#Article 1: दैनिक पूजा (626 words)


दैनिक पूजा विधि हिन्दू धर्म की कई उपासना पद्धतियों में से एक है। ये एक दैनिक कर्म है। विभिन्न देवताओं को प्रसन्न करने के लिये कई मन्त्र बताये गये हैं, जो लगभग सभी पुराणों से हैं। वैदिक मन्त्र यज्ञ और हवन के लिये होते हैं।

पूजा की रीति इस तरह है : पहले कोई भी देवता चुनें, जिसकी पूजा करनी है। फ़िर विधिवत निम्नलिखित मन्त्रों (सभी संस्कृत में हैं) के साथ उसकी पूजा करें। पौराणिक देवताओं के मन्त्र इस प्रकार हैं :

नीचे लिखे मन्त्र गणेश के लिये हैं :

शुक्लाम्बर धरं विष्णुं शशि वर्णम् चतुर्भुजम् . 
प्रसन्न वदनं ध्यायेत् सर्व विघ्नोपशान्तये ..

ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . ध्यायामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आवाहयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आसनं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . अर्घ्यं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पाद्यं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आचमनीयं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . उप हारं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पंचामृत स्नानं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . वस्त्र युग्मं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . यज्ञोपवीतं धारयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आभरणानि समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . गंधं धारयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . अक्षतान् समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुष्पैः पूजयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . प्रतिष्ठापयामि .

विनायक (गणेश) के पाँच नाम चुनें और ऐसा कहें :
ॐ महा गणपतये नमः . पादौ पूजयामि . 
ॐ विघ्न राजाय नमः . उदरम् पूजयामि . 
ॐ एक दन्ताय नमः . बाहुं पूजयामि . 
ॐ गौरी पुत्राय नमः . हृदयं पूजयामि . 
ॐ आदि वन्दिताय नमः . शिरः पूजयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . अंग पूजां समर्पयामि . 

विनायक (गणेश) के पाँच नाम चुनें और ऐसा कहें :
ॐ महा गणपतये नमः . आम्र पत्रम् समर्पयामि . 
ॐ विघ्न राजाय नमः . केतकि पत्रम् समर्पयामि . 
ॐ एक दन्ताय नमः . मन्दार पत्रम् समर्पयामि . 
ॐ गौरी पुत्राय नमः . सेवन्तिका पत्रं समर्पयामि . 
ॐ आदि वन्दिताय नमः . कमल पत्रं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पत्र पूजां समर्पयामि . 

विनायक (गणेश) के पाँच नाम चुनें और ऐसा कहें :
ॐ महा गणपतये नमः . जाजी पुष्पं समर्पयामि . 
ॐ विघ्न राजाय नमः . केतकी पुष्पं समर्पयामि . 
ॐ एक दन्ताय नमः . मन्दार पुष्पं समर्पयामि . 
ॐ गौरी पुत्राय नमः . सेवन्तिका पुष्पं समर्पयामि . 
ॐ आदि वन्दिताय नमः . कमल पुष्पं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुष्प पूजां समर्पयामि . 

अगर सम्भव हो तो गणेश के 108 नाम जपें :

ॐ सुमुखाय नमः . एक दन्ताय नमः . 
कपिलाय नमः . गज कर्णकाय नमः . 
लम्बोदराय नमः . विकटाय नमः . 
विघ्न राजाय नमः . विनायकाय नमः . 
धूम केतवे नमः . गणाध्यक्षाय नमः . 
भालचन्द्राय नमः . गजाननाय नमः . 
वक्रतुण्डाय नमः . हेरम्बाय नमः . 
स्कन्द पूर्वजाय नमः . सिद्धि विनायकाय नमः . 
श्री महागणपतये नमः . नाम पूजां समर्पयामि .

ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . धूपं आघ्रापयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . दीपं दर्शयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . नैवेद्यं निवेदयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . फलाष्टकं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . ताम्बूलं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . कर्पूर नीराजनं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . मंगल आरतीं समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुष्पांजलिं समर्पयामि . 

यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च .

तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणा पदे पदे ..

प्रदक्षिणा नमस्कारान् समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . समस्त राजोपचारान् समर्पयामि . 
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . मंत्र पुष्पं समर्पयामि . 

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ .

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ..

प्रार्थनां समर्पयामि . 

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं .

पूजाविधिं न जानामि क्षमस्व पुरुषोत्तम ..

क्षमापनं समर्पयामि .

ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुनरागमनाय च .




#Article 2: हिन्दी (3489 words)


हिन्दी विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की एक राजभाषा है। केन्द्रीय स्तर पर भारत में दूसरी आधिकारिक भाषा अंग्रेज़ी है। यह हिंदुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्दों का प्रयोग अधिक है और अरबी-फ़ारसी शब्द कम हैं। हिंदी संवैधानिक रूप से भारत की राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत के संविधान में किसी भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया है। एथनॉलोग (Ethnologue) के अनुसार हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है।

हिन्दी और इसकी बोलियाँ सम्पूर्ण भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं। भारत और अन्य देशों में भी लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम, नेपाल  और संयुक्त अरब अमीरात की जनता भी हिन्दी बोलती है। फरवरी २०१९ में अबू धाबी में हिन्दी को न्यायालय की तीसरी भाषा के रूप में मान्यता मिली।

भारत की जनगणना २०११ में 57.1% भारतीय आबादी हिंदी जानती है जिसमें से 43.63% भारतीय लोगों ने हिंदी को अपनी मूल भाषा या मातृभाषा घोषित किया था। भारत के बाहर, हिंदी बोलने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका में ८,६३,०७७; मॉरीशस में ६,८५,१७०; दक्षिण अफ़्रीका में ८,९०,२९२; यमन में २,३२,७६०; युगांडा में १,४७,०००; सिंगापुर में ५,०००; नेपाल में ८ लाख; जर्मनी में ३०,००० हैं। न्यूजीलैंड में हिंदी चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है।

इसके अलावा भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों में १४ करोड़ १० लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली उर्दू, मौखिक रूप से हिन्दी के समान है। एक विशाल संख्या में लोग हिंदी और उर्दू दोनों को ही समझते हैं। भारत में हिन्दी, विभिन्न भारतीय राज्यों की १४ आधिकारिक भाषाओं और क्षेत्र की बोलियों का उपयोग करने वाले लगभग १ अरब लोगों में से अधिकांश की दूसरी भाषा है।

हिन्दी भारत में सम्पर्क भाषा का कार्य करती है  और कुछ हद तक पूरे भारत में आमतौर पर एक सरल रूप में समझी जानेवाली भाषा है। कभी-कभी 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग नौ भारतीय राज्यों के संदर्भ में भी उपयोग किया जाता है, जिनकी आधिकारिक भाषा हिंदी है और हिन्दी भाषी बहुमत है, अर्थात् बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का।सन २०२० में हिन्दी को नवगठित संघशासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर की एक आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिली।

'देशी', 'भाखा' (भाषा), 'देशना वचन' (विद्यापति), 'हिंदवी', 'दक्खिनी', 'रेखता', 'आर्यभाषा' (दयानन्द सरस्वती), 'हिंदुस्तानी', 'खड़ी बोली', 'भारती' आदि हिंदी के अन्य नाम हैं जो विभिन्न ऐतिहासिक कालखण्डों में एवं विभिन्न संदर्भों में प्रयुक्त हुए हैं।

हिन्दी, यूरोपीय भाषा-परिवार के अन्दर आती है। ये हिन्द ईरानी शाखा की हिन्द आर्य उपशाखा के अन्तर्गत वर्गीकृत है। हिन्द-आर्य भाषाएँ वो भाषाएँ हैं जो संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं। उर्दू, कश्मीरी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, रोमानी, मराठी नेपाली जैसी भाषाएँ भी हिन्द-आर्य भाषाएँ हैं।

हिन्दी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। इसे नागरी के नाम से भी जाना जाता है। देवनागरी में ११ स्वर और ३३ व्यंजन हैं। इसे बाईं से दाईं तरफ़ लिखा जाता है।

हिन्दी शब्द का सम्बन्ध संस्कृत शब्द सिंधु से माना जाता है। 'सिंधु' सिंध नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आस-पास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिंधु शब्द ईरानी में जाकर ‘हिंदू’, हिंदी और फ़िर ‘हिंद’ हो गया। बाद में ईरानी धीरे-धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया तथा हिंद शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से (हिन्द+ईक) ‘हिंदीक’ बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। यूनानी शब्द ‘इन्दिका’ या अंग्रेज़ी शब्द ‘इंडिया’ आदि इस ‘हिंदीक’ के ही दुसरे रूप हैं। हिंदी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग शरफ़ुद्दीन यज्दी’ के ‘जफ़रनामा’(1424) में मिलता है।

प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने अपने हिंदी एवं उर्दू काअद्वैत शीर्षक आलेख में हिंदी की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए कहा है कि ईरान की प्राचीन भाषा अवेस्ता में 'स्' ध्वनि नहीं बोली जाती थी बल्कि 'स्' को 'ह्' की तरह बोला जाता था। जैसे संस्कृत शब्द 'असुर' का अवेस्ता में सजाति समकक्ष शब्द 'अहुर' था। अफ़ग़ानिस्तान के बाद सिंधु नदी के इस पार हिंदुस्तान के पूरे इलाके को प्राचीन फ़ारसी साहित्य में भी 'हिंद', 'हिंदुश' के नामों से पुकारा गया है तथा यहाँ की किसी भी वस्तु, भाषा, विचार को विशेषण के रूप में 'हिन्दीक' कहा गया है जिसका मतलब है 'हिन्द का' या 'हिन्द से'। यही 'हिन्दीक' शब्द अरबी से होता हुआ ग्रीक में 'इन्दिके', 'इन्दिका', लैटिन में 'इन्दिया' तथा अंग्रेज़ी में 'इंडिया' बन गया। अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में भारत (हिंद) में बोली जाने वाली भाषाओं के लिए 'ज़बान-ए-हिन्दी' पद का उपयोग हुआ है। भारत आने के बाद अरबी-फ़ारसी बोलने वालों ने 'ज़बान-ए-हिंदी', 'हिंदी ज़बान' अथवा 'हिंदी' का प्रयोग दिल्ली-आगरा के चारों ओर बोली जाने वाली भाषा के अर्थ में किया।

भाषाविद हिन्दी ब्लॉग एवं उर्दू को एक ही भाषा समझते है। हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर अधिकांशत: संस्कृत के शब्दों का प्रयोग करती है। उर्दू, नास्तिलिक लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर उस पर फ़ारसी और अरबी भाषाओं का प्रभाव अधिक है। हालाँकि व्याकरणिक रूप से उर्दू और हिन्दी में कोई अंतर नहीं है मगर कुछ विशेष क्षेत्रों में शब्दावली के स्रोत (जैसा कि ऊपर लिखा गया है) में अंतर है। कुछ विशेष ध्वनियाँ उर्दू में अरबी और फ़ारसी से ली गयी हैं और इसी प्रकार फ़ारसी और अरबी की कुछ विशेष व्याकरणिक संरचनाएँ भी प्रयोग की जाती हैं। उर्दू और हिन्दी को खड़ीबोली की दो आधिकारिक शैलियाँ हैं।

हिन्‍दी भाषा का इतिहास लगभग एक हज़ार वर्ष पुराना माना गया है। हिन्‍दी भाषा व साहित्‍य के जानकार अपभ्रंश की अंतिम अवस्‍था 'अवहट्ठ' से हिन्‍दी का उद्भव स्‍वीकार करते हैं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने इसी अवहट्ठ को 'पुरानी हिन्दी' नाम दिया।

अपभ्रंश की समाप्ति और आधुनिक भारतीय भाषाओं के जन्मकाल के समय को संक्रांतिकाल कहा जा सकता है। हिन्दी का स्वरूप शौरसेनी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से विकसित हुआ है। १००० ई. के आसपास इसकी स्वतंत्र सत्ता का परिचय मिलने लगा था, जब अपभ्रंश भाषाएँ साहित्यिक संदर्भों में प्रयोग में आ रही थीं। यही भाषाएँ बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के रूप में अभिहित हुईं। अपभ्रंश का जो भी कथ्य रूप था - वही आधुनिक बोलियों में विकसित हुआ।

अपभ्रंश के सम्बंध में ‘देशी’ शब्द की भी बहुधा चर्चा की जाती है। वास्तव में ‘देशी’ से देशी शब्द एवं देशी भाषा दोनों का बोध होता है। प्रश्न यह कि देशीय शब्द किस भाषा के थे ? भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में उन शब्दों को ‘देशी’ कहा है ‘जो संस्कृत के तत्सम एवं सद्भव रूपों से भिन्न है। ये ‘देशी’ शब्द जनभाषा के प्रचलित शब्द थे, जो स्वभावत: अप्रभंश में भी चले आए थे। जनभाषा व्याकरण के नियमों का अनुसरण नहीं करती, परंतु व्याकरण को जनभाषा की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करना पड़ता है, प्राकृत-व्याकरणों ने संस्कृत के ढाँचे पर व्याकरण लिखे और संस्कृत को ही प्राकृत आदि की प्रकृति माना। अतः जो शब्द उनके नियमों की पकड़ में न आ सके, उनको देशी संज्ञा दी गई।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हिन्दी और देवनागरी के मानकीकरण की दिशा में निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रयास हुये हैं :-

भाषाविदों के अनुसार हिन्दी के चार प्रमुख रूप या शैलियाँ हैं :

हिन्दी और उर्दू दोनों को मिलाकर हिन्दुस्तानी भाषा कहा जाता है। हिन्दुस्तानी मानकीकृत हिन्दी और मानकीकृत उर्दू के बोलचाल की भाषा है। इसमें शुद्ध संस्कृत और शुद्ध फ़ारसी-अरबी दोनों के शब्द कम होते हैं और तद्भव शब्द अधिक। उच्च हिन्दी भारतीय संघ की राजभाषा है (अनुच्छेद ३४३, भारतीय संविधान)। यह इन भारतीय राज्यों की भी राजभाषा है : उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली। इन राज्यों के अतिरिक्त महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, पंजाब और हिन्दी भाषी राज्यों से लगते अन्य राज्यों में भी हिन्दी बोलने वालों की अच्छी संख्या है। उर्दू पाकिस्तान की और भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर की राजभाषा है, इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, बिहार,तेलंगाना और दिल्ली में द्वितीय राजभाषा है। यह लगभग सभी ऐसे राज्यों की सह-राजभाषा है; जिनकी मुख्य राजभाषा हिन्दी है।

हिन्दी का क्षेत्र विशाल है तथा हिन्दी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं। इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना भी हुई है। ऐसी बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं। ये बोलियाँ हिन्दी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी। वे हिन्दी की जड़ों को गहरा बनाती हैं। हिन्दी की बोलियाँ और उन बोलियों की उपबोलियाँ हैं जो न केवल अपने में एक बड़ी परंपरा, इतिहास, सभ्यता को समेटे हुए हैं वरन स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना संसार सचेत है।

हिन्दी की बोलियों में प्रमुख हैं- अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुमाउँनी, मगही आदि। किन्तु हिन्दी के मुख्य दो भेद हैं - पश्चिमी हिन्दी तथा पूर्वी हिन्दी।

हिन्दी शब्दावली में मुख्यतः दो वर्ग हैं-

जिस हिन्दी में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी के शब्द लगभग पूरी तरह से हटा कर तत्सम शब्दों को ही प्रयोग में लाया जाता है, उसे शुद्ध हिन्दी या मानकीकृत हिन्दी कहते हैं।

देवनागरी लिपि में हिन्दी की ध्वनियाँ इस प्रकार हैं :

ये स्वर आधुनिक हिन्दी (खड़ीबोली) के लिये दिये गये हैं। 

इसके अलावा हिन्दी और संस्कृत में ये वर्णाक्षर भी स्वर माने जाते हैं :

जब किसी स्वर प्रयोग ना हो तो वहाँ पर डिफ़ॉल्ट रूप से 'अ' स्वर माना जाता है। स्वर के ना होना व्यंजन के नीचे हलन्त्‌ या विराम लगाके दर्शाया जाता है। जैसे क्‌ /k/, ख्‌ /kʰ/, ग्‌ /g/ और घ्‌ /gʱ/।

ये ध्वनियाँ मुख्यत: अरबी और फ़ारसी भाषाओं से लिये गये शब्दों के मूल उच्चारण में होती हैं। इनका स्रोत संस्कृत नहीं है। देवनागरी लिपि में ये सबसे करीबी देवनागरी वर्ण के नीचे बिन्दु (नुक़्ता) लगाकर लिखे जाते हैं। 

अन्य सभी भारतीय भाषाओं की तरह हिन्दी में भी कर्ता-कर्म-क्रिया वाला वाक्यविन्यास है। हिन्दी मे दो लिंग होते हैं — पुल्लिंग और स्त्रीलिंग। नपुंसक वस्तुओं का लिंग भाषा परम्परानुसार पुलिंग या स्त्रीलिंग होता है। क्रिया के रूप कर्ता के लिंग पर निर्भर करता है। हिन्दी में दो वचन होते हैं — एकवचन और बहुवचन। क्रिया वचन-से भी प्रभावित होती है। विशेषण विशेष्य-के पहले लगता है।

भिन्न-भिन्न भाषा-भाषियों के मध्य परस्पर विचार-विनिमय का माध्यम बनने वाली भाषा को सम्पर्क भाषा कहा जाता है। अपने राष्ट्रीय स्वरूप में ही हिन्दी पूरे भारत की सम्पर्क भाषा बनी हुर्इ है। अपने सीमित रूप में, प्रशासनिक भाषा के रूप में, हिन्दी के व्यवहार में भिन्न भाषाभाषियों के बीच परस्पर सम्प्रेषण का माध्यम बनी हुर्इ है। सम्पूर्ण भारतवर्ष में बोली और समझी जाने वाली राष्ट्रभाषा हिन्दी है, वह सरकार की राजभाषा भी है तथा सारे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली सम्पर्क भाषा भी है। इस तरह अपने तीनों रूपों-राष्ट्रभाषा, राजभाषा और सम्पर्क भाषा - में हिन्दी भाषा अपना दायित्व सहजता से निभा रही है क्याेंकि इन तीनों में अन्तःसम्बन्ध हैं। 

'राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र में स्वीकृत भाषा होती है जबकि प्रशासनिक कार्यों के व्यवहारों में प्रयुक्त होने वाली 'राजभाषा' घोषित की जाती है तथा सम्पर्क भाषा का विकास प्राकृतिक और स्वैचिछक आधार पर होता है जो सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। सम्पर्क भाषा ही सर्व-स्वीकृत होकर राष्ट्रभाषा बनती है। समृद्ध देशों में राष्ट्रभाषा, राजभाषा और सम्पर्क भाषा के रूप में एक ही भाषा का प्रयोग होता है, जैसे जापान, अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि देश। इस दृष्टि से भारत भी समृद्ध देश है जहाँ हिन्दी ही अपने तीनों रूपों में प्रयुक्त होती है। विश्व के अनेक देशों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार हो रहा है।

हिन्दी भारत की राजभाषा है। १४ सितम्बर १९४९ को हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था।

यद्यपि राष्ट्रभाषा के विषय में भारतीय संविधान में कुछ भी नहीं कहा गया है किन्तु राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहा था।उन्होंने 29 मार्च 1918 को इंदौर में आठवें हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। उस समय उन्होंने अपने सार्वजनिक उद्बोधन में पहली बार आह्वान किया था कि हिन्दी को ही भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिये। उन्होने यह भी कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।  उन्होने तो यहाँ तक कहा था कि हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।

आजाद हिन्द फौज का राष्ट्रगान 'शुभ सुख चैन' हिन्दी में था। उनका अभियान गीत 'कदम कदम बढ़ाए जा' भी हिन्दी में था।

कम्प्यूटर और इन्टरनेट ने पिछले वर्षों मे विश्व मे सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कम्प्यूटर (तथा कम्प्यूटर सदृश अन्य उपकरणों) से दूर रहकर लोगों से जुड़ी नही रह सकती। कम्प्यूटर के विकास के आरम्भिक काल में अंग्रेजी को छोड़कर विश्व की अन्य भाषाओं के कम्प्यूटर पर प्रयोग की दिशा में बहुत कम ध्यान दिया गया जिससे कारण सामान्य लोगों में यह गलत धारणा फैल गयी कि कम्प्यूटर अंग्रेजी के सिवा किसी दूसरी भाषा (लिपि) में काम ही नही कर सकता। किन्तु यूनिकोड (Unicode) के पदार्पण के बाद स्थिति बहुत तेजी से बदल गयी। 19 अगस्त 2009 में गूगल ने कहा की हर 5 वर्षों में हिन्दी की सामग्री में 94% बढ़ोतरी हो रही है। 

हिन्दी की इंटरनेट पर अच्छी उपस्थिति है। गूगल जैसे सर्च इंजन हिन्दी को प्राथमिक भारतीय भाषा के रूप में पहचानते हैं। इसके साथ ही अब अन्य भाषा के चित्र में लिखे शब्दों का भी अनुवाद हिन्दी में किया जा सकता है। फरवरी २०१८ में एक सर्वेक्षण के हवाले से खबर आयी कि इंटरनेट की दुनिया में हिंदी ने भारतीय उपभोक्ताओं के बीच अंग्रेजी को पछाड़ दिया है। यूथ4वर्क की इस सर्वेक्षण रिपोर्ट ने इस आशा को सही साबित किया है कि जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसार छोटे शहरों की ओर बढ़ेगा, हिंदी और भारतीय भाषाओं की दुनिया का विस्तार होता जाएगा। 

इस समय हिन्दी में सजाल (websites), चिट्ठे (Blogs), विपत्र (email), गपशप (chat), खोज (web-search), सरल मोबाइल सन्देश (SMS) तथा अन्य हिन्दी सामग्री उपलब्ध हैं। इस समय अन्तरजाल पर हिन्दी में संगणन के संसाधनों की भी भरमार है और नित नये कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। लोगों मे इनके बारे में जानकारी देकर जागरूकता पैदा करने की जरूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कम्प्यूटर पर हिन्दी का प्रयोग करते हुए अपना, हिन्दी का और पूरे हिन्दी समाज का विकास करें। शब्दनगरी जैसी नयी सेवाओं का प्रयोग करके लोग अच्छे हिन्दी साहित्य का लाभ अब इंटरनेट पर भी उठा सकते हैं।

हिन्दी सिनेमा का उल्लेख किये बिना हिन्दी का कोई भी लेख अधूरा होगा। मुम्बई मे स्थित बॉलीवुड हिन्दी फ़िल्म उद्योग पर भारत के करोड़ो लोगों की धड़कनें टिकी रहती हैं। हर चलचित्र में कई गाने होते हैं। हिन्दी और उर्दू (खड़ीबोली) के साथ साथ अवधी, बम्बइया हिन्दी, भोजपुरी, राजस्थानी जैसी बोलियाँ भी संवाद और गानों मे उपयुक्त होती हैं। प्यार, देशभक्ति, परिवार, अपराध, भय, इत्यादि मुख्य विषय होते हैं। अधिकतर गाने उर्दू शायरी पर आधारित होते हैं। कुछ लोकप्रिय चलचित्र हैं: महल (1949), श्री ४२० (1955), मदर इंडिया (1957), मुग़ल-ए-आज़म (1960), गाइड (1965), पाकीज़ा (1972), बॉबी (1973), ज़ंजीर (1973), यादों की बारात (1973), दीवार (1975), शोले (1975), मिस्टर इंडिया (1987), क़यामत से क़यामत तक (1988), मैंने प्यार किया (1989), जो जीता वही सिकन्दर (1991), हम आपके हैं कौन (1994), दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995), दिल तो पागल है (1997), कुछ कुछ होता है (1998), ताल (1999), कहो ना प्यार है (2000), लगान (2001), दिल चाहता है (2001), कभी ख़ुशी कभी ग़म (2001), देवदास (2002), साथिया (2002), मुन्ना भाई एमबीबीएस (2003), कल हो ना हो (2003), धूम (2004), वीर-ज़ारा (2004), स्वदेस (2004), सलाम नमस्ते (2005), रंग दे बसंती (2006) इत्यादि।

अब मोबाइल कंपनियां ऐसे हैंडसेट बना रही हैं जो हिंदी और भारतीय भाषाओं को सपोर्ट करते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी जानने वाले कर्मचारियों को वरीयता दे रही हैं। हॉलीवुड की फिल्में हिंदी में डब हो रही हैं और हिंदी फिल्में देश के बाहर देश से अधिक कमाई कर रही हैं। हिंदी, विज्ञापन उद्योग की पसंदीदा भाषा बनती जा रही है। गूगल, ट्रांसलेशन, ट्रांस्लिटरेशन, फोनेटिक टूल्स, गूगल असिस्टैन्ट आदि के क्षेत्र में नई नई रिसर्च कर अपनी सेवाओं को बेहतर कर रहा है। हिंदी और भारतीय भाषाओं की पुस्तकों का डिजिटलीकरण जारी है। 

फेसबुक और व्हाट्सएप हिंदी और भारतीय भाषाओं के साथ तालमेल बिठा रहे हैं। सोशल मीडिया ने हिंदी में लेखन और पत्रकारिता के नए युग का सूत्रपात किया है और कई जनान्दोलनों को जन्म देने और चुनाव जिताने-हराने में उल्लेखनीय और हैरान करने वाली भूमिका निभाई है। सितम्बर २०१८ में प्रकाशित हुई एक अमेरिकी रपट के अनुसार हिन्दी में ट्वीट करना अत्यन्त लोकप्रिय हो रहा है। रपट में कहा गया है कि पिछले वर्ष सबसे अधिक पुनः ट्वीट किए गये १५ सन्देशों में से ११ हिन्दी के थे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का बाजार इतना बड़ा है कि अनेक कम्पनियाँ अपने उत्पाद और वेबसाइटें हिन्दी और स्थानीय भाषाओं में ला रहीं हैं।

सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् 1997 में 'सैन्सस ऑफ़ इंडिया' का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित होने तथा संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए यूनेस्को द्वारा सन् 1998 में भेजी गई यूनेस्को प्रश्नावली के आधार पर उन्हें भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब विश्व स्तर पर यह स्वीकृत है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु मातृभाषियों की संख्या अंग्रेजी भाषियों से अधिक है। 

विश्वभाषा बनने के सभी गुण हिन्दी में विद्यमान हैं। बीसवीं शती के अंतिम दो दशकों में हिन्दी का अनतरराष्ट्रीय विकास बहुत तेजी से हुआ है। हिंदी एशिया के व्यापारिक जगत् में धीरे-धीरे अपना स्वरूप बिंबित कर भविष्य की अग्रणी भाषा के रूप में स्वयं को स्थापित कर रही है। वेब, विज्ञापन, संगीत, सिनेमा और बाजार के क्षेत्र में हिन्दी की मांग जिस तेजी से बढ़ी है वैसी किसी और भाषा में नहीं। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों तथा सैकड़ों छोटे-बड़े केंद्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध स्तर तक हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हुई है। विदेशों में 25 से अधिक पत्र-पत्रिकाएं लगभग नियमित रूप से हिन्दी में प्रकाशित हो रही हैं। यूएई के 'हम एफ-एम' सहित अनेक देश हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें बीबीसी, जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिन्दी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 

दिसम्बर २०१६ में विश्व आर्थिक मंच ने १० सर्वाधिक शक्तिशाली भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिन्दी भी एक है। इसी प्रकार 'कोर लैंग्वेजेज' नामक साइट ने 'दस सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाषाओं' में हिन्दी को स्थान दिया था। के-इण्टरनेशनल ने वर्ष २०१७ के लिये सीखने योग्य सर्वाधिक उपयुक्त नौ भाषाओं में हिन्दी को स्थान दिया है।

हिन्दी का एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने और विश्व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन को संस्थागत व्यवस्था प्रदान करने के उद्देश्य से ११ फरवरी २००८ को विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना की गयी थी। संयुक्त राष्ट्र रेडियो अपना प्रसारण हिन्दी में भी करना आरम्भ किया है। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाये जाने के लिए भारत सरकार प्रयत्नशील है। अगस्त २०१८ से संयुक्त राष्ट्र ने साप्ताहिक हिन्दी समाचार बुलेटिन आरम्भ किया है। 

पूर्वोत्तर एक अहिन्दी भाषी क्षेत्र है। यहाँ हजारों वर्षों से असमीया भाषा संपर्क भाषा रही है। यहाँ असमीया के साथ ही बंगला, नेपाली, मणिपुरी, अंग्रेजी, खासी, गारो, निशी, आदि, मोनपा, वांग्चु, नागामीज, मिजो, काॅकबराक, लेप्चा, भुटिया और गिनते-गिनते इन आठ राज्यों में प्रायः 200 विभिन्न भाषायें एवं बोलियां प्रचलित हैं। अधिकांश भाषा एवं बोलियां तिब्बत-बर्मी परिवार की होने के कारण अलग से पहचानी जाती हैं। विविधताओं के कारण इस अंचल को ‘भाषाओं की प्रयोगशाला’ कहा जाता है। 

पूर्वोत्तर भारत में अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनकी अपनी-अपनी भाषाएँ तथा बोलियां हैं। इनमें बोड़ो, कछारी, जयंतिया, कोच, त्रिपुरी, गारो, राभा, देउरी, दिमासा, रियांग, लालुंग, नागा, मिजो, त्रिपुरी, जामातिया, खासी, कार्बी, मिसिंग, निशी, आदी, आपातानी, इत्यादि प्रमुख हैं। पूर्वोत्तर की भाषाओं में से केवल असमिया, बोड़ो और मणिपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिला है। सभी राज्यों में हिन्दी भाषा का प्रयोग अधिकांश प्रवासी हिन्दी भाषियों द्वारा आपस में किया जाता है। 

पूर्वोत्तर में हिन्दी का औपचारिक रूप से प्रवेश वर्ष 1934 में हुआ, जब महात्मा गांधी ‘अखिल भारतीय हरिजन सभा’ की स्थापना हेतु असम आये। उस समय गड़मूड़ (माजुली) के सत्राधिकार (वैष्णव धर्मगुरू) एवं स्वतंत्रता सेनानी श्री श्री पीताम्बर देव गोस्वामी के आग्रह पर गांधी जी संतुष्ट होकर ‘बाबा राघव दास जी’ को हिन्दी प्रचारक के रूप में असम भेजा। वर्ष 1938 में ‘असम हिन्दी प्रचार समिति’ की स्थापना गुवाहाटी में हुई। यह समिति आगे चलकर ‘असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ बनी। आम लोगों में हिन्दी भाषा तथा साहित्य के प्रचार-प्रसार करने हेतु- प्रबोध, विशारद, प्रवीण, आदि परीक्षाओं का आयोजन इस समिति के द्वारा होता आ रहा है। पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति दिनों-दिन सबल होती जा रही है और यह सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।  हिन्दी का प्रचार-प्रसार तथा उसकी लोकप्रियता एवं व्यावहारिकता टी.वी. (धारावाहिक, विज्ञापन), सिनेमा, आकाशवाणी, पत्रकारिता, विद्यालय, महाविद्यालय तथा उच्च शिक्षा में हिन्दी भाषा के प्रयोग द्वारा बढ़ रही है।




#Article 3: फ़ारसी भाषा (765 words)


फ़ारसी (), एक भाषा है जो ईरान, ताजिकिस्तान, अफ़गानिस्तान और उज़बेकिस्तान में बोली जाती है। यह ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, ताजिकिस्तान की राजभाषा है और इसे ७.५ करोड़ लोग बोलते हैं। भाषाई परिवार के लिहाज़ से यह हिन्द यूरोपीय परिवार की हिन्द ईरानी (इंडो ईरानियन) शाखा की ईरानी उपशाखा का सदस्य है और हिन्दी की तरह इसमें क्रिया वाक्य के अंत में आती है। फ़ारसी संस्कृत से क़ाफ़ी मिलती-जुलती है और उर्दू (और हिन्दी) में इसके कई शब्द प्रयुक्त होते हैं। ये अरबी-फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। अंग्रेज़ों के आगमन से पहले भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी भाषा का प्रयोग दरबारी कामों तथा लेखन की भाषा के रूप में होता है। दरबार में प्रयुक्त होने के कारण ही अफ़गानिस्तान में इस दरी कहा जाता है।

इसे हिन्द-यूरोपीय भाषा परिवार की हिन्द-ईरानी शाखा की ईरानी भाषाओं की उपशाखा के पश्चिमी विभाग में वर्गीकृत किया जाता है। हालाँकि भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी को ग़लती से अरबी भाषा के समीप समझा जाता है, भाषावैज्ञानिक दृष्टि से यह अरबी से बहुत भिन्न और संस्कृत के बहुत समीप है। संस्कृत और फ़ारसी में कई हज़ारों मिलते-जुलते सजातीय शब्द मिलते हैं जो दोनों भाषाओँ की सांझी धरोहर हैं, जैसे की सप्ताह/हफ़्ता, नर/नर (पुरुष), दूर/दूर, हस्त/दस्त (हाथ), शत/सद (सौ), आप/आब (पानी), हर/ज़र (फ़ारसी में पीला-सुनहरा, संस्कृत में पीला-हरा), मय/मद/मधु (शराब/शहद), अस्ति/अस्त (है), रोचन/रोशन (चमकीला), एक/येक, कपि/कपि (वानर), दन्त/दन्द (दाँत), मातृ/मादर, पितृ/पिदर, भ्रातृ/बिरादर (भाई), दुहितृ/दुख़्तर (बेटी), वंश/बच/बच्चा, शुकर/ख़ूक (सूअर), अश्व/अस्ब (घोड़ा), गौ/गऊ (गाय), जन/जान (संस्कृत में व्यक्ति/जीव, फ़ारसी में जीवन), भूत/बूद (था, अतीत), ददामि/दादन (देना), युवन/जवान, नव/नव (नया) और सम/हम (बराबर)।

भारत में इसे फ़ारसी कहा जाता है। इसका मूल नाम 'पारसी' है पर अरब लोग, जिन्होंने फ़ारस पर सातवीं सदी के अंत तक अधिकार कर लिया था, की वर्णमाला में 'प' अक्षर नहीं होता है। इस कारण से वे इसे फ़ारसी कहते थे और यही नाम भारत में भी प्रयुक्त होता है। यूनानी लोग फार्स को पर्सिया (पुरानी ग्रीक में पर्सिस, Πέρσις) कहते थे। जिसके कारण यहाँ की भाषा पर्सियन (Persian) कहलाई। यही नाम अंग्रेज़ी सहित अन्य यूरोपीय भाषाओं में प्रयुक्त होता है।

फ़ारसी एक ईरानी भाषा है जो हिंद-यूरोपीय भाषा परिवार की हिंद-ईरानी शाखा में आती है। सामान्यत: ईरानी भाषा तीन अवधियों से जानी जाती है। आमतौर पर इस रूप में इसे ऐसे संदर्भित किया जाता हैं: पुरानी, मध्य और नई (आधुनिक) अवधि। ये ईरानी इतिहास में तीन युगों के अनुरूप हैं; पुराना युग हख़ामनी साम्राज्य से कुछ पहले का समय हैं, हख़ामनी युग और हख़ामनी के कुछ बाद वाला समय (400-300 ईसा पूर्व) है, मध्य युग सासानी युग और सासानी के कुछ बाद वाला समय और नया युग वर्तमान दिन तक की अवधि है।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, फ़ारसी भाषा केवल अकेली ईरानी भाषा है, जिसके लिए इसके तीनों चरणों के नज़दीकी भाषाविज्ञान-संबंधी रिश्ते स्थापित किए गए हैं तो पुरानी, मध्य और नई फ़ारसी एक ही फारसी भाषा का प्रतिनिधित्व करते हैं, कि नई फ़ारसी मध्य और पुरानी फारसी की एक प्रत्यक्ष वंशज है।

फ़ारसी भाषा ने पश्चिम एशिया, यूरोप, मध्य एशिया और दक्षिण एशियाई क्षेत्र की कई आधुनिक भाषाओं के निर्माण को प्रभावित किया। दक्षिण एशिया में तुर्कों-फ़ारसी गज़नवी विजय के बाद, फारसी सबसे पहले इस क्षेत्र में समाविष्ट की गई थी। ब्रिटिश उपनिवेश की स्थापना के पाँच सदियों पूर्व तक, फारसी व्यापक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में एक दूसरी भाषा के रूप में इस्तेमाल की जाती थी। इसने उपमहाद्वीप पर कई मुस्लिम दरबारों में संस्कृति और शिक्षा की भाषा के रूप में प्रमुखता ले ली। हालाँकि 1843 के शुरू से, अंग्रेजी और हिंदुस्तानी ने धीरे धीरे उपमहाद्वीप पर महत्व में फ़ारसी को बदल दिया। फ़ारसी के ऐतिहासिक प्रभाव के साक्ष्य भारतीय उपमहाद्वीप की कुछ भाषाओं पर इसके प्रभाव की सीमा में देखा जा सकता है। फारसी से उधार लिए शब्द अभी भी आमतौर पर कुछ हिंद आर्य भाषाओं में उपयोग किए जाते है। कुछ मुख्य दक्षिण एशियाई साम्राज्य जिनकी राजभाषा फ़ारसी थी:-

निम्नलिखित फारसी से संबंधित कुछ भाषाएं हैं:

ईरानी फ़ारसी में छह स्वर और बाईस व्यंजन है।

फ़ारसी ने अरबी भाषा पर कम प्रभाव डाला है और साथ ही मेसोपोटामिया की अन्य भाषाओं पर और इसकी मूल शब्दावली मध्य फारसी मूल की है, पर नई फारसी में अरबी शाब्दिक मदों की काफी मात्रा है, जिनका फ़ारसीकरण हो गया है। अरबी मूल के फारसी शब्दों में विशेष रूप से इस्लामी शब्द शामिल हैं। अन्य ईरानी, तुर्की और भारतीय भाषाओं में अरबी शब्दावली आम तौर पर नई फ़ारसी से नकल की गई है।

आधुनिक ईरानी फारसी और दारी में पाठ विशाल बहुमत से अरबी लिपि के साथ लिखा जाता है। ताजिक, जो मध्य एशिया की रूसी और तुर्की भाषाओं से प्रभावित है, को कुछ भाषाविदों द्वारा फारसी बोली माना जाता है, जिसे ताजिकिस्तान में सिरिलिक लिपि के साथ लिखा जाता है।




#Article 4: देवनागरी (2588 words)


देवनागरी एक भारतीय लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कई विदेशी भाषाएँ लिखी जाती हैं। यह बायें से दायें लिखी जाती है। इसकी पहचान एक क्षैतिज रेखा से है जिसे 'शिरोरेखा' कहते हैं। संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी,  हरियाणवी, बुंदेली भाषा, डोगरी, खस, नेपाल भाषा (तथा अन्य नेपाली भाषाएँ), तमांग भाषा, गढ़वाली, बोडो, अंगिका, मगही, भोजपुरी, नागपुरी,  मैथिली, संताली, राजस्थानी भाषा, बघेली आदि भाषाएँ और स्थानीय बोलियाँ भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में गुजराती, पंजाबी, बिष्णुपुरिया मणिपुरी, रोमानी और उर्दू भाषाएँ भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। देवनागरी विश्व में सर्वाधिक प्रयुक्त लिपियों में से एक है। यह दक्षिण एशिया की 175 से अधिक भाषाओं को लिखने के लिए प्रयुक्त हो रही है। 

अधिकतर भाषाओं की तरह देवनागरी भी बायें से दायें लिखी जाती है। प्रत्येक शब्द के ऊपर एक रेखा खिंची होती है (कुछ वर्णों के ऊपर रेखा नहीं होती है) इसे शिरोरेखा कहते हैं। देवनागरी का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। यह एक ध्वन्यात्मक लिपि है जो प्रचलित लिपियों (रोमन, अरबी, चीनी आदि) में सबसे अधिक वैज्ञानिक है। इससे वैज्ञानिक और व्यापक लिपि शायद केवल अध्वव लिपि है। भारत की कई लिपियाँ देवनागरी से बहुत अधिक मिलती-जुलती हैं, जैसे- बांग्ला, गुजराती, गुरुमुखी आदि। कम्प्यूटर प्रोग्रामों की सहायता से भारतीय लिपियों को परस्पर परिवर्तन बहुत आसान हो गया है।

भारतीय भाषाओं के किसी भी शब्द या ध्वनि को देवनागरी लिपि में ज्यों का त्यों लिखा जा सकता है और फिर लिखे पाठ को लगभग 'हू-ब-हू' उच्चारण किया जा सकता है, जो कि रोमन लिपि और अन्य कई लिपियों में सम्भव नहीं है, जब तक कि उनका विशेष मानकीकरण न किया जाये, जैसे आइट्रांस या IAST ।

इसमें कुल ५२ अक्षर हैं, जिसमें १४ स्वर और ३८ व्यंजन हैं। अक्षरों की क्रम व्यवस्था (विन्यास) भी बहुत ही वैज्ञानिक है। स्वर-व्यंजन, कोमल-कठोर, अल्पप्राण-महाप्राण, अनुनासिक्य-अन्तस्थ-उष्म इत्यादि वर्गीकरण भी वैज्ञानिक हैं। एक मत के अनुसार देवनगर (काशी) मे प्रचलन के कारण इसका नाम देवनागरी पड़ा। 

भारत तथा एशिया की अनेक लिपियों के संकेत देवनागरी से अलग हैं, परन्तु उच्चारण व वर्ण-क्रम आदि देवनागरी के ही समान हैं, क्योंकि वे सभी ब्राह्मी लिपि से उत्पन्न हुई हैं (उर्दू को छोड़कर)। इसलिए इन लिपियों को परस्पर आसानी से लिप्यन्तरित किया जा सकता है। देवनागरी लेखन की दृष्टि से सरल, सौन्दर्य की दृष्टि से सुन्दर और वाचन की दृष्टि से सुपाठ्य है। 

देवनागरी या नागरी नाम का प्रयोग क्यों प्रारम्भ हुआ और इसका व्युत्पत्तिपरक प्रवृत्तिनिमित्त क्या था- यह अब तक पूर्णतः निश्चित नहीं है। 

(क) 'नागर' अपभ्रंश या गुजराती नागर ब्राह्मणों से उसका संबंध बताया गया है। पर दृढ़ प्रमाण के अभाव में यह मत संदिग्ध है। 

(ख) दक्षिण में इसका प्राचीन नाम नंदिनागरी था। हो सकता है नंदिनागर कोई स्थानसूचक हो और इस लिपि का उससे कुछ संबंध रहा हो। 

(ग) यह भी हो सकता है कि नागर जन इसमें लिखा करते थे, अत: नागरी अभिधान पड़ा और जब संस्कृत के ग्रंथ भी इसमें लिखे जाने लगे तब देवनागरी भी कहा गया। 

(घ) सांकेतिक चिह्नों या देवताओं की उपासना में प्रयुक्त त्रिकोण, चक्र आदि संकेतचिह्नों को देवनागर कहते थे। कालान्तर में नाम के प्रथमाक्षरों का उनसे बोध होने लगा और जिस लिपि में उनको स्थान मिला- वह 'देवनागरी' या 'नागरी' कही गई। इन सब पक्षों के मूल में कल्पना का प्राधान्य है, निश्चयात्मक प्रमाण अनुपलब्ध हैं।

देवनागरी, भारत, नेपाल, तिब्बत और दक्षिण पूर्व एशिया की लिपियों के ब्राह्मी लिपि परिवार का हिस्सा है। गुजरात से कुछ अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनकी भाषा संस्कृत है और लिपि नागरी लिपि। ये अभिलेख पहली ईसवी से लेकर चौथी ईसवी के कालखण्ड के हैं। ध्यातव्य है कि नागरी लिपि, देवनागरी से बहुत निकट है और देवनागरी का पूर्वरूप है। अतः ये अभिलेख इस बात के साक्ष्य हैं कि प्रथम शताब्दी में भी भारत में देवनागरी का उपयोग आरम्भ हो चुका था। नागरी, सिद्धम और शारदा तीनों ही ब्राह्मी की वंशज हैं। रुद्रदमन के शिलालेखों का समय प्रथम शताब्दी का समय है और इसकी लिपि की देवनागरी से निकटता पहचानी जा सकती हैं। जबकि देवनागरी का जो वर्तमान मानक स्वरूप है, वैसी देवनागरी का उपयोग १००० ई के पहले आरम्भ हो चुका था। 

मध्यकाल के शिलालेखों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि नागरी से सम्बन्धित लिपियों का बड़े पैमाने पर प्रसार होने लगा था। कहीं-कहीं स्थानीय लिपि और नागरी लिपि दोनों में सूचनाएँ अंकित मिलतीं हैं।  उदाहरण के लिए, ८वीं शताब्दी के पट्टदकल (कर्नाटक) के स्तम्भ पर सिद्धमात्रिका और तेलुगु-कन्नड लिपि के आरम्भिक रूप - दोनों में ही सूचना लिखी हुई है। कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) के ज्वालामुखी अभिलेख में शारदा और देवनागरी दोनों में लिखा हुआ है। 

७वीं शताब्दी तक देवनागरी का नियमित रूप से उपयोग होना आरम्भ हो गया था और लगभग १००० ई तक  देवनागरी का पूर्ण विकास हो गया था।

डॉ॰ द्वारिका प्रसाद सक्सेना के अनुसार सर्वप्रथम देवनागरी लिपि का प्रयोग गुजरात के नरेश जयभट्ट (700-800 ई.) के शिलालेख में मिलता है। आठवीं शताब्दी में चित्रकूट, नवीं में बड़ौदा के ध्रुवराज भी अपने राज्यादेशों में इस लिपि का उपयोग किया हैं। 

कनिंघम की पुस्तक में सबसे प्राचीन मुसलमानों सिक्के के रूप में महमूद गजनवी द्वारा चलाये गए चांदी के सिक्के का वर्णन है जिस पर देवनागरी लिपि में संस्कृत अंकित है। मुहम्मद विनसाम (1192-1205) के सिक्कों पर लक्ष्मी की मूर्ति के साथ देवनागरी लिपि का व्यवहार हुआ है। शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1210-1235) के सिक्कों पर भी देवनागरी अंकित है। सानुद्दीन फिरोजशाह प्रथम, जलालुद्दीन रज़िया, बहराम शाह, अलाऊद्दीन मसूदशाह, नासिरुद्दीन महमूद, मुईजुद्दीन, गयासुद्दीन बलवन, मुईजुद्दीन कैकूबाद, जलालुद्दीन हीरो सानी, अलाउद्दीन महमद शाह आदि ने अपने सिक्कों पर देवनागरी अक्षर अंकित किये हैं। अकबर के सिक्कों पर देवनागरी में ‘राम‘ सिया का नाम अंकित है। गयासुद्दीन तुग़लक़, शेरशाह सूरी, इस्लाम शाह, मुहम्मद आदिलशाह, गयासुद्दीन इब्ज, ग्यासुद्दीन सानी आदि ने भी इसी परम्परा का पालन किया।

भाषावैज्ञानिक दृष्टि से देवनागरी लिपि अक्षरात्मक (सिलेबिक) लिपि मानी जाती है। लिपि के विकाससोपानों की दृष्टि से चित्रात्मक, भावात्मक और भावचित्रात्मक लिपियों के अनंतर अक्षरात्मक स्तर की लिपियों का विकास माना जाता है। पाश्चात्य और अनेक भारतीय भाषाविज्ञानविज्ञों के मत से लिपि की अक्षरात्मक अवस्था के बाद अल्फाबेटिक (वर्णात्मक) अवस्था का विकास हुआ। सबसे विकसित अवस्था मानी गई है ध्वन्यात्मक (फोनेटिक) लिपि की। देवनागरी को अक्षरात्मक इसलिए कहा जाता है कि इसके वर्ण- अक्षर (सिलेबिल) हैं- स्वर भी और व्यंजन भी। क, ख आदि व्यंजन सस्वर हैं- अकारयुक्त हैं। वे केवल ध्वनियाँ नहीं हैं अपितु सस्वर अक्षर हैं। अत: ग्रीक, रोमन आदि वर्णमालाएँ हैं। परंतु यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि भारत की ब्राह्मी या भारती वर्णमाला की ध्वनियों में व्यंजनों का पाणिनि ने वर्णसमाम्नाय के 14 सूत्रों में जो स्वरूप परिचय दिया है- उसके विषय में पतंजलि (द्वितीय शताब्दी ई.पू.) ने यह स्पष्ट बता दिया है कि व्यंजनों में संनियोजित अकार स्वर का उपयोग केवल उच्चारण के उद्देश्य से है। वह तत्वतः वर्ण का अंग नहीं है। इस दृष्टि से विचार करते हुए कहा जा सकता है कि इस लिपि की वर्णमाला तत्वतः ध्वन्यात्मक है, अक्षरात्मक नहीं।

देवनागरी की वर्णमाला में १२ स्वर और ३४ व्यंजन हैं। शून्य या एक या अधिक व्यंजनों और एक स्वर के मेल से एक अक्षर बनता है। 

निम्नलिखित स्वर आधुनिक हिन्दी (खड़ी बोली) के लिये दिये गये हैं। संस्कृत में इनके उच्चारण थोड़े अलग होते हैं।

संस्कृत में ऐ दो स्वरों का युग्म होता है और अ-इ या आ-इ की तरह बोला जाता है। इसी तरह औ अ-उ या आ-उ की तरह बोला जाता है।

इसके अलावा हिन्दी और संस्कृत में य

जब किसी स्वर प्रयोग नहीं हो, तो वहाँ पर 'अ' (अर्थात श्वा का स्वर) माना जाता है। स्वर के न होने को हलन्त्‌ अथवा विराम से दर्शाया जाता है। जैसे कि क्‌ ख्‌ ग्‌ घ्‌। 

जिन वर्णो को बोलने के लिए स्वर की सहायता लेनी पड़ती है उन्हें व्यंजन कहते है। 

दूसरे शब्दो में- व्यंजन उन वर्णों को कहते हैं, जिनके उच्चारण में स्वर वर्णों की सहायता ली जाती है। 

जैसे- क, ख, ग, च, छ, त, थ, द, भ, म इत्यादि।

हिन्दी भाषा में मुख्यत: अरबी और फ़ारसी भाषाओं से आये शब्दों को देवनागरी में लिखने के लिये कुछ वर्णों के नीचे नुक्ता (बिन्दु) लगे वर्णों का प्रयोग किया जाता है (जैसे क़, ज़ आदि)। किन्तु हिन्दी में भी अधिकांश लोग नुक्तों का प्रयोग नहीं करते। इसके अलावा संस्कृत, मराठी, नेपाली एवं अन्य भाषाओं को देवनागरी में लिखने में भी नुक्तों का प्रयोग नहीं किया जाता है।

थ़ का प्रयोग मुख्यतः पहाड़ी भाषाओँ में होता है जैसे की डोगरी (की उत्तरी उपभाषाओं) में आंसू के लिए शब्द है अथ़्रू। हिन्दी में ड़ और ढ़ व्यंजन फ़ारसी या अरबी से नहीं लिये गये हैं, न ही ये संस्कृत में पाये जाये हैं। असल में ये संस्कृत के साधारण ड और ढ के बदले हुए रूप हैं।

देवनागरी अंक निम्न रूप में लिखे जाते हैं :

देवनागरी लिपि में दो व्यंजन का संयुक्ताक्षर निम्न रूप में लिखा जाता है :

ब्राह्मी परिवार की लिपियों में देवनागरी लिपि सबसे अधिक संयुक्ताक्षरों को समर्थन देती है। देवनागरी २ से अधिक व्यंजनों के संयुक्ताक्षर को भी समर्थन देती है। छन्दस फॉण्ट देवनागरी में बहुत संयुक्ताक्षरों को समर्थन देता है।

पुराने समय में प्रयुक्त हुई जाने वाली देवनागरी के कुछ वर्ण आधुनिक देवनागरी से भिन्न हैं।

  

आचार्य विनोबा भावे संसार की अनेक लिपियों के जानकार थे। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि देवनागरी लिपि भारत ही नहीं, संसार की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। अगर भारत की सब भाषाओं के लिए इसका व्यवहार चल पड़े तो सारे भारतीय एक दूसरे के बिल्कुल नजदीक आ जाएंगे। हिंदुस्तान की एकता में देवनागरी लिपि हिंदी से ही अधिक उपयोगी हो सकती है। अनन्त शयनम् अयंगार तो दक्षिण भारतीय भाषाओं के लिए भी देवनागरी की संभावना स्वीकार करते थे। सेठ गोविन्ददास इसे राष्ट्रीय लिपि घोषित करने के पक्ष में थे।

बहुत से लोगों का विचार है कि भारत में अनेकों भाषाएँ होना कोई समस्या नहीं है जबकि उनकी लिपियाँ अलग-अलग होना बहुत बड़ी समस्या है। गांधीजी ने १९४० में गुजराती भाषा की एक पुस्तक को देवनागरी लिपि में छपवाया और इसका उद्देश्य बताया था कि मेरा सपना है कि संस्कृत से निकली हर भाषा की लिपि देवनागरी हो।

इसी प्रकार विनोबा भावे का विचार था कि-

बौद्ध संस्कृति से प्रभावित क्षेत्र नागरी के लिए नया नहीं है। चीन और जापान चित्रलिपि का व्यवहार करते हैं। इन चित्रों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण भाषा सीखने में बहुत कठिनाई होती है। देववाणी की वाहिका होने के नाते देवनागरी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर चीन और जापान के लिए भी समुचित विकल्प दे सकती है। भारतीय मूल के लोग संसार में जहां-जहां भी रहते हैं, वे देवनागरी से परिचय रखते हैं, विशेषकर मारीशस, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, त्रिनिदाद, टोबैगो आदि के लोग। इस तरह देवनागरी लिपि न केवल भारत के अंदर सारे प्रांतवासियों को प्रेम-बंधन में बांधकर सीमोल्लंघन कर दक्षिण-पूर्व एशिया के पुराने वृहत्तर भारतीय परिवार को भी ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय‘ अनुप्राणित कर सकती है तथा विभिन्न देशों को एक अधिक सुचारू और वैज्ञानिक विकल्प प्रदान कर ‘विश्व नागरी‘ की पदवी का दावा इक्कीसवीं सदी में कर सकती है। उस पर प्रसार लिपिगत साम्राज्यवाद और शोषण का माध्यम न होकर सत्य, अहिंसा, त्याग, संयम जैसे उदात्त मानवमूल्यों का संवाहक होगा, असत्‌ से सत्‌, तमस्‌ से ज्योति तथा मृत्यु से अमरता की दिशा में।देवनागरी एक भारतीय लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कई विदेशी भाषाएँ लिखी जाती हैं। यह बायें से दायें लिखी जाती है। इसकी पहचान एक क्षैतिज रेखा से है जिसे ‘शिरोरेखा’ कहते हैं। संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोङ्कणी, सिन्धी, कश्मीरी, हरियाणवी डोगरी, खस, नेपाल भाषा (तथा अन्य नेपाली भाषाएँ), तमाङ्ग भाषा, गढ़वाली, बोडो, अङ्गिका, मगही, भोजपुरी, नागपुरी, मैथिली, सन्थाली, राजस्थानी बघेली आदि भाषाएँ और स्थानीय बोलियाँ भी देवनागरी में लिखी जाती हैं।

इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में गुजराती, पञ्जाबी, बिष्णुपुरिया मणिपुरी, रोमानी और उर्दू भाषाएँ भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। देवनागरी विश्व में सर्वाधिक प्रयुक्त लिपियों में से एक है। यह दक्षिण एशिया की १७० से अधिक भाषाओं को लिखने के लिए प्रयुक्त हो रही है।

दुनिया की कई भाषाओं के लिये देवनागरी सबसे अच्छा विकल्प हो सकती है क्योंकि यह यह बोलने की पूरी आजादी देता है। दुनिया की और किसी भी लिपि मे यह नही हो सकता है। इन्डोनेशिया, विएतनाम, अफ्रीका आदि के लिये तो यही सबसे सही रहेगा। अष्टाध्यायी को देखकर कोई भी समझ सकता है की दुनिया मे इससे अच्छी कोई भी लिपि नहीं है। अग‍र दुनिया पक्षपातरहित हो तो देवनागरी ही दुनिया की सर्वमान्य लिपि होगी क्योंकि यह पूर्णत: वैज्ञानिक है। अंग्रेजी भाषा में वर्तनी (स्पेलिंग) की विकराल समस्या के कारगर समाधान के लिये देवनागरी पर आधारित देवग्रीक लिपि प्रस्तावित की गयी है।

विस्तृत लेख देवनागरी की वैज्ञानिकता देखें।

जिस प्रकार भारतीय अंकों को उनकी वैज्ञानिकता के कारण विश्व ने सहर्ष स्वीकार कर लिया वैसे ही देवनागरी भी अपनी वैज्ञानिकता के कारण ही एक दिन विश्वनागरी बनेगी।

देवनागरी का विकास उस युग में हुआ था जब लेखन हाथ से किया जाता था और लेखन के लिए शिलाएँ, ताड़पत्र, चर्मपत्र, भोजपत्र, ताम्रपत्र आदि का ही प्रयोग होता था। किन्तु लेखन प्रौद्योगिकी ने बहुत अधिक विकास किया और प्रिन्टिंग प्रेस, टाइपराइटर आदि से होते हुए वह कम्प्यूटर युग में पहुँच गयी है जहाँ बोलकर भी लिखना सम्भव हो गया है। 
जब प्रिंटिंग एवं टाइपिंग का युग आया तो देवनागरी के यंत्रीकरण में कुछ अतिरिक्त समस्याएँ सामने आयीं जो रोमन में नहीं थीं। उदाहरण के लिए रोमन टाइपराइटर में अपेक्षाकृत कम कुंजियों की आवश्यकता पड़ती थी। देवनागरी में संयुक्ताक्षर की अवधारणा होने से भी बहुत अधिक कुंजियों की आवश्यकता पड़ रही थी। ध्यातव्य है कि ये समस्याएँ केवल देवनागरी में नहीं थी बल्कि रोमन और 
सिरिलिक को छोड़कर लगभग सभी लिपियों में थी। चीनी और उस परिवार की अन्य लिपियों में तो यह समस्या अपने गम्भीरतम रूप में थी।

इन सामयिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए अनेक विद्वानों और मनीषियों ने देवनागरी के सरलीकरण और मानकीकरण पर विचार किया और अपने सुझाव दिए। इनमें से अनेक सुझावों को क्रियान्वित नहीं किया जा सका या उन्हें अस्वीकार कर दिया गया। कहने की आवश्यकता नहीं है कि कम्प्यूटर युग आने से (या प्रिंटिंग की नई तकनीकी आने से) देवनागरी से सम्बन्धित सारी समस्याएँ स्वयं समाप्त हों गयीं। 

भारत के स्वाधीनता आंदोलनों में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त होने के बाद लिपि के विकास व मानकीकरण हेतु कई व्यक्तिगत एवं संस्थागत प्रयास हुए। सर्वप्रथम बम्बई के महादेव गोविन्द रानडे ने एक लिपि सुधार समिति का गठन किया। तदन्तर महाराष्ट्र साहित्य परिषद पुणे ने सुधार योजना तैयार की। सन १९०४ में बाल गंगाधर तिलक ने अपने केसरी पत्र में देवनागरी लिपि के सुधार की चर्चा की। प्रिणामस्वरूप देवनागरी के टाइपों की संख्या १९० निर्धारित की गयी और इन्हें 'केसरी टाइप' कहा गया।

आगे चलकर सावरकर बंधुओं ने 'अ' की बारहखड़ी प्रयिग करने का सुझाव दिया ( अर्थात 'ई' न लिखकर अ पर बड़ी ई की मात्रा लगायी जाय)। डॉ गोरख प्रसाद ने सुझाव दिया कि मात्राओं को व्यंजन के बाद दाहिने तरफ अलग से रखा जाय। डॉ. श्यामसुन्दर दास ने अनुस्वार के प्रयोग को व्यापक बनाकर देवनागरी के सरलीकरण के प्रयास किये (पंचमाक्षर के बदले अनुस्वार के प्रयोग )। इसी प्रकार श्रीनिवास का सुझाव था कि महाप्राण वर्ण के लिए अल्पप्राण के नीचे ऽ चिह्न लगाया जाय। १९४५ में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा अ की बारहखड़ी और श्रीनिवास के सुझाव को अस्वीकार करने का निर्णय लिया गया।

देवनागरी के विकास में अनेक संस्थागत प्रयासों की भूमिका भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही है। १९३५ में हिंदी साहित्य सम्मेलन ने नागरी लिपि सुधार समिति के माध्यम से 'अ' की बारहखड़ी और शिरोरेखा से संबंधित सुधार सुझाए। इसी प्रकार, १९४७ में आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने बारहखड़ी, मात्रा व्यवस्था, अनुस्वार व अनुनासिक से संबंधित महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये। देवनागरी लिपि के विकास हेतु भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने कई स्तरों पर प्रयास किये हैं। सन् १९६६ में मानक देवनागरी वर्णमाला प्रकाशित की गई और १९६७ में ‘हिंदी वर्तनी का मानकीकरण’ प्रकाशित किया गया। १९८३ में ‘देवनागरी लिपि तथा हिन्दी की वर्तनी का मानकीकरण’ प्रकाशित किया गया।

 देखिये। 




#Article 5: भारत (6241 words)


भारत (आधिकारिक नाम: भारत गणराज्य, ) दक्षिण एशिया में स्थित भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा देश है। यह पूर्ण रूप से उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। भारत भौगोलिक दृष्टि से विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा देश है (१.रूस, २.कनाडा, ३.चीन, ४.अमरीका, ५.ब्राजील, ६.ऑस्ट्रेलिया), जबकि जनसंख्या के दृष्टिकोण से चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा देश है। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान, अफगानिस्तान ,उत्तर-पूर्व में चीन, नेपाल और भूटान, पूर्व में बांग्लादेश और म्यान्मार स्थित हैं। हिन्द महासागर में इसके दक्षिण पश्चिम में मालदीव, दक्षिण में श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व में इंडोनेशिया से भारत की सामुद्रिक सीमा लगती है। इसके उत्तर में हिमालय पर्वत तथा दक्षिण में हिन्द महासागर स्थित है। दक्षिण-पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर हैं।

आधुनिक मानव या होमो सेपियन्स अफ्रीका से भारतीय उपमहाद्वीप में ५५,००० साल पहले आये थे।  शिकारी के रूप में इन्होने अलग अलग व्यवसाय शुरू किये और इस प्रकार इस क्षेत्र को अत्यधिक विविधता पूर्ण बना दिया इस प्रकार इनका मानव आनुवंशिक विविधता में अफ्रीका के बाद दूसरा स्थान है।  ९,००० वर्ष पहले ये सिंधु नदी के पश्चिमी हिस्से की तरफ बसे हुए थे जहां से इन्होने धीरे धीरे पलायन किया और सिंधुघाटी की सभ्यता के रूप में विकसित हुए।  १,२०० ईसा पूर्व संस्कृत भाषा सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में फैली हुए थी और तब तक यहां पर हिन्दू धर्म का उद्धव हो चुका था और ऋग्वेद की रचना भी हो चुकी थी।  ४०० ईसा पूर्व तक आते आते हिन्दू धर्म में जातिवाद देखने को मिल जाता है।  इसी समय बौद्ध एवं जैन धर्म उत्पन्न हो रहे होते है।

प्रारंभिक राजनीतिक एकत्रीकरण ने  में स्थित मौर्य और गुप्त साम्राज्यों को जन्म दिया।

उनका समाज विस्तृत सृजनशीलता से भरा हुआ था। 
लेकिन महिलाओं की स्थिति भी गिर रही थी। 
दक्षिण भारत में मध्य भारत के राज्यों ने द्रविड़ भाषाओं, लिपियों, संस्कृतियों और परम्पराओं को दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को निर्यात किया। 

प्राचीन सिन्धु घाटी सभ्यता और बड़े-बड़े साम्राज्यों का विकास-स्थान रहे भारतीय उपमहाद्वीप को इसके सांस्कृतिक और आर्थिक सफलता के लंबे इतिहास के लिये जाना जाता रहा है। चार प्रमुख संप्रदायों: हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्मों का यहां उदय हुआ, पारसी, यहूदी, ईसाई, और मुस्लिम धर्म प्रथम सहस्राब्दी में यहां पहुचे और यहां की विविध संस्कृति को नया रूप दिया। क्रमिक विजयों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी ने १८वीं और १९वीं सदी में भारत के ज़्यादतर हिस्सों को अपने राज्य में मिला लिया। १८५७ के विफल विद्रोह के बाद भारत के प्रशासन का भार ब्रिटिश सरकार ने अपने ऊपर ले लिया। ब्रिटिश भारत के रूप में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रमुख अंग भारत ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक लम्बे और मुख्य रूप से अहिंसक स्वतन्त्रता संग्राम के बाद १५ अगस्त १९४७ को आज़ादी पाई। १९५० में लागू हुए नये संविधान में इसे सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के आधार पर स्थापित संवैधानिक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया गया और युनाईटेड किंगडम की तर्ज़ पर वेस्टमिंस्टर शैली की संसदीय सरकार स्थापित की गयी। एक संघीय राष्ट्र, भारत को २९ राज्यों और ७ संघ शासित प्रदेशों में गठित किया गया है। लम्बे समय तक समाजवादी आर्थिक नीतियों का पालन करने के बाद 1991 के पश्चात् भारत ने उदारीकरण और वैश्वीकरण की नयी नीतियों के आधार पर सार्थक आर्थिक और सामाजिक प्रगति की है।

भारत के दो आधिकारिक नाम हैं- हिन्दी में भारत और अंग्रेज़ी में इण्डिया (India)। इण्डिया नाम की उत्पत्ति सिन्धु नदी के अंग्रेजी नाम इण्डस से हुई है। भारत नाम, एक प्राचीन सम्राट भरत जो कि मनु के वंशज तथा ऋषभदेव के सबसे बड़े बेटे थे, जिनकी कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में है, के नाम से लिया गया है। एक व्युत्पत्ति के अनुसार भारत (भा + रत) शब्द का मतलब है आन्तरिक प्रकाश या विदेक-रूपी प्रकाश में लीन। एक तीसरा नाम हिन्दुस्तान भी है जिसका अर्थ हिन्द की भूमि, यह नाम विशेषकर अरब/ईरान में प्रचलित हुआ।ईरान से आए आक्रमणकारी स का उच्चारण ह से किया करते थे इस प्रकार उन्होंने सिंधु को हिंदु कहा  और भविष्य में आगे चलकर इसका नाम हिंदुस्तान पड़ा। लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व उत्तर पश्चिम से आने वाले ईरानियो तथा यूनानीयों ने सिंधु को हिंदोस अथवा इडोस और इस नदी के पूर्व में स्थित प्रदेश को इंडिया कहा भारत नाम का प्रयोग उत्तर पश्चिम में रहने वाले लोगों के एक समूह के लिए किया जाता था इस समूह का उल्लेख संस्कृत की आरंभिक काल 36000 वर्ष पुरानी कृति ऋग्वेद में मिलता है

इसका समकालीन उपयोग कम और प्रायः उत्तरी भारत के लिए होता है। इसके अतिरिक्त भारतवर्ष को वैदिक काल से आर्यावर्त जम्बूद्वीप और अजनाभदेश के नाम से भी जाना जाता रहा है। बहुत पहले भारत का एक मुंहबोला नाम 'सोने की चिड़िया' भी प्रचलित था।

भारत का राष्ट्रीय चिह्न सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ की अनुकृति है जो सारनाथ के संग्रहालय में सुरक्षित है। भारत सरकार ने यह चिह्न २६ जनवरी १९५० को अपनाया। उसमें केवल तीन सिंह दिखाई पड़ते हैं, चौथा सिंह दृष्टिगोचर नहीं है। राष्ट्रीय चिह्न के नीचे देवनागरी लिपि में 'सत्यमेव जयते' अंकित है।

भारत के राष्ट्रीय झंडे में तीन समांतर आयताकार पट्टियाँ हैं। ऊपर की पट्टी केसरिया रंग की, मध्य की पट्टी सफेद रंग की तथा नीचे की पट्टी गहरे हरे रंग की है। झंडे की लंबाई चौड़ाई का अनुपात 3:2 का है। सफेद पट्टी पर चर्खे की जगह सारनाथ के सिंह स्तंभ वाले धर्मचक्र अनुकृति अशोक चक्र है जिसका रंग गहरा नीला है। चक्र का व्यास लगभग सफेद पट्टी के चौड़ाई जितना है और उसमें २४ अरे हैं।
राष्ट्रभाषा: हिंदी
कवि रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखित 'जन-गण-मन' के प्रथम अंश को भारत के राष्ट्रीय गान के रूप में २४ जनवरी १९५० ई. को अपनाया गया। साथ-साथ यह भी निर्णय किया गया कि बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा लिखित 'वंदे मातरम्' को भी 'जन-गण-मन' के समान ही दर्जा दिया जाएगा, क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम में 'वंदे मातरम्' गान जनता का प्रेरणास्रोत था।

भारत सरकार ने देश भर के लिए राष्ट्रीय पंचांग के रूप में शक संवत् को अपनाया है। इसका प्रथम मास 'चैत' है और वर्ष सामान्यत: ३६५ दिन का है। इस पंचांग के दिन स्थायी रूप से अंग्रेजी पंचांग के मास दिनों के अनुरूप बैठते हैं। सरकारी कार्यो के लिए ग्रेगरी कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) के साथ-साथ राष्ट्रीय पंचांग का भी प्रयोग किया जाता है।

पाषाण युग भीमबेटका मध्य प्रदेश की गुफाएँ भारत में मानव जीवन का प्राचीनतम प्रमाण हैं। प्रथम स्थाई बस्तियों ने ९००० वर्ष पूर्व स्वरुप लिया। यही आगे चल कर सिन्धु घाटी सभ्यता में विकसित हुई, जो २६०० ईसा पूर्व और १९०० ईसा पूर्व के मध्य अपने चरम पर थी।
लगभग १६०० ईसा पूर्व आर्य भारत आए और उन्होंने उत्तर भारतीय क्षेत्रों में वैदिक सभ्यता का सूत्रपात किया। इस सभ्यता के स्रोत वेद और पुराण हैं। किन्तु आर्य-आक्रमण-सिद्धांत अभी तक विवादस्पद है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक सहित कुछ विद्वानों की मान्यता यह है कि आर्य भारतवर्ष के ही स्थायी निवासी रहे हैं तथा वैदिक इतिहास करीब ७५,००० वर्ष प्राचीन है। इसी समय दक्षिण भारत में द्रविड़ सभ्यता का विकास होता रहा। दोनों जातियों ने एक दूसरे की खूबियों को अपनाते हुए भारत में एक मिश्रित-संस्कृति का निर्माण किया।

५०० ईसवी पूर्व कॆ बाद कई स्वतंत्र राज्य बन गए। भारत के प्रारम्भिक राजवंशों में उत्तर भारत का मौर्य राजवंश उल्लेखनीय है जिसके प्रतापी सम्राट अशोक का विश्व इतिहास में विशेष स्थान है। १८० ईसवी के आरम्भ से मध्य एशिया से कई आक्रमण हुए, जिनके परिणामस्वरूप उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में यूनानी, शक, पार्थी और अंततः कुषाण राजवंश स्थापित हुए। तीसरी शताब्दी के आगे का समय जब भारत पर गुप्त वंश का शासन था, भारत का स्वर्णिम काल कहलाया। दक्षिण भारत में भिन्न-भिन्न काल-खण्डों में कई राजवंश चालुक्य, चेर, चोल, पल्लव तथा पांड्य रहे। ईसा के आस-पास संगम-साहित्य अपने चरम पर था, जिसमें तमिळ भाषा का परिवर्धन हुआ। सातवाहनों और चालुक्यों ने मध्य भारत में अपना वर्चस्व स्थापित किया। विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, खगोलशास्त्र, प्राचीन प्रौद्योगिकी, धर्म, तथा दर्शन इन्हीं राजाओं के शासनकाल में फले-फूले।

१२वीं शताब्दी के प्रारंभ में, भारत पर इस्लामी आक्रमणों के पश्चात, उत्तरी व केन्द्रीय भारत का अधिकांश भाग दिल्ली सल्तनत के शासनाधीन हो गया; और बाद में, अधिकांश उपमहाद्वीप मुगल वंश के अधीन। दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य शक्तिशाली निकला। हालाँकि, विशेषतः तुलनात्मक रूप से, संरक्षित दक्षिण में अनेक राज्य शेष रहे, अथवा अस्तित्व में आये। मुगलों के संक्षिप्त अधिकार के बाद सत्रहवीं सदी में दक्षिण और मध्य भारत में मराठों का उत्कर्ष हुआ। उत्तर पश्चिम में सिक्खों की शक्ति में वृद्धि हुई।

१७वीं शताब्दी के मध्यकाल में पुर्तगाल, डच, फ्रांस, ब्रिटेन सहित अनेक यूरोपीय देशों, जो भारत से व्यापार करने के इच्छुक थे, उन्होंने देश की आतंरिक शासकीय अराजकता का फायदा उठाया अंग्रेज दूसरे देशों से व्यापार के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल रहे और १८४० तक लगभग संपूर्ण देश पर शासन करने में सफल हुए। १८५७ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध असफल विद्रोह, जो भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम से भी जाना जाता है, के बाद भारत का अधिकांश भाग सीधे अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक नियंत्रण में आ गया।

बीसवी सदी के प्रारम्भ में आधुनिक शिक्षा के प्रसार और विश्वपटल पर बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के चलते भारत में एक बौद्धिक आन्दोलन का सूत्रपात हुआ जिसने सामाजिक और राजनीतिक स्तरों पर अनेक परिवर्तनों एवम आन्दोलनों की नीव रखी। १८८५ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक गतिमान स्वरूप दिया। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में लम्बे समय तक स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये विशाल अहिंसावादी संघर्ष चला, जिसका नेतृत्‍व महात्मा गांधी, जो आधिकारिक रूप से आधुनिक भारत के 'राष्ट्रपिता' के रूप में संबोधित किये जाते हैं, इसी सदी में भारत के सामाजिक आन्दोलन, जो सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भी विशाल अहिंसावादी एवं क्रांतिवादी संघर्ष चला, जिसका नेतृत्व डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर ने किया, जो ‘आधुनिक भारत के निर्माता’, ‘संविधान निर्माता' एवं ‘दलितों के मसिहा’ के रूप में संबोधित किये जाते है। इसके साथ-साथ चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, आदि के नेतृत्‍व मे चले क्रांतिकारी संघर्ष के फलस्वरुप १५ अगस्त, १९४७ भारत ने अंग्रेजी शासन से पूर्णतः स्वतंत्रता प्राप्त की। तदुपरान्त २६ जनवरी, १९५० को भारत एक गणराज्य बना।

एक बहुजातीय तथा बहुधार्मिक राष्ट्र होने के कारण भारत को समय-समय पर साम्प्रदायिक तथा जातीय विद्वेष का शिकार होना पड़ा है। क्षेत्रीय असंतोष तथा विद्रोह भी हालाँकि देश के अलग-अलग हिस्सों में होते रहे हैं, पर इसकी धर्मनिरपेक्षता तथा जनतांत्रिकता, केवल १९७५-७७ को छोड़, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी, अक्षुण्ण रही है।

भारत के पड़ोसी राष्ट्रों के साथ अनसुलझे सीमा विवाद हैं। इसके कारण इसे छोटे पैमानों पर युद्ध का भी सामना करना पड़ा है। १९६२ में चीन के साथ, तथा १९४७, १९६५, १९७१ एवं १९९९ में पाकिस्तान के साथ लड़ाइयाँ हो चुकी हैं।

भारत गुटनिरपेक्ष आन्दोलन तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के संस्थापक सदस्य देशों में से एक है।

१९७४ में भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था जिसके बाद १९९८ में ५ और परीक्षण किये गये। १९९० के दशक में किये गये आर्थिक सुधारीकरण की बदौलत आज देश सबसे तेज़ी से विकासशील राष्ट्रों की सूची में आ गया है।

भारत का संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य घोषित करता है। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसकी द्विसदनात्मक संसद वेस्टमिन्स्टर शैली की संसदीय प्रणाली द्वारा संचालित है। भारत का प्रशासन संघीय ढांचे के अन्तर्गत चलाया जाता है, जिसके अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार और राज्य स्तर पर राज्य सरकारें हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बंटवारा संविधान में दी गई रूपरेखा के आधार पर होता है। वर्तमान में भारत में २८ राज्य और ८ केंद्र-शासित प्रदेश हैं। केंद्र शासित प्रदेशों में, स्थानीय प्रशासन को राज्यों की तुलना में कम शक्तियां प्राप्त होती हैं। भारत का सरकारी ढाँचा, जिसमें केंद्र राज्यों की तुलना में ज़्यादा सशक्त है, उसे आमतौर पर अर्ध-संघीय (सेमि-फ़ेडेरल) कहा जाता रहा है, पर १९९० के दशक के राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक बदलावों के कारण इसकी रूपरेखा धीरे-धीरे और अधिक संघीय (फ़ेडेरल) होती जा रही है।

इसके शासन में तीन मुख्य अंग हैं: न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका।

व्यवस्थापिका संसद को कहते हैं, जिसके दो सदन हैं – उच्चसदन राज्यसभा, अथवा राज्यपरिषद् और निम्नसदन लोकसभा. राज्यसभा में २४५ सदस्य होते हैं जबकि लोकसभा में ५४५। राज्यसभा एक स्थाई सदन है और इसके सदस्यों का चुनाव, अप्रत्यक्ष विधि से ६ वर्षों के लिये होता है। राज्यसभा के ज़्यादातर सदस्यों का चयन राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा किया जाता है, और हर दूसरे साल राज्य सभा के एक तिहाई सदस्य पदमुक्त हो जाते हैं। लोकसभा के ५४३ सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष विधि से, ५ वर्षों की अवधि के लिये आम चुनावों के माध्यम से किया जाता है जिनमें १८ वर्ष से अधिक उम्र के सभी भारतीय नागरिक मतदान कर सकते हैं। इसके इलावा २ सदस्यों को राष्ट्रपति एंग्लो-इण्डियन समुदाय में से नामित कर सकती है, अगर यह समुदाय संसद में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व ना पा सका हो।

कार्यपालिका के तीन अंग हैं – राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मंत्रिमंडल। राष्ट्रपति, जो राष्ट्र का प्रमुख है, की भूमिका अधिकतर आनुष्ठानिक ही है। उसके दायित्वों में संविधान का अभिव्यक्तिकरण, प्रस्तावित कानूनों (विधेयक) पर अपनी सहमति देना और अध्यादेश जारी करना प्रमुख हैं। वह भारतीय सेनाओं का मुख्य सेनापति भी है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को एक अप्रत्यक्ष मतदान विधि द्वारा ५ वर्षों के लिये चुना जाता है। प्रधानमन्त्री सरकार का प्रमुख है और कार्यपालिका की सारी शक्तियाँ उसी के पास होती हैं। इसका चुनाव राजनैतिक पार्टियों या गठबन्धन के द्वारा प्रत्यक्ष विधि से संसद में बहुमत प्राप्त करने पर होता है। बहुमत बने रहने की स्थिति में इसका कार्यकाल ५ वर्षों का होता है। संविधान में किसी उप-प्रधानमंत्री का प्रावधान नहीं है पर समय-समय पर इसमें फेरबदल होता रहा है। मंत्रिमंडल का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है। मंत्रिमंडल के प्रत्येक मंत्री को संसद का सदस्य होना अनिवार्य है। कार्यपालिका संसद को उत्तरदायी होती है, और प्रधानमंत्री और उनका मंत्रिमण्डल लोक सभा में बहुमत के समर्थन के आधार पर ही अपने कार्यालय में बने रह सकते हैं।

भारत की स्वतंत्र न्यायपालिका का ढाँचा त्रिस्तरीय है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय, जिसके प्रधान प्रधान न्यायाधीश है; २४ उच्च न्यायालय और बहुत सारी निचली अदालतें हैं। सर्वोच्च न्यायालय को अपने मूल न्यायाधिकार (ओरिजिनल ज्युरिडिक्शन), और उच्च न्यायालयों के ऊपर अपीलीय न्यायाधिकार के मामलों, दोनो को देखने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय के मूल न्ययाधिकार में मौलिक अधिकारों के हनन के इलावा राज्यों और केंद्र, और दो या दो से अधिक राज्यों के बीच के विवाद आते हैं। सर्वोच्च न्यायालय को राज्य और केंद्रीय कानूनों को असंवैधानिक ठहराने के अधिकार है। भारत में २४ उच्च न्यायालयों के अधिकार और उत्तरदायित्व सर्वोच्च न्यायालय की अपेक्षा सीमित हैं। संविधान ने न्यायपालिका को विस्तृत अधिकार दिये हैं, जिनमें संविधान की अंतिम व्याख्या करने का अधिकार भी सम्मिलित है।

भारत विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र है। बहुदलीय प्रणाली वाले इस संसदीय गणराज्य में छ: मान्यता-प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियां, और ४० से भी ज़्यादा क्षेत्रीय पार्टियां हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जिसकी नीतियों को केंद्रीय-दक्षिणपंथी या रूढिवादी माना जाता है, के नेतृत्व में केंद्र में सरकार है जिसके प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हैं। अन्य पार्टियों में सबसे बडी भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस (कॉंग्रेस) है, जिसे भारतीय राजनीति में केंद्र-वामपंथी और उदार माना जाता है। २००४ से २०१४ तक केंद्र में मनमोहन सिंह की गठबन्धन सरकार का सबसे बडा हिस्सा कॉंग्रेस पार्टी का था। १९५० मे गणराज्य के घोषित होने से १९८० के दशक के अन्त तक कॉंग्रेस का संसद में निरंतर बहुमत रहा। पर तब से राजनैतिक पटल पर भाजपा और कॉंग्रेस को अन्य पार्टियों के साथ सत्ता बांटनी पडी है। १९८९ के बाद से क्षेत्रीय पार्टियों के उदय ने केंद्र में गठबंधन सरकारों के नये दौर की शुरुआत की है।

गणराज्य के पहले तीन चुनावों (१९५१–५२, १९५७, १९६२) में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कॉंग्रेस ने आसान जीत पाई। १९६४ में नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री कुछ समय के लिये प्रधानमंत्री बने, और १९६६ में उनकी खुद की मौत के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। १९६७ और १९७१ के चुनावों में जीतने के बाद १९७७ के चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पडा। १९७५ में प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय आपात्काल की घोषणा कर दी थी। इस घोषणा और इससे उपजी आम नाराज़गी के कारण १९७७ के चुनावों में नवगठित जनता पार्टी ने कॉंग्रेस को हरा दिया और पूर्व में कॉंग्रेस के सदस्य और नेहरु के केबिनेट में मंत्री रहे मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार बनी। यह सरकार सिर्फ़ तीन साल चली, और १९८० में हुए चुनावों में जीतकर इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बनीं। १९८४ में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी कॉंग्रेस के नेता और प्रधानमंत्री बने। १९८४ के चुनावों में ज़बरदस्त जीत के बाद १९८९ में नवगठित जनता दल के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय मोर्चा ने वाम मोर्चा के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई, जो केवल दो साल चली। १९९१ के चुनावों में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, परंतु कॉंग्रेस सबसे बडी पार्टी बनी, और पी वी नरसिंहा राव के नेतृत्व में अल्पमत सरकार बनी जो अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल रही।

१९९६ के चुनावों के बाद दो साल तक राजनैतिक उथल पुथल का वक्त रहा, जिसमें कई गठबंधन सरकारें आई और गई। १९९६ में भाजपा ने केवल १३ दिन के लिये सरकार बनाई, जो समर्थन ना मिलने के कारण गिर गई। उसके बाद दो संयुक्त मोर्चे की सरकारें आई जो कुछ लंबे वक्त तक चली। ये सरकारें कॉंग्रेस के बाहरी समर्थन से बनी थीं। १९९८ के चुनावों के बाद भाजपा एक सफल गठबंधन बनाने में सफल रही। भाजपा के अटल बिहारी वजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग, या एनडीए) नाम के इस गठबंधन की सरकार पहली ऐसी सरकार बनी जिसने अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा किय। २००४ के चुनावों में भी किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, पर कॉँंग्रेस सबसे बडी पार्टी बनके उभरी, और इसने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग, या यूपीए) के नाम से नया गठबंधन बनाया। इस गठबंधन ने वामपंथी और गैर-भाजपा सांसदों के सहयोग से मनमोहन सिँह के नेतृत्व में पाँच साल तक शासन चलाया। २००९ के चुनावों में यूपीए और अधिक सीटें जीता जिसके कारण यह साम्यवादी (कॉम्युनिस्ट) दलों के बाहरी सहयोग के बिना ही सरकार बनाने में कामयाब रहा। इसी साल मनमोहन सिँह जवाहरलाल नेहरू के बाद् ऐसे पहले प्रधानमंत्री बने जिन्हे दो लगातार कार्यकाल के लिये प्रधानमंत्री बनने का अवसर प्राप्त हुआ। २०१४ के चुनावों में १९८४ के बाद पहली बार किसी राजनैतिक पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ, और भाजपा ने गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई।

लगभग 13 लाख सक्रिय सैनिकों के साथ, भारतीय सेना दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी है। भारत की सशस्त्र सेना में एक थलसेना, नौसेना, वायु सेना और अर्द्धसैनिक बल, तटरक्षक, जैसे सामरिक और सहायक बल विद्यमान हैं। भारत के राष्ट्रपति भारतीय सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर है।

आज रूस के साथ सामरिक संबंधों को जारी रखने के अलावा, भारत विस्तृत इजरायल और फ्रांस के साथ रक्षा संबंध रखा है। हाल के वर्षों में, भारत में क्षेत्रीय सहयोग और विश्व व्यापार संगठन के लिए एक दक्षिण एशियाई एसोसिएशन में प्रभावशाली भूमिका निभाई है। १०,००० राष्ट्र सैन्य और पुलिस कर्मियों को चार महाद्वीपों भर में पैंतीस संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सेवा प्रदान की है। भारत भी विभिन्न बहुपक्षीय मंचों, खासकर पूर्वी एशिया शिखर बैठक और जी-८५ बैठक में एक सक्रिय भागीदार रहा है। आर्थिक क्षेत्र में भारत दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों के साथ घनिष्ठ संबंध रखते है। अब भारत एक पूर्व की ओर देखो नीति में भी संयोग किया है। यह आसियान देशों के साथ अपनी भागीदारी को मजबूत बनाने के मुद्दों की एक विस्तृत श्रृंखला है जिसमे जापान और दक्षिण कोरिया ने भी मदद किया है। यह विशेष रूप से आर्थिक निवेश और क्षेत्रीय सुरक्षा का प्रयास है।

हाल ही में, भारत का संयुक्त राष्ट्रे अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ आर्थिक, सामरिक और सैन्य सहयोग बढ़ गया है। 2008 में, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच असैनिक परमाणु समझौते हस्ताक्षर किए गए थे। हालाँकि उस समय भारत के पास परमाणु हथियार था और परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) के पक्ष में नहीं था यह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) से छूट प्राप्त है, भारत की परमाणु प्रौद्योगिकी और वाणिज्य पर पहले प्रतिबंध समाप्त. भारत विश्व का छठा वास्तविक परमाणु हथियार राष्ट्रत बन गया है। एनएसजी छूट के बाद भारत भी रूस, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम और कनाडा सहित देशों के साथ असैनिक परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर करने में सक्षम है।

वित्त वर्ष 2014-15 के केन्द्रीय अंतरिम बजट में रक्षा आवंटन में 10 प्रतिशत बढ़ोत्‍तरी करते हुए 224,000 करोड़ रूपए आवंटित किए गए। 2013-14 के बजट में यह राशि 203,672 करोड़ रूपए थी। 2012–13 में रक्षा सेवाओं के लिए 1,93,407 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था, जबकि 2011–2012 में यह राशि 1,64,415 करोइ़ थी। साल 2011 में भारतीय रक्षा बजट 36.03 अरब अमरिकी डॉलर रहा (या सकल घरेलू उत्पाद का 1,83%)। 2008 के एक SIRPI रिपोर्ट के अनुसार, भारत क्रय शक्ति के मामले में भारतीय सेना के सैन्य खर्च 72.7 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। साल 2011 में भारतीय रक्षा मंत्रालय के वार्षिक रक्षा बजट में 11.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई, हालाँकि यह पैसा सरकार की अन्य शाखाओं के माध्यम से सैन्य की ओर जाते हुए पैसों में शमिल नहीं होता है। भारत दुनिया का सबसे बड़े हथियार आयातक है।

२०१४ में नरेन्द्र मोदी नीत भाजपा सरकार ने मेक इन इण्डिया के नाम से भारत में निर्माण अभियान की शुरुआत की और भारत को हथियार आयातक से निर्यातक बनाने के लक्ष्य की घोषणा की। रक्षा निर्माण के द्वार निजी कंपनियों के लिए भी खोल दिए गए और भारत के कई उद्योग घरानों ने बड़े पैमाने पर इस क्षेत्र में पूंजी निवेश की योजनाएँ घोषित की। फ्राँस की डसॉल्ट एविएशन ने अंबानी समूह के साथ साझेदारी में रफेल लड़ाकू विमान, तथा अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन ने टाटा समूह के साथ साझेदारी लड़ाकू विमान एफ-१६  का निर्माण भारत में प्रारंभ करने की घोषणाएँ की हैं। अन्य प्रतिष्ठित समूह जैसे एल एंड टी, महिंद्रा, कल्याणी आदि भी कई परियोजनाओं के निर्माण की पहल कर चुके हैं जिनमें तोपें, असला, जलपोत व पनडुब्बियों का निर्मान शामिल है। रूस के साथ कमोव हेलीकॉप्टर का निर्माण भी भारत में करने के लिए समझौता हुआ है।

शीर्ष फॉरेन पॉलिसी मैगजीन ने अपने सर्वे में कहा कि भारत २०१७ में विश्व में ६ वीं महाशक्ति है।

वर्तमान में भारत 28 राज्यों तथा 

अन्टार्कटिका और दक्षिण गंगोत्री और मैत्री पर भी भारत के वैज्ञानिक-स्थल हैं, यद्यपि अभी तक कोई वास्तविक आधिपत्य स्थापित नहीं किया गया है।

भाषाओं के मामले में भारतवर्ष विश्व के समृद्धतम देशों में से है। संविधान के अनुसार हिन्दी भारत की राजभाषा है, और अंग्रेजी को सहायक राजाभाषा का स्थान दिया गया है। १९४७-१९५० के संविधान के निर्माण के समय देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी भाषा और हिन्दी-अरबी अंकों के अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप को संघ (केंद्र) सरकार की कामकाज की भाषा बनाया गया था, और गैर-हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी के प्रचलन को बढ़ाकर उन्हें हिन्दी-भाषी राज्यों के समान स्तर तक आने तक के लिये १५ वर्षों तक अंग्रेजी के इस्तेमाल की इजाज़त देते हुए इसे सहायक राजभाषा का दर्ज़ा दिया गया था। संविधान के अनुसार यह व्यवस्था १९५० मे समाप्त हो जाने वाली थी, लेकिन् तमिलनाडु राज्य के हिन्दी भाषा विरोधी आन्दोलन और हिन्दी भाषी राज्यों राजनैतिक विरोध के परिणामस्वरूप, संसद ने इस व्यवस्था की समाप्ति को अनिश्चित काल तक स्थगित कर दिया है। इस वजह से वर्तमान समय में केंद्रीय सरकार में काम हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं में होता है और राज्यों में हिन्दी अथवा अपने-अपने क्षेत्रीय भाषाओं में काम होता है। केन्द्र और राज्यों और अन्तर-राज्यीय पत्र-व्यवहार के लिए, यदि कोई राज्य ऐसी मांग करे, तो हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का होना आवश्यक है। भारतीय संविधान एक राष्ट्रभाषा का वर्णन नहीं करता। यह बात सत्य है, की भारत ही दुनिया का इकलौता ऐसा देश हैं,  जहाँ पर दस हजार से भी ज्यादा राज्य व स्थानीय क्षेत्रीय भाषा बोली जाती हैं। ऐसा अजीब संयोग सिर्फ भारत देश में ही संभव हैं. 

हिन्दी और अंग्रेज़ी के इलावा संविधान की आठवीं अनुसूची में २० अन्य भाषाओं का वर्णन है जिन्हें भारत में आधिकारिक कामकाज में इस्तेमाल किया जा सकता है। संविधान के अनुसार सरकार इन भाषाओं के विकास के लिये प्रयास करेगी, और अधिकृत राजभाषा (हिन्दी) को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए इन भाषाओं का उपयोग करेगी। आठवीं अनुसूची में दर्ज़ २२ भाषांए ये हैं:

राज्यवार भाषाओं की आधिकारिक स्थिति इस प्रकार है:

भारत पूरी तौर पर भारतीय प्लेट के ऊपर स्थित है जो भारतीय आस्ट्रेलियाई प्लेट (Indo-Australian Plate) का उपखण्ड है। प्राचीन काल में यह प्लेट गोंडवानालैण्ड का हिस्सा थी और अफ्रीका और अंटार्कटिका के साथ जुड़ी हुई थी। तकरीबन ९ करोड़ वर्ष पहले क्रीटेशियस काल में भारतीय प्लेट १५ सेमी. वर्ष की गति से उत्तर की ओर बढ़ने लगी और इओसीन पीरियड में यूरेशियन प्लेट से टकराई। भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के मध्य स्थित  टेथीस भूसन्नति के अवसादों के वालन द्वारा ऊपर उठने से तिब्बत पठार और हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ। सामने की द्रोणी में बाद में अवसाद जमा हो जाने से सिन्धु-गंगा मैदान बना। भारतीय प्लेट अभी भी लगभग ५ सेमी./वर्ष की गति से उत्तर की ओर गतिशील है और हिमालय की ऊंचाई में अभी भी २ मिमी./वर्ष कि गति से उत्थान हो रहा है।

भारत के उत्तर में हिमालय की पर्वतमाला नए और मोड़दार पहाड़ों से बनी है। यह पर्वतश्रेणी कश्मीर से अरुणाचल तक लगभग १,५०० मील तक फैली हुई है। इसकी चौड़ाई १५० से २०० मील तक है। यह संसार की सबसे ऊँची पर्वतमाला है और इसमें अनेक चोटियाँ २४,००० फुट से अधिक ऊँची हैं। हिमालय की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट है जिसकी ऊँचाई २९,०२८ फुट है जो नेपाल में स्थित है।

हिमालय के दक्षिण सिन्धु-गंगा मैदान है जो सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों द्वारा बना है। हिमालय (शिवालिक) की तलहटी में जहाँ नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र को छोड़कर मैदान में प्रवेश करती हैं, एक संकीर्ण पेटी में कंकड पत्थर मिश्रित निक्षेप पाया जाता है जिसमें नदियाँ अंतर्धान हो जाती हैं। इस ढलुवाँ क्षेत्र को भाबर कहते हैं। भाबर के दक्षिण में तराई प्रदेश है, जहाँ विलुप्त नदियाँ पुन: प्रकट हो जाती हैं। यह क्षेत्र दलदलों और जंगलों से भरा है। तराई के दक्षिण में जलोढ़ मैदान पाया जाता है। मैदान में जलोढ़ दो किस्म के हैं, पुराना जलोढ़ और नवीन जलोढ़। पुराने जलोढ़ को बाँगर कहते हैं। यह अपेक्षाकृत ऊँची भूमि में पाया जाता है, जहाँ नदियों की बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता। इसमें कहीं कहीं चूने के कंकड मिलते हैं। नवीन जलोढ़ को खादर कहते हैं। यह नदियों की बाढ़ के मैदान तथा डेल्टा प्रदेश में पाया जाता है जहाँ नदियाँ प्रति वर्ष नई तलछट जमा करती हैं।

उत्तरी भारत के मैदान के दक्षिण का पूरा भाग एक विस्तृत पठार है जो दुनिया के सबसे पुराने स्थल खंड का अवशेष है और मुख्यत: कड़ी तथा दानेदार कायांतरित चट्टानों से बना है। पठार तीन ओर पहाड़ी श्रेणियों से घिरा है। उत्तर में विंध्याचल तथा सतपुड़ा की पहाड़ियाँ हैं, जिनके बीच नर्मदा नदी पश्चिम की ओर बहती है। नर्मदा घाटी के उत्तर विंध्याचल प्रपाती ढाल बनाता है। सतपुड़ा की पर्वतश्रेणी उत्तर भारत को दक्षिण भारत से अलग करती है और पूर्व की ओर महादेव पहाड़ी तथा मैकाल पहाड़ी के नाम से जानी जाती है। सतपुड़ा के दक्षिण अजंता की पहाड़ियाँ हैं। प्रायद्वीप के पश्चिमी किनारे पर पश्चिमी घाट और पूर्वी किनारे पर पूर्वी घाट नामक पहाडियाँ हैं।

कई महत्वपूर्ण और बड़ी नदियाँ जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना, गोदावरी और कृष्णा भारत से होकर बहती हैं।

कोपेन के वर्गीकरण में भारत में छह प्रकार की जलवायु का निरूपण है किन्तु यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि भू-आकृति के प्रभाव में छोटे और स्थानीय स्तर पर भी जलवायु में बहुत विविधता और विशिष्टता मिलती है। भारत की जलवायु दक्षिण में उष्णकटिबंधीय है और हिमालयी क्षेत्रों में अधिक ऊँचाई के कारण अल्पाइन (ध्रुवीय जैसी), एक ओर यह पुर्वोत्तर भारत में उष्ण कटिबंधीय नम प्रकार की है तो पश्चिमी भागों में शुष्क प्रकार की।
 
कोपेन के वर्गीकरण के अनुसार भारत में निम्नलिखित छह प्रकार के जलवायु प्रदेश पाए जाते हैं:

परंपरागत रूप से भारत में छह ऋतुएँ मानी जाती रहीं हैं परन्तु भारतीय मौसम विज्ञान विभाग चार ऋतुओं का वर्णन करता है जिन्हें हम उनके परंपरागत नामों से तुलनात्मक रूप में निम्नवत लिख सकते हैं:

शीत ऋतु (Winters) – दिसंबर से मार्च तक, जिसमें दिसंबर और जनवरी सबसे ठंढे महीने होते हैं; उत्तरी भारत में औसत तापमान १० से १५ डिग्री सेल्सियस होता है।

ग्रीष्म ऋतु (Summers or Pre-monsoon) – अप्रैल से जून तक जिसमें मई सबसे गर्म महीना होता है, औसत तापमान ३२ से ४० डिग्री सेल्सियस होता है।

वर्षा ऋतु (Monsoon or Rainy) – जुलाई से सितम्बर तक, जिसमें सार्वाधिक वर्षा अगस्त महीने में होती है, वस्तुतः मानसून का आगमन और प्रत्यावर्तन (लौटना) दोनों क्रमिक रूप से होते हैं और अलग अलग स्थानों पर इनका समय अलग अलग होता है। सामान्यतः १ जून को केरल तट पर मानसून के आगमन तारीख होती है इसके ठीक बाद यह पूर्वोत्तर भारत में पहुँचता है और क्रमशः पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण की ओर गतिशील होता है इलाहाबाद में मानसून के पहुँचने की तिथि १८ जून मानी जाती है और दिल्ली में २९ जून।

शरद ऋतु (Post-monsoon ot Autumn) - उत्तरी भारत में अक्टूबर और नवंबर माह में मौसम साफ़ और शांत रहता है और अक्टूबर में मानसून लौटना शुरू हो जाता है जिससे तमिलनाडु के तट पर लौटते मानसून से वर्षा होती है।

भारत के मुख्य शहर हैं – दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलोर (बेंगलुरु)|

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मुद्रा स्थानांतरण की दर से भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में दसवें और क्रयशक्ति के अनुसार तीसरे स्थान पर है। वर्ष २००३ में भारत में लगभग ८% की दर से आर्थिक वृद्धि हुई है जो कि विश्व की सबसे तीव्र बढती हुई अर्थव्यवस्थओं में से एक है। परंतु भारत की अत्यधिक जनसंख्या के कारण प्रतिव्यक्ति आय क्रयशक्ति की दर से मात्र ३,२६२ अमेरिकन डॉलर है जो कि विश्व बैंक के अनुसार १२५वें स्थान पर है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार २६५ (मार्च २००९) अरब अमेरिकी डॉलर है। मुम्बई भारत की आर्थिक राजधानी है और भारतीय रिजर्व बैंक और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का मुख्यालय भी। यद्यपि एक चौथाई भारतीय अभी भी निर्धनता रेखा से नीचे हैं, तीव्रता से बढ़ती हुई सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के कारण मध्यमवर्ग में वृद्धि हुई है। १९९१ के बाद भारत में आर्थिक सुधार की नीति ने भारत के सर्वंगीण विकास मे बड़ी भूमिका निभाई है।

१९९१ के बाद भारत में हुए आर्थिक सुधारोँ ने भारत के सर्वांगीण विकास मे बड़ी भूमिका निभाई। भारतीय अर्थव्यवस्था ने कृषि पर अपनी ऐतिहासिक निर्भरता कम की है और कृषि अब भारतीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल २५% है। दूसरे प्रमुख उद्योग हैं उत्खनन, पेट्रोलियम, बहुमूल्य रत्न, चलचित्र, वस्त्र, सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएं, तथा सजावटी वस्तुऐं। भारत के अधिकतर औद्योगिक क्षेत्र उसके प्रमुख महानगरों के आसपास स्थित हैं। हाल ही के वर्षों में $१७२० करोड़ अमरीकी डालर वार्षिक आय २००४-२००५ के साथ भारत सॉफ़्टवेयर और बीपीओ सेवाओं का सबसे बडा केन्द्र बन कर उभरा है। इसके साथ ही कई लघु स्तर के उद्योग भी हैं जोकि छोटे भारतीय गाँव और भारतीय नगरों के कई नागरिकों को जीविका प्रदान करते हैं। पिछले वर्षों में भारत में वित्तीय संस्थानों ने विकास में बड़ी भूमिका निभाई है।

केवल तीस लाख विदेशी पर्यटकों के प्रतिवर्ष आने के बाद भी भारतीय पर्यटन राष्ट्रीय आय का एक अति आवश्यक, परन्तु कम विकसित स्रोत है। पर्यटन उद्योग भारत के जीडीपी का कुल ५,३% है। पर्यटन १०% भारतीय कामगारों को आजीविका देता है। वास्तविक संख्या ४.२ करोड है। आर्थिक रूप से देखा जाए तो पर्यटन भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग $४०० करोड डालर प्रदान करता है। भारत के प्रमुख व्यापार सहयोगी हैं अमरीका, जापान, चीन और संयुक्त अरब अमीरात।

भारत के निर्यातों में कृषि उत्पाद, चाय, कपड़ा, बहुमूल्य रत्न व आभूषण, साफ़्टवेयर सेवायें, इंजीनियरिंग सामान, रसायन तथा चमड़ा उत्पाद प्रमुख हैं जबकि उसके आयातों में कच्चा तेल, मशीनरी, बहुमूल्य रत्न, उर्वरक (फ़र्टिलाइज़र) तथा रसायन प्रमुख हैं। वर्ष २००४ के लिये भारत के कुल निर्यात $६९१८ करोड़ डालर के थे जबकि उसके आयात $८९३३ करोड़ डालर के थे।

दिसम्‍बर 2013 के अंत में भारत का कुल विदेशी कर्ज 426.0 अरब अमरीकी डॉलर था, जिसमें कि दीर्घकालिक कर्ज 333.3 अरब (78,2%) तथा अल्‍पकालिक कर्ज 92,7% अरब अमरीकी डॉलर (21,8%) था। कुल विदेशी कर्ज में सरकार का विदेशी कर्ज 76.4 अरब अमरीकी डॉलर (कुल विदेशी कर्ज का 17.9 प्रतिशत) था, बाकी में व्‍यावसायिक उधार, एनआरआई जमा और बहुउद्देश्‍यीय कर्ज आदि हैं।

 भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। भारत की विभिन्नताओं से भरी जनता में भाषा, जाति और धर्म, सामाजिक और राजनीतिक सौहार्द्र और समरसता के मुख्य शत्रु हैं। 
भारत की जनगणना २०११ के अनुसार भारत में ७४.०४ प्रतिशत साक्षरता है जिस में से +८०% पुरुष और ६हैं।% स्त्रियाँ साक्षर हैं। लिंग अनुपात की दृष्टि से भारत में प्रत्येक १००० पुरुषों के पीछे मात्र ९४० महिलायें हैं। कार्य भागीदारी दर (कुल जनसंख्या मे कार्य करने वालों का भाग) ३९.१% है। पुरुषों के लिये यह दर ५१,७% और स्त्रियों के लिये २५,६% है। भारत की १००० जनसंख्या में २२.३२ जन्मों के साथ बढ़ती जनसंख्या के आधे लोग २२.६६ वर्ष से कम आयु के हैं।

यद्यपि भारत की ७९.८० प्रतिशत या ९६.६२ करोड़ जनसंख्या हिन्दू है, १४.२३ प्रतिशत या १७.२२ करोड़ जनसंख्या के साथ भारत विश्व में मुसलमानों की संख्या में भी इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद तीसरे स्थान पर है। अन्य धर्मावलम्बियों में ईसाई (२.३० % या २.७८ करोड़), सिख (१,७२ % या २.०८ करोड़), बौद्ध (०,७० % या ८४.४३ लाख), जैन (०,३७ % या ४४.५२ लाख), अन्य धर्म  (०,६६ % या ७९.३८ लाख) इनमें यहूदी, पारसी, अहमदी और बहाई आदि धर्मीय हैं। नास्तिकता  ०,२४% या ३८.३७ लाख है।

भारत दो मुख्य भाषा-सूत्रों: आर्य और द्रविड़ भाषाओँ का स्रोत भी है। भारत का संविधान कुल २३ भाषाओं को मान्यता देता है। हिन्दी और अंग्रेजी केन्द्रीय सरकार द्वारा सरकारी कामकाज के लिये उपयोग की जाती हैं। संस्कृत और तमिल जैसी अति प्राचीन भाषाएं भारत में ही जन्मी हैं। संस्कृत, संसार की सर्वाधिक प्राचीन भाषाओँ में से एक है, जिसका विकास पथ्यास्वस्ति नाम की अति प्राचीन भाषा/ बोली से हुआ था। तमिल के अलावा सारी भारतीय भाषाएँ संस्कृत से ही विकसित हुई हैं, हालाँकि संस्कृत और तमिल में कई शब्द समान हैं ! कुल मिला कर भारत में १६५२ से भी अधिक भाषाएं एवं बोलियाँ बोली जातीं हैं।

भारत की सांस्कृतिक धरोहर बहुत संपन्न है। यहाँ की संस्कृति अनोखी है और वर्षों से इसके कई अवयव अब तक अक्षुण्य हैं। आक्रमणकारियों तथा प्रवासियों से विभिन्न चीजों को समेट कर यह एक मिश्रित संस्कृति बन गई है। आधुनिक भारत का समाज, भाषाएं, रीति-रिवाज इत्यादि इसका प्रमाण हैं। ताजमहल और अन्य उदाहरण, इस्लाम प्रभावित स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने हैं। 
 
भारतीय समाज बहुधर्मिक, बहुभाषी तथा मिश्र-सांस्कृतिक है। पारंपरिक भारतीय पारिवारिक मूल्यों को काफी आदर की दृष्टि से देखा जाता है।

विभिन्न धर्मों के इस भूभाग पर कई मनभावन पर्व त्यौहार मनाए जाते हैं - दिवाली, होली, दशहरा. पोंगल तथा ओणम . ईद उल-फ़ित्र, ईद-उल-जुहा, मुहर्रम, क्रिसमस, ईस्टर आदि भी काफ़ी लोकप्रिय हैं।

भारत में संगीत तथा नृत्य की अपनी शैलियां भी विकसित हुईं, जो बहुत ही लोकप्रिय हैं। भरतनाट्यम, ओडिसी, कथक प्रसिद्ध भारतीय नृत्य शैली है। हिन्दुस्तानी संगीत तथा कर्नाटक संगीत भारतीय परंपरागत संगीत की दो मुख्य धाराएं हैं। लोक नृत्यों () में शामिल हैं पंजाब का भांगड़ा, असम का बिहू, झारखंड का झुमइर और डमकच, झारखंड और उड़ीसा का छाऊ, राजस्थान का घूमर, गुजरात का डांडिया  और गरबा, कर्नाटक जा यक्षगान, महाराष्ट्र का लावनी और गोवा का देख्ननी ।

हालाँकि हॉकी देश का राष्ट्रीय खेल है, क्रिकेट सबसे अधिक लोकप्रिय है। वर्तमान में फुटबॉल, हॉकी तथा टेनिस में भी बहुत भारतीयों की अभिरुचि है। देश की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम 1983 और 2011 में दो बार विश्व कप और 2007 का 20–20 विश्व-कप जीत चुकी है। इसके अतिरिक्त वर्ष 2003 में वह विश्व कप के फाइनल तक पहुँची थी। 1930 तथा 40 के दशक में हॉकी भारत में अपने चरम पर थी। मेजर ध्यानचंद ने हॉकी में भारत को बहुत प्रसिद्धि दिलाई और एक समय भारत ने अमरीका को 24–0 से हराया था जो अब तक विश्व कीर्तिमान है। शतरंज के जनक देश भारत के खिलाड़ी विश्वनाथ आनंद ने अच्छा प्रदर्शन किया है।

वैश्वीकरण के इस युग में शेष विश्व की तरह भारतीय समाज पर भी अंग्रेजी तथा यूरोपीय प्रभाव पड़ रहा है। बाहरी लोगों की खूबियों को अपनाने की भारतीय परंपरा का नया दौर कई भारतीयों की दृष्टि में उचित नहीं है। एक खुले समाज के जीवन का यत्न कर रहे लोगों को मध्यमवर्गीय तथा वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। कुछ लोग इसे भारतीय पारंपरिक मूल्यों का हनन भी मानते हैं। विज्ञान तथा साहित्य में अधिक प्रगति न कर पाने की वजह से भारतीय समाज यूरोपीय लोगों पर निर्भर होता जा रहा है। ऐसे समय में लोग विदेशी अविष्कारों का भारत में प्रयोग अनुचित भी समझते हैं।

भारतीय फिल्म उद्योग, दुनिया की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली सिनेमा का उत्पादन करता है। इसके अलावा यहाँ असमिया, बंगाली, भोजपुरी, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी, गुजराती, मराठी, ओडिया, तमिल और तेलुगू भाषाओं के क्षेत्रीय सिनेमाई परंपराएं भी मौजूद हैं। दक्षिण भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय फिल्म राजस्व में 75% से अधिक का हिस्सा है। भारत में सितंबर 2016 तक 2200 मल्टीप्लेक्स स्क्रीन सिनेमाघर थे तथा इसके 2019 तक 3000 तक बढ़ने की अपेक्षा की गई हैं।

भारतीय खानपान बहुत ही समृद्ध है। शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों ही तरह का खाना पसन्द किया जाता है। भारतीय व्यंजन विदेशों में भी बहुत पसन्द किए जाते हैं।

रूस के साथ सामरिक संबंधों के अलावा, भारत का इजरायल और फ्रांस के साथ विस्तृत रक्षा संबंध हैं। हाल के वर्षों में, भारत ने क्षेत्रीय सहयोग और विश्व व्यापार संगठन के लिए एक दक्षिण एशियाई एसोसिएशन में प्रभावशाली भूमिका निभाई है।  भारत ने 100,000 सैन्य और पुलिस कर्मियों को चार महाद्वीपों भर में संयुक्त राष्ट्र के पैंतीस शांति अभियानों में सेवा प्रदान की है। भारत ने विभिन्न बहुपक्षीय मंचों, सबसे खासकर पूर्वी एशिया के शिखर बैठक और जी-8 5 में एक सक्रिय भागीदारी निभाई है। आर्थिक क्षेत्र में भारत का दक्षिण अमेरिका, एशिया, और अफ्रीका के विकासशील देशों के साथ घनिष्ठ संबंध है।

भारत में कई सारे पर्व मनाए जाते हैं, जिसमें 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस, 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस, 2 अक्टूबर को गांधी जयंती, दिवाली, होली और ईद पूरे देश में मनाई जाती है। इसके अलावा अन्य पर्व राज्यों के अनुसार होते हैं।




#Article 6: संस्कृत भाषा (767 words)


संस्कृत (संस्कृतम्) भारतीय उपमहाद्वीप की एक भाषा है। इसे देववाणी अथवा सुरभारती भी कहा जाता है। यह विश्व की सबसे प्राचीन  भाषा है। संस्कृत एक हिंद-आर्य भाषा हैं जो हिंद-यूरोपीय भाषा परिवार की एक शाखा हैं। आधुनिक भारतीय भाषाएँ जैसे, हिंदी, बांग्ला, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, नेपाली, आदि इसी से उत्पन्न हुई हैं। इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है। संस्कृत में वैदिक धर्म से संबंधित लगभग सभी धर्मग्रंथ लिखे गये हैं। बौद्ध धर्म (विशेषकर महायान) तथा जैन मत के भी कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथ संस्कृत में लिखे गये हैं। आज भी हिंदू धर्म के अधिकतर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही होती हैं। भीम राव अम्बेडकर  का मानना था कि संस्कृत पूरे भारत को भाषाई एकता के सूत्र में बांध सकने वाली इकलौती भाषा हो सकती है, अतः उन्होंने इसे देश की आधिकारिक भाषा बनाने का सुझाव दिया था। 

भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में संस्कृत को भी सम्मिलित किया गया है। यह उत्तराखण्ड की द्वितीय राजभाषा है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से संस्कृत में समाचार प्रसारित किए जाते हैं। कतिपय वर्षों से डी. डी. न्यूज (DD News) द्वारा वार्तावली नामक अर्धहोरावधि का संस्कृत-कार्यक्रम भी प्रसारित किया जा रहा है, जो हिन्दी चलचित्र गीतों के संस्कृतानुवाद, सरल-संस्कृत-शिक्षण, संस्कृत-वार्ता और महापुरुषों की संस्कृत जीवनवृत्तियों, सुभाषित-रत्नों आदि के कारण अनुदिन लोकप्रियता को प्राप्त हो रहा है।

 

संस्कृत का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान समय में प्राप्त सबसे प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ ॠग्वेद है जो कम से कम ढाई हजार ईसापूर्व की रचना है।

 

संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। बहुत प्राचीन काल से ही अनेक व्याकरणाचार्यों ने संस्कृत व्याकरण पर बहुत कुछ लिखा है। किन्तु पाणिनि का संस्कृत व्याकरण पर किया गया कार्य सबसे प्रसिद्ध है। उनका अष्टाध्यायी किसी भी भाषा के व्याकरण का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।

संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द-रूप बनाये जाते हैं, जो व्याकरणिक अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूलशब्द के अन्त में प्रत्यय लगाकर बनाये जाते हैं। इस तरह ये कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अन्त-श्लिष्टयोगात्मक भाषा है। संस्कृत के व्याकरण को वागीश शास्त्री ने वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है।

संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका विशेष संबंध है। देवनागरी लिपि वास्तव में संस्कृत के लिये ही बनी है, इसलिये इसमें हर एक चिह्न के लिये एक और केवल एक ही ध्वनि है। देवनागरी में १३ स्वर और ३३ व्यंजन हैं। देवनागरी से रोमन लिपि में लिप्यन्तरण के लिये दो पद्धतियाँ अधिक प्रचलित हैं : IAST और ITRANS. शून्य, एक या अधिक व्यंजनों और एक स्वर के मेल से एक अक्षर बनता है। 

संस्कृत, क्षेत्रीय लिपियों में लिखी जाती रही है।

ये स्वर संस्कृत के लिये दिये गये हैं। हिन्दी में इनके उच्चारण थोड़े भिन्न होते हैं।

संस्कृत में ऐ दो स्वरों का युग्म होता है और अ-इ या आ-इ की तरह बोला जाता है। इसी तरह औ अ-उ या आ-उ की तरह बोला जाता है।

इसके अलावा निम्नलिखित वर्ण भी स्वर माने जाते हैं :

जब कोई स्वर प्रयोग नहीं हो, तो वहाँ पर 'अ' माना जाता है। स्वर के न होने को हलन्त्‌ अथवा विराम से दर्शाया जाता है। जैसे कि क्‌ ख्‌ ग्‌ घ्‌। 

संस्कृत भाषा के शब्द मूलत रूप से सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं में हैं। सभी भारतीय भाषाओं में एकता की रक्षा संस्कृत के माध्यम से ही हो सकती है। मलयालम, कन्नड और तेलुगु आदि दक्षिणात्य भाषाएं संस्कृत से बहुत प्रभावित हैं। यहाँ तक कि तमिल में भी संस्कृत के हजारों शब्द भरे पड़े हैं और मध्यकाल में संस्कृत का तमिल पर गहरा प्रभव पड़ा।

विश्व की अनेकानेक भाषाओं पर संस्कृत ने गहरा प्रभाव डाला है। संस्कृत भारोपीय भाषा परिवर में आती है और इस परिवार की भाषाओं से भी संस्कृत में बहुत सी समानता है। वैदिक संस्कृत और अवेस्ता (प्राचीन इरानी) में बहुत समानता है। भारत के पड़ोसी देशों की भाषाएँ सिंहल, नेपाली, म्यांमार भाषा, थाई भाषा, ख्मेर संस्कृत से प्रभावित हैं। बौद्ध धर्म का चीन ज्यों-ज्यों प्रसार हुआ वैसे वैसे पहली शताब्दी से दसवीं शताब्दी तक सैकड़ों संस्कृत ग्रन्थों का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ। इससे संस्कृत के हजरों शब्द चीनी भाषा में गए। उत्तरी-पश्चिमी तिब्बत में तो अज से १००० वर्ष पहले तक संस्कृत की संस्कृति थी और वहाँ गान्धारी भाषा का प्रचलन था। 

भारत के संविधान में संस्कृत आठवीं अनुसूची में सम्मिलित अन्य भाषाओं के साथ विराजमान है। त्रिभाषा सूत्र के अन्तर्गत संस्कृत भी आती है। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की की वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली संस्कृत से निर्मित है।

भारत तथा अन्य देशों के कुछ संस्कृत विश्वविद्यालयों की सूची नीचे दी गयी है- (देखें, भारत स्थित संस्कृत विश्वविद्यालयों की सूची)

संस्कृत के विकिपीडिया प्रकल्प




#Article 7: हिन्दू (192 words)


शब्द हिंदू किसी भी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख करता है जो खुद को सांस्कृतिक रूप से, मानव-जाति के अनुसार या नृवंशतया (एक विशिष्ट संस्कृति का अनुकरण करने वाले एक ही प्रजाति के लोग), या धार्मिक रूप से हिंदू धर्म से जुड़ा हुआ अनुकरण हैं। यह शब्द ऐतिहासिक रूप से दक्षिण एशिया में स्वदेशी या स्थानीय लोगों के लिए एक भौगोलिक, सांस्कृतिक, और बाद में धार्मिक पहचानकर्ता के रूप में प्रयुक्त किया गया है। 

हिंदू शब्द का ऐतिहासिक अर्थ समय के साथ विकसित हुआ है। प्रथम सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में सिंधु की भूमि के लिए फारसी और ग्रीक संदर्भों के साथ, मध्ययुगीन युग के ग्रंथों के माध्यम से , हिंदू शब्द सिंधु (इंडस) नदी के चारों ओर या उसके पार भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों के लिए भौगोलिक रूप में, मानव-जाति के अनुसार (नृवंशतया), या सांस्कृतिक पहचानकर्ता के रूप में प्रयुक्त होने लगा था। 16 वीं शताब्दी तक, इस शब्द ने उपमहाद्वीप के उन निवासियों का उल्लेख करना शुरू कर दिया, जो कि तुर्की या मुस्लिम नहीं थे।

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1995 के एक फैसले में  कहा ‘हिंदुत्व का मतलब भारतीयकरण है और उसे धर्म जैसा नहीं माना जाना चाहिए’,




#Article 8: शब्दकोश (2245 words)


शब्दकोश (अन्य वर्तनी:शब्दकोष) एक बडी सूची या ऐसा ग्रंथ जिसमें शब्दों की वर्तनी, उनकी व्युत्पत्ति, व्याकरणनिर्देश, अर्थ, परिभाषा, प्रयोग और पदार्थ आदि का सन्निवेश हो। शब्दकोश एकभाषीय हो सकते हैं, द्विभाषिक हो सकते हैं या बहुभाषिक हो सकते हैं। अधिकतर शब्दकोशों में शब्दों के उच्चारण के लिये भी व्यवस्था होती है, जैसे - अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक लिपि में, देवनागरी में या आडियो संचिका के रूप में। कुछ शब्दकोशों में चित्रों का सहारा भी लिया जाता है। अलग-अलग कार्य-क्षेत्रों के लिये अलग-अलग शब्दकोश हो सकते हैं; जैसे - विज्ञान शब्दकोश, चिकित्सा शब्दकोश, विधिक (कानूनी) शब्दकोश, गणित का शब्दकोश आदि।

सभ्यता और संस्कृति के उदय से ही मानव जान गया था कि भाव के सही संप्रेषण के लिए सही अभिव्यक्ति आवश्यक है। सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द का चयन आवश्यक है। सही शब्द के चयन के लिए शब्दों के संकलन आवश्यक हैं। शब्दों और भाषा के मानकीकरण की आवश्यकता समझ कर आरंभिक लिपियों के उदय से बहुत पहले ही आदमी ने शब्दों का लेखाजोखा रखना शुरू कर दिया था। इस के लिए उस ने कोश बनाना शुरू किया। कोश में शब्दों को इकट्ठा किया जाता है।

सब से पहले शब्द संकलन भारत में बने। भारत की यह शानदार परंपरा वेदों जितनी—कम से कम पाँच हजार वर्ष—पुरानी है। प्रजापति कश्यप का निघंटु संसार का प्राचीनतम शब्द संकलन है। इस में 18 सौ वैदिक शब्दों को इकट्ठा किया गया है। निघंटु पर महर्षि यास्क की व्याख्या निरुक्त संसार का पहला शब्दार्थ कोश (डिक्शनरी) एवं विश्वकोश (ऐनसाइक्लोपीडिया) है। इस महान शृंखला की सशक्त कड़ी है छठी या सातवीं सदी में लिखा अमर सिंह कृत नामलिंगानुशासन या त्रिकांड जिसे सारा संसार 'अमरकोश' के नाम से जानता है। अमरकोश को विश्व का सर्वप्रथम समान्तर कोश (थेसेरस) कहा जा सकता है।

भारत के बाहर संसार में शब्द संकलन का एक प्राचीन प्रयास अक्कादियाई संस्कृति की शब्द सूची है। यह शायद ईसा पूर्व सातवीं सदी की रचना है। ईसा से तीसरी सदी पहले की चीनी भाषा का कोश है 'ईर्या'।

आधुनिक कोशों की नींव डाली इंग्लैंड में 1755 में सैमुएल जानसन ने। उन की डिक्शनरी सैमुएल जॉन्संस डिक्शनरी ऑफ़ इंग्लिश लैंग्वेज ने कोशकारिता को नए आयाम दिए। इस में परिभाषाएँ भी दी गई थीं। असली आधुनिक कोश आया इक्यावन साल बाद 1806 में अमरीका में नोहा वैब्स्टर्स की नोहा वैब्स्टर्स ए कंपैंडियस डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज प्रकाशित हुई। इस ने जो स्तर स्थापित किया वह पहले कभी नहीं हुआ था। साहित्यिक शब्दावली के साथ साथ कला और विज्ञान क्षेत्रों को स्थान दिया गया था। कोश को सफल होना ही था, हुआ। वैब्स्टर के बाद अँगरेजी कोशों के संशोधन और नए कोशों के प्रकाशन का व्यवसाय तेज़ी से बढ़ने लगा।

वर्तमान युग ने कोशविद्या को अत्यंत व्यापक परिवेश में विकसित किया। सामान्य रूप से उसकी दो मोटी-मोटी विधाएँ कही जा सकती हैं - (१) शब्दकोश और (२) ज्ञानकोश। शब्दकोश के स्वरूप का बहुमुखी प्रवाह निरंतर प्रौढ़ता की ओर बढ़ता लक्षित होता रहा है। आज की कोशविद्या का विकसित स्वरूप भाषा विज्ञान, व्याकरणशास्त्र, साहित्य, अर्थविज्ञान, शब्दप्रयोगीय, ऐतिहासिक विकास, संदर्भसापेक्ष अर्थविकास और नाना शास्त्रों तथा विज्ञानों में प्रयुक्त विशिष्ट अर्थों के बौद्धिक और जागरूक शब्दार्थ संकलन का पुंजीकृत परिणाम है।

हमारे परिचित भाषाओं के कोशों में ऑक्सफोर्ड-इंग्लिश-डिक्शनरी के परिशीलन में उपर्युक्त समस्त प्रवृत्तियों का उत्कृष्ट निदर्शन देखा जा सकता है। उसमें शब्दों के सही उच्चारण का संकेत-चिह्नों से विशुद्ध और परिनिष्ठित बोध भी कराया है। योरप के उन्नत और समृद्ध देशों की प्रायः सभी भाषाओं में विकासित स्तर की कोशविद्या के आधार पर उत्कृष्ट, विशाल, प्रमाणिक और संपन्न कोशों का निर्माण हो चुका है और उन दोशों में कोशनिर्माण के लिये ऐसे स्थायी संस्थान प्रतिष्ठापित किए जा चुके हैं जिनमें अबाध गति से सर्वदा कार्य चलता रहता है। लब्धप्रतिष्ठा और बडे़-बडे़ विद्वानों का सहयोग तो उन संस्थानों को मिलता ही है, जागरूक जनता भी सहयोग देती है। अंग्रेजी डिक्शनरी तथा अन्य भाषाओं में निर्मित कोशकारों के रचना-विधान-मूलक वैशिष्टयों का अध्ययन करने से अद्यतन कोशों में निम्ननिर्दिष्ट बातों का अनुयोग आवश्यक लगता है—

'आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी' का नव्यतम और बृहत्तम संस्करण आधुनिक कोशविद्या की प्रायः सभी विशेषताओं से संपन्न है। नागरीप्रचारिणी सभा के हिंदी शब्दसागर के अतिरिक्त हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा प्रकाश्यमान मानक शब्दकोश एक विस्तृत आयास है। हिंदी कोशकला के लब्धप्रतिष्ठ संपादक रामचन्द्र वर्मा के इस प्रशंसनीय कार्य का उपजीव्य भी मुख्यातः शब्दसागर ही है। उसका मूल कलेवर तात्विक रूप में शब्दसागर से ही अधिकांशतः परिकलित है। हिंदी के अन्य कोशों में भी अधिकांश सामग्री इसी कोश से ली गयी है। थोडे-बहुत मुख्यतः संस्कृत कोशों से और यदा-कदा अन्यत्र से शब्दों और अर्थों को आवश्यक अनावश्यक रूप में ठूँस दिया गया है। ज्ञानमंडल के बृहद् हिंदी शब्दकोश में पेटेवाली प्रणाली शुरू की गई है। परंतु वह पद्धति संस्कृत के कोशों में जिनका निर्माण पश्चिमी विद्वानों के प्रयास से आरंभ हुआ था, सैकड़ो वर्ष पूर्व से प्रचलित हो गई थी। पर आज भी, नव्य या आधुनिक भारतीय भाषाओं के कोश उस स्तर तक नहीं पहुँच पाए हैं जहाँ तक आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी अथवा रूसी, अमेरिकन, जर्मन, इताली, फ्रांसीसी आदि भाषाओं के उत्कृष्ट और अत्यंत विकसित कोश पहुँच चुके हैं।

कोशरचना की ऊपर वर्णित विधा को हम साधारणतः सामान्य भाषा शब्दकोश कह सकते हैं। इस प्रकार शब्दकोश एकभाषी, द्विभाषी, त्रिभाषी और बहुभाषी भी होते हैं। बहुभाषी शब्दकोशों में तुलनात्मक शब्दकोश भी यूरोपीय भाषाओं में ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषाविज्ञान की प्रौढ उपलब्धियों से प्रमाणीकृत रूप में निर्मित हो चुके हैं। इनमें मुख्य रूप से भाषावैज्ञानिक अनुशीलन और शोध के परिणामस्वरूप उपलब्ध सामग्री का नियोजन किया गया है। ऐसे तुलनात्मक कोश भी आज बन चुके हैं जिनमें प्राचीन भाषाओं की तुलना मिलती है। ऐसे भी कोश प्रकाशित हैं जिनमें एक से अधिक मुल परिवार की अनेक भाषाओं के शब्दों का तुलनात्मक परिशीलन किया गया है।

शब्दकोशों के और भी नाना रूप आज विकसित हो चुके हैं और हो रहे हैं। वैज्ञानिक और शास्त्रीय विषयों के सामूहिक और उस-उस विषय के अनुसार शब्दकोश भी आज सभी समृद्ध भाषाओं में बनते जा रहे हैं। शास्त्रों और विज्ञानशाखाओं के परिभाषिक शब्दकोश भी निर्मित हो चुके हैं और हो रहे हैं। इन शब्दकोशों की रचना एक भाषा में भी होती है और दो या अनेक भाषाओं में भी। कुछ में केवल पर्याय शब्द रहते हैं और कुछ में व्याख्याएँ अथवा परिभाषाएँ भी दी जाती है। विज्ञान और तकनीकी या प्रविधिक विषयों से संबद्ध नाना पारिभाषिक शब्दकोशों में व्याख्यात्मक परिभाषाओं तथा कभी कभी अन्य साधनों की सहायता से भी बिलकुल सही अर्थ का बोध कराया जाता है। दर्शन, भाषाविज्ञान, मनोविज्ञान, समाजविज्ञान और समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि समस्त आधुनिक विद्याओं के कोश विश्व की विविध संपन्न भाषाओं में विशेषज्ञों की सहायता से बनाए जा रहे हैं और इस प्रकृति के सैकडों-हजारों कोश भी बन चुके हैं। शब्दार्थकोश संबंधी प्रकृति के अतिरिक्त इनमें ज्ञानकोशात्मक तत्वों की विस्तृत या लघु व्याख्याएँ भी संमिश्रित रहती है। प्राचीन शास्त्रों और दर्शनों आदि के विशिष्ट एवं पारिभाषिक शब्दों के कोश भी बने हैं और बनाए जा रहे हैं। अनके अतिरिक्त एक-एक ग्रथं के शब्दार्थ कोश (यथा मानस शब्दावली) और एक-एक लेखक के साहित्य की शब्दावली भी योरप, अमेरिका और भारत आदि में संकलित हो रही है। इनमें उत्तम कोटि के कोशकारों ने ग्रंथसंदर्भों के संस्करणात्मक संकेत भी दिए हैं। अकारादि वर्णानुसारी अनुक्रमणिकात्मक उन शब्दसूचियों का—जिनके अर्थ नहीं दिए जाते हैं पर संदर्भसंकेत रहता हैं—यहाँ उल्लेख आवश्यक नहीं है। योरप और इंगलैड में ऐसी शब्दसूचियाँ अनेक बनीं। शेक्सपियर द्वारा प्रयुक्त शब्दों की ऐसी अनुक्रमणिका परम प्रसिद्ध है। वैदिक शब्दों की और ऋक्संहिता में प्रयुक्त पदों की ऐसी शब्दसूचियों के अनेक संकलन पहले ही बन चुके हैं। व्याकरण महाभाष्य की भी एक एक ऐसी शब्दानुक्रमणिका प्रकाशित है। परंतु इनमें अर्थ न होने के कारण यहाँ उनका विवेचन नहीं किया जा रहा है।

कोश की एक दूसरी विधा ज्ञानकोश भी विकसित हुई है। इसके वृहत्तम और उत्कष्ट रूप को इन्साइक्लोपिडिया कहा गया है। हिंदी में इसके लिये विश्वकोश शब्द प्रयुक्त और गृहीत हो गया है। यह शब्द बँगाल विश्वकोशकार ने कदाचित् सर्वप्रथम बँगाल के ज्ञानकोश के लिये प्रयुक्त किया। उसका एक हिंदी संस्करण हिंदी विश्वकोश के नाम से नए सिरे से प्रकाशित हुआ। हिंदी में यह शब्द प्रयुक्त होने लगा है। यद्यपि हिंदी के प्रथम किशोरोपयोगी ज्ञानकोश (अपूर्ण) को श्री श्रीनारायण चतुर्वेदी तथा पं० कृष्ण वल्लभ द्विवेदि द्वारा विश्वभारती अभिधान दिया गया तो भी ज्ञान कोश, ज्ञानदीपिका, विश्वदर्शन, विश्वविद्यालयभंडार आदि संज्ञाओं का प्रयोग भी ज्ञानकोश के लिये हुआ है। स्वयं सरकार भी बालशिक्षोपयोगी ज्ञानकोशात्मक ग्रंथ का प्रकाशन 'ज्ञानसरोवर' नाम से कर रही है। परंतु इन्साइक्लोपीडिया के अनुवाद रूप में विवकोश शब्द ही प्रचलित हो गया। उडीया के एक विश्वकोश का नाम शब्दार्थानुवाद के अनुसार ज्ञान मंडल रखा भी गया। ऐसा लगता है कि बृहद् परिवेश के व्यापक ज्ञान का परिभाषिक और विशिष्ट शब्दों के माध्यम से ज्ञान देनेवाले ग्रथं का इन्साइक्लोपीडिया या विश्वकोश अभिधान निर्धारित हुआ और अपेक्षाकृत लघुतरकोशों को ज्ञानकोश आदि विभिन्न नाम दिए गए। अंग्रेजी आदि भाषाओं में बुक ऑफ नालेज, डिक्शनरी आव जनरल नालेज आदि शीर्षकों के अंतरेगत नाना प्रकार के छोटे बडे विश्वकोश अथवा ज्ञानकोश बने हैं और आज भी निरंतर प्रकाशित एवं विकसित होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं इन्साइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन ऐंड एथिक्स आदि विषयविशेष से संबंद्ध विश्वकोशों की संख्या भी बहुत ही बडी है। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से निर्मित अनेक सामान्य विश्वकोश और विशष विश्वकोश भी आज उपलब्ध हैं।

इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, इन्साइक्लोपीडिया अमेरिकाना अंग्रेजी के ऐसे विश्वकोश हैं। अंग्रेजी के सामान्य विश्वकोशों द्वारा इनकी प्रमाणिकता और संमान्यता सर्वस्वीकृत है। निरंतर इनके संशोधित, संवर्धित तथा परिष्कृत संस्करण निकलते रहते हैं। इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के दो परिशिष्ट ग्रंथ भी हैं जो प्रकाशित होते रहते हैं और जो नूतन संस्करण की सामग्री के रूप में सातत्य भाव से संकलित होते रहते हैं। इंगलैंड में इन्साइक्लोपीडिया के पहले से ही ज्ञानकोशात्मक कोशों के नाना रूप बनने लगे थे।

ज्ञानकोशों के भी इतने अधिक प्रकार और पद्धतियाँ हैं जिनकी चर्चा का यहाँ अवसर नहीं है। चरितकोश, कथाकोश इतिहासकोश, ऐतिहासिक कालकोश, जीवनचरितकोश पुराख्यानकोश, पौराणिक- ख्यातपुरुषकोश आदि आदि प्रकार के विविध नामरूपात्मक ज्ञानकोशों की बहुत सी विधाएँ विकसित और प्रचलित हो चुकी हैं। यहाँ प्रसंगतः ज्ञानकोशों का संकेतात्मक नामनिर्देश मात्र कर दिया जा रहा है। हम इस प्रसंग को यहीं समाप्त करते हैं और शब्दर्थकोश से संबंद्ध प्रकृत विषय की चर्चा पर लौट आते हैं।

भारत में कोशविद्या के आधुनिक स्वरुप का उद्भव और विकास मध्यकालीन हिंदी कोशों की मान्यता और रचनाप्रक्रिया से भिन्न उद्देश्यों को लेकर हुआ। पाश्चात्य कोशों के आदर्श, मान्यताएँ, उद्देश्य, रचनाप्रक्रिया और सीमा के नूतन और परिवर्तित आयामों का प्रवेश भारत की कोश रचनापद्धति में आरंभ हुआ। संस्कृत और इतर भारतीय भाषाओं में पाश्चात्य तथा भारतीय विद्वानों के प्रयास से छोटे-बडे बहुत से कोश निर्मित हुए। इन कोशों का भारत और भारत के बाहर भी निर्माण हुआ। आरंभ में भारतीय भाषाओं के, मुख्यतः संस्कृत के कोश अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच आदि भाषाओं के माध्यम से बनाए गए। इनमें संस्कृत आदि के शब्द भी रोमन लिपि में रखे गए। शब्दार्थ की व्याख्या और अर्थ आदि के निर्देश कोश की भाषा के अनुसार जर्मन, अंग्रेजी, फारसी, पुर्तगाली आदि भाषाओं में दिए गए। बँगला, तमिल आदि भाषाओं के ऐसे अनके काशों की रचना ईसाई धर्मप्रचारकों द्वारा भारत और आसपास के लघु द्वीपों में हुई। हिंदी के भी ऐसे अनेक कोश बने। सबसे पहला शब्दकोश संभवतः फरग्युमन का 'हिंदुस्तानी अंग्रेजी' (अंग्रेजी हिंदुस्तानी) कोश था जो १७७३ ई० में लंदन में प्रकाशित हुआ। इन आरंभिक कोशों को 'हिंदुस्तानी कोश' कहा गया। ये कोश मुख्यतः हिंदी के ही थे। पाश्चात्य विद्वानों के इन कोशों में हिंदी को हिंदुस्तानी कहने का कदाचित् यह कारण है कि हिंदुस्तान भारत का नाम माना गया और वहाँ की भाषा हिंदुस्तानी कही गई। कोशविद्या के इन पाश्चात्य पंडितों की दृष्टि में हिंदी का ही पर्याय हिंदुस्तानी था और वही सामान्य रूप में हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा थी।

आरंभिक क्रम में कोशनिर्माण की प्रेरणात्मक चेतना का बहुत कुछ सामान्य रूप भारत और पश्चिम में मिलता जुलता था। भारत का वैदिक निघंटु विरल और क्लिष्ट शब्दों के अर्थ और पर्यायों का संक्षिप्त संग्रह था। योरप में भी ग्लासेरिया से जिस कोशविद्या का आरंभिक बीजवपन हुआ था, उसके मूल में भई विरल और क्लिष्ट शब्दों का पर्याय द्वारा अर्थबोध कराना ही उद्देश्य था। लातिन की उक्त शब्दार्थसूची से शनैः शनैः पश्चिम की आधुनिक कोशविद्या के वैकासिक सोपान आविर्भूत हुए। भारत और पश्चिम दोनों ही स्थानों में शब्दों के सकलन में वर्गपद्धति का कोई न कोई रूप मिल जाता है। पर आगे चलकर नव्य कोशों का पूर्वोंक्त प्राचीन और मध्यकालीन कोशों से जो सर्वप्रथम और प्रमुखतम भेदक वैशिष्टय प्रकट हुआ वह था - वर्णमालाक्रमानुसारी शब्दयोजना की पद्धति।

योरप में आधुनिक कोशों का जो स्वरूप विकसित हुआ, उसकी रूपरेखा का संकेत ऊपर किया जा चुका है। योरप, एशिया और अफ्रिका के उस तटभाग में जो अरब देशों के प्रभाव में आया था, उक्त पद्धति के अनुकरण पर कोशों का निर्माण होने लगा था। भारत में व्यापक पैमाने पर जिस रूप में कोश निर्मत होते चले, उनकी संक्षिप्त चर्चा की जा चुकी है। इन सबके आधार पर उत्तम कोटि के आधुनिक कोशों की विशिषिटताओं का आकलन करते हुए कहा जा सकता है कि:

कोशनिर्माण का शब्दसंकलन सर्वप्रमुख आधार है। परन्तु शब्दों के संग्रह का कार्य अत्यत कठिन है। मुख्य रूप में शब्दों का चयन दो स्त्रोतों से होता है -

लिखित साहित्य से सग्रह्य शब्दों के लिये हस्तलिखित और मुद्रित ग्रंथो का सहारा लिया जाता है। परंतु इसके अंतर्गत प्राचीन हस्तलेखों और मुद्रित ग्रथो के आधार पर जब शब्दसंकलन होता है तब उभयविध आधारग्रंथों की प्रामाणिकता और पाठशुद्धि आवश्यक होती है। इनके बिमा गृहीत शब्दों का महत्व कम हो जाता है और उनसे भ्रमसृष्टि की संभावना बढ़ती है।

आजकल ऐसे कम्प्यूटर प्रोग्राम उपलब्ध हैं जो शब्दकोश के सारे काम करते हैं। वे कागज पर मुद्रित नहीं हैं बल्कि किसी विशिष्ट फाइल-फॉर्मट में हैं और किसी 'डिक्शनरी सॉफ्टवेयर' के द्वारा प्रयोक्ता को शब्दार्थ ढूढने में मदद करते हैं। इनमें कुछ ऐसी सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं जो परम्परागत शब्दकोशों में सम्भव ही नहीं है; जैसे शब्द का उच्चारण ध्वनि के माध्यम से देना आदि।

शब्दकोशों के कुछ प्रकार ये हैं-

गलत




#Article 9: जन गण मन (873 words)


जन गण मन, भारत का राष्ट्रगान है जो मूलतः बंगाली में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखा गया था। भारत का राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम्‌ है। 

राष्ट्रगान के गायन की अवधि लगभग 52 सेकेण्ड है। कुछ अवसरों पर राष्ट्रगान संक्षिप्त रूप में भी गाया जाता है, इसमें प्रथम तथा अन्तिम पंक्तियाँ ही बोलते हैं जिसमें लगभग 20 सेकेण्ड का समय लगता है। संविधान सभा ने जन-गण-मन हिन्दुस्तान के राष्ट्रगान के रूप में 24 जनवरी 1950 को अपनाया था। इसे सर्वप्रथम 27 दिसम्बर 1911 को कांग्रेस के कलकत्ता अब दोनों भाषाओं में (बंगाली और हिन्दी) अधिवेशन में गाया गया था। पूरे गान में 5 पद हैं।

जनगणमन आधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जनगणमन:जनगण के मन/सारे लोगों के मन; अधिनायक:शासक; जय हे:की जय हो; भारतभाग्यविधाता:भारत के भाग्य-विधाता(भाग्य निर्धारक) अर्थात् भगवान
जन गण के मनों के उस अधिनायक की जय हो, जो भारत के भाग्यविधाता हैं!

पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंगविन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलजलधितरंग
पंजाब:पंजाब/पंजाब के लोग; सिन्धु:सिन्ध/सिन्धु नदी/सिन्धु के किनारे बसे लोग; गुजरात:गुजरात व उसके लोग; मराठा:महाराष्ट्र/मराठी लोग; द्राविड़:दक्षिण भारत/द्राविड़ी लोग; उत्कल:उडीशा/उड़िया लोग; बंग:बंगाल/बंगाली लोगविन्ध्य:विन्ध्यांचल पर्वत; हिमाचल:हिमालय/हिमाचल पर्वत श्रिंखला; यमुना गंगा:दोनों नदियाँ व गंगा-यमुना दोआब; उच्छल-जलधि-तरंग:मनमोहक/हृदयजाग्रुतकारी-समुद्री-तरंग या मनजागृतकारी तरंगें
उनका नाम सुनते ही पंजाब सिन्ध गुजरात और मराठा, द्राविड़ उत्कल व बंगालएवं विन्ध्या हिमाचल व यमुना और गंगा पे बसे लोगों के हृदयों में मनजागृतकारी तरंगें भर उठती हैं

तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मागेगाहे तव जयगाथा
तव:आपके/तुम्हारे; शुभ:पवित्र; नामे:नाम पे(भारतवर्ष); जागे:जागते हैं; आशिष:आशीर्वाद; मागे:मांगते हैंगाहे:गाते हैं; तव:आपकी ही/तेरी ही; जयगाथा:वजयगाथा(विजयों की कहानियां)
सब तेरे पवित्र नाम पर जाग उठने हैं, सब तेरी पवित्र आशीर्वाद पाने की अभिलाशा रखते हैंऔर सब तेरे ही जयगाथाओं का गान करते हैं

जनगणमंगलदायक जय हे भारतभाग्यविधाता!जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।
जनगणमंगलदायक:जनगण के मंगल-दाता/जनगण को सौभाग्य दालाने वाले; जय हे:की जय हो; भारतभाग्यविधाता:भारत के भाग्य विधाताजय हे जय हे:विजय हो, विजय हो; जय जय जय जय हे:सदा सर्वदा विजय हो
जनगण के मंगल दायक की जय हो, हे भारत के भाग्यविधाताविजय हो विजय हो विजय हो, तेरी सदा सर्वदा विजय हो

उपरोक्‍त राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण है और इसकी कुल अवधि लगभग 52 सेकंड है।

राष्‍ट्र गान की पहली और अंतिम पंक्तियों के साथ एक संक्षिप्‍त संस्‍करण भी कुछ विशिष्‍ट अवसरों पर बजाया जाता है। इसे इस प्रकार पढ़ा जाता है:

संक्षिप्‍त संस्‍करण को चलाने की अवधि लगभग 20 सेकंड है।
जिन अवसरों पर इसका पूर्ण संस्‍करण या संक्षिप्‍त संस्‍करण चलाया जाए, उनकी जानकारी इन अनुदेशों में उपयुक्‍त स्‍थानों पर दी गई है।

जनगणमन-अधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलजलधितरंग
तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मागे,
गाहे तव जयगाथा।
जनगणमंगलदायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

अहरह तव आह्वान प्रचारित, शुनि तव उदार बाणी
हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक मुसलमान खृष्टानी
पूरब पश्चिम आसे तव सिंहासन-पाशे
प्रेमहार हय गाँथा।
जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

पतन-अभ्युदय-वन्धुर पन्था, युग युग धावित यात्री।
हे चिरसारथि, तव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि।
दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे
संकटदुःखत्राता।
जनगणपथपरिचायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

घोरतिमिरघन निविड़ निशीथे पीड़ित मूर्छित देशे
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल नतनयने अनिमेषे।
दुःस्वप्ने आतंके रक्षा करिले अंके
स्नेहमयी तुमि माता।
जनगणदुःखत्रायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

रात्रि प्रभातिल, उदिल रविच्छवि पूर्व-उदयगिरिभाले –
गाहे विहंगम, पुण्य समीरण नवजीवनरस ढाले।
तव करुणारुणरागे निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा।
जय जय जय हे जय राजेश्वर भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

राष्ट्रगान बजाने के नियमों के आनुसार:

जब राष्‍ट्र गान गाया या बजाया जाता है तो श्रोताओं को सावधान की मुद्रा में खड़े रहना चाहिए। यद्यपि जब किसी चल चित्र के भाग के रूप में राष्‍ट्र गान को किसी समाचार की गतिविधि या संक्षिप्‍त चलचित्र के दौरान बजाया जाए तो श्रोताओं से अपेक्षित नहीं है कि वे खड़े हो जाएं, क्‍योंकि उनके खड़े होने से फिल्‍म के प्रदर्शन में बाधा आएगी और एक असंतुलन और भ्रम पैदा होगा तथा राष्‍ट्र गान की गरिमा में वृद्धि नहीं होगी।
जैसा कि राष्‍ट्र ध्‍वज को फहराने के मामले में होता है, यह लोगों की अच्‍छी भावना के लिए छोड दिया गया है कि वे राष्‍ट्र गान को गाते या बजाते समय किसी अनुचित गतिविधि में संलग्‍न नहीं हों।

क्या किसी को कोई गीत गाने के लिये मजबूर किया जा सकता है अथवा नहीं? यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोए एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य AIR 1980 SC 748 [3] नाम के एक वाद में उठाया गया। इस वाद में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल से इसलिये निकाल दिया गया था क्योंकि इन्होने राष्ट्र-गान जन-गण-मन को गाने से मना कर दिया था। यह विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्र-गान के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे तथा इसका सम्मान करते थे पर गाते नहीं थे। गाने के लिये उन्होंने मना कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इनकी याचिका स्वीकार कर इन्हें स्कूल को वापस लेने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र-गान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है। अत: इसे न गाने के लिये उस व्यक्ति को दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।




#Article 10: वन्दे मातरम् (1434 words)


वन्दे मातरम् ( बाँग्ला: বন্দে মাতরম)  बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा संस्कृत बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित इस गीत का प्रकाशन सन् १८८२ में उनके उपन्यास आनन्द मठ में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआ था। इस उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है। इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी। इस गीत को गाने में 65 सेकेंड (1 मिनट और 5 सेकेंड) का समय लगता है। 

सन् २००३ में, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिये दुनिया भर से लगभग ७,००० गीतों को चुना गया था और बी०बी०सी० के अनुसार १५५ देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के १० गीतों में दूसरे स्थान पर था।

यदि बाँग्ला भाषा को ध्यान में रखा जाय तो इसका शीर्षक बन्दे मातरम् होना चाहिये वन्दे मातरम् नहीं। चूँकि हिन्दी व संस्कृत भाषा में 'वन्दे' शब्द ही सही है, लेकिन यह गीत मूलरूप में बाँग्ला लिपि में लिखा गया था और चूँकि बाँग्ला लिपि में व अक्षर है ही नहीं अत: बन्दे मातरम् शीर्षक से ही बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शीर्षक 'बन्दे मातरम्' होना चाहिये था। परन्तु संस्कृत में 'बन्दे मातरम्' का कोई शब्दार्थ नहीं है तथा वन्दे मातरम् उच्चारण करने से माता की वन्दना करता हूँ ऐसा अर्थ निकलता है, अतः देवनागरी लिपि में इसे वन्दे मातरम् ही लिखना व पढ़ना समीचीन होगा। 

संस्कृत मूल गीत

आनन्दमठ के हिन्दी, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड आदि अनेक भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी-अनुवाद भी प्रकाशित हुए। डॉ॰ नरेशचन्द्र सेनगुप्त ने सन् १९०६ में Abbey of Bliss के नाम से इसका अंग्रेजी-अनुवाद प्रकाशित किया। अरविन्द घोष ने 'आनन्दमठ' में वर्णित गीत 'वन्दे मातरम्' का अंग्रेजी गद्य और पद्य में अनुवाद किया। महर्षि अरविन्द द्वारा किए गये अंग्रेजी गद्य-अनुवाद का हिन्दी-अनुवाद इस प्रकार है:

 मैं आपके सामने नतमस्तक होता हूँ। ओ माता!
 पानी से सींची, फलों से भरी,
 दक्षिण की वायु के साथ शान्त,
 कटाई की फसलों के साथ गहरी,
 माता!

 उसकी रातें चाँदनी की गरिमा में प्रफुल्लित हो रही हैं,
 उसकी जमीन खिलते फूलों वाले वृक्षों से बहुत सुन्दर ढकी हुई है,
 हँसी की मिठास, वाणी की मिठास,
 माता! वरदान देने वाली, आनन्द देने वाली।

सन् १८७०-८० के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में ‘गॉड! सेव द क्वीन’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी को, जो उन दिनों एक सरकारी अधिकारी (डिप्टी कलेक्टर) थे, बहुत ठेस पहुँची और उन्होंने सम्भवत: १८७६ में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बाँग्ला के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया - ‘वन्दे मातरम्’। शुरुआत में इसके केवल दो ही पद रचे गये थे जो संस्कृत में थे। 
इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वन्दना थी। उन्होंने १८८२ में जब आनन्द मठ नामक बाँग्ला उपन्यास लिखा तब मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रोत इस गीत को भी उसमें शामिल कर लिया। यह उपन्यास अंग्रेजी शासन, जमींदारों के शोषण व प्राकृतिक प्रकोप (अकाल) में मर रही जनता को जागृत करने
हेतु अचानक उठ खड़े हुए संन्यासी विद्रोह पर आधारित था। इस तथ्यात्मक इतिहास का उल्लेख बंकिम बाबू ने 'आनन्द मठ' के तीसरे संस्करण में स्वयं ही कर दिया था। और मजे की बात यह है कि सारे तथ्य भी उन्होंने अंग्रेजी विद्वानों-ग्लेग व हण्टर की पुस्तकों से दिये थे। उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम का एक संन्यासी विद्रोही गाता है। गीत का मुखड़ा विशुद्ध संस्कृत में इस प्रकार है: वन्दे मातरम् ! सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामलाम् मातरम्। मुखड़े के बाद वाला पद भी संस्कृत में ही है: शुभ्र ज्योत्स्नां पुलकित यमिनीम्, फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम् ; सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्, सुखदां वरदां मातरम्। किन्तु उपन्यास में इस गीत के आगे जो पद लिखे गये थे वे उपन्यास की मूल भाषा अर्थात् बाँग्ला में ही थे। बाद वाले इन सभी पदों में मातृभूमि की दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है। यह गीत रविवार, कार्तिक सुदी नवमी, शके १७९७ (७ नवम्बर १८७५) को पूरा हुआ।कहा जाता है कि यह गीत उन्होंने सियालदह से नैहाटी आते वक्त ट्रेन में ही लिखी थी।

बंगाल में चले स्वाधीनता-आन्दोलन के दौरान विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया। ब्रिटिश सरकार इसकी लोकप्रियता से भयाक्रान्त हो उठी और उसने इस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया। सन् १८९६ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया। पाँच साल बाद यानी सन् १९०१ में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत पुनः गाया। सन् १९०५ के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने स्वर दिया।

कांग्रेस-अधिवेशनों के अलावा आजादी के आन्दोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस 'जर्नल' का प्रकाशन शुरू किया था उसका नाम वन्दे मातरम् रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़नेवाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जुबान पर आखिरी शब्द वन्दे मातरम् ही थे। सन् १९०७ में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में वन्दे मातरम् ही लिखा हुआ था। आर्य प्रिन्टिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् १९२९ में प्रकाशित काकोरी के शहीद पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' की प्रतिबन्धित पुस्तक क्रान्ति गीतांजलि में पहला गीत मातृ-वन्दना वन्दे मातरम् ही था जिसमें उन्होंने केवल इस गीत के दो ही पद दिये थे और उसके बाद इस गीत की प्रशस्ति में वन्दे मातरम् शीर्षक से एक स्वरचित उर्दू गजल दी थी जो उस कालखण्ड के असंख्य अनाम हुतात्माओं की आवाज को अभिव्यक्ति देती है। ब्रिटिश काल में प्रतिबन्धित यह पुस्तक अब सुसम्पादित होकर पुस्तकालयों में उपलब्ध है।

स्वाधीनता संग्राम में इस गीत की निर्णायक भागीदारी के बावजूद जब राष्ट्रगान के चयन की बात आयी तो वन्दे मातरम् के स्थान पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे व गाये गये गीत जन गण मन को वरीयता दी गयी। इसकी वजह यही थी कि कुछ मुसलमानों को वन्दे मातरम् गाने पर आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है। इसके अलावा उनका यह भी मानना था कि यह गीत जिस आनन्द मठ उपन्यास से लिया गया है वह मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है। इन आपत्तियों के मद्देनजर सन् १९३७ में कांग्रेस ने इस विवाद पर गहरा चिन्तन किया। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित समिति जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे, ने पाया कि इस गीत के शुरूआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गये हैं, लेकिन बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का जिक्र होने लगता है; इसलिये यह निर्णय लिया गया कि इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। इस तरह गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर के जन-गण-मन अधिनायक जय हे को यथावत राष्ट्रगान ही रहने दिया गया और मोहम्मद इकबाल के कौमी तराने सारे जहाँ से अच्छा के साथ बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारम्भिक दो पदों का गीत वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ। 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में २४ जनवरी १९५० में 'वन्दे मातरम्' को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने सम्बन्धी वक्तव्य पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया। 

डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया वक्तव्य इस प्रकार है) :

आनन्द मठ उपन्यास को लेकर भी कुछ विवाद हैं, कुछ कट्टर लोग इसे मुस्लिम विरोधी मानते हैं। उनका कहना है कि इसमें मुसलमानों को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है। वन्दे मातरम् गाने पर भी विवाद किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि- 

क्या किसी को कोई गीत गाने के लिये मजबूर किया जा सकता है अथवा नहीं? यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोय एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य नाम के एक वाद में उठाया गया। इस वाद में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल से इसलिये निकाल दिया गया था क्योंकि उन्होने राष्ट्र-गान जन गण मन को गाने से मना कर दिया था। यह विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्रगान के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे तथा इसका सम्मान करते थे पर गीत को गाते नहीं थे। गाने के लिये उन्होंने मना कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली और स्कूल को उन्हें वापस लेने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है। अत: इसे न गाने के लिये उस व्यक्ति को दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। चूँकि वन्दे मातरम् इस देश का राष्ट्रगीत है अत: इसको जबरदस्ती गाने के लिये मजबूर करने पर भी यही कानून व नियम लागू होगा।




#Article 11: भारत के राज्य तथा केन्द्र-शासित प्रदेश (592 words)


भारत राज्यों का एक संघ है। इसमें 28 राज्य और 8  केन्द्र शासित प्रदेश हैं। ये राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश पुनः जिलों और अन्य क्षेत्रों में बांटे गए हैं।.

Jammu and Kashmir has 42,241 km2 of area administered by India and 78,114 km2 of area controlled by Pakistan under Azad Kashmir and Gilgit-Baltistan, which is claimed by India as part of Jammu and Kashmir. Additionally, it has 5,180 km2 of area controlled by the People's Republic of China under Trans-Karakoram Tract, which is also claimed by India as part of Jammu and Kashmir.

Ladakh has 59,146 km2 of area administered by India and 37,555 km2 of area controlled by the People's Republic of China under Aksai Chin, which is claimed by India as part of Ladakh.

भारत के इतिहास में भारतीय उपमहाद्वीप पर विभिन्न जातीय समूहों ने शासन किया और इसे अलग-अलग प्रशासन-संबन्धी भागों में विभाजित किया। आधुनिक भारत के वर्तमान प्रशासनिक प्रभाग नए घटनाक्रम हैं, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान विकसित हुए। ब्रिटिश भारत में, वर्तमान भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश, साथ ही अफ़्गानिस्तान प्रांत और उससे जुड़े संरक्षित प्रांत, बाद में उपनिवेश बना, बर्मा (म्यांमार) आदि, सभी राज्य समाहित थे। इस अवधि के दौरान, भारत के क्षेत्रों में या तो ब्रिटिशों का शासन था या उन पर स्थानीय राजाओं का नियंत्रण था। १९४७ में स्वतन्त्रता के बाद इन विभागों को संरक्षित किया गया और पंजाब तथा बंगाल के प्रांतों को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित किया गया। नए राष्ट्र के लिए पहली चुनौती थी राजसी राज्यों का संघों में विलय।

स्वतन्त्रता के बाद, हालांकि, भारत में अस्थिरता आ गई। कई प्रांत औपनिवेशिकरण के उद्देश्य से ब्रिटिशों द्वारा बनाए गए, पर इन पर भारतीय नागरिकों की या राजसी राज्यों की कोई इच्छा दिखाई नहीं दी। १९५६ में जातीय तनाव ने संसद का दरवाजा खटखटाया और राज्य पुनर्गठन अधिनियम के आधार पर देश को जातीय और भाषाई आधार पर पुनर्निर्माण करने के लिए अधिनियम लाया गया।

भारत में जिस प्रकार पूर्व में फ़्रांसीसी और पुर्तगाली उपनिवेशों को गणराज्य में समाहित किया गया था, वैसे ही १९६२ में पांडिचेरी, दादरा, नगर हवेली, गोआ, दमन और दियू को संघ राज्य बनाया गया।

१९५६ के बाद कई नए राज्यों और संघ राज्यों को बनाया गया। बम्बई पुनर्गठन अधिनियम के द्वारा १ मई, १९६० को भाषाई आधार पर बंबई राज्य को गुजरात और महाराष्ट्र के रूप में अलग किया गया। १९६६ के पंजाब पुनर्गठन अधिनियम ने भाषाई और धार्मिक पैमाने पर पंजाब (भारत) को हरियाणा के नए हिन्दू बहुल और हिन्दी भाषी राज्यों में बाँटा और पंजाब के उत्तरी जिलों को हिमाचल प्रदेश में स्थानांतरित कर दिया गया और एक जिले को चण्डीगढ़ का नाम दिया जो पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी है। नागालैण्ड १९६२ में, मेघालय और हिमाचल प्रदेश १९७१ में, त्रिपुरा और मणिपुर १९७२ में राज्य बनाए गए। १९७२ में अरुणाचल प्रदेश को एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। सिक्किम राज्य १९७५ में एक राज्य के रूप में भारतीय संघ में सम्मिलित हो गया। १९८६ में मिज़ोरम और १९८७ में गोआ और अरुणाचल प्रदेश राज्य बने जबकि गोआ के उत्तरी भाग दमन और दीयु एक अलग संघ राज्य बन गए। २००० में तीन नए राज्य बनाए गए। पूर्वी मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ (१ नवंबर, २०००) में और उत्तरांचल (९ नवंबर, २०००) बनाए गए जो अब उत्तराखण्ड है। उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों के कारण झारखण्ड (१५ नवंबर २०००) को बिहार के दक्षिणी जिलों में से पृथक कर बनाया गया। दो केन्द्र शासित प्रदेशों दिल्ली और पाण्डिचेरी (जो बाद में पुदुचेरी कहा गया) को विधानसभा सदस्यों का अधिकार दिया गया और अब वे छोटे राज्यों के रूप में गिने जाते हैं।




#Article 12: सप्ताह के दिन (593 words)


एक सप्ताह या हफ़्ते में सात दिन होते हैं। हिन्दी में ये निम्न नामों से पुकारे जाते हैं।

सामान्यत: एक माह में चार सप्ताह होते हैं और एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। सप्ताह के प्रत्येक दिन पर नौ ग्रहों के स्वामियों में से क्रमश: पहले सात का राज चलता है. जैसे-

रविवार पर सूर्य का राज चलता है।
सोमवार पर चन्द्रमा का राज चलता है।
मंगलवार पर मंगल का राज चलता है।
बुधवार पर बुध का राज चलता है।
बृहस्पतिवार पर गुरु का राज चलता है।
शुक्रवार पर शुक्र का राज चलता है।
शनिवार पर शनि का राज चलता है।
अन्तिम दो राहु और केतु क्रमश: मंगलवार और शनिवार के साथ सम्बन्ध बनाते हैं।
यहाँ एक बात याद रखना ज़रूरी है- पश्चिम में दिन की शुरुआत मध्य रात्रि से होती है और वैदिक दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है। वैदिक ज्योतिष में जब हम दिन की बात करें तो मतलब सूर्योदय से ही होगा। सप्ताह के प्रत्येक दिन के कार्यकलाप उसके स्वामी के प्रभाव से प्रभावित होते हैं और व्यक्ति के जीवन में उसी के अनुरुप फल की प्राप्ति होती है। जैसे- चन्द्रमा दिमाग और गुरु धार्मिक कार्यकलाप का कारक होता है। इस वार में इनसे सम्बन्धित कार्य करना व्यक्ति के पक्ष में जाता है। सप्ताह के दिनों के नाम ग्रहों की संज्ञाओं के आधार पर रखे गए हैं अर्थात जो नाम ग्रहों के हैं, वही नाम इन दिनों के भी हैं। जैसे-

सूर्य के दिन का नाम रविवार, आदित्यवार, अर्कवार, भानुवार इत्यादि।
शनिश्चर के दिन का नाम शनिवार, सौरिवार आदि।
संस्कृत में या अन्य किसी भी भाषा में भी साप्ताहिक दिनों के नाम सात ग्रहों के नाम पर ही मिलते हैं। संस्कृत में ग्रह के नाम के आगे वार या वासर या कोई ओर प्रयायवाची शब्द रख दिया जाता है।
सप्ताह केवल मानव निर्मित व्यवस्था है। इसके पीछे कोई ज्योतिष शास्त्रीय या प्राकृतिक योजना नहीं है।
स्पेन आक्रमण के पूर्व मेक्सिको में पाँच दिनों की योजना थी।
सात दिनों की योजना यहूदियों, बेबिलोनियों एवं दक्षिण अमेरिका के इंका लोगों में थी।
लोकतान्त्रिक युग में रोमनों में आठ दिनों की व्यवस्था थी, मिस्रियों एवं प्राचीन अथेनियनों में दस दिनों की योजना थी।
ओल्ड टेस्टामेण्ट में आया है कि ईश्वर ने छः दिनों तक सृष्टि की और सातवें दिन विश्राम करके उसे आशीष देकर पवित्र बनाया। - जेनेसिरा1, एक्सोडस2 एवं डेउटेरोनामी3 में ईश्वर ने यहूदियों कोसात दिनों के वृत्त के उद्भव एवं विकास का वर्णन 'एफ. एच. कोल्सन' के ग्रन्थ 'दी वीक'4 में उल्लिखित है।

डायोन कैसिअस (तीसरी शती के प्रथम चरण में) ने अपनी 37वीं पुस्तक में लिखा है कि 'पाम्पेयी ई. पू. 83 में येरूसलेम पर अधिकार किया, उस दिन यहूदियों का विश्राम दिन था। उसमें आया है कि ग्रहीय सप्ताह (जिसमें दिनों के नाम ग्रहों के नाम पर आधारित हैं) का उद्भव मिस्र में हुआ।
डियो ने 'रोमन हिस्ट्री'5 में यह स्पष्ट किया है कि सप्ताह का उद्गम यूनान में न होकर मिस्र में हुआ और वह भी प्राचीन नहीं है बल्कि हाल का है। 

रोमन केलैंण्डर में सम्राट कोंस्टेंटाईन ने ईसा के क़रीब तीन सौ वर्ष के बाद सात दिनों वाले सप्ताह को निश्चत किया और उन्हें नक्षत्रों के नाम दिये -

सप्ताह के पहले दिन को 'सूर्य का नाम' दिया गया है।
दूसरे दिन को चाँद का नाम दिया गया है।
तीसरे दिन को मंगल दिया गया है।
चौथे दिन को बुध दिया गया है।
पाँचवें दिन को बृहस्पति दिया गया है।
छठे दिन को शुक्र दिया गया है।
सातवें दिन को शनि का नाम दिया गया है।
आज भी रोमन संस्कृति से प्रभावित देशों में इन्हीं नामों का प्रयोग होता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ




#Article 13: यूनिकोड (592 words)


यूनिकोड (Unicode), प्रत्येक अक्षर के लिए एक विशेष संख्या प्रदान करता है, चाहे कोई भी कम्प्यूटर प्लेटफॉर्म, प्रोग्राम अथवा कोई भी भाषा हो। यूनिकोड स्टैंडर्ड को एपल, एच.पी., आई.बी.एम., जस्ट सिस्टम, माइक्रोसॉफ्ट, ऑरेकल, सैप, सन, साईबेस, यूनिसिस जैसी उद्योग की प्रमुख कम्पनियों और कई अन्य ने अपनाया है। यूनिकोड की आवश्यकता आधुनिक मानदंडों, जैसे एक्स.एम.एल, जावा, एकमा स्क्रिप्ट (जावास्क्रिप्ट), एल.डी.ए.पी., कोर्बा 3.0, डब्ल्यू.एम.एल के लिए होती है और यह आई.एस.ओ/आई.ई.सी. 10646 को लागू करने का अधिकारिक तरीका है। यह कई संचालन प्रणालियों, सभी आधुनिक ब्राउजरों और कई अन्य उत्पादों में होता है। यूनिकोड स्टैंडर्ड की उत्पति और इसके सहायक उपकरणों की उपलब्धता, हाल ही के अति महत्वपूर्ण विश्वव्यापी सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी रुझानों में से हैं।

यूनिकोड को ग्राहक-सर्वर अथवा बहु-आयामी उपकरणों और वेबसाइटों में शामिल करने से, परंपरागत उपकरणों के प्रयोग की अपेक्षा खर्च में अत्यधिक बचत होती है। यूनिकोड से एक ऐसा अकेला सॉफ्टवेयर उत्पाद अथवा अकेला वेबसाइट मिल जाता है, जिसे री-इंजीनियरिंग के बिना विभिन्न प्लेटफॉर्मों, भाषाओं और देशों में उपयोग किया जा सकता है। इससे आँकड़ों को बिना किसी बाधा के विभिन्न प्रणालियों से होकर ले जाया जा सकता है।

यूनिकोड प्रत्येक अक्षर के लिए एक विशेष नम्बर प्रदान करता है,

कम्प्यूटर, मूल रूप से, नंबरों से सम्बंध रखते हैं। ये प्रत्येक अक्षर और वर्ण के लिए एक नंबर निर्धारित करके अक्षर और वर्ण संग्रहित करते हैं। यूनिकोड का आविष्कार होने से पहले, ऐसे नंबर देने के लिए सैंकडों विभिन्न संकेत लिपि प्रणालियां थीं। किसी एक संकेत लिपि में पर्याप्त अक्षर नहीं हो सकते हैं : उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ को अकेले ही, अपनी सभी भाषाओं को कवर करने के लिए अनेक विभिन्न संकेत लिपियों की आवश्यकता होती है। अंग्रेजी जैसी भाषा के लिए भी, सभी अक्षरों, विरामचिन्हों और सामान्य प्रयोग के तकनीकी प्रतीकों हेतु एक ही संकेत लिपि पर्याप्त नहीं थी।

ये संकेत लिपि प्रणालियां परस्पर विरोधी भी हैं। इसीलिए, दो संकेत लिपियां दो विभिन्न अक्षरों के लिए, एक ही नंबर प्रयोग कर सकती हैं, अथवा समान अक्षर के लिए विभिन्न नम्बरों का प्रयोग कर सकती हैं। किसी भी कम्प्यूटर (विशेष रूप से सर्वर) को विभिन्न संकेत लिपियां संभालनी पड़ती है; फिर भी जब दो विभिन्न संकेत लिपियों अथवा प्लेटफॉर्मों के बीच डाटा भेजा जाता है तो उस डाटा के हमेशा खराब होने का जोखिम रहता है।

यूनिकोड से यह सब कुछ बदल रहा है!

यूनिकोड, आस्की तथा अन्य कैरेकटर कोडों की अपेक्षा अधिक स्मृति (मेमोरी) लेता है। कितनी अधिक स्मृति लगेगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कौन सा यूनिकोड प्रयोग कर रहे हैं। UTF7, UTF8, UTF16 या वास्तविक यूनिकोड - एक अक्षर अलग-अलग बाइट प्रयोग करते हैं।

यूनिकोड कन्सॉर्शियम, एक लाभ न कमाने वाला एक संगठन है जिसकी स्थापना यूनिकोड स्टैंडर्ड, जो आधुनिक सॉफ्टवेयर उत्पादों और मानकों में पाठ की प्रस्तुति को निर्दिष्ट करता है, के विकास, विस्तार और इसके प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। इस कन्सॉर्शियम के सदस्यों में, कम्प्यूटर और सूचना उद्योग में विभिन्न निगम और संगठन शामिल हैं। इस कन्सॉर्शियम का वित्तपोषण पूर्णतः सदस्यों के शुल्क से किया जाता है। यूनिकोड कन्सॉर्शियम में सदस्यता, विश्व में कहीं भी स्थित उन संगठनों और व्यक्तियों के लिए खुली है जो यूनिकोड का समर्थन करते हैं और जो इसके विस्तार और कार्यान्वयन में सहायता करना चाहते हैं।

अगर कोई लेख किसी जगह पर किसी ऐसे फॉन्ट को प्रयोग कर के लिखा गया है जो कि यूनिकोड नहीं है तो फॉन्ट परिवर्तक प्रोग्रामों का प्रयोग करके उसे यूनिकोड में बदला जा सकता है।

विस्तृत जानकारी के लिये देखें - 'फॉण्ट परिवर्तक'

याहू जैसे ईमेल सेवाओं में यूनिकोड कैरेक्टर विकृत हो जाने पर मूल ईमेल प्राप्त कर पढ़ने के ऑनलाईन औजार




#Article 14: अगस्त २००३ (210 words)


२००३ 

शुक्रवार, 08 अगस्त 2003

हमास का बदले का संकल्प --
फ़लस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास की सशस्त्र शाखा ने अपने सदस्यों से अपील की है कि वे इसराइली सेना के हमले में मारे गए दो नेताओं की मौत का बदला लें.

अभिनेता उमर शरीफ़ को सज़ा --
जाने माने अभिनेता उमर शरीफ़ को फ़्राँस की एक अदालत ने मारपीट के आरोप में सज़ा सुनाई है। उन्हें एक महीने की सस्पेंडेड जेल की सज़ा के साथ-साथ ग्यारह सौ पाउंड का जुर्माना भी लगाया गया है।

'अंतरराष्ट्रीय सहयोग ज़रूरी' --
इंडोनेशिया की राष्ट्रपति मेगावती सुकर्णोपुत्री ने आतंकवाद के विरुद्ध दुनियाभर का एक गठबंधन बनाने की माँग उठाई है। राजधानी जकार्ता के एक होटल में मंगलवार को हुए बम धमाके के बाद उन्होंने पहली टिप्पणी में ये माँग उठाई.

अमरीकी रणनीति बदलेगी? --
अमरीका इराक़ में अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव करने की योजना बना रहा है। अब अमरीका इराक़ में स्थानीय लोगों को अधिक संख्या में सामने लाना चाहता है और बड़े पैमाने पर होने वाली कार्रवाइयाँ कम करना चाहता है।

नए परमाणु हथियारों पर चर्चा --
अमरीकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन ने माना है कि वह सैनिक अधिकारियों और वैज्ञानिकों की एक उच्च स्तरीय बैठक कर रहा है। इसमें अगले चरण के अत्याधुनिक परमाणु हथियारों पर विचार होने की संभावना है।




#Article 15: भारत की भाषाएँ (228 words)


भारत बहुत सारी भाषाओं का देश है, लेकिन सरकारी कामकाज में व्यवहार में लायी जाने वाली दो भाषायें हैं, हिन्दी और अंग्रेज़ी। भारत में द्विभाषी वक्ताओं की संख्या 31.49 करोड़ है, जो 2011 में जनसंख्या का 26% है।

पालि, प्राकृत, मारवाड़ी/मेवाड़ी, अपभ्रंश, हिंदी, उर्दू, पंजाबी, राजस्थानी, सिंधी, कश्मीरी, मैथिली, भोजपुरी, नेपाली, मराठी, डोगरी, कुरमाली, नागपुरी, कोंकणी, गुजराती, बंगाली, उड़िया, असमी,  खोरठा

तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, तुलू, गोंडी, कुड़ुख

संथाली, हो, मुंडारी, खासी

नेपाल भाषा, मणिपुरी, खासी, मिज़ो, आओ, म्हार, नागा

यहाँ यह ध्यान रखने योग्य बात है कि भारत में द्विभाषिकता एवं बहुभाषिकता का प्रचलन है इसलिए यह सँख्या उन लोगों की है जिन्होंने ने हिन्दी को अपनी प्रथम भाषा के तौर पर १९९१ की जनगणना में दर्ज़ किया था।

हिंदी भारत के उत्तरी हिस्सों में सबसे व्यापक बोली जाने वाली भाषा है। भारतीय जनगणना हिंदी की व्यापक विविधता के रूप में हिंदी की व्यापक संभव परिभाषा लेती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, 43.63% भारतीय लोगों ने हिंदी को अपनी मूल भाषा या मातृभाषा घोषित कर दिया है। भाषा डेटा 26 जून 2018 को जारी किया गया था। भिली / भिलोदी 1.04 करोड़ वक्ताओं के साथ सबसे ज्यादा बोली जाने वाली गैर अनुसूचित भाषा थी, इसके बाद गोंडी 29 लाख वक्ताओं के साथ थीं। भारत की जनगणना २०११ में भारत की आबादी का 96.71% 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक अपनी मातृभाषा के रूप में बोलता है।




#Article 16: हिन्दू धर्म (3460 words)


 

हिन्दू धर्म (संस्कृत:  धर्म) एक धर्म (या, जीवन पद्धति) है जिसके अनुयायी अधिकांशतः भारत ,नेपाल और मॉरिशस में बहुमत में हैं। इसे विश्व का प्राचीनतम धर्म माना जाता है। इसे 'वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म' भी कहते हैं जिसका अर्थ है कि इसकी उत्पत्ति मानव की उत्पत्ति से भी पहले से है। विद्वान लोग हिन्दू धर्म को भारत की विभिन्न संस्कृतियों एवं परम्पराओं का सम्मिश्रण मानते हैं जिसका कोई संस्थापक नहीं है।

यह धर्म अपने अन्दर कई अलग-अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय और दर्शन समेटे हुए हैं। अनुयायियों की संख्या के आधार पर ये विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है। संख्या के आधार पर इसके अधिकतर उपासक भारत में हैं और प्रतिशत के आधार पर नेपाल में हैं। हालाँकि इसमें कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन वास्तव में यह एकेश्वरवादी धर्म है।

इसे सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहते हैं। इण्डोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम हिन्दु आगम है। हिन्दू केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है।

सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है; हालाँकि इसके इतिहास के बारे में अनेक विद्वानों के अनेक मत हैं। आधुनिक इतिहासकार हड़प्पा, मेहरगढ़ आदि पुरातात्विक अन्वेषणों के आधार पर इस धर्म का इतिहास कुछ हज़ार वर्ष पुराना मानते हैं। जहाँ भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, भगवान शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, शिवलिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। 

आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहते हैं। पहले दृष्टिकोण के अनुसार लगभग १७०० ईसा पूर्व में आर्य अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गए। तभी से वो लोग (उनके विद्वान ऋषि) अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे। पहले चार वेद रचे गए, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था। उसके बाद उपनिषद जैसे ग्रन्थ आए। हिन्दू मान्यता के अनुसार वेद, उपनिषद आदि ग्रन्थ अनादि, नित्य हैं, ईश्वर की कृपा से अलग-अलग मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को अलग-अलग ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त हुआ जिन्होंने फिर उन्हें लिपिबद्ध किया। बौद्ध और धर्मों के अलग हो जाने के बाद वैदिक धर्म में काफ़ी परिवर्तन आया। नये देवता और नये दर्शन उभरे। इस तरह आधुनिक हिन्दू धर्म का जन्म हुआ।

दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार हिन्दू धर्म का मूल कदाचित सिन्धु सरस्वती परम्परा (जिसका स्रोत मेहरगढ़ की ६५०० ईपू संस्कृति में मिलता है) से भी पहले की भारतीय परम्परा में है।
हालांकि भारत विरोधी विद्वानों ने कई प्रयासों के बावजूद यहां तक कि भ्रामक प्रमाणो के आधार पर भी अपने विचार को सिद्ध नहीं कर पाए।

भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने हिन्दुस्थान नाम दिया था, जिसका अपभ्रंश हिन्दुस्तान है। बृहस्पति आगम के अनुसार:

आम तौर पर हिन्दू शब्द को अनेक विश्लेषकों ने विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द माना है। इस धारणा के अनुसार हिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। हिन्दू धर्म को सनातन धर्म या वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है। ऋग्वेद में सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है - वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे। भाषाविदों के अनुसार हिन्द आर्य भाषाओं की स् ध्वनि (संस्कृत का व्यंजन स्) ईरानी भाषाओं की ह् ध्वनि में बदल जाती है। इसलिए सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) में जाकर हफ्त हिन्दु में परिवर्तित हो गया (अवेस्ता: वेन्दीदाद, फ़र्गर्द 1.18)। इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया। जब अरब से मुस्लिम हमलावर भारत में आए, तो उन्होंने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। चारों वेदों में, पुराणों में, महाभारत में, स्मृतियों में इस धर्म को हिन्दु धर्म नहीं कहा है, वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म कहा है।

हिन्दू धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी हिन्दुओं को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक जीवन का मार्ग है। हिन्दुओं का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है और न ही कोई पोप। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं, इन सब में विश्वास: धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं) और बेशक, ईश्वर। हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है। हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। हिन्दू धर्म में चार मुख्य सम्प्रदाय हैं : वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं), शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं) और स्मार्त (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं)। लेकिन ज्यादातर हिन्दू स्वयं को किसी भी सम्प्रदाय में वर्गीकृत नहीं करते हैं। प्राचीनकाल और मध्यकाल में शैव, शाक्त और वैष्णव आपस में लड़ते रहते थे। जिन्हें मध्यकाल के संतों ने समन्वित करने की सफल कोशिश की और सभी संप्रदायों को परस्पर आश्रित बताया।

संक्षेप में, हिन्‍दुत्‍व के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-हिन्दू-धर्म
	हिन्दू-कौन?--
		गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः।
		पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।
अर्थात-- गोमाता में जिसकी भक्ति हो, प्रणव जिसका पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में जिसका विश्वास हो--वही हिन्दू है।
	मेरुतन्त्र ३३ प्रकरण के अनुसार ' हीनं दूषयति स हिन्दु ' अर्थात जो हीन (हीनता या नीचता) को दूषित समझता है (उसका त्याग करता है) वह हिन्दु है। लोकमान्य तिलक के अनुसार-
		असिन्धोः सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका।
		पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।
	अर्थात्- सिन्धु नदी के उद्गम-स्थान से लेकर सिन्धु (हिन्द महासागर) तक सम्पूर्ण भारत भूमि जिसकी पितृभू (अथवा मातृ भूमि) तथा पुण्यभू (पवित्र भूमि) है, (और उसका धर्म हिन्दुत्व है) वह हिन्दु कहलाता है। हिन्दु शब्द मूलतः फा़रसी है इसका अर्थ उन भारतीयों से है जो भारतवर्ष के प्राचीन ग्रन्थों, वेदों, पुराणों में वर्णित भारतवर्ष की सीमा के मूल एवं पैदायसी प्राचीन निवासी हैं। कालिका पुराण, मेदनी कोष आदि के आधार पर वर्तमान हिन्दू ला के मूलभूत आधारों के अनुसार वेदप्रतिपादित वर्णाश्रम रीति से वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाला हिन्दू है। यद्यपि कुछ लोग कई संस्कृति के मिश्रित रूप को ही भारतीय संस्कृति मानते है, जबकि ऐसा नहीं है। जिस संस्कृति या धर्म की उत्पत्ती एवं विकास भारत भूमि पर नहीं हुआ है, वह धर्म या संस्कृति भारतीय (हिन्दू) कैसे हो सकती है।

हिन्दू धर्म के सिद्धान्त के कुछ मुख्य बिन्दु:

हिन्दू धर्मग्रन्थ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ही परम तत्त्व है (इसे त्रिमूर्ति के देवता ब्रह्मा से भ्रमित न करें)। वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है। वो विश्व का आधार है। उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है। ब्रह्म एक और सिर्फ़ एक ही है। वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी। वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। वो कालातीत, नित्य और शाश्वत है। वही परम ज्ञान है। ब्रह्म के दो रूप हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म। परब्रह्म असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन है। वो सभी गुणों से भी परे है, पर उसमें अनन्त सत्य, अनन्त चित् और अनन्त आनन्द है। ब्रह्म की पूजा नहीं की जाती है, क्योंकि वो पूजा से परे और अनिर्वचनीय है। उसका ध्यान किया जाता है। प्रणव ॐ (ओम्) ब्रह्मवाक्य है, जिसे सभी हिन्दू परम पवित्र शब्द मानते हैं। हिन्दू यह मानते हैं कि ओम् की ध्वनि पूरे ब्रह्माण्ड में गूंज रही है। ध्यान में गहरे उतरने पर यह सुनाई देता है। ब्रह्म की परिकल्पना वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है और हिन्दू धर्म की विश्व को अनुपम देन है।

ब्रह्म और ईश्वर में क्या सम्बन्ध है, इसमें हिन्दू दर्शनों की सोच अलग अलग है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार जब मानव ब्रह्म को अपने मन से जानने की कोशिश करता है, तब ब्रह्म ईश्वर हो जाता है, क्योंकि मानव माया नाम की एक जादुई शक्ति के वश में रहता है। अर्थात जब माया के आइने में ब्रह्म की छाया पड़ती है, तो ब्रह्म का प्रतिबिम्ब हमें ईश्वर के रूप में दिखायी पड़ता है। ईश्वर अपनी इसी जादुई शक्ति माया से विश्व की सृष्टि करता है और उस पर शासन करता है। इस स्थिति में हालाँकि ईश्वर एक नकारात्मक शक्ति के साथ है, लेकिन माया उसपर अपना कुप्रभाव नहीं डाल पाती है, जैसे एक जादूगर अपने ही जादू से अचंम्भित नहीं होता है। माया ईश्वर की दासी है, परन्तु हम जीवों की स्वामिनी है। वैसे तो ईश्वर रूपहीन है, पर माया की वजह से वो हमें कई देवताओं के रूप में प्रतीत हो सकता है। इसके विपरीत वैष्णव मतों और दर्शनों में माना जाता है कि ईश्वर और ब्रह्म में कोई फ़र्क नहीं है--और विष्णु (या कृष्ण) ही ईश्वर हैं। न्याय, वैषेशिक और योग दर्शनों के अनुसार ईश्वर एक परम और सर्वोच्च आत्मा है, जो चैतन्य से युक्त है और विश्व का सृष्टा और शासक है।

जो भी हो, बाकी बातें सभी हिन्दू मानते हैं : ईश्वर एक और केवल एक है। वो विश्वव्यापी और विश्वातीत दोनो है। बेशक, ईश्वर सगुण है। वो स्वयंभू और विश्व का कारण (सृष्टा) है। वो पूजा और उपासना का विषय है। वो पूर्ण, अनन्त, सनातन, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। वो राग-द्वेष से परे है, पर अपने भक्तों से प्रेम करता है और उनपर कृपा करता है। उसकी इच्छा के बिना इस दुनिया में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। वो विश्व की नैतिक व्यवस्था को कायम रखता है और जीवों को उनके कर्मों के अनुसार सुख-दुख प्रदान करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार विश्व में नैतिक पतन होने पर वो समय-समय पर धरती पर अवतार (जैसे कृष्ण) रूप ले कर आता है। ईश्वर के अन्य नाम हैं : परमेश्वर, परमात्मा, विधाता, भगवान (जो हिन्दी में सबसे ज़्यादा प्रचलित है)। इसी ईश्वर को मुसल्मान (अरबी में) अल्लाह, (फ़ारसी में) ख़ुदा, ईसाई (अंग्रेज़ी में) गॉड और यहूदी (इब्रानी में) याह्वेह कहते हैं।

हिन्दू धर्म में कई देवता हैं, जिनको अंग्रेज़ी में ग़लत रूप से  कहा जाता है। ये देवता कौन हैं, इस बारे में तीन मत हो सकते हैं :

 
एक बात और कही जा सकती है कि ज़्यादातर वैष्णव और शैव दर्शन पहले दो विचारों को सम्मिलित रूप से मानते हैं। जैसे, कृष्ण को परमेश्वर माना जाता है जिनके अधीन बाकी सभी देवी-देवता हैं और साथ ही साथ, सभी देवी-देवताओं को कृष्ण का ही रूप माना जाता है। तीसरे मत को धर्मग्रन्थ मान्यता नहीं देते।

जो भी सोच हो, ये देवता रंग-बिरंगी हिन्दू संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। वैदिक काल के मुख्य देव थे-- इन्द्र, अग्नि, सोम, वरुण, रूद्र, विष्णु, प्रजापति, सविता (पुरुष देव) और देवियाँ-- सरस्वती, ऊषा, पृथ्वी, इत्यादि (कुल 33)। बाद के हिन्दू धर्म में नये देवी देवता आये (कई अवतार के रूप में)-- गणेश, राम, कृष्ण, हनुमान, कार्तिकेय, सूर्य-चन्द्र और ग्रह और देवियाँ (जिनको माता की उपाधि दी जाती है) जैसे-- दुर्गा, पार्वती, लक्ष्मी, शीतला, सीता, काली, इत्यादि। ये सभी देवता पुराणों में उल्लिखित हैं और उनकी कुल संख्या 33 कोटी बतायी जाती है। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और शिव साधारण देव नहीं, बल्कि महादेव हैं और त्रिमूर्ति के सदस्य हैं।
इन सबके अलावा हिन्दू धर्म में गाय को भी माता के रूप में पूजा जाता है। यह माना जाता है कि गाय में सम्पूर्ण 33 कोटि देवी देवता वास करते हैं।
उल्लेखनीय है कि कोटि का यहाँ अर्थ प्रकार से है ना कि करोड़(संख्या) से हैं।

 
हिंदू धर्म मान्यताओं में पांच प्रमुख देवता पूजनीय है। ये एक ईश्वर के ही अलग-अलग रूप और शक्तियाँ हैं। 

देवताओं के गुरु बृहस्पति माने गए हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वे महर्षि अंगिरा के पुत्र थे। भगवान शिव के कठिन तप से उन्होंने देवगुरु का पद पाया। उन्होंने अपने ज्ञान बल व मंत्र शक्तियों से देवताओं की रक्षा की। शिव कृपा से ये गुरु ग्रह के रूप में भी पूजनीय हैं। गुरुवार, गुरु बृहस्पतिदेव की उपासना का विशेष दिन है।

दानवों के गुरु शुक्राचार्य माने जाते हैं। ब्रह्मदेव के पुत्र महर्षि भृगु इनके पिता थे। शुक्राचार्य ने ही शिव की कठोर तपस्या कर मृत संजीवनी विद्या प्राप्त की, जिससे वह मृत शरीर में फिर से प्राण फूंक देते थे। ब्रह्मदेव की कृपा से यह शुक्र ग्रह के रूप में पूजनीय हैं। शुक्रवार शुक्र देव की उपासना का ही विशेष दिन है।

हिन्दू धर्म के अनुसार हर चेतन प्राणी में एक अभौतिक आत्मा होती है, जो सनातन, अव्यक्त, अप्रमेय और विकार रहित है। हिन्दू धर्म के मुताबिक मनुष्य में ही नहीं, बल्कि हर पशु और पेड़-पौधे, यानि कि हर जीव में आत्मा होती है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आत्मा के लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं:

(यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न तो मरता ही है तथा न ही यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य सनातन, पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।)

किसी भी जन्म में अपनी आज़ादी से किये गये कर्मों के मुताबिक आत्मा अगला शरीर धारण करती है। जन्म-मरण के चक्र में आत्मा स्वयं निर्लिप्त रह्ते हुए अगला शरीर धारण करती है। अच्छे कर्मफल के प्रभाव से मनुष्य कुलीन घर अथवा योनि में जन्म ले सकता है जबकि बुरे कर्म करने पर निकृष्ट योनि में जन्म लेना पड़ता है। जन्म मरण का सांसारिक चक्र तभी ख़त्म होता है जब व्यक्ति को मोक्ष मिलता है। उसके बाद आत्मा अपने वास्तविक सत्-चित्-आनन्द स्वभाव को सदा के लिये पा लेती है। मानव योनि ही अकेला ऐसा जन्म है जिसमें मनुष्य के कर्म, पाप और पुण्यमय फल देते हैं और सुकर्म के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति मुम्किन है। आत्मा और पुनर्जन्म के प्रति यही धारणाएँ बौद्ध धर्म और सिख धर्म का भी आधार है।

हिंदू धर्म के पवित्र ग्रन्थों को दो भागों में बाँटा गया है- श्रुति और स्मृति। श्रुति हिन्दू धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं, जो पूर्णत: अपरिवर्तनीय हैं, अर्थात् किसी भी युग में इनमे कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। स्मृति ग्रन्थों में देश-कालानुसार बदलाव हो सकता है। श्रुति के अन्तर्गत वेद : ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद ब्रह्म सूत्र व उपनिषद् आते हैं। वेद श्रुति इसलिये कहे जाते हैं क्योंकि हिन्दुओं का मानना है कि इन वेदों को परमात्मा ने ऋषियों को सुनाया था, जब वे गहरे ध्यान में थे। वेदों को श्रवण परम्परा के अनुसार गुरू द्वारा शिष्यों को दिया जाता था। हर वेद में चार भाग हैं- संहिता—मन्त्र भाग, ब्राह्मण-ग्रन्थ—गद्य भाग, जिसमें कर्मकाण्ड समझाये गये हैं, आरण्यक—इनमें अन्य गूढ बातें समझायी गयी हैं, उपनिषद्—इनमें ब्रह्म, आत्मा और इनके सम्बन्ध के बारे में विवेचना की गयी है। अगर श्रुति और स्मृति में कोई विवाद होता है तो श्रुति ही मान्य होगी। श्रुति को छोड़कर अन्य सभी हिन्दू धर्मग्रन्थ स्मृति कहे जाते हैं, क्योंकि इनमें वो कहानियाँ हैं जिनको लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी याद किया और बाद में लिखा। सभी स्मृति ग्रन्थ वेदों की प्रशंसा करते हैं। इनको वेदों से निचला स्तर प्राप्त है, पर ये ज़्यादा आसान हैं और अधिकांश हिन्दुओं द्वारा पढ़े जाते हैं (बहुत ही कम हिन्दू वेद पढ़े होते हैं)। प्रमुख स्मृति ग्रन्थ हैं:- इतिहास--रामायण और महाभारत, भगवद गीता, पुराण--(18), मनुस्मृति, धर्मशास्त्र और धर्मसूत्र, आगम शास्त्र। भारतीय दर्शन के ६ प्रमुख अंग हैं- सांख्य दर्शन, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त।

हिंदू धर्मग्रंथों के मुताबिक देवता धर्म के तो दानव अधर्म के प्रतीक हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पौराणिक मान्यताओं में देव-दानवों को एक ही पिता, किंतु अलग-अलग माताओं की संतान बताया गया है। इसके मुताबिक देव-दानवों के पिता ऋषि कश्यप हैं। वहीं, देवताओं की माता का नाम अदिति और दानवों की माता का नाम दिति है।

विश्व में अधिकतम हिन्दू जनसँख्या वाले २० राष्ट्र

प्राचीन काल में लोग वैदिक मंत्रों और अग्नि-यज्ञ से कई देवताओं की पूजा करते थे। आर्य देवताओं की कोई मूर्ति या मन्दिर नहीं बनाते थे। प्रमुख देवता थे : देवराज इन्द्र, अग्नि, सोम और वरुण। उनके लिये वैदिक मन्त्र पढ़े जाते थे और अग्नि में घी, दूध, दही, जौ, इत्यागि की आहुति दी जाती थी।

भारत एक विशाल देश है, लेकिन उसकी विशालता और महानता को हम तब तक नहीं जान सकते, जब तक कि उसे देखें नहीं। इस ओर वैसे अनेक महापुरूषों का ध्यान गया, लेकिन आज से बारह सौ वर्ष पहले आदिगुरू शंकराचार्य ने इसके लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होनें चारों दिशाओं में भारत के छोरों पर, चार पीठ (मठ) स्थापित उत्तर में बदरीनाथ के निकट ज्योतिपीठ, दक्षिण में रामेश्वरम् के निकट श्रृंगेरी पीठ, पूर्व में जगन्नाथपुरी में गोवर्धन पीठ और पश्चिम में द्वारिकापीठ। तीर्थों के प्रति हमारे देशवासियों में बड़ी भक्ति भावना है। इसलिए शंकराचार्य ने इन पीठो की स्थापना करके देशवासियों को पूरे भारत के दर्शन करने का सहज अवसर दे दिया। ये चारों तीर्थ चार धाम कहलाते है। लोगों की मान्यता है कि जो इन चारों धाम की यात्रा कर लेता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।

ज्यादातर हिन्दू भगवान की मूर्तियों द्वारा पूजा करते हैं। उनके लिये मूर्ति एक आसान सा साधन है, जिसमें कि एक ही निराकार ईश्वर को किसी भी मनचाहे सुन्दर रूप में देखा जा सकता है। हिन्दू लोग वास्तव में पत्थर और लोहे की पूजा नहीं करते, जैसा कि कुछ लोग समझते हैं। मूर्तियाँ हिन्दुओं के लिये ईश्वर की भक्ति करने के लिये एक साधन मात्र हैं।

हिन्दुओं के उपासना स्थलों को मन्दिर कहते हैं। प्राचीन वैदिक काल में मन्दिर नहीं होते थे। तब उपासना अग्नि के स्थान पर होती थी जिसमें एक सोने की मूर्ति ईश्वर के प्रतीक के रूप में स्थापित की जाती थी। एक नज़रिये के मुताबिक बौद्ध और जैन धर्मों द्वारा बुद्ध और महावीर की मूर्तियों और मन्दिरों द्वारा पूजा करने की वजह से हिन्दू भी उनसे प्रभावित होकर मन्दिर बनाने लगे। हर मन्दिर में एक या अधिक देवताओं की उपासना होती है। गर्भगृह में इष्टदेव की मूर्ति प्रतिष्ठित होती है। मन्दिर प्राचीन और मध्ययुगीन भारतीय कला के श्रेष्ठतम प्रतीक हैं। कई मन्दिरों में हर साल लाखों तीर्थयात्री आते हैं।

अधिकाँश हिन्दू चार शंकराचार्यों को (जो ज्योतिर्मठ, द्वारिका, शृंगेरी और पुरी के मठों के मठाधीश होते हैं) हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु मानते हैं।

नववर्ष - द्वादशमासै: संवत्सर:।' ऐसा वेद वचन है, इसलिए यह जगत्मान्य हुआ। सर्व वर्षारंभों में अधिक योग्य प्रारंभदिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है। इसे पूरे भारत में अलग-अलग नाम से सभी हिन्दू धूम-धाम से मनाते हैं। यद्यपि प्राचीनकालमे माघशुक्ल प्रतिपदासे शिशिर ऋत्वारम्भ उत्तरायणारम्भ और नववर्षाम्भ तिनौं एक साथ माना जाता था।

हिन्दू धर्म में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ। मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है, किन्तु काल क्रम में अब यह बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश वासियों तक ही सीमित रह गया है।

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवरात्रोत्सव आरंभ होता है। नवरात्रोत्सव में घटस्थापना करते हैं। अखंड दीप के माध्यम से नौ दिन श्री दुर्गादेवी की पूजा अर्थात् नवरात्रोत्सव मनाया जाता है।

श्रावण कृष्ण अष्टमी पर जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। इस तिथि में दिन भर उपवास कर रात्रि बारह बजे पालने में बालक श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है, उसके उपरांत प्रसाद लेकर उपवास खोलते हैं, अथवा अगले दिन प्रात: दही-कलाकन्द का प्रसाद लेकर उपवास खोलते हैं।

आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाता है। दशहरे के पहले नौ दिनों (नवरात्रि) में दसों दिशाएं देवी की शक्ति से प्रभासित होती हैं, व उन पर नियंत्रण प्राप्त होता है, दसों दिशाओंपर विजय प्राप्त हुई होती है। इसी दिन राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी।

किसी भी हिन्दू का शाकाहारी होना आवश्यक नहीं है हालांकि शाकाहार को सात्विक आहार माना जाता है। आवश्यकता से अधिक तला भुना शाकाहार ग्रहण करना भी राजसिक माना गया है। मांसाहार को इसलिये अच्छा नहीं माना जाता, क्योंकि मांस पशुओं की हत्या से मिलता है, अत: तामसिक पदार्थ है। वैदिक काल में पशुओं का मांस खाने की अनुमति नहीं थी, एक सर्वेक्षण के अनुसार आजकल लगभग 70% हिन्दू, अधिकतर ब्राह्मण व गुजराती और मारवाड़ी हिन्दू पारम्परिक रूप से शाकाहारी हैं। वे गोमांस भी कभी नहीं खाते, क्योंकि गाय को हिन्दू धर्म में माता समान माना गया है। कुछ हिन्दू मन्दिरों में पशुबलि चढ़ती है, पर आजकल यह प्रथा हिन्दुओं द्वारा ही निन्दित किये जाने से समाप्तप्राय: है।

प्राचीन हिंदू व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था और जाति का विशेष महत्व था। चार प्रमुख वर्ण थे - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। पहले यह व्यवस्था कर्म प्रधान थी। अगर कोई सेना में काम करता था तो वह क्षत्रिय हो जाता था चाहे उसका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो। लेकिन मध्य काल में वर्ण व्यवस्था का स्वरुप विदेशी आचार - व्यवहार एवं राज्य नियमों के तहत जाति व्यवस्था में बदल गया। विदेशी आक्रमणकारियों का शासन स्थापित होने से भारतीय जनमानस में भी उन्हीं प्रभाव हुआ। इन विदेशियों नें कुछ निर्बल भारतीयों को अपनी विस्ठा और मैला ढोने मे लगाया तथा इन्हें स्वरोजगार करने वाले लोगों (चर्मकार, धोबी, डोम {बांस से दैनिक उपयोग की वस्तुओं के निर्माता} इत्यादि) से जोड़ दिया।
अंग्रेजो नें इस व्यवस्था को और अधिक विकृत किया एवं जनजातियों को भी शामिल कर दिया।।

सनातनी हिंदू भगवान विष्णु के १० अवतार मानते हैं:- मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन, नरसिंह, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि।

हनुमान भी भगवान शिव के अवतार हैं।




#Article 17: उपनिषद् सूची (922 words)


वेद शब्द का अर्थ 'ज्ञान' है। वेद-पुरुष के शिरोभाग को उपनिषद् कहते हैं। उप (व्यवधानरहित) नि (सम्पूर्ण) षद् (ज्ञान)। किसी विषय के होने न होने का निर्णय ज्ञान से ही होता है। अज्ञान का अनुभव भी ज्ञान ही कराता है। अतः ज्ञान को प्रमाणित करने के लिए ज्ञान से भिन्न किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। उपनिषद् का अन्य अर्थ उप (समीप) निषत् -निषीदति-बैठनेवाला। अर्थात- जो उस परम तत्व के समीप बैठता हो। उपनिषद्यते-प्राप्यते ब्रह्मात्मभावोऽनया इति उपनिषद्। अर्थात्-जिससे ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सके, वह उपनिषद् है।

मुक्तिकोपनिषद् में एक सौ आठ (१०८) उपनिषदों का वर्णन आता है, इसके अतिरिक्त अडियार लाइब्रेरी मद्रास से प्रकाशित संग्रह में से १७९ उपनिषदों के प्रकाशन हो चुके है। गुजराती प्रिटिंग प्रेस बम्बई से मुदित उपनिषद्-वाक्य-महाकोष में २२३ उपनिषदों की नामावली दी गई है, इनमें उपनिषद (१) उपनिधि-त्स्तुति तथा (२) देव्युपनिषद नं-२ की चर्चा शिवरहस्य नामक ग्रंथ में है लेकिन ये दोनों उपलब्ध नहीं हैं तथा माण्डूक्यकारिका के चार प्रकरण चार जगह गिने गए है इस प्रकार अबतक ज्ञात उपनिषदो की संख्या २२० आती हैः-

१०८ उपिनषदों की यह सूची मुक्तिक उपनिषद में १:३०-३९ में दी गयी है : 

ईश = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपिनषद्

केन (उपनिषद्)= सामवेद, मुख्य उपिनषद्

कठ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपिनषद्

प्रश्न = अथर्व वेद, मुख्य उपिनषद्

मुण्डक = अथर्व वेद, मुख्य उपिनषद्

माण्डुक्य = अथर्व वेद, मुख्य उपिनषद्

तैतरीय = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपिनषद्

ऐतरेय = ऋग् वेद, मुख्य उपिनषद्

छान्दोग्य = साम वेद, मुख्य उपिनषद्

बृहदारण्यक उपनिषद (१०) = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपिनषद्

ब्रह्म = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

कैवल्य = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपिनषद्

जाबाल (यजुर्वेद) = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

श्वेताश्वतर = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

हंस = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपिनषद्

आरुणेय = साम वेद, संन्यास उपिनषद्

गर्भ = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

नारायण = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपिनषद्

परमहंस = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

अमृत-बिन्दु (२०) = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपिनषद्

अमृत-नाद = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपिनषद्

अथर्व-शिर = अथर्व वेद, शैव उपिनषद्

अथर्व-शिख = अथर्व वेद, शैव उपिनषद्

मैत्रायिण = साम वेद, सामान्य उपिनषद्

कौषीिताक = ऋग् वेद, सामान्य उपिनषद्

बृहज्जाबाल = अथर्व वेद, शैव उपिनषद्

नृसिंहतापनी = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

कालाग्निरुद्र = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपिनषद्

मैत्रेय = साम वेद, संन्यास उपिनषद्

सुबाल (३०) = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

क्षुरिक = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपिनषद्

मान्त्रिक = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

सर्व-सार = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

निरालम्ब = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

शुक-रहस्य = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

वज्र-सिूच = साम वेद, सामान्य उपिनषद्

तेजो-बिन्दु = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

नाद-बिन्दु = ऋग् वेद, योग उपिनषद्

ध्यानिबन्दु = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपिनषद्

ब्रह्मिवद्या (४०) = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपिनषद्

योगतत्त्व = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपिनषद्

आत्मबोध = ऋग् वेद, सामान्य उपिनषद्

परिव्रात् (नारदपरिव्राजक) = अथर्व वेद, संन्यास उपिनषद्

त्रि-िषिख = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपिनषद्

सीता = अथर्व वेद, शाक्त उपिनषद्

योगचूडामिण = साम वेद, योग उपिनषद्

निर्वाण = ऋग् वेद, संन्यास उपिनषद्

मण्डलब्राह्मण = शुक्ल यजुर्वेद, उपिनषद्

दकि्षणामूर्ति = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपिनषद्

शरभ (५०) = अथर्व वेद, शैव उपिनषद्

स्कन्द (त्िरपाड्िवभूिट) = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

महानारायण = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

अद्वयतारक = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

रामरहस्य = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

रामतापिण = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

वासुदेव = साम वेद, वैष्णव उपिनषद्

मुद्गल = ऋग् वेद, सामान्य उपिनषद्

शाणि्डल्य = अथर्व वेद, योग उपिनषद्

पैंगल = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

भिक्षुक (६०) = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

महत् = साम वेद, सामान्य उपिनषद्

शारीरक = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

योगिशखा = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपिनषद्

तुरीयातीत = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

संन्यास = साम वेद, संन्यास उपिनषद्

परमहंस-परिव्राजक = अथर्व वेद, संन्यास उपिनषद्

अक्षमालिक = ऋग् वेद, शैव उपिनषद्

अव्यक्त = साम वेद, वैष्णव उपिनषद्

एकाक्षर = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

अन्नपूर्ण (७०) = अथर्व वेद, शाक्त उपिनषद्

सूर्य = अथर्व वेद, सामान्य उपिनषद्

अक्षि = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

अध्यात्मा = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

कुण्डिक = साम वेद, संन्यास उपिनषद्

सावित्री = साम वेद, सामान्य उपिनषद्

आत्मा = अथर्व वेद, सामान्य उपिनषद्

पाशुपत = अथर्व वेद, योग उपिनषद्

परब्रह्म = अथर्व वेद, संन्यास उपिनषद्

अवधूत = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

त्रिपुरातपिन (८०) = अथर्व वेद, शाक्त उपिनषद्

देवि = अथर्व वेद, शाक्त उपिनषद्

त्रिपुर = ऋग् वेद, शाक्त उपिनषद्

कठरुद्र = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

भावन = अथर्व वेद, शाक्त उपिनषद्

रुद्र-हृदय = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपिनषद्

योग-कुण्डिलिन = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपिनषद्

भस्म = अथर्व वेद, शैव उपिनषद्

रुद्राक्ष = साम वेद, शैव उपिनषद्

गणपित = अथर्व वेद, शैव उपिनषद्

दर्शन (९०) = साम वेद, योग उपिनषद्

तारसार = शुक्ल यजुर्वेद, वैष्णव उपिनषद्

महावाक्य = अथर्व वेद, योग उपिनषद्

पंच-ब्रह्म = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपिनषद्

प्राणाग्नि-होत्र = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

गोपाल-तपिण = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

कृष्ण = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

याज्ञवल्क्य = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

वराह = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपिनषद्

शात्यायिन = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्

हयग्रीव (१००) = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

दत्तात्रेय = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

गारुड = अथर्व वेद, वैष्णव उपिनषद्

किल-सण्टारण = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपिनषद्

जाबाल (सामवेद) = साम वेद, शैव उपिनषद्

सौभाग्य = ऋग् वेद, शाक्त उपिनषद्

सरस्वती-रहस्य = कृष्ण यजुर्वेद, शाक्त उपिनषद्

बह्वृच = ऋग् वेद, शाक्त उपिनषद्

मुक्तिक (१०८) = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपिनषद्

१९ उपिनषद् शुक्ल यजुर्वेद से हैं और उनका शान्तिपाठ पूर्णमदः से आरम्भ होता है | 

३२ उपिनषद कृष्ण यजुर्वेद से हैं और उनका शान्तिपाठ सहनाववतु से आरम्भ होता है | 

१६ उपिनषद् सामवेद से हैं और उनका शान्तिपाठ आप्यायन्तु से आरम्भ होता है | 

३१ उपिनषद् अथर्ववेद से हैं और उनका शान्तिपाठ भद्रं कर्णेभिः से आरम्भ होता है | 

१० उपिनषद् ऋग्वेद से हैं और उनका शान्तिपाठ वण्मे मनिस से आरम्भ होता है |




#Article 18: उपनिषद् (2653 words)


उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं। ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। ये संस्कृत में लिखे गये हैं। इनकी संख्या लगभग २०० है, किन्तु मुख्य उपनिषद १३ हैं।  हर एक उपनिषद किसी न किसी वेद से जुड़ा हुआ है।  इनमें परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन दिया गया है।

उपनिषदों में कर्मकाण्ड को 'अवर' कहकर ज्ञान को इसलिए महत्व दिया गया कि ज्ञान स्थूल (जगत और पदार्थ) से सूक्ष्म (मन और आत्मा) की ओर ले जाता है। ब्रह्म, जीव और जगत्‌ का ज्ञान पाना उपनिषदों की मूल शिक्षा है। भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों के साथ मिलकर वेदान्त की 'प्रस्थानत्रयी' कहलाते हैं। ब्रह्मसूत्र और गीता कुछ सीमा तक उपनिषदों पर आधारित हैं। भारत की समग्र दार्शनिक चिन्तनधारा का मूल स्रोत उपनिषद-साहित्य ही है। इनसे दर्शन की जो विभिन्न धाराएं निकली हैं, उनमें 'वेदान्त दर्शन' का अद्वैत सम्प्रदाय प्रमुख है। उपनिषदों के तत्त्वज्ञान और कर्तव्यशास्त्र का प्रभाव भारतीय दर्शन के अतिरिक्त धर्म और संस्कृति पर भी परिलक्षित होता है। उपनिषदों का महत्त्व उनकी रोचक प्रतिपादन शैली के कारण भी है। कर्इ सुन्दर आख्यान और रूपक, उपनिषदों में मिलते हैं।

उपनिषद् भारतीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर है। उपनिषद ही समस्त भारतीय दर्शनों के मूल स्रोत हैं, चाहे वो वेदान्त हो या सांख्य। उपनिषदों को स्वयं भी 'वेदान्त' कहा गया है। १७वीं सदी में दारा शिकोह ने अनेक उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराया। १९वीं सदी में जर्मन तत्त्ववेता शोपेनहावर ने इन ग्रन्थों में जो रुचि दिखलाकर इनके अनुवाद किए वह सर्वविदित हैं और माननीय हैं। विश्व के कई दार्शनिक उपनिषदों को सबसे बेहतरीन ज्ञानकोश मानते हैं।

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं। वे चिन्तनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं। वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएं हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में प्रस्तुत करनेकि की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अन्तरदृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।

उपनिषद् शब्द का साधारण अर्थ है - ‘समीप उपवेशन’ या 'समीप बैठना (ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के पास बैठना)। यह शब्द ‘उप’, ‘नि’ उपसर्ग तथा, ‘सद्’ धातु से निष्पन्न हुआ है। सद् धातु के तीन अर्थ हैं : विवरण-नाश होना; गति-पाना या जानना तथा अवसादन-शिथिल होना। उपनिषद् में ऋषि और शिष्य के बीच बहुत सुन्दर और गूढ संवाद है जो पाठक को वेद के मर्म तक पहुंचाता है।और

उपनिषदों में मुख्य रूप से 'आत्मविद्या' का प्रतिपादन है, जिसके अन्तर्गत ब्रह्म और आत्मा के स्वरूप, उसकी प्राप्ति के साधन और आवश्यकता की समीक्षा की गयी है। आत्मज्ञानी के स्वरूप, मोक्ष के स्वरूप आदि अवान्तर विषयों के साथ ही विद्या, अविद्या, श्रेयस, प्रेयस, आचार्य आदि तत्सम्बद्ध विषयों पर भी भरपूर चिन्तन उपनिषदों में उपलब्ध होता है। वैदिक ग्रन्थों में जो दार्शनिक और आध्यात्मिक चिन्तन यत्र-तत्र दिखार्इ देता है, वही परिपक्व रूप में उपनिषदों में निबद्ध हुआ है। 

उपनिषदों में सर्वत्र समन्वय की भावना है। दोनों पक्षों में जो ग्राह्य है, उसे ले लेना चाहिए। इसी दृष्टि से ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग, विद्या और अविद्या, संभूति और असंभूति के समन्वय का उपदेश है। उपनिषदों में कभी-कभी ब्रह्मविद्या की तुलना में कर्मकाण्ड को बहुत हीन बताया गया है। र्इश आदि कर्इ उपनिषदें एकात्मवाद का प्रबल समर्थन करती हैं।

उपनिषद् ब्रह्मविद्या का द्योतक है। कहते हैं इस विद्या के अभ्यास से मुमुक्षुजन की अविद्या नष्ट हो जाती है (विवरण); वह ब्रह्म की प्राप्ति करा देती है (गति); जिससे मनुष्यों के गर्भवास आदि सांसारिक दुःख सर्वथा शिथिल हो जाते हैं (अवसादन)। फलतः उपनिषद् वे ‘तत्त्व’ प्रतिपादक ग्रन्थ माने जाते हैं जिनके अभ्यास से मनुष्य को ब्रह्म अथवा परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

उपनिषदों में देवता-दानव, ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी, पृथ्वी, प्रकृति, चर-अचर, सभी को माध्यम बना कर रोचक और प्रेरणादायक कथाओं की रचना की गयी है। इन कथाओं की रचना वेदों की व्याख्या के उद्देश्य से की गई। जो बातें वेदों में जटिलता से कही गयी है उन्हें उपनिषदों में सरल ढंग से समझाया गया है।  ब्रह्मा, विष्णु, महेश, अग्नि, सूर्य, इन्द्र आदि देवताओं से लेकर नदी, समुद्र, पर्वत, वृक्ष तक उपनिषद के कथापात्र है। 

उपनिषद् गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श उदाहरण हैं। प्रश्नोत्तर के माध्यम से सृष्टि के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन उपनिषदों में सहज ढंग से किया गया है। विभिन्न दृष्टान्तों, उदाहरणों, रूपकों, संकेतों और युक्तियों द्वारा आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म आदि का स्पष्टीकरण इतनी सफलता से उपनिषद् ही कर सके हैं।

रजि की कथा, कार्तवीर्य की कथा, नचिकेता की कथा, उद्दालक और श्वेतकेतु की कथा, सत्यकाम जाबाल की कथा आदि।

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूलाधार है, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं। वे चिंतनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं। वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएँ हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में बाँधने की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अंतर्दृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।

वैदिक युग सांसारिक आनन्द एवं उपभोग का युग था। मानव मन की निश्चिंतता, पवित्रता, भावुकता, भोलेपन व निष्पापता का युग था। जीवन को संपूर्ण अल्हड़पन से जीना ही उस काल के लोगों का प्रेय व श्रेय था। प्रकृति के विभिन्न मनोहारी स्वरूपों को देखकर उस समय के लोगों के भावुक मनों में जो उद्‍गार स्वयंस्फूर्त आलोकित तरंगों के रूप में उभरे उन मनोभावों को उन्होंने प्रशस्तियों, स्तुतियों, दिव्यगानों व काव्य रचनाओं के रूप में शब्दबद्ध किया और वे वैदिक ऋचाएँ या मंत्र बन गए। उन लोगों के मन सांसारिक आनंद से भरे थे, संपन्नता से संतुष्ट थे, प्राकृतिक दिव्यताओं से भाव-विभोर हो उठते थे। अत: उनके गीतों में यह कामना है कि यह आनंद सदा बना रहे, बढ़ता रहे और कभी समाप्त न हो। उन्होंने कामना की कि इस आनंद को हम पूर्ण आयु सौ वर्षों तक भोगें और हमारे बाद की पीढियाँ भी इसी प्रकार तृप्त रहें। यही नहीं कामना यह भी की गई कि इस जीवन के समाप्त होने पर हम स्वर्ग में जाएँ और इस सुख व आनंद की निरंतरता वहाँ भी बनी रहे। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न अनुष्ठान भी किए गए और देवताओं को प्रसन्न करने के आयोजन करके उनसे ये वरदान भी माँगे गए। जब प्रकृति करवट लेती थी तो प्राकृतिक विपदाओं का सामना होता था। तब उन विपत्तियों केकाल्पनिक नियंत्रक देवताओं यथा मरुत, अग्नि, रुद्र आदि को तुष्ट व प्रसन्न करने के अनुष्ठान किए जाते थे और उनसे प्रार्थना की जाती थी कि ऐसी विपत्तियों को आने न दें और उनके आने पर प्रजा की रक्षा करें। कुल मिलाकर वैदिक काल के लोगों का जीवन प्रफुल्लित, आह्लादमय, सुखाकांक्षी, आशावादी और‍ जिजीविषापूर्ण था। उनमें विषाद, पाप या कष्टमय जीवन के विचार की छाया नहीं थी। नरक व उसमें मिलने वाली यातनाओं की कल्पना तक नहीं की गई थी। कर्म को यज्ञ और यज्ञ को ही कर्म माना गया था और उसी के सभी सुखों की प्राप्ति तथा संकटों का निवारण हो जाने की अवधारणा थी। यह जीवनशैली दीर्घकाल तक चली। पर ऐसा कब तक चलता। एक न एक दिन तो मनुष्य के अनंत जिज्ञासु मस्तिष्क में और वर्तमान से कभी संतुष्ट न होने वाले मन में यह जिज्ञासा, यह प्रश्न उठना ही था कि प्रकृति की इस विशाल रंगभूमि के पीछे सूत्रधार कौन है, इसका सृष्टा/निर्माता कौन है, इसका उद्‍गम कहाँ है, हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, यह सृष्टि अंतत: कहाँ जाएगी। हमारा क्या होगा? शनै:-शनै: ये प्रश्न अंकुरित हुए। और फिर शुरू हुई इन सबके उत्तर खोजने की ललक तथा जिज्ञासु मन-मस्तिष्क की अनंत खोज यात्रा।
कुछ लोगों की जीवन देखने की क्षमता गहरी होने लगी, जिसकी वजह से उनको जीवन चक्र दिखने लगा। जीवन में सुख और दुख दोनों है ये दिखने लगा। कुछ लोगों को ये लगने लगा कि जीवन क्या सिर्फ यही है। उन्होंने 'ना' कहना शुरू किया पेट केंद्रित जीवन को।
इसी ना से उपनिषद की शुरुआत हुई।

ऐसा नहीं है कि आत्मा, पुनर्जन्म और कर्मफलवाद के विषय में वैदिक ऋषियों ने कभी सोचा ही नहीं था। ऐसा भी नहीं था कि इस जीवन के बारे में उनका कोई ध्यान न था। ऋषियों ने यदा-कदा इस विषय पर विचार किया भी था। इसके बीज वेदों में यत्र-तत्र मिलते हैं, परंतु यह केवल विचार मात्र था। कोई चिंता या भय नहीं। आत्मा शरीर से भिन्न तत्व है और इस जीवन की समाप्ति के बाद वह परलोक को जाती है इस सिद्धांत का आभास वैदिक ऋचाओं में मिलता अवश्य है परंतु संसार में आत्मा का आवागमन क्यों होता है, इसकी खोज में वैदिक ऋषि प्रवृत्त नहीं हुए। अपनी समस्त सीमाओं के साथ सांसारिक जीवन वैदिक ऋषियों का प्रेय था। प्रेय को छोड़कर श्रेय की ओर बढ़ने की आतुरता उपनिषदों के समय जगी, तब मोक्ष के सामने ग्रहस्थ जीवन निस्सार हो गया एवं जब लोग जीवन से आनंद लेने के बजाय उससे पीठ फेरकर संन्यास लेने लगे। हाँ, यह भी हुआ कि वैदिक ऋषि जहाँ यह पूछ कर शांत हो जाते थे कि 'यह सृष्टि किसने बनाई है?' और 'कौन देवता है जिसकी हम उपासना करें'? वहाँ उपनिषदों के ऋषियों ने सृष्टि बनाने वाले के संबंध में कुछ सिद्धांतों का निश्चय कर दिया और उस 'सत' का भी पता पा लिया जो पूजा और उपासना का वस्तुत: अधिकार है। वैदिक धर्म का पुराना आख्यान वेद और नवीन आख्यान उपनिषद हैं।'वेदों में यज्ञ-धर्म का प्रतिपादन किया गया और लोगों को यह सीख दी गई कि इस जीवन में सुखी, संपन्न तथा सर्वत्र सफल व विजयी रहने के लिए आवश्यक है कि देवताओं की तुष्टि व प्रसन्नता के लिए यज्ञ किए जाएँ। 'विश्व की उत्पत्ति का स्थान यज्ञ है। सभी कर्मों में श्रेष्ठ कर्म यज्ञ है। यज्ञ के कर्मफल से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।' ये ही सूत्र चारों ओर गुँजित थे। दूसरे, जब ब्राह्मण ग्रंथों ने यज्ञ को बहुत अधिक महत्व दे दिया और पुरोहितवाद तथा पुरोहितों की मनमानी अत्यधिक बढ़ गई तब इस व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई और विरोध की भावना का सूत्रपात हुआ। लोग सोचने लगे कि 'यज्ञों का वास्तविक अर्थ क्या है?' 'उनके भीतर कौन सा रहस्य है?' 'वे धर्म के किस रूप के प्रतीक हैं?' 'क्या वे हमें जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुँचा देंगे?' इस प्रकार, कर्मकाण्ड पर बहुत अधिक जोर तथा कर्मकाण्डों को ही जीवन की सभी समस्याओं के हल के रूप में प्रतिपादित किए जाने की प्रवृत्ति ने विचारवान लोगों को उनके बारे में पुनर्विचार करने को प्रेरित किया।
प्रकृति के प्रत्येक रूप में एक नियंत्रक देवता की कल्पना करते-करते वैदिक आर्य बहुदेववादी हो गए थे। उनके देवताओं में उल्लेखनीय हैं- इंद्र, वरुण, अग्नि, सविता, सोम, अश्विनीकुमार, मरुत, पूषन, मित्र, पितर, यम आदि। तब एक बौद्धिक व्यग्रता प्रारंभ हुई उस एक परमशक्ति के दर्शन करने या उसके वास्तविक स्वरूप को समझने की कि जो संपूर्ण सृष्टि का रचयिता और इन देवताओं के ऊपर की सत्ता है। इस व्यग्रता ने उपनिषद के चिंतनों का मार्ग प्रशस्त किया।

 चिंतनशील एवं कल्पाशील मनीषियों की दार्शनिक काव्य रचनाएँ हैं। जहाँ गद्य लिख गए हैं वे भी पद्यमय गद्य-रचनाओं में ऐसी शब्द-शक्ति, ध्वन्यात्मकता, लव एवं अर्थगर्भिता है कि वे किसी दैवी शक्ति की रचनाओं का आभास देते हैं। यह सचमुच अत्युक्ति नहीं है कि उन्हें 'मंत्र' या 'ऋचा' कहा गया। वास्तव में मंत्र या ऋचा का संबंध वेद से है परंतु उपनिषदों की हमत्ता दर्शाने के लिए इन संज्ञाओं का उपयोग यहाँ भी कतिपय विद्वानों द्वारा किया जाता है। उपनिषद अपने आसपास के दृश्य संसार के पीछे झाँकने के प्रयत्न हैं। इसके लिए न कोई उपकरण उपलब्ध हैं और न किसी प्रकार की प्रयोग-अनुसंधान सुविधाएँ संभव है। अपनी मनश्चेतना, मानसिक अनुभूति या अंतर्दृष्टि के आधार पर हुए आध्यात्मिक स्फुरण या दिव्य प्रकाश को ही वर्णन का आधार बनाया गया है। उपनिषद अध्यात्मविद्या के विविध अध्याय हैं जो विभिन्न अंत:प्रेरित ऋषियों द्वारा लिखे गए हैं। इनमें विश्व की परमसत्ता के स्वरूप, उसके अवस्थान, विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों के साथ उसके संबंध, मानवीय आत्मा में उसकी एक किरण की झलक या सूक्ष्म प्रतिबिंब की उपस्थिति आदि को विभिन्न रूपकों और प्रतीकों के रूप में वर्णित किया गया है। सृष्टि के उद्‍गम एवं उसकी रचना के संबंध में गहन चिंतन तथा स्वयंफूर्त कल्पना से उपजे रूपांकन को विविध बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है। अंत में कहा यह गया कि हमारी श्रेष्ठ परिकल्पना के आधार पर जो कुछ हम समझ सके, वह यह है। इसके आगे इस रहस्य को शायद परमात्मा ही जानता हो और 'शायद वह भी नहीं जानता हो।'

संक्षेप में, वेदों में इस संसार में दृश्यमान एवं प्रकट प्राकृतिक शक्तियों के स्वरूप को समझने, उन्हें अपनी कल्पनानुसार विभिन्न देवताओं का जामा पहनाकर उनकी आराधना करने, उन्हें तुष्ट करने तथा उनसे सांसारिक सफलता व संपन्नता एवं सुरक्षा पाने के प्रयत्न किए गए थे। उन तक अपनी श्रद्धा को पहुँचाने का माध्यम यज्ञों को बनाया गया था। उपनिषदों में उन अनेक प्रयत्नों का विवरण है जो इन प्राकृतिक शक्तियों के पीछे की परमशक्ति या सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता से साक्षात्कार करने की मनोकामना के साथ किए गए। मानवीय कल्पना, चिंतन-क्षमता, अंतर्दृष्टि की क्षमता जहाँ तक उस समय के दार्शनिकों, मनीषियों या ऋषियों को पहुँचा सकीं उन्होंने पहुँचने का भरसक प्रयत्न किया। यही उनका तप था।

१०८ उपनिषदों को अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है। 

वैदिक संहिताओं के अनन्तर वेद के तीन प्रकार के ग्रन्थ हैं- ब्राह्राण, आरण्यक और उपनिषद। इन ग्रन्थों का सीधा सम्बन्ध अपने वेद से होता है, जैसे ऋग्वेद के ब्राह्राण, ऋग्वेद के आरण्यक और ऋग्वेद के उपनिषदों के साथ ऋग्वेद का संहिता ग्रन्थ मिलकर भारतीय परम्परा के अनुसार 'ऋग्वेद' कहलाता है।

किसी उपनिषद का सम्बन्ध किस वेद से है, इस आधार पर उपनिषदों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है- 

(१) ऋग्वेदीय -- १० उपनिषद्

(२) शुक्ल यजुर्वेदीय -- १९ उपनिषद्

(३) कृष्ण यजुर्वेदीय -- ३२ उपनिषद्

(४) सामवेदीय -- १६ उपनिषद्

(५) अथर्ववेदीय -- ३१ उपनिषद्

कुल -- १०८ उपनिषद्

इनके अतिरिक्त नारायण, नृसिंह, रामतापनी तथा गोपाल चार उपनिषद् और हैं। 

विषय की गम्भीरता तथा विवेचन की विशदता के कारण १३ उपनिषद् विशेष मान्य तथा प्राचीन माने जाते हैं। 

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने १० पर अपना भाष्य दिया है- 
(१) ईश, (२) ऐतरेय (३) कठ (४) केन (५) छान्दोग्य (६) प्रश्न (७) तैत्तिरीय (८) बृहदारण्यक (९) मांडूक्य और (१०) मुण्डक। 

उन्होने निम्न तीन को प्रमाण कोटि में रखा है- 
(१) श्वेताश्वतर (२) कौषीतकि तथा (३) मैत्रायणी।

अन्य उपनिषद् तत्तद् देवता विषयक होने के कारण 'तांत्रिक' माने जाते हैं। ऐसे उपनिषदों में शैव, शाक्त, वैष्णव तथा योग विषयक उपनिषदों की प्रधान गणना है।

डॉ॰ ड्यूसेन, डॉ॰ बेल्वेकर तथा रानडे ने उपनिषदों का विभाजन प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से इस प्रकार किया है:

१. ऐतरेय, २. केन, ३. छान्दोग्य, ४. तैत्तिरीय, ५. बृहदारण्यक तथा ६. कौषीतकि; 
इनका गद्य ब्राह्मणों के गद्य के समान सरल, लघुकाय तथा प्राचीन है।

१.ईश, २.कठ, ३. श्वेताश्वतर तथा नारायण 
इनका पद्य वैदिक मंत्रों के अनुरूप सरल, प्राचीन तथा सुबोध है। 

१.प्रश्न, २.मैत्री (मैत्रायणी) तथा ३.माण्डूक्य

अन्य अवांतरकालीन उपनिषदों की गणना इस श्रेणी में की जाती है।

भाषा तथा उपनिषदों के विकास क्रम की दृष्टि से डॉ॰ डासन ने उनका विभाजन चार स्तर में किया है:

१. ईश, २. ऐतरेय, ३. छान्दोग्य, ४. प्रश्न, ५. तैत्तिरीय, ६. बृहदारण्यक, ७. माण्डूक्य और ८. मुण्डक

१. कठ, २. केन

१. कौषीतकि, २. मैत्री (मैत्राणयी) तथा ३. श्वेताश्वतर

उपनिषदों की भौगोलिक स्थिति मध्यदेश के कुरुपांचाल से लेकर विदेह (मिथिला) तक फैली हुई है। 
उपनिषदों के काल के विषय मे निश्चित मत नही है पर उपनिषदो का काल ३००० ईसा पूर्व से ३५०० ई पू माना गया है। वेदो का रचना काल भी यही समय माना गया है। उपनिषद् काल का आरम्भ बुद्ध से पर्याप्त पूर्व है। ग्रेट एजेज ऑफ मैन के सम्पादक इसे लगभग ८०० ई.पू. बतलाते हैं।

उपनिषदों के रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वानों का एक मत नहीं है। कुछ उपनिषदों को वेदों की मूल संहिताओं का अंश माना गया है। ये सर्वाधिक प्राचीन हैं। कुछ उपनिषद ‘ब्राह्मण’ और ‘आरण्यक’ ग्रन्थों के अंश माने गये हैं। इनका रचनाकाल संहिताओं के बाद का है। उपनिषदों के काल के विषय मे निश्चित मत नही है समान्यत उपनिषदो का काल रचनाकाल ३००० ईसा पूर्व से ५०० ईसा पूर्व माना गया है। उपनिषदों के काल-निर्णय के लिए निम्न मुख्य तथ्यों को आधार माना गया है— 

निम्न विद्वानों द्वारा विभिन्न उपनिषदों का रचना काल निम्न क्रम में माना गया है-

 

उपनिषद्




#Article 19: रुपया (452 words)


रुपया (रु.) (हिंदी और उर्दू: रुपया, संस्कृत: रूप्यकम् से उत्प्रेरित जिसका अर्थ चांदी का सिक्का है) भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, मॉरीशस और सेशल्स में उपयोग मे आने वाली मुद्रा का नाम है। इंडोनेशिया की मुद्रा को रुपिया जबकि मालदीव की मुद्रा को रुफियाह, के नाम से जाना जाता है जो असल मे हिन्दी शब्द रुपया का ही बदला हुआ रूप है। भारतीय और पाकिस्तानी रुपये मे सौ पैसे होते हैं (एकवचन पैसा) में, श्रीलंकाई रुपये में 100 सेंट, तथा नेपाली रुपये को सौ पैसे या चार सूकों (एकवचन सूक) या दो मोहरों (एकवचन मोहर) मे विभाजित किया जा सकता है। 

शेर शाह सूरी के शासनकाल के दौरान शुरू किया गया ‘रुपया’ आज तक प्रचलन मे है। भारत मे ब्रिटिश राज के दौरान भी यह प्रचलन मे रहा, इस दौरान इसका वजन 11.66 ग्राम था और इसके भार का 91,7% तक शुद्ध चांदी थी। 19वीं शताब्दी के अंत मे रुपया प्रथागत ब्रिटिश मुद्रा विनिमय दर, के अनुसार एक शिलिंग और चार पेंस के बराबर था वहीं यह एक पाउंड स्टर्लिंग का 1 / 15 हिस्सा था। 

उन्नीसवीं सदी मे जब दुनिया में सबसे सशक्त अर्थव्यवस्थायें स्वर्ण मानक पर आधारित थीं तब चांदी से बने रुपये के मूल्य मे भीषण गिरावट आयी। संयुक्त राज्य अमेरिका और विभिन्न यूरोपीय उपनिवेशों में विशाल मात्रा मे चांदी के स्रोत मिलने के परिणामस्वरूप चांदी का मूल्य सोने के अपेक्षा काफी गिर गया। अचानक भारत की मानक मुद्रा से अब बाहर की दुनिया से ज्यादा खरीद नहीं की जा सकती थी। इस घटना को ‘रुपए की गिरावट के रूप में जाना जाता है। 

पहले रुपए (11.66 ग्राम) को 16 आने या 64 पैसे या 192 पाई में बांटा जाता था। रुपये का दशमलवीकरण 1869 में सीलोन (श्रीलंका) में, 1957 में भारत मे और 1961 में पाकिस्तान में हुआ। इस प्रकार अब एक भारतीय रुपया 100 पैसे में विभाजित हो गया। भारत में कभी कभी पैसे के लिए नया पैसा शब्द भी इस्तेमाल किया जाता था। भारत मे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा जारी की जाती है, जबकि पाकिस्तान मे यह स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के द्वारा नियंत्रित होता है। 

असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में बोली जाने वाली असमिया और बांग्ला भाषाओं में, रुपये को टका के रूप में जाना जाता है और भारतीय बैंक नोटों पर भी इसी रूप में लिखा जाता है। भारत और पाकिस्तान की मुद्रा 1, 2, 5, 10, 20, 50, 100, 200, 500 और 2000 रुपये के मूल्यवर्ग में जारी की जाती है, वहीं पाकिस्तान मे 5000 रुपये का नोट भी जारी किया जाता है। रुपये की बड़ी मूल्यवर्ग अक्सर लाख (100000) करोड़ (10000000) और अरब (1000000000) रुपए में गिने जाते हैं।

सन २०१० में भारतीय सरकार द्वारा एक रुपये के लिये प्रतीक चिह्न निर्धारित करने हेतु एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन किया गया




#Article 20: भौतिक शास्त्र (573 words)


रसायन  शास्त्र अथवा भौतिकी, प्रकृति विज्ञान की एक विशाल शाखा है। भौतिकी को परिभाषित करना कठिन है। कुछ विद्वानों के मतानुसार यह ऊर्जा विषयक विज्ञान है और इसमें ऊर्जा के रूपांतरण तथा उसके द्रव्य संबन्धों की विवेचना की जाती है। इसके द्वारा प्राकृत जगत और उसकी आन्तरिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। स्थान, काल, गति, द्रव्य, विद्युत, प्रकाश, ऊष्मा तथा ध्वनि इत्यादि अनेक विषय इसकी परिधि में आते हैं। यह विज्ञान का एक प्रमुख विभाग है। इसके सिद्धांत समूचे विज्ञान में मान्य हैं और विज्ञान के प्रत्येक अंग में लागू होते हैं। इसका क्षेत्र विस्तृत है और इसकी सीमा निर्धारित करना अति दुष्कर है। सभी वैज्ञानिक विषय अल्पाधिक मात्रा में इसके अंतर्गत आ जाते हैं। विज्ञान की अन्य शाखायें या तो सीधे ही भौतिक पर आधारित हैं, अथवा इनके तथ्यों को इसके मूल सिद्धांतों से संबद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है।

भौतिकी का महत्व इसलिये भी अधिक है कि अभियांत्रिकी तथा शिल्पविज्ञान की जन्मदात्री होने के नाते यह इस युग के अखिल सामाजिक एवं आर्थिक विकास की मूल प्रेरक है। बहुत पहले इसको दर्शन शास्त्र का अंग मानकर नैचुरल फिलॉसोफी या प्राकृतिक दर्शनशास्त्र कहते थे, किंतु 1870 ईस्वी के लगभग इसको वर्तमान नाम भौतिकी या फिजिक्स द्वारा संबोधित करने लगे। धीरे-धीरे यह विज्ञान उन्नति करता गया और इस समय तो इसके विकास की तीव्र गति देखकर, अग्रगण्य भौतिक विज्ञानियों को भी आश्चर्य हो रहा है। धीरे-धीरे इससे अनेक महत्वपूर्ण शाखाओं की उत्पत्ति हुई, जैसे रासायनिक भौतिकी, तारा भौतिकी, जीवभौतिकी, भूभौतिकी, नाभिकीय भौतिकी, आकाशीय भौतिकी इत्यादि।

भौतिकी का मुख्य सिद्धांत उर्जा संरक्षण का नियम है। इसके अनुसार किसी भी द्रव्यसमुदाय की ऊर्जा की मात्रा स्थिर होती है। समुदाय की आंतरिक क्रियाओं द्वारा इस मात्रा को घटाना या बढ़ाना संभव नहीं। ऊर्जा के अनेक रूप होते हैं और उसका रूपांतरण हो सकता है, किंतु उसकी मात्रा में किसी प्रकार परिवर्तन करना संभव नहीं हो सकता। आइंस्टाइन के सापेक्षिकता सिद्धांत के अनुसार द्रव्यमान भी उर्जा में बदला जा सकता है। इस प्रकार ऊर्जा संरक्षण और द्रव्यमान संरक्षण दोनों सिद्धांतों का समन्वय हो जाता है और इस सिद्धांत के द्वारा भौतिकी और रसायन एक दूसरे से संबद्ध हो जाते हैं।

भौतिकी को मोटे रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। १९०० ईस्वी से पूर्व जो भौतिक ज्ञान अर्जित किया गया था और तत्संबंधी जो नियम तथा सिद्धांत प्रतिपादित किए गए थे, उनका समावेश चिरसम्मत भौतिकी में किया गया। उस समय की विचारधारा के प्रेरणास्त्रोत गैलिलियो (१५६४-१६४२ ईस्वीं) तथा न्यूटन (१६४२-१७२७) थे। चिरसम्मत भौतिकी को मुख्यत: यांत्रिकी (मिकैनिक्स), ध्वनिकी (अकौस्टिक्स), ऊष्मा, विद्युतचुंबकत्व और प्रकाशिकी (ऑप्टिक्स) में विभाजित किया जाता है। ये शाखायें इंजीनियरिंग तथा शिल्प विज्ञान की आधारशिलायें हैं और भौतिकी की प्रारंभिक शिक्षा इनसे ही शुरू की जाती है

१९०० ईस्वी के पश्चात अनेक क्रांतिकारी तथ्य ज्ञात हुए, जिनको चिरसम्मति भौतिकी के ढाँचे में बैठाना कठिन है। इन नये तथ्यों के अध्ययन करने और उनकी गुत्थियों को सुलझाने में भौतिकी की जिस शाखा की उत्पत्ति हुई, उसको आधुनिक भौतिकी कहते हैं। आधुनिक भौतिकी का द्रव्यसंरचना से सीधा संबंध है। अणुपरमाणु, केंद्रक (न्युक्लियस) तथा मूल कण इनके मुख्य विषय हैं। भौतिकी की इस नवीन शाखा ने वैज्ञानिक विचारधारा को नवीन और क्रांतिकारी मोड़ दिया है तथा इससे समाजिक विज्ञान और दर्शनशास्त्र भी महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित हुए हैं। 'currently solid state physics is known as modern physics where we reads about construction and energy of material. There are some other branches but Electronics is the latest.'

वर्तमान मे इलेक्तट्रोनिक्स बिषय एक केन्द्र बिन्दु माना जा रहा है जिसके सहारे समूचा विश्व चलायमान है|




#Article 21: धर्म (446 words)


पन्थ/सम्प्रदाय के अर्थ में धर्म के लिए धर्म (पंथ) देखें। राजधर्म के लिए राजधर्म देखें। दक्षिणा के लिए दक्षिणा देखें।

धर्म  ( पालि : धम्म ) भारतीय संस्कृति और भारतीय दर्शन की प्रमुख संकल्पना है। 'धर्म' शब्द का पश्चिमी भाषाओं में किसी समतुल्य शब्द का पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्-गुण आदि। धर्म का शाब्दिक अर्थ होता है, 'धारण करने योग्य' सबसे उचित धारणा, अर्थात जिसे सबको धारण करना चाहिये। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन या बौद्ध आदि धर्म न होकर सम्प्रदाय या समुदाय मात्र हैं। सम्प्रदाय एक परम्परा के मानने वालों का समूह है। ऐसा माना जाता है कि धर्म मानव को मानव बनाता है। 

हिन्दू धर्म में अनेक स्थलों पर धर्म को किसी ऐसे मानव के रूप में दर्शाया गया है जो न्याय और प्राकृतिक व्यवस्था की प्रतिमूर्ति है। 
इसी प्रकार, यम को 'धर्मराज' कहा जाता है क्योंकि वे मनुष्यों को उनके कर्म के अनुसार निर्णय करके गति देते हैं।

सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ स्वीकार किए गये हैं जिनमें धर्म प्रमुख है। तीन अन्य पुरुषार्थ ये हैं- अर्थ, काम और मोक्ष।

गौतम ऋषि कहते हैं - 'यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धिः स धर्म।' (जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। )

मनु ने मानव धर्म के दस लक्षण बताये हैं:

जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है। 
 

वात्स्यायन ने धर्म और अधर्म की तुलना करके धर्म को स्पष्ट किया है। वात्स्यायन मानते हैं कि मानव के लिए धर्म मनसा, वाचा, कर्मणा होता है। यह केवल क्रिया या कर्मों से सम्बन्धित नहीं है बल्कि धर्म चिन्तन और वाणी से भी संबंधित है।

महाभारत के वनपर्व (३१३/१२८) में कहा है-

इसी तरह भगवद्गीता में कहा है-

जैन ग्रंथ, तत्त्वार्थ सूत्र में १० धर्मों का वर्णन है। यह १० धर्म है: 

पुराणों के अनुसार धर्म, ब्रह्मा के एक मानस पुत्र हैं। वे उनके दाहिने वक्ष से उत्पन्न हुए हैं। धर्म का विवाह दक्ष की १३ पुत्रियों से हुआ था, जिनके नाम हैं-  श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति।
श्रद्धा से नर और काम का जन्म हुआ ;  तुष्टि से सन्तोष और क्रिया का जन्म हुआ ; क्रिया से दण्ड, नय और विनय का जन्म हुआ।

अहिंसा, धर्म की पत्नी (शक्ति) हैं। धर्म तथा अहिंसा से विष्णु का जन्म हुआ है। धर्म की ग्लानि होने पर उसकी पुनर्प्रतिष्ठा के लिए विष्णु अवतार लेते हैं।

विष्णुपुराण में 'अधर्म' का भी उल्लेख है। अधर्म की पत्नी हिंसा है जिससे अनृत नामक पुत्र और निकृति नाम की कन्या का जन्म हुआ। भय और नर्क अधर्म के नाती हैं ।




#Article 22: खगोल शास्त्र (1464 words)


, एक ऐसा शास्त्र है जिसके अंतर्गत पृथ्वी और उसके वायुमण्डल के बाहर होने वाली घटनाओं का अवलोकन, विश्लेषण तथा उसकी व्याख्या (explanation) की जाती है। यह वह अनुशासन है जो आकाश में अवलोकित की जा सकने वाली तथा उनका समावेश करने वाली क्रियाओं के आरंभ, बदलाव और भौतिक तथा रासायनिक गुणों का अध्ययन करता है।

बीसवीं शताब्दी के दौरा

खगोलिकी ब्रह्मांड में अवस्थित आकाशीय पिंडों का प्रकाश, उद्भव, संरचना और उनके व्यवहार का अध्ययन खगोलिकी का विषय है। अब तक ब्रह्मांड के जितने भाग का पता चला है उसमें लगभग 19 अरब आकाश गंगाओं के होने का अनुमान है और प्रत्येक आकाश गंगा में लगभग 10 अरब तारे हैं। आकाश गंगा का व्यास लगभग एक लाख प्रकाशवर्ष है। हमारी पृथ्वी पर आदिम जीव 2 अरब साल पहले पैदा हुआ और आदमी का धरती पर अवतण 10-20 लाख साल पहले हुआ।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महापिंड के विस्फोट से हुई है। सूर्य एक औसत तारा है जिसके आठ मुख्य ग्रह हैं, उनमें से पृथ्वी भी एक है। इस ब्रह्मांड में हर एक तारा सूर्य सदृश है। बहुत-से तारे तो ऐसे हैं जिनके सामने अपना सूर्य अणु (कण) के बराबर भी नहीं ठहरता है। जैसे सूर्य के ग्रह हैं और उन सबको मिलाकर हम सौर परिवार के नाम से पुकारते हैं, उसी प्रकार हरेक तारे का अपना अपना परिवार है। बहुत से लोग समझते हैं कि सूर्य स्थिर है, लेकिन संपूर्ण सौर परिवार भी स्थानीय नक्षत्र प्रणाली के अंतर्गत प्रति सेकेंड 13 मील की गति से घूम रहा है। स्थानीय नक्षत्र प्रणाली आकाश गंगा के अंतर्गत प्रति सेकेंड 200 मील की गति से चल रही है और संपूर्ण आकाश गंगा दूरस्थ बाह्य ज्योर्तिमालाओं के अंतर्गत प्रति सेकेंड 100 मील की गति से विभिन्न दिशाओं में घूम रही है।

चंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जिस पर मानव के कदम पहुँच चुके हैं। इस ब्रह्मांड में सबसे विस्मयकारी दृश्य है- आकाश गंगा (गैलेक्सी) का दृश्य। रात्रि के खुले (जब चंद्रमा न दिखाई दे) आकाश में प्रत्येक मनुष्य इन्हें नंगी आँखों से देख सकता है। देखने में यह हल्के सफेद धुएँ जैसी दिखाई देती है, जिसमें असंख्य तारों का बाहुल्य है। यह आकाश गंगा टेढ़ी-मेढ़ी होकर बही है। इसका प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर है। पर प्रात:काल होने से थोड़ा पहले इसका प्रवाह पूर्वोत्तर से पश्चिम और दक्षिण की ओर होता है। देखने में आकाश गंगा के तारे परस्पर संबद्ध से लगते हैं, पर यह दृष्टि भ्रम है। एक दूसरे से सटे हुए तारों के बीच की दूरी अरबों मील हो सकती है। जब सटे हुए तारों का यह हाल है तो दूर दूर स्थित तारों के बीच की दूरी ऐसी गणनातीत है जिसे कह पाना मुश्किल है। इसी कारण से ताराओं के बीच तथा अन्य लंबी दूरियाँ प्रकाशवर्ष में मापी जाती हैं। एक प्रकाशवर्ष वह दूरी है जो दूरी प्रकाश एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड की गति से एक वर्ष में तय करता है। उदाहरण के लिए सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सवा नौ करोड़ मील है, प्रकाश यह दूरी सवा आठ मिनट में तय करता है। अत: पृथ्वी से सूर्य की दूरी सवा आठ प्रकाश मिनट हुई। जिन तारों से प्रकाश आठ हजार वर्षों में आता है, उनकी दूरी हमने पौने सैंतालिस पद्म मील आँकी है। लेकिन तारे तो इतनी इतनी दूरी पर हैं कि उनसे प्रकाश के आने में लाखों, करोड़ों, अरबों वर्ष लग जाता है। इस स्थिति में हमें इन दूरियों को मीलों में व्यक्त करना संभव नहीं होगा और न कुछ समझ में ही आएगा। इसीलिए प्रकाशवर्ष की इकाई का वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया है।

मान लीजिए, ब्रह्मांड के किसी और नक्षत्रों आदि के बाद बहुत दूर दूर तक कुछ नहीं है, लेकिन यह बात अंतिम नहीं हो सकती है। यदि उसके बाद कुछ है तो तुरंत यह प्रश्न सामने आ जाता है कि वह कुछ कहाँ तक है और उसके बाद क्या है? इसीलिए हमने इस ब्रह्मांड को अनादि और अनंत माना। इसके अतिरिक्त अन्य शब्दों में ब्रह्मांड की विशालता, व्यापकता व्यक्त करना संभव नहीं है।

अंतरिक्ष में कुछ स्थानों पर दूरदर्शी से गोल गुच्छे दिखाई देते हैं। इन्हें स्टार क्लस्टर या ग्लीट्य्रूलर स्टार अर्थात् तारा गुच्छ कहते हैं। इसमें बहुत से तारे होते हैं जो बीच में घने रहते हैं और किनारे बिरल होते हैं। टेलिस्कोप से आकाश में देखने पर कहीं कहीं कुछ धब्बे दिखाई देते हैं। ये बादल के समान बड़े सफेद धब्बे से दिखाई देते हैं। इन धब्बों को ही नीहारिका कहते हैं। इस ब्रह्मांड में असंख्य नीहारिकाएँ हैं। उनमें से कुछ ही हम देख पाते हैं।

इस अपरिमित ब्रह्मांड का अति क्षुद्र अंश हम देख पाते हैं। आधुनिक खोजों के कारण जैसे जैसे दूरबीन की क्षमता बढ़ती जाती है, वैसे वैसे ब्रह्मांड के इस दृश्यमान क्षेत्र की सीमा बढ़ती जाती है। परन्तु वर्तमान परिदृश्य में ब्रह्मांड की पूरी थाह मानव क्षमता से बहुत दूर है।

खगोल भौतिकी का आधुनिक युग जर्मन भौतिकविद् किरचाक से आरंभ हुआ। सूर्य के वातावरण में सोडियम, लौह, मैग्नेशियम, कैल्शियम तथा अनेक अन्य तत्वों का उन्होंने पता लगाया (सन् 1859)। हमारे देश में स्वर्गीय प्रोफेसर मेघनाद साहा ने सूर्य और तारों के भौतिक तत्वों के अध्ययन में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने वर्णक्रमों के अध्ययन से खगोलीय पिंडों के वातावरण में अत्यंत महत्वपूर्ण खोजें की हैं। आजकल हमारे देश के दो प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ॰ एस. चंद्रशेखर और डॉ॰ जयंत विष्णु नारलीकर भी ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने में उलझे हुए हैं।

बहुत पहले कोपर्निकस, टाइको ब्राहे और मुख्यत: कैप्लर ने खगोल विद्या में महत्वपर्णू कार्य किया था। कैप्लर ने ग्रहों के गति के संबंध में जिन तीन नियमों का प्रतिपादन किया है वे ही खगोल भौतिकी की आधारशिला बने हुए हैं। खगोल विद्या में न्यूटन का कार्य बहुत महत्वपूर्ण रहा है।

ब्रह्मांड विद्या के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों (लगभग 45 वर्षों पूर्व) की खोजों के फलस्वरूप कुछ महत्वपूर्ण बातें समाने आई हैं। विख्यात वैज्ञानिक हबल ने अपने निरीक्षणों से ब्रह्मांडविद्या की एक नई प्रक्रिया का पता लगाया। हबल ने सुदूर स्थित आकाश गंगाओं से आनेवाले प्रकाश का परीक्षण किया और बताया कि पृथ्वी तक आने में प्रकाश तरंगों का कंपन बढ़ जाता है। यदि इस प्रकाश का वर्णपट प्राप्त करें तो वर्णपट का झुकाव लाल रंग की ओर अधिक होता है। इस प्रक्रिया को डोपलर प्रभाव कहते हैं। ध्वनि संबंधी डोपलर प्रभाव से बहुत लोग परिचित होंगे। जब हम प्रकाश के संदर्भ में डोपलर प्रभाव को देखते हैं तो दूर से आनेवाले प्रकाश का झुकाव नीले रंग की ओर होता है और दूर जाने वाले प्रकाश स्रोत के प्रकाश का झुकाव लाल रंग की ओर होता है। इस प्रकार हबल के निरीक्षणों से यह मालूम हुआ कि आकाश गंगाएँ हमसे दूर जा रही हैं। हबल ने यह भी बताया कि उनकी पृथ्वी से दूर हटने की गति, पृथ्वी से उनकी दूरी के अनुपात में है। माउंट पोलोमर वेधशाला में स्थित 200 इंच व्यासवाले लेंस की दूरबीन से खगोल शास्त्रियों ने आकाश गंगाओं के दूर हटने की प्रक्रिया को देखा है।

दूरबीन से ब्रह्मांड को देखने पर हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हम इस ब्रह्मांड के केंद्रबिंदु हैं और बाकी चीजें हमसे दूर भागती जा रही हैं। यदि अन्य आकाश गंगाओं में प्रेक्षक भेजे जाएँ तो वे भी यही पाएंगे कि इस ब्रह्मांड के केंद्र बिंदु हैं, बाकी आकाश गंगाएँ हमसे दूर भागती जा रही हैं। अब जो सही चित्र हमारे सामने आता है, वह यह है कि ब्रह्मांड का समान गति से विस्तार हो रहा है। और इस विशाल प्रारूप का कोई भी बिंदु अन्य वस्तुओं से दूर हटता जा रहा है।

हबल के अनुसंधान के बाद ब्रह्मांड के सिद्धांतों का प्रतिपादन आवश्यक हो गया था। यह वह समय था जब कि आइन्सटीन का सापेक्षवाद का सिद्धांत अपनी शैशवावस्था में था। लेकिन फिर भी आइन्सटीन के सिद्धांत को सौरमंडल संबंधी निरीक्षणों पर आधारित निष्कर्षों की व्याख्या करने में न्यूटन के सिद्धांतों से अधिक सफलता प्राप्त हुई थी। न्यूटन के अनुसार दो पिंडों के बीच की गुरु त्वाकर्षण शक्ति एक दूसरे पर तत्काल प्रभाव डालती है लेकिन आइन्सटीन ने यह साबित कर दिया कि पारस्परिक गुरु त्वाकर्षण की शक्ति की गति प्रकाश की गति के समान तीव्र नहीं हो सकती है। आखिर यहाँ पर आइन्सटीन ने न्यूटन के पत्र को गलत प्रमाणित किया। लोगों को आइन्सटीन का ही सिद्धांत पसंद आया। ब्रह्मांड की उत्पत्ति की तीन धारणाएँ प्रस्तुत हैं----

 

इन धारणाओं में दूसरी धारणा की महत्ता अधिक है। इस धारणा के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महापिंड के विस्फोट से हुई है और इसी कारण आकाश गंगाएँ हमसे दूर भागती जा रही है। इस ब्रह्मांड का उलटा चित्र आप अपने सामने रखिए तब आपको ब्रह्मांड प्रसारित न दिखाई देकर सकुंचित होता हुआ दिखाई देगा और आकाश गंगाएँ भागती हुई न दिखाई देकर आती हुई प्रतीत होगी। अत: कहने का तात्पर्य यह है कि किसी समय कोई महापिंड रहा होगा और उसी के विस्फोट होने के कारण आकाश गंगाएँ भागती हुई हमसे दूर जा रही हैं। क्वासर और पल्सर नामक नए तारों की खोज से भी विस्फोट सिद्धांत की पुष्टि हो रही है।




#Article 23: अर्थशास्त्र (ग्रन्थ) (2206 words)


अर्थशास्त्र, कौटिल्य या चाणक्य (चौथी शती ईसापूर्व) द्वारा रचित संस्कृत का एक ग्रन्थ है। इसमें राज्यव्यवस्था, कृषि, न्याय एवं राजनीति आदि के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है। अपने तरह का (राज्य-प्रबन्धन विषयक) यह प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसकी शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक (instructional) है।

यह प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके रचनाकार का व्यक्तिनाम विष्णुगुप्त, गोत्रनाम कौटिल्य (कुटिल से व्युत्पत्र) और स्थानीय नाम चाणक्य (पिता का नाम चणक होने से) था। अर्थशास्त्र (15.431) में लेखक का स्पष्ट कथन है: 

चाणक्य सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य (321-298 ई.पू.) के महामंत्री थे। उन्होंने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी। यह मुख्यत: सूत्रशैली में लिखा हुआ है और संस्कृत के सूत्रसाहित्य के काल और परंपरा में रखा जा सकता है। यह शास्त्र अनावश्यक विस्तार से रहित, समझने और ग्रहण करने में सरल एवं कौटिल्य द्वारा उन शब्दों में रचा गया है जिनका अर्थ सुनिश्चित हो चुका है। (अर्थशास्त्र, 15.6)'

अर्थशास्त्र में समसामयिक राजनीति, अर्थनीति, विधि, समाजनीति, तथा धर्मादि पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इस विषय के जितने ग्रंथ अभी तक उपलब्ध हैं उनमें से वास्तविक जीवन का चित्रण करने के कारण यह सबसे अधिक मूल्यवान् है। इस शास्त्र के प्रकाश में न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन होता है अपितु अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय का शमन भी होता है (अर्थशास्त्र, 15.431)।

इस ग्रंथ की महत्ता को देखते हुए कई विद्वानों ने इसके पाठ, भाषांतर, व्याख्या और विवेचन पर बड़े परिश्रम के साथ बहुमूल्य कार्य किया है। शाम शास्त्री और गणपति शास्त्री का उल्लेख किया जा चुका है। इनके अतिरिक्त यूरोपीय विद्वानों में हर्मान जाकोबी (ऑन दि अथॉरिटी ऑव कौटिलीय, इं.ए., 1918), ए. हिलेब्रांड्ट, डॉ॰ जॉली, प्रो॰ए.बी. कीथ (ज.रा.ए.सी.) आदि के नाम आदर के साथ लिए जा सकते हैं। अन्य भारतीय विद्वानों में डॉ॰ नरेन्द्रनाथ ला (स्टडीज इन ऐंशेंट हिंदू पॉलिटी, 1914), श्री प्रमथनाथ बनर्जी (पब्लिक ऐडमिनिस्ट्रेशन इन ऐंशेंट इंडिया), डॉ॰ काशीप्रसाद जायसवाल (हिंदू पॉलिटी), प्रो॰ विनयकुमार सरकार (दि पाज़िटिव बैकग्राउंड ऑव् हिंदू सोशियोलॉजी), प्रो॰ नारायणचंद्र वंद्योपाध्याय, डॉ॰ प्राणनाथ विद्यालंकार आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

यद्यपि कतिपय प्राचीन लेखकों ने अपने ग्रंथों में अर्थशास्त्र से अवतरण दिए हैं और कौटिल्य का उल्लेख किया है, तथापि यह ग्रंथ लुप्त हो चुका था। 1904 ई. में तंजोर के एक पंडित ने भट्टस्वामी के अपूर्ण भाष्य के साथ अर्थशास्त्र का हस्तलेख मैसूर राज्य पुस्तकालय के अध्यक्ष श्री आर. शाम शास्त्री को दिया। श्री शास्त्री ने पहले इसका अंशतः अंग्रेजी भाषान्तर 1905 ई. में इंडियन ऐंटिक्वेरी तथा मैसूर रिव्यू (1906-1909) में प्रकाशित किया। इसके पश्चात् इस ग्रंथ के दो हस्तलेख म्यूनिख लाइब्रेरी में प्राप्त हुए और एक संभवत: कलकत्ता में। तदनन्तर शाम शास्त्री, गणपति शास्त्री, यदुवीर शास्त्री आदि द्वारा अर्थशास्त्र के कई संस्करण प्रकाशित हुए। शाम शास्त्री द्वारा अंग्रेजी भाषान्तर का चतुर्थ संस्करण (1929 ई.) प्रामाणिक माना जाता है।

पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही भारत तथा पाश्चात्य देशों में हलचल-सी मच गई क्योंकि इसमें शासन-विज्ञान के उन अद्भुत तत्त्वों का वर्णन पाया गया, जिनके सम्बन्ध में भारतीयों को सर्वथा अनभिज्ञ समझा जाता था। पाश्चात्य विद्वान फ्लीट, जौली आदि ने इस पुस्तक को एक ‘अत्यन्त महत्त्वपूर्ण’ ग्रंथ बतलाया और इसे भारत के प्राचीन इतिहास के निर्माण में परम सहायक साधन स्वीकार किया।

ग्रंथ के अंत में दिए चाणक्यसूत्र (15.1) में अर्थशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार हुई है : 

इसके मुख्य विभाग हैं : 

इन अधिकरणों के अनेक उपविभाग (15 अधिकरण, 150 अध्याय, 180 उपविभाग तथा 6,000 श्लोक) हैं।

अर्थशास्त्र में समसामयिक राजनीति, अर्थनीति, विधि, समाजनीति, तथा धर्मादि पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इस विषय के जितने ग्रंथ अभी तक उपलब्ध हैं उनमें से वास्तविक जीवन का चित्रण करने के कारण यह सबसे अधिक मूल्यवान् है। इस शास्त्र के प्रकाश में न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन होता है अपितु अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय का शमन भी होता है (अर्थशास्त्र, 15.431)।

इस ग्रंथ की महत्ता को देखते हुए कई विद्वानों ने इसके पाठ, भाषांतर, व्याख्या और विवेचन पर बड़े परिश्रम के साथ बहुमूल्य कार्य किया है। शाम शास्त्री और गणपति शास्त्री का उल्लेख किया जा चुका है। इनके अतिरिक्त यूरोपीय विद्वानों में हर्मान जाकोबी (ऑन दि अथॉरिटी ऑव कौटिलीय, इं.ए., 1918), ए. हिलेब्रांड्ट, डॉ॰ जॉली, प्रो॰ ए.बी. कीथ (ज.रा.ए.सी.) आदि के नाम आदर के साथ लिए जा सकते हैं। अन्य भारतीय विद्वानों में डॉ॰ नरेंद्रनाथ ला (स्टडीज इन ऐंशेंट हिंदू पॉलिटी, 1914), श्री प्रेमथनाथ बनर्जी (पब्लिक ऐडमिनिस्ट्रेशन इन ऐंशेंट इंडिया), डॉ॰ काशीप्रसाद जायसवाल (हिंदू पॉलिटी), प्रो॰ विनयकुमार सरकार (दि पाज़िटिव बैकग्राउंड ऑव् हिंदू सोशियोलॉजी), प्रो॰ नारायणचंद्र वन्द्योपाध्याय, डॉ॰ प्राणनाथ विद्यालंकार आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

कौटिल्य का 'अर्थशास्त्र' राजनीतिक सिद्धांतों की एक महत्त्वपूर्ण कृति है। इस संबंध में यह प्रश्न उठता है कि कौटिल्य ने अपनी पुस्तक का नाम 'अर्थशास्त्र' क्यों रखा? प्राचीनकाल में 'अर्थशास्त्र' शब्द का प्रयोग एक व्यापक अर्थ में होता था। इसके अन्तगर्त मूलतः राजनीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कानून आदि का अध्ययन किया जाता था। आचार्य कौटिल्य की दृष्टि में राजनीति शास्त्र एक स्वतंत्र शास्त्र है और आन्वीक्षिकी (दर्शन), त्रयी (वेद) तथा वार्ता एंव कानून आदि उसकी शाखाएँ हैं। सम्पूर्ण समाज की रक्षा राजनीति या दण्ड व्यवस्था से होती है या रक्षित प्रजा ही अपने-अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकती है।

उस समय अर्थशास्त्र को राजनीति और प्रशासन का शास्त्र माना जाता था। महाभारत में इस संबंध में एक प्रसंग है, जिसमें अर्जुन को अर्थशास्त्र का विशेषज्ञ माना गया है।

निश्चित रूप से कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी राजशास्त्र के रूप में लिया गया होगा, यों उसने अर्थ की कई व्याख्याएँ की हैं। कौटिल्य ने कहा है— मनुष्याणां वृतिरर्थः (4) अर्थात् मनुष्यों की जीविका को 'अर्थ' कहते हैं। अर्थशास्त्र की व्याख्या करते हुए उसने कहा है—तस्या पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थ-शास्त्रमिति। (5) (मनुष्यों से युक्त भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है।) इस प्रकार यह भी स्पष्ट है कि 'अर्थशास्त्र' के अन्तर्गत राजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था दोनों से संबंधित सिद्धांतों का समावेश है। वस्तुतः कौटिल्य 'अर्थशास्त्र' को केवल राजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था का शास्त्र कहना उपयुक्त नहीं होगा। वास्तव में, यह अर्थव्यवस्था, राजव्यस्था, विधि व्यवस्था, समाज व्यवस्था और धर्म व्यवस्था से संबंधित शास्त्र है।

कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के पूर्व और भी कई अर्थशास्त्रों की रचना की गयी थी, यद्यपि उनकी पांडुलिपियाँ उपलब्ध नहीं हैं। भारत में प्राचीन काल से ही अर्थ, काम और धर्म के संयोग और सम्मिलन के लिए प्रयास किये जाते रहे हैं और उसके लिये शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों में विशद् चर्चाएँ की गयी हैं। कौटिल्य ने भी 'अर्थशास्त्र' में अर्थ, काम और धर्म की प्राप्ति के उपायों की व्याख्या की है। वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में भी अर्थ, धर्म और काम के संबंध में सूत्रों की रचना की गयी है।

अपने पूर्व अर्थशास्त्रों की रचना की बात स्वयं कौटिल्य ने भी स्वीकार किया है। अपने 'अर्थशास्त्र' में कई सन्दर्भों में उसने आचार्य वृहस्पति, भारद्वाज, शुक्राचार्य, पराशर, पिशुन, विशालाक्ष आदि आचार्यों का उल्लेख किया है। कौटिल्य के पूर्व अनेक आचार्यों के ग्रंथों का नामकरण दंडनीति के रूप में किया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कौटिल्य के पूर्व शास्त्र दंडनीति कहे जाते थे और वे अर्थशास्त्र के समरूप होते थे। परन्तु जैसा कि अनेक विद्वानों ने स्वीकार किया है कि दंडनीति और अर्थशास्त्र दोनों समरूप नहीं हैं। यू. एन. घोषाल के कथनानुसार अर्थशास्त्र ज्यादा व्यापक शास्त्र है, जबकि दंडनीति मात्र उसकी शाखा है। (6)

कौटिल्य के पाश्चात् लिखे गये शास्त्र नीतिशास्त्र के नाम से विख्यात हुए, जैसे कामंदक नीतिसार। वैसे कई विद्वानों ने अर्थशास्त्र को नीतिशास्त्र की अपेक्षा ज्यादा व्यापक माना है। परन्तु, अधिकांश विद्वानों की राय में नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों समरूप हैं तथा दोनों के विषय क्षेत्र भी एक ही हैं। स्वयं कामंदक ने नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र को समरूप माना है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के पूर्व और उसके बाद भी 'अर्थशास्त्र' जैसे शास्त्रों की रचना की गयी।

इस संबंध में ऐसे विद्वानों की अच्छी-खासी संख्या है जो यह मानते हैं कि कौटिल्य 'अर्थशास्त्र' का रचनाकार नहीं था। ऐसे विद्वानों में पाश्चात्य विद्वानों की संख्या ज्यादा है। स्टेन, जॉली, विंटरनीज व कीथ इस प्रकार के विचार के प्रतिपादक हैं। भारतीय विद्वान आर. जी. भण्डारकर ने भी इसका समर्थन किया है। भंडारकर ने कहा है कि पतंजलि ने महाभाष्य में कौटिल्य का उल्लेख नहीं किया है। 'अर्थशास्त्र' के रचयिता के रूप में कौटिल्य को नहीं मान्यता देनेवालों ने अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये हैं—

पुस्तक की समाप्ति पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है-

साथ ही यह भी लिखा गया है:

विष्णु पुराण में इस घटना की चर्चा इस तरह की गई है: 

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि विष्णुगुप्त और कौटिल्य एक ही व्यक्ति थे। ‘अर्थशास्त्र’ में ही द्वितीय अधिकरण के दशम अध्याय के अन्त में पुस्तक के रचयिता का नाम ‘कौटिल्य’ बताया गया है:

पुस्तक के आरम्भ में ‘कौटिल्येन कृतं शास्त्रम्’ तथा प्रत्येक अध्याय के अन्त में ‘इति कौटिलीयेऽर्थशास्त्रे’ लिखकर ग्रन्थकार ने अपने ‘कौटिल्य नाम को अधिक विख्यात किया है। जहां-जहां अन्य आचार्यों के मत का प्रतिपादन किया है, अन्त में ‘इति कौटिल्य’ अर्थात् कौटिल्य का मत है-इस तरह कहकर कौटिल्य नाम के लिए अपना अधिक पक्षपात प्रदर्शित किया है।

परन्तु यह सर्वथा निर्विवाद है कि विष्णुगुप्त तथा कौटिल्य अभिन्न व्यक्ति थे। उत्तरकालीन दण्डी कवि ने इसे आचार्य विष्णुगुप्त नाम से यदि कहा है, तो बाणभट्ट ने इसे ही कौटिल्य नाम से पुकारा है। दोनों का कथन है कि इस आचार्य ने ‘दण्डनीति’ अथवा ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की।

पंचतन्त्र में इसी आचार्य का नाम चाणक्य दिया गया है, जो अर्थशास्त्र का रचयिता है। कवि विशाखदत्त-प्रणीत सुप्रसिद्ध नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में चाणक्य को कभी कौटिल्य तथा कभी विष्णुगुप्त नाम से सम्बोधित किया गया है।

जैसे ऊपर कहा गया है, इसका मुख्य विषय शासन-विधि अथवा शासन-विज्ञान है: ‘‘कौटिल्येन नरेन्द्रार्थे शासनस्य विधि: कृत:।’’ (कौटिल्य ने राजाओं के लिये शासन विधि की रचना की है।) इन शब्दों से स्पष्ट है कि आचार्य ने इसकी रचना राजनीति-शास्त्र तथा विशेषतया शासन-प्रबन्ध की विधि के रूप में की। अर्थशास्त्र की विषय-सूची को देखने से (जहां अमात्योत्पत्ति, मन्त्राधिकार, दूत-प्रणिधि, अध्यक्ष-नियुक्ति, दण्डकर्म, षाड्गुण्यसमुद्देश्य, राजराज्ययो: व्यसन-चिन्ता, बलोपादान-काल, स्कन्धावार-निवेश, कूट-युद्ध, मन्त्र-युद्ध इत्यादि विषयों का उल्लेख है) यह सर्वथा प्रमाणित हो जाता है कि इसे आजकल कहे जाने वाले अर्थशास्त्र (इकोनोमिक्स) की पुस्तक कहना भूल है। प्रथम अधिकरण के प्रारम्भ में ही स्वयं आचार्य ने इसे 'दण्डनीति' नाम से सूचित किया है।

शुक्राचार्य ने दण्डनीति को इतनी महत्त्वपूर्ण विद्या बतलाया है कि इसमें अन्य सब विद्याओं का अन्तर्भाव मान लिया है- क्योंकि शस्त्रेण रक्षिते देशे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते की उक्ति के अनुसार शस्त्र (दण्ड) द्वारा सुशासित तथा सुरक्षित देश में ही वेद आदि अन्य शास्त्रों की चिन्ता या अनुशीलन हो सकता है। अत: दण्डनीति को अन्य सब विद्याओं की आधारभूत विद्या के रूप में स्वीकार करना आवश्यक है और वही दण्डनीति अर्थशास्त्र है।

जिसे आजकल अर्थशास्त्र (economics) कहा जाता है, उसके लिए वार्ता शब्द का प्रयोग किया गया है, यद्यपि यह शब्द पूर्णतया अर्थशास्त्र का द्योतक नहीं। कौटिल्य ने वार्ता के तीन अंग कहे हैं - कृषि, वाणिज्य तथा पशु-पालन, जिनसे प्राय: वृत्ति या जीविका का उपार्जन किया जाता था। मनु, याज्ञवल्क्य आदि शास्त्रकारों ने भी इन तीन अंगों वाले वार्ताशास्त्र को स्वीकार किया है। पीछे शुक्राचार्य ने इस वार्ता में कुसीद (बैंकिग) को भी वृत्ति के साधन-रूप में सम्मिलित कर दिया है। परन्तु अर्थशास्त्र को सभी शास्त्रकारों ने दण्डनीति, राजनीति अथवा शासनविज्ञान के रूप में ही वर्णित किया है। अत: ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ को राजनीति की पुस्तक समझना ही ठीक होगा न कि सम्पत्तिशास्त्र की पुस्तक। वैसे इसमें कहीं-कहीं सम्पत्तिशास्त्र के धनोत्पादन, धनोपभोग तथा धन-विनिमय, धन-विभाजन आदि विषयों की भी प्रासंगिक चर्चा की गई है।

अर्थात्-प्राचीन आचार्यों ने पृथ्वी जीतने और पालन के उपाय बतलाने वाले जितने अर्थशास्त्र लिखे हैं, प्रायः उन सबका सार लेकर इस एक अर्थशास्त्र का निर्माण किया गया है।

यह उद्धरण अर्थशास्त्र के विषय को जहां स्पष्ट करता है, वहां इस सत्य को भी प्रकाशित करता है कि ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ से पूर्व अनेक आचार्यों ने अर्थशास्त्र की रचनाएं कीं, जिनका उद्देश्य पृथ्वी-विजय तथा उसके पालन के उपायों का प्रतिपादन करना था। उन आचार्यों तथा उनके सम्प्रदायों के कुछ नामों का निर्देशन ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में किया गया है, यद्यपि उनकी कृतियां आज उपलब्ध भी नहीं होतीं। ये नाम निम्नलिखित है:

अर्थशास्त्र के इन दस सम्प्रदायों के आचार्यों में प्राय: सभी के सम्बन्ध में कुछ-न-कुछ ज्ञात है, परन्तु विशालाक्ष के बारे में बहुत कम परिचय प्राप्त होता है। इन नामों से यह तो अत्यन्त स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र नीतिशास्त्र के प्रति अनेक महान विचारकों तथा दार्शनिकों का ध्यान गया और इस विषय पर एक उज्जवल साहित्य का निर्माण हुआ। आज वह साहित्य लुप्त हो चुका है। अनेक विदेशी आक्रमणों तथा राज्यक्रान्तियों के कारण इस साहित्य का नाम-मात्र शेष रह गया है, परन्तु जितना भी साहित्य अवशिष्ट है वह एक विस्तृत अर्थशास्त्रीय परम्परा का संकेत करता है।

इस अर्थशास्त्र में एक ऐसी शासन-पद्धति का विधान किया गया है जिसमें राजा या शासक प्रजा का कल्याण सम्पादन करने के लिए शासन करता है। राजा स्वेच्छाचारी होकर शासन नहीं कर सकता। उसे मन्त्रिपरिषद् की सहायता प्राप्त करके ही प्रजा पर शासन करना होता है। राज्य-पुरोहित राजा पर अंकुश के समान है, जो धर्म-मार्ग से च्युत होने पर राजा का नियन्त्रण कर सकता है और उसे कर्तव्य-पालन के लिए विवश कर सकता है।

सर्वलोकहितकारी राष्ट्र का जो स्वरूप कौटिल्य को अभिप्रेत है, वह ‘अर्थशास्त्र’ के निम्नलिखित वचन से स्पष्ट है-

अर्थात्-प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजाके हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय (स्वार्थ) कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।

सोमदेव सूरि का नीतिवाक्यामृत, हेमचन्द्र का लघु अर्थनीति, भोज का युक्तिकल्पतरु, शुक्र का शुक्रनीति आदि कुछ दूसरे सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्र हैं, जिनको नीतिशास्त्र के व्यावहारिक पक्ष की व्याख्या करने वाले ग्रन्थों के अन्तर्गत भी गिना जा सकता है। चाणक्यनीतिदर्पण, नीतिश्लोकों का अव्यवस्थित संग्रह है।




#Article 24: भूगोल (2577 words)


भूगोल (Geography) वह शास्त्र है जिसके द्वारा पृथ्वी के ऊपरी स्वरुप और उसके प्राकृतिक विभागों (जैसे पहाड़, महादेश, देश, नगर, नदी, समुद्र, झील, डमरुमध्य, उपत्यका, अधित्यका, वन आदि) का ज्ञान होता है। प्राकृतिक विज्ञानों के निष्कर्षों के बीच कार्य-कारण संबंध स्थापित करते हुए पृथ्वीतल की विभिन्नताओं का मानवीय दृष्टिकोण से अध्ययन ही भूगोल का सार तत्व है। पृथ्वी की सतह पर जो स्थान विशेष हैं उनकी समताओं तथा विषमताओं का कारण और उनका स्पष्टीकरण भूगोल का निजी क्षेत्र है। भूगोल शब्द दो शब्दों भू यानि पृथ्वी और गोल से मिलकर बना है।

भूगोल एक ओर अन्य श्रृंखलाबद्ध विज्ञानों से प्राप्त ज्ञान का उपयोग उस सीमा तक करता है जहाँ तक वह घटनाओं और विश्लेषणों की समीक्षा तथा उनके संबंधों के यथासंभव समुचित समन्वय करने में सहायक होता है। दूसरी ओर अन्य विज्ञानों से प्राप्त जिस ज्ञान का उपयोग भूगोल करता है, उसमें अनेक व्युत्पत्तिक धारणाएँ एवं निर्धारित वर्गीकरण होते हैं। यदि ये धारणाएँ और वर्गीकरण भौगोलिक उद्देश्यों के लिये उपयोगी न हों, तो भूगोल को निजी व्युत्पत्तिक धारणाएँ तथा वर्गीकरण की प्रणाली विकसित करनी होती है। अत: भूगोल मानवीय ज्ञान की वृद्धि में तीन प्रकार से सहायक होता है:

सर्वप्रथम प्राचीन यूनानी विद्वान इरैटोस्थनिज़ ने भूगोल को धरातल के एक विशिष्टविज्ञान के रूप में मान्यता दी। इसके बाद हिरोडोटस तथा रोमन विद्वान स्ट्रैबो तथा क्लाडियस टॉलमी ने भूगोल को सुनिइतिहासश्चित स्वरुप प्रदान किया। इस प्रकार भूगोल में 'कहाँ' 'कैसे 'कब' 'क्यों' व 'कितनें' प्रश्नों की उचित व्याख्या की जाती हैं।

भूगोल शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-भू+गोल। यहाँ भू शब्द का तात्पर्य पृथ्वी🌎 और गोल शब्द का तात्पर्य उसके गोल आकार से है।

 

भूगोल एक प्राचीनतम विज्ञान है और इसकी नींव प्रारंभिक यूनानी विद्वानों के कार्यों में दिखाई पड़ती है। भूगोल शब्द का प्रथम प्रयोग यूनानी विद्वान इरेटॉस्थनीज ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में किया था। भूगोल विस्तृत पैमाने पर सभी भौतिक व मानवीय तथ्यों की अन्तर्क्रियाओं और इन अन्तर्क्रियाओं से उत्पन्न स्थलरूपों का अध्ययन करता है। यह बताता है कि कैसे, क्यों और कहाँ मानवीय व प्राकृतिक क्रियाकलापों का उद्भव होता है और कैसे ये क्रियाकलाप एक दूसरे से अन्तर्संबंधित हैं।

भूगोल की अध्ययन विधि परिवर्तित होती रही है। प्रारंभिक विद्वान वर्णनात्मक भूगोलवेत्ता थे। बाद में, भूगोल विश्लेषणात्मक भूगोल के रूप में विकसित हुआ। आज यह विषय न केवल वर्णन करता है, बल्कि विश्लेषण के साथ-साथ भविष्यवाणी भी करता है। 

यह काल 15वीं सदी के मध्य से शुरू होकर 18वीं सदी के पूर्व तक चला। यह काल आरंभिक भूगोलवेत्ताओं की खोजों और अन्वेषणों द्वारा विश्व की भौतिक व सांस्कृतिक प्रकृति के बारे में वृहत ज्ञान प्रदान करता है। 17वीं सदी का प्रारंभिक काल नवीन 'वैज्ञानिक भूगोल' की शुरूआत का गवाह बना। कोलम्बस, वास्कोडिगामा, मैगलेन और थॉमस कुक इस काल के प्रमुख अन्वेषणकर्त्ता थे। वारेनियस, कान्ट, हम्बोल्ट और रिटर इस काल के प्रमुख भूगोलवेत्ता थे। इन विद्वानों ने मानचित्रकला के विकास में योगदान दिया और नवीन स्थलों की खोज की, जिसके फलस्वरूप भूगोल एक वैज्ञानिक विषय के रूप में विकसित हुआ।

रिटर और हम्बोल्ट का उल्लेख बहुधा आधुनिक भूगोल के संस्थापक के रूप में किया जाता है। सामान्यतः 19वीं सदी के उत्तरार्ध का काल आधुनिक भूगोल का काल माना जाता है। वस्तुतः रेट्जेल प्रथम आधुनिक भूगोलवेत्ता थे, जिन्होंने चिरसम्मत भूगोलवेत्ताओं द्वारा स्थापित नींव पर आधुनिक भूगोल की संरचना का निर्माण किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भूगोल का विकास बड़ी तीव्र गति से हुआ। हार्टशॉर्न जैसे अमेरिकी और यूरोपीय भूगोलवेत्ताओं ने इस दौरान अधिकतम योगदान दिया। हार्टशॉर्न ने भूगोल को एक ऐसे विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जो क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन करता है। वर्तमान भूगोलवेत्ता प्रादेशिक उपागम और क्रमबद्ध उपागम को विरोधाभासी की जगह पूरक उपागम के रूप में देखते हैं।

भूगोल ने आज विज्ञान का दर्जा प्राप्त कर लिया है, सचिन भोजाकोर जो पृथ्वी तल पर उपस्थित विविध प्राकृतिक और सांस्कृतिक रूपों की व्याख्या करता है। भूगोल एक समग्र और अन्तर्सम्बंधित क्षेत्रीय अध्ययन है जो स्थानिक संरचना में भूत से भविष्य में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन करता है। इस तरह भूगोल का क्षेत्र विविध विषयों जैसे सैन्य सेवाओं, पर्यावरण प्रबंधन, जल संसाधन, आपदा प्रबंधन, मौसम विज्ञान, नियोजन और विविध सामाजिक विज्ञानों में है। इसके अलावा भूगोलवेत्ता दैनिक जीवन से सम्बंधित घटनाओं जैसे पर्यटन, स्थान परिवर्तन, आवासों तथा स्वास्थ्य सम्बंधी क्रियाकलापों में सहायक हो सकता है

विद्वानों ने भूगोल के तीन मुख्य विभाग किए हैं- गणितीय भूगोल, भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल। पहले विभाग में पृथ्वी का सौर जगत के अन्यान्य ग्रहों और उपग्रहों आदि से संबंध बतलाया जाता है और उन सबके साथ उसके सापेक्षिक संबंध का वर्णन होता है। इस विभाग का बहुत कुछ संबंध गणित ज्योतिष से भी है। दूसरे विभाग में पृथ्वी के भौतिक रूप का वर्णन होता है और उससे यह जाना जाता है कि नदी, पहाड़, देश, नगर आदि किसे कहते है और अमुक देश, नगर, नदी या पहाड़ आदि कहाँ हैं। साधारणतः भूगोल से उसके इसी विभाग का अर्थ लिया जाता है। भूगोल का तीसरा विभाग मानव भूगोल है जिसके अन्तर्गत राजनीतिक भूगोल भी आता है जिसमें इस बात का विवेचन होता है कि राजनीति, शासन, भाषा, जाति और सभ्यता आदि के विचार से पृथ्वी के कौन विभाग है और उन विभागों का विस्तार और सीमा आदि क्या है।

एक अन्य दृष्टि से भूगोल के दो प्रधान अंग है : शृंखलाबद्ध भूगोल तथा प्रादेशिक भूगोल। पृथ्वी के किसी स्थानविशेष पर शृंखलाबद्ध भूगोल की शाखाओं के समन्वय को केंद्रित करने का प्रतिफल प्रादेशिक भूगोल है।
 	
भूगोल एक प्रगतिशील विज्ञान है। प्रत्येक देश में विशेषज्ञ अपने अपने क्षेत्रों का विकास कर रहे हैं। फलत: इसकी निम्नलिखित अनेक शाखाएँ तथा उपशाखाएँ हो गई है :

आर्थिक भूगोल-- इसकी शाखाएँ कृषि, उद्योग, खनिज, शक्ति तथा भंडार भूगोल और भू उपभोग, व्यावसायिक, परिवहन एवं यातायात भूगोल हैं। अर्थिक संरचना संबंधी योजना भी भूगोल की शाखा है।

राजनीतिक भूगोल -- इसके अंग भूराजनीतिक शास्त्र, अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, औपनिवेशिक भूगोल, शीत युद्ध का भूगोल, सामरिक एवं सैनिक भूगोल हैं।

ऐतिहासिक भूगोल --प्राचीन, मध्यकालीन, आधुनिक वैदिक, पौराणिक, इंजील संबंधी तथा अरबी भूगोल भी इसके अंग है।

रचनात्मक भूगोल-- इसके भिन्न भिन्न अंग रचना मिति, सर्वेक्षण आकृति-अंकन, चित्रांकन, आलोकचित्र, कलामिति (फोटोग्रामेटरी) तथा स्थाननामाध्ययन हैं।

इसके अतिरिक्त भूगोल के अन्य खंड भी विकसित हो रहे हैं जैसे ग्रंथ विज्ञानीय, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, गणित शास्त्रीय, ज्योतिष शास्त्रीय एवं भ्रमण भूगोल तथा स्थाननामाध्ययन हैं।

भौतिक भूगोल -- इसके भिन्न भिन्न शास्त्रीय अंग स्थलाकृति, हिम-क्रिया-विज्ञान, तटीय स्थल रचना, भूस्पंदनशास्त्र, समुद्र विज्ञान, वायु विज्ञान, मृत्तिका विज्ञान, जीव विज्ञान, चिकित्सा या भैषजिक भूगोल तथा पुरालिपि शास्त्र हैं।

पृथ्वी पर 7 महाद्वीप हैं: एशिया, यूरोप, अफ्रीका, उत्तरी अमरीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका। 

पृथ्वी पर 5 महासागर हैं: अटलांटिक महासागर, आर्कटिक महासागर,हिंद महासागर, प्रशान्त महासागर |
दक्षिण महासागर 
स्थलाकृति विज्ञान - 

शैल - (1) आग्नेय शैल (2) कायांतरित शैल (3) अवसादी शैल |

वायुमण्डल, ऋतु, तापमान, गर्मी, उष्णता, क्षय ऊष्मा, आर्द्रता |

मानव भूगोल, भूगोल की वह शाखा है जो मानव समाज के क्रियाकलापों और उनके परिणाम स्वरूप बने भौगोलिक प्रतिरूपों का अध्ययन करता है। इसके अन्तर्गत मानव के राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक तथा आर्थिक पहलू आते हैं।
मानव भूगोल को अनेक श्रेणियों में बांटा जा सकता है, जैसे:'

इतिहास के भिन्न कालों में भूगोल को विभिन्न रूपों में परिभाषित किया गया है। प्राचीन यूनानी विद्वानों ने भौगोलिक धारणाओं को दो पक्षों में रखा था-

भूगोल में प्रादेशिक उपागम का उद्भव भी भूगोल की वर्णनात्मक प्रकृति पर बल देता है। हम्बोल्ट के अनुसार, भूगोल प्रकृति से सम्बंधित विज्ञान है और यह पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी साधनों का अध्ययन व वर्णन करता है।

हेटनर और हार्टशॉर्न पर आधारित भूगोल की तीन मुख्य शाखाएँ है : भौतिक भूगोल, मानव भूगोल और प्रादेशिक भूगोल। भौतिक भूगोल में प्राकृतिक परिघटनाओं का उल्लेख होता है, जैसे कि जलवायु विज्ञान, मृदा और वनस्पति। मानव भूगोल भूतल और मानव समाज के सम्बंधों का वर्णन करता है। भूगोल एक अन्तरा-अनुशासनिक विषय है।

भूगोल का गणित, प्राकृतिक विज्ञानों और सामाजिक विज्ञानों के साथ घनिष्ठ सम्बंध है। जबकि अन्य विज्ञान विशिष्ट प्रकार की परिघटनाओं का ही वर्णन करते हैं, भूगोल विविध प्रकार की उन परिघटनाओं का भी अध्ययन करता है, जिनका अध्ययन अन्यविज्ञानों में भी शामिल होता है। इस प्रकार भूगोल ने स्वयं को अन्तर्सम्बंधित व्यवहारों के संश्लेषित अध्ययन के रूप में स्थापित किया है। 

भूगोल स्थानों का विज्ञान है। भूगोल प्राकृतिक व सामाजिक दोनों ही विज्ञान है, जोकि मानव व पर्यावरण दोनों का ही अध्ययन करता है। यह भौतिक व सांस्कृतिक विश्व को जोड़ता है। भौतिक भूगोल पृथ्वी की व्यवस्था से उत्पन्न प्राकृतिक पर्यावरणका अध्ययन करता है। मानव भूगोल राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और जनांकिकीय प्रक्रियाओं से सम्बंधित है। यह संसाधनों के विविध प्रयोगों से भी सम्बंधित है। प्रारंभिक भूगोल सिर्फ स्थानों का वर्णन करता था। हालाँकि यह आज भी भूगोल के अध्ययन में शामिल है परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इसके प्रतिरूपों के वर्णन में परिवर्तन हुआ है। भौगोलिक परिघटनाओंं का वर्णन सामान्यतः दो उपागमों के आधार पर किया जाता है जैसे (१) प्रादेशिक और (२) क्रमबद्ध। प्रादेशिक उपागम प्रदेशों के निर्माण व विशेषताओं की व्याख्या करता है। यह इस बात का वर्णन करने का प्रयास करता है कि कोई क्षेत्र कैसे और क्यों एक दूसरे से अलग है। प्रदेश भौतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, जनांकिकीय आदि हो सकता है। क्रमबद्ध उपागम परिघटनाओं तथा सामान्य भौगोलिक महत्वों के द्वारा संचालित है। प्रत्येक परिघटना का अध्ययन क्षेत्रीय विभिन्नताओं व दूसरे के साथ उनके संबंधों का अध्ययन भूगोल आधार पर किया जाता है।

भूगोल की प्रायः सभी शाखाओं विशेष रूप से भौतिक भूगोल की शाखाओं में तथ्यों के विश्लेषण में गणितीय विधियों का प्रयोग किया जाता है। 

खगोल विज्ञान में आकाशीय पिण्डों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। भूतल की घटनाओं और तत्वों पर आकाशीय पिण्डों - सूर्य, चंद्रमा, धूमकेतुओं आदि का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है। इसीलिए भूगोल में सौरमंडल, सूर्य का अपने आभासी पथ पर गमन, पृथ्वी की दैनिक और वार्षि गतियों तथा उनके परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों - दिन-रात और ऋतु परिवर्तन, चन्द्र कलाओं, सूर्य ग्रहण, चन्द्रगहण आदि का अध्ययन किया जाता है। इन तत्वों और घटनाओं का मौलिक अध्ययन खगोल विज्ञान में किया जाता है। इस प्रकार भूगोल का खगोल विज्ञान से घनिष्ट संबंध परिलक्षित होता है।

भू-विज्ञान पृथ्वी के संगठन, संरचना तथा इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन सं संबंधित है। इसके अंतर्गत पृथ्वी के संघठक पदार्थों, भूतल पर क्रियाशील शक्तियों तथा उनसे उत्पन्न संरचनाओं, भूपटल की शैलें की संरचना एवं वितरण, पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक कालों आदि का अध्ययन सम्मिलित होता है। भूगोल में स्थलरूपों के विश्लेषण में भूविज्ञान के सिद्धान्तों तथा साक्ष्यों का सहारा लिया जाता है। इस प्रकार भौतिक भूगोल विशेषतः भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) का भू-विज्ञान से अत्यंत घनिष्ट संबंध है। 

भूतल को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारकों में जलवायु सर्वाधिक प्रभावशाली और महत्वपूर्ण कारक है। मौसम विज्ञान वायुमण्डल विशेषतः उसमें घटित होने वाले भौतिक प्रक्रमों तथा उससे सम्बद्ध स्थलमंडल और जलमंडल के विविध प्रक्रमों का अध्ययन करता है। इसके अंतर्गत वायुदाब, तापमान, पवन, आर्द्रता, वर्षण, मेघाच्छादन, सूर्य प्रकाश आदि का अध्ययन किया जाता है। मौसम विज्ञान के इन तत्वों का विश्लेषण भूगोल में भी किया जाता है।

जल विज्ञान पृथ्वी पर स्थित जल के अध्ययन से संबंधित है। इसके साथ ही इसमें जल के अन्वेषण, प्रयोग, नियंत्रण और संरक्षण का अध्यन भी समाहित होता है। महासारीय तत्वों के स्थानिक वितरण का अध्ययन भूगोल की एक शखा समुद्र विज्ञन (Oceanography) में किया जाता है। समद्र विज्ञान में महसागयी जल केकर पशुओं के पीने, फसलों की सिंचई करने, काखानों में जलापूर्ति, जशक्ति, जल रिवहन, मत्स्यखेट आदि विभिन्न रूपों में जल आवश्यक ही नहीं अनवर्य होता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि भूगोल और जल विज्ञान में अत्यंत निकट का और घनिष्ट संबंध है।

मृदा विज्ञान (Pedology or soil science) मिट्टी के निर्माण, संरचना और विशेषता का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। भूतल पर मिट्टियों के वितरण का अध्ययन मृदा भूगोल  (Pedogeogaphy or Soil Geography) के अंतर्गत किया जाता है। मिट्टी का अध्ययन कृषि भूगोल का भी महत्वपूर्ण विषय है। इस प्रकार भूगोल की घनिष्टता मृदा विज्ञान से भी पायी जाती है। 

पेड़-पौधों का मानव जीवन से गहरा संबंध है। वनस्पति विज्ञान पादप जीवन (Plant life) और उसके संपूर्ण विश्व रूपों का वैज्ञानिक अध्यय करता है। प्राकृतिक वनस्पतियों के स्थानिक वितरण और विशेषताओं का विश्लेषण भौतिक भूगोल की शाखा जैव भूगोल  (Biogeography) और उपशाखा वनस्पति या पादप भूगोल  (Plant Geography) में की जाती है।

जन्तु विज्ञान या प्राणि समस्त प्रकार के प्राणि जीवन की संरचना, वर्गीकरण तथा कार्यों का वैज्ञानिक अध्ययन है। मनुष्य के लिए जन्तु जगत् और पशु संसाधन (Animal resource) का अत्यधिक महत्व है। पशु मनुष्य के लिए बहु-उपयोगी हैं। मनुष्य को पशुओं से अनेक उपयोगी पदार्थ यथा दूध, मांस, ऊन, चमड़ा आदि प्राप्त होते हैं और कुछ पशुओं का प्रयोग सामान ढोने और परिवहन या सवारी करने के लिए भी किया जाता है। जैव भूगोल की एक उप-शाखा है जंतु भूगोल  (Animal Geography) जिसमें विभिन्न प्राणियों के स्थानिक वितरण और विशेषताओं का विश्लेषण किया जाता है। मानव जीवन के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में पशु जगत का महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण इसको भौगोलिक अध्ययनों में भी विशिष्ट स्थान प्राप्त है। अतः भूगोल का जन्तु विज्ञान से भी घनिष्ट संबंध प्रमाणित होता है। 

भोजन, वस्त्र और आश्रय मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएं हैं जो किसी भी देश, काल या परिस्थिति में प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य होती हैं। इसके साथ ही मानव या मानव समूह की अन्यान्य सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि आवश्यकताएं भी होती हैं जो बहुत कुछ अर्थव्यवस्था पर आधारित होती हैं। अर्थव्यवस्था (economy) का अध्ययन करना अर्थशास्त्र का मूल विषय है। किसी स्थान, क्षेत्र या जनसमुदाय के समस्त जीविका स्रोतों या आर्थिक संसाधनों के प्रबंध, संगठन तथा प्रशासन को ही अर्थव्यवस्था कहते हैं। विविध आर्थिक पक्षों  स्थानिक अध्ययन भूगोल की एक विशिष्ट शाखा आर्थिक भूगोल में किया जाता है।

समाजशास्त्र मनुष्यों के सामाजिक जीवन, व्यवहार तथा सामाजिक क्रिया का अध्ययन है जिसमें मानव समाज की उत्पत्ति, विकास, संरचना तथा सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन सम्मिलित होता है। समाजशास्त्र मानव समाज के विकास, प्रवृत्ति तथा नियमों की वैज्ञानिक व्याख्या करता है। समस्त मानव समाज अनेक वर्गों, समूहों तथा समुदायों में विभक्त है जिसके अपने-अपने रीति-रिवाज, प्रथाएं, परंपराएं तथा नियम होते हैं जिन पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव निश्चित रूप से पाया जाता है। अतः समाजशास्त्रीय अध्ययनों में भौगोलिक ज्ञान आवश्यक होता है।

मानव भूगोल मानव सभ्यता के इतिहास तथा मानव समाज के विकास का अध्ययन भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में करता है। किसी भी देश या प्रदेश के इतिहास पर वहां के भौगोलिक पर्यावरण तथा परिस्थितियों का गहरा प्रभाव पाया जाता है। प्राकृतिक तथा मानवीय या सांस्कृतिक तथ्य का विश्लेषण विकासात्मक दृष्टिकोण से करते हैं तब मनुष्य और पृथ्वी के परिवर्तनशील संबंधों का स्पष्टीकरण हो जाता है। किसी प्रदेश में जनसंख्या, कृषि, पशुपालन, खनन, उद्योग धंधों, परिवहन के साधनों, व्यापारिक एवं वाणिज्कि संस्थाओं आदि के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन मानव भूगोल में किया जाता है जिसके लिए उपयुक्त साक्ष्य और प्रमाण इतिहास से ही प्राप्त होते हैं।

राजनीति विज्ञान के अध्ययन का केन्द्र बिन्दु ‘शासन व्यवस्था’ है। इसमें विभिनन राष्ट्रों एवं राज्यों की शासन प्रणालियों, सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों आदि का अध्ययन किया जाता है। राजनीतिक भूगोल मानव भूगोल की एक शाखा है जिसमें राजनीतिक रूप से संगठित क्षेत्रों की सीमा, विस्तार, उनके विभिनन घटकों, उप-विभागों, शासित भू-भागों, संसाधनों, आंतरिक तथा विदेशी राजनीतिक संबंधों आदि का अध्ययन सम्मिलित होता है। मानव भूगोल की एक अन्य शाखा भूराजनीति (Geopolitics) भी है जिसके अंतर्गत भूतल के विभिन्न प्रदेशों की राजनीतिक प्रणाली विशेष रूप से अंतर्राष्टींय राजनीति पर भौगोलिक कारकों के प्रभाव की व्याख्या की जाती है। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भूगोल और राजनीति विज्ञान परस्पर घनिष्ट रूप से संबंधित हैं। 

जनांकिकी या जनसांख्यिकी के अंतर्गत जनसंख्या के आकार, संरचना, विकास आदि का परिमाणात्मक अध्ययन किया जाता है। इसमें जनसंख्या संबंधी आंकड़ों के एकत्रण, वर्गीकरण, मूल्यांकन, विश्लेषण तथा प्रक्षेपण के साथ ही जनांकिकीय प्रतिरूपों तथा प्रक्रियाओं की भी व्याख्या की जाती है। मानव भूगोल और उसकी उपशाखा जनसंख्या भूगोल में भौगोलिक पर्यावरण के संबंध में जनांकिकीय प्रक्रमों तथा प्रतिरूपों में पायी जाने वाली क्षेत्रीय भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार विषय सादृश्य के कारण भूगोल और जनांकिकी में घनिष्ट संबंध पाया जाता है। 




#Article 25: इतिहास (1976 words)


 का प्रयोग विशेषत: दो अर्थों में किया जाता है। एक है प्राचीन अथवा विगत काल की घटनाएँ और दूसरा उन घटनाओं  के विषय में धारणा  इतिहास शब्द (इति + ह + आस ; अस् धातु, लिट् लकार अन्य पुरुष तथा एक वचन) का तात्पर्य है यह निश्चय था। ग्रीस के लोग इतिहास के लिए हिस्तरी (history) शब्द का प्रयोग करते थे। हिस्तरी का शाब्दिक अर्थ बुनना था। अनुमान होता है कि ज्ञात घटनाओं को व्यवस्थित ढंग से बुनकर ऐसा चित्र उपस्थित करने की कोशिश की जाती थी जो सार्थक और सुसंबद्ध हो।
इस प्रकार इतिहास शब्द का अर्थ है - परंपरा से प्राप्त उपाख्यान समूह (जैसे कि लोक कथाएँ), वीरगाथा (जैसे कि महाभारत) या ऐतिहासिक साक्ष्य। इतिहास के अंतर्गत हम जिस विषय का अध्ययन करते हैं उसमें अब तक घटित घटनाओं या उससे संबंध रखनेवाली घटनाओं का कालक्रमानुसार वर्णन होता है। दूसरे शब्दों में मानव की विशिष्ट घटनाओं का नाम ही इतिहास है। या फिर प्राचीनता से नवीनता की ओर आने वाली, मानवजाति से संबंधित घटनाओं का वर्णन इतिहास है। इन घटनाओं व ऐतिहासिक साक्ष्यों को तथ्य के आधार पर प्रमाणित किया जाता है।

यह शब्द यूनानी / ग्रीक भाषा के शब्द HISTORIA  से बना है जिसका मतलब होता है - छानबीन करके या खोजबीन करके जो भी जानकारी प्राप्त होती है उसे ही ग्रीक भाषा में हिस्टोरिया कहा जाता है। 
सबसे पहले हेरोडोटस नाम के यूनानी व्यक्ति ने हिस्टोरिका नामक पुस्तक लिखकर अतीत में हुई घटनाओँ की जानकारी दी। इतिहास लिखने का काम सबसे पहले हेरोडोटस ने किया इसलिए इसे इतिहास का पिता या Father Of History भी कहा जाता है। 
इतिहास के मुख्य आधार युगविशेष और घटनास्थल के वे अवशेष हैं जो किसी न किसी रूप में प्राप्त होते हैं। जीवन की बहुमुखी व्यापकता के कारण स्वल्प सामग्री के सहारे विगत युग अथवा समाज का चित्रनिर्माण करना दु:साध्य है। सामग्री जितनी ही अधिक होती जाती है उसी अनुपात से बीते युग तथा समाज की रूपरेखा प्रस्तुत करना साध्य होता जाता है। पर्याप्त साधनों के होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि कल्पनामिश्रित चित्र निश्चित रूप से शुद्ध या सत्य ही होगा। इसलिए उपयुक्त कमी का ध्यान रखकर कुछ विद्वान् कहते हैं कि इतिहास की संपूर्णता असाध्य सी है, फिर भी यदि हमारा अनुभव और ज्ञान प्रचुर हो, ऐतिहासिक सामग्री की जाँच-पड़ताल को हमारी कला तर्कप्रतिष्ठत हो तथा कल्पना संयत और विकसित हो तो अतीत का हमारा चित्र अधिक मानवीय और प्रामाणिक हो सकता है। सारांश यह है कि इतिहास की रचना में पर्याप्त सामग्री, वैज्ञानिक ढंग से उसकी जाँच, उससे प्राप्त ज्ञान का महत्व समझने के विवेक के साथ ही साथ ऐतिहासक कल्पना की शक्ति तथा सजीव चित्रण की क्षमता की आवश्यकता है। स्मरण रखना चाहिए कि इतिहास न तो साधारण परिभाषा के अनुसार विज्ञान है और न केवल काल्पनिक दर्शन अथवा साहित्यिक रचना है। इन सबके यथोचित संमिश्रण से इतिहास का स्वरूप रचा जाता है।

लिखित इतिहास का आरंभ पद्य अथवा गद्य में वीरगाथा के रूप में हुआ। फिर वीरों अथवा विशिष्ट घटनाओं के संबंध में अनुश्रुति अथवा लेखक की पूछताछ से गद्य में रचना प्रारंभ हुई। इस प्रकार के लेख खपड़ों, पत्थरों, छालों और कपड़ों पर मिलते हैं। कागज का आविष्कार होने से लेखन और पठन पाठन का मार्ग प्रशस्त हो गया। लिखित सामग्री को अन्य प्रकार की सामग्री-जैसे खंडहर, शव, बर्तन, धातु, अन्न, सिक्के, खिलौने तथा यातायात के साधनों आदि के सहयोग द्वारा ऐतिहासिक ज्ञान का क्षेत्र और कोष बढ़ता चला गया। उस सब सामग्री की जाँच पड़ताल की वैज्ञानिक कला का भी विकास होता गया। प्राप्त ज्ञान को सजीव भाषा में गुंफित करने की कला ने आश्चर्यजनक उन्नति कर ली है, फिर भी अतीत के दर्शन के लिए कल्पना कुछ तो अभ्यास, किंतु अधिकतर व्यक्ति की नैसर्गिक क्षमता एवं सूक्ष्म तथा क्रांत दृष्टि पर आश्रित है। यद्यपि इतिहास का आरंभ एशिया में हुआ, तथापि उसका विकास यूरोप में विशेष रूप से हुआ।

एशिया में चीनियों, किंतु उनसे भी अधिक इस्लामी लोगों को, जिनको कालक्रम का महत्व अच्छे प्रकार ज्ञात था, इतिहासरचना का विशेष श्रेय है। मुसलमानों के आने के पहले हिंदुओं की इतिहास संबंध में अपनी अनोखी धारणा थी। कालक्रम के बदले वे सांस्कृतिक और धार्मिक विकास या ह्रास के युगों के कुछ मूल तत्वों को एकत्रित कर और विचारों तथा भावनाओं के प्रवर्तनों और प्रतीकों का सांकेतिक वर्णन करके संतुष्ट हो जाते थे। उनका इतिहास प्राय: काव्यरूप में मिलता है जिसमें सब कच्ची-पक्की सामग्री मिली जुली, उलझी और गुथी पड़ी है। उसके सुलझाने के कुछ-कुछ प्रयत्न होने लगे हैं, किंतु कालक्रम के अभाव में भयंकर कठिनाइयाँ पड़ रही हैं।

वर्तमान सदी में यूरोपीय शिक्षा में दीक्षित हो जाने से ऐतिहासिक अनुसंधान की हिंदुस्तान में उत्तरोत्तर उन्नति होने लगी है। इतिहास की एक नहीं, सहस्रों धाराएँ हैं। स्थूल रूप से उनका प्रयोग राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में अधिक हुआ है। इसके सिवा अब व्यक्तियों में सीमित न रखकर जनता तथा उसके संबंध का ज्ञान प्राप्त करने की ओर अधिक रुचि हो गई है।

भारत में इतिहास के स्रोत हैं: ऋग्वेद और अन्‍य वेद जैसे यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ग्रंथ, इतिहास पुराणस्मृति ग्रंथ आदि। इन्हें ऐतिहासिक सामग्री कहते हैं।

पश्चिम में हिरोडोटस को प्रथम इतिहासकार मानते हैं।

इतिहास का क्षेत्र बड़ा व्यापक है। प्रत्येक व्यक्ति, विषय, अन्वेषण आंदोलन आदि का इतिहास होता है, यहाँ तक कि इतिहास का भी इतिहास होता है। अतएव यह कहा जा सकता है कि दार्शनिक, वैज्ञानिक आदि अन्य दृष्टिकोणों की तरह ऐतिहासिक दृष्टिकोण की अपनी निजी विशेषता है। वह एक विचारशैली है जो प्रारंभिक पुरातन काल से और विशेषत: 17वीं सदी से सभ्य संसार में व्याप्त हो गई। 19वीं सदी से प्राय: प्रत्येक विषय के अध्ययन के लिए उसके विकास का ऐतिहासिक ज्ञान आवश्यक समझा जाता है। इतिहास के अध्ययन से मानव समाज के विविध क्षेत्रों का जो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है उससे मनुष्य की परिस्थितियों को आँकने, व्यक्तियों के भावों और विचारों तथा जनसमूह की प्रवृत्तियों आदि को समझने के लिए बड़ी सुविधा और अच्छी खासी कसौटी मिल जाती है।

इतिहास प्राय: नगरों, प्रांतों तथा विशेष देशों के या युगों के लिखे जाते हैं। अब इस ओर चेष्ठा और प्रयत्न होने लगे हैं कि यदि संभव हो तो सभ्य संसार ही नहीं, वरन् मनुष्य मात्र के सामूहिक विकास या विनाश का अध्ययन भूगोल के समान किया जाए। इस ध्येय की सिद्ध यद्यपि असंभव नहीं, तथापि बड़ी दुस्तर है। इसके प्राथमिक मानचित्र से यह अनुमान होता है कि विश्व के संतोषजनक इतिहास के लिए बहुत लंबे समय, प्रयास और संगठन की आवश्यकता है। कुछ विद्वानों का मत है कि यदि विश्वइतिहास की तथा मानुषिक प्रवृत्तियों के अध्ययन से कुछ सर्वव्यापी सिद्धांत निकालने की चेष्टा की गई तो इतिहास समाजशास्त्र में बदलकर अपनी वैयक्तिक विशेषता खो बैठेगा। यह भय इतना चिंताजनक नहीं है, क्योंकि समाजशास्त्र के लिए इतिहास की उतनी ही आवश्यकता है जितनी इतिहास को समाजशासत्र की। वस्तुत: इतिहास पर ही समाजशास्त्र की रचना संभव है।

सैन्य इतिहास युद्ध, रणनीतियों, युद्ध, हथियार और युद्ध के मनोविज्ञान से संबंधित है। 1970 के दशक के बाद से नए सैन्य इतिहास जो जनशक्ति से अधिक सैनिकों के साथ, एवं रणनीति से अधिक मनोविज्ञान के साथ और समाज और संस्कृति पर युद्ध के व्यापक प्रभाव से संबंधित है।

धर्म का इतिहास सदियों से धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक इतिहासकारों दोनों के लिए एक मुख्य विषय रहा है, और सेमिनार और अकादमी में पढ़ाया जा रहा है। अग्रणी पत्रिकाओं में चर्च इतिहास, कैथोलिक हिस्टोरिकल रिव्यू, और धर्म का इतिहास शामिल है। विषय व्यापक रूप से राजनीतिक और सांस्कृतिक और कलात्मक आयामों से लेकर धर्मशास्त्र और मरणोत्तर गित तक फैला हुआ है। यह विषय दुनिया के सभी क्षेत्रों और जगहों में धर्मों का अध्ययन करता है जहां मनुष्य रहते हैं।

सामाजिक इतिहास, जिसे कभी-कभी नए सामाजिक इतिहास कहा जाता है, एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें सामान्य लोगों के इतिहास और जीवन के साथ सामना करने के लिए उनकी रणनीतियाँ शामिल हैं। अपने स्वर्ण युग 1960 और 1970 के दशक में यह विद्वानों के बीच एक प्रमुख विषय था, और अभी भी इतिहास के विभागों में इसकी अच्छी पैठ है। 1975 से 1995 तक दो दशकों में, अमेरिकी इतिहास के प्रोफेसरों का अनुपात सामाजिक इतिहास के साथ-साथ 31% से बढ़कर 41% हो गया, जबकि राजनीतिक इतिहासकारों का अनुपात 40% से 30% तक गिर गया।

राजनयिक इतिहास राष्ट्रों के बीच संबंधों पर केंद्रित है, मुख्यतः कूटनीति और युद्ध के कारणों के बारे में। हाल ही में यह शांति और मानव अधिकारों के कारणों को देखता है। यह आम तौर पर विदेशी कार्यालय के दृष्टिकोण और लंबी अवधि के रणनीतिक मूल्यों को प्रस्तुत करता है, जैसा कि निरंतरता और इतिहास में परिवर्तन की प्रेरणा शक्ति है। इस प्रकार के राजनीतिक इतिहास समय के साथ देशों या राज्य सीमाओं के बीच अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के संचालन का अध्ययन है। इतिहासकार म्यूरीयल चेम्बरलेन ने लिखा है कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद, राजनयिक इतिहास ने ऐतिहासिक जांच के प्रमुख के रूप में संवैधानिक इतिहास का स्थान ले लिया, जोकि कभी सबसे ऐतिहासिक, सबसे सटीक और ऐतिहासिक अध्ययनों के सबसे परिष्कृत था। उन्होंने कहा कि 1945 के बाद, प्रवृत्ति उलट गई है, अब सामाजिक इतिहास ने इसकी जगह ले लिया है।

यद्यपि 19वीं सदी के उत्तरार्ध से ही आर्थिक इतिहास अच्छी तरह से स्थापित है, हाल के वर्षों में शैक्षिक अध्ययन पारंपरिक इतिहास विभागों से स्थानांतरित हो कर अधिक से अधिक अर्थशास्त्र विभागों की तरफ चला गया है। व्यावसायिक इतिहास व्यक्तिगत व्यापार संगठनों, व्यावसायिक तरीकों, सरकारी विनियमन, श्रमिक संबंधों और समाज पर प्रभाव के इतिहास से संबंधित है। इसमें व्यक्तिगत कंपनियों, अधिकारियों और उद्यमियों की जीवनी भी शामिल है यह आर्थिक इतिहास से संबंधित है; व्यावसायिक इतिहास को अक्सर बिजनेस स्कूलों में पढ़ाया जाता है

पर्यावरण का इतिहास एक नया क्षेत्र है जो 1980 के दशक में पर्यावरण के इतिहास विशेष रूप से लंबे समय में और उस पर मानवीय गतिविधियों का प्रभाव को देखने के लिए उभरा।

विश्व इतिहास पिछले 3000 वर्षों के दौरान प्रमुख सभ्यताओं का अध्ययन है। विश्व इतिहास मुख्य रूप से एक अनुसंधान क्षेत्र की बजाय एक शिक्षण क्षेत्र है। इसे 1980 के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और अन्य देशों में लोकप्रियता हासिल हुई थी, जिससे कि छात्रों को बढ़ते हुए वैश्वीकरण के परिवेश में दुनिया के लिए व्यापक ज्ञान की आवश्यक होगी।

इतिहासकार पिछली घटनाओं की जानकारी एकत्र करते हैं, इकट्ठा करते हैं, व्यवस्थित करते हैं और प्रस्तुत करते हैं। वे इस जानकारी को पुरातात्विक साक्ष्य के माध्यम से खोजते हैं, जो भूतकाल में पाचीन स्रोतों जैसे पाण्डुलिपि, शिलालेख आदि से लिये गये है और लिखे गए होते हैं। जैसे जगह के  नाम, उनकी विचारधारा आवास, वयवसथा, सामाजिक संस्था, सामाजिक उत्थान और भाषा आदि।

इतिहासकारों की सूची में, इतिहासकारों को उस ऐतिहासिक काल के क्रम में सामूहीकृत किया जा सकता है, जिसमें वे लिख रहे थे, जो जरूरी नहीं कि वह अवधि, जिस अवधि में वे विशेषीकृत थे या निपुण थे क्रॉनिकल्स और एनलिस्ट, हालांकि वे सही अर्थों में इतिहासकार नहीं हैं, उन्हें भी अक्सर शामिल किया जाता है।

छद्मइतिहास उन लेखों/रचनाओं के लिये प्रयुक्त किया जाता है जिनकी सामग्री की प्रकृति 'इतिहास जैसी' होती है किन्तु वे इतिहास-लेखन की मानक विधियों से मेल नहीं खाती। इसलिये उनके द्वारा दिये गये निष्कर्ष भ्रामक एवं अविश्वसनीय बन जाते हैं। प्राय: राष्ट्रीय, राजनैतिक, सैनिक, एवं धार्मिक विषयों के सम्बन्ध में नये एवं विवादित और काल्पनिक तथ्यों पर आधारित इतिहास को छद्मइतिहास की श्रेणी में रखा जाता है।

मानव सभ्यता कि इतिहास वस्तुत: मानव के विकास का इतिहास है, पर यह प्रश्न सदा विवादग्रस्त रहा है कि आदि मनव और उसकी सभ्यता का विकास कब और कहाँ हुआ। इतिहास के इसी अध्ययन को प्रागैतिहास कहते हैं। यानि इतिहास से पूर्व का इतिहास। प्रागैतिहासिक काल की मानव सभ्यता को ४ भागों में बाँटा गया है।

असभ्यता से अर्धसभ्यता, तथा अर्धसभ्यता से सभ्यता के प्रथम सोपान तक हज़ारों सालों की दूरी तय की गई होगी। लेकिन विश्व में किस समय किस तरह से ये सभ्यताएँ विकसित हुईं इसकी कोई जानकारी आज नहीं मिलती है। हाँ इतना अवश्य मालूम हो सका है कि प्राचीन विश्व की सभी सभ्यताएँ नदियों की घाटियों में ही उदित हुईं और फली फूलीं। दजला-फ़रात की घाटी में सुमेर सभ्यता, बाबिली सभ्यता, तथा असीरियन सभ्यता, नील की घाटी में प्राचीन मिस्र की सभ्यता तथा सिंधु की घाटी में सिंधु घाटी सभ्यता का विकास हुआ।




#Article 26: मानस शास्त्र (8378 words)


साइकोलोजी या मनोविज्ञान (ग्रीक : Ψυχολογία, लिट.मस्तिष्क का अध्ययन,साइकेशवसन, आत्मा, जीव और -लोजिया () का अध्ययन ) एक अकादमिक () और प्रयुक्त अनुशासन है जिसमें मानव के मानसिक कार्यों और व्यवहार () का वैज्ञानिक अध्ययन () शामिल है कभी कभी यह प्रतीकात्मक () व्याख्या () और जटिल विश्लेषण () पर भी निर्भर करता है, हालाँकि ये परम्पराएँ अन्य सामाजिक विज्ञान () जैसे समाजशास्त्र () की तुलना में कम स्पष्ट हैं। मनोवैज्ञानिक ऐसी घटनाओं को धारणा (), अनुभूति (), भावना (), व्यक्तित्व (), व्यवहार () और पारस्परिक संबंध () के रूप में अध्ययन करते हैं। कुछ विशेष रूप से गहरे मनोवैज्ञानिक () अचेत मस्तिष्क () का भी अध्ययन करते हैं।

मनोवैज्ञानिक ज्ञान मानव क्रिया () के भिन्न क्षेत्रों पर लागू होता है, जिसमें दैनिक जीवन के मुद्दे शामिल हैं और -; जैसे परिवार, शिक्षा () और रोजगार और - और मानसिक स्वास्थ्य () समस्याओं का उपचार (). मनोविज्ञानवेत्ता व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार में मानसिक कार्य की भूमिका को समझने का प्रयास करते हैं, जबकि इसके तहत आने वाले शरीर कार्यिकी () तथा तंत्रिका () प्रक्रियाओं पर भी कार्य करते हैं। मनोविज्ञान में अध्ययन और अनुप्रयोग के कई उपक्षेत्र भी शामिल हैं जैसे मानव विकास (), खेल (), स्वास्थ्य (), उद्योग (), मीडिया () और कानून ().मनोविज्ञान में प्राकृतिक विज्ञान (), सामाजिक विज्ञान और मानविकी () के अनुसंधान भी शामिल हैं।

दार्शनिक संदर्भ में मनोविज्ञान का अध्ययन मिस्र, ग्रीस (), चीन और भारत की प्राचीन सभ्यताओं से सन्दर्भ रखता है। मनोविज्ञान ने मध्यकाल में अधिक नैदानिक () और प्रयोगात्मक () दृष्टिकोण अपना लिया जब मुस्लिम मनोवैज्ञानिकों () और चिकित्सकों () ने ऐसे उद्देश्यों के लिए मनोरोग अस्पताल () बनाने शुरू कर दिए। 

१८०२ में, फ्रांसीसी मनोविज्ञानी पियरे कबानीज () ने अपने निबंध रेपर्ट्स ड्यू फिजिक एट ड्यू मोरल डी आई 'होम () के द्वारा जैव मनो विज्ञान को आगे बढ़ाने की कोशिश की (मानव के शारीरिक और नैतिक पहलुओं के बीच संबंधों पर).
कबानीज ने जीव विज्ञान के पूर्व अध्ययन के प्रकाश में मस्तिष्क के बारे में व्याख्या की और तर्क दिया कि संवेदनशीलता () और आत्मा (), तंत्रिका तंत्र () के गुण हैं।

हालाँकि मनोवैज्ञानिक प्रयोगों () का उपयोग अल्हाजन () की  प्रकाशिकी की पुस्तक () से १०२१ में शुरू हुआ, फिर भी एक स्वतंत्र प्रायोगिक क्षेत्र के रूप में मनोविज्ञान का अध्ययन १८७९ में शुरू हुआ, जब विल्हेम वुन्द्त () ने जर्मनी में लीपजीज विश्वविद्यालय () में विशेष रूप से मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक पहली प्रयोगशाला बनायी, जिसके लिए वुन्द्त मनोविज्ञान के जनक  के रूप में जाने जाते हैं। इसी लिए १८७९ को कभी कभी मनोविज्ञान की जन्म तिथि कहा जाता है। अमेरिकी दार्शनिक विलियम जेम्स () ने १८९० में अपनी मौलिक पुस्तक मनोविज्ञान के सिद्धांत () में कई ऐसे प्रश्नों की नीव रखी जिन पर आने वाले कई वर्षों में मनो वैज्ञानिकों () ने अपना ध्यान केन्द्रित किया। इस क्षेत्र में अन्य महत्वपूर्ण प्रारंभिक योगदानकर्ता हैं हरमन एब्बिनघस () (१८५०-१९०९), जो बर्लिन विश्वविद्यालय () में स्मृति () पर अध्ययन करने में अग्रणी रहे हैं; और रुसी मनो विज्ञानी () इवान पावलोव () (१८४९-१९३६) जिन्होंने सीखने की प्रक्रिया () की खोज की जो आज क्लासिकल कंडिशनिंग () के नाम से जाना जाता है।

१८९० से लेकर १९३९ में उनकी मृत्यु तक, ऑस्ट्रिया के चिकत्सक सिगमंड फ्रुड ने मनश्चिकित्सा () की एक विधि का विकास किया जिसे मनोविश्लेषण () के नाम से जाना जाता है। मस्तिष्क के बारे में फ्राइड की समझ बड़े पैमाने पर व्यख्यानात्मक विधियों, आत्मनिरीक्षण () और नैदानिक टिप्पणियों पर आधारित थी और इसने विशेष रूप से अचेत संघर्ष, मानसिक तनाव और मनो रोग विज्ञान () पर ध्यान केन्द्रित किया। फ्रुड के सिद्धांत बहुत ही लोकप्रिय हो गए क्योंकि इन्होने कई विषयों जैसे कामुकता (), दमन () और अचेत मस्तिष्क () को मनो वैज्ञानिक विकास के सामान्य पहलुओं के रूप में नियंत्रित किया। इन्हें उस समय बड़े पैमाने पर पाबन्द () विषय माना जाता था और फ्रुड ने सभी समाज में इस पर खुले तौर पर चर्चा करने के लिए इनके लिए एक उत्प्रेरक उपलब्ध कराया. हालाँकि फ्रुड को संभवतः उसके मस्तिष्क के त्रिपक्षीय मॉडल के लिए जाना जाता था, जिसमें आई डी (), अहंकार () और अति अंहकार () और इडिपस जटिल () के बारे में उनके सिद्धांत शामिल हैं, उनकी सबसे स्थायी विरासत शायद उनके सिद्धांत नहीं हैं बल्कि उनके नैदानिक नवाचार हैं, जैसे मुक्त संघ () की विधि और क्लिनिकल इनट्रस्ट इन ड्रीम्स.

फ्रुड ने एक स्विस मनोवैज्ञानिक कार्ल जंग () पर गहरा प्रभाव डाला, जिसका विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान () गहरे मनो विज्ञान () के लिए एक विकल्पी विधि बन गया। मध्य बीसवीं सदी के अन्य प्रसिद्द मनो विश्लेषक विचारक जिसमें सिगमंड फ्रुड की बेटी मनोविश्लेषक ऐना फ्रुड (); जर्मन अमेरिकी मनो विज्ञानी एरिक एरिक्सन (), ऑस्ट्रियाई-ब्रिटिश मनोविश्लेषक मेलानीक्लेन (), अंग्रेजी मनोवैज्ञानिक और चिकित्सकडोनाल्ड विन्नीकोट (), जर्मन मनोचिकित्सक करेन होर्नी (), जर्मन में जन्मे शामिल मनोवैज्ञानिक और दार्शनिकएरिच फ्रॉम () और अंग्रेजी मनोचिकित्सक जॉन बोल्बी () शामिल हैं। समकालीन मनोविश्लेषण में विचारों के कई विद्यालय शामिल हैं इनके विषय हैं अहंकार मनोविज्ञान (), उद्देश्य संबंधों (), पारस्परिक (), लेकेनियन () और संबंधपरक मनोविश्लेषण () जंग के सिद्धांतों के संशोधन ने मनोवैज्ञानिक विचारों के आद्य रूप () तथा प्रक्रिया उन्मुख () स्कूलों का नेतृत्व किया।

ऑस्ट्रियाई-ब्रिटिश दार्शनिक कार्ल पोप्पर () ने तर्क दिया कि फ्रुद के मनो विश्लेषक सिद्धांत जांच के अयोग्य () रूप में पेश किये गए। अमेरिकी विश्विद्यालय में मनोविज्ञान के विभाग आज वैज्ञानिक उन्मुख () हैं और फ्रुड का सिद्धांत हाशिये पर रख दिया गया है, इसे एक हाल ही के ऐ पी ऐ () अध्ययन के अनुसार एक डेसीकेटेड और मृत ऐतिहासिक तथ्य मन जा रहा है। हाल ही में, तथापि, दक्षिण अफ्रीकी तंत्रिका विज्ञानी मार्क सोल्म्स () और तंत्रिका मनो विश्लेषण () के विकसित होते हुए क्षेत्र में अन्य अनुसन्धानकर्ताओं का तर्क है कि फ्रुड के सिद्धांत, फ्रुड की अवधारणा से सम्बंधित मस्तिष्क की संरंचनाओं की और इशारा करते हैं, जैसे लिबिडो (), ड्राइव्स (), अचेत () और दमन ().

व्यावहारिकता का आंशिक विकास प्रयोगशाला पर आधारित जंतु प्रयोगों की लोकप्रियता के कारण हुआ और आंशिक विकास फ्रुड की मनो गतिकी () की प्रतिक्रिया में हुआ, जिसका मूल रूप से () परिक्षण करना मुश्किल था क्योंकि, अन्य कारणों के बीच, यह मामलों के अध्ययन और नैदानिक अनुभवों पर भरोसा करने की प्रवृति रखता था और बड़े पैमाने पर अन्तर-मनो घटना से क्रिया करता था, जिसकी मात्रात्मक गणना करना या उसे घटनात्मक रूप () से परिभाषित करना मुश्किल काम था। इसके अलावा, प्रारंभी मनोविज्ञानी विल्हेम वुन्द्त और विलियम जेम्स के विपरीत, जिन्होंने आत्मनिरीक्षण () के माध्यम से मस्तिष्क का अध्ययन किया, व्यवहार विज्ञानियों का तर्क था कि मस्तिष्क के अवयव वैज्ञानिक जाँच के लिए खुले नहीं थे और वैज्ञानिक मनोविज्ञान को केवल प्रेक्षणीय व्यवहार से सन्दर्भ रखना चाहिए। आंतरिक प्रधिनिधित्व या मस्तिष्क के बारे में कोई विचार नहीं किया गया। व्यावहारिकता की शुरुआत २० वीं सदी में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जॉन बी वाटसन () के द्वारा की गयी, इसका विस्तार अमेरिकियों एडवर्ड थोर्नडीके (), क्लार्क एल हुल (), एडवर्ड सी. टोलमन () और बाद में बी एफ स्किनर () के द्वारा किया गया।

व्यावहारिकता अन्य दृष्टिकोणों से कई प्रकार से विभिन्न है। व्यवहार विज्ञानी व्यवहार-पर्यावरण संबंधों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और खुले और निजी व्यवहार को एक जीव के कार्य के रूप में विश्लेषित करते हैं, जो अपने वातावरण के साथ अंतर क्रिया करता है। व्यवहार विज्ञानी, निजी घटनाओं के अध्ययन को अस्वीकृत नहीं करते हैं, (उदाहरण स्वप्न), लेकिन इस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर देते हैं कि जीव के भीतर एक स्वायत्त संस्था खुले (उदाहरण चलना और बोलना) और निजी व्यवहार (उदाहरण सपने देखना और कल्पना करना) का कारण है।मस्तिष्क और सचेतता जैसी अव्धार्नाओं को व्यवहार विज्ञानियों के द्वारा प्रयुक्त नहीं किया जाता है, क्योंकि ऐसे शब्द वास्तविक मनो वैज्ञानिक घटनाओं का वर्णन नहीं करते हैं, (जैसे कि कल्पना) लेकिन ये जीव में कहीं पर छुपे हुए स्पष्टीकारक संस्थाओं के रूप में प्रयुक्त किये जाते हैं। इसके विपरीत, व्यावहारिकता निजी घटनाओं को व्यवहार मानता है और उन्हें खुले व्यवहार के तरीके से ही विश्लेषित करता है। व्यवहार का उपयोग जीव की ठोस घटनाओं, खुली या निजी के लिए किया जाता है।

अमेरिकी भाषाविद् नोअम चोमस्की के भाषा अधिग्रहण () के व्यावहारिक मोडल की आलोचना को कई लोगों के द्वारा व्यावहारिकता की सामान्य प्रसिद्धि में कमी में एक मुख्य बिंदु माना जाता है। लेकिन स्किनर की व्यावहारिकता शायद आंशिक रूप से अभी ख़त्म नहीं हुई है, क्योंकि इसने सफल प्रायोगिक अनुप्रयोगों का विकास किया है। मनोविज्ञान के एक व्यापक माडल के रूप में व्यावहारिकता के आरोहण ने, हालाँकि, अगले प्रभावी उदाहरण, संज्ञानात्मक दृष्टिकोण को रास्ता दिया है।

मानवता मनोविज्ञान () का विकास १९५० में, व्यावहारिकता और मनो विश्लेषण दोनों की प्रतिक्रिया में हुआ। घटना विज्ञान (), अंतर विषयता () और पहले व्यक्ति की श्रेणी का उपयोग करते हुए, मानवता दृष्टिकोण, पूरे व्यक्ति की झलक देता है-नकि केवल व्यक्तित्व या संज्ञानात्मक कार्य के कुछ खंडों की झलक. मानवतावाद अद्वितीय मानव मुद्दों और जीवन के मूल मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करता है, जैसे अपनी पहचान, मृत्यु, अकेलापन, स्वतंत्रता और अर्थ.ऐसे कई कारक हैं जो मानवीय दृष्टिकोण को मनो विज्ञान के अन्य दृष्टिकोणों से विभेदित करते हैं। इनमें शामिल हैं विषयात्मक अर्थ पर जोर, नियतत्ववाद की अस्वीकृति और रोगविज्ञान के बजाय सकारात्मक विकास के लिए सन्दर्भ.विचारों के इस स्कूल के पीछे कुछ कुछ संस्थापक सिद्धांत वादी अमेरिकी मनो विज्ञानी थे अब्राहम मसलो (), जिन्होंने मानव आवश्यकताओं का पदानुक्रम () बनाया और कार्ल रोजर्स () जिन्होंने ग्राहक- केन्द्रित चिकित्सा () का निर्माण और विकास किया; और जर्मन-अमेरिकी मनो चिकित्सक फ्रिट्ज पर्ल्स () जिन्होंने गेसटाल्ट चिकित्सा () के निर्माण और विकास में योगदान दिया। यह इतना प्रभावी बन गया की मनोविज्ञान, व्यावहारिकता और मनोविश्लेषण में तीसरा बल कहा जाने लगा। 

जर्मन दार्शनिक मार्टिन हिदेगर () और डैनीश दार्शनिकसोरेन कीरकेगार्ड () के कार्य से प्रभावित होकर मनोविश्लेषक दृष्टि से प्रशिक्षित अमेरिकी मनो वैज्ञानिक रोलो मे () ने १९५० और १९६० के बीच मनोविज्ञान की एक अस्तित्व () प्रजाति का विकास किया। अस्तित्व मनोवैज्ञानिकों ने तर्क दिया की लोगों को अपनी मरण शीलता को स्वीकार करना चाहिए। और ऐसा करने में लोगों को यह स्वीकार करना चाहिए कि वे मुक्त हैं; वे मुक्त इच्छा रखते हैं, वे उम्मीदें करने के लिए स्वतंत्र हैं और अपने जीवन के दौरान उनके अपने अर्थ पूर्ण () पथ की उपेक्षा कर सकते हैं। में का कि अर्थ निर्माण करने वाली प्रक्रिया का एक मुख्य तत्व, है, मिथक () की खोज, या कथात्मक प्रतिरूप जिनमें कोई व्यक्ति फिट हो सकता है।

अस्तित्व के दृष्टिकोण से, न केवल मरण शीलता की स्वीकृति से उत्पन्न अर्थ के लिए प्रश्न किये जाते हैं बल्कि अर्थ की प्राप्ति मृत्यु की सम्भावना को ढक सकती है। ऑस्ट्रिया के एक अस्तित्व मनोचिकित्सक और पूर्ण आहुति उत्तरजीवी विक्टर फ्रेंकल () ने देखा, हम जो एकाग्रता शिविरों () में रहते थे, उन व्यक्तियों को याद रख सकते हैं जो दूसरों को आराम देते हुए झोपडियों में होकर जाते हैं, अपना रोटी का आखिरी टुकडा भी दूसरों को दे देते हैं। ये संख्या में बहुत कम हो सकते हैं, लेकिन वे इस बात का पर्याप्त प्रमाण देते हैं कि, एक व्यक्ति से सब कुछ वापिस लिया जा सकता है, लेकिन एक चीज: मानव की आखिरी स्वतंत्रता; परिस्थितियों के किसी भी दिए गए समुच्चय में किसी के रवैये का चयन, किसी के अपने रास्ते का चयन.

मे ने अस्तित्व चिकित्सा () के विकास में अग्रणी होने में सहायता की और फ्रेंकल ने इसकी कई किस्मों का विकास किया जो लोगो थेरेपी () कहलाती हैं। मे और फ्रेंकल के अलावा, स्विस मनोविश्लेषक लुडविग बिन्सवेंगर () और अमेरिकी मनो चिकित्सक जॉर्ज केली () को अस्तित्व स्कूल से सम्बंधित कहा जा सकता है। अस्तित्व और मानवता वादी दोनों प्रकार के मनो विज्ञानी तर्क देते हैं कि, लोगों को अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँचने के लिए भरपूर कोशिश करनी चाहिए, लेकिन केवल मानवतावादी मनोविज्ञानी विश्वास करते हैं कि, यह प्रयास सहज है। अस्तित्व मनोवैज्ञानिकों के लिए, यह प्रयास एक चिंताजनक मरणशीलता, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व का कारण होता है।

व्यावहारिकता, २० वीं शताब्दी के पहले आधे भाग में अमेरिकी मनोविज्ञान में प्रभावी प्रतिमान था। हालाँकि, मनोविज्ञान का आधुनिक क्षेत्र मुख्यतः संज्ञानात्मक मनोविज्ञान () से प्रभावित रहा। नोअम चोमस्की ने १९५९ में बी॰ ऍफ़॰ स्किनर के मौखिक व्यवहार की समीक्षा की, जिसने उस समय प्रभावी भाषा और व्यवहार के अध्ययन के व्यावहारिक दृष्टिकोण को चुनौती दी और मनोविज्ञान में संज्ञानात्मक क्रांति () में योगदान दिया। चोमस्की 'उत्तेजना', 'प्रतिक्रिया' और ' सुदृढीकरण' के मनमाने विचारों के बारे में जटिलता से सोचते थे, ये विचार स्किनर ने प्रयोगशाला में जंतु प्रयोगों के द्वारा प्राप्त किये। चोमस्की का तर्क था कि स्किनर के विचार केवल जटिल मानव व्यवहार जैसे भाषा अधिग्रहण पर एक अस्पष्ट और सतही तरीके से लागू किये जा सकते हैं। चोमस्की ने इस बात पर जोर दिया कि अनुसंधान और विश्लेषण के दौरान, भाषा के अधिग्रहण में एक बच्चे के योगदान की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और प्रस्तावित किया कि मानव भाषा के अधिग्रहण () की प्राकृतिक क्षमता के साथ पैदा हुए हैं। मनो विज्ञानी अल्बर्ट बन्दुरा () से सम्बंधित अधिकंश कार्य, जिन्होंने सामाजिक शिक्षा सिद्धांत () की शुरुआत की और इसका अध्ययन किया, ने दर्शाया कि बच्चे अवलोकन अधिगम () के माध्यम से अपने रोल मॉडल से उग्रता सीख सकते हैं, इसके दौरान उनके खुले व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आता और इसे उप आंतरिक प्रक्रिया माना जा सकता है।

कंप्यूटर विज्ञान और कृत्रिम बुद्धि के विकास के साथ, मानव के द्वारा सूचना संसाधन () और मशीनों के द्वारा सूचना संसाधन के बीच समरूपता को चित्रित किया गया। यह, इस अनुमान के साथ संयोजित हो गया कि मानसिक अभिव्यक्ति उपस्थित होती है और ये मानसिक स्थितियाँ और क्रियाएँ, प्रयोगशाला में वैज्ञानिक प्रयोगों के द्वारा निष्कर्षित की जा सकती हैं। जिसने मस्तिष्क के एक लोकप्रिय मोडल के रूप में संज्ञानात्मक () को जन्म दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के से लेकर हथियारों की क्रिया के बारे में एक बेहतर समझ विकसित करने के लिए संज्ञानात्मक मनोविज्ञान अनुसंधान किया गया।

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान अन्य मनोविज्ञानिक परिप्रेक्ष्यों से दो मुख्य तरीकों से अलग है। पहला, यह वैज्ञानिक विधि के उपयोग को स्वीकार करता है और प्रतीकों का उपयोग करने वाले दृष्टिकोण जैसे फ्रुद की मनो गतिकी के विपरीत सामान्यतः आत्मनिरीक्षण को खोज की एक विधि के रूप में अस्वीकृत करता है। दूसरा, यह स्पष्ट रूप से आंतरिक मानसिक स्थिति के अस्तित्व को स्वीकार करता है और -जैसे विश्वास, इच्छा और प्रेरणा और - जबकि व्यावहारिकता ऐसा नहीं करती है। हालाँकि, फ्रुड और गहरे मनोविज्ञानियों की तरह संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक दमन () सहित अचेत प्रक्रिया में रूचि लेते हैं, लेकिन उन्हें प्रचालन-परिभाषित () घटकों के शब्दों में स्पष्ट करना पसंद करते हैं, जैसे कि अचेतन प्रसंस्करण () और अंतर्निहित स्मृति () जो प्रयोगात्मक जाँच के लिए उत्तरदायी होते हैं। फिर भी संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिकों ने इन घटकों के अस्तित्व पर कई सवाल उठाये हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिकन मनोवैज्ञानिक एलिजाबेथ लोफ्ट्स () ने उन तरीकों के प्रदर्शन के लिए मूल विधियों का उपयोग किया है जिनमें प्रकट होने वाली यादों को दमन के उन्मूलन के बजाय छलरचना () के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है।

संज्ञानात्मक क्रांति में आगे बढ़ते हुए, कई दशकों के दौरान, हरमन एब्बिनघास स्मृति के प्रायोगिक अध्ययन में अग्रणी रहे हैं, वे तर्क देते हैं की उच्चतर मानसिक प्रक्रियाएं, दृश्य से छुपी हुई नहीं है, लेकिन इसके बजाय प्रयोगों का उपयोग करते हुए उनका अध्ययन किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक गतिविधि और मस्तिष्क () और तंत्रिका तंत्र () के कार्यों के बीच की कड़ियों को समझा गया, ऐसा आंशिक रूप से कुछ लोगों के प्रायोगिक कार्य के कारण हुआ जैसे अंग्रेजी मनो वैज्ञानिक औचार्ल्स शेरिंगटन () और कनाडा के मनो चिकत्सक डोनाल्ड ओल्डिंग हेब्ब () तथा आंशिक रूप से मस्तिष्क क्षति () से युक्त लोगों के अध्ययन से हुआ। ये मस्तिष्क-शरीर () कडियाँ संज्ञानात्मक तंत्रिका मनो विज्ञानियों () के द्वारा लम्बाई में स्पष्ट की गयीं। मस्तिष्क के कार्यों के मापन के लिए तकनीकों के विकास के साथ, तंत्रिका मनो विज्ञान () और संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान () समकालीन मनोविज्ञान के तेजी से बढ़ते हुए सक्रिय क्षेत्र बन गए हैं। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान को अन्य विषयों के साथ शामिल किया गया है जैसे मन के दर्शन (), कंप्यूटर विज्ञान () और संज्ञानात्मक विज्ञान () के अनुशासन के अधीन तंत्रिका विज्ञान ()।

विचारों के कई स्कूलों का तर्क है कि एक मार्गदर्शन सिद्धांत के रूप में एक विशेष मॉडल का उपयोग किया जाता है, जिसके द्वारा सभी या अधिकांश मानव व्यवहार को स्पष्ट किया जा सकता है। इनकी लोकप्रियता समय के साथ बढती घटती रही है। कुछ मनो वैज्ञानिक () अपने आप को विचारों के विशेष स्कूल से जोड़ते हैं जबकि अन्य स्कूलों को अस्वीकृत करते हैं, हालाँकि अधिकांशतः प्रत्येक को मस्तिष्क की समझ के लिए एक दृष्टिकोण मानते हैं और जरुरी रूप से परस्पर अनन्य सिद्धांत के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं।तिनबर्जन के चार सवालों () के आधार पर मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के सभी क्षेत्रों के रूपरेखा सन्दर्भ स्थापित किये जा सकते हैं। (जिसमें एन्थ्रोपोलोजी अनुसंधान और मानविकी शामिल है)

आधुनिक समय में, मनोविज्ञान ने सचेतता, व्यवहार और सामाजिक अंतर्क्रिया की समझ की दिशा में एक एकीकृत दृष्टिकोण को अपनाया है। इस परिप्रेक्ष्य को सामान्यतः जैव मनो सामाजिक () दृष्टिकोण कहा जाता है। जैव मनो सामाजिक मॉडल का मूल सिद्धांत यह है कि कोई भी दिया गया सिद्धांत या मानसिक प्रक्रिया प्रभाव डालती है और गतिक रूप से अंतर सम्बंधित जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों को प्रभावित करती है। 
मनोवैज्ञानिक पहलू एक भूमिका से सन्दर्भ रखता है जो अनुभूति और भावना एक दी गयी मनोवैज्ञानिक घटना में निभाते हैं; उदाहरण के लिए मूड का प्रभाव या एक घटना के लिए एक व्यक्ति से उम्मीदें या विशवास।जैविक पहलू, मनोवैज्ञानिक घटना में जैविक कारकों की भूमिका से सबंध रखता है और -; उदाहरण के लिए जन्म के पूर्व के वातावरण का मस्तिष्क विकास और संज्ञानात्मक क्षमताओं पर प्रभाव, या व्यक्तिगत स्वभाव पर जीनों का प्रभाव। सामाजिक, सांस्कृतिक पहलू उस भूमिका से सन्दर्भ रखता है जो सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण एकदी गयी मनोवैज्ञानिक घटना में निभाते हैं; उदाहरण के लिए एक व्यक्ति के लक्षणों में अभिभावकों या सहकर्मियों का प्रभाव।

मनोविज्ञान, एक विशाल डोमेन से बना है और इसमें मानसिक प्रक्रिया और व्यवहार के अध्ययन के कई विभिन्न दृष्टिकोण शामिल हैं। नीचे पूछताछ के कई क्षेत्र दिए गए हैं जो मनोविज्ञान से युक्त हैं। मनोविज्ञान में क्षेत्रों और उपक्षेत्रों की एक व्यापक सूची को मनोविज्ञान विषयों की सूची () पर और मनो विज्ञान अनुशासनों की सूची () पर पाया जा सकता है।

असामान्य मनोविज्ञान () असामान्य व्यवहार () का अध्ययन है जिसमें क्रिया के असामान्य प्रतिरूप का वर्णन, अनुमान, स्पष्टीकरण और परिवर्तन किया जाता है। असामान्य मनोविज्ञान मनो रोग विज्ञान () और इसके कारणों की प्रकृति का अधययन करता है और इस ज्ञान को मनोवैज्ञानिक विकृतियों से युक्त रोगियों के उपचार के लिए नैदानिक मनोविज्ञान () में लागू किया जाता है।

सामान्य और असामान्य व्यवहार की बीच एक रेखा खींचना मुश्किल हो सकता है। सामान्यतयः, असामान्य व्यवहार अन अनुकूलित होना चाहिए और यह एक व्यक्तिगत महत्वपूर्ण परेशानी का कारण होता है ताकि नैदानिक और अनुसंधान प्रक्रिया को लागू किया जा सके। डीएसएम-आईवी-टीआर के अनुसार व्यवहार को असामान्य माना जा सकता है यदि वे विकलांगता, व्यक्तिगत परेशानी, सामाजिक मानदंडों के उल्लंघन या गलत क्रियाओं से सम्बंधित हो।

जैविक मनोविज्ञान व्यवहार और मानसिक अवस्थाओं के जैविक सब्सट्रेट्स का वैज्ञानिक अध्ययन है। हर व्यवहार को तंत्रिका तंत्र () से सम्बंधित मानते हुए, जैविक मनो विज्ञानी महसूस करते हैं कि व्यवहार को समझने के लिए मस्तिष्क () की कार्य प्रणाली का अध्ययन समझदारी भरा है। यह वह दृष्टिकोण है जो व्यवहार तंत्रिका विज्ञान (), संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान () और तंत्रिका मनो विज्ञान () में प्रयुक्त किया जाता है। तंत्रिका मनो विज्ञान,मनो विज्ञान की एक शाखा है जो इस बात को समझने में मदद करती है कि मस्तिष्क की संरंचना और कार्य किस प्रकार से विशेष व्यवहारिक और मनो वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से सम्बंधित हैं। तंत्रिका मनो विज्ञान विशेष रूप से मस्तिष्क की क्षति को समझने से सम्बंधित है, ताकि सामान्य मनो वैज्ञानिक कार्यों को बनाये रखने के लिए प्रयास किया जा सके। मस्तिष्क और व्यवहार के बीच सम्बन्ध के अध्ययन के लिए संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान का दृष्टिकोण तंत्रिका इमेजिंग उपकरणों का उपयोग करता है, ताकि यह प्रेक्षण किया जा सके कि मस्तिष्क के कौन से क्षेत्र एक विशेष क्रिया के दौरान सक्रिय हैं।

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान () अनुभूति () का और व्यवहार के तहत आने वाली मानसिक प्रक्रियाओं () का अध्ययन करता है, यह मस्तिष्क को समझने के लिए सूचना संसाधन () का उपयोग एक ढांचे के रूप में करता है। धारणा (), सीख (), समस्या का हल (), स्मृति (), ध्यान (), भाषा और भावना () भी अनुसंधान के क्षेत्र हैं। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विचारों के एक स्क्कोल से सम्बंधित है जो अनुभूति () के नाम से जाना जाता है, जिसे मानने वालों का तर्क है कि मानसिक क्रिया का सूचना संसाधन () मोडल, यक़ीन () और प्रयोगात्मक मनोविज्ञान () के द्वारा सूचित होता है।

एक व्यापक स्तर पर, संज्ञानात्मक विज्ञान () संज्ञानात्मक मनोविज्ञानियों, तंत्रिका जैव विज्ञानियों (), तथा कृत्रिम बुद्धि, तर्कविदों (), भाषाविदों और सामाजिक विज्ञानियों के अनुसंधानकर्ताओं का संयुक्त उद्यम है और यह कम्प्यूटेशनल सिद्धांत व औपचारिकीकरण पर अधिक जोर डालता है। दोनों ही क्षेत्र कम्प्यूटेशनल मॉडल () का उपयोग रूची की घटना का अनुकरण करने के लिए करते हैं। क्योंकि मानसिक घटनाओं को प्रत्यक्ष रूप से प्रेक्षित नहीं किया जा सकता है, कम्प्यूटेशनल मॉडल मस्तिष्क के कार्यात्मक संगठन का अध्ययन करने के लिए एक औजार का उपयोग करते हैं। इस तरह के मॉडल संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिकों को एक ऐसा तरीका बताते हैं कि जिससे वे हार्डवेयर से स्वतंत्र रहकर मानसिक प्रक्रियाओं के सॉफ्टवेयर का अधययन कर सकते हैं, फिर चाहे वो मस्तिष्क हो या कंप्यूटर.

तुलनात्मक मनोविज्ञान () में मानव के अलावा जानवर () में व्यवहार और मानसिक जीवन का अध्ययन किया जाता है। यह मनोविज्ञान के बाहर अनुशासन से सम्बंधित है जिसमें जंतु व्यवहार जैसे इथोलोजी () का अध्ययन किया जाता है। हालाँकि मनोविज्ञान का क्षेत्र प्रारंभिक रूप से मानव से सम्बंधित है, जानवरों () के व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन भी मनो वैज्ञानिक अध्ययन का एक मुख्य भाग है। यह अपने आप में एक अलग विषय हो सकता है (उदाहरण पशु अनुभूति () और इथोलोजी) या विकास की कड़ियों के बारे में महत्वपूर्ण हो सकता है और विवादस्पद रूप से मानव मनो विज्ञान पर दृष्टि डालने का एक तरीका हो सकता है। इसे तुलना के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है या भावना और व्यवहार प्रणाली के पशु मोडल्स के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। जैसा कि मनोविज्ञान के तंत्रिका विज्ञान में देखा गया है। (उदाहरण, प्रभावी तंत्रिका विज्ञान () और सामाजिक तंत्रिका विज्ञान ()).

परामर्श मनोविज्ञान () जीवन के दौरान व्यक्तिगत पारस्परिक () क्रियाओं को बढ़ावा देने का प्रयास करता है और सामाजिक, भावात्मक, व्यावसायिक (), शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी, विकास और संगठनात्मक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करता है। सलाहकार मुख्य रूप से चिकित्सक होते हैं, ये ग्राहकों के उपचार के लिए मनश्चिकित्सा और अन्य उपायों का इस्तेमाल करते हैं। परंपरागत रूप से, परामर्श मनोविज्ञान ने मनो रोग विज्ञान की तुलना में सामान्य विकास मुद्दों पर और दैनिक तनाव () के मुद्दों पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया है, लेकिन यह विभेदन समय के साथ कम हो गया है। परामर्श मनोविज्ञानी कई प्रकार के स्थानों पर कार्य कर रहे हैं जैसे विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, स्कूलों, सरकारी संगठनों, व्यापार, निजी प्रैक्टिस और सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र।

नैदानिक मनोविज्ञान () में मनोविज्ञान का अध्ययन और अनुप्रयोग शामिल है जो मनोविज्ञान पर आधारित तनाव या रोग से आराम दिलाने के लिए, उसे रोकने या समझने के लिए किया जाता है और व्यक्तिपरक जीवों के () व व्यक्तिगत विकास के लिए किया जाता है। इसके अभ्यास के केंद्र हैं मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और मनश्चिकित्सा () हालाँकि नैदानिक मनोचिकित्सक अनुसंधान, शिक्षण, परामर्श, न्यायालयिक गवाही में और कार्यक्रम के विकास और प्रशासन में संलग्न हो सकते हैं।
कुछ नैदानिक मनोवैज्ञानिक मस्तिष्क की चोट () के रोगियों में नैदानिक प्रबंधन पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं- यह क्षेत्र नैदानिक तंत्रिका मनोविज्ञान () कहलाता है। अनेक देशों में नैदानिक मनोविज्ञान एक विनियमित मानसिक स्वास्थ्य पेशा () है।

नैदानिक मनोवैज्ञानिकों के द्वारा किया गया कार्य कई चिकित्सा मॉडल्स में किया जाता है, जिनमें से सभी में पेशेवर और ग्राहक के बीच एक औपचारिक सम्बन्ध होता है-सामान्यतः एक व्यक्ति, जोड़ा, परिवार, या एक छोटा समूह-जो चिकित्सा प्रक्रियाओं के एक समुच्चय से होकर गुजरता है, मनोवैज्ञानिक समस्योप्न की प्रकृति को स्पष्ट करता है और सोच, अहसास और व्यवहार के नए तरीकों को उत्साहित करता है। चार प्रमुख परिप्रेक्ष्य हैं मनो गतिकी (), संज्ञानात्मक व्यवहार (), अस्तित्व-मानवतावाद () और तंत्र या परिवार चिकित्सा () इन विभिन्न चिकित्सा दृष्टिकोणों को एकीकृत करने के लिए एक बढ़ता हुआ आन्दोलन रहा है, विशेष रूप से संस्कृति, लिंग, आध्यात्मिकता और यौन उन्मुखता के मुद्दों के सम्बन्ध में एक बढ़ती हुई समझ के साथ। मनो चिकित्सा के सम्बन्ध में अधिक मजबूत शोध निष्कर्षों के आगमन के साथ, इस बात के प्रमाण बढ़ गए हैं की अधिकांश मुख्य चिकित्साएँ बराबर प्रभाविता की होती हैं, जिनमें एक प्रबल चिकित्सा गठबंधन के साथ सामान्य कुंजी तत्व होते हैं। इस वजह से और अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम और मनोविज्ञानी अब एक्लेक्टिक चिकित्सात्मक उन्मुखीकरण () को अपना रहे हैं।

गंभीर मनोविज्ञान () मनोविज्ञान के गंभीर सिद्धांतों की विधियों पर लागू होता है। इस प्रकार, यह न केवल यथास्थिति के मानसिक सबसट्रेट्स की आलोचना करता है बल्कि मुख्यधारा मनोविज्ञान के तत्वों की भी आलोचना करता है, जो अपने आप में दमनकारी विचारधारा () के योगदानकर्ताओं के रूप में देखे जाते हैं। गंभीर मनोविज्ञान इस विश्वास पर कार्य करती है कि मनोविज्ञान की मुख्यधारा ने मानव के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्र के नैतिक जनादेश के एक संकीर्ण दृष्टिकोण को संस्थागत रूप से संचालित किया है इसमें सामाजिक बुराईयों को व्यक्तिगत रूप से दूर करने का प्रयास किया गया है, तुच्छ और महत्वहीन अनुसंधान को प्रोत्साहित किया गया है और ऐसी प्रक्रियाओं में भाग लिया गया है कि गंभीर संवीक्षा के तहत सकारात्मक तरीके विफल रहे हैं।

एक गंभीर मनोविज्ञानी पूछ सकता है यदि एक काम के तनाव का मामला बडे स्तर के तंत्र को परिवर्तित करने के लिए प्रयास की वारंटी देता है जो कार्य का नियंत्रण करता है, बजाय इसके कि कि उस व्यक्ति का इलाज करता है जो तनाव का अनुभव करता है और-; अधिक सही है कि, अनगिनत अन्य व्यक्तियों के साथ कौन तनाव को शेयर करता है। कोई यह भी पूछ सकता है कि युद्ध में तबाह हो गए समुदायों में मुख्य धारा के आघात प्रयास, मानव के अधिकारों और सामाजिक न्याय पर ध्यान केन्द्रित करने में क्यों असफल हो जाते हैं संक्षेप में, गंभीर मनोविज्ञान, जहाँ यह समाज के लिए, एक व्यक्ति से विश्लेषण के मनोवैज्ञानिक स्तर को उठाने में उपयुक्त प्रतीत होता है, और मनोविज्ञान को उन्नत के तुलना में अधिक रूपांतरणीय बनाता है। गंभीर मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के अन्य उपक्षेत्रों की विस्तृत सारणी पर लागू होता है और इसके कई सिद्धांतवादी, मुख्यधारा मनोविज्ञानी पेशे में कार्यरत हैं।

विकासात्मक मनोविज्ञान () में मुख्य रूप से जीवन अवधि के माध्यम से मानव मस्तिष्क के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, इसमें यह बात समझी जाती है कि लोग कैसे दुनिया में होने वाली क्रियाओं को समझते हैं, उन पर प्रतिक्रिया करते हैं और यह प्रक्रिया उनकी उम्र बढ़ने के साथ कैसे बदल जाती है। यह बौद्धिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक, तंत्रिका, या नैतिक विकास () पर ध्यान केन्द्रित कर सकता है। शोधकर्ता जो बच्चों का अध्ययन करते हैं, वे प्राकृतिक सेटिंग्स में अवलोकन करने के लिए कई अद्वितीय अनुसंधान विधियों का प्रयोग करते हैं या उन्हें प्रयोगात्मक कार्यों में व्यस्त करते हैं। इस प्रकार के कार्य सामान्यतः विशेष रूप से डिजाईन किये गए खेल या गतिविधियाँ होती हैं, जो बच्चों के लिए मजेदार भी होती हैं और वैज्ञानिक रूप से उपयोगी भी होती हैं। और शोधकर्ताओं ने यहाँ तक कि छोटे शिशुओं की मानसिक प्रक्रियाओं को अध्ययन करने के लिए भी चतुराई पूर्ण तरीके तैयार किये हैं। बच्चों का अध्ययन करने के अलावा, विकासात्मक मनोविज्ञानी उम्र बढ़ने () का व जीवन अवधि के दौरान होने वाली प्रक्रियाओं का भी अध्ययन करते हैं, यह अध्ययन विशेष रूप से तीव्र परिवर्तन के समय पर किया जाता है (जैसे किशोरावस्था और बुढ़ापे के समय)। विकास मनोवैज्ञानिक अपने अनुसंधान की जानकारी देने के लिए वैज्ञानिक मनोविज्ञान में सिद्धान्तवादियों की पूरी रेंज को आकर्षित करते हैं।

शैक्षिक मनोविज्ञान () में इस बात का अध्ययन किया जाता है कि मनुष्य कैसे शैक्षिक सेटिंग्स में सीखते हैं, साथ ही शैक्षिक हस्तक्षेप की प्रभावशीलता, शिक्षण के मनोविज्ञान और विद्यालयों के संगठनों के सामाजिक मनोविज्ञान () का अध्ययन भी किया जाता है। बाल मनोवैज्ञानिकों जैसे लेव वयगोटस्की (), जीन पिअगेत () और जेरोम ब्रूनर () का कार्य शिक्षण () तरीकों और शैक्षिक प्रथाओं के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण रहा है। शैक्षिक मनोविज्ञान को अक्सर अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम में शामिल किया जाता है, कम से कम उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ऐसा किया जाता है।

विकासवादी मनोविज्ञान () मानसिक और व्यवहारिक प्रतिरूप के आनुवंशिक () जड़ों को स्पष्ट करता है और बताता है कि सामान्य प्रतिरूप उत्पन्न हुए हैं क्योंकि वे उनके पिछले विकास शील वातावरण में मानव के लिए उच्च अनुकूली () थे; यहाँ तक कि इनमें से कुछ प्रतिरूप आज के वातावरण में उपयुक्त अनुकूली नहीं हैं। विकासवादी मनोविज्ञान से निकट संबंधी क्षेत्र हैं पशु व्यवहार पारिस्थितिकी (), मानव व्यवहार पारिस्थितिकी (), दोहरा आनुवंशिक सिद्धांत () और सामाजिक जैव विज्ञान ().मेमेटिक्स () जिसकी खोज ब्रिटिश विकासवादी जीवविज्ञानी () रिचर्ड डाकिंस () के द्वारा की गयी। यह सम्बंधित लेकिन प्रतिस्पर्धी क्षेत्र है जो बताता है कि सांस्कृतिक विकास () एक डार्विनी अर्थ में हो सकता है लेकिन यह मेंडल () की प्रणाली से स्वतंत्र होता है; इसलिए यह उन तरीकों की जाँच करता है जिनमें विचार या मेमे (), संभवतः जीन से स्वतंत्र रूप से विकसित हो सकते हैं।

फॉरेंसिक मनोविज्ञान () प्रथाओं की एक व्यापक रेंज को कवर करता है, जिसमें प्रतिवादी () का नैदानिक मूल्यांकन () शामिल है। यह दिए गए मुद्दों पर अदालती गवाही, जजों और कानूनी प्रतिनिधियों के लिए रिपोर्ट देता है। फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिकों को अदालत के द्वारा नियुक्त किया जाता है या कानूनी प्रतिनिधियों के द्वारा उन्हें हायर किया जाता है ताकि परीक्षण मूल्यांकन का संचालन किया जा सके, कार्यान्वित मूल्यांकन की प्रतिस्पर्धा का संचालन किया जा सके, विवेक मूल्यांकन, अस्वैच्छिक प्रतिबद्धता मूल्यांकन, यौन अपराधी मूल्यांकन और उपचार मूल्यांकन किया जा सके तथा लिखित रिपोर्ट और गवाही के माध्यम से अदालत को सिफारिशें उपलब्ध करायी जा सकें। बहुत से प्रश्न जो अदालत, फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिकों से पूछती है, अंततः कानूनी मुद्दों () पर जाते हैं, हालाँकि एक मनोविज्ञानी कानूनी प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता है। उदहारण के लिए, मनोविज्ञान में मानसिक संतुलन की परिभाषा नहीं है। बल्कि, मानसिक संतुलन एक कानूनी परिभाषा है जो दुनिया भर में अलग अलग जगह पर अलग अलग होती है। इसलिए, एक फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिक की एक प्रमुख योग्यता व्यवस्था, कानून की, विशेष रूप से आपराधिक कानून की एक अभिन्न समझ है।

स्वास्थ्य मनोविज्ञान () मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का अनुप्रयोग है और स्वास्थ्य, बीमारी और स्वास्थ्य देखभाल के लिए अनुसंधान है। जबकि नैदानिक मनोविज्ञान मानसिक स्वास्थ्य, तंत्रिका विकार पर ध्यान केन्द्रित करता है, स्वास्थ्य मनोविज्ञान () एक स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार की एक अधिक व्यापक रेंज के मनो विज्ञान से सम्बंधित है जिसमें स्वस्थ भोजन, चिकित्सक रोगी संबंध, स्वास्थ्य सूचना के बारे में एक रोगी की समझ और बीमारी के बारे में विश्वास शामिल हैं। स्वास्थ्य मनोवैज्ञानिक जन स्वास्थ्य अभियान में शामिल हो सकते हैं, ये बीमारी या स्वास्थ्य नीति के जीवन की गुणवत्ता () पर प्रभाव की जाँच करते हैं और स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर अनुसंधान करते हैं।

औद्योगिक और संगठनात्मक मनोविज्ञान () (आई / ओ) कार्यस्थान पर मानव की क्षमता को अनुकूलित करने के लिए मनोवैज्ञानिक अवधारणाओं और विधियों को लागू करते हैं। कार्मिक मनोविज्ञान, आई / ओ मनोविज्ञान का एक उप क्षेत्र, मनोविज्ञान के सिद्धांतों और विधियों को श्रमिकों के चयन और मूल्यांकन पर लागू करता है। आई / ओ मनोविज्ञान का अन्य उपक्षेत्र, संगठनात्मक मनोविज्ञान (), काम के वातावरण और प्रबंधन शैलियों के कार्यकर्ता प्रेरणा, नौकरी से संतुष्टि और उत्पादकता पर प्रभाव की जाँच करता है।

कानूनी मनोविज्ञान () एक शोध उन्मुख क्षेत्र है जिसमें मनो विज्ञान की कई भिन्न क्षेत्रों से अनुसंधानकर्ता होते हैं (हालाँकि सामाजिक () और संज्ञानात्मक () मनोवैज्ञानिक प्रारूपिक होते हैं।) कानूनी मनोवैज्ञानिक जूरी निर्णय, प्रत्यक्षदर्शी स्मृति, वैज्ञानिक सबूत और कानूनी नीति जैसे विषयों को स्पष्ट करते हैं। शब्द कानूनी मनोविज्ञान हाल ही में उपयोग में आया है और आम तौर पर किसी भी गैर नैदानिक कानून से संबंधित अनुसंधान के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

व्यक्तित्व मनोविज्ञान () एक व्यक्ति में व्यवहार (), सोच () और भावना () के प्रतिरूप का अध्ययन करता है, इसका प्रयोग आम तौर पर  के लिए किया जाता है। व्यक्तित्व के सिद्धांत विभिन्न मनोवैज्ञानिक स्कूलों और संस्थाओं में अलग अलग हो सकते हैं। वे ऐसे मुद्दों के लिए भिन्न अनुमान लगा सकते हैं, जैसे अचेत () की भूमिका और बचपन के अनुभव के महत्व। फ्रुड के अनुसार, व्यक्तित्व अहंकार, अति अहंकार, और आई डी की गतिक अंतर क्रियाओं पर निर्भर करता है। इसके विपरीतविशेषता सिद्धांतवादी (), कारक विश्लेषण () की सांख्यिकीय गतिविधियों के द्वारा कुंजी लक्षणों की असतत संख्या के शब्दों में व्यक्तित्व का विश्लेषण करने के प्रयास करते हैं। प्रस्तावित लक्षणों की संख्या व्यापक रूप से कई प्रकार की होती है।हंस आईजेंक () के द्वारा प्रस्तावित एक प्रराम्भ्की मॉडल बताता है कि तीन ऐसे गुण हैं जो मानव व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं: बहिर्मुखी और अंतर मुखी होना (), तंत्रिका वाद (), मनोवाद ().रेमंड केटल () ने 16 व्यक्तित्व कारकों () का सिद्धांत प्रस्तावित किया। बड़ा पाँच () पाँच करक मॉडल, जो लुईस गोल्डवर्ग () के द्वारा प्रस्तावित किया गया, वर्तमान में उसे लक्षण सिद्धांत वादियों के बीच प्रबल समर्थन मिला है।

मात्रात्मक मनोविज्ञान () में मनोवैज्ञानिक अनुसंधान में गणितीय और सांख्यिकीय मॉडलिंग के अनुप्रयोग शामिल हैं, साथ ही व्यवहारिक आंकडों के विश्लेषण और स्पष्टीकरण के लिए सांख्यिकीय विधियों का विकास भी शामिल है। शब्द मात्रात्मक मनोविज्ञान अपेक्षाकृत नया है और बहुत कम इस्तेमाल किया जाता है, (हाल ही में मात्रात्मक मनोविज्ञान में पीएचडी प्रोग्राम किये गए हैं) और यह शिथिल रूप से मनोमीती () और गणितीय मनोविज्ञान () उपक्षेत्रों को कवर करता है।

मनोमिति () मनो विज्ञान का एक क्षेत्र है जो मनो वैज्ञानिक मापन की तकनीक और सिद्धांत से सम्बंधित है, जिसमें ज्ञान, क्षमता (), दृष्टिकोण () और व्यक्तित्व के लक्षणों () का मापन शामिल है। प्रेक्षण के लिए अयोग्य इस घटना () का मापन मुश्किल है और इस विषय में अधिकांश अनुसंधान और संचित ज्ञान का विकास हुआ है ताकि इसे ठीक प्रकार से परिभाषित किया जा सके और ऐसी घटना का मात्रात्मक अनुमान लगाया जा सके। मनोमीती अनुसंधान में प्रारूपिक रूप से दो मुख्य अनुसंधान कार्य शामिल हैं नामतः (i) यंत्रों () का निर्माण और मापन के लिए प्रक्रियाएं और (ii) मापन के लिए सैद्धांतिक दृष्टिकोण के शोधन और विकास.

जबकि मनोमीति () मुख्य रूप से व्यक्तिगत मतभेद () और जनसंख्या संरचना () से सम्बंधित है और गणितीय मनोविज्ञान () औसत व्यक्ति कीमानसिक () और प्रेरक प्रक्रियाओं () की मॉडलिंग से सम्बंधित है। मनोमीति () शैक्षिक मनोविज्ञान, व्यक्तित्व () और नैदानिक मनोविज्ञान से अधिक सम्बंधित है।गणितीय मनोविज्ञान () अधिक निकट रूप से साइको नोमिक्स ()/प्रयोगात्मक () और संज्ञानात्मक () और शरीर क्रिया मनोविज्ञान () और (संज्ञानात्मक ()) तंत्रिका विज्ञान () से सम्बंधित है।

सामाजिक मनोविज्ञान () सामाजिक व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन है, जिसमें इस बात पर जोर दिया जाता है कि लोग कैसे एक दूसरे के बारे में सोचते हैं और कैसे एक दूसरे से सम्बंधित होते हैं। सामाजिक मनोवैज्ञानिक विशेष रूप से इस बात में रूचि लेते हैं, के लोग सामाजिक स्थिति के लिए कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। वे ऐसे विषयों को एक व्यक्ति के व्यवहार पर दूसरों के प्रभाव के रूप में अध्ययन करते हैं (उदाहरण समनुरूपता (), अनुनय ()) और साथ ही अन्य लोगों के बारे में विश्वासों के गठन, दृष्टिकोण () और स्टीरियोटाइप () पर दूसरों के प्रभाव के रूप में अध्ययन करते हैं।सामाजिक अनुभूति () में सामाजिक और संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के तत्व संग्लित हो जाते हैं ताकि इस बात को समझा जा सके के लोग कैसे सामाजिक जानकारियों को याद रखते हैं, उन पर प्रतिक्रिया करते हैं और उन्हें विकृत करते हैं।समूह गतिशीलता () का अध्ययन नेतृत्व, संचार और वे घटनाएँ जो कम से कम सूक्ष्मदर्शीय () स्तर पर विकसित होती हैं, के अनुकूलन की क्षमता और प्रकृति के बारे में जानकारी प्रकट करता है। हाल ही के वर्षों में, कई सामाजिक मनोवैज्ञानिकों ने अंतर्निहित () उपायों, मध्यस्थ () मॉडलों और व्यवहार के लेखांकन में व्यक्तियों और समाज की अंतर क्रिया पर बहुत अधिक रूचि दर्शायी है।

स्कूल मनोविज्ञान () में शैक्षिक मनोविज्ञान () और नैदानिक मनोविज्ञान () दोनों के सिद्धांत शामिल हैं ताकि जिन विद्यार्थियों में सीखने की क्षमता का अभाव है, उनका उपचार किया जा सके और उन्हें समझा जा सके; बहुत अच्छे विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास को बढ़ावा दिया जा सके; किशोरों में पूर्व सामाजिक व्यवहार को बढ़ावा दिया जा सके; और सुरक्षित, सहायक और प्रभावी शिक्षण वातावरण का विकास किया जा सके। स्कूल मनोवैज्ञानिक शैक्षिक और व्यवहार मूल्यांकन, हस्तक्षेप, रोकथाम और परामर्श में प्रशिक्षित होते हैं और अधिकांश अनुसंधान में व्यापक प्रशिक्षण लेते हैं। वर्तमान में, स्कूल मनोविज्ञान एक मात्र क्षेत्र है जिसमें, एक पेशेवर को एक डॉक्टरेट की डिग्री के बिना एक मनोवैज्ञानिक कहा जा सकता है,स्कूल मनोविज्ञानवेत्ताओं का राष्ट्रीय संघ () (एन ऐ एस पी) प्रवेश स्तर पर विशेषज्ञ की डिग्री () देता है। यह एक विवादास्पद मामला है क्योंकि ऐ पी ऐ () एक मनोवैज्ञानिक के लिए प्रवेश स्तर के रूप में एक डॉक्टरेट से नीचे कुछ भी नहीं मानता है। विशेषज्ञ स्तरीय स्कूल मनो विज्ञानी, जो आमतौर पर तीन साल का स्नातक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, वे स्कूल प्रणाली में विशेष रूप से कार्य करते हैं, जबकि डॉक्टरेट के स्तर के लोग अन्य सेटिंग्स में भी पाए जाते हैं, जिनमें विश्व विद्यालय, अस्पताल, क्लिनिक और निजी प्रेक्टिस शामिल है।

मनोविज्ञान के अधिकांश क्षेत्रों में अनुसंधान वैज्ञानिक विधियों () के मानकों के साथ संचालित किये गए हैं जिसमें गुणात्मक ()इथोलोजिकल () और मात्रात्मक सांख्यिकीय () दोनों प्रकार की रूपात्मकताये शामिल हैं, जो मनोवैज्ञानिक घटना () के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण () परिकल्पना () का मूल्यांकन करता है और इसे उत्पन्न करता है। जाँच को प्रयोगात्मक प्रोटोकॉल () के द्वारा किया जा सकता है, लेकिन कभी कभी नुसंधान नैतिकता के कारण, एक दिए गए अनुसंधान डोमेन में विकास की अवस्था के कारण और अन्य कारणों से वैकल्पिक तरीकों को प्राथमिकता दी जाती है।

मनो विज्ञान एक्लेक्टिक () प्रवृति रख सकता है, ताकि मनो वैज्ञानिक घटना को समझने के लिए और उसे स्पष्ट करने के लिए अन्य क्षेत्र से ज्ञान प्राप्त किया जा सके। उदाहरण के लिए, विकासवादी मनो विज्ञानी, मनोविज्ञान, जैव विज्ञान और एन्थ्रोपोलोजी के कई उप क्षेत्रों से आंकडों का निर्माण कर सकते हैं। इसके अलावा, वे दो भिन्न प्रकार के कारणों का व्यापक उपयोग करते हैं। हालाँकि अक्सर सख्त धनात्मकता के निगमनात्मक-नोमोलोजिकल () तर्क को अपनाते हुए, वे आगमनात्मक तर्क () पर भरोसा करते हैं, ताकि शिकारी-संग्राहक () जीवन के खाते बनाये जा सके, जो भिन्न विचारों व क्रियाओं के अनुकूली मूल्य को स्पष्ट कर सकेगा .

गुणात्मक मनोवैज्ञानिक अनुसंधान () प्रेक्षणीय तरीकों के एक व्यापक स्पेक्ट्रमका उपयोग करता है, इसमें क्रिया अनुसंधान (), नृवंशविज्ञान (), अन्वेषणत्मक आंकडे (), संरचित () साक्षात्कार () और भागीदार अवलोकन () शामिल है, जो क्लासिकल प्रयोगों के द्वारा अच्छी जानकारी प्राप्त करने में मदद करते हैं। मानवता मनो विज्ञान में अनुसंधान, विज्ञान के बजाय अधिक प्रारूपिक रूप से नृवंशविज्ञान (), ऐतिहासिक () और इतिहास लेखन () की विधियों से किया जाता है। मनो गतिकी अनुसंधान ने चिकित्सकीय मामलों के अध्ययन के अनुमान में पारंपरिक रूप से भाग लिया है, फ्रुड के मनो विश्लेषण से लेकर नव-जंगीय आद्य रूप मनो विज्ञान तक के उप स्कूलों ने व्याख्या के एक वाहन के रूप में मिथक () पर कार्य किया है। हाल ही के विकास विशेष रूप से तंत्रिका मनो विश्लेषण में, विकास ने अपेक्षाकृत रूप से वैज्ञानिक निठरता के उच्च स्तर की मांग की है।

महत्वपूर्ण मनोविज्ञान के लिए एक अग्रदूतमुक्ति मनोविज्ञान () ने अपने बंधन मुक्त प्रश्नों में पारंपरिक सर्वे किया है। महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिकों के बीच एक विवाद है कि केवल उन्हें ही वे अनुसंधान लागू करना चाहिए जिसे वे संचालित करते हैं और उन्हें कैसे क्रियोन्मुख या जागरूकता की और उन्मुख होना चाहिए। सामान्य रूप में, हालाँकि, उनकी विधियां सकारात्मक से ज्यादा जटिल हो सकती हैं और इसीलिए, उन्हें न केवल वैज्ञानिक विधियों से बचना चाहिए बल्कि उन तरीकों की भी पहचान करनी चाहिए जिसमें इस विधि का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता है और उसका दुरूपयोग किया जाता है। गंभीर मनो वैज्ञानिक अनुसंधान में एक मुख्य अवधारणा है रिफ्लेकसीविटी () या गंभीर आत्म निरिक्षण जो इस बात का स्पष्टीकरण देता है कि (मनो विज्ञानी) मूल्य और मान्यताएं किस प्रकार से (उनके) सैद्धांतिक और विधिपूर्वक लक्ष्यों, क्रियाओं और व्याख्याओं को प्रभावित करते हैं। एक रिफ्लेकसिव दृष्टिकोण लेते हुए, गंभीर मनो विज्ञानी मनोवैज्ञानिक मामलों की वर्तमान अवस्था की जाँच करते हैं और पुराने प्रश्नों और - पर सुरक्षात्मक स्थिति को तलाश में रहते हैं; जैसे कि मुक्त इच्छा बनाम नियतत्ववाद (), प्रकृति बनाम पोषण (), [और] चेतना () बनाम अचेत () बल.

मनोवैज्ञानिक कार्यों के विविध पहलुओं का परीक्षण () मुख्यधारा मनोविज्ञान का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
मनोमितीय () और सांख्यिकीय विधियाँ प्रभावी होती हैं, इनमें भिन्न जाने माने मानक परिक्षण शामिल हैं और वे जो स्थिति या प्रयोग को आवश्यकता के अनुसार बनाये जाते हैं।

अकादमिक मनोविज्ञानी, शुद्ध रूप से अनुसंधान और मनो वैज्ञानिक सिद्धांत पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं, जिनका उद्देश्य है विशेष क्षेत्र में अग्रणी मनोवैज्ञानिक समझ, जबकि मनो विज्ञानी अनुप्रयोग मनो विज्ञान () पर कार्य कर सकते हैं, ताकि इस प्रकार के ज्ञान को तात्कालिक और प्रायोगिक लाभ पर लागू किया जा सके। ये दृष्टिकोण परस्पर, विशिष्ट नहीं होते हैं और कई मनो विज्ञानी करियर के दौरान किसी बिंदु पर मनोविज्ञान को लागू करने और इस क्षेत्र में अनुसंधान में लगे होते हैं। कई नैदानिक मनोविज्ञान के कार्यक्रमों का लक्ष्य होता है मनोविज्ञानियों के अभ्यास में ज्ञान का विकास और अनुसंधान व प्रायोगिक विधियों में अनुभव का विकास, जब वे मनो वैज्ञानिक मुद्दों से युक्त व्यक्तियों का इलाज करते हैं तब इन विकास के बिन्दुओं को रोगियों पर लागू करते हैं।

जब किसी क्षेत्र को विशेष प्रशिक्षण और विशेष ज्ञान को जरुरत होती है, खासकर अनुप्रयोग क्षेत्रों में, मनोवैज्ञानिक संघ सामान्य रूप से प्रशिक्षण को जरूरतों के प्रबंधन के लिए एक प्रशासन निकाय को स्थापना करते हैं। इसी प्रकार, मनोविज्ञान में विश्व विद्यालयी डिग्री को जरुरत हो सकती है, ताकि विद्यार्थी कई क्षेत्रों में उपयुक्त ज्ञान प्राप्त कर सकें। इसके अतिरिक्त, प्रायोगिक मनोविज्ञान के क्षेत्र, जहाँ मनो विज्ञानी दूसरों का उपचार करते हैं, उन्हें जरुरत हो सकती है कि उन्हें सरकार द्वारा विनियमित किसी इकाई से लाइसेंस लेना पड़े।

प्रायोगिक मनोवैज्ञानिक अनुसंधान का संचालन एक प्रयोगशाला में नियंत्रित स्थितियों में किया जाता है। अनुसंधान को यह विधि व्यवहार को समझने के लिए वैज्ञानिक विधि () के अनुप्रयोग पर निर्भर करता है। प्रयोगकर्ता कई प्रकार के मापन का प्रयोग करते हैं, जिसमें प्रतिक्रिया की दर, प्रतिक्रिया का समय () और भिन्न मनोमितीय () शामिल हैं। प्रयोगों को विशेष परिकल्पना () के परीक्षण () के लिए (निगमनात्मक दृष्टिकोण) या कार्यात्मक संबंध के मूल्यांकन के लिए (आगमनात्मक दृष्टिकोण) डिजाईन किया गया है। वे शोधकर्ताओं को व्यवहार और वातावरण के भिन्न पहलूओं के बीच अनौपचारिक सम्बन्ध स्थापित करने की अनुमति देते हैं। एक प्रयोग में, रूचि के एक या अधिक चरों को प्रयोगकर्ता के द्वारा नियंत्रित किया जाता है (स्वतंत्र चर) और अन्य चर का मापन विभिन्न स्थितियों की प्रतिक्रिया में किया जाता है। (आश्रित चर) मनोविज्ञान के कई क्षेत्रों में प्रयोग प्राथमिक अनुसंधान विधियों में से एक है, विशेष रूप से संज्ञानात्मक ()/साइकोनोमिक्स (), गणितीय मनोविज्ञान (), मनोशरीरकार्यिकी () और जैविक मनोविज्ञान ()/संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान ().

मानव पर प्रयोग कुछ नियंत्रण के अंतर्गत किये गए हैं, जो नाम के द्वारा सूचित किये गए हैं और स्वैच्छिक सहमति के हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, प्रायोगिक विषयों के नाजी गलतियों की वजह से नुरेमबर्ग कोड () की स्थापना की गयी। बाद में, अधिकांश देशों (और वैज्ञानिक पत्रिकाओं) ने हेलसिंकी की घोषणा () को अपना लिया। अमेरिका में, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के () ने १९६६ में संस्थागत समीक्षा बोर्ड () की स्थापना की और १९७४ में राष्ट्रीय अनुसंधान अधिनियम () (मानव संसाधन ७७२४) को अपना लिया। इन सभी कारणों से अनुसंधानकर्ता प्रयोगात्मक अध्ययनों में मानव प्रतिभागियों से सूचित सहमति प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित हुए। कई प्रभावी अध्ययनों से इस नियम की स्थापना हुई; इन अध्ययनों में शामिल थे, एमआईटी और फर्नाल्ड स्कूल रेडियो आइसोटोप का अध्ययन, थेलीडोमाईड त्रासदी (), विलोब्रुक हेपेटाइटिस () का अध्ययन और स्टैनले मिल्ग्राम () का सत्ता के लिए आज्ञाकारिता का अध्ययन।

सांख्यिकी सर्वेक्षणों का उपयोग, मनोविज्ञान में व्यवहार और लक्षणों के मापन के लिए, मूड में परिवर्तन के नियंत्रण के लिए, प्रयोगात्मक अभिव्यक्ती की वैद्यता की जाँच के लिए किया जाता है। साथ ही कई अन्य मनोवैज्ञानिक विषयों में भी इसका प्रयोग किया जाता है। सबसे अधिक सामान्य रूप से, मनोविज्ञानी कागज और पेंसिल सर्वेक्षण का उपयोग करते हैं। बहरहाल, सर्वेक्षण फोन पर या ई मेल के माध्यम से भी किए जा सकते हैं। तेजी से बढ़ते हुए, वेब आधारित सर्वेक्षण अनुसंधान में प्रयोग किए जा रहे हैं। समान विधी का उपयोग अनुप्रयोग सेटिंग में किया जाता है जैसे नैदानिक मूल्यांकन और आकलन कर्मियों का मूल्यांकन.

एक अनुदैर्ध्य अध्ययन () अनुसंधान की एक विधी है जो समय के साथ एक विशेष जनसंख्या का प्रेक्षण करती है। उदाहरण के लिए, कोई एक समय अवधि के दौरान व्यक्तियों के एक समूह के प्रेक्षण के द्वारा, कुछ शर्तों के साथविशिष्ट भाषा हानि () का अध्ययन करना चाह सकता है, इस विधी में यह लाभ होता है कि इससे पता चल जाता है कि कैसे लम्बे समय के दौरान परिस्थितियाँ एक व्यक्ति को प्रभावित करती हैं। हालाँकि, ऐसे अध्ययनों में विषय की मृत्यु हो जाने पर या चले जाने पर मुश्किल हो जाती है। इसके अतिरिक्त, चूँकि समूह के सदस्यों के बीच अंतर नियंत्रित नहीं होता है, जनसंख्या के बारे में निष्कर्ष निकालना मुश्किल हो सकता है। 
अनुदैर्ध्य अध्ययन एक विकास अनुसंधान रणनीति है जिसमें कई वर्षों के दौरान बार बार एक आयु वर्ग की जांच की जाती है। अनुदैर्ध्य अध्ययन इस बारे में सजीव प्रश्नों का उत्तर देते हैं कि कैसे लोगों का विकास होता है। यह विकास अनुसंधान कई सालों के दौरान लोगों का अनुसरण करता है और परिणाम, मनोवैज्ञानिक समस्याओं से विशेष रूप से सम्बंधित खोज की अविश्वसनीय सारणी होती है।

उसी तरह जेन गुडाल () ने चिंपांज़ी () की सामाजिक और पारिवारिक जीवन का अध्ययन किया, मनो विज्ञानी इसी प्रकार के अध्ययन मानव के सामाजिक, पेशेवर और पारिवारिक जीवन के लिए करते हैं। कभी कभी प्रतिभागी यह जानते हैं कि उनका प्रेक्षण किया जा रहा है और कभी कभी यह गुप्त होता है: प्रतिभागियों को यह नहीं पता होता कि उन पर प्रेक्षण किया जा रहा है। नीतिशास्त्रीय दिशानिर्देश पर विचार किया जाना चाहिए जब गुप्त प्रेक्षण किया जा रहा है।

मामलों की वर्तमान स्थिति, जैसे विचार, अहसास और व्यक्ति के व्यवहार, के बारे में प्रश्नों के उत्तर देने के लिए डिजाईन किया गया अनुसंधान, वर्णनात्मक अनुसंधान कहलाता है। वर्णनात्मक अनुसंधान अभिविन्यास में मात्रात्मक या गुणात्मक हो सकता है। गुणात्मक अनुसंधान एक वर्णनात्मक अनुसंधान है जो घटनाओं के प्रेक्षण और वर्णन पर ध्यान केन्द्रित करता है, जब ये घटनाएँ घटती हैं, इसका उद्देश्य है प्रतिदिन के व्यवहार की गुणवत्ता को पकड़ना और घटना को समझने और उसकी खोज की आशा के साथ, जो छूट सकता है यदि अधिक सरसरा परिक्षण किया जाये.

तंत्रिका मनोविज्ञान () में स्वस्थ व्यक्तियों और रोगियों दोनों का अध्ययन शामिल है, प्रारूपिक रूप से जो मस्तिष्क की चोट () या मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं।

संज्ञानात्मक तंत्रिका मनोविज्ञान () और संज्ञानात्मक तंत्रिका मनो चिकित्सा () में तंत्रिका और मानसिक कार्यों का अध्ययन किया जाता है, ताकि सामान्य मस्तिष्क व मन के सिद्धांतों का निष्कर्ष निकला जा सके। इसमें प्रारूपिक रूप से बची हुई क्षमता के प्रतिरूप में अंतर के लिए खोज शामिल है, (जो कार्यात्मक अ-संगठन कहलाता है) जो इस बात के सुराग दे सकता है कि यदि क्षमताएं छोटे कार्य से युक्त हैं या एकमात्र संज्ञानात्मक प्रणाली के द्वारा नियंत्रित की जाती हैं।

इसके अलावा, प्रयोगात्मक तकनीक अक्सर स्वस्थ व्यक्तियों के तंत्रिका विज्ञान के अध्ययन के लिए उपयोग किया जाता है। इसमें व्यवहारिक प्रयोग, मस्तिष्क की स्केनिंग, या कार्यात्मक तंत्रिका इमेजिंग () शामिल है जिसका उपयोग, कार्य निष्पादन के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियों की जांच करने के लिए किया जाता है और उन तकनीकों जैसे परा क्रेनियम चुम्बकीय उत्प्रेरण () की जाँच के लिए किया जाता है जो छोटे मस्तिष्क के क्षेत्रों के कार्य को सुरक्षित रूप से परिवर्तित कर सकते हैं ताकि मानसिक गतिविधियों में उनके महत्त्व को प्रकट किया जा सके।

दो परतों के साथ 
कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग () का उपयोग अक्सर गणितीय मनोविज्ञान () और संज्ञानात्मक मनोविज्ञान () में किया जाता है, ताकि एक कंप्यूटर के उपयोग के द्वारा एक विशेष व्यवहार को उत्तेजित किया जा सके। इस विधि के कई फायदे हैं। चूंकि आधुनिक कंप्यूटर बहुत जल्दी प्रक्रिया करते हैं, कई उत्त्प्रेरण बहुत छोटे समय में किये जा सकते हैं, जो सांख्यिकीय क्षमता की बड़ी मात्रा की अनुमति देते हैं। मोडलिंग मनोविज्ञानियों को उन मानसिक घटनाओं के कार्यात्मक संगठन के बारे में परिकल्पना करने की अनुमति देता है जो मानव में प्रत्यक्ष रूप से प्रेक्षित नहीं की जा सकती हैं।

व्यवहार के अध्ययन के लिए मॉडलिंग के कई प्रकारों का उपयोग किया जाता है।संबंधवाद () मस्तिष्क को उत्तेजित करने के लिए तंत्रिका नेटवर्क () का उपयोग करता है। एनी विधि है प्रतीकात्मक मॉडलिंग, जो चरों और नियमों के उपयोग के द्वारा भिन्न मानसिक वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करता है। मॉडलिंग के अन्य प्रकारों में शामिल हैं गतिशील प्रणाली () और स्टोकेस्टिक () मॉडलिंग.

पशु अधिगम प्रयोग मनोविज्ञान के कई पहलुओं में महत्वपूर्ण हैं जैसे सीखना, स्मृति और व्यवहार के जैविक आधार पर जांच। 1890 में मनो विज्ञानी इवान पावलोव () ने क्लासिकल कंडिशनिंग () के प्रदर्शन के लिए कुत्तों का उपयोग किया जो काफी प्रसिद्द रहा। गैर मानव प्राइमेट्स () बिलियन, कुत्ते, चूहे और अन्य रोडेन्टस () अक्सर मनो वैज्ञानिक प्रयोगों में प्रयुक्त किये जाते हैं। नियंत्रित प्रयोगों में शामिल है एक समय में केवल एक चर () को शामिल करना। इसीलिए, प्रयोगों में प्रयुक्त किये जाने वाले पशुओं को प्रयोगशाला सेटिंग्स में रखा जाता है। इसके विपरीत, मानव वातावरण और आनुवंशिक पृष्ठभूमि व्यापक रूप से भिन्न प्रकार के होते हैं, जो मानव विषयों के लिए महत्ववपूर्ण चरों के नियंत्रण को मुश्किल बनाता है।

मनोविज्ञान की आलोचनाएँ अक्सर इस धारणा से आती हैं की यह एक उलझन भरा  विज्ञान है। दार्शनिक थॉमस कुहन () के १९६२ के आलोचक ने मनोविज्ञान को एक पूर्व समग्र अवस्था पर लागू किया, जिसमें ऐसे समझौतों का अभाव था जो परिपक्व विज्ञान जैसे रसायन शास्त्र और भौतिकी में पाए जाने वाले सिद्धांतों तक पहुँच सके। मनोवैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने विभिन्न तरीकों से इस मुद्दे को संबोधित किया है।

क्योंकि मनोविज्ञान के कुछ क्षेत्र अनुसंधान विधियों जैसे सर्वेक्षण और प्रश्नावली () पर भरोसा करते हैं, आलोचकों का यह मानना है की मनोविज्ञान वैज्ञानिक नहीं है। अन्य घटना जिसमें मनोविज्ञानी रूचि लेते हैं, जैसे व्यक्तित्व (), सोच () और भावना (), का मापन प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता है और अक्सर इन्हें विषयी स्व-रिपोर्टों से मापा जाता है, जो समस्या जनक हो सकता है।

संभाव्यता () की वैद्यता, जो सनुसंधान उपकरण के रूप में जांच करती है, उस पर प्रश्न उठते रहे हैं। इसमें सोचने की बात है कि सांख्यिकीय विधियाँ अर्थपूर्ण रूप में तुच्छ निष्कर्षों को बढ़ावा दे सकती हैं, विशेष रूप से जब बड़े नमूनों का उपयोग किया जाता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने प्रभावी आकार () सांख्यिकी के बढे हुए उपयोग के साथ प्रतिक्रिया दी है, इसके बजाय सांख्यिकीय परिकल्पना परिक्षण में यह केवल पारंपरिक पी न्यूरिन्जर, ऐ.:मेलियोरेशन एंड सेल्फ एक्सपेरीमेनटेशन  व्यवहार के प्रयोगात्मक विश्लेषण की जर्नल 




#Article 27: मनोविज्ञान (2959 words)


मनोविज्ञान (Psychology) वह शैक्षिक व अनुप्रयोगात्मक विद्या है जो प्राणी (मनुष्य, पशु आदि) के मानसिक प्रक्रियाओं (mental processes), अनुभवों तथा व्यक्त व अव्यक्त दाेनाें प्रकार के व्यवहाराें का एक क्रमबद्ध तथा वैज्ञानिक अध्ययन करती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि मनोविज्ञान एक ऐसा विज्ञान है जो क्रमबद्ध रूप से (systematically) प्रेक्षणीय व्यवहार (observable behaviour) का अध्ययन करता है तथा प्राणी के भीतर के मानसिक एवं दैहिक प्रक्रियाओं जैसे - चिन्तन, भाव आदि तथा वातावरण की घटनाओं के साथ उनका संबंध जोड़कर अध्ययन करता है। इस परिप्रेक्ष्य में मनोविज्ञान को व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं के अध्ययन का विज्ञान कहा गया है। 'व्यवहार' में मानव व्यवहार तथा पशु व्यवहार दोनों ही सम्मिलित होते हैं। मानसिक प्रक्रियाओं के अन्तर्गत संवेदन (Sensation), अवधान (attention), प्रत्यक्षण (Perception), सीखना (अधिगम), स्मृति, चिन्तन आदि आते हैं।

मनोविज्ञान अनुभव का विज्ञान है। इसका उद्देश्य चेतनावस्था की प्रक्रिया के तत्त्वों का विश्लेषण, उनके परस्पर संबंधों का स्वरूप तथा उन्हें निर्धारित करनेवाले नियमों का पता लगाना है। 

शिवम- मनोविज्ञान मानव अन्तरनिहित वेदनाओं का संग्रह है|

मनोविज्ञान की परिभाषाएँ :-

प्राक्-वैज्ञानिक काल (pre-scientific period) में मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र (Philosophy) का एक शाखा था। जब विल्हेल्म वुण्ट (Wilhelm Wundt) ने १८७९ में मनोविज्ञान की पहला प्रयोगशाला खोला, मनोविज्ञान दर्शनशास्त्र के चंगुल से निकलकर एक स्वतंत्र विज्ञान का दर्जा पा सकने में समर्थ हो सका।

मनोविज्ञान पर वैज्ञानिक प्रवृत्ति के साथ-साथ दर्शनशास्त्र का भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। वास्तव में वैज्ञानिक परंपरा बाद में आरंभ हुई पहले तो प्रयोग या पर्यवेक्षण के स्थान पर विचारविनिमय तथा चिंतन समस्याओं को सुलझाने की सर्वमान्य विधियाँ थीं मनोवैज्ञानिक समस्याओं को दर्शन के परिवेश में प्रतिपादित करनेवाले विद्वानों में से कुछ के नाम उल्लेखनीय हैं।

डेकार्ट (1596 - 1650) ने मनुष्य तथा पशुओं में भेद करते हुए बताया कि मनुष्यों में आत्मा होती है जबकि पशु केवल मशीन की भाँति काम करते हैं। आत्मा के कारण मनुष्य में इच्छाशक्ति होती है। पिट्यूटरी ग्रंथि पर शरीर तथा आत्मा परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। डेकार्ट के मतानुसार मनुष्य के कुछ विचार ऐसे होते हैं जिन्हे जन्मजात कहा जा सकता है। उनका अनुभव से कोई संबंध नहीं होता। लायबनीत्स (1646 - 1716) के मतानुसार संपूर्ण पदार्थ मोनैड इकाई से मिलकर बना है। उन्होंने चेतनावस्था को विभिन्न मात्राओं में विभाजित करके लगभग दो सौ वर्ष बाद आनेवाले फ्रायड के विचारों के लिये एक बुनियाद तैयार की। लॉक (1632-1704) का अनुमान था कि मनुष्य के स्वभाव को समझने के लिये विचारों के स्रोत के विषय में जानना आवश्यक है। उन्होंने विचारों के परस्पर संबंध विषयक सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए बताया कि विचार एक तत्व की तरह होते हैं और मस्तिष्क उनका विश्लेषण करता है। उनका कहना था कि प्रत्येक वस्तु में प्राथमिक गुण स्वयं वस्तु में निहित होते हैं। गौण गुण वस्तु में निहित नहीं होते वरन् वस्तु विशेष के द्वारा उनका बोध अवश्य होता है। बर्कले (1685-1753) ने कहा कि वास्तविकता की अनुभूति पदार्थ के रूप में नहीं वरन् प्रत्यय के रूप में होती है। उन्होंने दूरी की संवेदनाके विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अभिबिंदुता धुँधलेपन तथा स्वत: समायोजन की सहायता से हमें दूरी की संवेदना होती है। मस्तिष्क और पदार्थ के परस्पर संबंध के विषय में लॉक का कथन था कि पदार्थ द्वारा मस्तिष्क का बोध होता है। ह्यूम (1711-1776) ने मुख्य रूप से विचार तथा अनुमान में भेद करते हुए कहा कि विचारों की तुलना में अनुमान अधिक उत्तेजनापूर्ण तथा प्रभावशाली होते हैं। विचारों को अनुमान की प्रतिलिपि माना जा सकता है। ह्यूम ने कार्य-कारण-सिद्धांत के विषय में अपने विचार स्पष्ट करते हुए आधुनिक मनोविज्ञान को वैज्ञानिक पद्धति के निकट पहुँचाने में उल्लेखनीय सहायता प्रदान की। हार्टले (1705-1757) का नाम दैहिक मनोवैज्ञानिक दार्शनिकों में रखा जा सकता है। उनके अनुसार स्नायु-तंतुओं में हुए कंपन के आधार पर संवेदना होती है। इस विचार की पृष्ठभूमि में न्यूटन के द्वारा प्रतिपादित तथ्य थे जिनमें कहा गया था कि उत्तेजक के हटा लेने के बाद भी संवेदना होती रहती है। हार्टले ने साहचर्य विषयक नियम बताते हुए सान्निध्य के सिद्धांत पर अधिक जोर दिया।

हार्टले के बाद लगभग 70 वर्ष तक साहचर्यवाद के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। इस बीच स्काटलैंड में रीड (1710-1796) ने वस्तुओं के प्रत्यक्षीकरण का वर्णन करते हुए बताया कि प्रत्यक्षीकरण तथा संवेदना में भेद करना आवश्यक है। किसी वस्तु विशेष के गुणों की संवेदना होती है जबकि उस संपूर्ण वस्तु का प्रत्यक्षीकरण होता है। संवेदना केवल किसी वस्तु के गुणों तक ही सीमित रहती है, किंतु प्रत्यक्षीकरण द्वारा हमें उस पूरी वस्तु का ज्ञान होता है। इसी बीच फ्रांस में कांडिलैक (1715-1780) ने अनुभववाद तथा ला मेट्री ने भौतिकवाद की प्रवृत्तियों की बुनियाद डाली। कांडिलैंक का कहना था कि संवेदन ही संपूर्ण ज्ञान का मूल स्त्रोत है। उन्होंने लॉक द्वारा बताए गए विचारों अथवा अनुभवों को बिल्कुल आवश्यक नहीं समझा। ला मेट्री (1709-1751) ने कहा कि विचार की उत्पत्ति मस्तिष्क तथा स्नायुमंडल के परस्पर प्रभाव के फलस्वरूप होती है। डेकार्ट की ही भाँति उन्होंने भी मनुष्य को एक मशीन की तरह माना। उनका कहना था कि शरीर तथा मस्तिष्क की भाँति आत्मा भी नाशवान् है। आधुनिक मनोविज्ञान में प्रेरकों की बुनियाद डालते हुए ला मेट्री ने बताया कि सुखप्राप्ति ही जीवन का चरम लक्ष्य है।

जेम्स मिल (1773-1836) तथा बाद में उनके पुत्र जान स्टुअर्ट मिल (1806-1873) ने मानसिक रसायनी का विकास किया। इन दोनों विद्वानों ने साहचर्यवाद की प्रवृत्ति को औपचारिक रूप प्रदान किया और वुंट के लिये उपयुक्त पृष्ठभूमि तैयार की। बेन (1818-1903) के बारे में यही बात लागू होती है। कांट ने समस्याओं के समाधान में व्यक्तिनिष्ठावाद की विधि अपनाई कि बाह्य जगत् के प्रत्यक्षीकरण के सिद्धांत में जन्मजातवाद का समर्थन किया। हरबार्ट (1776-1841) ने मनोविज्ञान को एक स्वरूप प्रदान करने में महत्वपूण्र योगदान किया। उनके मतानुसार मनोविज्ञान अनुभववाद पर आधारित एक तात्विक, मात्रात्मक तथा विश्लेषात्मक विज्ञान है। उन्होंने मनोविज्ञान को तात्विक के स्थान पर भौतिक आधार प्रदान किया और लॉत्से (1817-1881) ने इसी दिशा में ओर आगे प्रगति की।

मनोवैज्ञानिक समस्याओं के वैज्ञानिक अध्ययन का शुभारंभ उनके औपचारिक स्वरूप आने के बाद पहले से हो चुका था। सन् 1834 में वेबर ने स्पर्शेन्द्रिय संबंधी अपने प्रयोगात्मक शोधकार्य को एक पुस्तक रूप में प्रकाशित किया। सन् 1831 में फेक्नर स्वयं एकदिश धारा विद्युत् के मापन के विषय पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित कर चुके थे। कुछ वर्षों बाद सन् 1847 में हेल्मो ने ऊर्जा सरंक्षण पर अपना वैज्ञानिक लेख लोगों के सामने रखा। इसके बाद सन् 1856 ई, 1860 ई तथा 1866 ईदृ में उन्होंने आप्टिक नामक पुस्तक तीन भागों में प्रकाशित की। सन् 1851 ई तथा सन् 1860 ई में फेक्नर ने भी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दो महत्वपूर्ण ग्रंथ (ज़ेंड आवेस्टा तथा एलिमेंटे डेयर साईकोफ़िजिक प्रकाशित किए।

सन् 1858 ई में वुंट हाइडलवर्ग विश्वविद्यालय में चिकित्सा विज्ञान में डाक्टर की उपधि प्राप्त कर चुके थे और सहकारी पद पर क्रियाविज्ञान के क्षेत्र में कार्य कर रहे थे। उसी वर्ष वहाँ बॉन से हेल्मोल्त्स भी आ गए। वुंट के लिये यह संपर्क अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसी के बाद उन्होंने क्रियाविज्ञान छोड़कर मनोविज्ञान को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

वुंट ने अनगिनत वैज्ञानिक लेख तथा अनेक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित करके मनोविज्ञान को एक धुँधले एवं अस्पष्ट दार्शनिक वातावरण से बाहर निकाला। उसने केवल मनोवैज्ञानिक समस्याओं को वैज्ञानिक परिवेश में रखा और उनपर नए दृष्टिकोण से विचार एवं प्रयोग करने की प्रवृत्ति का उद्घाटन किया। उसके बाद से मनोविज्ञान को एक विज्ञान माना जाने लगा। तदनंतर जैसे-जैसे मरीज वैज्ञानिक प्रक्रियाओं पर प्रयोग किए गए वैसे-वैसे नई नई समस्याएँ सामने आईं।

आधुनिक मनोविज्ञान ==
आधुनिक मनोविज्ञान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में इसके दो सुनिश्चित रूप दृष्टिगोचर होते हैं। एक तो वैज्ञानिक अनुसंधानों तथा आविष्कारों द्वारा प्रभावित वैज्ञानिक मनोविज्ञान तथा दूसरा दर्शनशास्त्र द्वारा प्रभावित दर्शन मनोविज्ञान। वैज्ञानिक मनोविज्ञान 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से आरंभ हुआ है। सन् 1860 ई में फेक्नर (1801-1887) ने जर्मन भाषा में एलिमेंट्स आव साइकोफ़िज़िक्स (इसका अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है) नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें कि उन्होंने मनोवैज्ञानिक समस्याओं को वैज्ञानिक पद्धति के परिवेश में अध्ययन करने की तीन विशेष प्रणालियों का विधिवत् वर्णन किया : मध्य त्रुटि विधि, न्यूनतम परिवर्तन विधि तथा स्थिर उत्तेजक भेद विधि। आज भी मनोवैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में इन्हीं प्रणालियों के आधार पर अनेक महत्वपूर्ण अनुसंधान किए जाते हैं।

वैज्ञानिक मनोविज्ञान में फेक्नर के बाद दो अन्य महत्वपूर्ण नाम है : हेल्मोलत्स (1821-1894) तथा विल्हेम वुण्ट (1832-1920)। हेल्मोलत्स ने अनेक प्रयोगों द्वारा दृष्टीर्द्रिय विषयक महत्वपूर्ण नियमों का प्रतिपादन किया। इस संदर्भ में उन्होंने प्रत्यक्षीकरण पर अनुसंधान कार्य द्वारा मनोविज्ञान का वैज्ञानिक अस्तित्व ऊपर उठाया। वुंट का नाम मनोविज्ञान में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने सन् 1879 ई में लिपज़िग विश्वविद्यालय (जर्मनी) में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला स्थापित की। मनोविज्ञान का औपचारिक रूप परिभाषित किया। लाइपज़िग की प्रयोगशाला में वुंट तथा उनके सहयोगियों ने मनोविज्ञान की विभिन्न समस्याओं पर उल्लेखनीय प्रयोग किए, जिसमें समय-अभिक्रिया विषयक प्रयोग विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

क्रियाविज्ञान के विद्वान् हेरिंग (1834-1918), भौतिकी के विद्वान् मैख (1838-1916) तथा जी ई म्यूलर (1850 से 1934) के नाम भी उल्लेखनीय हैं। हेरिंग घटना-क्रिया-विज्ञान के प्रमुख प्रवर्तकों में से थे और इस प्रवृत्ति का मनोविज्ञान पर प्रभाव डालने का काफी श्रेय उन्हें दिया जा सकता है। मैख ने शारीरिक परिभ्रमण के प्रत्यक्षीकरण पर अत्यंत प्रभावशाली प्रयोगात्मक अनुसंधान किए। उन्होंने साथ ही साथ आधुनिक प्रत्यक्षवाद की बुनियाद भी डाली। जी ई म्यूलर वास्तव में दर्शन तथा इतिहास के विद्यार्थी थे किंतु फेक्नर के साथ पत्रव्यवहार के फलस्वरूप उनका ध्यान मनोदैहिक समस्याओं की ओर गया। उन्होंने स्मृति तथा दृष्टींद्रिय के क्षेत्र में मनोदैहिकी विधियों द्वारा अनुसंधान कार्य किया। इसी संदर्भ में उन्होंने जास्ट नियम का भी पता लगाया अर्थात् अगर समान शक्ति के दो साहचर्य हों तो दुहराने के फलस्वरूप पुराना साहचर्य नए की अपेक्षा अधिक दृढ़ हो जाएगा (जास्ट नियम म्यूलर के एक विद्यार्थी एडाल्फ जास्ट के नाम पर है)।

व्यवहार विषयक नियमों की खोज ही मनोविज्ञान का मुख्य ध्येय था। सैद्धांतिक स्तर पर विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए। मनोविज्ञान के क्षेत्र में सन् 1912 ई के आसपास संरचनावाद, क्रियावाद, व्यवहारवाद, गेस्टाल्टवाद तथा मनोविश्लेषण आदि मुख्य मुख्य शाखाओं का विकास हुआ। इन सभी वादों के प्रवर्तक इस विषय में एकमत थे कि मनुष्य के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन ही मनोविज्ञान का उद्देश्य है। उनमें परस्पर मतभेद का विषय था कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने का सबसे अच्छा ढंग कौन सा है। सरंचनावाद के अनुयायियों का मत था कि व्यवहार की व्याख्या के लिये उन शारीरिक संरचनाओं को समझना आवश्यक है जिनके द्वारा व्यवहार संभव होता है। क्रियावाद के माननेवालों का कहना था कि शारीरिक संरचना के स्थान पर प्रेक्षण योग्य तथा दृश्यमान व्यवहार पर अधिक जोर होना चाहिए। इसी आधार पर बाद में वाटसन ने व्यवहारवाद की स्थापना की। गेस्टाल्टवादियों ने प्रत्यक्षीकरण को व्यवहारविषयक समस्याओं का मूल आधार माना। व्यवहार में सुसंगठित रूप से व्यवस्था प्राप्त करने की प्रवृत्ति मुख्य है, ऐसा उनका मत था। फ्रायड ने मनोविश्लेषणवाद की स्थापना द्वारा यह बताने का प्रयास किया कि हमारे व्यवहार के अधिकांश कारण अचेतन प्रक्रियाओं द्वारा निर्धारित होते हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान में इन सभी वादों का अब एकमात्र ऐतिहासिक महत्व रह गया है। इनके स्थान पर मनोविज्ञान में अध्ययन की सुविधा के लिये विभिन्न शाखाओं का विभाजन हो गया है।

प्रयोगात्मक मनोविज्ञान में मुख्य रूप से उन्हीं समस्याओं का मनोवैज्ञानिक विधि से अध्ययन किया जाने लगा जिन्हें दार्शनिक पहले चिंतन अथवा विचारविमर्श द्वारा सुलझाते थे। अर्थात् संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण। बाद में इसके अंतर्गत सीखने की प्रक्रियाओं का अध्ययन भी होने लगा। प्रयोगात्मक मनोविज्ञान, आधुनिक मनोविज्ञान की प्राचीनतम शाखा है।

मनुष्य की अपेक्षा पशुओं को अधिक नियंत्रित परिस्थितियों में रखा जा सकता है, साथ ही साथ पशुओं की शारीरिक रचना भी मनुष्य की भाँति जटिल नहीं होती। पशुओं पर प्रयोग करके व्यवहार संबंधी नियमों का ज्ञान सुगमता से हो सकता है। सन् 1912 ई के लगभग थॉर्नडाइक ने पशुओं पर प्रयोग करके तुलनात्मक अथवा पशु मनोविज्ञान का विकास किया। किंतु पशुओं पर प्राप्त किए गए परिणाम कहाँ तक मनुष्यों के विषय में लागू हो सकते हैं, यह जानने के लिये विकासात्मक क्रम का ज्ञान भी आवश्यक था। इसके अतिरिक्त व्यवहार के नियमों का प्रतिपादन उसी दशा में संभव हो सकता है जब कि मनुष्य अथवा पशुओं के विकास का पूर्ण एवं उचित ज्ञान हो। इस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए विकासात्मक मनोविज्ञान का जन्म हुआ। सन् 1912 ई के कुछ ही बाद मैक्डूगल (1871-1938) के प्रयत्नों के फलस्वरूप समाज मनोविज्ञान की स्थापना हुई, यद्यपि इसकी बुनियाद समाज वैज्ञानिक हरबर्ट स्पेंसर (1820-1903) द्वारा बहुत पहले रखी जा चुकी थी। धीरे-धीरे ज्ञान की विभिन्न शाखाओं पर मनोविज्ञान का प्रभाव अनुभव किया जाने लगा। आशा व्यक्त की गई कि मनोविज्ञान अन्य विषयों की समस्याएँ सुलझाने में उपयोगी हो सकता है। साथ ही साथ, अध्ययन की जानेवाली समस्याओं के विभिन्न पक्ष सामने आए। परिणामस्वरूप मनोविज्ञान की नई-नई शाखाओं का विकास होता गया। इनमें से कुछ ने अभी हाल में ही जन्म लिया है, जिनमें प्रेरक मनोविज्ञान, सत्तात्मक मनोविज्ञान, गणितीय मनोविज्ञान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

मनोविज्ञान की मूलभूत एवं अनुप्रयुक्त - दोनों प्रकार की शाखाएं हैं। इसकी महत्वपूर्ण शाखाएं सामाजिक एवं पर्यावरण मनोविज्ञान, संगठनात्मक व्यवहार/मनोविज्ञान, क्लीनिकल (निदानात्मक) मनोविज्ञान, मार्गदर्शन एवं परामर्श, औद्योगिक मनोविज्ञान, विकासात्मक, आपराधिक, प्रायोगिक परामर्श, पशु मनोविज्ञान आदि है। अलग-अलग होने के बावजूद ये शाखाएं परस्पर संबद्ध हैं।

नैदानिक मनोविज्ञान - न्यूरोटिसिज्म, साइकोन्यूरोसिस, साइकोसिस जैसी क्लीनिकल समस्याओं एवं शिजोफ्रेनिया, हिस्टीरिया, ऑब्सेसिव-कंपलसिव विकार जैसी समस्याओं के कारण क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। ऐसे मनोवज्ञानिक का प्रमुख कार्य रोगों का पता लगाना और निदानात्मक तथा विभिन्न उपचारात्मक तकनीकों का इस्तेमाल करना है।

विकास मनोविज्ञान में जीवन भर घटित होनेवाले मनोवैज्ञानिक संज्ञानात्मक तथा सामाजिक घटनाक्रम शामिल हैं। इसमें शैशवावस्था, बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था के दौरान व्यवहार या वयस्क से वृद्धावस्था तक होने वाले परिवर्तन का अध्ययन होता है। पहले इसे बाल मनोविज्ञान भी कहते थे।

आपराधिक मनोविज्ञान चुनौतीपूर्ण क्षेत्र है, जहां अपराधियों के व्यवहार विशेष के संबंध में कार्य किया जाता है। अपराध शास्त्र, मनोविज्ञान आपराधिक विज्ञान की शाखा है, जो अपराध तथा संबंधित तथ्यों की तहकीकात से जुड़ी है।

पशु मनोविज्ञान एक अद्भुत शाखा है।

मनोविज्ञान की प्रमुख शाखाएँ हैं -

मनोविज्ञान के कार्यक्षेत्र (scope) को सही ढंग से समझने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण श्रेणी वह श्रेणी है जिससे यह पता चलता है कि मनोविज्ञानी क्या चाहते हैं ? किये गये कार्य के आधार पर मनोविज्ञानियों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है:

इस तरह से मनोविज्ञानियों का तीन प्रमुख कार्यक्षेत्र है—शिक्षण (teaching), शोध (research) तथा उपयोग (application)। इन तीनों कार्यक्षेत्रों से सम्बन्धित मुख्य तथ्यों का वर्णन निम्नांकित है—

शिक्षण तथा शोध मनोविज्ञान का एक प्रमुख कार्य क्षेत्र है। इस दृष्टिकोण से इस क्षेत्र के तहत निम्नांकित शाखाओं में मनोविज्ञानी अपनी अभिरुचि दिखाते हैं—

बाल मनोविज्ञान का प्रारंभिक संबंध मात्र बाल विकास के अध्ययन से था परंतु हाल के वर्षों में विकासात्मक मनोविज्ञान में किशोरावस्था, वयस्कावस्था तथा वृद्धावस्था के अध्ययन पर भी बल डाला गया है। यही कारण है कि इसे 'जीवन अवधि विकासात्मक मनोविज्ञान' कहा जाता है। विकासात्मक मनोविज्ञान में मनोविज्ञान मानव के लगभग प्रत्येक क्षेत्र जैसे—बुद्धि, पेशीय विकास, सांवेगिक विकास, सामाजिक विकास, खेल, भाषा विकास का अध्ययन विकासात्मक दृष्टिकोण से करते हैं। इसमें कुछ विशेष कारक जैसे—आनुवांशिकता, परिपक्वता, पारिवारिक पर्यावरण, सामाजिक-आर्थिक अन्तर का व्यवहार के विकास पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन किया जाता है। कुल मनोविज्ञानियों का 5% मनोवैज्ञानिक विकासात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत हैं।

मानव प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ मानव के उन सभी व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है जिस पर प्रयोग करना सम्भव है। सैद्धान्तिक रूप से ऐसे तो मानव व्यवहार के किसी भी पहलू पर प्रयोग किया जा सकता है परंतु मनोविज्ञानी उसी पहलू पर प्रयोग करने की कोशिश करते हैं जिसे पृथक किया जा सके तथा जिसके अध्ययन की प्रक्रिया सरल हो। इस तरह से दृष्टि, श्रवण, चिन्तन, सीखना आदि जैसे व्यवहारों का प्रयोगात्मक अध्ययन काफी अधिक किया गया है। मानव प्रयोगात्मक मनोविज्ञान में उन मनोवैज्ञानिकों ने भी काफी अभिरुचि दिखलाया है जिन्हें प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का संस्थापक कहा जाता है। इनमें विलियम वुण्ट, टिचेनर तथा वाटसन आदि के नाम अधिक मशहूर हैं।

मनोविज्ञान का यह क्षेत्र मानव प्रयोगात्मक विज्ञान (Human experimental Psychology) के समान है। सिर्फ अन्तर इतना ही है कि यहाँ प्रयोग पशुओं जैसे—चूहों, बिल्लियों, कुत्तों, बन्दरों, वनमानुषों आदि पर किया जाता है। पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान में अधिकतर शोध सीखने की प्रक्रिया तथा व्यवहार के जैविक पहलुओं के अध्ययन में किया गया है। पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में स्कीनर, गथरी, पैवलव, टॉलमैन आदि का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। सच्चाई यह है कि सीखने के आधुनिक सिद्घान्त तथा मानव व्यवहार के जैविक पहलू के बारे में हम आज जो कुछ भी जानते हैं, उसका आधार पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान ही है। इस मनोविज्ञान में पशुओं के व्यवहारों को समझने की कोशिश की जाती है। कुछ लोगों का मत है कि यदि मनोविज्ञान का मुख्य संबंध मानव व्यवहार के अध्ययन से है तो पशुओं के व्यवहारों का अध्ययन करना कोई अधिक तर्कसंगत बात नहीं दिखता। परंतु मनोविज्ञानियों के पास कुछ ऐसी बाध्यताएँ हैं जिनके कारण वे पशुओं के व्यवहार में अभिरुचि दिखलाते हैं। जैसे पशु व्यवहार का अध्ययन कम खर्चीला होता है। फिर कुछ ऐसे प्रयोग हैं जो मनुष्यों पर नैतिक दृष्टिकोण से करना संभव नहीं है तथा पशुओं का जीवन अवधि (life span) का लघु होना प्रमुख ऐसे कारण हैं। मानव एवं पशु प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में कुछ मनोविज्ञानियों की संख्या का करीब 14% मनोविज्ञानी कार्यरत है।

दैहिक मनोविज्ञान में मनोविज्ञानियों का कार्यक्षेत्र प्राणी के व्यवहारों के दैहिक निर्धारकों (Physical determinants) तथा उनके प्रभावों का अध्ययन करना है। इस तरह के दैहिक मनोविज्ञान की एक ऐसी शाखा है जो जैविक विज्ञान (biological science) से काफी जुड़ा हुआ है। इसे मनोजीवविज्ञान (Psychobiology) भी कहा जाता है। आजकल मस्तिष्कीय कार्य (brain functioning) तथा व्यवहार के संबंधों के अध्ययन में मनोवैज्ञानिकों की रुचि अधिक हो गयी है। इससे एक नयी अन्तरविषयक विशिष्टता (interdisplinary specialty) का जन्म हुआ है जिसे ‘न्यूरोविज्ञान’ (neuroscience) कहा जाता है। इसी तरह के दैहिक मनोविज्ञान हारमोन्स (hormones) का व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन में भी अभिरुचि रखते हैं। आजकल विभिन्न तरह के औषध (drug) तथा उनका व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन दैहिक मनोविज्ञान में किया जा रहा है। इससे भी एक नयी विशिष्टता (new specialty) का जन्म हुआ है, जिसे मनोफर्माकोलॉजी (Psychopharmacology) कहा जाता है तथा जिसमें विभिन्न औषधों के व्यवहारात्मक प्रभाव (behavioural effects) से लेकर तंत्रीय तथा चयापचय (metabolic) प्रक्रियाओं में होने वाले आणविक शोध (molecular research) तक का अध्ययन किया जाता है।




#Article 28: खेल (2072 words)


खेल, कई नियमों एवं रिवाजों द्वारा संचालित होने वाली एक प्रतियोगी गतिविधि है। खेल सामान्य अर्थ में उन गतिविधियों को कहा जाता है, जहाँ प्रतियोगी की शारीरिक क्षमता खेल के परिणाम (जीत या हार) का एकमात्र अथवा प्राथमिक निर्धारक होती है, लेकिन यह शब्द दिमागी खेल (कुछ कार्ड खेलों और बोर्ड खेलों का सामान्य नाम, जिनमें 
भाग्य का तत्व बहुत थोड़ा या नहीं के बराबर होता है) और मशीनी खेल जैसी गतिविधियों के लिए भी प्रयोग किया जाता है, जिसमें मानसिक तीक्ष्णता एवं उपकरण संबंधी गुणवत्ता बड़े तत्व होते हैं। सामान्यतः खेल को एक संगठित, प्रतिस्पर्धात्मक और प्रशिक्षित शारीरिक गतिविधि के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें प्रतिबद्धता तथा निष्पक्षता होती है। कुछ देखे जाने वाले खेल इस तरह के गेम से अलग होते है, क्योंकि खेल में उच्च संगठनात्मक स्तर एवं लाभ (जरूरी नहीं कि वह मौद्रिक ही हो) शामिल होता है। उच्चतम स्तर पर अधिकतर खेलों का सही विवरण रखा जाता है और साथ ही उनका अद्यतन भी किया जाता है, जबकि खेल खबरों में विफलताओं और उपलब्धियों की व्यापक रूप से घोषणा की जाती है।

जिन खेलों का निर्णय निजी पसंद के आधार पर किया जाता है, वे सौंदर्य प्रतियोगिताओं और शरीर सौष्ठव कार्यक्रमों जैसे अन्य निर्णयमूलक गतिविधियों से अलग होते हैं, खेल की गतिविधि के प्रदर्शन का प्राथमिक केंद्र मूल्यांकन होता है, न कि प्रतियोगी की शारीरिक विशेषता। (हालाँकि दोनों गतिविधियों में प्रस्तुति या उपस्थिति भी निर्णायक हो सकती हैं)।

खेल अक्सर केवल मनोरंजन या इसके पीछे आम तथ्य को उजागर करता है कि लोगों को शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम करने की आवश्यकता है। 

हालाँकि वे हमेशा सफल नहीं होते है। खेल प्रतियोगियों से खेल भावना का प्रदर्शन करने और विरोधियों एवं अधिकारियों को सम्मान देने व हारने पर विजेता को बधाई देने जैसे व्यवहार के मानदंड के पालन की उम्मीद की जाती है। राजस्थान के खेल गिल्ली डंडा और हाथों लिया चार्ली नारियो लुक मिचली प्रसिद्ध खेल रहे हैं इन से शरीर को बहुत फायदा होता था वह रात को सारी बस्ती की लड़कियों और लड़कों के साथ खेलने में मजा ही कुछ और था

प्राप्त कलाकृतियों और ढाँचों से पता चलता है कि चीन के लोग लगभग 4000 ईसा पूर्व से खेल की गतिविधियों में शामिल थे। ऐसा प्रतीत होता है कि चीन के प्राचीन काल में जिम्नास्टिक एक लोकप्रिय खेल था। तैराकी और मछली पकड़ना जैसे खेलों के साथ कई खेल पूरी तरह से विकसित और नियमबद्ध थे। इनका संकेत फराहों के स्मारकों से मिलता है। मिस्र के अन्य खेलों में भाला फेंक, ऊँची कूद और कुश्ती भी शामिल थी। फारस के प्राचीन खेलों में जौरखानेह (Zourkhaneh) जैसा पारंपरिक ईरानी मार्शल आर्ट का युद्ध कौशल से गहरा संबंध था। अन्य खेलों में फारसी मूल के पोलो और खेल में सवारों का द्वंद्वयुद्ध शामिल हैं।

प्राचीन यूनानी काल में कई तरह के खेलों की परंपरा स्थापित हो चुकी थी और ग्रीस की सैन्य संस्कृति और खेलों के विकास ने एक दूसरे को काफी प्रभावित किया। खेल उनकी संस्कृति का एक ऐसा प्रमुख अंग बन गया कि यूनान ने ओलिंपिक खेलों का आयोजन किया, जो प्राचीन समय में हर चार साल पर पेलोपोनेसस के एक छोटे से गाँव में ओलंपिया नाम से आयोजित किये जाते थे।

प्राचीन ओलंपिक्स से वर्तमान सदी तक खेल आयोजित किये जाते रहे हैं और उनका विनियमन भी होता रहा है। औद्योगिकीकरण की वजह से विकसित और विकासशील देशों के नागरिकों के अवकाश का समय भी बढ़ा है, जिससे नागरिकों को खेल समारोहों में भाग लेने और दर्शक के रूप में मैदानों तक पहुँचने, एथलेटिक गतिविधियों में अधिक से अधिक भागीदारी करने और उनकी पहुँच बढ़ी है। मास मीडिया और वैश्विक संचार माध्यमों के प्रसार से ये प्रवृत्तियाँ जारी रहीं। व्यवसायिकता की प्रधानता हुई, जिससे खेलों की लोकप्रियता में वृद्धि हुई, क्योंकि खेल प्रशंसकों ने रेडियो, टेलीविजन और इंटरनेट के माध्यम से व्यावसायिक खिलाड़ियों के खेल का बेहतरीन आनंद लेना शुरू किया। इसके अलावा व्यायाम और खेल में शौकिया भागीदारी का आनंद लेने का रिवाज भी बढ़ा।

नई सदी में, नए खेल, प्रतियोगिता के शारीरिक पहलू से आगे जाकर मानसिक या मनोवैज्ञानिक पहलू को बढ़ावा दे रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक खेल संगठन दिन पर दिन लोकप्रिय होते जा रहे हैं।

क्रियाएं, जहाँ परिणाम गतिविधि पर निर्णय से निर्धारित होता है, उन्हें प्रदर्शन या प्रतिस्पर्धा माना जाता है।

खेल भावना एक दृष्टिकोण है, जो ईमानदारीपूर्वक खेलने, टीम के साथियों और विरोधियों के प्रति शिष्टाचार बरतने, नैतिक व्यवहार और सत्यनिष्ठा दिखाने तथा जीत या हार में बड़प्पन के प्रदर्शन की प्रेरणा देता है।

खेल भावना एक आकांक्षा या लोकाचार को अभिव्यक्त करती है कि गतिविधि का आनंद खुद गतिविधि ही उठाये। खेल पत्रकार ग्रांटलैंड राइस का प्रसिद्ध कथन है कि यह अहम नहीं है कि तुम हारे या जीते, अहम यह है कि तुमने खेल कैसा खेला, आधुनिक ओलिंपिक भावना की अभिव्यक्ति इसके संस्थापक पियरे डी कॉबिरटीन ने इस प्रकार की है कि सबसे महत्वपूर्ण बात है।..जीतना नहीं, बल्कि इसमें हिस्सा लेना ये इस भावना की विशिष्ट अभिव्यक्ति हैं।

खेल में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और जानबूझकर आक्रामक हिंसा के बीच की रेखा को पार करने से ही हिंसा पैदा होती है। एथलीट, कोच, प्रशंसक, कभी अभिभावक कभी-कभी गुमराह वफादारी, प्रभुत्व, क्रोध, या उत्सव के तौर पर लोगों और संपत्ति को हिंसा की भेंट चढ़ा देते हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में हुड़दंग और गुंडागर्दी आम बात हो गयी है और यह एक बड़ी समस्या बन गयी है।

खेल के मनोरंजन वाले पहलू, मास मीडिया के प्रसार और अवकाश के लिए समय बढ़ने के साथ-साथ खेलों में व्यावसायिकता बढ़ी है। इसकी वजह से कुछ-कुछ संघर्ष के हालात भी पैदा हुए हैं, जहाँ भुगतान का चेक मनोरंजक पहलुओं से ज्यादा अहम हो जाता है या जहाँ खेलों को ज्यादा से ज्यादा मुनाफेदार और लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जाती है और इस तरह कुछ महत्वपूर्ण परंपराएं लुप्त होती जाती हैं।

खेल के मनोरंजन पहलू का मतलब यह भी है कि खिलाड़ियों और महिलाओं को अक्सर सेलिब्रिटी की हैसियत हासिल होती है।

समय के साथ खेल और राजनीति ने एक-दूसरे को काफी प्रभावित किया है। 

जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद सरकारी नीति थी, खेलों से जुड़े कई लोग, विशेष रूप से रग्बी यूनियन में आम सहमति से एक दृष्टिकोण अपनाया गया कि उन्हें वहाँ प्रतिस्पर्धात्मक खेलों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए। कुछ लोगों को लगता है कि रंगभेद की नीति के खात्मे में इसका एक प्रभावी योगदान था, जबकि दूसरों को लगता है कि यह काफी लंबे समय तक चल सकता था और और अपना सबसे बुरा प्रभाव दिखा सकता था।

 एक मिसाल था, शायद पीछे मुड़कर आत्मनिरीक्षण करने का, जहाँ एक विचारधारा विकसित हुई, जिसने प्रचार-प्रसार के माध्यम से खुद को मजबूत करने के लिए आयोजन का उपयोग किया। 

आयरलैंड के इतिहास में, गेलिक खेल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़े हुए थे। 20वीं सदी के मध्य तक कोई व्यक्ति गेलिक फुटबॉल खेलने, प्रक्षेपण, या गेलिक एथलेटिक एसोसिएशन (GAA) द्वारा प्रशासित खेलों में भाग लेने से रोका जा सकता था, अगर वह ब्रिटिश मूल के फुटबॉल या अन्य खेलों में भाग लेता या समर्थन करता। हाल तक GAA ने गेलिक स्थानों फुटबॉल और रग्बी यूनियन के खेलने पर प्रतिबंध जारी रखा था। यह प्रतिबंध आज भी लागू है, लेकिन क्रोक पार्क में फुटबॉल और रग्बी खेलने की अनुमति देने के लिए कुछ संशोधन किया गया। जबकि लैंसडाउन रोड को पुनर्विकसित किया जा रहा है। हाल तक नियम 21 के तहत, GAA ने भी ब्रिटिश सुरक्षा बलों और RUC के सदस्यों पर गेरिक खेल खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन 1998 में गुड फ्राइडे समझौते के बाद इस प्रतिबंध को हटाया जा सका।

खेल कार्यकलाप के दौरान, या इसकी रिपोर्टिंग में कई बार राष्ट्रवाद उभर कर सामने आ जाता है। राष्ट्रीय दलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी या कमेंटेटर और दर्शक पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हैं। कई अवसरों पर ऐसा तनाव खिलाड़ियों या मैदान के भीतर या बाहर के दर्शकों के बीच हिंसक झड़पों को जन्म (फुटबॉल युद्ध देख सकते हैं) देता है। खेल के बुनियादी मूल्यों के विपरीत ये प्रवृतियाँ अपने हित और प्रतियोगियों के मनोरंजन के लिए अपनाई जाती रही हैं।

खेल की कला के साथ कई समानताएं हैं। आइस स्केटिंग व ताई ची और उदाहरण के लिए डाँस स्पोर्ट, ऐसे खेल हैं जो कलात्मक नजरिये के करीब होते हैं। इसी प्रकार, कलात्मक जिमनास्टिक, शरीर सौष्ठव, पार्कआवर, प्रदर्शन कला, योग, बेसबॉल, ड्रेसेज, पाक कला जैसी गतिविधियों में खेल और कला दोनों के तत्व दिखते हैं। शायद इसका सबसे अच्छा उदाहरण बुल फाइटिंग (साँडों से लड़ना) है, जिनकी खबरें समाचार पत्रों के कला पन्नों में छापी जाती हैं। वस्तुत: कुछ स्थितियों में खेल, कला के इतने करीब होता है कि वह संभवत: खेल की प्रकृति से संबंधित हो जाता है। उपरोक्त खेल की परिभाषा एक गतिविधि का विचार व्यक्त करती है, जो सामान्य प्रयोजनों के लिए नहीं होती, उदाहरण के लिए दौड़ना केवल कहीं पहुंचने के लिए नहीं होता, बल्कि अपने लिए दौड़ना है, जैसे कि हम दौड़ने में सक्षम हैं। 

यह सौंदर्य मूल्यबोध के आम विचार के करीब है, जो वस्तु के सामान्य उपयोग से निकले विशुद्ध कार्यकारी मूल्य से ऊपर है। जैसे, सौंदर्यबोध वाली मनभावन कार वह नहीं है जो ए से बी को मिलती है, बल्कि जो अनुग्रह, शिष्टता और करिश्में से हमें प्रभावित करती है।

उसी तरह, उँची कूद जैसे खेल के प्रदर्शन में सिर्फ बाधाओं से बचने या नदियों को पार करने की गतिविधि हमें प्रभावित नहीं करती। इसमें दिखी योग्यता, कौशल और शैली से हम प्रभावित होते हैं।

कला और खेल के बीच संभवतः स्पष्ट संपर्क प्राचीन ग्रीस के समय से है, जब जिमनास्टिक और कालिस्थेनिक्स (calisthenics) ने प्रतिभागियों द्वारा प्रदर्शित शारीरिक गठन, शक्ति और 'एरेट' सौंदर्य की सराहना शुरू की। कौशल के रूप में 'कला' आधुनिक अर्थ प्राचीन ग्रीक शब्द 'arete से संबंधित है। इस दौर में कला और खेल की निकटता ओलंपिक खेलों के जरिये दिखी, जैसा कि हमने खेल और कलात्मक उपलब्धियों दोनों के समारोहों, कविता, मूर्तिकला और वास्तुकला में देखा है।

खेल में प्रौद्योगिकी की एक महत्वपूर्ण भूमिका है, चाहे उसका किसी एथलीट के स्वास्थ्य के लिए उपयोग किया जाये या एथलीट्स की तकनीक या उपकरण की विशेषताओं के रूप में। 
 
उपकरण चूंकि खेल और अधिक प्रतिस्पर्धी हो गए हैं, इसलिए बेहतर उपकरणों की जरूरत बढ़ी है। नई तकनीक के प्रयोग से गोल्फ क्लब, फुटबॉल हेलमेट, बेसबॉल के बल्ले, फुटबॉल की गेंद, हॉकी, स्केट्स और अन्य उपकरणों में उल्लेखनीय बदलाव देखे गये हैं। 
 
स्वास्थ्य पोषण से लेकर चोटों के इलाज तक, समय के साथ मानव शरीर के ज्ञान में बढोत्तरी होने के कारण एक खिलाड़ी की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। एथलीट अब ज्यादा उम्र का होने के बावजूद खेलने में सक्षम हैं, उनके चोट जल्दी ठीक हो रहे हैं और पिछली पीढ़ियों के एथलीटों की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से प्रशिक्षित हो रहे हैं। 
 
अनुदेश प्रौद्योगिकी के विकास ने खेलों में अनुसंधान के लिए नये अवसर पैदा किये हैं। अब खेल के पहलुओं का विश्लेषण संभव है, जिन्हें पहले पहुँच से बाहर समझा जाता था। गति के चित्र लेने से लेकर खिलाड़ी की गति या उन्नत कंप्यूटर सिमुलेशन को पकड़ने से मॉडल भौतिक स्थितियों को कैद करने में सक्षम होने के कारण एथलीट के क्रियाकलापों को समझने और उनमें सुधार करने की क्षमता पैदा हुई है।

ब्रिटिश अंग्रेजी में खेल की गतिविधियाँ सामान्य संज्ञा खेल के रूप में चिह्नित हैं। अमेरिकी अंग्रेजी में खेल का अधिक इस्तेमाल किया जाता है। अंग्रेजी की सभी बोलियों में, खेल एक से अधिक विशिष्ट खेलों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, फुटबॉल और तैराकी, मेरे पसंदीदा खेल हैं, सभी अंग्रेज़ी बोलने वालों को स्वाभाविक लगेगा जबकि मैं खेल का आनंद लेता हूँ, उत्तरी अमेरिकियों को मैं खेलों का आनंद लेता हूँ की तुलना में कम स्वाभाविक लगेगा।

खेल प्रतिभागियों के लिए मनोरंजन का एक रूप होने के बावजूद बहुत सारे खेल दर्शकों के सामने खेले जाते हैं। ज्यादातर पेशेवर खेल किसी तरह के 'थियेटर', एक स्टेडियम, मैदान, गोल्फ कोर्स, दौड़ ट्रैक, या खुली सड़क पर आम जनता के देखने के प्रावधान (अक्सर इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है) के तहत खेले जाते हैं।

खेल में अब बड़े टीवी दर्शकों या रेडियो श्रोताओं को भी आकर्षित किया जाता है, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी प्रसारक कुछ खेलों के प्रसारण 'अधिकार' के लिए बड़ी राशि की बोली लगाते हैं। फुटबॉल विश्व कप, विश्व के लाखों-करोड़ों टीवी दर्शकों को आकर्षित करता है, जैसे 2006 के फाइनल ने अकेले पूरी दुनिया में 700 मिलियन दर्शकों को आकर्षित किया। संयुक्त राज्य अमेरिका में NFL की चैम्पियनशिप खेल- सुपर बाउल- वर्ष का सबसे ज्यादा देखे जाने वाले टेलीविजन प्रसारणों में से एक बन गया। सुपर बाउल रविवार एक तरह से अमेरिका में राष्ट्रीय अवकाश बन जाता है और दर्शकों की संख्या इतनी ज्यादा होती है कि 2007 में प्रति 30 सेकेंड के स्लॉट के लिए 2.6 मिलियन डॉलर की दर से विज्ञापन मिले।




#Article 29: नृत्य (1583 words)


नृत्य भी मानवीय अभिव्यक्तियों का एक रसमय प्रदर्शन है। यह एक सार्वभौम कला है, जिसका जन्म मानव जीवन के साथ हुआ है। बालक जन्म लेते ही रोकर अपने हाथ पैर मार कर अपनी भावाभिव्यक्ति करता है कि वह भूखा है- इन्हीं आंगिक -क्रियाओं से नृत्य की उत्पत्ति हुई है। यह कला देवी-देवताओं- दैत्य दानवों- मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों को अति प्रिय है। भारतीय पुराणों में यह दुष्ट नाशक एवं ईश्वर प्राप्ति का साधन मानी गई है। अमृत मंथन के पश्चात जब दुष्ट राक्षसों को अमरत्व प्राप्त होने का संकट उत्पन्न हुआ तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अपने लास्य नृत्य के द्वारा ही तीनों लोकों को राक्षसों से मुक्ति दिलाई थी। इसी प्रकार भगवान शंकर ने जब कुटिल बुद्धि दैत्य भस्मासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि वह जिसके ऊपर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाए- तब उस दुष्ट राक्षस ने स्वयं भगवान को ही भस्म करने के लिये कटिबद्ध हो उनका पीछा किया- एक बार फिर तीनों लोक संकट में पड़ गये थे तब फिर भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अपने मोहक सौंदर्यपूर्ण नृत्य से उसे अपनी ओर आकृष्ट कर उसका वध किया।

भारतीय संस्कृति एवं धर्म की आरंभ से ही मुख्यत- नृत्यकला से जुड़े रहे हैं। देवेन्द्र इन्द्र का अच्छा नर्तक होना- तथा स्वर्ग में अप्सराओं के अनवरत नृत्य की धारणा से हम भारतीयों के प्राचीन काल से नृत्य से जुड़ाव की ओर ही संकेत करता है। विश्वामित्र-मेनका का भी उदाहरण ऐसा ही है। स्पष्ट ही है कि हम आरंभ से ही नृत्यकला को धर्म से जोड़ते आए हैं। पत्थर के समान कठोर व दृढ़ प्रतिज्ञ मानव हृदय को भी मोम सदृश पिघलाने की शक्ति इस कला में है। यही इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष है। जिसके कारण यह मनोरंजक तो है ही- धर्म- अर्थ- काम- मोक्ष का साधन भी है। स्व परमानंद प्राप्ति का साधन भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कला-धारा पुराणों- श्रुतियों से होती हुई आज तक अपने शास्त्रीय स्वरूप में धरोहर के रूप में हम तक प्रवाहित न होती। इस कला को हिन्दु देवी-देवताओं का प्रिय माना गया है। भगवान शंकर तो नटराज कहलाए- उनका पंचकृत्य से संबंधित नृत्य सृष्टि की उत्पत्ति- स्थिति एवं संहार का प्रतीक भी है। भगवान विष्णु के अवतारों में सर्वश्रेष्ठ एवं परिपूर्ण कृष्ण नृत्यावतार ही हैं। इसी कारण वे 'नटवर' कृष्ण कहलाये। भारतीय संस्कृति एवं धर्म के इतिहास में कई ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि जिससे सफल कलाओं में नृत्यकला की श्रेष्ठता सर्वमान्य प्रतीत होती है।

भारतीय नृत्य उतने ही विविध हैं जितनी हमारी संस्कृति, लेकिन इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है- शास्त्रीय नृत्य तथा लोकनृत्य। हाल ही में बॉलीवुड नृत्य की एक नई शैली लोकप्रिय होती जा रही हैं जो भारतीय सिनेमा पर आधारित है। इसमें भारतीय शास्त्रीय, भारतीय लोक और पाश्चात्य शास्त्रीय तथा पाश्चात्य लोक का समन्वय देखने को मिलता है।

जिस तरह भारत में कोस-कोस पर पानी और वाणी बदलती है वैसे ही नृत्य शैलियाँ भी विविध हैं। प्रमुख भारतीय शास्त्रीय नृत्य हैं:

लोक नृत्यों में प्रत्येक प्रांत के अनेक स्थानीय नृत्य हैं। जैसे पंजाब में भांगड़ा, उत्तर-प्रदेश का पखाउज आदि

नृत्य का प्राचीनतम ग्रंथ भरत मुनि का नाट्यशास्त्र है। लेकिन इसके उल्लेख वेदों में भी मिलते हैं, जिससे पता चलता है कि प्रागैतिहासिक काल में नृत्य की खोज हो चुकी थी। इतिहास की दृष्टि में सबसे पहले उपलब्ध साक्ष्य गुफाओं में प्राप्त आदिमानव के उकेरे चित्रों तथा हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाईयों में प्राप्त मूर्तियाँ हैं, जिनके संबंध में पुरातत्वेत्ता नर्तकी होने का दावा करते हैं। ऋगवेद के अनेक श्लोकों में नृत्या शब्द का प्रयोग हुआ है।  इन्द्र यथा हयस्तितेपरीतं नृतोशग्वः । तथा  नह्यंगं नृतो त्वदन्यं विन्दामि राधसे। अर्थात- इन्द्र तुम बहुतों द्वारा आहूत तथा सबको नचाने वाले हो। इससे स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समाज में नृत्यकला का प्रचार-प्रसार सर्वत्र था। इस युग में नृत्य के साथ निम्नलिखित वाद्यों का प्रयोग होता था।  वीणा वादं पाणिघ्नं तूणब्रह्मं तानृत्यान्दाय तलवम्। अर्थात- नृत्य के साथ वीणा वादक और मृदंगवादक और वंशीवादक को संगत करनी चाहिये और ताल बजाने वाले को बैठना चाहिये।

यर्जुवेद में भी नृत्य संबंधी सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। नृत्य को उस युग में व्यायाम के रूप में माना गया था। शरीर को अरोग्य रखने के लिये नृत्यकला का प्रयोग किया जाता था। पुराणों में भी नृत्य संबंधी घटनाओं का उल्लेख है। श्रीमद्भागवत महापुराण, शिव पुराण तथा कूर्म पुराण में भी नृत्य का उल्लेख कई विवरणों में मिला है। रामायण और महाभारत में भी समय-समय पर नृत्य पाया गया है। इस युग में आकर नृत्त- नृत्य- नाट्य तीनों का विकास हो चुका था। भरत के नाट्य शास्त्र के समय तक भारतीय समाज में कई प्रकार की कलाओं का पूर्णरूपेण विकास हो चुका था। इसके बाद संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों जैसे कालिदास के शाकुंतलम- मेघदूतम- वात्स्यायन की कामसूत्र- तथा मृच्छकटिकम आदि ग्रंथों में इन नृत्य का विवरण हमारी भारतीय संस्कृति की कलाप्रियता को दर्शाता है। आज भी हमारे समाज में नृत्य- संगीत को उतना ही महत्व दिया जाता है कि हमारे कोई भी समारोह नृत्य के बिना संपूर्ण नहीं होते। भारत के विविध शास्त्रीय नृत्यों की अनवरत शिष्य परंपराएँ हमारी इस सांस्कृतिक विरासत की धारा को लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित करती रहेंगी।

कई अन्य नृत्य शैलियों बैले के आधार पर कर रहे हैं के रूप में बैले, नृत्य के कई अन्य शैलियों के लिए एक आधार के रूप में कार्य करता है। बैले सदियों से विकसित किया गया है कि तकनीक पर आधारित है। बैले कहानियां बताने के लिए संगीत और नृत्य का उपयोग करता है। बैले नर्तकियों एक और दुनिया के लिए एक दर्शकों को परिवहन करने की क्षमता है।

जैज मौलिकता और कामचलाऊ व्यवस्था पर काफी निर्भर करता है कि एक मजेदार नृत्य शैली है। कई जैज नर्तकियों को अपने स्वयं की अभिव्यक्ति को शामिल, उनके नृत्य में विभिन्न शैलियों का मिश्रण। जैज नृत्य अक्सर् संकुचन सहित बोल्ड, नाटकीय शरीर आंदोलनों का उपयोग करता है।

हिप हॉप संस्कृति से विकसित किया है कि आमतौर पर हिप हॉप संगीत के लिए नृत्य एक नृत्य शैली देश और पश्चिमी नृत्य आम तौर पर देश के पश्चिमी संगीत पर नृत्य किया कई नृत्य रूपों, भी शामिल है। यदि आप कभी भी एक देश और पश्चिमी क्लब या सराय लिए किया गया है, तो आप शायद उनके चेहरे पर बड़ी मुस्कान के साथ डांस फ्लोर के आसपास ट्वर्लिग्ग् कुछ चरवाहे बूट पहने नर्तकों देखा है। बेली नृत्यहै। हिप हॉप ऐसे तोड़ने पॉपिंग, लॉकिंग और क्रम्पिंग्ग् और यहां तक ​​कि घर के नृत्य के रूप में विभिन्न चाल भी शामिल है। कामचलाऊ व्यवस्था और व्यक्तिगत व्याख्या हिप - हॉप नृत्य करने के लिए आवश्यक हैं।

स्विंग नृत्य जोड़े, झूले स्पिन और एक साथ कूद जिसमें एक जीवंत नृत्य शैली है। स्विंग नृत्य एक सामान्य संगीत स्विंग करने के नाच का मतलब है कि अवधि, या संगीत है झूलों. कि एक गीत झूलों यदि आप कैसे बता सकते हैं? स्विंग नर्तकियों वे इसे सुना है, वे अभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं जब एक गाना झूलों क्योंकि जानते हैं।

कॉन्ट्रा नृत्य नर्तकियों दो समानांतर लाइनों फार्म और रेखा की लंबाई नीचे विभिन्न भागीदारों के साथ नृत्य आंदोलनों का एक दृश्य जो प्रदर्शन में अमेरिकी लोक नृत्य का एक रूप है। कॉन्ट्रा नृत्य परिवार की तरह वायुमंडल के साथ आराम कर रहे हैं। नृत्य बहुत अच्छा व्यायाम है और नर्तकियों को अपनी गति निर्धारित कर सकते हैं। कॉन्ट्रा नर्तकियों आमतौर पर नृत्य का एक प्यार के साथ दोस्ताना, सक्रिय लोग हैं।

बेली नृत्य कूल्हों और पेट की तेज, रोलिंग आंदोलनों द्वारा विशेषता नृत्य का एक अनोखा रूप है। बेली डांसिंग का असली मूल उत्साही लोगों के बीच बहस कर रहे हैं।

आधुनिक नृत्य भीतर की भावनाओं की अभिव्यक्ति पर बजाय ध्यान केंद्रित, शास्त्रीय बैले के कड़े नियमों से कई को खारिज कर दिया कि एक नृत्य शैली है। आधुनिक नृत्य नृत्यकला और प्रदर्शन में रचनात्मकता पर बल, शास्त्रीय बैले के खिलाफ एक विद्रोह के रूप में बनाया गया था।

लैटिन नृत्य सेक्सी हिप आंदोलनों द्वारा विशेषता एक तेजी से पुस्तक, अक्सर कामुक, साथी नृत्य है। हालांकि, हिप आंदोलनों लैटिन नृत्य में से किसी में जानबूझकर नहीं कर रहे हैं। हिप गति से एक दूसरे पैर से वजन बदलने का एक स्वाभाविक परिणाम है

साल्सा क्यूबा से एक समधर्मी नृत्य शैली है। एकल रूपों में पहचाने जाते हैं, हालांकि साल्सा, सामान्य रूप से एक साथी नृत्य है। साल्सा आमतौर पर साल्सा संगीत पर नृत्य किया जाता है। आप एक साथी आवश्यक नहीं हो सकता है, जिसमें रेखा नृत्य का एक फार्म के रूप में यह नृत्य निर्देशन कर सकते हैं, हालांकि साल्सा, एक जोड़ी की आवश्यकता है। इस नृत्य शैली लैटिन अमेरिका भर में बहुत लोकप्रिय है और समय के साथ यह उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, एशिया और मध्य पूर्व के माध्यम से फैल गया।

एक लाइन नृत्य लोगों के एक समूह के व्यक्तियों के लिंग के संबंध के बिना एक या एक से अधिक लाइनों या पंक्तियों में नृत्य जिसमें कदम की एक दोहराया अनुक्रम के साथ एक नृत्य नृत्य है, सभी एक ही दिशा का सामना करना पड़ और एक ही समय में कदम क्रियान्वित करने। उनके पास नर्तकियों का हाथ पकड़े हुए हैं जबकि, पुराने नर्तकियों एक दूसरे का सामना जिसमें लाइनें है रेखा नृत्य, या रेखा लाइन डांस फ्लोर के चारों ओर एक नेता का पालन में एक चक्र, या सभी नर्तकियों है।

बॉलरूम डांस अपने साथी के साथ किया जाने वाला नृत्य है, जिसे दुनियाभर में बेहद पसंद किया जाता है। हल्‍की लाइट म्‍यूजिक में यह डांस बेहद आकर्षक दिखता है। इसमें साल्सा, रूंबा, सांबा, कैसीनो और बक आदि को मिक्‍स भ्‍ीा किया जा सकता है। आमतौर पर बॉरूम डांस अपने साथी के साथ एक दूसरे की बाहों में किया जाता है। बॉलरूम नृत्य के दो मुख्य शैलियों हैं - अमेरिकी शैली और अंतर्राष्ट्रीय शैली।




#Article 30: संगीत (1677 words)


सुव्यवस्थित ध्वनि, जो रस की सृष्टि करे, संगीत कहलाती है। गायन, वादन व नृत्य तीनों के समावेश को संगीत कहते हैं। संगीत नाम इन तीनों के एक साथ व्यवहार से पड़ा है। गाना, बजाना और नाचना प्रायः इतने पुराने है जितना पुराना आदमी है। बजाने और बाजे की कला आदमी ने कुछ बाद में खोजी-सीखी हो, पर गाने और नाचने का आरंभ तो न केवल हज़ारों बल्कि लाखों वर्ष पहले उसने कर लिया होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

गायन मानव के लिए प्राय: उतना ही स्वाभाविक है जितना भाषण। कब से मनुष्य ने गाना प्रारंभ किया, यह बतलाना उतना ही कठिन है जितना कि कब से उसने बोलना प्रारंभ किया है। परंतु बहुत काल बीत जाने के बाद उसके गायन ने व्यवस्थित रूप धारण किया।

युद्ध, उत्सव और प्रार्थना या भजन के समय मानव गाने बजाने का उपयोग करता चला आया है। संसार में सभी जातियों में बाँसुरी इत्यादि फूँक के वाद्य (सुषिर), कुछ तार या ताँत के वाद्य (तत), कुछ चमड़े से मढ़े हुए वाद्य (अवनद्ध या आनद्ध), कुछ ठोंककर बजाने के वाद्य (घन) मिलते हैं।

ऐसा जान पड़ता है कि भारत में भरत के समय तक गान को पहले केवल 'गीत' कहते थे। वाद्य में जहाँ गीत नहीं होता था, केवल दाड़ा, दिड़दिड़ जैसे शुष्क अक्षर होते थे, वहाँ उसे 'निर्गीत' या 'बहिर्गीत' कहते थे और नृत्त अथवा नृत्य की एक अलग कला थी। किंतु धीरे-धीरे गान, वाद्य और नृत्य तीनों का संगीत में अंतर्भाव हो गया - गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगतमुच्यते।

भारत से बाहर अन्य देशों में केवल गीत और वाद्य को संगीत में गिनते हैं; नृत्य को एक भिन्न कला मानते हैं। भारत में भी नृत्य को संगीत में केवल इसलिए गिन लिया गया कि उसके साथ बराबर गीत या वाद्य अथवा दोनों रहते हैं। ऊपर लिखा जा चुका है कि स्वर और लय की कला को संगीत कहते हैं। स्वर और लय गीत और वाद्य दोनों में मिलते हैं, किंतु नृत्य में लय मात्र है, स्वर नहीं। हम संगीत के अंतर्गत केवल गीत और वाद्य की चर्चा करेंगे, क्योंकि संगीत केवल इसी अर्थ में अन्य देशों में भी व्यवहृत होता है।

संगीत का आदिम स्रोत प्राकृतिक ध्वनियाँ ही है। प्राक् संगीत-युग में मनुष्य के प्रकृति की ध्वनियों और उनकी विशिष्ट लय को समझने की कोशिश की। हर तरह की प्राकृतिक ध्वनियाँ संगीत का आधार नहीं हो सकतीं, अत: भाव पैदा करने वाली ध्वनियों को परखकर संगीत का आधार बनाने के साथ-साथ उन्हें लय में बाँधने का प्रयास किया गया होगा। प्रकृति की वे ध्वनियाँ जिन्होंने मनुष्य के मन-मस्तिष्क को स्पर्श कर उल्लसित किया, वही सभ्यता के विकास के साथ संगीत का साधन बनीं। हालांकि विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। दार्शनिकों ने नाद के चार भागों परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी में से मध्यमा को संगीतोपयोगी स्वर का आधार माना। डार्विन ने कहा कि पशु रति के समय मधुर ध्वनि करते हैं। मनुष्य ने जब इस प्रकार की ध्वनि का अनुकरण आरम्भ किया तो संगीत का उद्भव हुआ।’’ कार्ल स्टम्फ ने भाषा उत्पत्ति के बाद मनुष्य द्वारा ध्वनि की एकतारता को स्वर की उत्पत्ति माना। उन्नीसवीं शदी के उत्तरार्द्ध में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा कि ‘‘संगीत की उत्पत्ति मानवीय संवेदना के साथ हुई।’’ उन्होंने संगीत को गाने, बजाने, बताने (केवल नृत्य मुद्राओं द्वारा) और नाचने का समुच्चय बताया।

प्राच्य शास्त्रों में संगीत की उत्पत्ति को लेकर अनेक रोचक कथाएँ हैं। देवराज इन्द्र की सभा में गायक, वादक व नर्तक हुआ करते थे। गन्धर्व गाते थे, अप्सराएँ नृत्य करती थीं और किन्नर वाद्य बजाते थे। गान्धर्व-कला में गीत सबसे प्रधान रहा है। आदि में गान था, वाद्य का निर्माण पीछे हुआ। गीत की प्रधानता रही। यही कारण है कि चाहे गीत हो, चाहे वाद्य सबका नाम संगीत पड़ गया। पीछे से नृत्य का भी इसमें अन्तर्भाव हो गया। संसार की जितनी आर्य भाषाएँ हैं उनमें संगीत शब्द अच्छे प्रकार से गाने के अर्थ में मिलता है।

'संगीत' शब्द ‘सम्+ग्र’ धातु से बना है। अन्य भाषाओं में ‘सं’ का ‘सिं’ हो गया है और ‘गै’ या ‘गा’ धातु (जिसका भी अर्थ गाना होता है) किसी न किसी रूप में इसी अर्थ में अन्य भाषाओं में भी वर्तमान है। ऐंग्लो सैक्सन में इसका रूपान्तर है ‘सिंगन’ (singan) जो आधुनिक अंग्रेजी में ‘सिंग’ हो गया है, आइसलैंड की भाषा में इसका रूप है ‘सिग’ (singja), (केवल वर्ण विन्यास में अन्तर आ गया है,) डैनिश भाषा में है ‘सिंग (Synge), डच में है ‘त्सिंगन’ (tsingen), जर्मन में है ‘सिंगेन’ (singen)। अरबी में ‘गना’ शब्द है जो ‘गान’ से पूर्णतः मिलता है। सर्वप्रथम ‘संगीतरत्नाकर’ ग्रन्थ में गायन, वादन और नृत्य के मेल को ही ‘संगीत’ कहा गया है। वस्तुतः ‘गीत’ शब्द में ‘सम्’ जोड़कर ‘संगीत’ शब्द बना, जिसका अर्थ है ‘गान सहित’। नृत्य और वादन के साथ किया गया गान ‘संगीत’ है। शास्त्रों में संगीत को साधना भी माना गया है।

प्रामाणिक तौर पर देखें तो सबसे प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष, मूर्तियों, मुद्राओं व भित्तिचित्रों से जाहिर होता है कि हजारों वर्ष पूर्व लोग संगीत से परिचित थे। देव-देवी को संगीत का आदि प्रेरक सिर्फ हमारे ही देश में नहीं माना जाता, यूरोप में भी यह विश्वास रहा है। यूरोप, अरब और फारस में जो संगीत के लिए शब्द हैं उस पर ध्यान देने से इसका रहस्य प्रकट होता है। संगीत के लिए यूनानी भाषा में शब्द ‘मौसिकी’ (musique), लैटिन में ‘मुसिका’ (musica), फ्रांसीसी में ‘मुसीक’ (musique), पोर्तुगी में ‘मुसिका’ (musica), जर्मन में मूसिक’ (musik), अंग्रेजी में ‘म्यूजिक’ (music), इब्रानी, अरबी और फारसी में ‘मोसीकी’। इन सब शब्दों में साम्य है। ये सभी शब्द यूनानी भाषा के ‘म्यूज’(muse) शब्द से बने हैं। ‘म्यूज’ यूनानी परम्परा में काव्य और संगीत की देवी मानी गयी है। कोश में ‘म्यूज’ (muse) शब्द का अर्थ दिया है ‘दि इन्सपायरिंग गॉडेस ऑफ साँग’ अर्थात् ‘गान की प्रेरिका देवी’। यूनान की परम्परा में ‘म्यूज’ ‘ज्यौस’(zeus) की कन्या मानी गयी हैं। ज्यौस’ शब्द संस्कृत के ‘द्यौस्’ का ही रूपान्तर है जिसका अर्थ है ‘स्वर्ग’। ‘ज्यौस’ और ‘म्यूज’ की धारण ब्रह्मा और सरस्वती से बिलकुल मिलती-जुलती है।

भारतीय संगीत का जन्म वेद के उच्चारण में देखा जा सकता है। 
संगीत का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ भरत मुनि का नाट्‍यशास्त्र है। अन्य ग्रन्थ हैं : बृहद्‌देशी, दत्तिलम्‌, संगीतरत्नाकर।

संगीत एवं आध्यात्म भारतीय संस्कृति का सुदृढ़ आधार है। भारतीय संस्कृति आध्यात्म प्रधान मानी जाती रही है। संगीत से आध्यात्म तथा मोक्ष की प्रप्ति के साथ भारतीय संगीत के प्राण भूत तत्व रागों के द्वारा मनः शांति, योग ध्यान, मानसिक रोगों की चिकित्सा आदि विशेष लाभ प्राप्त होते है। प्राचीन समय से मानव संगीत की आध्यात्मिक एवं मोहक शक्ति से प्रभावित होता आया है।

प्राचीन मनीषियों ने सृष्टि की उत्पत्ति नाद से मानी है। ब्रह्माण्ड के सम्पूर्ण जड़-चेतन में नाद व्याप्त है, इसी कारण इसे नाद-ब्रह्म” भी कहते हैं।

अर्थात् शब्द रूपी ब्रह्म अनादि, विनाश रहित और अक्षर है तथा उसकी विवर्त प्रक्रिया से  ही यह जगत भासित होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण संसार अप्रत्यक्ष रूप से संगीतमय हैं। संगीत एक ईश्वरीय वाणी है। अतः यह ब्रह्म रूप ही हैं । संगीत आनन्द का अविर्भाव है तथा आनन्द ईश्वर का स्वरूप है। संगीत के माध्यम से ही ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। योग व ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ आचार्य श्री याज्ञवल्क्य जी कहते हैं -  
 

 
संगीत एक प्रकार का योग है। इसकी विशेषता है कि इसमें साध्य और साधन दोनों ही  सुखरूप हैं। अतः संगीत एक उपासना है, इस कला के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति होती है। यही कारण है कि भारतीय संगीत के सुर और लय की सहायता से मीरा, तुलसी, सूर और कबीर जैसे कवियों ने भक्त शिरोमणि की उपाधि प्राप्त की और अन्त में ब्रह्म के आनन्द में लीन हो गए। इसीलिए संगीत को ईश्वर प्राप्ति का सुगम मार्ग बताया गया है। संगीत में मन को एकाग्र करने की एक अत्यन्त प्रभावशाली शक्ति है तभी से ऋषि मुनि इस कला का प्रयोग परमेश्वर का आराधना के लिए करने लगे।

संगीत हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है। और यह हमारी दैनिक जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। संगीत केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं सुना जाता है। वरन इसके कई सारे फायदे हैं। अब संगीत का प्रयोग वैज्ञानिक अनेक रोगों के उपचार के अंदर भी कर रहे हैं। अनेक वैज्ञानिक रिसर्च ने इस बात को ‌‌‌प्रमाणित किया है कि संगीत सुनने से कई सारे मानसिक फायदे होते हैं।

आज कल हर इंसान की जिंदगी दौड़ धूप से भरी रहती है। काम करते करते हम बुरी तरह से थक जाते हैं। जब संगीत सुनते हैं तो हमारा दिमाग रिलेक्स मोड के अंदर आता है। हमारे दिमाग मे नई एनर्जी का संचार होता है। व हम अच्छा फील करते हैं। संगीत हमारे मूड को बदल देता है। ‌‌‌संगीत दिमाग मे कार्टिसोल के स्तर को कम करता है। जिससे दिमाग बेहतर तरीके से काम करता है।

काम की वजह से दिमाग की नसे ज्यादा थक जाती हैं। संगीत सुनने से दिमाग को आराम मिलता है जहां पर कई बार दवाएं काम नहीं करती हैं ।वहां म्यूजिक थैरेपी काम करती है।स्वर- तरंगें संगीत का रूप लेकर जीवन दायनी सामर्थ्य उत्पन्न करती हैं ।

कुछ वैज्ञानिक शोध यह बताते हैं कि जब इंसान किसी तरह के दर्द से पीड़ित होता है तो उसे उसका मन पसंद संगीत सुनाया जाना चाहिए । जिससे उसका ध्यान दर्द से हट जाता है। और उसे दर्द का एहसास कम होता है।संगीत सुनने से दिमाग मे डोपामाइन का स्तर अधिक होता है। जो खुशी पैदा ‌‌‌करता है।

अमेरिका वैज्ञानिकों के अनुसार संगीत थेरैपी फेफड़ों के लिए काफी अच्छी रहती है। सांस से संबंधित रोगी को संगीत थैरेपी से ईलाज करने से फायदा मिलता है। लेकिन गम्भीर सांस के रोग इससे सही नहीं हो पाते हैं।

जिन लोगों की यादाश्त अच्छी नहीं होती है। उनको संगीत सुनना चाहिए । जिससे उनकी यादाश्त अच्छी हो जाती है। और दिमाग काफी बेहतर तरीके से काम करने लग जाता है।

संगीत सुनने से दिमाग के अंदर एंडोर्फिंस हार्मोन का स्त्राव होता है ।वैज्ञानिकों के अनुसार रोजाना 30 मिनट संगीत सुनने से दिल की क्षमता के अंदर बढ़ोतरी होती है। एक्सरसाइज के साथ संगीत सुनने से  दिल की कार्यक्षमता के अंदर इजाफा होता है।

अच्छे संगीत सुनने से दिमाग के अंदर चल रहे बेकार के विचारों को विराम मिलता है। और रात के समय दिमाग पूरा खाली हो जाने से अच्छी नींद आती है। आमतौर पर जिन लोगों को नींद नहीं आती उनको सोने से पहले कुछ देर अच्छे गाने सुनने चाहिए।




#Article 31: साहित्य (161 words)


 

किसी भाषा के वाचिक और लिखित (शास्त्रसमूह) को साहित्य कह सकते हैं। दुनिया में सबसे पुराना वाचिक साहित्य हमें आदिवासी भाषाओं में मिलता है। इस दृष्टि से आदिवासी साहित्य सभी साहित्य का मूल स्रोत है। साहित्य - स+हित+य के योग से बना है

भारतीय वाङ्मय को काल की दृष्टि से निम्नलिखित भागों में विभक्त किया गया है -

भारत का संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से आरम्भ होता है। व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की। भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे।

भक्ति साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, ब्रज भाषा में सूरदास तथा रैदास, मारवाड़ी में मीराबाई, खड़ीबोली में  कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं। अवधी के प्रमुख कवियों में रमई काका सुप्रसिद्ध कवि हैं।

हिन्दी साहित्य में कथा, कहानी और उपन्यास के लेखन में प्रेमचन्द का महान योगदान है।

ग्रीक साहित्य में होमर के इलियड और ऑडसी विश्वप्रसिद्ध हैं। अंग्रेज़ी साहित्य में शेक्स्पियर का नाम कौन नहीं जानता।




#Article 32: चित्रकला (656 words)


चित्रकला एक द्विविमीय (two-dimensional) कला है। भारत में चित्रकला का एक प्राचीन स्रोत विष्णुधर्मोत्तर पुराण है।

चित्रकला का प्रचार चीन, मिस्र, भारत आदि देशों में अत्यंत प्राचीन काल से है। मिस्र से ही चित्रकला यूनान में गई, जहाँ उसने बहुत उन्नति की। ईसा से १४०० वर्ष पहले मिस्र देश में चित्रों का अच्छा प्रचार था। लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में ३००० वर्ष तक के पुराने मिस्री चित्र हैं। भारतवर्ष में भी अत्यंत प्राचीन काल से यह विधा प्रचलित थी, इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। रामायण में चित्रों, चित्रकारों और चित्रशालाओं का वर्णन बराबर आया है। विश्वकर्मीय शिल्पशास्त्र में लिखा है कि स्थापक, तक्षक, शिल्पी आदि में से शिल्पी को ही चित्र बनाना चाहिए। प्राकृतिक दृश्यों को अंकित करने में प्राचीन भारतीय चित्रकार कितने निपुण होते थे, इसका कुछ आभास भवभूति के उत्तररामचरित के देखने से मिलता है, जिसमें अपने सामने लाए हुए वनवास के चित्रों को देख सीता चकित हो जाती हैं। यद्यपि आजकल कोई ग्रंथ चित्रकला पर नहीं मिलता है, तथापि प्राचीन काल में ऐसे ग्रंथ अवश्य थे। कश्मीर के राजा जयादित्य की सभा के कवि दोमोदर गुप्त आज से ११०० वर्ष पहले अपने कुट्टनीमत नामक ग्रंथ में चित्रविद्या के 'चित्रसूत्र' नामक एक ग्रंथ का अल्लेख किया है। अजंता गुफा के चित्रों में प्राचीन भारतवासियों की चित्रनिपुणता देख चकित रह जाना पड़ता है। बड़े बड़े विज्ञ युरोपियनों ने इन चित्रों की प्रशंसा की है। उन गुफाओं में चित्रों का बनाना ईसा से दो सौ वर्ष पूर्व से आरंभ हुआ ता औरक आठवीं शताब्दी तक कुछ न कुछ गुफाएँ नई खुदती रहीं। अतः डेढ़ दो हजार वर्ष के प्रत्यक्ष प्रमाण तो ये चित्र अवश्य हैं।

चित्रविद्या सीखने के लिये पहले प्रत्येक प्रकार की सीधी टेढ़ी, वक्र आदि रेखाएँ खींचने का अभ्यास करना चाहिए। इसके उपरांत रेखाओं के ही द्वारा वस्तुओं के स्थूल ढाँचे बनाने चाहिए। इस विद्या में दूरी आदि के सिद्धांत का पूरा अनुशीलन किए बिना निपूणता नहीं प्राप्त हो सकती। दृष्टि के समानांतर या ऊपर नीचे के विस्तार का अंकन तो सहज है, पर आँखों के ठीक सामने दूर तक गया हुआ विस्तार अंकित करना कठिन विषय है। इस प्रकार की दूरी का विस्तार प्रदर्शित करने की क्रिया को 'पर्सपेक्टिव' (Perspective) कहते हैं। किसी नगर की दूर तक सामने गई हुई सड़क, सामने को बही हुई नदी आदि के दृश्य बिना इसके सिद्धांतों को जाने नहीं दिखाए जा सकते। किस प्रकार निकट के पदार्थ बड़े और साफ दिखाई पड़ते हैं और दूर के पदार्थ क्रमशः छोटे और धुँधले होते जाते हैं, ये सब बातें अंकित करनी पड़ती हैं। उदाहरण के लिये दूर पर रखा हुआ एक चौखूँटा संदूक लीजिए। मान लीजिए कि आप उसे एक ऐसे किनारे से देख रहे हैं जहाँ से उसके दो पार्श्व या तीन कोण दिखाई पड़ते हैं। अब चित्र बनाने के निमित्त हम एक पेंसिल आँखों के समानांतर लेकर एक आँख दबाकर देखेंगे तो संदूक की सबके निकटस्थ खड़ी कोणरेखा (ऊँचाई) सबसे बड़ी दिखाई देगी; जो पार्श्व अधिक सामने रहेगा, उसके दूसरे ओर की कोणरेखा उससे छोटी और जो पार्श्व कम दिखाई देगा, उसके दूसरे ओर की कोणरेखा सबसे छोटी दिखाई पड़ेगी। अर्थात् निकटस्थ कोण रेखा से लगा हुआ उस पार्श्व का कोण जो कम दिखाई देता है, अधिक दिखाई पड़नेवाले पार्श्व के कोण से छोटा होगा। दूसरा सिद्धांत आलोक और छाया का है जिसके बिना सजीवता नहीं आ सकती। पदार्थ का जो अंश निकट और सामने रहेगा वह खुलता (आलोकित) और स्पष्ट होगा; और जो दूर या बगल में पड़ेगा, वह स्पष्ट ओर कालिमा लिए होगा। पदार्थोंका उभार और गहराई आदि भी इसी आलोक और छाया के नियमानुसार दिकाई जाती है। जो अंश उठा या उभरा होगा, वह अधिक खुलता होगा और जो धँसा या गहरा होगा वह कुछ स्याही लिए होगा। इन्हीं सिद्धांतों को न जानने के कारण बाजारू चित्रकार शीशे आदि पर जो चित्र बनाते हैं वे खेलवाड़ से जान पड़ते हैं। चित्रों में रंग एक प्रकार की कूँची से भरा जाता है जिसे चित्रकार कलम कहते हैं। पहले यहाँ गिलहरी की पूँछ के बालों की कलम बनती थी। अब विलायती ब्रुश काम में आते हैं।




#Article 33: ऋग्वेद (1039 words)


हिन्दू धर्म का सबसे आरम्भिक स्रोत है। इसमें १० मंडल, १०२८ सूक्त और 10462 मन्त्र  हैं, मन्त्र संख्या के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद है। मंत्रों में देवताओं की स्तुति की गयी है। इसमें देवताओं का यज्ञ में आह्वान करने के लिये मन्त्र हैं। यही सर्वप्रथम वेद है। ऋग्वेद को इतिहासकार हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की अभी तक उपलब्ध पहली रचनाऔं में एक मानते हैं। यह संसार के उन सर्वप्रथम ग्रन्थों में से एक है जिसकी किसी रूप में मान्यता आज तक समाज में बनी हुई है। यह एक प्रमुख हिन्दू धर्म ग्रंथ है। 

ऋग्वेद सबसे पुराना ज्ञात वैदिक संस्कृत पुस्तक है। इसकी प्रारंभिक परतें किसी भी इंडो-यूरोपीय भाषा में सबसे पुराने मौजूदा ग्रंथों में से एक हैं।  ऋग्वेद  की ध्वनियों और ग्रंथों को दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से मौखिक रूप से प्रसारित किया गया है। दार्शनिक और भाषाई साक्ष्य इंगित करते हैं कि ऋग्वेद संहिता के थोक की रचना भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में हुई थी, जो कि सबसे अधिक संभावना है। 1500 और 1000 ईसा पूर्व, [11] [12] [13] हालांकि सी का एक व्यापक सन्निकटन। 1700-1000 BCE भी दिया गया है।

ऋक् संहिता में १० मंडल, बालखिल्य सहित १०२८ सूक्त हैं। वेद मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है। ऋग्वेद में ही मृत्युनिवारक त्र्यम्बक-मंत्र या मृत्युंजय मन्त्र (७/५९/१२) वर्णित है, ऋग्विधान के अनुसार इस मंत्र के जप के साथ विधिवत व्रत तथा हवन करने से दीर्घ आयु प्राप्त होती है तथा मृत्यु दूर हो कर सब प्रकार का सुख प्राप्त होता है। विश्व-विख्यात गायत्री मन्त्र (ऋ० ३/६२/१०) भी इसी में वर्णित है। ऋग्वेद में अनेक प्रकार के लोकोपयोगी-सूक्त, तत्त्वज्ञान-सूक्त, संस्कार-सुक्त उदाहरणतः रोग निवारक-सूक्त (ऋ०१०/१३७/१-७), श्री सूक्त या लक्ष्मी सूक्त (ऋग्वेद के परिशिष्ट सूक्त के खिलसूक्त में), तत्त्वज्ञान के नासदीय-सूक्त (ऋ० १०/१२९/१-७) तथा हिरण्यगर्भ सूक्त (ऋ०१०/१२१/१-१०) और विवाह आदि के सूक्त (ऋ० १०/८५/१-४७) वर्णित हैं, जिनमें ज्ञान विज्ञान का चरमोत्कर्ष दिखलाई देता है।

इस ग्रंथ को इतिहास की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण रचना माना गया है। ईरानी अवेस्ता की गाथाओं का ऋग्वेद के श्लोकों के जैसे स्वरों में होना, जिसमें कुछ विविध हिन्दू देवताओं जैसे अग्नि, वायु, जल,  सोम आदि का वर्णन है।

ऋग्वेद के विषय में कुछ प्रमुख बातें निम्नलिखित है- 

इस पाठ को दस मण्डलों में बांटा गया है,जो कि अलग-अलग समय में लिखे गए हैं और अलग-अलग लम्बाई के हैं।

मण्डल संख्या २ से ७ ऋग्वेद के सबसे पुराने और सूक्ष्मतम मंडल हैं। यह मण्डल कुल पाठ का ३८% है।

उत्तर वैदिक काल से पहले का वह काल जिसमें ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना हुई थी इन ऋचाओं की जो भाषा थी वो ऋग्वैदिक भाषा कहलाती है। ऋग्वैदिक भाषा हिंद यूरोपीय भाषा परिवार की एक भाषा है। इसकी परवर्ती पुत्री भाषाएँ अवेस्ता, पुरानी  फ़ारसी, पालि, प्राकृत और संस्कृत हैँ।

ऋग्वैदिक भाषा के मूल मातृभाषी संस्कृत भाषी हिंद-इरानी थे।

जैसे होमेरिक ग्रीक क्लासिकल ग्रीक से भिन्न है वैसै ऋग्वैदिक भाषा
संस्कृत भाषा से भिन्न है। तिवारी ([1955] 2005) ने दोनोँ के बीच अंतर को निम्न सिद्धांत स्वरूप सूचित किया:

१९वीं शताब्दी में अवस्ताई फ़ारसी और ऋग्वैदिक भाषा दोनों पर पश्चिमी विद्वानों की नज़र नई-नई पड़ी थी और इन दोनों के गहरे सम्बन्ध का तथ्य उनके सामने जल्दी ही आ गया। उन्होने देखा के अवस्ताई फ़ारसी और ऋग्वैदिक भाषा के शब्दों में कुछ सरल नियमों के साथ एक से दुसरे को अनुवादित किया जा सकता था और व्याकरण की दृष्टि से यह दोनों बहुत नज़दीक थे। अपनी सन् १८९२ में प्रकाशित किताब अवस्ताई व्याकरण की संस्कृत से तुलना और अवस्ताई वर्णमाला और उसका लिप्यन्तरण में भाषावैज्ञानिक और विद्वान एब्राहम जैक्सन ने उदहारण के लिए एक अवस्ताई धार्मिक श्लोक का ऋग्वैदिक भाषा में सीधा अनुवाद किया।

एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, वेद पहले एक संहिता में थे पर व्यास ऋषि ने अध्ययन की सुगमता के लिए इन्हें चार भागों में बाँट दिया। इस विभक्तिकरण के कारण ही उनका नाम वेद व्यास पड़ा। इनका विभाजन दो क्रम से किया जाता है -

ऋग्वेद के सूक्तों के पुरुष रचियताओं में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज, वशिष्ठ आदि प्रमुख हैं। सूक्तों के स्त्री रचयिताओं में लोपामुद्रा, घोषा, शची, कांक्षावृत्ति, पौलोमी आदि प्रमुख हैं।
ऋग्वेद के १० वें मंडल के ९५ सूक्त में पुरुरवा, ऐल और उर्वसी का संवाद है।

वेदों में किसी प्रकार की मिलावट न हो इसके लिए ऋषियों ने शब्दों तथा अक्षरों को गिन कर लिख दिया था। कात्यायन प्रभृति ऋषियों की अनुक्रमणी के अनुसार ऋचाओं की संख्या १०,५८०, शब्दों की संख्या १५३५२६ तथा शौनककृत अनुक्रमणी के अनुसार ४,३२,००० अक्षर हैं। शतपथ ब्राह्मण जैसे ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि प्रजापति कृत अक्षरों की संख्या १२००० बृहती थी। अर्थात १२००० गुणा ३६ यानि ४,३२,००० अक्षर। आज जो शाकल संहिता के रूप में ऋग्वेद उपलब्ध है उनमें केवल १०५५२ ऋचाएँ हैं।

ऋग्वेद में ऋचाओं का बाहुल्य होने के कारण इसे 'ज्ञान का वेद' कहा जाता है।

ऋग्वेद की जिन २१ शाखाओं का वर्णन मिलता है, उनमें से चरणव्युह ग्रंथ के अनुसार पाँच ही प्रमुख हैं- 

सबसे पुराना भाष्य (यानि टीका, समीक्षा) किसने लिखा यह कहना मुश्किल है पर सबसे प्रसिद्ध उपलब्द्ध प्राचीन भाष्य आचार्य सायण का है। आचार्य सायण से पूर्व के भाष्यकार अधिक गूढ़ भाष्य बना गए थे। यास्क ने ईसापूर्व पाँचवीं सदी में (अनुमानित) एक कोष लिखा था जिसमें वैदिक शब्दों के अर्थ दिए गए थे। लेकिन सायण ही एक ऐसे भाष्यकार हैं जिनके चारों वेदों के भाष्य मिलते हैं। ऋग्वेद के परिप्रेक्ष्य में क्रम से इन भाष्यकारों ने ऋग्वेद की टीका लिखी -

आधुनिक कल में ऋग्वेद को समझने हेतु महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका की रचना की गई। और उस भाष्य का फिर आगे सरल संस्कृत एवं हिन्दी में अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया। इसी प्रकार स्वामी जी ने यजुर्वेद का भी भाष्य लिखा। उन्होने अंधविश्वास मिटाने हेतु और सत्य विद्या को जन जन तक पहुँचने हेतु हिन्दी में  सत्यार्थ प्रकाश  नामक ग्रंथ की रचना की और आर्य समाज संस्था कि स्थापना की।

ऋग्वेद के तत्वों में पारसी धर्म के अवेस्ता के साथ समानता है;, उदाहरण के लिए: अहुरा से असुर,देवा डेवा से, अहुरा मज़्दा से हिंदू एकेश्वरवाद, वरुण, विष्णु और गरुड़, अग्नि से अग्नि मंदिर, स्वर्गीय रस सोमा - हाओमा नामक पेय से, समकालीन भारतीय और फारसी युद्ध से देवासुर का युद्ध, अरिया से आर्य, मिथरा से मित्र, द्यौष्पिता और ज़ीउस से बृहस्पति, यज्ञ से यज्ञ, नरिसंग से नरसंगसा, इंद्र, गंधर्व से गंधर्व, वज्र, वायु, मंत्र , यम, अहुति, हमता से सुमति इत्यादि।




#Article 34: रहीम (1310 words)


अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ या सिर्फ रहीम, एक मध्यकालीन कवि, सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद, कलाप्रेमी, एवं विद्वान थे। वे भारतीय सामासिक संस्कृति के अनन्य आराधक तथा सभी संप्रदायों के प्रति समादर भाव के सत्यनिष्ठ साधक थे। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न था। वे एक ही साथ  कलम और तलवार के धनी थे और मानव प्रेम के सूत्रधार थे।

जन्म से एक मुसलमान होते हुए भी हिंदू जीवन के अंतर्मन में बैठकर रहीम ने जो मार्मिक तथ्य अंकित किये थे, उनकी विशाल हृदयता का परिचय देती हैं। हिंदू देवी-देवताओं, पर्वों, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का जहाँ भी उनके द्वारा उल्लेख किया गया है, पूरी जानकारी एवं ईमानदारी के साथ किया गया है। वे जीवनभर हिंदू जीवन को भारतीय जीवन का यथार्थ मानते रहे। रहीम ने काव्य में रामायण, महाभारत, पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथों के कथानकों को उदाहरण के लिए चुना है और लौकिक जीवनव्यवहार पक्ष को उसके द्वारा समझाने का प्रयत्न किया है, जो भारतीय संस्कृति की वर झलक को पेश करता है।

अबदुर्ररहीम खानखाना का जन्म संवत् १६१३ (ई. सन् १५५६) में लाहौर में हुआ था। संयोग से उस समय हुमायूँ , सिकंदर , सूरी का आक्रमण का प्रतिरोध करने के लिए सैन्य के साथ लाहौर में मौजूद थे।

रहीम के पिता बैरम खाँ तेरह वर्षीय अकबर के शिक्षक तथा अभिभावक थे। बैरम खाँ खान-ए-खाना की उपाधि से सम्मानित थे। वे हुमायूँ के साढ़ू और अंतरंग मित्र थे। रहीम की माँ वर्तमान हरियाणा प्रांत के मेवाती राजपूत जमाल खाँ की सुंदर एवं गुणवती कन्या सुल्ताना बेगम थी। जब रहीम पाँच वर्ष के ही थे, तब गुजरात के पाटण नगर में सन १५६१ में इनके पिता बैरम खाँ की हत्या कर दी गई। रहीम का पालन-पोषण अकबर ने अपने धर्म-पुत्र की तरह किया। शाही खानदान की परंपरानुरूप रहीम को 'मिर्जा खाँ' का ख़िताब दिया गया। रहीम ने बाबा जंबूर की देख-रेख में गहन अध्ययन किया। शिक्षा समाप्त होने पर अकबर ने अपनी धाय की बेटी माहबानो से रहीम का विवाह  करा दिया। इसके बाद रहीम ने गुजरात, कुम्भलनेर, उदयपुर आदि युद्धों में विजय प्राप्त की। इस पर अकबर ने अपने समय की सर्वोच्च उपाधि 'मीरअर्ज' से रहीम को विभूषित किया। सन १५८४ में अकबर ने रहीम को खान-ए-खाना की उपाधि से सम्मानित किया। रहीम का देहांत ७१ वर्ष की आयु में सन १६२७ में हुआ। रहीम को उनकी इच्छा के अनुसार दिल्ली में ही उनकी पत्नी के मकबरे के पास ही दफना दिया गया। यह मज़ार आज भी दिल्ली में मौजूद हैं। रहीम ने स्वयं ही अपने जीवनकाल में इसका निर्माण करवाया था।

हुमायूँ ने युवराज अकबर की शिक्षा-दिक्षा के लिए बैरम खाँ को चुना और अपने जीवन के अंतिम दिनों में राज्य का प्रबंध की जिम्मेदारी देकर अकबर का अभिभावक नियुक्त किया था। बैरम खाँ ने कुशल नीति से अकबर के राज्य को मजबूत बनाने में पूरा सहयोग दिया। किसी कारणवश बैरम खाँ और अकबर के बीच मतभेद हो गया। अकबर ने बैरम खाँ के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया और अपने उस्ताद की मान एवं लाज रखते हुए उसे हज पर जाने की इच्छा जताई। परिणामस्वरुप बैरम खाँ हज के लिए रवाना हो गये। बैरम खाँ हज के लिए जाते हुए गुजरात के पाटन में ठहरे और पाटन के प्रसिद्ध सहस्रलिंग सरोवर में नौका-विहार के बाद तट पर बैठे थे कि भेंट करने की नियत से एक अफगान सरदार मुबारक खाँ आया और धोखे से बैरम खाँ की हत्या कर दी। यह मुबारक खाँ ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए किया।

इस घटना ने बैरम खाँ के परिवार को अनाथ बना दिया। इन धोखेबाजों ने सिर्फ कत्ल ही नहीं किया, बल्कि काफी लूटपाट भी मचाया। विधवा सुल्ताना बेगम अपने कुछ सेवकों सहित बचकर अहमदाबाद आ गई। अकबर को घटना के बारे में जैसे ही मालूम हुआ, उन्होंने सुल्ताना बेगम को दरबार वापस आने का संदेश भेज दिया। रास्ते में संदेश पाकर बेगम अकबर के दरबार में आ गई। ऐसे समय में अकबर ने अपने महानता का सबूत देते हुए इनको बड़ी उदारता से शरण दिया और रहीम के लिए कहा “इसे सब प्रकार से प्रसन्न रखो। इसे यह पता न चले कि इनके पिता खान खानाँ का साया सर से उठ गया है। बाबा जम्बूर को कहा यह हमारा बेटा है। इसे हमारी दृष्टि के सामने रखा करो। इस प्रकार अकबर ने रहीम का पालन- पोषण एकदम धर्म- पुत्र की भांति किया। कुछ दिनों के पश्चात अकबर ने विधवा सुल्ताना बेगम से विवाह कर लिया। अकबर ने रहीम को शाही खानदान के अनुरुप “मिर्जा खाँ’ की उपाधि से सम्मानित किया। रहीम की शिक्षा- दीक्षा अकबर की उदार धर्म- निरपेक्ष नीति के अनुकूल हुई। इसी शिक्षा-दीक्षा के कारण रहीम का काव्य आज भी हिंदूओं के गले का कण्ठहार बना हुआ है। दिनकर जी के  कथनानुसार अकबर ने अपने दीन-इलाही में हिंदूत्व को जो स्थान दिया होगा, उससे कई गुणा ज्यादा स्थान रहीम ने अपनी कविताओं में दिया। रहीम के बारे में यह कहा जाता है कि वह धर्म से मुसलमान और संस्कृति से शुद्ध भारतीय थे।

रहीम की शिक्षा समाप्त होने के पश्चात सम्राट अकबर ने अपने पिता हुमायूँ की परंपरा का निर्वाह करते हुए, रहीम का विवाह बैरम खाँ के विरोधी मिर्जा अजीज कोका की बहन माहबानों से करवा दिया। इस विवाह में भी अकबर ने वही किया, जो पहले करता रहा था कि विवाह के संबंधों के बदौलत आपसी तनाव व पुरानी से पुरानी कटुता को समाप्त कर दिया करता था। रहीम के विवाह से बैरम खाँ और मिर्जा के बीच चली आ रही पुरानी रंजिश खत्म हो गयी। रहीम का विवाह लगभग तेरह साल की उम्र में कर दिया गया था।इनकी दस संताने थी

अकबर के दरबार को प्रमुख पदों में से एक मीर अर्ज का पद था। यह पद पाकर कोई भी व्यक्ति रातों रात अमीर हो जाता था, क्योंकि यह पद ऐसा था, जिससे पहुँचकर ही जनता की फरियाद सम्राट तक पहुँचती थी और सम्राट के द्वारा लिए गए फैसले भी इसी पद के जरिये जनता तक पहुँचाए जाते थे। इस पद पर हर दो- तीन दिनों में नए लोगों को नियुक्त किया जाता था। सम्राट अकबर ने इस पद का काम- काज सुचारु रूप से चलाने के लिए अपने सच्चे तथा विश्वास पात्र अमीर रहीम को मुस्तकिल मीर अर्ज नियुक्त किया। यह निर्णय सुनकर सारा दरबार सन्न रह गया था। इस पद पर आसीन होने का मतलब था कि वह व्यक्ति जनता एवं सम्राट दोनों में सामान्य रूप से विश्वसनीय है।

काफी मिन्नतों तथा आशीर्वाद के बाद अकबर को शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से एक लड़का प्राप्त हो सका, जिसका नाम उन्होंने सलीम रखा। शहजादा सलीम माँ-बाप और दूसरे लोगों के अधिक दुलार के कारण शिक्षा के प्रति उदासीन हो गया था। कई महान लोगों को सलीम की शिक्षा के लिए अकबर ने लगवाया। इन महान लोगों में शेर अहमद, मीर कलाँ और दरबारी विद्वान अबुलफजल थे। सभी लोगों की कोशिशों के बावजूद शहजादा सलीम को पढ़ाई में मन न लगा। अकबर ने सदा की तरह अपना आखिरी हथियार रहीम खाने खाना को सलीम का अतालीक नियुक्त किया। कहा जाता है रहीम यह गौरव पाकर बहुत प्रसन्न थे।

रहीम ने अवधी और ब्रजभाषा दोनों में ही कविता की है जो सरल, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण है। 

उनके काव्य में शृंगार, शांत तथा हास्य रस मिलते हैं। दोहा, सोरठा, बरवै, कवित्त और सवैया उनके प्रिय छंद हैं। रहीम दास जी की भाषा अत्यंत सरल है, उनके काव्य में भक्ति, नीति, प्रेम और श्रृंगार का सुन्दर समावेश मिलता है। उन्होंने सोरठा एवं छंदों का प्रयोग करते हुए अपनी काव्य रचनाओं को किया है| उन्होंने ब्रजभाषा में अपनी काव्य रचनाएं की है| उनके ब्रज का रूप अत्यंत व्यवहारिक, स्पष्ट एवं सरल है| उन्होंने तदभव शब्दों का अधिक प्रयोग किया है। ब्रज भाषा के अतिरिक्त उन्होंने कई अन्य भाषाओं का प्रयोग अपनी काव्य रचनाओं में किया है| अवधी के ग्रामीण शब्दों का प्रयोग भी रहीमजी ने अपनी रचनाओं में किया है, उनकी अधिकतर काव्य रचनाएं मुक्तक शैली में की गई हैं जो कि अत्यंत ही सरल एवं बोधगम्य है |

रहीम दोहावली, बरवै, नायिका भेद, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, नगर शोभा आदि।




#Article 35: एस्पेरान्तो का प्राग इश्तिहार (779 words)


एस्पेरान्तो की प्रगति चाहने वाले हम लोग यह इश्तिहार सब सरकारों अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं और सज्जनों के नाम दे रहे हैं; यहाँ दिये गए उद्देश्यों की ओर दृढ़ निश्चय से काम करने की घोषणा कर रहे हैं; और सब संस्थाओं और लोगों को हमारे प्रयास में जुटने का निमन्त्रण दे रहे हैं।

एस्पेरान्तो जिसका आगाज़ १८८७ में अन्तर्राष्ट्रीय संप्रेषण के लिये एक सहायक भाषा के रूप में हुआ था और जो जल्दी ही अपने आप में एक जीती जागती ज़बान बन गई -- पिछले एक शताब्दी से लोगों को भाषा और संस्कृति की दीवारों को पार कराने का काम कर रही है। जिन उद्देश्यों से एस्पेरान्तो बोलने वाले प्रेरित होते आए हैं, वो उद्देश्य आज भी उतने ही महत्वपूर्ण और सार्थक हैं। ना दुनिया भर में कुछ ही राष्ट्रीय भाषाओं के इस्तेमाल होने से, ना संप्रेषण तकनीकों में प्रगति से, ना ही भाषा सिखाने के नए तौर-तरीक़ों से, यह निम्नलिखित मूल यथार्त हो पायेंगे जिन्हें हम सच्ची और साधक भाषा प्रणाली के लिए अनिवार्य मानते हैं।

लोकतंत्र
ऐसी संचार-प्रणाली जो किसी एक को ख़ास फ़ायदा प्रदान करते हुए औरों से यह चाहे कि वे सालों भर का प्रयास करें और वो भी एक मामूली योग्यता प्राप्त करने के लिए, ऐसी प्रणाली बुनियादी तौर पर अलौकतांत्रिक है। यद्यपि एस्पेरान्तो और ज़बानों की तरह ही, दोष-हीन नहीं है, पर विश्वव्यापक समान संप्रेषण के लिए, एस्पेरान्तो बाकी भाषाओं से कहीं बेहतर है।
हम मानते हैं कि भाषा असमता संप्रेषण असमता को हर स्तर पर पैदा करती है, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी। हमारा आन्दोलन लोकतांत्रिक संप्रेषण का आन्दोलन है।

विश्वव्यापी विद्या
हर जातीय भाषा किसी ना किसी संस्कृति और देश से मिली जुड़ी हुई है। मिसाल के तौर पे, अंग्रेज़ी सीखता छात्र दुनिया के अंग्रेज़ी बोलने वाले देशों के बारे में सीखता है -- ख़ास कर, अमेरिका और इंग्लैंड के बारे में। एस्पेरान्तो सीखने वाला छात्र एक ऐसी दुनिया के बारे में सीखता है जिसमे सीमाएँ नहीं हैं, जहाँ हर देश घर है।
हमारा मत है कि हर भाषा में दी गयी विद्या किसी ना किसी दृष्टिकोण से जुड़ी हुई है। हमारा आन्दोलन विश्वव्यापी विद्या का आन्दोलन है।

प्रभावशील विद्या

विदेशी भाषा सीखने वालों में कुछ प्रतिशत ही विदेशी भाषा में धाराप्रवाह हासिल कर पाते हैं। एस्पेरान्तो में धाराप्रवाह घर बैठ कर पढ़ाई से भी मुमकिन है। कई शोध-पत्रों में साबित किया गया है कि एस्पेरान्तो सीखने से अन्य भाषाओं का सीखना आसान हो जाता है। यह भी अनुशंसित किया गया है कि भाषा-चेतना के पाठ्यक्रमों की बुनियाद में ही एस्पेरान्तो सम्मिलित होना चाहिए।

हमारा मत है कि जिन विद्यार्थियों को दूसरी भाषा सीखने से फ़ायदा हो सकता है, उन विद्यार्थियों केलिए विदेशी भाषाएँ सीखने की कठिनाइयाँ हमेशा एक दीवार बन कर खड़ी रहेंगी। हमारा आन्दोलन प्रभावशील भाषाग्रहण का आन्दोलन है।

बहुभाष्यता

एस्पेरान्तो समुदाय उन चुने-गिने विश्वव्यापी समुदायों में से है जिनका हर सदस्य दुभाषी या बहुभाषी है। इस समुदाय के हर सदस्य ने कम से कम एक विदेशी भाषा को बोलचाल-स्तर तक सीखने का प्रयास किया है। कई बार इस कारण अनेक भाषाओं का ग्यान और अनेक भाषाओं के प्रति प्रेम पैदा हुआ है -- निजि मानसिक-क्षितिजों में बढ़ौत्री हुई है।

हम मानते हैं कि हर इनसान को, चाहे वो छोटी ज़बान बोलने वाला हो, या बड़ी, एक दूसरी ज़बान उच्च-स्तर तक सीखने का मौका मिलना चाहिए। हमारा आन्दोलन वह मौका हर एक को देता है।

भाषा-अधिकार

भाषाओं की ताकतों का असमान वितरण, दुनिया में ज़्यादातर लोगों में भाषा असुरक्षा पैदा करती है, या फिर यह असमानता खुले आम भाषा अत्याचार का रूप लेती है। एस्पेरान्तो समुदाय का हर सदस्य, चाहे वो ताकतवर ज़बान का बोलने वाला हो, या बलहीन, एक समान स्तर पर हर दूसरे सदस्य से मिलता है, समझौता करने के लिए तय्यार। भाषा अधिकारों और ज़िम्मेवारियों का यह समतुलन, अन्य भाषा असमानताओं और संघर्षणों की कसौटी है।

भाषा जो भी हो, बरताव एक ही होगा -- हम मानते हैं कि कई अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों में व्यक्त किया गया यह सिद्धांत, भाषाओं की ताकत में असमानताओं के कारण नसार्थक बन रहा है। हमारा आन्दोलन भाषा-अधिकारों का आन्दोलन है।

भाषा विभिन्नता

सरकारें दुनिया की विशाल भाषा विभिन्नता को संप्रेषण और तरक्की के रास्ते में एक दीवार मानती हैं। मगर एस्पेरान्तो समुदाय भाषा विभिन्नता को एक अत्यावष्यक और निरन्तर धन के रूप में देखती है। इस कारण, हर भाषा, हर प्रकार के जीव-जन्तु की तरह, सहायता और सुरक्षा के लायक है।

हमारा मत है कि संप्रेषण और विकास की नीतियाँ जो सब ज़बानों के सम्मान और सहायता पर आधारित नहीं है, वह नीतियाँ दुनिया के अधिकतर भाषाओं के लिए सज़ा-ए-मौत साबित होंगी। हमारा आन्दोलन भाषा विभिन्नता का आन्दोलन है।

मानव बन्धनमुक्ति

हम मानते हैं कि केवल जातीय भाषाओं पर आधारित रहना अभिव्यक्ति, संप्रेषण और संघठन की स्वतंत्रता में अवश्य ही बाधाएँ पैदा करती है। हमारा आन्दोलन मानव बन्धनमुक्ति का आन्दोलन है।

प्राग, जुलाई १९९६




#Article 36: एशिया (664 words)


एशिया या जम्बुद्वीप आकार और जनसंख्या दोनों ही दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीप है, जो उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। पश्चिम में इसकी सीमाएं यूरोप से मिलती हैं, हालाँकि इन दोनों के बीच कोई सर्वमान्य और स्पष्ट सीमा नहीं निर्धारित है। एशिया और यूरोप को मिलाकर कभी-कभी यूरेशिया भी कहा जाता है।

एशियाई महाद्वीप भूमध्य सागर, अंध सागर, आर्कटिक महासागर, प्रशांत महासागर और हिन्द महासागर से घिरा हुआ है। काकेशस पर्वत शृंखला और यूराल पर्वत प्राकृतिक रूप से एशिया को यूरोप से अलग करते हैं। 

कुछ सबसे प्राचीन मानव सभ्यताओं का जन्म इसी महाद्वीप पर हुआ था जैसे सुमेर, भारतीय सभ्यता, चीनी सभ्यता इत्यादि। चीन और भारत(🇮🇳) विश्व के दो सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश भी हैं। 

पश्चिम में स्थित एक लंबी भू सीमा यूरोप को एशिया से पृथक करती है। तह सीमा उत्तर-दक्षिण दिशा में नीचे की ओर रूस में यूराल पर्वत तक जाती है, यूराल नदी के किनारे-किनारे कैस्पियन सागर तक और फिर काकेशस पर्वतों से होते हुए अंध सागर तक। रूस का लगभग तीन चौथाई भूभाग एशिया में है और शेष यूरोप में। चार अन्य एशियाई देशों के कुछ भूभाग भी यूरोप की सीमा में आते हैं।

विश्व के कुल भूभाग का लगभग ३/१०वां ( 3/10 वाँ ) भाग या ३०% (30%) एशिया में है और इस महाद्वीप की जनसंख्या अन्य सभी महाद्वीपों की संयुक्त जनसंख्या से अधिक है, लगभग ३/५वां ( 3/5 वाँ ) भाग या ६०% (60%) उत्तर में बर्फ़ीले आर्कटिक से लेकर दक्षिण में ऊष्ण भूमध्य रेखा तक यह महाद्वीप लगभग ४,४५,७९,००० कि॰मी॰ (4,45,79,000 कि॰मी॰) क्षेत्र में फैला हुआ है और अपने में कुछ विशाल, खाली रेगिस्तानों, विश्व के सबसे ऊँचे पर्वतों और कुछ सबसे लंबी नदियों को समेटे हुए है।

एशिया पृथ्वी का सबसे बड़ा महाद्वीप है। इसमें पृथ्वी के कुल सतह क्षेत्र का 8.8% हिस्सा है, और सबसे समुद्र से जुड़ा भाग 62,800 किलोमीटर (39,022 मील) का है। यह पूर्व में प्रशांत महासागर, दक्षिण में हिन्द महासागर और उत्तर में आर्कटिक महासागर द्वारा घिरा है। एशिया को 48 देशों में विभाजित किया गया है, उनमें से तीन (रूस, कजाकिस्तान और तुर्की) का भाग यूरोप में भी है।

जलवायु के आधार पर संपूर्ण एशिया तीन प्रदेशों बांटा जाता है 
प्रथम मानसूनी एशिया ड्रेस एशिया में भारी वर्षा के तीन छेत्र में भारत से हिंदी चीनी एवं भारत से चीन दक्षिण में जलवायु व्याप्त है दीप समूह से जापान क्षेत्र एशिया में 90 परसेंट व्हाट्सएप विश्व का दिन है जापान था दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ भागों में शीतकाल में वर्षा होती है इस संपूर्ण एशिया का सबसे अधिक वर्षा वाला इलाका भारत के मेघालय राज्य में खासी पहाड़ियों पर स्थित मासिनराम है इससे पूर्व चेरापूंजी नामक स्थान पर सबसे ज्यादा वर्षा दर्ज की जाती थी।

शुष्क एशिया- मध्य तथा दक्षिण-पश्चिम एशिया मंगोलिया में शुष्क जलवायु पाई जाती है इन प्रदेशों की ओर वर्षा 2.5 से 20 सैंटीमीटर तक होती है इन क्षेत्रों में वर्षा की अपेक्षा बस विकराल की प्रक्रिया अधिक होती है संपूर्ण एशिया का सबसे गर्म स्थान पाकिस्तान का जो को बाद रहा है जहाँ पर अधिकतम तापमान 57 डिग्री दर्ज किया गया है इन्हीं इलाकों में एशिया का प्रमुख मरुस्थल में पाए जाते हैं जैसे फर्स्ट अरब का मरुस्थल एशिया दक्षिण पश्चिमी एशिया में स्थित है जिसका क्षेत्रफल 2323 000 वर्ग किलोमीटर   का है

एशिया की अर्थव्यवस्था यूरोप के बाद विश्व की, क्रय शक्ति के आधार पर, दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। एशिया की अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत लगभग ४ अरब लोग आते हैं, जो विश्व जनसंख्या का 80% है। ये ४ अरब लोग एशिया के ४६ विभिन्न देशों में निवास करते है। छः अन्य देशों के कुछ भूभाग भी आंशिक रूप से एशिया में पड़ते हैं, लेकिन ये देश आर्थिक और राजनैतिक कारणों से अन्य क्षेत्रों में गिने जाते हैं। एशिया वर्तमान में विश्व का सबसे ते़ज़ी उन्नति करता हुआ क्षेत्र है और चीन इस समय एशिया की सबसे बड़ी और विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है जो कई पूर्वानुमानों के अनुसार अगले कुछ वर्षों में विश्व की भी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगी। एशिया की 5 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं है 1.चीन 2.जापान




#Article 37: कला (1649 words)


कला (आर्ट) शब्द इतना व्यापक है कि विभिन्न विद्वानों की परिभाषाएँ केवल एक विशेष पक्ष को छूकर रह जाती हैं। कला का अर्थ अभी तक निश्चित नहीं हो पाया है, यद्यपि इसकी हजारों परिभाषाएँ की गयी हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार कला उन सारी क्रियाओं को कहते हैं जिनमें कौशल अपेक्षित हो। यूरोपीय शास्त्रियों ने भी कला में कौशल को महत्त्वपूर्ण माना है।

कला एक प्रकार का कृत्रिम निर्माण है जिसमे शारीरिक और मानसिक कौशलों का प्रयोग होता है।

मैथिली शरण गुप्त के शब्दों में,

दूसरे शब्दों में -: मन के अंतःकरण की सुन्दर प्रस्तुति ही कला है।

कला शब्द का प्रयोग शायद सबसे पहले भरत के नाट्यशास्त्र में ही मिलता है। पीछे वात्स्यायन और उशनस् ने क्रमश: अपने ग्रंथ कामसूत्र और शुक्रनीति में इसका वर्णन किया।

 यूरोपीय साहित्य में भी कला शब्द का प्रयोग शारीरिक या मानसिक कौशल के लिए ही अधिकतर हुआ है। वहाँ प्रकृति से कला का कार्य भिन्न माना गया है। कला का अर्थ है रचना करना अर्थात् वह कृत्रिम है। प्राकृतिक सृष्टि और कला दोनों भिन्न वस्तुएँ हैं। कला उस कार्य में है जो मनुष्य करता है। कला और विज्ञान में भी अंतर माना जाता है। विज्ञान में ज्ञान का प्राधान्य है, कला में कौशल का। कौशलपूर्ण मानवीय कार्य को कला की संज्ञा दी जाती है। कौशलविहीन या बेढब ढंग से किये गये कार्यों को कला में स्थान नहीं दिया जाता।

कलाओं के वर्गीकरण में मतैक्य होना सम्भव नहीं है। वर्तमान समय में कला को मानविकी के अन्तर्गत रखा जाता है जिसमें इतिहास, साहित्य, दर्शन और भाषाविज्ञान आदि भी आते हैं।

पाश्चात्य जगत में कला के दो भेद किये गये हैं- उपयोगी कलाएँ (Practice Arts) तथा ललित कलाएँ (Fine Arts)। परम्परागत रूप से निम्नलिखित सात को 'कला' कहा जाता है- 

आधुनिक काल में इनमें फोटोग्राफी, चलचित्रण, विज्ञापन और कॉमिक्स जुड़ गये हैं।

उपरोक्त कलाओं को निम्नलिखित प्रकार से भी श्रेणीकृत कर सकते हैं-

कुछ कलाओं में दृश्य और निष्पादन दोनों के तत्त्व मिश्रित होते हैं, जैसे फिल्म।

जीवन, ऊर्जा का महासागर है। जब अंतश्‍चेतना जागृत होती है तो ऊर्जा जीवन को कला के रूप में उभारती है। कला जीवन को सत्‍यम् शिवम् सुन्‍दरम् से समन्वित करती है। इसके द्वारा ही बुद्धि आत्‍मा का सत्‍य स्‍वरुप झलकता है। कला उस क्षितिज की भाँति है जिसका कोई छोर नहीं, इतनी विशाल इतनी विस्‍तृत अनेक विधाओं को अपने में समेटे, तभी तो कवि मन कह उठा-

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मुख से निकला “कला में मनुष्‍य अपने भावों की अभिव्‍यक्ति करता है ” तो प्लेटो ने कहा - “कला सत्‍य की अनुकृति के अनुकृति है।”

टालस्‍टाय के शब्‍दों में अपने भावों की क्रिया रेखा, रंग, ध्‍वनि या शब्‍द द्वारा इस प्रकार अभिव्‍यक्ति करना कि उसे देखने या सुनने में भी वही भाव उत्‍पन्‍न हो जाए कला है। हृदय की गइराईयों से निकली अनुभूति जब कला का रूप लेती है, कलाकार का अन्‍तर्मन मानो मूर्त ले उठता है चाहे लेखनी उसका माध्‍यम हो या रंगों से भीगी तूलिका या सुरों की पुकार या वाद्यों की झंकार। कला ही आत्मिक शान्ति का माध्‍यम है। यह ‍कठिन तपस्‍या है, साधना है। इसी के माध्‍यम से कलाकार सुनहरी और इन्‍द्रधनुषी आत्‍मा से स्‍वप्निल विचारों को साकार रूप देता है।

कला में ऐसी शक्ति होनी चाहिए कि वह लोगों को संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठाकर उसे ऐसे ऊँचे स्‍थान पर पहुँचा दे जहाँ मनुष्‍य केवल मनुष्‍य रह जाता है। कला व्‍यक्ति के मन में बनी स्‍वार्थ, परिवार, क्षेत्र, धर्म, भाषा और जाति आदि की सीमाएँ मिटाकर विस्‍तृत और व्‍यापकता प्रदान करती है। व्‍यक्ति के मन को उदात्‍त बनाती है। वह व्‍यक्ति को “स्‍व” से निकालकर “वसुधैव कुटुम्‍बकम्” से जोड़ती है।

कला ही है जिसमें मानव मन में संवेदनाएँ उभारने, प्रवृत्तियों को ढालने तथा चिंतन को मोड़ने, अभिरुचि को दिशा देने की अद्भुत क्षमता है। मनोरंजन, सौन्‍दर्य, प्रवाह, उल्‍लास न जाने कितने तत्त्वों से यह भरपूर है, जिसमें मानवीयता को सम्‍मोहित करने की शक्ति है। यह अपना जादू तत्‍काल दिखाती है और व्यक्ति को बदलने में, लोहा पिघलाकर पानी बना देने वाली भट्टी की तरह मनोवृत्तियों में भारी रुपान्‍तरण प्रस्‍तुत कर सकती है।

जब यह कला संगीत के रूप में उभरती है तो कलाकार गायन और वादन से स्‍वयं को ही नहीं श्रोताओं को भी अभिभूत कर देता है। मनुष्‍य आत्‍मविस्‍मृत हो उठता है। दीपक राग से दीपक जल उठता है और मल्‍हार राग से मेघ बरसना यह कला की साधना का ही चरमोत्‍कर्ष है। संगीत की साधना; सुरों की साधना है। मिलन है आत्‍मा से परमात्‍मा का; अभिव्‍यक्ति है अनुभूति की।

भाट और चारण भी जब युद्धस्‍थल में उमंग, जोश से सराबोर कविता-गान करते थे, तो वीर योद्धाओं का उत्‍साह दोगुना हो जाता था और युद्धक्षेत्र कहीं हाथी की चिंघाड़, तो कहीं घोड़ों की हिनहिनाहट तो कहीं शत्रु की चीत्‍कार से भर उठता था; यह गायन कला की परिणति ही तो है।pop

संगीत केवल मानवमात्र में ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों व पेड़-पौधों में भी अमृत रस भर देता है। पशु-पक्षी भी संगीत से प्रभावित होकर झूम उठते हैं तो पेड़-पौधों में भी स्‍पन्‍दन हो उठता है। तरंगें फूट पड़ती हैं। यही नहीं मानव के अनेक रोगों का उपचार भी संगीत की तरंगों से सम्‍भव है। कहा भी है:

संगीत के बाद ये ललित-कलाओं में स्‍थान दिया गया है तो वह है- नृत्‍यकला। चाहे वह भरतनाट्यम हो या कथक, मणिपुरी हो या कुचिपुड़ी। विभिन्‍न भाव-भंगिमाओं से युक्‍त हमारी संस्कृति व पौराणिक कथाओं को ये नृत्‍य जीवन्‍तता प्रदान करते हैं। शास्‍त्रीय नृत्‍य हो या लोकनृत्‍य इनमें खोकर तन ही नहीं मन भी झूम उठता है।

कलाओं में कला, श्रेष्‍ठ कला, वह है चित्रकला। मनुष्‍य स्‍वभाव से ही अनुकरण की प्रवृत्ति रखता है। जैसा देखता है उसी प्रकार अपने को ढालने का प्रयत्‍न करता है। यही उसकी आत्‍माभिव्‍यंजना है। अपनी रंगों से भरी तूलिका से चित्रकार जन भावनाओं की अभिव्‍यक्ति करता है तो दर्शक हतप्रभ रह जाता है। पाषाण युग से ही जो चित्र पारितोषक होते रहे हैं ये मात्र एक विधा नहीं, अपितू ये मानवता के विकास का एक निश्चित सोपान प्रस्‍तुत करते हैं। चित्रों के माध्‍यम से आखेट करने वाले आदिम मानव ने न केवल अपने संवेगों को बल्कि रहस्‍यमय प्रवृत्ति और जंगल के खूंखार प्रवासियों के विरुद्ध अपने अस्तित्व के लिए किये गये संघर्ष को भी अभिव्‍यक्‍त किया है। धीरे-धीरे चित्रकला शिल्‍पकला सोपान चढ़ी। सिन्‍धुघाटी सभ्‍यता में पाये गये चित्रों में पशु-पक्षी मानव आकृति सुन्‍दर प्रतिमाएँ, ज्यादा नमूने भारत की आदिसभ्‍यता की कलाप्रियता का द्योतक है।

अजन्‍ता, बाध आदि के गुफा चित्रों की कलाकृतियों पूर्व बौद्धकाल के अन्‍तर्गत आती है। भारतीय कला का उज्‍ज्वल इतिहास भित्ति चित्रों से ही प्रारम्‍भ होता है और संसार में इनके समान चित्र कहीं नहीं बने ऐसा विद्वानों का मत है। अजन्‍ता के कला मन्दिर प्रेम, धैर्य, उपासना, भक्ति, सहानुभूति, त्‍याग तथा शान्ति के अपूर्व उदाहरण है।

मधुबनी शैली, पहाड़ी शैली, तंजौर शैली, मुगल शैली, बंगाल शैली अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण आज जनशक्ति के मन चिन्हित है। यदि भारतीय संस्‍कृति की मूर्त्ति कला व शिल्प कला के दर्शन करने हो तो दक्षिण के मन्दिर अपना विशिष्‍ट स्‍थान रखते हैं। जहाँ के मीनाक्षी मन्दिर, वृहदीश्‍वर मन्दिर, कोणार्क मन्दिर अपनी अनूठी पहचान के लिए प्रसिद्ध है।

यही नहीं भारतीय संस्‍कृति में लोक कलाओं की खुश्बू की महक आज भी अपनी प्राचीन परम्‍परा से समृद्ध है। जिस प्रकार आदिकाल से अब तक मानव जीवन का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता उसी प्रकार कला का भी इतिहास क्रमबद्ध नहीं है, परन्‍तु यह निश्चित है कि सहचरी के रूप में कला सदा से ही साथ रही है। लोक कलाओं का जन्‍म भावनाओं और परम्‍पराओं पर आधारित है क्‍योंकि यह जनसामान्‍य की अनुभूति की अभिव्यक्ति है। यह वर्तमान शास्त्रीय और व्‍यावसायिक कला की पृष्‍ठभूमि भी है। भारतवर्ष में पृथ्‍वी को धरती माता कहा गया है। मातृभूति तो इसका सांस्कृतिक व परिष्कृत रूप है। इसी धरती माता का श्रद्धा से अलंकरण करके लोकमानव में अपनी आत्‍मीयता का परिचय दिया। भारतीय संस्‍कृति में धरती को विभिन्‍न नामों से अलंकृत किया जाता है। गुजरात में “साथिया” राजस्‍थान में “माण्‍डना”, महाराष्‍ट्र में “रंगोली” उत्‍तर प्रदेश में “चौक पूरना”, बिहार में “अहपन”, बंगाल में “अल्‍पना” और गढ़वाल में “आपना” के नाम से प्रसिद्ध है। यह कला धर्मानुप्रागित भावों से प्रेषित होती है; जिसमें श्रद्धा से रचना की जाती है। विवाह और शुभ अवसरों में लोककला का विशिष्‍ट स्‍थान है। द्वारों पर अलंकृत घड़ों का रखना, उसमें जल व नारियल रखना, वन्‍दनवार बांधना आदि को आज के आधुनिक युग में भी इसे आदरभाव, श्रद्धा और उपासना की दृष्टि से देखा जाता है।

आज भारत की वास्‍तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण “ताजमहल” है, जिसने विश्‍व की अपूर्व कलाकृत्तियों के सात आश्‍चर्य में शीर्षस्‍थ स्‍थान पाया है। लालकिला, अक्षरधाम मन्दिर, कुतुबमीनार, जामा मस्जिद भी भारतीय वास्‍तुकला का अनुपम उदाहरण रही है। मूर्त्तिकला, समन्‍वयवादी वास्‍तुकला तथा भित्तिचित्रों की कला के साथ-साथ पर्वतीय कलाओं ने भी भारतीय कला से समृद्ध किया है।

सत्‍य, अहिंसा, करुणा, समन्‍वय और सर्वधर्म समभाव ये भारतीय संस्‍कृति के ऐसे तत्त्व हैं, जिन्‍होंने अनेक बाधाओं के ‍बीच भी हमारी संस्‍कृति की निरन्‍तरता को अक्षुण्ण बनाए रखा है। इन विशेषताओं ने हमारी संस्कृति में वह शक्ति उत्पन्‍न की है कि वह भारत के बाहर एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया में अपनी जड़े फैला सके।

हमारी संस्‍कृति के इन तत्त्वों को प्राचीन काल से लेकर आज तक की कलाओं में देखा जा सकता है। इन्‍हीं ललित कलाओं ने हमारी संस्‍कृति को सत्‍य, शिव, सौन्‍दर्य जैसे अनेक सकारात्‍मक पक्षों को चित्रित किया है। इन कलाओं के माध्‍यम से ही हमारा लोकजीवन, लोकमानस तथा जीवन का आं‍तरिक और आध्‍यात्मिक पक्ष अभिव्‍यक्‍त होता रहा है, हमें अपनी इस परम्‍परा से कटना नहीं है ‍अपितु अपनी परम्‍परा से ही रस लेकर आधुनिकता को चित्रित करना है।

वात्स्यायन के कामसूत्र की व्याख्या करते हुए जयमंगल ने दो प्रकार की कलाओं का उल्लेख किया है – (1) कामशास्त्र से सम्बन्धित कलाएँ, (2) तंत्र सम्बन्धी कलाएँ। दोनों की अलग-अलग संख्या 64 है। काम की कलाएँ 24 हैं जिनका सम्बन्ध सम्भोग के आसनों से है, 20 द्यूत सम्बन्धी, 16 कामसुख सम्बन्धी और 4 उच्चतर कलाएँ। कुल 64 प्रधान कलाएँ हैं। इसके अतिरिक्त कतिपय साधारण कलाएँ भी बतायी गयी हैं।

प्रगट है कि इन कलाओं में से बहुत कम का सम्बन्ध ललित कला या फ़ाइन आर्ट्स से है। ललित कला – अर्थात् चित्रकला, मुर्त्तिकला आदि का प्रसंग इनसे भिन्न और सौंदर्यशास्त्र से सम्बन्धित है।




#Article 38: काव्य (1517 words)


काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है।

काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वहजिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। रसगंगाधर में 'रमणीय' अर्थ के प्रतिपादक शब्द को 'काव्य' कहा है। 'अर्थ की रमणीयता' के अंतर्गत शब्द की रमणीयता (शब्दलंकार) भी समझकर लोग इस लक्षण को स्वीकार करते हैं। पर 'अर्थ' की 'रमणीयता' कई प्रकार की हो सकती है। इससे यह लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं है। साहित्य दर्पणाकार विश्वनाथ का लक्षण ही सबसे ठीक जँचता है। उसके अनुसार 'रसात्मक वाक्य ही काव्य है'। रस अर्थात् मनोवेगों का सुखद संचार की काव्य की आत्मा है। 

काव्यप्रकाश में काव्य तीन प्रकार के कहे गए हैं, ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र। ध्वनि वह है जिस, में शब्दों से निकले हुए अर्थ (वाच्य) की अपेक्षा छिपा हुआ अभिप्राय (व्यंग्य) प्रधान हो। गुणीभूत ब्यंग्य वह है जिसमें गौण हो। चित्र या अलंकार वह है जिसमें बिना ब्यंग्य के चमत्कार हो। इन तीनों को क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम भी कहते हैं। काव्यप्रकाशकार का जोर छिपे हुए भाव पर अधिक जान पड़ता है, रस के उद्रेक पर नहीं। काव्य के दो और भेद किए गए हैं, महाकाव्य और खंड काव्य। महाकाव्य सर्गबद्ध और उसका नायक कोई देवता, राजा या धीरोदात्त गुंण संपन्न क्षत्रिय होना चाहिए। उसमें शृंगार, वीर या शांत रसों में से कोई रस प्रधान होना चाहिए। बीच बीच में करुणा; हास्य इत्यादि और रस तथा और और लोगों के प्रसंग भी आने चाहिए। कम से कम आठ सर्ग होने चाहिए। महाकाव्य में संध्या, सूर्य, चंद्र, रात्रि, प्रभात, मृगया, पर्वत, वन, ऋतु, सागर, संयोग, विप्रलम्भ, मुनि, पुर, यज्ञ, रणप्रयाण, विवाह आदि का यथास्थान सन्निवेश होना चाहिए। काव्य दो प्रकार का माना गया है, दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य वह है जो अभिनय द्वारा दिखलाया जाय, जैसे, नाटक, प्रहसन, आदि जो पढ़ने और सुनेन योग्य हो, वह श्रव्य है। श्रव्य काव्य दो प्रकार का होता है, गद्य और पद्य। पद्य काव्य के महाकाव्य और खंडकाव्य दो भेद कहे जा चुके हैं। गद्य काव्य के भी दो भेद किए गए हैं- कथा और आख्यायिका। चंपू, विरुद और कारंभक तीन प्रकार के काव्य और माने गए है।

सामान्यत: संस्कृत के काव्य-साहित्य के दो भेद किये जाते हैं- दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य शब्दों के अतिरिक्त पात्रों की वेशभूषा, भावभंगिमा, आकृति, क्रिया और अभिनय द्वारा दर्शकों के हृदय में रसोन्मेष कराता है। दृश्यकाव्य को 'रूपक' भी कहते हैं क्योंकि उसका रसास्वादन नेत्रों से होता है। श्रव्य काव्य शब्दों द्वारा पाठकों और श्रोताओं के हृदय में रस का संचार करता है। श्रव्यकाव्य में पद्य, गद्य और चम्पू काव्यों का समावेश किया जाता है। गत्यर्थक में पद् धातु से निष्पन ‘पद्य’ शब्द गति की प्रधानता सूचित करता है। अत: पद्यकाव्य में ताल, लय और छन्द की व्यवस्था होती है। पुन: पद्यकाव्य के दो उपभेद किये जाते हैं—महाकाव्य और खण्डकाव्य। खण्डकाव्य को ‘मुक्तकाव्य’ भी कहते हैं। खण्डकाव्य में महाकाव्य के समान जीवन का सम्पूर्ण इतिवृत्त न होकर किसी एक अंश का वर्णन किया जाता है—

कवित्व के साथ-साथ संगीतात्कता की प्रधानता होने से ही इनको हिन्दी में ‘गीतिकाव्य’ भी कहते हैं। ‘गीति’ का अर्थ हृदय की रागात्मक भावना को छन्दोबद्ध रूप में प्रकट करना है। गीति की आत्मा भावातिरेक है। अपनी रागात्मक अनुभूति और कल्पना के कवि वर्ण्यवस्तु को भावात्मक बना देता है। गीतिकाव्य में काव्यशास्त्रीय रूढ़ियों और परम्पराओं से मुक्त होकर वैयक्तिक अनुभव को सरलता से अभिव्यक्त किया जाता है। स्वरूपत: गीतिकाव्य का आकार-प्रकार महाकाव्य से छोटा होता है। इन सब तत्त्वों के सहयोग से संस्कृत मुक्तककाव्य को एक उत्कृष्ट काव्यरूप माना जाता है। मुक्तकाव्य महाकाव्यों की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय हुए हैं।

संस्कृत में गीतिकाव्य मुक्तक और प्रबन्ध दोनों रूपों में प्राप्त होता है। प्रबन्धात्मक गीतिकाव्य का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण मेघदूत है। अधिकांश प्रबन्ध गीतिकाव्य इसी के अनुकरण पर लिखे गये हैं। मुक्तक वह हैजिसमें प्रत्येक पद्य अपने आप में स्वतंत्र होता है। इसके सुन्दर उदाहरण अमरूकशतक और भतृहरिशतकत्रय हैं। संगीतमय छन्द मधुर पदावली गीतिकाव्यों की विशेषता है। शृंंगार, नीति, वैराग्य और प्रकृति इसके प्रमुख प्रतिपाद्य विषय है। नारी के सौन्दर्य और स्वभाव का स्वाभाविक चित्रण इन काव्यों में मिलता है। उपदेश, नीति और लोकव्यवहार के सूत्र इनमें बड़े ही रमणीय ढंग से प्राप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि मुक्तकाव्यों में सूक्तियों और सुभाषितों की प्राप्ति प्रचुरता से होती है।

मुक्तककाव्य की परम्परा स्फुट सन्देश रचनाओं के रूप में वैदिक युग से ही प्राप्त होती है। ऋग्वेद में सरमा नामक कुत्ते को सन्देशवाहक के रूप में भेजने का प्रसंग है। वैदिक मुक्तककाव्य के उदाहरणों में वसिष्ठ और वामदेव के सूक्त, उल्लेखनीय हैं। रामायण, महाभारत और उनके परवर्ती ग्रन्थों में भी इस प्रकार के स्फुट प्रसंग विपुल मात्रा में उपलब्ध होते हैं। कदाचित् महाकवि वाल्मीकि के शाकोद्गारों में यह भावना गोपित रूप में रही है। पतिवियुक्ता प्रवासिनी सीता के प्रति प्रेषित श्री राम के संदेशवाहक हनुमान, दुर्योधन के प्रति धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा प्रेषित श्रीकृष्ण और सुन्दरी दयमन्ती के निकट राजा नल द्वारा प्रेषित सन्देशवाहक हंस इसी परम्परा के अन्तर्गत गिने जाने वाले प्रसंग हैं। इस सन्दर्भ में भागवत पुराण का वेणुगीत विशेष रूप से उद्धरणीय है जिसकी रसविभोर करने वाली भावना छवि संस्कृत मुक्तककाव्यों पर अंकित है। 

राजशेखर ने कविचर्या के प्रकरण में बताया है कि कवि को विद्याओं और उपविद्याओं की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। व्याकरण, कोश, छन्द, और अलंकार - ये चार विद्याएँ हैं। ६४ कलाएँ ही उपविद्याएँ हैं। कवित्व के ८ स्रोत हैं- स्वास्थ्य, प्रतिभा, अभ्यास, भक्ति, विद्वत्कथा, बहुश्रुतता, स्मृतिदृढता और राग।

मम्मट ने काव्य के छः प्रयोजन बताये हैं-

कविता या काव्य क्या है इस विषय में भारतीय साहित्य में आलोचकों की बड़ी समृद्ध परंपरा है— आचार्य विश्वनाथ, पंडितराज जगन्नाथ, पंडित अंबिकादत्त व्यास, आचार्य श्रीपति, भामह आदि संस्कृत के विद्वानों से लेकर आधुनिक आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा जयशंकर प्रसाद जैसे प्रबुद्ध कवियों और आधुनिक युग की मीरा महादेवी वर्मा ने कविता का स्वरूप स्पष्ट करते हुए अपने अपने मत व्यक्त किए हैं। विद्वानों का विचार है कि मानव हृदय अनन्त रूपतामक जगत के नाना रूपों, व्यापारों में भटकता रहता है, लेकिन जब मानव अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक सम्बंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

काव्य के भेद दो प्रकार से किए गए हैं– 

स्वरूप के आधार पर काव्य के दो भेद हैं - श्रव्यकाव्य एवं दृश्यकाव्य।

जिस काव्य का रसास्वादन दूसरे से सुनकर या स्वयं पढ़ कर किया जाता है उसे श्रव्य काव्य कहते हैं। जैसे रामायण और महाभारत।

श्रव्य काव्य के भी दो भेद होते हैं - प्रबन्ध काव्य तथा मुक्तक काव्य।

इसमें कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। कथा का क्रम बीच में कहीं नहीं टूटता और गौण कथाएँ बीच-बीच में सहायक बन कर आती हैं। जैसे रामचरित मानस।

प्रबंध काव्य के दो भेद होते हैं - महाकाव्य एवं खण्डकाव्य।

जैसे - पद्मावत, रामचरितमानस, कामायनी, साकेत आदि महाकव्य हैं।
 महाकाव्य में ये बातें होना आवश्यक हैं-

जैसे - पंचवटी, सुदामा चरित्र, हल्दीघाटी, पथिक आदि खंडकाव्य हैं।
 खंड काव्य में ये बातें होना आवश्यक हैं-

इसमें केवल एक ही पद या छंद स्वतंत्र रूप से किसी भाव या रस अथवा कथा को प्रकट करने में समर्थ होता है। गीत कवित्त दोहा आदि मुक्तक होते हैं।

जिस काव्य की आनंदानुभूति अभिनय को देखकर एवं पात्रों से कथोपकथन को सुन कर होती है उसे दृश्य काव्य कहते हैं। जैसे नाटक में या चलचित्र में।

आधुनिक हिंदी पद्य का इतिहास लगभग ८०० साल पुराना है और इसका प्रारंभ तेरहवीं शताब्दी से समझा जाता है। हर भाषा की तरह हिंदी कविता भी पहले इतिवृत्तात्मक थी। यानि किसी कहानी को लय के साथ छंद में बांध कर अलंकारों से सजा कर प्रस्तुत किया जाता था। भारतीय साहित्य के सभी प्राचीन ग्रंथ कविता में ही लिखे गए हैं। इसका विशेष कारण यह था कि लय और छंद के कारण कविता को याद कर लेना आसान था। जिस समय छापेखाने का आविष्कार नहीं हुआ था और दस्तावेज़ों की अनेक प्रतियां बनाना आसान नहीं था उस समय महत्वपूर्ण बातों को याद रख लेने का यह सर्वोत्तम साधन था। यही कारण है कि उस समय साहित्य के साथ साथ राजनीति, विज्ञान और आयुर्वेद को भी पद्य (कविता) में ही लिखा गया। भारत की प्राचीनतम कविताएं संस्कृत भाषा में ऋग्वेद में हैं जिनमें प्रकृति की प्रशस्ति में लिखे गए छंदों का सुंदर संकलन हैं। जीवन के अनेक अन्य विषयों को भी इन कविताओं में स्थान मिला है।




#Article 39: ऑस्ट्रेलिया (5534 words)


ऑस्ट्रेलिया (), सरकारी तौर पर ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रमंडल दक्षिणी गोलार्द्ध के महाद्वीप के अर्न्तगत एक देश है जो दुनिया का सबसे छोटा महाद्वीप भी है और दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप भी, जिसमे तस्मानिया और कई अन्य द्वीप हिंद और प्रशांत महासागर में है। ऑस्ट्रेलिया एकमात्र ऐसी जगह है जिसे एक ही साथ महाद्वीप, एक राष्ट्र और एक द्वीप माना जाता है। पड़ोसी देश उत्तर में इंडोनेशिया, पूर्वी तिमोर और पापुआ न्यू गिनी, उत्तर पूर्व में सोलोमन द्वीप, वानुअतु और न्यू कैलेडोनिया और दक्षिणपूर्व में न्यूजीलैंड है।

प्रौद्योगिक रूप से उन्नत और औद्योगिक ऑस्ट्रेलिया एक समृद्ध बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है और इसका कई राष्ट्रों की तुलना में इन क्षत्रों में प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा है जैसे स्वास्थ्य, आयु संभाव्यता, जीवन-स्तर, मानव विकास, जन शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और मूलभूत अधिकारों की रक्षा और राजनैतिक अधिकार. ऑस्ट्रेलियाई शहरों को जीवन कुशलता, सांस्कृतिक प्रस्तावों और जीवन-स्तर के क्षेत्र में दुनिया में उच्च स्थान दिया जाता है। यह कई संगठनों जैसे संयुक्त राष्ट्र, जी-20मुख्य अर्थव्यवस्थाएँ, राष्ट्र मंडल देशों, ANZUS, OECD और विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य |

ऑस्ट्रेलिया नाम लैटिन के एक शब्द ऑस्ट्रेलिज़ से लिया गया है जिसका अर्थ दक्षिणी होता है। रोमन समय की एक पौराणिक कथा अननोन लैंड ऑफ़ द साउथ(Terra australis incognita) और मध्यकालीन भूगोल में भी इसका जिक्र था पर यह महाद्वीप के किसी दस्तावेजी जानकारी पर आधारित नहीं था। 1521 में प्रशांत महासागर में जहाज चलाने वाले पहले यूरोपियनों में से एक स्पनिअर्ड्स थे। अंग्रेजी में ऑस्ट्रेलिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1625 में, मास्टर हक्लुय्त द्वारा लिखित, हक्लुयतूस पोस्थुमस ' में सामुएल पुर्चास द्वारा प्रकाशित किताब ए नोट ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया डेल एस्पिरितु सैनटो में हुआ। 
डच विशेषण रूप ऑस्ट्रैलिस्चे का प्रयोग बताविया में डच ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियो द्वारा 1638 में दक्षिण में नए भू-भाग खोज लेने के सन्दर्भ में किया गया था।ऑस्ट्रेलिया शब्द का प्रयोग 1693 में 'जक्क़ुएस सडयूर' उप नाम से गाब्रिएल दे फोइग्न्य द्वारा 1676 में फ्रेंच में लिखित उपन्यास (Les Aventures de Jacques Sadeur dans la Découverte et le Voyage de la Terre Australe) के अनुवाद में हुआ था। उसके बाद एलेकजेंडर डेलरिम्पल ने 'समुद्र यात्रा का ऐतिहासिक संचयन'और 'दक्षिणी प्रशांत महासागर में खोज (1771)'में समूचे दक्षिण प्रशांत महासागर क्षेत्र के सन्दर्भ में किया था। 1793 में, जॉर्ज शॉ और सर जेम्स स्मिथ ने जूलोजी (जीव-विज्ञान) और बोटनी ऑफ़ न्यू हॉलैंड (न्यू हॉलैंड का वनस्पति विज्ञान) किताब प्रकाशित की, जिसमे उन्होंने लिखा था एक विशाल द्वीप या आंशिक रूप से ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप, ऑस्ट्रैलेसिया या न्यू-हॉलैंड. साथ ही 1799 में जेम्स विल्सन के चार्ट में भी यह दिखाई पड़ा.

ऑस्ट्रेलिया नाम मैथ्यू फ्लिनडेर्स द्वारा मशहूर हुआ, जिन्होंने 1804 के करीब इसे औपचारिक तौर पर अपनाने के लिए दबाव डाला। जब वह अपनी पाण्डुलिपि और चार्ट अपनी किताब 1814 ए वोयज टू टेरा ऑस्ट्रैलिस (A Voyage to Terra Australis) के लिए तैयार कर रहे थे तब वे अपने सहयोगी सर जोसफ बैंक्स द्वारा टेर्रा ऑस्ट्रैलिस शब्द का प्रयोग करने के लिए प्रेरित किये गए क्योंकि ये जनता के लिए सबसे परिचित शब्द था। फ्लिनडेर्स ने भी ऐसा ही किया पर एक टिप्पणी के साथ: क्या मैं अपने आप को मौलिक शब्द से किसी नवरचना को अनुमति दूँ, यह होगा इसे ऑस्ट्रेलिया में बदलना, जो कानों को सुनने में ज्यादा अच्छा लगे और पृथ्वी के दूसरे महान भू-भागो का सम्मिलन हो, उस व्याखान में यही एक मात्र संयोग ऑस्ट्रेलिया शब्द का था लेकिन परिशिष्ट III,रॉबर्ट ब्राउन के सामान्य टिप्पणी, भौगोलिक और व्यवस्थित, टेर्रा ऑस्ट्रैलिस का वनस्पति विज्ञान में ब्राउन ने विशेषण रूप आस्ट्रेलियन ' का लगातार प्रयोग किया है, यह उस रूप का पहला जाना हुआ प्रयोग था। लोकप्रिय धारणा के बावजूद किताब नाम धारण करने में सहायक नहीं बनी, यह नाम अगले दस वर्षो में धीरे-धीरे सामने आया।

लचलान मक्कुँरी 'न्यू-साउथ वेल्स के एक गवर्नर', अनंतर अपने इंग्लैंड के प्रेषणों में इस शब्द का प्रयोग करते थे और 12 दिसम्बर 1817 को इसे औपचारिक रूप से नगरीय कार्यालयों में प्रयोग के लिए स्वीकार्य बनाने की संस्तुति की।  1824 में, नौ सेना विभाग सहमत हुआ की अब यह महाद्वीप सरकारी तौर पर ऑस्ट्रेलिया नाम से जाना जाना चाहिए।

ऑस्ट्रेलियाई अंग्रेजी में ऑस्ट्रेलिया शब्द का उच्चारण होता है. 20-वीं सदी के शुरुआती समय में कई बार इस देश को स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय रूप में ओज (Oz) नाम से उल्लेखित किया गया, ऑस्सी (Aussie) (कभी-कभी ओजी (Ozzie) लिखी जाती है जो उच्चारण को अच्छी तरह पेश करता है) सामान्य बोल-चाल की भाषा में यह एक विशेषण है और संज्ञा रूप में यह शब्द ऑस्ट्रेलियाइयो का उल्लेख करती हैं।

{मुख्य ऑस्ट्रेलिया का इतिहास}

ऑस्ट्रेलिया के मानव निवास-स्थान की शुरुवात आज से 42000 और 48000 वर्षो पहले की अनुमानित की गयी है। ये पहले ऑस्ट्रेलियाई आज के आधुनिक स्वदेशी ऑस्ट्रैलियाईयो के पूर्वज रहे होंगे, वे भू-सेतु के रास्ते आये होंगे और छोटी समुद्री यात्रा वहां से कियें होंगे जो आज दक्षिणी-पूर्वी एशिया है। इनमें से अधिकांश लोग शिकारी-संग्राहक और साथ में मिश्रित मौखिक संस्कृति और ड्रीमटाइम में विश्वास और भूमि की इज्ज़त करने पर आधारित आध्यात्मिक गुण वाले थे। द टोर्रेस जलसंयोगी द्वीपवासी एथ्निकल्लीमेलानेसियन, वास्तविक में शिकारी और बागवानी करने वाले थे। उनकी सांस्कृतिक परंपरा हमेशा से महाद्वीप के आदि निवासियों से अलग रही है।

ऑस्ट्रेलियन महाद्वीप का पहला अभिलिखित यूरोपियन अवलोकन डच नाविक विलियम जनस्जून द्वारा किया गया, उन्होंने 1606 में केप यार्क पेनिन्सुला का अवलोकन किया था। 17वी सदी के दौरान डच ने सम्पूर्ण पश्चिमी और उत्तरी तटरेखा को अभिलिखित किया जिसे उन्होंने न्यू-हॉलैंड कहा, लेकिन उन्होंने इसके अवस्थापन की कोई कोशिश नहीं की। 1770 में, जेम्स कुक ने जहाज़ लेकर पूरा भ्रमण किया और ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट का मानचित्र खींचा, जिसे उन्होंने नाम दिया न्यू-साउथ वेल्स और ग्रेट ब्रिटेन के लिए दावा किया।

कूक की खोजों ने नए दंड सम्बन्धी नगर की स्थापना का रास्ता तैयार किया। 26 जनवरी 1788 को कैप्टेन आर्थर फिलिप द्वारा, न्यू साउथ वेल्स का शीर्ष ब्रिटिश नगर पोर्ट जैक्सन में अवस्थापन शुरू किया गया। यह दिन आगे चल कर ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय दिवस, 'ऑस्ट्रेलिया दिवस' बना। 
वेन डीमेंस लैंड जिसे अब तस्मानिया नाम से जाना जाता है, की स्थापना 1803 में की गयी और 1825 में यह एक अलग नगर हो गया। ग्रेटब्रिटेन ने 1829 में औपचारिक रूप से ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी हिस्से पर अपना दावा किया। न्यू साउथ वेल्स के हिस्से से पृथक करके अलग नगरो का निर्माण किया गया, 1836 में दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया, 1851 में विक्टोरिया और 1859 में क्वींसलैंड.उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्र की स्थापना 1911 में हुई थी जब इसे दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया से अलग किया गया। दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया की स्थापना एक स्वतंत्र प्रदेश के रूप में की गयी, क्योकि यह कभी भी दंड संबंधी नगर नहीं रहा। विक्टोरिया और पश्चमी ऑस्ट्रेलिया की स्थापना भी स्वतंत्र रूप में की गई परन्तु बाद में ले गए दोषी कारागारवासियों को इसने स्वीकार कर लिया।दोषी कैदियों को न्यू साउथ वेल्स ले जाना नगरवासियों द्वारा चलाये गए एक अभियान के बाद 1848 में बंद कर दिया गया।

आदिकालीन इतिहास के ऐसे भाषांतरण पर कुछ रूढ़ीवादी विवरणकारो द्वारा विवाद किया गया, जैसे भूतपूर्व प्रधानमंत्री हॉवर्ड, जैसे की राजनैतिक या वैचारिक कारणों के लिए अत्युक्ति या कल्पित हुई है। इतिहासकार किथ विंडशटल तर्क देते है कि आदिवासी लोगो के आचरण का प्रबल ऐतिहासिक भाषांतरण श्वेतो के सीमा अवस्थापन में ऑस्ट्रेलिया की कल्पना हुई। वह दावा करते हैं कि यह कार्य राजनैतिक रूप प्रेरित विद्वानों की एक पीढ़ी के कार्यों का नतीज़ा था। उन्होंने आरोप लगाये हैं कि यह कार्य कमज़ोर ऐतिहासिक पद्धति अपनाकर तथ्यों के अभाव में कहानियां गढ़कर, आकृतियां बनाकर, तथ्यों को छुपाकर गलत सन्दर्भ स्रोतों के जरिये किया गया है, जिससे पाठक ठगे गये हैं।

इस वाद-विवाद को ऑस्ट्रेलिया के अन्दर इतिहास युद्धों के रूप में जाना जाता है।1967 के रिफ़रेंडम का पालन करते हुए संघीय सरकार ने नीतियों को कार्यान्वित करने के लिए शक्ति प्राप्त किया और आदिवासियों के लिए कानून बनाया। पारंपरिक भू-स्वामित्व--देशी शीर्षक 1992 तक मानी नहीं गयी, जबतक उच्च न्यायालयने यूरोपियन अधिग्रहण के समय क्वींसलैंड के विरुद्ध मेबो के मामले में ऑस्ट्रेलिया के मत को टेर्रा न्युलिय्स (अक्षरश स्वामित्त्व मुक्त भूमिप्रभावता खाली जमीनया भूमि) कह कर उलट न दिया। 

ब्रिटेन के 1931 के वेस्टमिन्स्टर की प्रतिमा ने ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के बीच औपचारिक रूप से अधिकांशत संवैधानिक कड़ियों को ख़त्म कर दिया, ऑस्ट्रेलिया ने इसे 1942 में स्वीकार किया, लेकिन इसे द्वितीय विश्व युद्घ के शुरूआती समय का कर दिया ताकि ऑस्ट्रेलियाई संसद द्वारा युद्घ के दौरान पारित इसकी कानूनी वैधता की पुष्टि हो जाए.ब्रिटेन के 1942 में एशिया में हार के सदमें और जापानी आक्रमणकारियों की धमकी ने ऑस्ट्रेलिया को संयुक्त राज्य का एक सहयोगी और अपना रक्षक बना दिया। ANZUS संधि के तहत,1951 से, ऑस्ट्रेलिया अमेरिका का एक औपचारिक सैन्य सहयोगी है। द्वितीय विश्व युद्घ के बाद,1970 के दशक और ऑस्ट्रेलिया की श्वेत नीति के अंत से, ऑस्ट्रेलिया ने यूरोप सेअप्रवास को बढ़ावा दिया, एशिया और दुसरे जगहों से भी अप्रवास को बढ़ावा दिया गया। परिणामस्वरूप, ऑस्ट्रेलिया की जनसांख्यिकी, संस्कृति और स्वयं की छवि रूपांतरित हो गयी। ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के बीच अंतिम संवैधानिक संधि को 1986 ऑस्ट्रेलिया कानून के पारित होने के बाद अलग कर दिया गया और ऑस्ट्रेलिया राज्य-सरकार में ब्रिटिश भूमिका और UK गुप्त परिषद् को हुए न्यायिक निवेदन को ख़त्म कर दिया गया।1999 के जनमत संग्रह पर,54% ऑस्ट्रेलियाई मतदाताओं ने गणतंत्र बनने और राष्ट्रपति को सांसदों के दो तिहाई मतों से नियुक्त करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। विटलम सरकार के चनाव के बाद 1972 में, दुसरे प्रशांतीय किनारों के राष्ट्रों तक सम्बन्ध विस्तार पर ध्यान केन्द्रित किया गया, जबकि ऑस्ट्रेलिया के पारंपरिक सहयोगी और व्यापारिक सहयोगियो के साथ संबंधो को मजबूत रखने का प्रयास भी जारी रहा।

ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रमंडल संघीय शक्ति विभाजन पर आधारित, एक संवैधानिक प्रजातंत्र है। सरकार के संसदीय व्यवस्था के साथ सरकार का जो रूप उपयोग होता है वह ऑस्ट्रेलिया का संवैधानिक राजतंत्र है।क्वीन एलिजाबेथ II ऑस्ट्रेलिया की महारानी है, उनकी भूमिका दुसरे राष्ट्रीय मंडल राज्यों के अधीश्वरो के पदो से अलग है। संघ के स्तर पर गवर्नर-जेनरल के रूप में प्रतिनिधित्व करती है और राज्य स्तर पर गवर्नर के रूप में.जो कुछ भी हो संविधान गवर्नर-जनरल को विस्तृत प्रबंधकारिणी अधिकार देती है, ये सब सामान्यत: प्रधानमंत्री के परामर्श पर ही प्रयोग होते है। प्रधानमंत्री के आदेश के बाहर जो आरक्षित आधिकार गवर्नर-जनरल को प्राप्त है उसका सबसे उल्लेखनीय प्रयोग 1975 के संवैधानिक संकट के समय विटलम सरकार की बर्खास्तगी था।

सरकार की तीन शाखाएँ हैं:

राष्ट्रमंडल के दो सदनों के संसद में महारानी, 76 सभासदों की मंत्री सभा (ऊपरी सदन) और 150 सदस्यों की एक प्रतिनिधि सभा (निचली सदन) निहित होते है। निचली सदन के सदस्य एकल सदस्य मतदाता क्षेत्र से चुने जाते है; जिसे सामान्य तौर पर निर्वाचन क्षेत्रों या सीटों के रूप में जाना जाता है, जिसे जनसंख्या के आधार पर राज्यों को बांटा गया है, साथ में हर मूल राज्य के लिए कम से कम पांच सीटें सुनिश्चित है। मंत्री सभा में, हर राज्य बारह सभासदो द्वारा प्रतिनिधित्व किये गए है और हर प्रदेश (ऑस्ट्रेलिया प्रमुख प्रदेश और उत्तरी प्रदेश) दो के द्वारा b.दोनों सदनों के लिए चुनाव हर तीन साल में होते है, साथ-साथ सांसदों का कार्यकाल अतिव्यापी छ: वर्षो का होता है, जबकि हर चुनाव में आधे सभासदों का चुनाव होता है जब तक कि यह चक्र दोगुनी विलयन द्वारा बाधित न हो। जो पार्टी संसद में बहुमत में होती है सरकार गठन करती है और उसके नेता प्रधानमंत्री बनते है।

संघीय तौर पर और राज्य में दो मुख्य राजनैतिक दल है जो सरकार गठन करती है, वे है: ऑस्ट्रेलियन लेबर पार्टी और गठबंधन जो औपचारिकत: दो दलों का संगठन होता है: द लिबरल पार्टी और उसके छोटे सहयोगी दल, राष्ट्रीय पार्टी.स्वतंत्र सदस्य और कई छोटी पार्टिया- जिसमे ग्रीन्स और ऑस्ट्रेलियन डेमोक्रेट्स शामिल है-इन्होने ऑस्ट्रेलियाई संसद, अधिकांश: ऊपरी सदन में अपना प्रतिनिधित्व प्राप्त कर लिया है।नवम्बर 2007 चुनाव में लेबर पार्टी प्रधान मंत्री के तौर पर केविन रुड के साथ सत्ता में आई.हर ऑस्ट्रेलियाई संसद (संघीय, राज्य और प्रदेशीय) में उस समय 2008 सितम्बर तक एक लेबर पार्टी की सरकार होती थी जबतक पश्चमी ऑस्ट्रेलिया के नेशनल पार्टी के साथ गठ्संघन करके लेबर पार्टी ने एक अल्पसंख्यक सरकार की स्थापना न कर ली। 2004 के चुनाव में, पिछली जॉन हावर्ड की नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने मंत्रीसभा की सत्ता जीती- ऐसा पिछले बीस वर्षो में पहली बार हुआ कि किसी पार्टी (या गठबंधन) ने सरकार में रहते हुए ऐसा किया। हर राज्य और प्रदेश और संघीय स्तर पर 18 और उससे ऊपर के उम्र वालो के लिए मतदान अनिवार्य है. दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर हर जगह मतदान के लिए नामांकन करवाना अनिवार्य है।

ऑस्ट्रेलिया के छ: राज्ये और दो मुख्य महाद्वीप प्रदेशे है। साथ ही कुछ छोटे प्रदेशे है जो संघीय सरकार के प्रबंधन के अंतगर्त है।

राज्ये है, न्यू साउथ वेल्स, क्वींसलैंड, दक्षिण ऑस्ट्रेलिया, तस्मानिया, विक्टोरिया और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया.दो मुख्य महाद्वीप प्रदेश है उत्तरी प्रदेश और ऑस्ट्रेलियाई प्रमुख प्रदेश (ACT).अधिकतर मामलों में, दोनों प्रदेशे राज्यों की तरह कार्य करते है, पर राष्ट्रमंडल संसद इनके सांसदों द्वारा पारित किसी भी कानून की अवहेलना या उसे खारिज कर सकती है। विरोधास्वरूप, संघीय कानून सिर्फ कुछ क्षेत्रों में राज्य कानून की अवहेलना कर सकती है जो ऑस्ट्रेलियाई संविधान के धारा 51 में है; राज्य संसद के पास शेष सभी अधिकार कायम रहते है जिसमे अस्पताल, शिक्षा, पुलीस, न्यायालय, सड़क, जन परिवहन और स्थानीय सरकार पर अधिकार शामिल है।

हर राज्य या मुख्य महाद्वीप प्रदेश का अपना कानून या संसद है: उत्तरी प्रदेश, द ACT और क्वींसलैण्ड में एक सभा या एक सदन और बाकी राज्यों में दो सदन या सभा है। राज्य प्रभुता सम्पन्न है, यद्यपि राष्ट्रमंडल के कुछ विषय पर अधिकार संविधान में परिभाषित है।निचले सदन को विधान सभा के नाम से जाना जाता है (दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया और तस्मानिया में संयोजन सभा) और ऊपरी सदन को विधान परिषद नाम से जाना जाता है। हर राज्य में सरकार का मुखिया प्रधानमंत्री (premier) होता है और हर प्रदेश में मुख्य मंत्री.महारानी की कई भूमिका है, प्रत्येक राज्य में गवर्नर द्वारा प्रतिनिधित्व करती है और उत्तरी प्रदेश में प्रबंधक द्वारा और ACT में ऑस्ट्रेलियाई गवर्नर जनरल के रूप में .

संघीय सरकार प्रत्यक्ष रूप से इन प्रदेशों का प्रबंधन करती है:

नोरफोर्क द्वीप भी तकनीकी रूप से बाह्य प्रदेश है, जो कुछ भी हो, नोरफोर्क द्वीप कानून 1979 के तहत यह अपने ही विधान सभा द्वारा स्थानीय तौर पर शासन करती है और इसे अत्यधिक स्वायत्तता दी गयी है।महारानी प्रबंधक द्वारा प्रतिनिधित्व करती है, वर्त्तमान में ओवेन वाल्श.

पिछले कई दशको से ऑस्ट्रेलिया के विदेश संबंध अमेरिका के साथ हुए ANZUS संधि के घनिष्ट सहचर्य के द्वारा चलती है और एशिया, विशेषकर ASEAN और प्रशांतीय द्वीप फोरम के साथ संबंधो को विकसित करने की इच्छा के साथ.अमिती की संधि और दक्षिणी पूर्वी एशिया सहयोग की अपनी अधिमिलन के द्वारा ऑस्ट्रेलिया ने पूर्वी एशिया सम्मेलन में मंचीय आसन सुनिशिचत कर लिया। ऑस्ट्रेलिया राष्ट्रमंडल देशो का एक सदस्य है, जिसमे राष्ट्रमंडल सरकारों के प्रमुखों के बीच की मुलाक़ात आपसी सहयोग के लिए मुख्य मंच प्रदान करती है। ऑस्ट्रेलिया ने तेजी से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार उदारीकरण के उद्देश्य का अनुसरण किया है। यह कैर्न्स समूह और एशिया प्रशांतीय अर्थव्यवस्था सहयोग गठन का कारण बना। ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग और विकास संगठन और विश्व व्यापार संगठन का सदस्य है और इसने कई प्रमुख द्विपक्षिक स्वतंत्र व्यापार अनुबंधों का अनुसरण किया, तत्काल में ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका मुक्त व्यापार अनुबंध और न्यूजीलैंड के साथ बराबर का आर्थिक संबंध.ऑस्ट्रेलिया का जापान के साथ मुक्त व्यापार अनुबंध के लिए वार्ता जारी है, जिसके साथ ऑस्ट्रेलिया का एशिया प्रशांत क्षेत्र में एक विशवासयोग्य साथी के रूप में संबंध है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, मलेशिया और सिंगापूर के साथ पांच शक्तिशाली रक्षा सम्बन्धन व्यवस्था दल है।संयुक्त राष्ट्र के स्थापना का एक सदस्य देश, ऑस्ट्रेलिया अपने मध्य शक्ति सहयोगी कनाडा और नॉर्डिक देशों के साथ बहुपक्षीय संबंधो के लिए प्रबल रूप से प्रतिबद्ध है और एक अंतराष्ट्रीय सहायता कार्यक्रम का निर्वहन करता है जिसके अंतर्गत 60 देश सहायता पाते है। 2005-06 का बजट विकास सहयोग के लिए A$2.5 करोड़ प्रदान करता है; घरेलू विकास दर (GDP) के रूप में यह सहयोग सयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दि विकास लक्ष्य में सिफारिश की गयी राशिः से कम है। ऑस्ट्रेलिया का स्थान 2008 वैश्विक विकास केन्द्र में विकास की प्रतिबद्धता सूचि में साँतवा है।

ऑस्ट्रेलियाई सशस्त्र सेनाएँ -- ऑस्ट्रेलियन सुरक्षा बल (ADF) में शाही ऑस्ट्रेलियन नौसेना (RAN) ऑस्ट्रेलियाई फौज और शाही ऑस्ट्रेलियाई वायु सेना (RAAF) की कुल संख्या 73,000 है (जिसमे 53000 नियमित और 20000 आरक्षित) है। ऑस्ट्रेलिया की सेना दुनिया की 68वी बड़ी सेना है, लेकिन प्रति व्यक्ति आधार पर दुनिया की एक छोटी सेनाहै। ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा बल (ADF) की सभी शाखाएँ संयुक्त राष्ट्र में और क्षेत्रीय शांति के लिए (अभी हाल ही में पूर्वी तिमोर,सोलोमन द्वीप और सूडान में), आपदा सहायता और सैन्य संघर्ष, जिसमे 2003 का इराक़ युद्घ सम्मिलित है, में शामिल है। सरकार किसी भी एक सैन्य बल से सुरक्षा बल के अध्यक्ष को नियुक्त करती है; वर्तामान में सुरक्षा बल के अध्यक्ष वायु सेना अध्यक्ष एंगस हस्टन है। 2006-07 के बजट में रक्षा खर्च $22 करोड़ था, जो वैश्विक सैन्य खर्च का 1% से भी कम है। प्रमुखत:अपने अफगानिस्तान में उपस्थिति के कारण,2008 विश्व शांति सुचनांक, में ऑस्ट्रेलिया को 27वा स्थान दिया गया। जबकि गवर्नर जनरल ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा बल का प्रधान सेनापति होता है, इनका सुरक्षा बल (ADF) को चलाने में कोई सक्रिय योगदान नहीं होता, यह चुनी हुई ऑस्ट्रेलियाई सरकार चलाती है।

ऑस्ट्रेलिया का भूक्षेत्र हिन्द-ऑस्ट्रेलियाई तख़्ते पर है। हिंद और प्रशांत महासागर से घिरा हुआ है, ऑस्ट्रेलिया एशिया से अराफुरा और तिमुर समुद्रों के कारण विभाजित है। ऑस्ट्रेलिया की तट रेखा है (सभी अपतट द्वीपों को छोड़कर) और  के विस्तृत विशेष आर्धिक क्षेत्र पर अधिकार है। इस विशेष आर्थिक क्षेत्र में ऑस्ट्रेलियाई दक्षिण-ध्रुवीय प्रदेश सम्मिलित नहीं है।

विशाल अवरोधक चट्टान, दुनिया का सबसे बड़ा मूंगा- चट्टान, उत्तरी पूर्वी तट से बहुत कम दुरी में स्थित है और  से ज्यादा तक फैला हुआ है।माउंट अगस्टस को दुनिया का सबसे बड़ा पत्थर का खम्भा, माना जाता है, जो पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में स्थित है। पर स्थित ग्रेट डिवाइडिंग रेंज पर माउंट कोसिक्जो ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप का सबसे बड़ा चट्टान है; हलाकि हर्ड द्वीप के सुदूर ऑस्ट्रेलियन प्रदेश का मासन पीक  लम्बा है।

दूर तक का ऑस्ट्रेलिया का बड़ा भाग मरुस्थल है या अर्धशुष्क भूमि है जिसे सामन्यता पिछड़ा क्षेत्र कहा जाता है। ऑस्ट्रेलिया एक समतल महाद्वीप है, जिसकी मिट्टी सबसे पुरानी और कम उर्वरक है और सबसे सूखा आवासीय महाद्वीप है। सिर्फ महाद्वीप के दक्षिणी पूर्वी और दक्षिणी पश्चिमी किनारे की जलवायु समशीतोष्ण है।जनसँख्या का घनत्व 2.8 निवासी प्रति स्क्वायर किलोमीटर है, जो दुनिया के सबसे निचलो में से एक है, हालाँकि जनसँख्या का एक बड़ा भाग दक्षिणी-पूर्वी तट रेख के समशीतोष्ण हिस्से में रहती है। उष्णदेशीय जलवायु के साथ देश के उत्तरी भाग के भू-प्रदेश में वर्षा प्रचुरवन, जंगलीभूमि, घासभूमि, वायुशिफ, दलदल और मरुस्थल सम्मिलित है। महत्वपूर्णता से जलवायु महासागरीय बहावो से प्रभावित होती है, जिसमे भारतीय महासागर द्रिधुव और अल नीनो दक्षिणी दोलन, जो सामयिक सूखे के साथ सहसम्बंधित है और मौसमी उष्णदेशीय निम्न चाप व्यवस्था जो उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में चक्रवात का निर्माण करती है।

हालांकि अधिकांशत: ऑस्ट्रेलिया अर्दशुष्क या मरुस्थल है, इसमें अलपाइन झाडियों से लेकर उष्णदेशीय वर्षाप्रचुरवन के विमित्र आवासीय क्षेणी है और इसे बहुविधिता वाला देश माना गया है। महाद्वीप के इतने पुराने होने के कारण, इसके अत्यधिक अस्थिर मौसम नमूने और इसका लंबी अवधि का भोगोलिक विलगन, ऑस्ट्रेलिया का अधिकांश बायोटा अनूठा और भिन्न-भिन्न प्रकार का है। लगभग 85% फूल-पौधे, 84% स्तनपायी, 45% से ज्यादा चिड़ियाँ और 89% जलचर, समशीतोष्ण क्षेत्र की मछलियाँ स्थानिक है। 755 जातियों के साथ, ऑस्ट्रेलिया में किसी भी देश से ज्यादा सर्पणशील जंतु है। इस क्षेत्र के अर्न्तगत ऑस्ट्रेलिया के कई इकोरीजन और जातियाँ मनुष्य के क्रियाकलापों और नई किस्म के पौधों और जानवरों के कारण खतरे में है। संघीय वातावरण सुरक्षा और जैव विविधता संरक्षण कानून 1999 खतरे में पड़े प्रजातियों के संरक्षण का एक कानूनी ढाँचा है। अनूठे परितंत्र की सुरक्षा और उसे बचाने के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना के अंतगर्त विमित्र सुरक्षा क्षेत्र बनाए गए है; 64 आर्द्रतायुक्त भूमि को रामसर समझौता के अंतगर्त पंजीकृत किया गया है और 16 विश्व मीरास स्थल निर्मित किये गए है। ऑस्ट्रेलिया को 2005 के विश्व पर्यावरण निरंतरता सूचनांक में 13वां स्थान दिया गया।ऑस्ट्रेलियाई जंगलों में बहुधा विभिन्न किस्म के नीलगिरी के वृक्ष है और ज्यादातर उच्च वर्षा दर वाले क्षेत्रों में स्थित है।

अधिकतर ऑस्ट्रेलियाई काष्ठीय पौधों की जातियाँ सदाबहार है और कई आग और सुखा के अनुकूल है, जिसमे नीलगिरी और बबूल शामिल है। ऑस्ट्रेलिया के पास स्थानिक फली जाति के विशाल प्रकार है जो रिजोबिया बैक्टेरिया और माइक्रोजिल फंगी के साथ सहजीविता के कारण कम-पोषण वाले मिट्टियों में पनपते है। बहुप्रचलित ऑस्ट्रेलियाई जानवरों मेंमनोट्रिम्स(प्लेटिपस और इकिडना); मार्सुपिय्ल्स के परिचारक, जिसमे कंगारू, द कोअला और वोमब्रेट; नाम्किनिजल और साफ़ जल मगरमच्छ और चिडियाँ जैसे एमु और कोकबुराहै। ऑस्ट्रेलिया विश्व के कुछ विषैले साँपो का घर है।डिंगो(ऑस्ट्रेलियाई कुत्ता) को ऑस्ट्रोनेसियन लोगो द्वारा लाया गया था जो 3000 BCE के करीब स्वदेशी ऑस्ट्रेलियाईयो के साथ व्यापार करते थे, पहले मानव अवस्थापन के साथ कई पौधे और जानवरों की जांतिया जल्द ही गायब हो गई, जिसमे ऑस्ट्रेलियाई मेगाफौना; अन्य जो युरोपियन अवस्थान के बाद गायब हुए उसमे थाईलेसीनहै।

हाल के वर्षो में जलवायु परिवर्तन ऑस्ट्रेलिया का बड़ा चिंता का विषय बन गया है, साथ में कई ऑस्ट्रेलियाइयो का मानना है कि पर्यावरण की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मामला है देश अभी जिसका सामना कर रहा है। पहले रुड मंत्रालय ने उत्सर्ग घटाने के लिए कर क्रियाकलाप प्रारंभ किए, रुड का पहला कार्यालयीन कानून, कार्यालय के पहले दिन,क्योटो प्रोटोकोलके दृढीकरण के कारक पर हस्ताक्षर करना। तथापि ऑस्ट्रेलिया का प्रति व्यक्ति कार्बन डाइऑक्साइड निकासी दुनिया में उच्च में है, कुछ दुसरे औद्दयोगिक देश जैसे अमेरिका, कनाडा और नार्वे से कम है। पिछले सदी के अनंतर ऑस्ट्रेलिया में वर्षा में थोडी बढोत्तरी हुई है, देशभर में और राष्ट्र के दोनों चतुर्थ भाग में.चिरकालिक कमी जो शहरी आबादी में बढोत्तरी और स्थानीय सूखे के कारण हो रही है उसके कारण जलवायु के इस लाभदायक परिवर्तन के बावजूद, ऑस्ट्रेलिया के कई शहरों और क्षेत्रों में जल सीमा लागू है।

ऑस्ट्रेलियाई डॉलर ऑस्ट्रेलियाइ राष्ट्रमंडल की मुद्रा है, जिसमे क्रिशमस द्वीप, कोकोस (किलिंग) द्वीप और नोरफोक द्वीप और साथ ही साथ किरीबती के प्रशांतीय द्वीप राज्य, नौरु और तुवालु शामिल है।ऑस्ट्रेलियन प्रतिभूति एक्सचेंज और सिडनी फ्यूचर्स एक्सचेंज ऑस्ट्रेलिया के बड़े शेयर बाज़ार है।

आर्थिक स्वतंत्रता के सुचनांक के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया एक निर्वाध पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है।ऑस्ट्रेलिया का प्रति व्यक्ति (GDP) ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस से क्रय शक्ति समानता मामले में थोड़ा ऊँचा है। देश को 2007 के संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सुचनांक में तीसरा,2008 के लेगाटम में समृद्धि सुचनांक में पहला और द इकोनोमिस्ट वर्ल्डवाइड 2005 के जीवन स्तर सुचनांक में छठा स्थान दिया गया। ऑस्ट्रेलिया के सभी बड़े शहरों ने जीवन कुशलता के तुलनात्मक सर्वे में अच्छा प्रदर्शन किया; मेलबर्न को 2008 दुनिया के सबसे अच्छे आवासीय शहर में दूसरा स्थान, इस सूची में इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर को चौथा, एडिलेड को 7वाँ और सिडनी को 9वाँ स्थान मिला.   सदी के शुरुआत में वस्तुओं के दाम बढ़ते समय, वस्तुओ के निर्माण की जगह उसके निर्यात पर ज्यादा ध्यान देना ऑस्ट्रेलिया के व्यापार में बढोतरी का आधार बना।   ऑस्ट्रेलिया का भुगतान संतुलित है जो GDP के 7% से ज्यादा नकारात्मक है और 50 वर्षो से भी ज्यादा के एकसमान बड़े चालू खाता घाटा है।   ऑस्ट्रेलिया 15 वर्षो से 3.6% की औसत दर से विकसित हुआ है, जिसमे कि एक अवधि तक OECD का वार्षिक औसत 2.5% था।  IMF के अनुसार,17 वर्षो विकास के बाद ऑस्ट्रेलियाई अर्थव्यवस्था 2009 में मंदी की मार खा सकता है।  
 

अनुमानित 21.8 मिलियन (दस लाख) में अधिकतर ऑस्ट्रेलियाइ उपनिवेश काल के स्थापितो के वंशज है और यूरोप के उत्तर-संघीय अप्रवासी है और करीब जनसँख्या का 90% यूरोपीय वंशज के है। पीढ़ियों से, उपनिवेशकालीन स्थापितों और उत्तर संघीय अप्रवासियों का विशाल जनसंख्या ब्रिटिश आइस्ल्स से केवल यहाँ आई और ऑस्ट्रेलियाई लोग अभी भी मुख्यतः ब्रिटिश या आयरिश एथिनिक उत्पति के है। 2006 में ऑस्ट्रेलियाई गणना सबसे ज्यादा जिसमे ऑस्ट्रेलियाई वंशज (37.13%), फिर अंग्रेज(31.65%), आयरिश(9.08%), स्कॉटिश(7.56%), इटालियन(4.29%), जर्मन (4.09 %), चाइनीज(3.37%) और ग्रीक (1.84%) आते हैं।

ऑस्ट्रेलिया की आबादी पहले विश्व युद्घ से चार गुणा बढ़ गयी है,
और महत्वाकांक्षी आप्रवासी कार्यक्रम के कारण भी बढ़ी.दूसरे विश्व युद्ध से 2000 तक, कुल जनसंख्या का करीब 5.9 मिलियन देश में नए अप्रवासी के तौर पर बसे, इसका मतलब हुआ की हर सात में से दो ऑस्ट्रेलियाई समुद्र पार पैदा हुआ। अधिकतर अप्रवासी कुशल है, लेकिन अप्रवासी कोटा में परिवार के सदस्यों और रिफ्यूजी के लिए विभाग शामिल है। 2001 में 23.1% ऑस्ट्रेलियाइयो का पाँच बड़ा समूह समुद्र पार ब्रिटेन, न्यूजीलैण्ड, इटली, वियतनाम और चीन में पैदा हुआ था।  1973 में ऑस्ट्रेलियाई श्वेत नीति के अंत के साथ, बहुसंस्कृतिवाद की नीति के आधार पर जाति सौहार्द को प्रोत्साहन और बढ़ावा देने के लिए कई सरकारी पहलों को स्थापित किया गया।

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स्वदेशी जनसंख्या-महाद्वीपीय आदिवासी और तोर्स स्ट्रेट द्वीपवासियों-की संख्या 2001 में 410,003(कुल जनसंख्या का 2.2%) गणना की गयी थी;जिसमे 1976 की गणना से अभूतपूर्व बढोत्तरी हुई; जिसमें सर्वदेशी जनसंख्या 115,953 गिनी गयी। बड़ी संख्या में स्वदेशी जनसंख्या की गणना नहीं हो सकी क्योंकि उनकी स्वदेशी स्थिति फार्म में दाखिल नहीं हुई थी, कारणों के समन्वय के बाद,ABS ने 2001 का सही आँकडा लगभग 460,140 (कुल जनसंख्या का 2.4%) अनुमानित किया। स्वदेशी ऑस्ट्रेलियाईकारावास और बेरोजगारी, शिक्षा का निचा स्तर और जीवन काल पुरुषों और महिलाओं का जो 11-17 वर्ष विदेशियों से कम है, से प्रभावित है। कुछ सुदूर स्वदेशी वर्ग को विफल राज्य जैसी अवस्था से परिभाषित किया गया है। (तीसरा अंतिम अनुच्छेद).

विकसित देशों में जो एक बात समान है, ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या बूढी जनसंख्या की ओर बढ़ रही है जिससे सेवानिवृत्ति और सेवा करने वालों की कम उम्र वाले ज्यादा है। 2004 में, सामान्य जनसंख्या की औसत उम्र 38.8 वर्ष थी। एक बड़ी संख्या में ऑस्ट्रेलियाई (2002-03 की अवधि में 759,849) अपने देश से बाहर रहे।

राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी है। अपनी खुद की विशेष उच्चारण गुण और शब्द संग्रह (जिसमे कुछ ने अपने लिए अंग्रेजी की राह खोज ली) के साथ ऑस्ट्रेलियाई अंग्रेजी भाषा का एक मुख्य प्रकार है, लेकिन अमेरिकन या ब्रिटिश अंग्रेजी से आंतरिक बोली भिन्नता में कम (छोटे क्षेत्रीय उच्चारण और शाब्दिक विविधता को छोड़कर) है। व्याकरण और वर्तनी मुख्यत: ब्रिटिश अंग्रेजी पर आधारित है। 2001 की गणना के अनुसार स्वदेश की करीब 80% जनसंख्या द्वारा सिर्फ अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। दूसरे सामान्य जो भाषा घर में बोली जाती है वह है चीनी (2.1%), इटालियन (1.9%) और ग्रीक (1.4%).पहली और दूसरी पीढ़ी के प्रवासियों का एक उल्लेखनीय अनुपात द्विभाषिक है। ऐसा माना जाता है कि पहले यूरोपियन सम्पर्क के समय,ऑस्ट्रेलियाई प्राचीन भाषाएं 200 से 300 के बीच थी। इनमे से सिर्फ 70 के करीब ही बच पाए और उनमें से 20 अब खतरे में है। एक स्वदेशी भाषा 50,000(0.25%) लोगों की मुख्य भाषा अभी भी बनी हुई है। ऑस्ट्रेलिया के पास एक चिन्ह भाषा है जिसे असलन के नाम से जाना जाता है, जो करीब 6500 बहरे लोगों की मुख्य भाषा है।

ऑस्ट्रेलिया का कोई राष्ट्रीय धर्म नहीं है। 2006 की गणना में, 64% ऑस्ट्रेलियाई को किसी भी मनुष्य जाति के ईसाई के रूप में सूचीबद्ध किया गया था, जिसमे 26% रोमन कैथोलिक और 19% एंगलिकेन के रूप में थे।धर्म रहित(जिससे मानवतावाद, अनीश्वरवाद, अज्ञेयवाद और बुद्धिवाद) कुल मिलाकर 19% और जो तेजी से बढ़ता हुआ समूह है (2006 और 2001 के गणना में हुए विभिन्नता के सन्दर्भ में; और 12% जवाब नहीं दिए और न ही अनुवाद पर कोई अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त किए).ऑस्ट्रेलिया में दूसरा बड़ा धर्म बौद्ध, उसके बाद हिन्दू और इस्लाम धर्म है। कुल मिलाकर 6% से कम ऑस्ट्रेलियाई इसाई धर्म के अलावा के पाए गए है।
 सर्वेक्षणो से पता चला है कि विकसित देशों में ऑस्ट्रेलिया कम धार्मिक राष्ट्र है, साथ ही ऑस्ट्रेलियाइयों के जीवन के धर्म की कोई महत्वपूर्ण भूमिका के रूप में व्याख्या नहीं की गयी है। जैसा कि विभिन्न पश्चिमी देशों में हैं, यहाँ चर्चो में अराधना करने वाले सक्रिय भागीदार कम है और कम हो रही है, चर्च के कायों में, 2004 के गणना के अनुसार, उपस्थित जनसंख्या का करीब 7.5% यानि 1.5 मिलियन है।

पूरे ऑस्ट्रेलिया में स्कूल उपस्थिति अनिवार्य है। अधिकांश ऑस्ट्रेलिया राज्य में 5-6 वर्ष के बच्चे 11 वर्ष की अनिवार्य सिक्षा प्राप्त करते है; उसके बाद दो वर्ष और बढ़ सकते है (11 और 12 वर्ष), इसका साक्षरता दर में सहयोग करीब 99% माना गया है।अन्तराष्ट्रीय विद्यार्थी मुल्यांकन कार्यक्रम, आर्थिक सह भागिता और विकास संगठन (OECD) के सहयोग द्वारा, ऑस्ट्रलियाई शिक्षा को विश्व में आँठवा स्थान दिया गया है, जो विशेषतापूर्वक 30 देशों OECD के औसत स्थान से ज्यादा है। सरकारी अनुदान से ऑस्ट्रेलिया के 38 विश्वविद्यालयों को समर्थन दी जाती है और जबकि कई नीजि विश्वविद्यालय भी बनाए गए है, जिसमे से अधिकांश को सरकारी निधियन मिला। व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए एक राज्य आधारित व्यवस्था है, जो महाविद्यालयों से ज्यादा है जिसे टेफ संस्थान के नाम से जाना जाता है और कई उद्योग नए उद्यमियो के लिए प्रशिक्षण का प्रबंध करते है। लगभग 58% 25 से 64 वर्ष के ऑस्ट्रेलियाइयो के पास व्यावसायिक या तृतीय श्रेणी की पात्रता है, और OECD देशों में 49% के स्नातक दर के साथ इसका स्थान सबसे ऊपर है। तृतीय श्रेणी से शिक्षा लेने वाले स्थानीय और अंतराष्ट्रीय विद्यार्थियों का अनुपात OECD के देशों में सबसे ज्यादा ऑस्ट्रेलिया का है।

ऑस्ट्रेलियाई दृश्यकला की शुरुआत अपने स्वदेशी लोगो के गुफाओं और वृक्षों की चित्रकलाओं से मानी गयी है। स्वदेशी ऑस्ट्रेलियाइयो की परंपरा मौखिक रूप से ज्यादा प्रसारित हुई और ड्रीमटाइम की कहानियों को कहने और समारोहों से जुडी हैं। ऑस्ट्रेलियाई प्राचीन संगीत, नृत्य और कला से प्रभावित हुई। यूरोपियन अवस्थापन के समय से, ऑस्ट्रेलियाई कला का विषय ऑस्ट्रेलियाई भूमि प्रदेश का चित्र, जो उदाहरणस्वरूप अल्बर्ट नमत्जीरा, अर्थर स्ट्रीटन और दुसरे हेडिलबर्ग स्कूल और अर्थर बोय्ड साथ जुड़े की कार्यो में देखा जाता है। इस समय जो ऑस्ट्रेलियाई कलाकार आधुनिक अमेरिका और यूरोपियन कलाओं के साथ जुड़े़ हैं उसमें क्यूबिस्ट ग्रेस क्रोवली, सुर्रेलिस्ट जेम्स ग्लीसन, अमूर्त व्यंजक ब्रेट विटले और पॉप कलाकार मार्टिन शार्प शामिल है।ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय चित्रशाला और विभिन्न दूसरे राज्य चित्रशालाएं ऑस्ट्रेलियाई और विदेशी संकलनों को सम्भाल कर रखे हुए हैं। 20वीं सदी के प्रारम्भ से लेकर अबतक ऑस्ट्रेलियाई आधुनिक कलाकारों के लिए देश के भूमि प्रदेश का चित्र मुख्य प्रेरणास्रोत बनी है; इस बात की स्तुति जीत कलाकारों की चित्रों में होती है, वे है सिडनी नोलन, ग्रेस कोसिंगटन स्मिथ, फ्रेड विलियम्स, सिडनी लॉन्ग और क्लिफ्टन पघ.

ऑस्ट्रेलियाई प्रदर्शन कलाओं की कुछ कंपनियाँ संघीय सरकार की ऑस्ट्रेलिया परिषद से आर्थिक सहायता पाती है। हर राज्य के प्रधान शहर में एक स्वररचना वादक यंत्र है और राष्ट्रीय ओपेरा कंपनी, ओपेरा ऑस्ट्रेलिया, जो गायक जॉन सुथेरलैण्ड के द्वारा निकला। निली मेल्बा उनकी विख्यात पूर्वीधिकारी थी। नाटक और नृत्य ऑस्ट्रेलियाई बैलेट और विमित्र राज्य नृत्य कंपनियों के द्वारा प्रदर्शित की जाती हैं। हर राज्य के पास सार्वजनिक निधि प्राप्त रंगमंच कंपनी हैं।

ऑस्ट्रेलियन सिनेमा उद्योग की शुरुआत ऑस्ट्रेलियाइ बुश रेंजर नेड केली की 70 - मिनट की फिल्म द स्टोरी ऑफ द केली गैंग के प्रदर्शनि के साथ 1906 में शुरू हुई, जिसे दुनिया की पहली लम्बी फिल्म माना जाता है।द न्यू वेव ऑफ ऑस्ट्रेलियन सिनेमा 1970 के दशक में उत्तेजक और सफल फिल्मे लाइ, कुछ देश के आदिवासियों के भुत-काल का वर्णन करती है, जैसे पिकनिक ऐट हैगिंग राक और द लास्ट वेव .बाद के सफल में मैड मैक्स और गालिपोली शामिल है। हाल ही की सफलता में शाइन, रैबिट-प्रूफ फेंस और हैप्पी फीट शामिल है। ऑस्ट्रेलियाइ के विविध भूमि प्रदेश और शहर कई दूसरे फिल्मों के प्राथमिक स्थान रहे है, जैसे- द मैट्रिक्स, पीटर पैन, सुपरमैन रीटर्न्स और फाइंडिंग नेमो के.हाल के अच्छी तरह विख्यात ऑस्ट्रेलियाई अभिनेता में जुडिथ अन्देरसों, एर्रोल फ़्लाइन, निकोले किडमन, हघ जक्क्मन, हेथ लेजर, गेओफ्फ्रे रश, रुस्सेल्ल क्रोवे, टोनी कोलेट्टे, नओमी वॉट्स और सिडनी रंगमंच कंपनी के संयुक्त निर्देशक- केट ब्लैनकेट शामिल है।

ऑस्ट्रेलियाई साहित्य भी भूमि प्रदेश से प्रभावित हुई है, कई लेखको के काम जैसे बंजो पटेरसों, हेनरी लावसन और डोरोथा मैकेलर ऑस्ट्रेलियाई झाड़ों के अनुभव को लिए। ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों का आचरण, जैसा कि शुरूआती साहित्यों में दर्शाया गया है, वह आधुनिक ऑस्ट्रेलियाइयो में मशहूर है। वे मानते है कि यह समतावाद, मेटशीप और एन्टी-ओथोरीटेनिस्म को बढ़ाता है।  1973 में पेट्रिक वाईट को नोबल प्राइज़ से नवाजा गया था, ऐसा करने वाले वे एकमात्र ऑस्ट्रेलियाई थे।कोलीन मैक्कुलोफ़, डेविड विलियम्सन और डेविड मुलोफ़ भी प्रसिद्ध लेखक है।

ऑस्ट्रेलिया के पास दो सार्वजनिक प्रसारणकर्ता (द ऑस्ट्रेलियन ब्रोडकास्टिंग निगम और बहुसांस्कृतिक विशेष प्रसारण सेवा), तीन वाणिज्यिक टेलीविजन नेटवर्क, कई पे-टीवी सेवाएँ और विभिन्न सार्वजनिक, लाभ राहित टेलीविजन और रेडियो केंद्र है। हर प्रमुख शहर में रोजाना के अखबारे और दो राष्ट्रीय दैनिक अखबारे, द ऑस्ट्रेलियन और द ऑस्ट्रेलियन फैनैन्शियल रिव्यू है। 2008 में रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया का मुक्त प्रेस द्वारा दिए गए, 173 देशों को स्थान में 25वां है, न्यूजीलैण्ड के (7वां) और (23वां) के पीछे लेकिन अमेरिका (48वां) से आगे.पायदान में नीचे होने का प्रमुख कारण है ऑस्ट्रेलिया में व्याव्सायिक मीडिया के सिमित विभेद, साथ में, अधिकांश ऑस्ट्रेलियन प्रिंट मीडिया निउज कार्पोरेशन और जॉन फेयरफेक्स होल्डिंग्स के नियंत्रण अधीन है।

ऑस्ट्रेलिया खेल क्रियाकलापों में 15 वर्ष के ऊपर वाले करीब 24% ऑस्ट्रेलियाइ नियमित रूप से भाग लेते है। ऑस्ट्रेलिया के कई मजबूत अंतर्राष्ट्रीय टीमें क्रिकेट, फिल्ड हॉकी, नेट बॉल, रग्बी लीग, रग्बी यूनियन में है और यह साइक्लिंग, रोइंग और तैराकी में अच्छा प्रदर्शन करते है। ऑस्ट्रेलिया में कुछ बड़े सफल खिलाडी है तैराक डाउन फ्रेजर, मर्रे रोस और लेन थोर्प, स्प्रिंटर बेट्टी कथब्र्ट, टेनिस खिलाडी रोड लेवर और मेर्ग्रेट कोर्ट और क्रिकेटर डोनाल्ड ब्रेडमैन.राष्ट्रीय तौर पर दुसरे मशहूर खेल है ऑस्ट्रेलियन टूल्स फूटबाल, घुड़दौड़, सर्फ़िंग, फूटबाल (सोकर) और मोटर दौड़.ऑस्ट्रेलिया ने आधुनिक दौर के सभी समर ओलम्पिक खेलो और सभी राष्ट्रमंडल खेलो में हिस्सा लिया है। ऑस्ट्रेलिया ने 1956 में मेलबर्न समर ओलंपिक और 2000 में सिडनी समर ओलंपिक कि मेंजबानी की और 2000 में मेडल पाने वाले शीर्ष छ: में शामिल रहां. ऑस्ट्रेलिया ने साथ ही 1938, 1962, 1982 और 2006 राष्ट्रमंडल खेलो की भी मेजबानी कर चूका है। दुसरे महत्वपूर्ण श्रंखलाएं जो ऑस्ट्रेलिया में हुई है उनमे ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियन ओपेन टेनिस टूर्नामेंट, अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैचे और फार्मूला वन ऑस्ट्रेलियन ग्रैंड प्रिक्स शामिल है। उच्च स्थान प्राप्त टेलीविजन कार्यक्रम में खेल प्रसारण जैसे समर ओलंपिक गेम्स, स्टेट्स ऑफ आरिजिन और राष्ट्रीय रग्बी लीग और ऑस्ट्रेलियन फूटबाल लीग के भव्य फाइनल शामिल है।




#Article 40: जर्मनी (1615 words)


जर्मनी (जर्मन: Deutschland डॉयच्लान्ट्, अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक लिपि: [ˈdɔɪtʃlant]) यूरोप महाद्वीप में स्थित एक देश है। जर्मनी की उत्तरी सीमा पर उत्तरी समुद्र, डेनमार्क और बाल्टिक समुद्र, पूरब में पोलैंड और चेक गणराज्य, दक्षिण में आस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड और पश्चिम में फ्रांस, लक्सेम्बर्ग, बेल्जियम और नीदरलैंड है।

जर्मनी में कुल सोलह राज्य हैं। इनको ४९३ ज़िलों में बाँटा गया है।

जर्मनी में कई बड़े नगर हैं |

जर्मनी मध्य यूरोप में स्थित है, इसका कुल क्षेत्रफल ३५७,०२१ कि.मी.२ है|

भौगोलिक दृष्टि से जर्मनी के निम्नलिखित विभाग किए गए हैं :
 

इस प्रदेश की अधिकतम चौड़ाई लगभग 150 मील है। हिमयुग का प्रभाव यहाँ के भूपटल पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। जलप्रवाह का विकास अच्छा नहीं है एवं भूमि हिम कटाव के कारण अनुपजाऊ है। इस भाग की मुख्य नदियाँ एल्बे (Elbe) तथा वेजर (Weser) हैं। अनुपजाऊ भागों को पोलैंड के आधार पर उपजाऊ बनाया जा रहा है।

इस प्रदेश के मुख्य नगरों में बर्लिन तथा हैमवर्ग हैं। यहाँ से जर्मनी के प्रत्येक क्षेत्र के लिये आवागमन के साधन सुलभ हैं।

यह संपूर्ण देश का अत्यधिक विकसित प्रदेश है। यहाँ जर्मनी के विशाल उद्योग, खनिज तथा अन्य संबंधित उद्योगों का विकास हुआ है। युद्धों के कारण इस भाग की अत्यधिक क्षति हुई थी। किंतु पुन: उद्योग धंधों का विकास किया गया है। यहाँ कपड़ा, रेशम, लोहा, इस्पात, कांच, बरतन, रसायनक तथा चमड़े के अनेक कारखाने हैं।

प्रमुख नगरों में ड्रेसडेन एल्बे के तट पर स्थित है। लाइपसिग (Leipzig) महत्वपूर्ण आवागमन का केंद्र है, जो उत्तरी एवं मध्य जर्मनी के मुख्य औद्योगिक नगरों को मिलाता है। इस भौगोलिक विभाग के अंतर्गत सैक्सनी एवं वेस्टफेलिया हैं। वेस्टफेलिया क्षेत्र खनिजों के लिये विश्वप्रसिद्ध है। इसी क्षेत्र में रूर (Ruhr) कोयला क्षेत्र स्थित हे, जहाँ प्रति वर्ष लगभग 8,00,00,000 टन कोयले का उत्खनन होता है। इस प्रदेश के मुख्य औद्योगिक नगरों में एसेन (Essen) तथा डार्टमंट है। इन नगरों के क्षेत्र में कच्छा लोहा प्राप्त होता है। युद्ध के पहले लोहे इस्पात का उत्पादन यहाँ ग्रेट ब्रिटेन के उत्पादन से भी अधिक था।

इस भौगोलिक विभाग के अंतर्गत राइन घाटी तथा समीपवर्ती प्रदेश आते हैं। यहाँ राइन नदी गहरी घाटी से होकर प्रवाहित होती है। यह क्षेत्र कृषि तथा आवागमन के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस घाटी से आवागमन के मार्ग दक्षिणी यूरोप के लिये बेसेल से होकर स्विटसरलैंड एवं इटली की ओर जाते हैं तथा पश्चिमी यूरोप के लिये सेवर्न गेट से होकर पेरिस जाते हैं।

राइन घाटी के पूर्व की ओर त्रिकोणात्मक रूप में ब्लैक फारेस्ट का विस्तृत प्रदेश है। इस प्रदेश की ऊँचाई 2,000 से 3,000 फुट तक है। यहाँ के प्रमुख नगरों में न्यूरेनवर्ग एवं स्टटगॉर्ट (Stuttgart) हैं।

इसके अंतर्गत बवेरिया (Bavaria) का भाग आता है। यहाँ की भूमि अनुपजाऊ है। बवेरिया प्रमुख नगर तथा क्षेत्रीय राजधानी है। यह नगर आइज़र नदी के तट पर स्थित है। पर्वतीय भागों का प्रदेश अत्यंत ऊँचा नीचा है। यहाँ ओबरामरगोउ (Oberammergau) प्रसिद्ध दर्शनीय क्षेत्र है।

जर्मनी की जलवायु कई प्रकार की है। उत्तरी जर्मनी मुख्यत: उत्तरी-पश्चिमी यूरोपीय जलवायु प्रदेश के अंतर्गत आता है। मध्य एवं दक्षिणी जर्मनी महाद्वीपी प्रकार की जलवायु के क्षेत्र में सम्मिलित किए जाते हैं।

पूर्वी जर्मनी के निवासी प्राय: समजातीय हैं, यद्यपि स्वैबियनों (Swabians), थुरिंजियनों (Thuringians) सैक्सनियनों (Saxonians), प्रशियनों (Prussians) आदि में कुछ परस्पर भेदमूलक विशेषताएँ हैं। पश्चिमी में लगभग 99% मूल जर्मन हैं। अल्पसंख्यकों में केवल डेनी (Danes) हैं। हाल में पूर्वी यूरोप से कुछ लोग आकर बसे हैं।

जर्मन राजभाषा है। भिन्न-भिन्न भागों में प्रयोग होनेवाली बोलियाँ जर्मन के ही अंतर्गत हैं।

संविधान द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता मान्य है। प्राय: रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट लोग ही बसते हैं।

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जर्मनी एक अत्यंत कुशल श्रम शक्ति, एक बड़े शेयर पूंजी, भ्रष्टाचार का स्तर कम, और नवीनता के एक उच्च स्तर के साथ एक सामाजिक बाजार अर्थव्यवस्था है। यह दुनिया की वस्तुओं का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक, और यूरोप में सबसे बड़ा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में जो भी है दुनिया की चौथी नाममात्र का सकल घरेलू उत्पाद और पीपीपी द्वारा पांचवें एक करके सबसे बड़ा। 
सेवा क्षेत्र की कुल सकल घरेलू उत्पाद (सूचना प्रौद्योगिकी सहित), उद्योग 28% के लगभग 71%, और कृषि 1% योगदान देता है। बेरोजगारी यूरोस्टेट द्वारा प्रकाशित दर जनवरी 2015, जो सभी 28 यूरोपीय संघ के सदस्य राज्यों की सबसे कम दर है में 4.7% के बराबर है। 7.1% के साथ जर्मनी भी यूरोपीय संघ के सभी सदस्य देशों के सबसे युवा बेरोजगारी दर है। ओईसीडी जर्मनी के मुताबिक दुनिया में सबसे ज्यादा श्रम उत्पादकता के स्तर में से एक है। 
जर्मनी यूरोपीय एकल बाजार जो अधिक से अधिक 508 मिलियन उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करता है का हिस्सा है। कई घरेलू वाणिज्यिक नीतियों यूरोपीय संघ (ईयू) के सदस्यों के बीच और यूरोपीय संघ के कानून द्वारा समझौतों से निर्धारित होते हैं। जर्मनी 2002 मेंम यूरोपीय मुद्रा यूरो शुरू यह यूरोजोन का एक सदस्य जो चारों ओर 338 मिलियन नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है। अपनी मौद्रिक नीति यूरोपीय सेंट्रल बैंक, जो फ्रैंकफर्ट, महाद्वीपीय यूरोप के वित्तीय केंद्र में मुख्यालय है द्वारा निर्धारित है।
आधुनिक कार के लिए घर होने के नाते, जर्मनी में मोटर वाहन उद्योग के सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी और दुनिया में अभिनव से एक है, के रूप में माना जाता है और उत्पादन से चौथा सबसे बड़ा है। जर्मनी के शीर्ष 10 निर्यात वाहन, मशीनरी, रासायनिक वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, बिजली के उपकरणों, दवाइयों, परिवहन उपकरण, मूल धातुओं, खाद्य उत्पादों, और रबर और प्लास्टिक हैं।

जर्मनी में सरकारी और प्रमुख बोली जाने वाली भाषा जर्मन भाषा (जर्मन : deutsch डॉइच्) है। यह 24 अधिकारी और यूरोपीय संघ का काम कर रहे भाषाओं में से एक, और यूरोपीय आयोग के तीन कार्य भाषाओं में से एक है। जर्मन करीब 100 मिलियन देशी वक्ताओं के साथ, यूरोपीय संघ में सबसे व्यापक रूप से बोली पहली भाषा है। 
जर्मनी में मान्यता प्राप्त मूल निवासी अल्पसंख्यक भाषाओं, डेनिश, निचला जर्मन हैं सॉर्बियन, रोमानी, और फ़्रिसियाई; वे आधिकारिक तौर पर क्षेत्रीय या अल्पसंख्यक भाषाओं के यूरोपीय चार्टर द्वारा संरक्षित हैं। सबसे अधिक इस्तेमाल किया आप्रवासी भाषाओं, तुर्की, कुर्द हैं पॉलिश, बाल्कन भाषाओं, और रूसी। जर्मनी के आम तौर पर बहुभाषी हैं। जर्मन नागरिकों के 67% से कम से कम एक विदेशी भाषा और कम से कम दो में 27% में संवाद करने में सक्षम होने का दावा 
स्टैंडर्ड जर्मन एक पश्चिम जर्मन भाषा है और बारीकी से संबंधित है और निचला जर्मन, डच, फ़्रिसियाई और अंग्रेजी भाषाओं के साथ वर्गीकृत किया गया है। एक हद तक कम करने के लिए, यह भी पूर्व युरोपीय (विलुप्त) और स्कैंडिनेवियाई भाषाएँ से संबंधित है। अधिकांश जर्मन शब्दावली भारोपीय भाषा परिवार के जर्मनिक शाखा से प्राप्त होता है। शब्दों का महत्वपूर्ण अल्पसंख्यकों एक छोटे (Denglisch के रूप में जाना जाता है) फ्रेंच और सबसे हाल ही में अंग्रेजी से राशि के साथ, लैटिन और ग्रीक से निकाली गई है। जर्मन को लैटिन वर्णमाला का उपयोग कर लिखा गया है। जर्मन बोलियों, पारंपरिक स्थानीय किस्मों वापस युरोपीय जनजाति का पता लगाया है, उनके शब्दकोष, स्वर विज्ञान, और वाक्य रचना द्वारा मानक जर्मन की किस्मों से प्रतिष्ठित हैं।

भौगोलिक दृष्टि से, प्रोटेस्टेंट देश के उत्तरी, मध्य और पूर्वी भागों में केंद्रित है। इनमें से ज्यादातर EKD, जो लूथरन, सुधार और वापस 1817 रोमन कैथोलिक के प्रशिया संघ के लिए डेटिंग दक्षिण और पश्चिम में केंद्रित है दोनों परंपराओं का प्रशासनिक या इकबालिया यूनियनों शामिल के सदस्य हैं।

इस्लाम देश का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है। 2011 की जनगणना में, जर्मनी के 1.9% के लिए खुद को घोषित मुसलमानों किया जाना है। और हाल ही में अनुमान लगता है, वहाँ 2.1 और जर्मनी में रहने वाले 4 लाख मुसलमानों के बीच हैं। मुसलमानों में से अधिकांश सुन्नी और Alevites तुर्की से हैं, लेकिन शिया, Ahmadiyyas और अन्य संप्रदायों की एक छोटी संख्या में हैं। 
अन्य जर्मनी की आबादी के कम से कम एक प्रतिशत शामिल धर्मों 250,000 अनुयायियों (लगभग 0.3%) और कुछ 100,000 अनुयायियों (0.1%) के साथ हिंदू धर्म के साथ बौद्ध धर्म हैं। जर्मनी में अन्य सभी धार्मिक समुदायों की तुलना में कम 50,000 अनुयायियों प्रत्येक है।

जर्मनी में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक वैश्विक नेता के रूप में यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उपलब्धियों के लिए किया गया है , विकास के प्रयासों की अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा है। नोबेल पुरस्कार से 107 जर्मन पुरस्कार विजेताओं को सम्मानित किया गया है। यह विज्ञान और इंजीनियरिंग (31%), दक्षिण कोरिया के बाद में स्नातकों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या पैदा करता है। 20 वीं सदी की शुरुआत में, जर्मन पुरस्कार विजेताओं किसी भी अन्य देश के उन लोगों, खासकर विज्ञान (फिजिक्स, केमिस्ट्री, और फिजियोलॉजी या चिकित्सा) की तुलना में अधिक पुरस्कार के लिए किया था। 

जर्मनी में कई प्रसिद्ध वैज्ञानिक और इंजीनियर, हंस गीजर, गीजर काउंटर के निर्माता सहित के घर गई है; और कोनराड झूस, जो पहली बार पूरी तरह से स्वचालित डिजिटल कंप्यूटर का निर्माण किया। इस तरह के जर्मन वैज्ञानिक, इंजीनियर और के रूप में गिनती फर्डिनेंड वॉन टसेपेल्लिन उद्योगपतियों, ओटो Lilienthal, Gottlieb डेमलर, रुडोल्फ डीजल, ह्यूगो Junkers और कार्ल बेंज आकार आधुनिक मोटर वाहन और हवाई परिवहन प्रौद्योगिकी में मदद की। जर्मन एयरोस्पेस सेंटर (डीएलआर) की तरह जर्मन संस्थानों ईएसए के लिए सबसे बड़ा योगदान कर रहे हैं। एयरोस्पेस इंजीनियर Wernher वॉन ब्राउन Peenemünde में पहला अंतरिक्ष रॉकेट विकसित की है और बाद में नासा के एक प्रमुख सदस्य थे और शनि वी मून रॉकेट विकसित की है। विद्युत चुम्बकीय विकिरण के क्षेत्र में हेनरिक रुडोल्फ हर्ट्ज के काम आधुनिक दूरसंचार के विकास के लिए निर्णायक था। 
जर्मनी में अनुसंधान संस्थानों के मैक्स प्लैंक सोसायटी, Helmholtz एसोसिएशन और Fraunhofer सोसायटी शामिल हैं। ग्रैफ्स्वाल्ड में Wendelstein 7 एक्स उदाहरण के लिए संलयन ऊर्जा के अनुसंधान के क्षेत्र में एक सुविधा होस्ट करता है। गाटफ्रीड लैबनिट्ज़ पुरस्कार दस वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों हर साल के लिए प्रदान किया जाता है। लाख € 2.5 पुरस्कार प्रति की एक अधिकतम के साथ यह दुनिया में सबसे ज्यादा संपन्न अनुसंधान पुरस्कार में से एक है।

ये देश २०१४ फीफा वर्ल्ड कप में अर्जेंटीना को १-० से हराकर २२ साल बाद विश्व विजेता बना.




#Article 41: यूरोप (1487 words)


यूरोप पृथ्वी पर स्थित सात महाद्वीपों में से एक महाद्वीप है। यूरोप, एशिया से पूरी तरह जुड़ा हुआ है। यूरोप और एशिया वस्तुतः यूरेशिया के खण्ड हैं और यूरोप यूरेशिया का सबसे पश्चिमी प्रायद्वीपीय खंड है। एशिया से यूरोप का विभाजन इसके पूर्व में स्थित यूराल पर्वत के जल विभाजक जैसे यूराल नदी, कैस्पियन सागर, कॉकस पर्वत शृंखला और दक्षिण पश्चिम में स्थित काले सागर के द्वारा होता है। यूरोप के उत्तर में आर्कटिक महासागर और अन्य जल निकाय, पश्चिम में अटलांटिक महासागर, दक्षिण में भूमध्य सागर और दक्षिण पूर्व में काला सागर और इससे जुड़े जलमार्ग स्थित हैं। इस सबके बावजूद यूरोप की सीमायें बहुत हद तक काल्पनिक हैं और इसे एक महाद्वीप की संज्ञा देना भौगोलिक आधार पर कम, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आधार पर अधिक है। ब्रिटेन, आयरलैंड और आइसलैंड जैसे देश एक द्वीप होते हुए भी यूरोप का हिस्सा हैं, पर ग्रीनलैंड उत्तरी अमरीका का हिस्सा है। रूस सांस्कृतिक दृष्टिकोण से यूरोप में ही माना जाता है, हालाँकि इसका सारा साइबेरियाई इलाका एशिया का हिस्सा है। आज ज़्यादातर यूरोपीय देशों के लोग दुनिया के सबसे ऊँचे जीवनस्तर का आनन्द लेते हैं।

यूरोप पृष्ठ क्षेत्रफल के आधार पर विश्व का दूसरा सबसे छोटा महाद्वीप है, इसका क्षेत्रफल के 10,180,000 वर्ग किलोमीटर (3,930,000 वर्ग मील) है जो पृथ्वी की सतह का २% और इसके भूमि क्षेत्र का लगभग 6.8% है। यूरोप के 50 देशों में, रूस क्षेत्रफल और आबादी दोनों में ही सबसे बड़ा है, जबकि वैटिकन नगर सबसे छोटा देश है। जनसंख्या के हिसाब से यूरोप एशिया और अफ्रीका के बाद तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला महाद्वीप है, 73.1 करोड़ की जनसंख्या के साथ यह विश्व की जनसंख्या में लगभग 11% का योगदान करता है, तथापि, संयुक्त राष्ट्र के अनुसार (मध्यम अनुमान), 2050 तक विश्व जनसंख्या में यूरोप का योगदान घटकर 7% पर आ सकता है। 1900 में, विश्व की जनसंख्या में यूरोप का हिस्सा लगभग 25% था।

पुरातन काल में यूरोप, विशेष रूप से यूनान पश्चिमी संस्कृति का जन्मस्थान है। मध्य काल में इसी ने ईसाईयत का पोषण किया है। यूरोप ने 16 वीं सदी के बाद से वैश्विक मामलों में एक प्रमुख भूमिका अदा की है, विशेष रूप से उपनिवेशवाद की शुरुआत के बाद. 16 वीं और 20 वीं सदी के बीच विभिन्न समयों पर, दोनो अमेरिका, अफ्रीका, ओशिआनिया और एशिया के बड़े भूभाग यूरोपीय देशों के नियंत्रित में थे। दोनों विश्व युद्धों की शुरुआत मध्य यूरोप में हुई थी, जिनके कारण 20 वीं शताब्दी में विश्व मामलों में यूरोपीय प्रभुत्व में गिरावट आई और संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के रूप में दो नये शक्ति के केन्द्रों का उदय हुआ। शीत युद्ध के दौरान यूरोप पश्चिम में नाटो के और पूर्व में वारसा संधि के द्वारा विभाजित हो गया। यूरोपीय एकीकरण के प्रयासों से पश्चिमी यूरोप में यूरोपीय परिषद और यूरोपीय संघ का गठन हुआ और यह दोनों संगठन 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद से पूर्व की ओर अपने प्रभुत्व का विस्तार कर रहे

यूरोप में मानव ईसापूर्व 35,000 के आसपास आया। ग्रीक (यूनानी) तथा लातिनी (रोम) राज्यों की स्थापना प्रथम सहस्त्राब्दी के पूर्वार्ध में हुई। इन दोनों संस्कृतियों ने आधुनिक य़ूरोप की संस्कृति को बहुत प्रभावित किया है। ईसापूर्व 480 के आसपास य़ूनान पर फ़ारसियों का आक्रमण हुआ जिसमें यवनों को बहुधा पीछे हटना पड़ा। 330 ईसापूर्व में सिकन्दर ने फारसी साम्राज्य को जीत लिया। 146 ई.पू. में यूनानी प्रायद्वीप (द्वीपों को छोड़कर) रोमन प्रोटेक्टोरेट का भाग बन गया। यूनान का अन्तिम पतन 88 ई.पू में हुआ जब पोन्टस के मिथ्रिडेट्स षष्ठ नामक राजा ने रोम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, जब वह रोमन जनरल लुसियस कॉर्नेलियस सुला द्वारा यूनान से बाहर खदेड़ा गया तब यूनान पर पुनः रोम का अधिकार हो गया और यूनानी नगर फिर कभी इससे उबर न सके। सन् 27 ईसापूर्व में रोमन गणतंत्र समाप्त हो गया और रोमन साम्राज्य की स्थापना हुई। सन् 313 में कांस्टेंटाइन ने ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया और यह धर्म रोमन साम्राज्य का राजधर्म बन गया। पाँचवीं सदी तक आते आते रोमन साम्राज्य कमजोर हो चला और पूर्वी रोमन साम्राज्य पंद्रहवीं सदी तक इस्तांबुल में बना रहा। इस दौरान पूर्वी रोमन साम्राज्यों को अरबों के आक्रमण का सामना करना पड़ा जिसमें उन्हें अपने प्रदेश अरबों को देने पड़े।

सन् 1453 में इस्तांबुल के पतन के बाद यूरोप में नए जनमानस का विकास हुआ जो धार्मिक बंधनों से ऊपर उठना चाहता था। इस घटना को पुनर्जागरण (फ़्रेंच में रेनेसाँ) कहते हैं। पुनर्जागरण ने लोगों को पारम्परिक विचारों को त्याग व्यावहारिक तथा वैज्ञानिक तथ्यों पर विश्वास करने पर जोर दिया। इस काल में भारत तथा अमेरिका जैसे देशों के समुद्री मार्ग की खोज हुई। सोलहवीं सदी में पुर्तगाली तथा डच नाविक दुनिया के देशों के सामुद्रिक रास्तों पर वर्चस्व बनाए हुए थे। इसी समय पश्चिमी य़ूरोप में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हो गया था। सांस्कृतिक रूप से भी य़ूरोप बहुत आगे बढ़ चुका था। साहित्य तथा कला के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई थी। छपाई की खोज के बाद पुस्तकों से ज्ञानसंचार त्वरित गति से बढ़ गया था।

सन् 1781 में फ्रांस की राज्यक्रांति हुई जिसने पूरे यूरोप को प्रभावित किया। इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जनभागीदारी तथा उदारता को बल मिला था। रूसी साम्राज्य धीरे धीरे विस्तृत होने लगा था। पर इसका विस्तार मुख्यतः एशिया में अपने दक्षिण की तरफ़ हो रहा था। इस समय ब्रिटेन तथा फ्रांस अपने नौसेना की तकनीकी प्रगति के कारण डचो तथा पुर्तगालियों से आगे निकल गए। पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया और पुर्तगाली उपनिवेशों को अंग्रेजों तथा फ्रांसिसियों ने अधिकार कर लिया। रूसी सर्फराज्य का पतन 1761 में हुआ। बाल्कन के प्रदेश उस्मानी साम्राज्य (ऑटोमन) से स्वतंत्र होते गए। 1918 तथा 1945 में दो विश्व युद्ध हुए। दोनों में जर्मनी की पराजय हुई। इसके बाद विश्व शीतयुद्ध के दौर से गुजरा। अमेरिका तथा रूस दो महाशक्ति बनकर उभरे। प्रायः पूर्वी य़ूरोप के देश रूस के साथ रहे जबकि पश्चिमी य़ूरोप के देश अमेरिका के। जर्मनी का विभाजन हो गया।

सन् 1951 में रूस ने अपने कॉस्मोनॉट यूरी गगारिन को अंतरिक्ष में भेजा। 1969 में अमेरिका ने सफलतापूर्वक मानव को चन्द्रमा की सतह तक पहुँचाने का दावा किया। हथियारों की होड़ बढ़ती गई और अंततः अमेरिका आगे निकल गया। 1989 में जर्मनी का एकीकरण हुआ। 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। रूस सबसे बड़ा परवर्ती राज्य बना। सन् 2007 में यूरोपीय संघ की स्थापना हुई।

यूरोप में दो पर्वतीय भाग के बीच एक विशाल मैदान है।

पांच सबसे बड़े यूरोपीय संघ के देशों की राजधानियों:

यूरोप मुख्यतः शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों में से है। यूरोप की जलवायु गल्फ स्ट्रीम नामक इस समुद्री गर्म जलधारा के प्रभाव के कारण विश्व भर में एक ही अक्षांश पर स्थित अन्य क्षेत्रों की तुलना में कम विषम है। गल्फ स्ट्रीम यूरोप की जलवायु गर्म और नम बनाता है। गल्फ स्ट्रीम न केवल यूरोप के सागर तट को तुलनात्मक रूप से गर्म रखता है बल्कि अटलांटिक महासागर से महाद्वीप की ओर चलने वाली प्रचलित पश्चिमी हवाओं को भी गर्म करता है, इसलिए नेपल्स का साल भर का औसत तापमान १६° सेल्सियस (६०.८°F) है, जबकि लगभग उसी ऊँचाई पर स्थित न्यूयॉर्क सिटी का औसत तापमान केवल १२° सेल्सियस (में ५३.६°F) ही रहता है।

तापमान एवं वर्षा में अन्तर मिलने के कारण यूरोप महाद्वीप की प्राकृतिक वनस्पति में भी काफी अन्तर मिलता है। यूरोप महाद्वीप के उत्तर के आर्कटिक महासागर के तटीय भाग में कठोर शीत के कारण भूमि हिमाच्छादित रहती है। अतः वनस्पति का प्रायः अभाव रहता है। इस भाग की मुख्य वनस्पति काई एवं लाइकेन है। यहाँ गर्मी में बर्फ पिघलने पर सुन्दर-सुन्दर फूलों वाले पौधे उगते हैं। जो अल्पकाल के लिए अपनी छटा दिखाकर समाप्त हो जाते हैं। जीव-जन्तुओं में ध्रुवीय भालू, रेंडियर, लोमड़ी तथा पानी में सील एवं व्हेल पाए जाते हैं। टुण्ड्रा प्रदेश के दक्षिणी भाग नार्वे, स्वीडन, फ़िनलैंड एवं रूस में नुकीली पत्ती वाले कोणधारी वन पाए जाते हैं जिन्हे टैगा कहते हैं। यहाँ के प्रमुख वृक्ष चीड़, स्प्रूस, सिलवर, फर, बर्च, बलूत आदि हैं। इन वनों में भालू, भेड़िया एवं मिंक आदि पशु पाए जाते हैं। टैगा प्रदेश के दक्षिण में कम वर्षा होती है अतः यहाँ शीतोष्ण घास के मैदान मिलते हैं जिन्हें स्टेपीज कहा जाता है। यह मैदान दक्षिणी रूस, रूमानिया एवं हंगरी के डेन्यूब प्रदेश में विस्तृत है। इस घास प्रदेश में घास खाने वाले जानवर जैसे घोड़ा, बारहसिंगा एवं घास में रेंगने वाले जीव पाए जाते हैं।

दक्षिणी यूरोप के भूमध्य सागरीय प्रदेश में जहाँ भूमध्यसागरीय जलवायु पाइ जाती है वहाँ चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन मिलते हैं। यहाँ बलूत, जैतून, सीडार, साइप्रस, अखरोट, बादाम, संतरा, अंजीर एवं अंगूर जैसे फलों के वृक्ष खूब पैदा होते हैं। उत्तरी-पश्चिमी मध्य यूरोप में समशीतोष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती वाले पतझड़ के वन पाए जाते हैं। कठोर शीत से सुरक्षा के लिए यहाँ के वृक्ष जाड़े के प्रारम्भ में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। ऐसे वृक्षों में बलूत, ऐश, बीच, बर्च, एल्म, मैपिल, चेस्टनट और अखरोट मुख्य हैं। ऊँचें पर्वतीय भागों में अधिक ठण्डक के कारण नुकीली पत्ती वाले वन पाए जाते हैं। इनके प्रमुख वृक्ष चीड़, फर, सनोवर, लार्च, स्प्रूस, सीडार और हेमलाक हैं। इस प्रकार यूरोप में पतझड़ एवं नुकीली पत्ती के वृक्षों के मिश्रित वन पाए जाते हैं।




#Article 42: उत्तर प्रदेश (4887 words)


उत्तर प्रदेश उत्तर भारत का एक राज्य है यह लगभग 20 करोड़ से अधिक निवासियों के साथ, यह भारत में सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है, और साथ ही दुनिया में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश उपखंड है। यह 1 अप्रैल 1937 को ब्रिटिश शासन के दौरान संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध के रूप में स्थापित किया गया था। ब्रिटिश शासनकाल में इसे यूनाइटेड प्रोविंस कहा जाता था जो कि 1950 में बदलकर उत्तर प्रदेश हो गया। इस तरह सामान्य बोलचाल में यू.पी. कहे जाने वाले प्रान्त का अधिकारिक नाम बदलने के बाद भी संक्षिप्त नाम अपरिवर्तित ही रहा। राज्य की प्रशासनिक व विधायिक राजधानी लखनऊ, और न्यायिक राजधानी प्रयागराज है, और प्रशासनिक कारणों से इसे 18 मण्डलों(मंडलों) और 75 जिलों में विभाजित किया गया है। 9 नवंबर 2000 को, एक नया राज्य, उत्तराखंड(उत्तराखण्ड), राज्य के हिमालयी पहाड़ी क्षेत्र से बनाया गया था। राज्य की दो प्रमुख नदियाँ, गंगा(गङ्गा) और यमुना, प्रयागराज में मिलती हैं और फिर आगे गंगा(गङ्गा) के रूप में बहती हैं। हिंदी(हिन्दी) राज्य में सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा है, और राज्य की आधिकारिक भाषा भी है।

उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा (जनसंख्या के आधार पर) राज्य है। राज्य के उत्तर में उत्तराखण्ड तथा हिमाचल प्रदेश, पश्चिम में हरियाणा, दिल्ली तथा राजस्थान, दक्षिण में मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ और पूर्व में बिहार तथा झारखंड(झारखण्ड) राज्य स्थित हैं। इनके अतिरिक्त राज्य की की पूर्वोत्तर दिशा में नेपाल देश है।

उत्तर प्रदेश भारत के उत्तर में स्थित है। यह राज्य उत्तर में नेपाल को छूता है, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ है। यह राज्य 2,40,928 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यहाँ का मुख्य न्यायालय प्रयागराज में है।

यहाँ के मुख्य शहर इटावा, कानपुर, हरदोई हमीरपुर, चित्रकूट, एटा , जालौन, नोएडा ललितपुर,सीतापुर लखीमपुर खीरी, वाराणसी , चन्दौली, प्रयागराज,जौनपुर, मेरठ, गोरखपुर, बस्ती, नोएडा,बुलंदशहर मथुरा, मुरादाबाद, गाजियाबाद, अलीगढ़, सुल्तानपुर, अयोध्या, बरेली, आज़मगढ़, मुज़फ्फरनगर, शामली, सहारनपुर, गोंडा(गोण्डा) यहाँ के मुख्य शहर हैं।

राज्य के मूल निवासियों को आमतौर पर उत्तर प्रदेशी कहा जाता है, ये अधिक विशेष रूप से अवध,पूर्वाञ्चल,बृज,  बुन्देलखण्ड, या रोहिलखंड(रोहिलखण्ड) इत्यादि क्षेत्र के आधार पर जाने पहचाने जाते हैं। हिन्दू धर्म का तीन-चौथाई से अधिक आबादी द्वारा अभ्यास किया जाता है, जिसमें इस्लाम दूसरा सबसे बड़ा सम्प्रदाय है। उत्तर प्रदेश प्राचीन और मध्यकालीन भारत के शक्तिशाली साम्राज्यों का घर था। राज्य में कई ऐतिहासिक, प्राकृतिक और धार्मिक पर्यटन स्थल हैं, जैसे कि आगरा, अयोध्या, वृंदावन (मथुरा), वाराणसी और प्रयागराज। यह 243,290 वर्ग किलोमीटर (93,933 वर्ग मील) को कवर करता है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल के 7.33% के बराबर है, और क्षेत्रफल के हिसाब से चौथा सबसे बड़ा भारतीय राज्य है। उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था सकल घरेलू उत्पाद में  15.79 लाख करोड़ और 80 57,480 प्रति व्यक्ति जीडीपी के साथ भारत में चौथी सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था है। उत्तर प्रदेश राज्य सबसे अघिक दूध का उत्पादन करता है। कृषि और सेवा उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। सेवा क्षेत्र में यात्रा और पर्यटन, होटल उद्योग, रियल एस्टेट, बीमा और वित्तीय परामर्श शामिल हैं। 1968 के बाद से उत्तर प्रदेश में दस बार अलग-अलग कारणों से और कुल 1,700 दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया है।

उत्तर प्रदेश का ज्ञात इतिहास लगभग 4000 वर्ष पुराना है, जब आर्यों ने अपना पहला कदम इस जगह पर रखा। इस समय वैदिक सभ्यता का प्रारम्भ हुआ और उत्तर प्रदेश में इसका जन्म हुआ। आर्यों का फ़ैलाव सिन्धु नदी और सतलुज के मैदानी भागों से यमुना और गंगा के मैदानी क्षेत्र की ओर हुआ। आर्यों ने दोब (दो-आब, यमुना और गंगा का मैदानी भाग) और घाघरा नदी क्षेत्र को अपना घर बनाया। इन्हीं आर्यों के नाम पर भारत देश का नाम आर्यावर्त या भारतवर्ष (भारत आर्यों के एक प्रमुख राजा थे) पड़ा। समय के साथ आर्य भारत के दूरस्थ भागों में फ़ैल गये। संसार के प्राचीनतम शहरों में एक माना जाने वाला वाराणसी शहर यहीं पर स्थित है। वाराणसी के
पास स्थित सारनाथ का चौखन्डी स्तूप भगवान बुद्ध के प्रथम प्रवचन की याद दिलाता है। समय के साथ यह क्षेत्र छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया या फिर बड़े साम्राज्यों गुर्जर प्रतिहार, गुप्त, मोर्य और कुषाण का हिस्सा बन गया। ७वीं शताब्दी में कन्नौज गुप्त साम्राज्य का प्रमुख केन्द्र था। 

उत्तर प्रदेश हिन्दू धर्म का प्रमुख स्थल रहा। प्रयाग के कुम्भ का महत्त्व पुराणों में वर्णित है। त्रेतायुग में विष्णु अवतार श्री रामचंद्र जी ने अयोध्या में जन्म लिया। राम भगवान का चौदह वर्ष के वनवास में प्रयाग, चित्रकूट, श्रंगवेरपुर आदि का महत्त्व है। भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ, जोकि उत्तर प्रदेश में स्थित है। काशी (वाराणसी) में विश्वनाथ मंदिर के शिवलिंग का सनातन धर्म विशेष महत्त्व रहा है। सनातन धर्म के प्रमुख ऋषि रामायण रचयिता महर्षि बाल्मीकि, रामचरित मानस रचयिता गोस्वामी तुलसीदास (जन्मस्थान- सोरों कासगंज), महर्षि भारद्वाज|

सातवीं शताब्दी ई. पू. के अन्त से भारत और उत्तर प्रदेश का व्यवस्थित इतिहास आरम्भ होता है, जब उत्तरी भारत में 16 महाजनपद श्रेष्ठता की दौड़ में शामिल थे, इनमें से सात वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के अंतर्गत थे। बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी (बनारस) के निकट सारनाथ में दिया और एक ऐसे धर्म की नींव रखी, जो न केवल भारत में, बल्कि चीन व जापान जैसे सुदूर देशों तक भी फैला। कहा जाता है कि बुद्ध को कुशीनगर में परिनिर्वाण (शरीर से मुक्त होने पर आत्मा की मुक्ति) प्राप्त हुआ था, जो पूर्वी ज़िले कुशीनगर में स्थित है। पाँचवीं शताब्दी ई. पू. से छठी शताब्दी ई. तक उत्तर प्रदेश अपनी वर्तमान सीमा से बाहर केन्द्रित शक्तियों के नियंत्रण में रहा, पहले मगध, जो वर्तमान बिहार राज्य में स्थित था और बाद में उज्जैन, जो वर्तमान मध्य प्रदेश राज्य में स्थित है। इस राज्य पर शासन कर चुके इस काल के महान शासकों में नंदवंश संस्थापक महान चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद थे। जो एक नाई सम्राट थे। सम्राट पद्मनंद के पुत्र सम्राट धनानंद थे। शासनकाल लगभग (268-330 B.C के दौरान 323B.C में नंदवंश का सुनहरा दौर था।इस समय यह प्रदेश मगध  के नाम से जाना जाता था। जिसकी सीमा गंगा के विशाल मैदान को लांघ गई थी। और केंद्रीय शासन पध्दति  भी इसी समय शुरू हुई थी किन्तु ईर्ष्या के कारण यह सफल नहीं हुई। चन्द्रगुप्त प्रथम (शासनकाल लगभग 330-380 ई.) व अशोक (शासनकाल लगभग 268 या 265-238), जो मौर्य सम्राट थे और समुद्रगुप्त (लगभग 330-380 ई.) और चन्द्रगुप्त द्वितीय हैं (लगभग 380-415 ई., जिन्हें कुछ विद्वान विक्रमादित्य मानते हैं)। एक अन्य प्रसिद्ध शासक हर्षवर्धन (शासनकाल 606-647) थे। जिन्होंने कान्यकुब्ज (आधुनिक कन्नौज के निकट) स्थित अपनी राजधानी से समूचे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्सों पर शासन किया।

इस काल के दौरान बौद्ध संस्कृति, का उत्कर्ष हुआ। अशोक के शासनकाल के दौरान बौद्ध कला के स्थापत्य व वास्तुशिल्प प्रतीक अपने चरम पर पहुँचे। गुप्त काल (लगभग 320-550) के दौरान हिन्दू कला का भी अधिकतम विकास हुआ। लगभग 647 ई. में हर्ष की मृत्यु के बाद हिन्दूवाद के पुनरुत्थान के साथ ही बौद्ध धर्म का धीरे-धीरे पतन हो गया। इस पुनरुत्थान के प्रमुख रचयिता दक्षिण भारत में जन्मे शंकर थे, जो वाराणसी पहुँचे, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मैदानों की यात्रा की और हिमालय में बद्रीनाथ में प्रसिद्ध मन्दिर की स्थापना की। इसे हिन्दू मतावलम्बी चौथा एवं अन्तिम मठ (हिन्दू संस्कृति का केन्द्र) मानते हैं।

इस क्षेत्र में हालाँकि 1000-1030 ई. तक मुसलमानों का आक्रमण हो चुका था, किन्तु उत्तरी भारत में 12वीं शताब्दी के अन्तिम दशक के बाद ही मुस्लिम शासन स्थापित हुआ, जब मुहम्मद ग़ोरी ने गहड़वालों (जिनका उत्तर प्रदेश पर शासन था) और पूर्वी अवध के भाराशिव पासी वंश के अंतिम स्थानीय राजाओ  को हराया था।एकाध राजा सुहलदेव पासी आदि का सफल विरोध के अतिरिक्त  लगभग 650 वर्षों तक अधिकांश भारत की तरह उत्तर प्रदेश पर भी किसी न किसी मुस्लिम वंश का शासन रहा, जिनका केन्द्र दिल्ली या उसके आसपास था। 1526 ई. में बाबर ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी को हराया और सर्वाधिक सफल मुस्लिम वंश (मुग़ल वंश) की नींव रखी। इस साम्राज्य ने 350 वर्षों से भी अधिक समय तक उपमहाद्वीप पर शासन किया। इस साम्राज्य का महानतम काल अकबर (शासनकाल 1556-1605 ई.) से लेकर औरंगजेब आलमगीर (1707) का काल था, जिन्होंने आगरा के पास नई शाही राजधानी फ़तेहपुर सीकरी का निर्माण किया। उनके पोते शाहजहाँ (शासनकाल 1628-1658 ई.) ने आगरा में ताजमहल (अपनी बेगम की याद में बनवाया गया मक़बरा, जो प्रसव के दौरान चल बसी थीं) बनवाया, जो विश्व के महानतम वास्तुशिल्पीय नमूनों में से एक है। शाहजहाँ ने आगरा व दिल्ली में भी वास्तुशिल्प की दृष्टि से कई महत्त्वपूर्ण इमारतें बनवाईं थीं। 

उत्तर प्रदेश में केन्द्रित मुग़ल साम्राज्य ने एक नई मिश्रित संस्कृति के विकास को प्रोत्साहित किया। अकबर इसके प्रतिपादक थे, जिन्होंने बिना किसी भेदभाव के अपने दरबार में वास्तुशिल्प, साहित्य, चित्रकला और संगीत विशेषज्ञों को नियुक्त किया था। भारत के विभिन्न मत और इस्लाम के मेल ने कई नए मतों का विकास किया, (जिसे दीन-ए-ईलाही कहा जाता है।) जो भारत की विभिन्न जातियों के बीच साधारण सहमति प्रस्थापित करना चाहते थे। भक्ति आन्दोलन के संस्थापक रामानन्द (लगभग 1400-1470 ई.) का प्रतिपादन था कि, किसी व्यक्ति की मुक्ति ‘लिंग’ या ‘जाति’ पर आश्रित नहीं होती। सभी धर्मों के बीच अनिवार्य एकता की शिक्षा देने वाले कबीर ने उत्तर प्रदेश में मौजूद धार्मिक असहिष्णुता के विरुद्ध अपनी लड़ाई केन्द्रित की। कांशीराम नगर(कासगंज) के निकट स्थित सोरों में गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण की रचना की, जो भगवान राम के जीवन को उल्लेखित करती है।18वीं शताब्दी में मुग़लों के पतन के साथ ही इस मिश्रित संस्कृति का केन्द्र दिल्ली से लखनऊ चला गया, जो अवध के नवाब के अन्तर्गत था और जहाँ साम्प्रदायिक सद्भाव के वातावरण में कला, साहित्य, संगीत और काव्य का उत्कर्ष हुआ।

लगभग 75 वर्ष की अवधि में उत्तर प्रदेश के क्षेत्र का ईस्ट इण्डिया कम्पनी (ब्रिटिश व्यापारिक कम्पनी) ने धीरे-धीरे अधिग्रहण किया। विभिन्न उत्तर भारतीय वंशों 1775, 1798 और 1801 में नवाबों, 1803 में सिंधिया और 1816 में गोरखों से छीने गए प्रदेशों को पहले बंगाल प्रेज़िडेन्सी के अन्तर्गत रखा गया, लेकिन 1833 में इन्हें अलग करके पश्चिमोत्तर प्रान्त (आरम्भ में आगरा प्रेज़िडेन्सी कहलाता था) गठित किया गया। 1856 ई. में कम्पनी ने अवध पर अधिकार कर लिया और आगरा एवं अवध संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के समरूप) के नाम से इसे 1877 ई. में पश्चिमोत्तर प्रान्त में मिला लिया गया। 1902 ई. में इसका नाम बदलकर संयुक्त प्रान्त कर दिया गया।

सन 1857 में अंग्रेजी फौज के भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह एक साल तक चला और अधिकतर उत्तर भारत में फ़ैल गया। इसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा गया। इस विद्रोह का प्रारम्भ मेरठ शहर में हुआ। इस का कारण अंग्रेज़ों द्वारा गाय और सुअर की चर्बी से युक्त कारतूस देना बताया गया। इस संग्राम का एक प्रमुख कारण डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति भी थी। यह लड़ाई मुख्यतः दिल्ली,लखनऊ,कानपुर,झाँसी और बरेली में लड़ी गयी। इस लड़ाई में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, अवध की बेगम हज़रत महल, बख्त खान, नाना साहेब, मौल्वी अहमदुल्ला शाह्, राजा बेनी माधव सिंह,गंगाबख्श रावत,वीरांगना उदादेवी पासी, अजीमुल्लाह खान और अनेक देशभक्तों ने भाग लिया।

सन 1902 में नार्थ वेस्ट प्रोविन्स का नाम बदल कर यूनाइटेड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे यूपी कहा गया। सन 1921 में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद से लखनऊ कर दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक न्यायपीठ स्थापित की गयी।

सन 2000 में पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र स्थित गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डल को मिला कर एक नये राज्य उत्तरांचल का गठन किया गया जिसका नाम बाद में बदल कर 2007 में उत्तराखण्ड कर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश भारत के उत्तर पूर्वी भाग में स्थित है। प्रदेश के उत्तरी एवम पूर्वी भाग की तरफ़ पहाड़ तथा पश्चिमी एवम मध्य भाग में मैदान हैं। उत्तर प्रदेश को मुख्यतः तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है।

यहाँ की जलवायु मुख्यतः उष्णदेशीय मानसून की है परन्तु समुद्र तल से ऊँचाई बदलने के साथ इसमें परिवर्तन 
होता है। उत्तर प्रदेश ८ राज्यों - उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार से घिरा राज्य है
उत्तर प्रदेश का राजकीय खेल- हाॅकी है।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख भूगोलीय तत्व इस प्रकार से हैं-

भू-आकृति - उत्तर प्रदेश को दो विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों, गंगा के मध्यवर्ती मैदान और दक्षिणी उच्चभूमि में बाँटा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा गंगा के मैदान में है। मैदान अधिकांशत: गंगा व उसकी सहायक नदियों के द्वारा लाए गए जलोढ़ अवसादों से बने हैं। इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में उतार-चढ़ाव नहीं है, यद्यपि मैदान बहुत उपजाऊ है, लेकिन इनकी ऊँचाई में कुछ भिन्नता है, जो पश्चिमोत्तर में 305 मीटर और सुदूर पूर्व में 58 मीटर है। गंगा के मैदान की दक्षिणी उच्चभूमि अत्यधिक विच्छेदित और विषम विंध्य पर्वतमाला का एक भाग है, जो सामान्यत: दक्षिण-पूर्व की ओर उठती चली जाती है। यहाँ ऊँचाई कहीं-कहीं ही 305 से अधिक होती है।

उत्तर प्रदेश में अनेक नदियाँ है जिनमें गंगा, यमुना, बेतवा, केन, चम्बल, घाघरा, गोमती, सोन आदि मुख्य है। प्रदेश के विभिन्न भागों में प्रवाहित होने वाली इन नदियों के उदगम स्थान भी भिन्न-भिन्न है, अतः इनके उदगम स्थलों के आधार पर इन्हें निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है।

हिमालय पर्वत से निकलने वाली नदियाँ
गंगा के मैदानी भाग से निकलने वाली नदियाँ
दक्षिणी पठार से निकलने वाली नदियाँ हैं बेतवा, केन, चम्बल आदि प्रमुख हैं

उत्तर प्रदेश में झीलों का अभाव है। यहाँ की अधिकांश झीलें कुमाऊँ क्षेत्र में हैं जो कि प्रमुखतः भूगर्भीय शक्तियों के द्वारा भूमि के धरातल में परिवर्तन हो जाने के परिणामस्वरूप निर्मित हुई हैं।

नहरों के वितरण एवं विस्तार की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का अग्रणीय स्थान है। यहाँ की कुल सिंचित भूमि का लगभग 30 प्रतिशत भाग नहरों के द्वारा सिंचित होता है। यहाँ की नहरें भारत की प्राचीनतम नहरों में से एक हैं।

यह राज्य उत्तर में हिमालय और दक्षिण में विंध्य पर्वतमाला से उदगमित नदियों के द्वारा भली-भाँति अपवाहित है। गंगा एवं उसकी सहायक नदियों, यमुना नदी, रामगंगा नदी, गोमती नदी, घाघरा नदी और गंडक नदी को हिमालय के हिम से लगातार पानी मिलता रहता है। विंध्य श्रेणी से निकलने वाली चंबल नदी, बेतवा नदी और केन नदी यमुना नदी में मिलने से पहले राज्य के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में बहती है। विंध्य श्रेणी से ही निकलने वाली सोन नदी राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग में बहती है और राज्य की सीमा से बाहर बिहार में गंगा नदी से मिलती है।

उत्तर प्रदेश के क्षेत्रफल का लगभग दो-तिहाई भाग गंगा तंत्र की धीमी गति से बहने वाली नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी की गहरी परत से ढंका है। अत्यधिक उपजाऊ यह जलोढ़ मिट्टी कहीं रेतीली है, तो कहीं चिकनी दोमट। राज्य के दक्षिणी भाग की मिट्टी सामान्यतया मिश्रित लाल और काली या लाल से लेकर पीली है। राज्य के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में मृदा कंकरीली से लेकर उर्वर दोमट तक है, जो महीन रेत और ह्यूमस मिश्रित है, जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में घने जंगल हैं।

उत्तर प्रदेश की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है। राज्य में औसत तापमान जनवरी में 12.50 से 17.50 से. रहता है, जबकि मई-जून में यह 30.50 से 42.50 से. के बीच रहता है। पूर्व से (1,000 मिमी से 2,000 मिमी) पश्चिम (610 मिमी से 1,000 मिमी) की ओर वर्षा कम होती जाती है। राज्य में लगभग 90 प्रतिशत वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होती है, जो जून से सितम्बर तक होती है। वर्षा के इन चार महीनों में होने के कारण बाढ़ एक आवर्ती समस्या है, जिससे ख़ासकर राज्य के पूर्वी हिस्से में फ़सल, जनजीवन व सम्पत्ति को भारी नुक़सान पहुँचता है। मानसून की लगातार विफलता के परिणामस्वरूप सूखा पड़ता है व फ़सल का नुक़सान होता है।

राज्य में वन मुख्यत: दक्षिणी उच्चभूमि पर केन्द्रित हैं, जो ज़्यादातर झाड़ीदार हैं। विविध स्थलाकृति एवं जलवायु के कारण इस क्षेत्र का प्राणी जीवन समृद्ध है। इस क्षेत्र में शेर, तेंदुआ, हाथी, जंगली सूअर, घड़ियाल के साथ-साथ कबूतर, फ़ाख्ता, जंगली बत्तख़, तीतर, मोर, कठफोड़वा, नीलकंठ और बटेर पाए जाते हैं। कई प्रजातियाँ, जैसे-गंगा के मैदान से सिंह और तराई क्षेत्र से गैंडे अब विलुप्त हो चुके हैं। वन्य जीवन के संरक्षण के लिए सरकार ने 'चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य' और 'दुधवा अभयारण्य' सहित कई अभयारण्य स्थापित किए हैं।

उत्तर प्रदेश इन 18 मंडलों के तहत 75 जिलों में विभाजित है:

उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में प्रयागराज,नोएडा, मुरादाबाद, गाजियाबाद, आज़मगढ़, लखनऊ, कानपुर, बरेली, आगरा, अलीगढ, अयोध्या, झाँसी, मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, वाराणसी, गोरखपुर,हरदोई मथुरा, फर्रुखाबाद, बहराइच, देवरिया, गोंडा, गाजीपुर, सिद्धार्थनगर, मऊ,बाराबंकी तथा श्रावस्ती आदि शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा (जनसंख्या के आधार पर) राज्य है। लगभग २२ करोड़ की जनसंख्या के साथ उत्तर प्रदेश भारत का सर्वाधिक आबादी वाला उप राष्ट्रीय इकाई है। यदि प्रदेश एक स्वतंत्र राष्ट्र होता तो यह विश्व का चीन, भारत, सं॰रा॰अमेरिका, इण्डोनेशिया और ब्राज़ील के बाद जनसंख्या के अनुसार छटा सबसे बड़ा देश होता है। 2001 की जनगणना के अनुसार, राज्य की जनसंख्या 25.80 प्रतिशत बढ़ी। जनसंख्या का लौकिक अनुपात (प्रति 1000 पुरुष पर महिलाओं की संख्या) 908 (जनगणना 2011) दर्ज किया गया है, जो 2001 के 898 के मुक़ाबले बेहतर है। गंगा का मैदान, जहाँ जनसंख्या का घनत्व सबसे अधिक है, राज्य की 80 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करता है। इसकी तुलना में हिमालय क्षेत्र व दक्षिणी उच्चभूमि में जनसंख्या का घनत्व बहुत कम है।

राज्य की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण आवासों की विशेषताएँ हैं- राज्य के पश्चिमी हिस्से में पाए जाने वाले घने बसे हुए गाँव, पूर्वी क्षेत्र में पाए जाने वाले छोटे गाँव और मध्य क्षेत्र में दोनों का समूह होता है, जिसकी छत फूस या मिट्टी के खपड़ों से बनी होती है। शहरी जनसंख्या का आधे से अधिक हिस्सा एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में रहता है।

उत्तर प्रदेश भारत की राजकीय भाषा हिन्दी की जन्मस्थली है, और आबादी के बहुमत (94.08%) द्वारा बोली जाती है। शताब्दियों के दौरान हिन्दी के कई स्थानीय स्वरूप विकसित हुए हैं। साहित्यिक हिन्दी ने 19वीं शताब्दी तक खड़ी बोली का वर्तमान स्वरूप (हिन्दुस्तानी) धारण नहीं किया था। वाराणसी के भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885 ई.) उन अग्रणी लेखकों में से थे, जिन्होंने हिन्दी के इस स्वरूप का इस्तेमाल साहित्यिक माध्यम के तौर पर किया था। इसके अलावा विभिन्न क्षेत्रों की अपनी बोलियाँ भी हैं। इनमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में बोली जाने वाली अवधी, पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी क्षेत्र में बोली जाने वाली भोजपुरी और ब्रज क्षेत्र के पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बोली जाने वाली ब्रजभाषा शामिल हैं। उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया जाता है।

लोक सभा की वर्तमान सदस्य संख्या 545 है।

राज्यसभा में २४५ सदस्य होते हैं। जिनमे १२ सदस्य भारत के राष्ट्रपति के द्वारा नामांकित होते हैं। इन्हें 'नामित सदस्य' कहा जाता है।   

राज्यसभा में सदस्य ६ साल के लिए चुने जाते हैं, जिनमे एक-तिहाई सदस्य हर २ साल में सेवा-निवृत होते हैं।   

उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के निम्न साधन हैं-

आर्थिक तौर पर उत्तर प्रदेश देश के अत्यधिक अल्पविकसित राज्यों में से एक है। यह मुख्यत: कृषि प्रधान राज्य है और यहाँ की तीन-चौथाई (75 प्रतिशत) से अधिक जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है। राज्य में औद्योगिकीकरण के लिए महत्त्वपूर्ण खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों की कमी है। यहाँ पर केवल सिलिका, चूना पत्थर व कोयले जैसे खनिज पदार्थ ही उल्लेखनीय मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा यहाँ जिप्सम, मैग्नेटाइट, फ़ॉस्फ़ोराइट और बॉक्साइट के अल्प भण्डार भी पाए जाते हैं।

राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, जौ और गन्ना राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। 1960 के दशक से गेहूँ व चावल की उच्च पैदावार वाले बीजों के प्रयोग, उर्वरकों की अधिक उपलब्धता और सिंचाई के अधिक इस्तेमाल से उत्तर प्रदेश खाद्यान्न का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बन गया है। यद्यपि किसान दो प्रमुख समस्याओं से ग्रस्त हैं: आर्थिक रूप से अलाभकारी छोटे खेत और बेहतर उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी में निवेश करने के लिए अपर्याप्त संसाधन, राज्य की अधिकतम कृषि भूमि किसानों को मुश्किल से ही भरण-पोषण कर पाती है। पशुधन व डेयरी उद्योग आय के अतिरिक्त स्रोत हैं। उत्तर प्रदेश में भारत के किसी भी शहर के मुक़ाबले सर्वाधिक पशु पाए जाते हैं। हालाँकि प्रति गाय दूध का उत्पादन कम है।

राज्य में काफ़ी समय से मौजूद वस्त्र उद्योग व चीनी प्रसंस्करण उद्योग में राज्य के कुल मिलकर्मियों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा लगा है। राज्य की अधिकांश मिलें पुरानी व अक्षम हैं। अन्य संसाधन आधारित उद्योगों में वनस्पति तेल, जूट व सीमेंट उद्योग शामिल हैं। केन्द्र सरकार ने यहाँ पर भारी उपकरण, मशीनें, इस्पात, वायुयान, टेलीफ़ोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और उर्वरकों के उत्पादन वाले बहुत से बड़े कारख़ाने स्थापित किए हैं। यहाँ मथुरा में एक तेल परिष्करणशाला और राज्य के दक्षिण-पूर्वी मिर्ज़ापुर ज़िले में कोयला क्षेत्र का विकास केन्द्र सरकार की दो प्रमुख परियोजनाएँ हैं। राज्य सरकार ने मध्यम और लघु स्तर के उद्योगों को प्रोत्साहन दिया है।

हस्तशिल्प, क़ालीन, पीतल की वस्तुएँ, जूते-चप्पल, चमड़े व खेल का सामान राज्य के निर्यात में प्रमुखता के साथ योगदान देते हैं। कानपुर उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा औधोगिक शहर है यहाँ चमड़े का काम होता है। कानपुर में चमड़े का जूता पूरी दुनिया में मशहूर है। भदोई व मिर्ज़ापुर के क़ालीन दुनिया भर में सराहे जाते हैं। पिलखुवा की हैण्ड ब्लाक प्रिंट की चादरें, वाराणसी का रेशम व ज़री का काम, मुरादाबाद की पीतल की ख़ूबसूरत वस्तुएँ, लखनऊ की चिकनकारी, नगीना का आबनूस की लकड़ी का काम, फ़िरोज़ाबाद की काँच की वस्तुएँ और सहारनपुर का नक्क़ाशीदार लकड़ी का काम भी उल्लेखनीय है। सार्वजनिक क्षेत्र के वाणिज्यिक बैंकों की संख्या उत्तर प्रदेश में ही सबसे अधिक है। देश के विकास में इस प्रदेश का बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश बिजली की भीषण कमी का शिकार है। 1951 से स्थापित अन्य विद्युत उत्पादन केन्द्रों से क्षमता बढ़ी है, लेकिन माँग और आपूर्ति के बीच अन्तर बढ़ता ही जा रहा है। भारत के अधिकतम तापविद्युत केन्द्रों में से एक ओबरा-रिहंद (दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश), राज्य के कई अन्य हिस्सों में स्थित विभिन्न पनबिजली संयंत्रों और बुलंदशहर के परमाणु बिजलीघर में बिजली का उत्पादन किया जाता है।
वर्ष 2004-05 में उत्तर प्रदेश में कुल 5,21,835 लघु उद्योग इकाइयाँ थीं, जिनमें लगभग 5,131 करोड़ रुपये की पूंजी का निवेश था और लगभग 20,01,000 लोग काम कर रहे थे। वर्ष 2004-05 में राज्य में लगभग 45.51 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ। उत्तर प्रदेश राज्य में 68 कपड़ा मिलें और 32 आटोमोबाइल के कारखाने हैं, जिनमें 5,740 करोड़ रुपये की पूंजी का निवेश है। सन् 2011 तक 'नोएडा प्राधिकरण' के अंतर्गत 102 सेक्टर विकसित करने की योजना चल रही है। इस प्राधिकरण में औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र, ग्रुप हाउसिंग क्षेत्र, आवासीय भवन, व्यावसायिक परिसंपत्तियां और संस्थागत शिक्षा क्षेत्र शामिल हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा की भांति ही राज्य में अन्य स्थानों पर औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करने के लिए कार्य किये जा रहे 

वैसे तो यहाँ उद्योगों के लिए काफी संभावनायें हैं और कई बड़े उद्योग यहाँ लगे हुए हैं। वैसे उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में पहली आयुर्वेदिक दवा उद्योग की स्थापना न्यू इंडिया फार्मास्युटिकल्स नाम से की गयी है। यह ओधोगिक इकाई करीब सौ से अधिक दवाअों का उत्पादन कर रही है। टेबलेट सिरप के साथ साथ कई अन्य दवाओं का निर्माण यहाँ होता है। हालाँकि अभी यह समूह अपनी पूरी ताकत से विस्तार की और अगसर है और इसे जागरूक लोगों की जरुरत है जो इसके उत्पादन को भारतीय बाज़ार में पहुँचा सके।हैं।

राज्य के प्रमुख शहर व नगर सड़कों व रेल सम्पर्क से जुड़े हैं, फिर भी आमतौर पर सड़कों की स्थिति ख़राब है और रेल की पटरियों की भिन्न लाइनों (बड़ी और छोटी) के बीच सामंजस्य न होने के कारण रेल प्रणाली भी प्रभावित हुई है। लखनऊ उत्तरी नेटवर्क का मुख्य जंक्शन है। उत्तर प्रदेश के मुख्य नगर वायुमार्ग द्वारा दिल्ली व भारत के अन्य शहरों से जुड़े हुए हैं। राज्य के भीतर के परिवहन तंत्र में गंगा, यमुना और सरयू नदियों की अंतर्देशीय जल परिवहन व्यवस्था भी शामिल है।

उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित सड़कों की कुल लंबाई 1,18,946 किलोमीटर है। इसमें 3,869 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग, 9,097 किलोमीटर प्रांतीय राजमार्ग, 1,05,980 किलोमीटर अन्य ज़िला सड़कें और 72,931 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें हैं।

रेलवे का उत्तरी नेटवर्क का मुख्य जंक्शन राजधानी लखनऊ है। उत्तर मध्य रेलवे का मुख्यालय प्रयागराज में है जिसके अंतर्गत प्रयागराज, कानपुर, झाँसी, आगरा, बांदा, चित्रकूट, टूंडला, इटावा, आदि स्टेशन हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण रेल जंक्शन- मथुरा, पं दीनदयाल उपाधयाय, जौनपुर, मुरादाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, गोंडा, फ़ैज़ाबाद, बरेली और सीतापुर हैं।

प्रदेश में वर्तमान में दो अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे चौधरी चरण सिंह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, लखनऊ में और लाल बहादुर शास्त्री अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, वाराणसी में स्थित है। इअसके अलावा कानपुर, प्रयागराज, आगरा, झांसी, बरेली, ग़ाज़ियाबाद, गोरखपुर, सहारनपुर और रायबरेली शहरों में घरेलु हवाई अड्डे हैं।

उत्तर प्रदेश हिन्दुओं की प्राचीन सभ्यता का उदगम स्थल है। वैदिक साहित्य मन्त्र, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रौं, आदि महाकाव्य-वाल्मीकिरामायण, और महाभारत (जिसमें श्रीमद् भगवद्गीता शामिल है) अष्टादश पुराणौंके उल्लेखनीय हिस्सों का मूल यहाँ के कई आश्रमों में जीवन्त है। बौद्ध-हिन्दू काल (लगभग 600 ई. पू.-1200 ई.) के ग्रन्थों व वास्तुशिल्प ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत में बड़ा योगदान दिया है। 1947 के बाद से भारत सरकार का चिह्न मौर्य सम्राट अशोक के द्वारा बनवाए गए चार सिंह युक्त स्तम्भ (वाराणसी के निकट सारनाथ में स्थित) पर आधारित है। वास्तुशिल्प, चित्रकारी, संगीत, नृत्यकला और दो भाषाएँ (हिन्दी व उर्दू) मुग़ल काल के दौरान यहाँ पर फली-फूली। इस काल के चित्रों में सामान्यतः धार्मिक व ऐतिहासिक ग्रन्थों का चित्रण है। यद्यपि साहित्य व संगीत का उल्लेख प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में किया गया है और माना जाता है कि गुप्त काल (लगभग 320-540) में संगीत समृद्ध हुआ। संगीत परम्परा का अधिकांश हिस्सा इस काल के दौरान उत्तर प्रदेश में विकसित हुआ। तानसेन व बैजू बावरा जैसे संगीतज्ञ मुग़ल शहंशाह अकबर के दरबार में थे, जो राज्य व समूचे देश में आज भी विख्यात हैं। भारतीय संगीत के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध वाद्य सितार (वीणा परिवार का तंतु वाद्य) और तबले का विकास इसी काल के दौरान इस क्षेत्र में हुआ। 18वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश में वृन्दावन व मथुरा के मन्दिरों में भक्तिपूर्ण नृत्य के तौर पर विकसित शास्त्रीय नृत्य शैली कथक उत्तरी भारत की शास्त्रीय नृत्य शैलियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय गीत व नृत्य भी हैं। सबसे प्रसिद्ध लोकगीत मौसमों पर आधारित हैं।

हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। साहित्य और भारतीय रक्षा सेवायेँ, दो ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें उत्तर प्रदेश निवासी गर्व कर सकते हैं। गोस्वामी तुलसीदास, कबीरदास, सूरदास से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य राम चन्द्र शुक्ल, मुँशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानन्दन पन्त, मैथलीशरण गुप्त, सोहन लाल द्विवेदी, हरिवंशराय बच्चन, महादेवी वर्मा, राही मासूम रजा,  हजारी प्रसाद द्विवेदी,  अज्ञेय जैसे इतने महान कवि और लेखक हुए हैं उत्तर प्रदेश में कि पूरा पन्ना ही भर जाये। 
उर्दू साहित्य में भी बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है उत्तर प्रदेश का। फिराक़, जोश मलीहाबादी, अकबर इलाहाबादी, नज़ीर, वसीम बरेलवी,अनवर फर्रुखाबादी, चकबस्त जैसे अनगिनत शायर उत्तर प्रदेश ही नहीं वरन देश की शान रहे हैं। हिंदी साहित्य का क्षेत्र बहुत ही व्यापक रहा है और लुगदी साहित्य भी यहाँ खूब पढ़ा जाता है।

संगीत उत्तर प्रदेश के व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह तीन प्रकार में बांटा जा सकता है

१- पारंपरिक संगीत एवं लोक संगीत : यह संगीत और गीत पारंपरिक मौकों शादी विवाह, होली, त्योहारों आदि समय पर गाया जाता है
२- शास्त्रीय संगीत : उत्तर प्रदेश में उत्कृष्ट गायन और वादन की परंपरा रही है।
३- हिंदी फ़िल्मी संगीत एवं भोजपुरी पॉप संगीत साथ ही हरयाणवी गीत(पश्चिमी क्षेत्र हरियाणा से लगने के कारण बोली खड़ी है जिसमें मुख्यतः शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ है)

कथक उत्तर प्रदेश का एक परिष्कृत शास्त्रीय नृत्य है जो कि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ किया जाता है। कथक नाम 'कथा' शब्द से बना है, इस नृत्य में नर्तक किसी कहानी या संवाद को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करता है। कथक नृत्य का प्रारम्भ ६-७वीं शताब्दी में उत्तर भारत में हुआ था। प्राचीन समय में यह एक धार्मिक नृत्य हुआ करता था जिसमें नर्तक महाकाव्य गाते थे और अभिनय करते थे। १३वीं शताब्दी तक आते-आते कथक सौन्दर्यपरक हो गया तथा नृत्य में सूक्ष्म अभिनय एवं मुद्राओं पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। कथक में सूक्ष्म मुद्राओं के साथ ठुमरी गायन पर तबले और पखावज के साथ ताल मिलाते हुए नृत्य किया जाता है। कथक नृत्य के प्रमुख कलाकार पन्डित बिरजू महाराज हैं। फरी नृत्य, जांघिया नृत्य, पंवरिया नृत्य, कहरवा,पसियावा नृत्य, जोगिरा, निर्गुन, कजरी, सोहर, चइता गायन उत्तर प्रदेश की लोकसंस्कृतियां हैं। लोकरंग सांस्कृतिक समिति इन संस्कृतियों संवर्द्धन, संरक्षण के लिए कार्यरत है।

अलीगढ़ का ताला, फिरोजाबाद की चूड़ियाँ, सहारनपुर का काष्ठ शिल्प, पिलखुवा की हैण्ड ब्लाक प्रिंट की चादरें, वाराणसी की साड़ियाँ तथा रेशम व ज़री का काम, लखनऊ का कपड़ों पर चिकन की कढ़ाई का काम, रामपुर का पैचवर्क, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन औरंगाबाद का टेराकोटा, मेरठ की कैंची अलीगढ़ का ताला (लॉक)आदि प्रशिध्द हैं।

उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहाँ समय समय पर सभी धर्मों के त्योहार मनाये जाते हैं-

उत्तर प्रदेश में सभी के लिए आकर्षण की कई चीज़ें हैं।

सीता समाहित स्थल (सीतामढ़ी) मंदिर संत रविदास नगर जिला में स्थित है। यह मंदिर इलाहबाद और वाराणसी के मध्य स्थित जंगीगंज बाज़ार से ११ किलोमीटर दूर गंगा के किनारे स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर माँ सीता से अपने आप को धरती में समाहित कर लिया था। यहाँ पर हनुमानजी की ११० फीट ऊँची मूर्ति है जिसे विश्व की सबसे बड़ी हनुमान जी की मूर्ति होने का गौरव प्राप्त है। स्वामी जितेंद्रानंद जी के असीम प्रयास से और श्री प्रकाश नारायण पुंज की मदद से ये स्थान पर्यटक स्थल के रूप में उभर कर आया है।

जिला मुज़फ्फरनगर में शुक्रताल नामक एक जगह है जिसे हिन्दुओ की धर्मस्थल के रूप में देखा जाता है। शुक्रताल में मुख्यतः रविदास आश्रम और सुक देव आश्रम प्रसिद्ध है। गंगा स्नान पर यहाँ एक बड़े मेले का आयोजन प्रति वर्ष होता है।




#Article 43: केरल (2764 words)


केरल (मलयालम: കേരളം, केरळम्) भारत का एक प्रान्त है। इसकी राजधानी तिरुवनन्तपुरम (त्रिवेन्द्रम) है। मलयालम (മലയാളം, मलयाळम्) यहां की मुख्य भाषा है। हिन्दुओं तथा मुसलमानों के अलावा यहां ईसाई भी बड़ी संख्या में रहते हैं। भारत की दक्षिण-पश्चिमी सीमा पर अरब सागर और सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य एक खूबसूरत भूभाग स्थित है, जिसे केरल के नाम से जाना जाता है। इस राज्य का क्षेत्रफल 38863 वर्ग किलोमीटर है और यहाँ मलयालम भाषा बोली जाती है। अपनी संस्कृति और भाषा-वैशिष्ट्य के कारण पहचाने जाने वाले भारत के दक्षिण में स्थित चार राज्यों में केरल प्रमुख स्थान रखता है। इसके प्रमुख पड़ोसी राज्य तमिलनाडु और कर्नाटक हैं। पुदुच्चेरी (पांडिचेरि) राज्य का मय्यष़ि (माहि) नाम से जाता जाने वाला भूभाग भी केरल राज्य के अन्तर्गत स्थित है। अरब सागर में स्थित केन्द्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप का भी भाषा और संस्कृति की दृष्टि से केरल के साथ अटूट संबन्ध है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व केरल में राजाओं की रियासतें थीं। जुलाई 1949 में तिरुवितांकूर और कोच्चिन रियासतों को जोड़कर 'तिरुकोच्चि' राज्य का गठन किया गया। उस समय मलाबार प्रदेश मद्रास राज्य (वर्तमान तमिलनाडु) का एक जिला मात्र था। नवंबर 1956 में तिरुकोच्चि के साथ मलाबार को भी जोड़ा गया और इस तरह वर्तमान केरल की स्थापना हुई। इस प्रकार 'ऐक्य केरलम' के गठन के द्वारा इस भूभाग की जनता की दीर्घकालीन अभिलाषा पूर्ण हुई।

पौराणिक कथाओं के अनुसार परशुराम ने अपना परशु समुद्र में फेंका जिसकी वजह से उस आकार की भूमि समुद्र से बाहर निकली और केरल अस्तित्व में आया। यहां 10वीं सदी ईसा पूर्व से मानव बसाव के प्रमाण मिले हैं।

केरल शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में एकमत नहीं है। कहा जाता है कि चेर - स्थल, 'कीचड़' और अलम-प्रदेश शब्दों के योग से चेरलम बना था, जो बाद में केरल बन गया। केरल शब्द का एक और अर्थ है : - वह भूभाग जो समुद्र से निकला हो। समुद्र और पर्वत के संगम स्थान को भी केरल कहा जाता है। प्राचीन विदेशी यायावरों ने इस स्थल को 'मलबार' नाम से भी सम्बोधित किया है। काफी लबे अरसे तक यह भूभाग चेरा राजाओं के आधीन था एवं इस कारण भी चेरलम (चेरा का राज्य) और फिर केरलम नाम पड़ा होगा।

केरल की संस्कृति हज़ारों साल पुरानी है। इसके इतिहास का प्रथम काल 1000 ईं. पूर्व से 300 ईस्वी तक माना जाता है। अधिकतर महाप्रस्तर युगीन स्मारिकाएँ पहाड़ी क्षेत्रों से प्राप्त हुई। अतः यह सिद्ध होता है कि केरल में अतिप्राचीन काल से मानव का वास था। केरल में आवास केन्द्रों के विकास का दूसरा चरण संगमकाल माना जाता है। यही प्राचीन तमिल साहित्य के निर्माण का काल है। संगमकाल सन् 300 ई. से 800 ई तक रहा। प्राचीन केरल को इतिहासकार तमिल भूभाग का अंग समझते थे। सुविधा की दृष्टि से केरल के इतिहास को प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक कालीन - तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं।

विज्ञापनों में केरल को 'ईश्वर का अपना घर' (God's Own Country) कहा जाता है, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। जिन कारणों से केरल विश्व भर में पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बना है, वे हैं : समशीतोष्ण मौसम, समृद्ध वर्षा, सुंदर प्रकृति, जल की प्रचुरता, सघन वन, लम्बे समुद्र तट और चालीस से अधिक नदियाँ। भौगोलिक दृष्टि से केरल उत्तर अक्षांश 8 डिग्री 17' 30 और 12 डिग्री 47' 40 के बीच तथा पूर्व देशांतर 74 डिग्री 7' 47 और 77 डिग्री 37' 12 के बीच स्थित है।

भौगोलिक प्रकृति के आधार पर केरल को अनेक क्षेत्रों में विभक्त किया जाता है। सर्वप्रचलित विभाज्य प्रदेश हैं, पर्वतीय क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, समुद्री क्षेत्र आदि। अधिक स्पष्टता की दृष्टि से इस प्रकार विभाजन किया गया है - पूर्वी मलनाड (Eastern Highland), अडिवारम (तराई - Foot Hill Zone), ऊँचा पहाडी क्षेत्र (Hilly Uplands), पालक्काड दर्रा, तृश्शूर-कांजगाड समतल, एरणाकुलम - तिरुवनन्तपुरम रोलिंग समतल और पश्चिमी तटीय समतल। यहाँ की भौगोलिक प्रकृति में पहाड़ और समतल दोनों का समावेश है।

केरल को जल समृद्ध बनाने वाली 41 नदियाँ पश्चिमी दिशा में स्थित समुद्र अथवा झीलों में जा मिलती हैं। इनके अतिरिक्त पूर्वी दिशा की ओर बहने वाली तीन नदियाँ, अनेक झीलें और नहरें हैं।

भूमध्यरेखा से केवल 8 डिग्री की दूरी पर स्थित होने के कारण केरल में गर्म मौसम है। लेकिन वन एवं पेड़ पौधों एवं वर्षा की अधिकता के कारण  मौसम समशीतोष्ण रहता है। यहाँ की धरती की उच्च-निम्न स्थिति भी जलवायु पर बड़ा प्रभाव डालती है। केरल की जलवायु की विशेषता है शीतल मन्द हवा और भारी वर्षा। प्रमुख वर्षाकाल इडवप्पाति अथवा पश्चिमी मानसून है। दूसरा वर्षाकाल तुलावर्षम अथवा उत्तरी-पश्चिमी मानसून है। प्रत्येक वर्ष करीब 120 से लेकर 140 दिन वर्षा होती है। औसत वार्षिक वर्षा 3017 मिली मीटर मानी जाती है। भारी वर्षा से बाढ़ें आती हैं और जन-धन की हानि भी होती है। दूसरी ओर ऐसी वर्षा के कारण केरल में पर्याप्त कृषि होती है। बिजली का मुख्य उत्पादन भी इस कारण से पनबिजली द्वारा होता है।

भारत के एक राज्य के रूप में केरल की आर्थिक व्यवस्था की अपनी विशेषताएँ हैं। मानव संसाधन विकास की आधारभूत सूचना के अनुसार केरल की उपलब्धियाँ प्रशंसनीय है। मानव संसाधन विकास के बुनियादी तत्त्वों में उल्लेखनीय हैं - भारत के अन्य राज्यों की तुलना में आबादी की कम वृद्धि दर, राष्ट्रीय औसत सघनता से ऊँची दर, ऊँची आयु-दर, गंभीर स्वास्थ्य चेतना, कम शिशु मृत्यु दर, ऊँची साक्षरता, प्राथमिक शिक्षा की सार्वजनिकता, उच्च शिक्षा की सुविधा आदि आर्थिक प्रगति के अनुकूल हैं।

वैश्वीकरण के प्रतिकूल प्रभाव ने कृषि तथा अन्य परम्परागत क्षेत्रों को बहुत कम कर दिया है। स्वातंत्र्य पूर्व तिरुवितांकूर, कोच्चि, मलबार क्षेत्रों का विकास आधुनिक केरल की आर्थिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि है। भौगोलिक एवं प्राकृतिक विशेषताएँ केरल की आर्थिक व्यवस्था को प्राकृतिक संपदा के वैविध्य के साथ श्रम संबन्धी वैविध्य भी प्रदान करती हैं। केरल में कृषि खाद्यान्न और निर्यात की जानेवाली फसलों के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। शासन व्यवस्था तथा व्यापार के कारण निर्यात की जानेवाली फसलों बढ़ोतरी हुई है। कयर (नारियल रेशा) उद्योग, लकडी उद्योग, खाद्य तेल उत्पादन आदि भी कृषि पर आधारित हैं

आधुनिक केरल की आर्थिक व्यवस्था में आप्रवासी केरलीयों का मुख्य योगदान है। केरल की आर्थिक व्यवस्था के सुदृढ आधार हैं - वाणिज्य बैंक, सहकारी बैंक, मुद्रा विनिमय व्यवस्था, यातायात का विकास, शिक्षा - स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में हुई प्रगति, शक्तिशाली श्रमिक आन्दोलन, सहकारी आन्दोलन आदि।

केरलीय जीवन की छवि यहाँ मनाये जाने वाले उत्सवों में दिखाई देती है। केरल में अनेक उत्सव मनाये जाते हैं जो सामाजिक मेल-मिलाप और आदान-प्रदान की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। केरलीय कलाओं का विकास यहाँ मनाये जाने वाले उत्सवों पर आधारित है। इन उत्सवों में कई का संबन्ध देवालयों से है, अर्थात् ये धर्माश्रित हैं तो अन्य कई उत्सव धर्मनिरपेक्ष हैं। ओणम केरल का राज्योत्सव है। यहाँ मनाये जाने वाले प्रमुख हिन्दू त्योहार हैं - विषु, नवरात्रि, दीपावली, शिवरात्रि, तिरुवातिरा आदि। मुसलमान रमज़ान, बकरीद, मुहरम, मिलाद-ए-शरीफ आदि मनाते हैं तो ईसाई क्रिसमस, ईस्टर आदि। इसके अतिरिक्त हिन्दू, मुस्लिम और ईसाइयों के देवालयों में भी विभिन्न प्रकार के उत्सव भी मनाये जाते हैं।

केरल की कला-सांस्कृतिक परंपराएँ सदियों पुरानी हैं। केरल के सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कलारूपों में लोककलाओं, अनुष्ठान कलाओं और मंदिर कलाओं से लेकर आधुनिक कलारूपों तक की भूमिका उल्लेखनीय है। केरलीय कलाओं को सामान्यतः दो वर्गों में बाँट सकते हैं - एक दृश्य कला और दूसरी श्रव्य कला। दृश्य कला के अंतर्गत रंगकलाएँ, अनुष्ठान कलाएँ, चित्रकला और सिनेमा आते हैं।

केरल में क्रीड़ा संस्कार कई शताब्दियाँ पहले रूपायित हुआ था। केरल के क्रीडा जगत के क्षेत्र में लोक क्रीडाएँ, आयोधन कलाएँ, आधुनिक क्रीडाएँ सब एक साथ विद्यमान हैं। 'कळरिप्पयट्टु' केरल की प्रान्तीय आयुधन कला है। पहले केरलीय गाँवों में खेल-कूद को विशिष्ट महत्व दिया जाता था किन्तु आधुनिक जीवन शैली तथा आधुनिक खेलों के चलते लोक क्रीडाएँ लुप्तप्राय हो गई हैं। लेकिन आज भी देशी मनोरंजन नौका विहार को महत्व दिया जाता है।

फुटबॉल, वॉलीबॉल, एथलेटिक्स इत्यादि आधुनिक खेल कूदों में केरल की भारत पर प्रभुता है। भारत की सबसे बड़ी धावक पी.टी. उषा केरल की सुपुत्री है।

केरल प्रांत पर्यटकों में बेहद लोकप्रिय है, इसीलिए इसे 'God's Own Country' अर्थात् 'ईश्वर का अपना घर' नाम से पुकारा जाता है। यहाँ अनेक प्रकार के दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें प्रमुख हैं - पर्वतीय तराइयाँ, समुद्र तटीय क्षेत्र, अरण्य क्षेत्र, तीर्थाटन केन्द्र आदि। इन स्थानों पर देश-विदेश से असंख्य पर्यटक भ्रमणार्थ आते हैं। मून्नार, नेल्लियांपति, पोन्मुटि आदि पर्वतीय क्षेत्र, कोवलम, वर्कला, चेरायि आदि समुद्र तट, पेरियार, इरविकुळम आदि वन्य पशु केन्द्र, कोल्लम, अलप्पुष़ा, कोट्टयम, एरणाकुळम आदि झील प्रधान क्षेत्र (backwaters region) आदि पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण केन्द्र हैं। भारतीय चिकित्सा पद्धति - आयुर्वेद का भी पर्यटन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है। राज्य की आर्थिक व्यवस्था में भी पर्यटन ने निर्णयात्मक भूमिका निभाई है।

केरल की भाषा मलयालम है जो द्रविड़ परिवार की भाषाओं में एक है। मलयालम भाषा के उद्गम के बारे में अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत किए गए हैं। एक मत यह है कि भौगोलिक कारणों से किसी आदि द्रविड़ भाषा से मलयालम एक स्वतंत्र भाषा के रूप में विकसित हुई। इसके विपरीत दूसरा मत यह है कि मलयालम तमिल से व्युत्पन्न भाषा है। ये दोनों प्रबल मत हैं। सभी विद्वान यह मानते हैं कि भाषाई परिवर्तन की वजह से मलयालम उद्भूत हुई। तमिल, संस्कृत दोनों भाषाओं के साथ मलयालम का गहरा सम्बन्ध है। मलयालम का साहित्य मौखिक रूप में शताब्दियाँ पुराना है। परंतु साहित्यिक भाषा के रूप में उसका विकास 13 वीं शताब्दी से ही हुआ था। इस काल में लिखित 'रामचरितम्' को मलयालम का आदि काव्य माना जाता है।

मलयालम का साहित्य आठ शताब्दियों से अधिक पुराना है। किन्तु आज तक ऐसा कोई ग्रंथ प्राप्त नहीं हुआ है जो यहाँ के साहित्य की प्रारंभिक दशा पर प्रकाश डालता हो। अतः मलयालम साहित्यिक उद्गम से सम्बन्धित कोई स्पष्ट धारणा नहीं मिलती है। अनुमान है कि प्रारम्भिक काल में लोक साहित्य का प्रचलन रहा होगा। ऐसी कोई रचना उपलब्ध नहीं जिसकी रचना 1000 वर्ष पहले की गई है। दसवीं सदी के उपरान्त लिखे गए अनेक ग्रंथों की प्रामाणिकता को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं हैं। केरलीय साहित्य से सामान्यतः मलयालम साहित्य अर्थ लिया जाता है। लेकिन मलयालम साहित्यकारों का तमिल और संस्कृत भाषा विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। केरल के कुछ विद्वानों ने अंग्रेज़ी, कन्नड़, तुळु, कोंकणी, हिन्दी आदि भाषाओं में भी रचना लिखी हैं।

केरल के अधिकांश लोगों की मातृभाषा मलयालम है, जो द्रविड़ परिवार की प्रमुख भाषा है। यहाँ आर्य, अरबी, यहूदी तथा मिश्रित वंश के लोग भी रहते हैं। दूसरा प्रमुख वर्ग आदिवासियों का है। ये सभी वर्ग मिलकर आधुनिक केरलीय समाज का निर्माण करते हैं। एक राज्य के रूप में केरल की स्थापना 1961 से ही हुई। किन्तु वर्तमान केरल के अन्तर्गत जितने प्रदेश हैं उन प्रदेशों की जनगणना 1881 में ही तैयार हो पाई। प्रमाणों के आधार पर यह विश्वास किया जाता है कि 17 वीं सदी के प्रारंभ में केरल की जनसंख्या लगभग 30 लाख थी। 1850 में यह 45 लाख हो गई। 1881 से जनसंख्या लगातार बढ़ती रही। 1901 में जनसंख्या 64 लाख थी जो 1991 में 291 लाख हो गई। (6) 2001 की जनगणना के अनुसार केरल की जनसंख्या 31841374 है।

केरल के प्रमुख धर्म हैं हिन्दू, ईसाई एवं इस्लाम धर्म। बौद्ध, जैन, पारसी, सिक्ख, बहाई धर्मावलम्बी लोग भी यहाँ रहते हैं। हिन्दू समाज विविध जातियों से बना है। ईस्वी सन् 8 वीं सदी से केरल में जाति-व्यवस्था प्रचलित हुई थी। अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति तक विभिन्न श्रेणी के लोगों को जाति - व्यवस्था के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया। जाति व्यवस्था के कारण समाज में ऊँच - नीच की भावना तथा सामाजिक कुरीतियाँ प्रचलित हो गईं। 19 वीं शताब्दी के अंत में चलने वाले सामाजिक नवोत्थान अभियानों ने 20 वीं शताब्दी में तथा तत्पश्चात् स्वतंत्रता संग्राम में जाति व्यवस्था को किसी सीमा तक तोड़ा। वर्तमान केरलीय समाज में यद्यपि ऊँच - नीच का भेदभावना नहीं है, लेकिन जाति - व्यवस्था मौजूद है।

विभिन्न धर्मावलम्बी लोगों के देवालयों तथा उनके धार्मिक आचार - अनुष्ठानों ने केरलीय संस्कृति को पुष्ट किया है। साहित्य और कला के विकास में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण है। मन्दिरों से जुड़े उत्सवों ने केरलीय संस्कृति की शोभा बढ़ायी है।

केरल को भारत की राजनीतिक प्रयोगशाला कहा जा सकता है। चुनाव के द्वारा कम्यूनिस्ट पार्टी का सत्ता में आना और विभिन्न पार्टियों के मोर्चों का गठन तथा उनका शासक बनना आदि अनेक राजनीतिक प्रयोग पहली बार केरल में हुए। देश में मशीनी मतपेटी का प्रथम प्रयोग भी केरल में हुआ। केरल में 140 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र और 20 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र हैं। विधानसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक प्रतिनिधि को नामित किया जाता है। केरल में अनेक राजनीतिक दल तथा उनके संपोषक संगठन भी हैं। यथा- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जनता दल (सेक्युलर), मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस (एम), केरल कॉग्रेस (जे) आदि। सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के श्रमिक, विद्यार्थी, महिला, युवा, कृषक और सेवा संगठन भी सक्रिय हैं। ट्रेड यूनियनों की संख्या आवश्यकता से अधिक बढ़ रही है। 1973 में केरल की पंजीकृत ट्रेड यूनियनों की संख्या 1680 थी। यह 1996 में 10326 हो गई। यहाँ सरकारी नौकरी में रत 3000 लोगों के लिए एक ट्रेड यूनियन बनाई गई है।

केरल राज्य के आविर्भाव के बाद राज्य में 13 बार चुनाव हुए। बीस मत्रिमंण्डल तथा 12 मुख्यमंत्री हुए हैं। 5 अप्रैल 1957 को ई. एम. एस. नंपूतिरिप्पाड के नेतृत्व में प्रथम मंत्रिमण्डल सत्ता में आया। वर्तमान मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानन्दन ने 18 मई 2006 को शासन संभाला।

केरल के पास विज्ञान और प्रौद्योगिकी की समृद्ध परंपरा है। गणित, ज्योतिषी, ज्योतिष, आयुर्वेद, वास्तुकला, धातु विज्ञान आदि क्षेत्रों में केरलीयों ने उल्लेखनीय योगदान किया है। आधुनिक भारत के वैज्ञानिक क्षेत्र में केरल की उपस्थिति उल्लेखनीय है। वैज्ञानिक तकनीकी क्षेत्रों में भी केरल बहुत आगे है। केरल के अनेक वैज्ञानिक विदेशों में कार्यरत हैं। पुराने काल में ज्योतिष, मंत्र-तंत्र आदि विज्ञान के रूप में विकसित हुए थे। मलयालम का वैज्ञानिक साहित्य भी अत्यंत समृद्ध है।

भारतीय परम्परा के अनुरूप केरल में भी गणित, ज्योतिषी और ज्योतिष का विकास परस्पर सम्बद्ध था। गणित के क्षेत्र में प्राचीन केरल का योगदान विश्व प्रसिद्ध है। समकालीन गणितज्ञों द्वारा प्रयुक्त 'केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स' शब्द इसका प्रमाण है। केरलीय गणित एवं ज्योतिषी का विकास आर्यभट की रचना 'आर्यभटीय' के आधार पर हुआ है और आर्यभट को कतिपय विद्वान केरलीय मानते हैं। केरलीय गणित एवं ज्योतिषी के विकास के परिणाम स्वरूप बनी प्रमुख पद्धतियाँ हैं ईस्वी सन् 7 वीं शती में हरिदत्त द्वारा आविष्कृत 'परहितम्' तथा ईस्वी सन् 15 वीं शती में वडश्शेरी परमेश्वरन द्वारा आविष्कृत 'दृगणितम्'।

प्राचीन केरलीय गणितज्ञों की सूची लम्बी है। उनमें से अनेक कृतियाँ ताड़पत्रों में आज भी उपलब्ध हैं। गणित के क्षेत्र में सर्वाधिक प्रसिद्ध नाम हैं - वररुचि प्रथम, वररुचि द्वितीय, हरिदत्तन, गोविन्दस्वामी, शंकरनारायणन, विद्यामाधवन, तलक्कुलम गोविन्द भट्टतिरि, संगम ग्राम माधवन, वडश्शेरी परमेश्वरन, नीलकंठ सोमयाजी, शंकर वारियर, ज्येष्ठ देवन, मात्तूर नंपूतिरिमार, महिषमंगलम शंकरन, तृक्कण्डियूर अच्युतप्पिषारडी, पुतुमना पोमातिरि (पुतुमना सोमयाजी), कोच्चु कृष्णनाशान, मेलपुत्तूर नारायण भट्टतिरि आदि। आधुनिक गणित का इतिहास यह मानता है कि कलन (Calculus) का आविष्कारक आइज़ेक न्यूटन और लैबनीज़ न होकर केरल के गणित वैज्ञानिक हैं।

आयुर्वेद दो हज़ार वर्ष पुरानी भारतीय चिकित्सा-पद्धति है। इस पद्धति का विकास स्वास्थ्य, जीवन-शैली एवं चिकित्सा की दृष्टि से हुआ था। इसमें जीवन के समस्त अंगों का अध्ययन तथा परिशीलन निहित है। केरलीय आयुर्वेद परम्परा अत्यन्त प्राचीन एवं समृद्ध है। यही कारण है कि विश्व भर में केरल अपनी आयुर्वेदिक चिकित्सा शैली के कारण प्रसिद्ध है। लेकिन आयुर्वेद मात्र रोग की चिकित्सा तक सीमित नहीं है यह एक विशिष्ट जीवन दर्शन को स्थापित करता है।

केरल की आयुर्वेद परंपरा अत्यंत प्राचीन है। यह आज भी विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। पर्यटन के क्षेत्र में भी आयुर्वेद पर आधारित पर्यटन (Health Tourism) केरल की विशेषता है। 'पंचकर्म चिकित्सा' जो कि पुनर्यौवन चिकित्सा कहलाती है, इसकेलिए सैकड़ों विदेशी पर्यटक प्रतिवर्ष केरल आते हैं। केरलीय वैद्य परम्परा में परम्परागत आयुर्वेद विद्यालयों के स्तानकों से लेकर परिवारिक परम्परा वाले देशज वैद्य शामिल है। यहाँ एक ऐसा परिवारिक परम्परा वाला वैद्यपरिवार बड़ा प्रसिद्ध है जिसे अष्टवैद्य के नाम से पुकारा जाता है।

केरल की आयुर्वेद चिकित्सा परंपरा सदियों से चलती चली आ रही है। केरलीय आयुर्वेद का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ हैं वाग्भट का 'अष्टांगह्रदयम्' और 'अष्टांगसंग्रहम्'। केरलीय वैद्यों ने भी अनेक आयुर्वेद ग्रन्थ रचे हैं। 
देखें - 

आधुनिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ नवीन वैज्ञानिक क्षेत्रों में भी केरलीयों ने विशेष योग्यता प्राप्त की। विज्ञान की विविध शाखाओं में केरल के अनेक प्रसिद्ध वैज्ञानिक हुए हैं। जैसे कि - के. आर. रामनाथन, सी. आर. पिषारडी, आर. एस. कृष्णन, जी. एन. रामचन्द्रन, गोपीनाथ कर्ता, यू. एस. नायर, के. आर. नायर, ई. सी. जी. सुदर्शन, एम. एम. मत्तायि, के. आई. वर्गीस, एम. एस. स्वामीनाथन, ताणु पद्मनाभन, पी. के. अय्यंगार, एम. जी. रामदास मेनन, के. के. नायर, एन. के. पणिक्कर, एन. बालकृष्णन नायर, के. के. नायर, के. जी. अडियोडी, जी. माधवन नायर आदि लब्ध प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की सूची बहुत लम्बी है।

आधुनिक विज्ञान के विकास में योग देने वाली संस्थाएँ हैं विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक - प्रौद्योगिकी विद्यालय, वैज्ञानिक अनुसंधान प्रतिष्ठान आदि। 'केरल शास्त्र साहित्य परिषद' जैसी वैज्ञानिक संस्थाएँ भी जनता में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक बनी हैं।

केरल में 14 जिले हैं:




#Article 44: गुजरात (3067 words)


गुजरात (गुजराती:ગુજરાત)() पश्चिमी भारत में स्थित एक राज्य है। इसकी उत्तरी-पश्चिमी सीमा जो अन्तर्राष्ट्रीय सीमा भी है, पाकिस्तान से लगी है। राजस्थान और मध्य प्रदेश इसके क्रमशः उत्तर एवं उत्तर-पूर्व में स्थित राज्य हैं। महाराष्ट्र इसके दक्षिण में है। अरब सागर इसकी पश्चिमी-दक्षिणी सीमा बनाता है। इसकी दक्षिणी सीमा पर दादर एवं नगर-हवेली हैं। इस राज्य की राजधानी गांधीनगर है। गांधीनगर, राज्य के प्रमुख व्यवसायिक केन्द्र अहमदाबाद के समीप स्थित है। गुजरात का क्षेत्रफल १,९६,०२४ किलोमीटर है।

गुजरात, भारत का एक राज्य है। कच्छ, सौराष्ट्र, काठियावाड, हालार, पांचाल, गोहिलवाड, झालावाड और गुजरात उसके प्रादेशिक सांस्कृतिक अंग हैं। इनकी लोक संस्कृति और साहित्य का अनुबन्ध राजस्थान, सिंध और पंजाब, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के साथ है। विशाल सागर तट वाले इस राज्य में इतिहास युग के आरम्भ होने से पूर्व ही अनेक विदेशी जातियाँ थल और समुद्र मार्ग से आकर स्थायी रूप से बसी हुई हैं। इसके उपरांत गुजरात में अट्ठाइस आदिवासी जातियां हैं। जन-समाज के ऐसे वैविध्य के कारण इस प्रदेश को भाँति-भाँति की लोक संस्कृतियों का लाभ मिला है।

गुजरात नाम, गुर्जरत्रा से आया है। गुर्जरों का साम्राज्य ६ठीं से १२वीं सदी तक गुर्जरत्रा के नाम से जाना जाता था। गुर्जरों द्वारा रक्षित भूमि को
गुर्जरत्रा कहा गया हैं।  प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जर प्रतिहार का सम्बन्ध सूर्यवंश या रघुवंश से बताया है। कुछ विद्वान इन्हे मध्य-एशिया से आये आर्य भी बताते है।

गुजरात का इतिहास पाषाण युग के बस्तियों के साथ शुरू हुआ, इसके बाद चोलकोथिक और कांस्य युग के बस्तियों जैसे सिंधु घाटी सभ्यता। गुजरात का इतिहास ईसवी पूर्व लगभग २,००० वर्ष पुराना है। माना जाता है कि कृष्‍ण मथुरा छोड़कर सौराष्‍ट्र के पश्चिमी तट पर जा बसे, जो द्वारिका यानी प्रवेशद्वार कहलाया। बाद के वर्षो में मौर्य, गुप्त, गुर्जर प्रतिहार तथा अन्‍य अनेक राजवंशों ने इस प्रदेश पर राज किया। चालुक्य राजवंश अर्थात सोलंकी गुर्जरो का शासनकाल गुजरात में प्रगति और समृद्ध का युग था। महमूद गजनवी की लूटपाट के बावजूद चालुक्य राजवंशो ने यहां के लोगों की समृद्धि और भलाई का पूरा ध्‍यान रखा।

स्वतन्त्रता से पहले गुजरात का वर्तमान क्षेत्र मुख्‍य रूप से दो भागों में विभक्त था- एक ब्रिटिश क्षेत्र और दूसरा देसी रियासतें। राज्‍यों के पुनर्गठन के कारण सौराष्‍ट्र के राज्‍यों और कच्‍छ के केन्द्र शासित प्रदेश के साथ पूर्व ब्रिटिश गुजरात को मिलाकर द्विभाषी बम्बई राज्‍य का गठन हुआ। १ मई १९६० को वर्तमान गुजरात राज्‍य अस्तित्‍व में आया। गुजरात भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है। इसके पश्चिम में अरब सागर, उत्तर में पाकिस्‍तान तथा उत्तर-पूर्व में राजस्‍थान, दक्षिण-पूर्व में मध्‍यप्रदेश और दक्षिण में महाराष्‍ट्र है। राज्य का भौगोलिक क्षेत्रफल 1,96,024 वर्ग किमी है।

गुजरात कपास, तम्बाकू और मूँगफली का उत्‍पादन करने वाला देश का प्रमुख राज्‍य है तथा यह कपड़ा, तेल और साबुन जैसे महत्‍वपूर्ण उद्योगों के लिए कच्‍चा माल उपलब्‍ध कराता है। यहाँ की अन्‍य महत्‍वपूर्ण नकदी फसलें हैं - इसबगोल, धान, गेहूँ और बाजरा। गुजरात के वनों में उपलबध वृक्षों की जातियाँ हैं-सागवान, खैर, हलदरियो, सादाद और बाँस।

राज्‍य में औद्योगिक ढाँचे में धीरे-धीरे विविधता आती जा रही है और यहाँ रसायन, पेट्रो-रसायन, उर्वरक, इंजीनियरिंग, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स आदि उद्योगों का विकास हो रहा है। २००४ के अन्त में राज्‍य में पंजीकृत चालू फैक्‍टरियों की संख्‍या २१,५३६ (अस्‍थाई) थी जिनमें औसतन ९.२७ लाख दैनिक श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ था। मार्च, २००५ तक राज्‍य में २.९९ लाख लघु औद्योगिक इकाइयों का पंजीकरण हो चुका था। गुजरात औद्योगिक विकास निगम को ढाँचागत सुविधाओ के साथ औद्योगिक सम्पदाओं के वि‍कास की भूमिका सौंपी गई है। दिसंबर, २००५ तक गुजरात औद्योगिक विकास निगम ने २३७ औद्योगिक सम्पदाएँ स्‍थापित की थी।

राज्‍य में भूतलीय जल तथा भूमिगत जल द्वारा कुल सिंचाई क्षमता ६४.४८ लाख हेक्‍टेयर आंकी गई है जिसमें सरदार सरोवर (नर्मदा) परियोजना की १७.९२ लाख हेक्‍टेयर क्षमता भी सम्मिलित है। राज्‍य में जून २००५ तक कुल सिंचाई क्षमता ४०.३४ लाख हेक्‍टेयर क्षमता भी सम्मिलित है। राज्‍य में जून २००७ तक कुल सिंचाई क्षमता ४२.२६ लाख हेक्‍टेयर तक पहुँच गई थी। जून २००७ तक अधिकतम उपयोग क्षमता ३७.३३ लाख हेक्‍टेयर आँकी गई।

२००५-०६ के अन्त में राज्य में सड़कों की कुल लम्बाई (गैर योजना, सामुदायिक, नगरीय और परियोजना सड़कों के अतिरिक्त) लगभग ७४,०३८ किलोमीटर थी।

राज्‍य के अहमदाबाद स्थित मुख्‍य हवाई अड्डे से मुम्बई, दिल्‍ली और अन्‍य नगरों के लिए दैनिक विमान सेवा उपलब्‍ध है। अहमदाबाद हवाई अड्डे को अब अन्तरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डे का दर्जा मिल गया हैं। अन्‍य हवाई अड्डे वड़ोदरा, भावनगर, भुज, सूरत, जामनगर, काण्डला, केशोद, पोरबन्दर और राजकोट में है।

गुजरात का सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन वडोदरा जंक्शन है। यहाँ से हर रोज १५० से भी ज्यादा ट्रेन पसर होती है और भारत के लगभग हर एक कोने में जाने के लिए यहाँ से ट्रेन उपलब्ध होती है। वडोदरा के अलावा गुजरात के बड़े स्टेशनों में अहमदाबाद, सूरत, राजकोट, भुज और भावनगर का समावेश होता है। गुजरात भारतीय रेल के पश्चिम रेलवे ज़ोन में पड़ता है।

गुजरात में कुल ४० बन्दरगाह हैं। काण्डला राज्‍य का प्रमुख बन्दरगाह है। वर्ष २००४-०५ के दौरान गुजरात के मंझोले और छोटे बन्दरगाहों से कुल ९७१.२८ लाख टन माल ढोया गया जबकि काण्डला बन्दरगाह से ४१५.५१ लाख टन माल ढोया गया।

भाद्रपद्र (अगस्‍त-सितंबर) मास के शुक्‍ल पक्ष में चतुर्थी, पंचमी और षष्‍ठी के दिन तरणेतर गांव में भगवान शिव की स्‍तुति में तरणेतर मेला लगता है। भगवान कृष्‍ण द्वारा रुक्‍मणी से विवाह के उपलक्ष्‍य में चैत्र (मार्च-अप्रैल) के शुक्‍ल पक्ष की नवमी को पोरबंदर के पास माधवपूर में माधावराय मेला लगता है। उत्तरी गुजरात के बनासकांठा जिले में हर वर्ष मां अंबा को समर्पित अंबा जी मेला आयेजित किया जाता हैं। राज्‍य का सबसे बड़ा वार्षिक मेला द्वारिका और डाकोर में भगवान कृष्‍ण के जन्‍मदिवस जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर बड़े हर्षोल्‍लास से आयोजित होता है। इसके अलावा गुजरात में मकर सक्रांति, नवरात्रि, डांगी दरबार, शामलाजी मेले तथा भावनाथ मेले का भी आयोजन किया जाता हैं।

राज्‍य में द्वारका, सोमनाथ, पालीताना, पावागढ़, अंबाजी भद्रेश्‍वर, शामलाजी,बगदाणा,वीरपुर,खेरालु (सूर्यमंदिर),मोढेरा (सूर्यमंदिर) तारंगा,निष्कलंक महादेव,राजपरा (भावनगर),बहुचराजी, और गिरनार जैसे धार्मिक स्‍थलों के अलावा महात्‍मा गांधी की जन्‍मभूमि पोरबंदर तथा पुरातत्‍व और वास्‍तुकला की दृष्टि से उल्‍लेखनीय पाटन, सिद्धपुर, घुरनली, दभेई, बडनगर, मोधेरा, लोथल और अहमदाबाद जैसे स्‍थान भी हैं। अहमदपुर मांडवी, चारबाड़ उभारत और तीथल के सुंदर समुद्री तट, सतपुड़ा पर्वतीय स्‍थल, गिर वनों के शेरों का अभयारण्‍य और कच्‍छ में जंगली गधों का अभयारण्‍य भी पर्यटकों के आकर्षण का केद्र हैं। इसके अलावा गुजरात के स्थानीय व्यंजन के जायके भी गुजरात की खूबसूरती को और बढ़ाते है।

राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्यपाल गुजरात के प्रशासन का प्रमुख होता है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिमंडल राज्यपाल को उसके कामकाज में सहयोग और सलाह देता है। राज्य में एक निर्वाचित निकाय एकसदनात्मक विधानसभा है। उच्च न्यायालय राज्य की सर्वोपरि न्यायिक सत्ता है, जबकि शहरी न्यायालय, ज़िला व सत्र न्यायाधीशों के न्यायालय और प्रत्येक ज़िले में दीवानी मामलों के न्यायाधीशों के न्यायालय हैं। राज्य को 34 प्रशासनिक ज़िलों में बांटा गया है। अहमदाबाद, अमरेली, बनास कंठा, भरूच, भावनगर, डेंग, गाँधीनगर, खेड़ा, महेसाणा, पंचमहल, राजकोट, साबर कंठा, सूरत सुरेंद्रनगर, वडोदरा, महीसागर, वलसाड, नवसारी, नर्मदा, दोहद, आनंद, पाटन, जामनगर, पोरबंदर, जूनागढ़ और कच्छ, प्रत्येक ज़िले का राजस्व और सामान्य प्रशासन ज़िलाधीश की देखरेख में होता है, जो क़ानून और व्यवस्था भी बनाए रखता है। स्थानीय प्रशासन में आम लोगों को शामिल करने के लिए 1963 में पंचायत द्वारा प्रशासन की शुरुआत की गई।

स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं में मलेरिया, तपेदिक, कुष्ठ और अन्य संक्रामक रोगों के उन्मूलन के साथ-साथ पेयजल की आपूर्ति में सुधार और खाद्य सामग्री में मिलावट को रोकने के कार्यक्रम शामिल हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, अस्पतालों और चिकित्सा महाविद्यालयों के विस्तार के लिए भी क़दम उठाए गए हैं।

बच्चों, महिलाओं और विकलांगों, वृद्ध, असहाय, परित्यक्त के साथ-साथ अपराधी भिखारी, अनाथ और जेल से छुटे लोगों की कल्याण आवश्यकताओं की देखरेख विभिन्न राजकीय संस्थाएं करती हैं। राज्य में तथाकथित पिछड़े वर्ग के लोगों की शिक्षा, आर्थिक विकास, स्वास्थ्य और आवास की देखरेख के लिए एक अलग विभाग है।

गुजराती जनसंख्या में विविध जातीय समूह का मोटे तौर पर इंडिक / भारतोद्भव (उत्तरी मूल) या द्रविड़ (दक्षिणी मूल) के रूप में वर्गीकरण किया जा सकता है। पहले वर्ग में नगर ब्राह्मण, भटिया, भदेला, राबरी और मीणा जातियां (पारसी, मूल रूप से फ़ारस से, परवर्ती उत्तरी आगमन का प्रतिनिधित्व करते हैं), जबकि दक्षिणी मूल के लोगों में वाल्मीकि, कोली, डबला, नायकदा व मच्छि-खरवा जनजातिया हैं। शेष जनसंख्या में आदिवासी भील मिश्रित विशेषताएं दर्शाते हैं। अनुसूचित जनजाति और आदिवासी जनजाति के सदस्य प्रदेश की जनसंख्या का लगभग पाँचवां हिस्सा हैं। यहाँ डेंग ज़िला पूर्णत: आदिवासी युक्त ज़िला है। अहमदाबाद ज़िले में अनुसूचित जनजाति का अनुपात सर्वाधिक है। गुजरात में जनसंख्या का मुख्य संकेंद्रण अहमदाबाद, खेड़ा, वडोदरा, सूरत और वल्सर के मैदानी क्षेत्र में देखा जा सकता है। यह क्षेत्र कृषि के दृष्टिकोण से उर्वर है और अत्यधिक औद्योगीकृत है। जनसंख्या का एक अन्य संकेंद्रण मंगरोल से महुवा तक और राजकोट एवं जामनगर के आसपास के हिस्सों सहित सौराष्ट्र के दक्षिणी तटीय क्षेत्रों में देखा जा सकता है। जनसंख्या का वितरण उत्तर (कच्छ) और पूर्वी पर्वतीय क्षेत्रों की ओर क्रमश कम होता जाता है। जनसंख्या का औसत घनत्व 258 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी (2001) है और दशकीय वृद्धि दर 2001 में 22.48 प्रतिशत पाई गई।

गुजराती और हिन्दी राज्य की अधिकृत भाषाएं हैं। दोनों में गुजराती का ज़्यादा व्यापक इस्तेमाल होता है, जो संस्कृत के अलावा प्राचीन भारतीय मूल भाषा प्राकृत और 10 वीं शताब्दी के बीच उत्तरी और पश्चिमी भारत में बोली जाने वाली अपभ्रंश भाषा से व्युत्पन्न एक भारतीय-आर्य भाषा है। समुद्र मार्ग से गुजरात के विदेशों से संपर्क ने फ़ारसी, अरबी, तुर्की, पुर्तग़ाली और अंग्रेज़ी शब्दों से इसका परिचय करवाया। गुजराती में महात्मा गांधी की विलक्षण रचनाएं अपनी सादगी और ऊर्जस्विता के लिए प्रसिद्ध हैं। इन रचनाओं ने आधुनिक गुजराती गद्य पर ज़बरदस्त प्रभाव डाला है। गुजरात में राजभाषा गुजराती भाषा के अतिरिक्त हिन्दी, मराठी और अंग्रेज़ी का प्रचलन है। गुजराती भाषा नवीन भारतीय–आर्य भाषाओं के दक्षिण–पश्चिमी समूह से सम्बन्धित है। इतालवी विद्वान तेस्सितोरी ने प्राचीन गुजराती को प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी भी कहा, क्योंकि उनके काल में इस भाषा का उपयोग उस क्षेत्र में भी होता था, जिसे अब राजस्थान राज्य कहा जाता है।

गुजरात में अधिकांश जनसंख्या हिन्दू धर्म को मानती है, जबकि कुछ संख्या इस्लाम, जैन और पारसी धर्म मानने वालों की भी है। २१वीं सदी की शुरुआत में अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों को गोधरा में रेलबोगी में जिन्दा जला दिए जाने के बाद यहाँ सांप्रदायिक दंगे हुए। 

गुजरात की अधिकांश लोक संस्कृति और लोकगीत हिन्दू धार्मिक साहित्य पुराण में वर्णित भगवान कृष्ण से जुड़ी किंवदंतियों से प्रतिबिंबित होती है। कृष्ण के सम्मान में किया जाने वाला रासनृत्य और रासलीला प्रसिद्ध लोकनृत्य गरबा के रूप में अब भी प्रचलित है। यह नृत्य देवी दुर्गा के नवरात्र पर्व में किया जाता है। एक लोक नाट्य भवई भी अभी अस्तित्व में है।

गुजरात में शैववाद के साथ-साथ वैष्णववाद भी लंबे समय से फलता-फूलता रहा है, जिनसे भक्ति मत का उद्भव हुआ। प्रमुख संतों, कवियों और संगीतज्ञों में 15वीं सदी में पदों के रचयिता नरसी मेहता, अपने महल को त्यागने वाली 16वीं सदी की राजपूत राजकुमारी व भजनों की रचनाकार मीराबाई, 18वीं सदी के कवि और लेखक प्रेमानंद और भक्ति मत को लोकप्रिय बनाने वाले गीतकार दयाराम शामिल हैं। भारत में अन्य जगहों की तुलना में अहिंसा और शाकाहार की विशिष्टता वाले जैन धर्म ने गुजरात में गहरी जड़े जमाई। ज़रथुस्त्र के अनुयायी पारसी 17वीं सदी के बाद किसी समय फ़ारस से भागकर सबसे पहले गुजरात के तट पर ही बसे थे।

इस समुदाय के अधिकांश लोग बाद में बंबई (वर्तमान मुंबई) चले गए। कृष्ण, दयानन्द सरस्वती, महात्मा गाँधी, सरदार पटेल तथा सुप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी रणजी जैसे व्यक्तित्व ने प्रदेश के समाज को गौरवांवित किया। गुजरात की संस्कृति में मुख्यत: शीशे का काम तथा 'गरबा' एवं 'रास' नृत्य पूरे भारत में प्रसिद्ध है। प्रदेश का सर्वप्रमुख लोक नृत्य गरबा तथा डांडिया है। गरबा नृत्य में स्त्रियाँ सिर पर छिद्रयुक्त पात्र लेकर नृत्य करती हैं, जिस के भीतर दीप जलता है। डांडिया में अक्सर पुरुष भाग लेते हैं परंतु कभी-कभी स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर करते हैं। प्रदेश के रहन-सहन और पहनावे पर राजस्थान का काफ़ी प्रभाव देखा जा सकता है। प्रदेश का भवई लोकनाट्य काफ़ी लोकप्रिय है। स्थापत्य शिल्प की दृष्टि से प्रदेश काफ़ी समृद्ध है। इस दृष्टि से रुद्र महालय, सिद्धपुर, मातृमूर्ति पावागढ़, शिल्पगौरव गलतेश्वर, द्वारिकानाथ का मंदिर, शत्रुंजय पालीताना के जैन मंदिर, सीदी सैयद मस्जिद की जालियाँ, पाटन की काष्ठकला इत्यादि काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं। हिन्दी में जो स्थान सूरदास का है गुजराती में वही स्थान नरसी मेहता का है।

भारत के पश्चिमी भाग में बसा समृद्धशाली राज्य गुजरात अपने त्योहारों और सांस्कृतिक उत्सवों के लिये विश्व प्रसिद्ध है।

भाद्रपद्र (अगस्त-सितंबर) मास के शुक्ल पक्ष में चतुर्थी, पंचमी और षष्ठी के दिन तरणेतर गांव में भगवान शिव की स्तुति में तरणेतर मेला लगता है।

भगवान कृष्ण द्वारा रुक्मणी से विवाह के उपलक्ष्य में चैत्र (मार्च-अप्रैल) के शुक्ल पक्ष की नवमी को पोरबंदर के पास माधवपुर में माधवराय मेला लगता है।

उत्तरी गुजरात के बांसकांठा ज़िले में हर वर्ष मां अंबा को समर्पित अंबा जी मेला आयेजित किया जाता हैं।

राज्य का सबसे बड़ा वार्षिक मेला द्वारका और डाकोर में भगवान कृष्ण के जन्मदिवस जन्माष्टमी के अवसर पर बड़े हर्षोल्लास से आयोजित होता है।
इसके अतिरिक्त गुजरात में मकर संक्राति, नवरात्र, डांगी दरबार, शामला जी मेले तथा भावनाथ मेले का भी आयोजन किया जाता हैं।

गुजरात की वास्तुकला शैली अपनी पूर्णता और अलंकारिकता के लिए विख्यात है, जो सोमनाथ, द्वारका, मोधेरा, थान, घुमली, गिरनार जैसे मंदिरों और स्मारकों में संरक्षित है। मुस्लिम शासन के दौरान एक अलग ही तरीक़े की भारतीय-इस्लामी शैली विकसित हुई। गुजरात अपनी कला व शिल्प की वस्तुओं के लिए भी प्रसिद्ध है। इनमें जामनगर की बांधनी (बंधाई और रंगाई की तकनीक), पाटन का उत्कृष्ट रेशमी वस्त्र पटोला, इदर के खिलौने, पालनपुर का इत्र कोनोदर का हस्तशिल्प का काम और अहमदाबाद व सूरत के लघु मंदिरों का काष्ठशिल्प तथा पौराणिक मूर्तियाँ शामिल हैं। राज्य के सर्वाधिक स्थायी और प्रभावशाली सांस्कृतिक संस्थानों में महाजन के रूप में प्रसिद्ध व्यापार और कला शिल्प संघ है। अक्सर जाति विशेष में अंतर्गठित और स्वायत्त इन संघों ने अतीत कई विवादों को सुलझाया है और लोकहित के माध्यम की भूमिका निभाते हुए कला व संस्कृति को प्रोत्साहन दिया है।

गुजरात राज्य में की जाने वाली वास्तु शिल्पीय नक़्क़ाशी कम से कम 15वीं शताब्दी से गुजरात भारत में लकड़ी की नक़्क़ाशी का मुख्य केंद्र रहा है। निर्माण सामग्री के रूप में जिस समय पत्थर का इस्तेमाल अधिक सुविधाजनक और विश्वसनीय था, इस समय भी गुजरात के लोगों ने मंदिरों के मंडप तथा आवासीय भवनों के अग्रभागों, द्वारों, स्तंभों, झरोखों, दीवारगीरों और जालीदार खिड़कियों के निर्माण में निर्माण में बेझिझक लकड़ी का प्रयोग जारी रखा। मुग़ल काल (1556-1707) के दौरान गुजरात की लकड़ी नक़्क़ाशी में देशी एवं मुग़ल शैलियों का सुंदर संयोजन दिखाई देता है। 16वीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं 17वीं सदी के जैन काष्ठ मंडपों पर जैन पौराणिक कथाएँ एवं समकालीन जीवन के दृश्य तथा काल्पनिक बेल-बूटे, पशु-पक्षी एवं ज्यामितीय आकृतियाँ उत्कीर्ण की गई हैं; आकृति मूर्तिकला अत्यंत जीवंत एवं लयात्मक है। लकड़ी पर गाढ़े लाल रौग़न का प्रयोग आम था। 19वीं सदी के कई भव्य काष्ठ पुरोभाग संरक्षित हैं, लेकिन उनका अलंकरण पहले की निर्मितियों जैसा ललित और गत्यात्मक नहीं है। गुजरात (/ ˌɡʊdʒərɑːt / Gujrāt [ɡudʒ (ə) ɾaːt̪] (इस ध्वनि के बारे में सुनो) पश्चिमी भारत में एक राज्य है, इसका क्षेत्र 1,6,024 किमी 2 (75,685 वर्ग मील) है जिसमें 1,600 किलोमीटर (9 9 0 9 मील), जिनमें से अधिकांश काठियावाड़ प्रायद्वीप पर स्थित है, और 60 मिलियन से अधिक की आबादी है राज्य को राजस्थान से उत्तर की ओर, दक्षिण में महाराष्ट्र, पूर्व में मध्य प्रदेश, और अरब सागर और पश्चिम में सिंध के पाकिस्तानी प्रांत में सीमाएं हैं। इसकी राजधानी गांधीनगर है, जबकि इसका सबसे बड़ा शहर अहमदाबाद है। गुजरात भारत के गुजराती भाषण वाले लोगों का घर है।

राज्य में प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता की कुछ साइटें शामिल हैं, जैसे लोथल और ढोलवीरा लोथल को दुनिया के पहले बंदरगाहों में से एक माना जाता है। गुजरात के तटीय शहरों, मुख्यतः भरूच और खंभात, मोरिया और गुप्त साम्राज्यों में बंदरगाहों और व्यापार केंद्रों के रूप में कार्य करते थे, और पश्चिमी सतराप काल से शाही शक राजवंशों के उत्तराधिकार के दौरान।

गुजरात प्राचीन यूनानियों के लिए जाना जाता था, और यूरोपीय मध्य युग के अंत के माध्यम से सभ्यता के अन्य पश्चिमी केंद्रों में परिचित था। गुजरात के 2,000 साल के समुद्री इतिहास का सबसे पुराना लिखित रिकार्ड एक ग्रीक किताब में प्रकाशित किया गया है जिसका नाम पेरिप्लस ऑफ द इरिथ्रेअन सी: ट्रैवल एंड ट्रेड इन हिंद ओन्सन ऑफ द मर्चेंट ऑफ द फर्स्ट सेंचुरी है।

विषय वस्तु 

आधुनिक दिवस गुजरात संस्कृत शब्द गुर्जरेदेसा, गुर्जर राष्ट्र से प्राप्त होता है। आधुनिक राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों को मुगल काल से पहले शताब्दियों तक गुरुराजरा या गुर्जरभूमि (गुर्जर की भूमि) के रूप में जाना जाता है। 

प्राचीन लोथल की ढक्कन आज की तरह है

ढोलवीरा में प्राचीन जल भंडार
गुजरात सिंधु घाटी सभ्यता के मुख्य केंद्रों में से एक था। इसमें सिंधु घाटी से प्राचीन महानगरीय शहरों जैसे लोथल, धौलावीरा और गोला धोरो शामिल हैं। लोथल प्राचीन शहर था जहां भारत का पहला बंदरगाह स्थापित किया गया था। प्राचीन शहर ढोलवीरा, सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित भारत की सबसे बड़ी और सबसे प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में से एक है। सबसे हालिया खोज गोला धोरो थी। कुल मिलाकर, लगभग 50 सिंधु घाटी स्थितियों के खंडहर गुजरात में खोजे गये है।

गुजरात के प्राचीन इतिहास को इसके निवासियों की वाणिज्यिक गतिविधियों से समृद्ध किया गया था। 1000 से 750 ईसा पूर्व के समय के दौरान फारस की खाड़ी में मिस्र, बहरीन और सुमेर के साथ व्यापार और वाणिज्य संबंधों का स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण है। मौर्या राजवंश, पश्चिमी सतराप, सातवाहन राजवंश, गुप्त साम्राज्य, चालुक्य वंश, राष्ट्रकूट साम्राज्य, पाल साम्राज्य और गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य के साथ-साथ स्थानीय राजवंशों जैसे मैत्रकस और फिर हिंदू और बौद्ध राज्यों का उत्तराधिकार था।

गुजरात के शुरुआती इतिहास में चंद्रगुप्त मौर्य की शाही भव्यता को दर्शाया गया है, जिसने पहले के कई राज्यों पर विजय प्राप्त की जो अब गुजरात है। पुष्यगुप्त, एक वैश्य, को मौर्य शासन द्वारा सौराष्ट्र के राज्यपाल नियुक्त किया गया था। उन्होंने गिरिंगर (आधुनिक दिवस जूनागढ़) (322 ईसा पूर्व से 2 9 4 ईसा पूर्व) पर शासन किया और सुदर्शन झील पर एक बांध बनाया। चंद्रगुप्त मौर्य के पोते सम्राट अशोक ने केवल जूनागढ़ में चट्टान पर अपने पदों के उत्कीर्णन का आदेश नहीं दिया, बल्कि राज्यपाल टुशेरफा को झील से नहरों में कटौती करने के लिए कहा, जहां पहले मौर्य राज्यपाल ने बांध बांध दिया था। मौर्य शक्ति की कमी और उज्जैन के सम्प्रति मौर्यों के प्रभाव में सौराष्ट्र आने के बीच, डेमेट्रीयूस के नेतृत्व में गुजरात में एक इंडो-ग्रीक आक्रमण हुआ। 1 शताब्दी ईस्वी के पहले छमाही में, गुजरात गोंडफेयर के एक व्यापारी की कहानी है जो गुजरात में उत्तराधिकारी थॉमस के साथ उतरती है। शेर की हत्या कर रहे कप वाहक की घटना से संकेत हो सकता है कि बंदरगाह शहर का वर्णन गुजरात में है।




#Article 45: गोवा (1172 words)


गोवा या गोआ (कोंकणी: गोंय), क्षेत्रफल के अनुसार से भारत का सबसे छोटा और जनसंख्या के अनुसार चौथा सबसे छोटा राज्य है। पूरी दुनिया में गोवा अपने सुन्दर समुद्र के किनारों और प्रसिद्ध स्थापत्य के लिये जाना जाता है। गोवा पहले पुर्तगाल का एक उपनिवेश था। पुर्तगालियों ने गोवा पर लगभग 450 सालों तक शासन किया और 19 दिसंबर 1961 में यह भारतीय प्रशासन को सौंपा गया।

महाभारत में गोवा का उल्लेख गोपराष्ट्र यानि गाय चरानेवालों के देश के रूप में मिलता है। दक्षिण कोंकण क्षेत्र का उल्लेख गोवाराष्ट्र के रूप में पाया जाता है। संस्कृत के कुछ अन्य पुराने स्त्रोतों में गोवा को गोपकपुरी और गोपकपट्टन कहा गया है जिनका उल्लेख अन्य ग्रंथों के अलावा हरिवंशम और स्कंद पुराण में मिलता है। गोवा को बाद में कहीं कहीं गोअंचल भी कहा गया है। अन्य नामों में गोवे, गोवापुरी, गोपकापाटन औरगोमंत प्रमुख हैं। टोलेमी ने गोवा का उल्लेख वर्ष 200 के आस-पास गोउबा के रूप में किया है। अरब के मध्युगीन यात्रियों ने इस क्षेत्र को चंद्रपुर और चंदौर के नाम से इंगित किया है जो मुख्य रूप से एक तटीय शहर था। जिस स्थान का नाम पुर्तगाल के यात्रियों ने गोवा रखा वह आज का छोटा सा समुद्र तटीय शहर गोअ-वेल्हा है। बाद में उस पूरे क्षेत्र को गोवा कहा जाने लगा जिस पर पुर्तगालियों ने कब्जा किया।

जनश्रुति के अनुसार गोवा जिसमें कोंकण क्षेत्र भी शामिल है (और जिसका विस्तार गुजरात से केरल तक बताया जाता है) की रचना भगवान परशुराम ने की थी। कहा जाता है कि परशुराम ने एक यज्ञ के दौरान अपने बाणो की वर्षा से समुद्र को कई स्थानों पर पीछे धकेल दिया था और लोगों का कहना है कि इसी वजह से आज भी गोवा में बहुत से स्थानों का नाम वाणावली, वाणस्थली इत्यादि हैं। उत्तरी गोवा में हरमल के पास आज भूरे रंग के एक पर्वत को परशुराम के यज्ञ करने का स्थान माना जाता है।

गोवा के लंबे इतिहास की शुरुआत् तीसरी सदी इसा पूर्व से शुरु होता है जब यहाँ मौर्य वंश के शासन की स्थापना हुई थी। बाद में पहली सदी के शुरुआत में इस पर कोल्हापुर के सातवाहन वंश के शासकों का अधिकार स्थापित हुआ और फिर बादामी के चालुक्य शासकों ने इस पर वर्ष 580 से 750 तक राज किया। इसके बाद के सालों में इस पर कई अलग अलग शासकों ने अधिकार किया। वर्ष 1312 में गोवा पहली बार दिल्ली सल्तनत के अधीन हुआ लेकिन उन्हें विजयनगर के शासक हरिहर प्रथम द्वार वहाँ से खदेड़ दिया गया। अगले सौ सालों तक विजयनगर के शासकों ने यहाँ शासन किया और 1469 में गुलबर्ग के बहामी सुल्तान द्वारा फिर से दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बनाया गया। बहामी शासकों के पतन के बाद बीजापुर के आदिल शाह का यहाँ कब्जा हुआ जिसने गोअ-वेल्हा को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।

भारत ने 1947 में अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त की, भारत ने अनुरोध किया कि भारतीय उपमहाद्वीप में पुर्तगाली प्रदेशों को भारत को सौंप दिया जाए।किंतु पुर्तगाल ने अपने भारतीय परिक्षेत्रों की संप्रभुता पर बातचीत करना अस्वीकार कर दिया। पर 19 दिसंबर 1961 को, भारतीय सेना ने गोवा, दमन, दीव के भारतीय संघ में विलय के लिए ऑपरेशन विजय के साथ सैन्य संचालन किया और इसके परिणामस्वरूप गोवा, दमन और दीवभारत का एक केन्द्र प्रशासित क्षेत्र बना। 30 मई 1987 में केंद्र शासित प्रदेश को विभाजित किया गया था, और गोवा भारत का पच्चीसवां राज्य बनाया गया। जबकि दमन और दीव केंद्र शासित प्रदेश ही रहे।

गोवा का क्षेत्रफल 3702 वर्ग किलोमीटर है। गोवा का अक्षांश और देशान्तर क्रमश: 14°53'54 और 73°40'33 E है। गोवा का समुद्र तट 101 किलोमीटर लम्बा है।
गोआ भारत का सबसे छोटा राज्य है।

गोवा का प्रमुख उद्योग पर्यटन है। पर्यटन के आलावा गोवा में लौह खनिज भी विपुल मात्रा में पाया जाता है जो जापान तथा चीन जैसे देशों में निर्यात होता है। गोवा मतस्य (मछली) उद्योग के लिए भी जाना जाता है लेकिन यहाँ की मछली निर्यात नहीं की जाती बल्कि स्थानीय बाजारों में बेची जाती है। यहाँ का काजू सउदी अरब, ब्रिटेन तथा अन्य यूरोपीय राष्ट्रों को निर्यात होता है। पर्यटन के वज़ह से बाकी उद्योग जो पर्यटन पर निर्भर करते है वो भी यहाँ पर जोर शोर से चालू हैं। गोवा में अभी तक सिर्फ़ एक ही विमानपत्तन है और दूसरा अभी बनने वाला है।

गोवा करीब करीब 450 साल तक पुर्तगाली शासन के आधीन रहा, इस कारण यहाँ यूरोपीय संस्कृति का प्रभाव बहुत महसूस होता है। गोवा की लगभग 60% जनसंख्या हिंदू और लगभग 28% जनसंख्या ईसाई है। गोवा की एक खास बात यह है कि, यहाँ के ईसाई समाज में भी हिंदुओं जैसी जाति व्यवस्था पाई जाती है।

गोवा के दक्षिण भाग में ईसाई समाज का ज्यादा प्रभाव है लेकिन वहाँ के वास्तुशास्त्र में हिंदू प्रभाव दिखाई देता है। सबसे प्राचीन मन्दिर गोवा में दिखाई देते है। उत्तर गोवा में ईसाइ कम संख्या में हैं इसलिए वहाँ पुर्तगाली वास्तुकला के नमूने ज्यादा दिखाई देते है।

संस्कृति की दृष्टि से गोवा की संस्कृति काफी प्राचीन है। 1000 साल पहले कहा जाता है कि गोवा कोंकण काशी के नाम से जाना जाता था। हालाँकि पुर्तगाली लोगों ने यहाँ के संस्कृति का नामोनिशान मिटाने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन यहाँ की मूल संस्कृति इतनी शक्तिशाली थी की वह ऐसा नहीं कर पाए .

वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही प्रकृति गोवा को कुछ ऐसा ही अलग, लेकिन अदभुत स्वरूप प्रदान करती है। यह स्थान शांतिप्रिय पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को बहुत भाता है। गोवा एक छोटा-सा राज्य है। यहां छोटे-बड़े लगभग 40 समुद्री तट है। इनमें से कुछ समुद्र तट अंर्तराष्ट्रीय स्तर के हैं। इसी कारण गोवा की विश्व पर्यटन मानचित्र के पटल पर अपनी एक अलग पहचान है।

गोवा में पर्यटकों की भीड़ सबसे अधिक गर्मियों के महीनें में होती है। जब यह भीड़ समाप्त हो जाती है तब यहां शुरू होता है ऐसे सैलानियों के आने का सिलसिला जो यहां मानसून का लुत्‍फ उठाना चाहते हैं।

गोवा के मनभावन बीच की लंबी कतार में पणजी से 16 किलोमीटर दूर कलंगुट बीच, उसके पास बागा बीच, पणजी बीच के निकट मीरामार बीच, जुआरी नदी के मुहाने पर दोनापाउला बीच स्थित है। वहीं इसकी दूसरी दिशा में कोलवा बीच ऐसे ही सागरतटों में से है जहां मानसून के वक्त पर्यटक जरूर आना चाहेंगे। यही नहीं, अगर मौसम साथ दे तो बागाटोर बीच, अंजुना बीच, सिंकेरियन बीच, पालोलेम बीच जैसे अन्य सुंदर सागर तट भी देखे जा सकते हैं। गोवा के पवित्र मंदिर जिनसे श्री कामाक्षी, सप्तकेटेश्‍वर, श्री शांतादुर्ग, महालसा नारायणी, परनेम का भगवती मंदिर और महालक्ष्मी आदि दर्शनीय है।

पणजी गोवा की राजधानी है। यहां के आधुनिक बाजार भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। मांडवी नदी के तट पर बसे इस शहर में शाम के समय सैलानी रिवर क्रूज का आनन्द लेने पहुंचते हैं। मांडवी पर तैरते क्रूज पर संगीत एवं नृत्य के कार्यक्रम में गोवा की संस्कृति की एक झलक देखने को मिलती है।

गोवा में दो जिले हैं -

गोवा में सबसे लोकप्रिय खेल फुटबाल है। यहाँ कई लोकप्रिय फुटबाल क्लब हैं। इसके अलावा गोवा के बहुत से खिलाड़ी हाकी में भी दिलचस्पी रखते हैं। गोवा में अनेक समुद्रतट हैं . उन्मे से कुछ हैं बागा समुद्रतट, कलांगुते समुद्रतट, कोला समुद्रतट, इतियादी।




#Article 46: चण्डीगढ़ (7594 words)


चण्डीगढ़, (पंजाबी: ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ), भारत का एक केन्द्र शासित प्रदेश है, जो दो भारतीय राज्यों, पंजाब और हरियाणा की राजधानी भी है। इसके नाम का अर्थ है चण्डी का किला। यह हिन्दू देवी दुर्गा के एक रूप चण्डिका या चण्डी के एक मंदिर के कारण पड़ा है। यह मंदिर आज भी शहर में स्थित है। इसे सिटी ब्यूटीफुल भी कहा जाता है। चंडीगढ़ राजधानी क्षेत्र में मोहाली, पंचकुला और ज़ीरकपुर आते हैं, जिनकी २००१ की जनगणना के अनुसार जनसंख्या ११६५१११ (१ करोड़ १६ लाख) है। भारत की लोकसभा में प्रतिनिधित्व हेतु चण्डीगढ़ के लिए एक सीट आवण्टित है। वर्तमान सोलहवीं लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी की श्रीमति किरण खेर यहाँ से साँसद हैं। चण्डीगढ मे सेक्टर १३ नाम से कोइ सेक्टर नही है क्योंकि चण्डीगढ शहर के शिल्पकार ली कार्बूजियर इस अंक को अशुभ मानते थे।

इस शहर का नामकरण दुर्गा के एक रूप ‘चंडिका’ के कारण हुआ है और चंडी का मंदिर आज भी इस शहर की धार्मिक पहचान है। इस शहर के निर्माण में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भी निजी रुचि रही है, जिन्होंने नए राष्ट्र के आधुनिक प्रगतिशील दृष्टिकोण के रूप में चंडीगढ़ को देखते हुए इसे राष्ट्र के भविष्य में विश्वास का प्रतीक बताया था।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शहरी योजनाबद्धता और वास्तु-स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध यह शहर आधुनिक भारत का प्रथम योजनाबद्ध शहर है। चंडीगढ़ के मुख्य वास्तुकार फ्रांसीसी वास्तुकार ली कार्बूजियर हैं, लेकिन शहर में पियरे जिएन्नरेट, मैथ्यु नोविकी एवं अल्बर्ट मेयर के बहुत से अद्भुत वास्तु नमूने देखे जा सकते हैं। शहर का भारत के समृद्ध राज्यों और संघ शसित प्रदेशों की सूची में अग्रणी नाम आता है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय ९९,२६२ रु (वर्तमान मूल्य अनुसार) एवं स्थिर मूल्य अनुसार ७०,३६१ (२००६-०७) रु है।

ब्रिटिश भारत के विभाजन उपरांत १९४७ में पंजाब राज्य को भारत और पाकिस्तान में दो भागों में बाँट दिया गया था। इसके साथ ही राज्य की पुरानी राजधानी लाहौर पाकिस्तान के भाग में चली गयी थी। अब भारतीय पंजाब को एक नयी राजधानी की आवश्यकता पड़ी। पूर्व स्थित शहरों को राजधानी बदलने में आने वाली बहुत सी कठिनाईयों के फलस्वरूप एक नये योजनाबद्ध राजधानी शहर की स्थापना का निश्चय किया गया तथा १९५२ में इस शहर की नींव रखी गई।

उस समय में भारत में चल रही बहुत सी नवीन शहर योजनाओं में चंडीगढ़ को प्राथमिकता मिली जिसका मुख्य कारण एक तो नगर की स्थिति और दूसरा कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु तथा राज्यपाल सर सी पी एन ( चन्देश्वर प्रसाद नारायण सिंह ) का निजी रुचि का होना था । राष्ट्र के आधुनिक प्रगतिशील दृष्टिकोण के रूप में चंडीगढ़ को देखते हुए उन्होंने शहर को अतीत की परंपराओं से उन्मुक्त, राष्ट्र के भविष्य में विश्वास का प्रतीक बताया। शहर के बहुत से खाके व इमारतों की वास्तु रचना फ्रांस में जन्में स्विस वास्तुकार व नगर-नियोजक ली कार्बुज़िए ने १९५० के दशक में की थी। कार्बुज़िए भी असल में शहर के द्वितीय वास्तुकार थे, जिसका मूल मास्टर प्लान अमरीकी वास्तुकार-नियोजक अल्बर्ट मेयर ने तब बनाया था, जब वे पोलैंड में जन्मे वास्तुकार मैथ्यु नोविकी के संग कार्यरत थे। १९५० में नोविकी की असामयिक मृत्यु के चलते कार्बूजियर को परियोजना में स्थान मिला था। 

१ नवंबर, १९६६ को पंजाब के हिन्दी-भाषी पूर्वी भाग को काटकर हरियाणा राज्य का गठन किया गया, जबकि पंजाबी-भाषी पश्चिमी भाग को वर्तमान पंजाब ही रहने दिया था। चंडीगढ़ शहर दोनों के बीच सीमा पर स्थित था, जिसे दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी के रूप में घोषित किया गया और साथ ही संघ शासित क्षेत्र भी घोषित किया गया था। १९५२ से १९६६ तक ये शहर मात्र पंजाब की राजधानी रहा था। अगस्त १९८५ में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी और अकाली दल के संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच हुए समझौते के अनुसार, चंडीगढ़ को १९८६ में पंजाब में स्थानांतरित होना तय हुआ था। इसके साथ ही हरियाणा के लिए एक नयी राजधानी का सृजन भी होना था, किन्तु कुछ प्रशासनिक कारणों के चलते इस स्थानांतरण में विलंब हुआ। इस विलंब के मुख्य कारणों में दक्षिणी पंजाब के कुछ हिन्दी-भाषी गाँवों को हरियाणा और पश्चिम हरियाणा के पंजाबी-भाषी गाँवों को पंजाब को देने का विवाद था। 

१५ जुलाई २००७ को चंडीगढ़ प्रथम भारतीय गैर-धूम्रपान क्षेत्र घोषित हुआ। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध है और चंडीगढ़ प्रशासन के नियमों के तहत दंडनीय अपराध है। इसका बाद २ अक्टूबर २००८ को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्म-दिवस पर शहर में पॉलीथीन की थैलियों के प्रयोग पर पूर्ण निषेध लागू हो गया।

नए चंडीगढ़, चंडीगढ़, के आसपास Mullanpur Garibdass के शहर के पास स्थित एक नए समाधान की पंजाब की पहली 'स्मार्ट शहर के रूप में डिज़ाइन किया गया है। 

पहला इको सिटी के पंजाब GMADA, ग्रेटर मोहाली क्षेत्र के स्थानीय योजना प्राधिकरण Mullanpur पहली पारिस्थितिकी  स्मार्ट सिटी पंजाब के रूप में घोषित किया था। Mullanpur नए चंडीगढ़ का हिस्सा होगा। नए चंडीगढ़ के 32 गांवों से बना हो जाएगा। इस शहर का पहला चरण पहले से ही घोषित किया गया है और भूमि अधिग्रहण और प्लॉट आवंटन की प्रक्रिया शुरू की गई है। यह कई पार्कों और पर्यटन स्थल की मेजबानी करेगा। शहर के मास्टर प्लान सिंगापुर स्थित कंपनी द्वारा Jurong अंतर्राष्ट्रीय तैयार है। यह शहर मुख्य रूप से आवासीय शहर उच्च रहने के साथ के रूप में होगा। यह शहर सूचना प्रौद्योगिकी और अस्पतालों की तरह nonpolluting उद्योगों की मेजबानी करेगा।

प्रमुख खिलाड़ी GMADA, जो पहले से ही भूमि अधिग्रहण और प्लॉट आवंटन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, इसके अलावा कई निजी खिलाड़ी हैं।

डीएलएफ एक 1,000 एकड़ बस्ती ऊपर सेट करने के लिए योजना बना रहा है। कंपनी पहले चरण के लिए 400 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया है; दूसरे चरण के लिए अधिग्रहण शीघ्र ही शुरू हो जाएगा। यूनिटेक समूह और Altus अंतरिक्ष बिल्डर्स भी आवासीय टाउनशिप विकसित कर रहे हैं। अन्य डेवलपर्स रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (ADAG), Ansals और Rahejas शामिल हैं।

चंडीगढ़ (स्थानीय उच्चारण: [tʃə̃ˈɖiːɡəɽʱ] (यह ध्वनि सुनने के बाद में) एक शहर और एक संघ भारत के राज्यक्षेत्र कि हरियाणा और पंजाब के भारतीय राज्यों की राजधानी के रूप में कार्य करता है। एक केंद्र शासित प्रदेश, के रूप में शहर सीधे केंद्रीय सरकार द्वारा नियंत्रित होता है और या तो राज्य का हिस्सा नहीं है।

चंडीगढ़ पंजाब उत्तर, पश्चिम और दक्षिण के लिए, और हरियाणा राज्य के पूर्व करने के लिए राज्य द्वारा bordered है। चंडीगढ़ चंडीगढ़ राजधानी क्षेत्र या ग्रेटर चंडीगढ़, चंडीगढ़, और शहर के पंचकुला (हरियाणा) में भी शामिल है जो का एक हिस्सा और Kharar, Kurali, मोहाली, (पंजाब) में ज़िरकपुर का शहर माना जाता है। यह शिमला के दक्षिण पश्चिम के अमृतसर और सिर्फ 116 मी (72 मील) दक्षिण-पूर्व स्थित 260 किमी (162 मील) उत्तर न्यू दिल्ली, 229 मी (143 मील) है।

चंडीगढ़ आजादी के बाद भारत में प्रारंभिक नियोजित शहरों में से एक था जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी वास्तुकला और शहरी डिजाइन के लिए जाना जाता है। Le Corbusier, जो बदल से पहले की योजना बनाई गई स्विस-फ़्रांसीसी आर्किटेक्ट पोलिश वास्तुकार Maciej Nowicki और अमेरिकी नियोजक अल्बर्ट मेयर द्वारा द्वारा शहर का मास्टर प्लान तैयार किया गया था। अधिकांश सरकारी इमारतों और शहर में आवास चंडीगढ़ राजधानी परियोजना Le Corbusier, जेन आकर्षित और मैक्सवेल तलना द्वारा नेतृत्व टीम द्वारा डिजाइन किए गए थे। 2015 में बीबीसी द्वारा प्रकाशित लेख चंडीगढ़ वास्तुकला, सांस्कृतिक विकास और आधुनिकीकरण के मामले में दुनिया के आदर्श शहरों में से एक के रूप में नाम।

चंडीगढ़ के कैपिटल परिसर यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत सम्मेलन के 40 वें सत्र में विश्व विरासत के रूप में की घोषणा की जुलाई 2016 में इस्तांबुल में आयोजित किया गया था। यूनेस्को शिलालेख Le Corbusier आधुनिक आंदोलन करने के लिए एक उत्कृष्ट योगदान के वास्तु काम के तहत था। कैपिटल परिसर इमारतें स्मारकों खुले हाथ के साथ साथ, शहीद स्मारक, गुणोत्तर हिल और टॉवर की छाया पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय, पंजाब और हरियाणा सचिवालय और पंजाब और हरियाणा विधानसभा शामिल हैं।

शहर देश में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय में से एक है। शहर एक राष्ट्रीय सरकार अध्ययन पर आधारित सबसे साफ भारत में से एक होने की सूचना दी थी। संघ शासित क्षेत्र भी मानव विकास सूचकांक के अनुसार भारतीय राज्यों की राजधानियां की सूची प्रमुख हैं। २०१५, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स, द्वारा एक सर्वेक्षण में चंडीगढ़ खुशी सूचकांक पर भारत में सबसे खुशी का शहर के रूप में रैंक। [15] [16] मेट्रोपोलिटन चंडीगढ़-मोहाली-पंचकूला की सामूहिक रूप से 2 लाख से अधिक की जनसंख् या के साथ मिलाकर एक त्रि-शहर, रूपों। 

सामग्री

ब्याज के 7 स्थानों

चंडीगढ़ से 11 उल्लेखनीय लोग

व्युत्पत्ति [संपादित करें]
नाम चंडीगढ़ चण्डी और गढ़ का एक सूटकेस है। चण्डी हिंदू देवी चण्डी, योद्धा देवी पार्वती का अवतार और गढ़ का मतलब है घर के लिए संदर्भित करता है। [18] नाम चंडी मंदिर, एक प्राचीन मंदिर हिंदू देवी चण्डी, पंचकुला जिले में शहर के पास करने के लिए समर्पित से ली गई है। [19]

इतिहास [संपादित करें]
प्रारंभिक इतिहास [संपादित करें]
शहर के एक पूर्व ऐतिहासिक अतीत है। झील की उपस्थिति के कारण, क्षेत्र जीवाश्म अवशेष निशान जलीय पौधों और पशुओं, और उभयचर जीवन, जो कि पर्यावरण द्वारा समर्थित थे की एक विशाल विविधता के साथ है। यह पंजाब क्षेत्र का एक हिस्सा था के रूप में, यह कई नदियाँ कहाँ शुरू हुआ प्राचीन और आदिम मनुष्य के बसने के पास था। तो, लगभग 8000 साल पहले, क्षेत्र भी एक घर हड़प्पावासियों के लिए किया जा करने के लिए जाना जाता था। [23]

आधुनिक इतिहास

चंडीगढ़ ड्रीम सिटी के भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू था। भारत विभाजन के बाद 1947 में, पंजाब के पूर्व ब्रिटिश प्रांत (ज्यादातर सिखों के बीच) विभाजित था भारत में पूर्वी पंजाब और पाकिस्तान में (अधिकतर मुस्लिम) पश्चिम पंजाब। भारतीय पंजाब लाहौर, जो विभाजन के दौरान पाकिस्तान का हिस्सा बन गया की जगह एक नई राजधानी की आवश्यकता है।

 
चंडीगढ़ हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला की तराई में भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। शहर का क्षेत्रफ़ल लगभग ४४ वर्ग मील (११४ कि॰मी॰²) है। इसकी सीमाएं पूर्व में हरियाणा, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में पंजाब (भारत) से लगती हैं। शहर के सही सही भूगोलीय निर्देशांक  हैं। यहाँ समुद्र-सतह से औसत ऊंचाई ३२१ मी.(१०५३ फीट) है। 

शहर के समीपस्थ जिलों में हरियाणा के अंबाला और पंचकुला तथा पंजाब के मोहाली, पटियाला और रोपड़ जिले हैं। इसके उत्तरी भाग से हिमाचल प्रदेश की सीमाएं अधिक दूर नहीं हैं। शहर की जलवायु उप-उष्णकटिबन्धीय महाद्वीपीय मानसून प्रकार की है; जिसमें ऊष्म ग्रीष्म काल, कुछ शीतल शीतकाल, अविश्वसनीय वर्षा और तापमान में बड़े अंतर (-१ °से. सेo ४१.२ °से.) का अनुमान रहता है। शीतकाल में दिसम्बर व जनवरी के माह में कभी-कभार कोहरा हो सकता है। औसत वार्षिक वर्षा १११०.७ मि.मी होती है। शहर को कई बार पश्चिम से लौटते मानसून की शीतकालीन वर्षा का अनुभव भी मिलता है। 

 औसत तापमान

 

अधिकांश चंडीगढ़ बरगद और यूकेलिप्टस के बगीचों से भरा हुआ है। अशोक, कैसिया, शहतूत व अन्य वृक्ष भी यहाँ की शोभा बढ़ाते हैं। शहर को घेरे हुए बड़ा वन्य-क्षेत्र है जिसमें अनेक जंतु व पादप प्रजातियां फलती-फूलती हैं। हिरण, सांभर, कुत्ता, तोते, कढ़फोड़वे एवं मोर संरक्षित वनों में निवास करते हैं। सुखना झील में बत्तखों और गीज़ प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करते हैं, जो जापान और साईबेरिया क्षेत्रों से उड़कर जाड़ों में यहाँ आते हैं व झील की शोभा बढ़ाते हैं। शहर में एक शुक अभयारण्य भी है, जिसमें पक्षियों कि अनेक प्रजातियां देखने को मिलती हैं।

चंडीगढ़ प्रशासन संविधान की धारा २३९ के तहत नियुक्त किये गए प्रशासक के अधीन कार्यरत है। शहर का प्रशासनिक नियंत्रण भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पास है। वर्तमान में पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ़ के प्रशासक होते हैं। प्रशासक का सलाहकार एक अखिल भारतीय सेवाओं से नियुक्त अति-वरिष्ठ अधिकारी होता है। ये अधिकारी प्रशासक के बाद सर्वे-सर्वा होता है। इस अधिकारी का स्तर भारतीय प्रशासनिक सेवा में ए.जी.एम.यू कैडर का होता है। 

उपरोक्त तीन अधिकारी अखिल भारतीय सेवाओं के ए.जी.एम.यू, हरियाणा या पंजाब कैडर से होते हैं।

२००१ की भारत की जनगणना के अनुसार, चंडीगढ़ की कुल जनसंख्या ९,००,६३५ है, जिसके अनुसार ७९०० व्यक्ति प्रति वर्ग कि॰मी॰ का घनत्व होता है। इसमें पुरुषों का भाग कुल जनसंख्या का ५६% और स्त्रियों का ४४% है। शहर का लिंग अनुपात ७७७ स्त्रियां प्रति १००० पुरुष हैं, जो देश में न्यूनतम है। औसत साक्षरता दर ८१.९% है, जो राष्ट्रीय औसत साक्षरता दर ६४.८ से अधिक है। इसमें पुरुष दर ८६.१% एवं स्त्री साक्षरता दर ७६.५% है। यहाँ की १२% जनसंख्या छः वर्ष से नीचे की है। मुख्य धर्मों में हिन्दू (७८.६%), सिख (१६.१%), इस्लाम (३.९%) एवं ईसाई (०.८% हैं। 

चंडीगढ़ में रहने वाले हरियाणा व पंजाब के प्रवासी लोग भी बड़े प्रतिशत में हैं, जो यहाँ की व्यावसायिक रिक्तियों को भरने हेतु व धनोपार्जन में लगे हैं। ये लोग शहर के विभिन्न सरकारी विभागों व निजी व्यवसायों में कार्यरत हैं।

हिन्दी एवं पंजाबी चंडीगढ़ की बोली जाने वाली प्रमुख भाषाएं हैं, हालाँकि आजकल अंग्रेज़ी भी प्रचलित होती जा रही है। अधिकांश आबादी हिंदी (73%) बोलती है जबकि पंजाबी 23% बोली जाती है। तमिल-भाषी लोग तीसरा सबसे बड़ा समूह बनाते हैं। शहर के लोगों का एक छोटा भाग उर्दु भी बोलता है।

चंडीगढ़ सॉफ्टवेयर निर्यात वृद्धि 
उद्यमी विकास केंद्र (EDC) एक जगह है जो चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा राजीव गांधी चंडीगढ़ टेक्नोलॉजी पार्क (RGCTP) में चंडीगढ़ से सॉफ्टवेयर निर्यात के निर्यात को बढ़ाने और युवा पेशेवरों को अपनी उद्यमशीलता स्थापित करने में सहायता करने के लिए प्रदान की गई है। शेल स्पेस या स्पेस एन प्ले फैसिलिटीज इन द स्टेट ऑफ़ द आर्ट एनवायरनमेंट फ्रेंडली और एक इंटेलिजेंट बिल्डिंग।

इस परियोजना की कल्पना आईटी सॉफ्टवेयर निर्यात कंपनियों के लिए एक पारगमन बिंदु के रूप में की गई है, जो पार्क में आने के लिए तैयार हैं, लेकिन अभी तक उनकी खुद की पूरी तरह से विकसित इमारत नहीं है, या उनके द्वारा निर्मित स्वीट प्लॉट का निर्माण अभी तक नहीं हुआ है। इसके पास आईटी विभाग के प्रशासनिक कार्यालय भी होंगे जो आसपास के क्षेत्रों में आईटी कंपनियों के लिए अधिक सुलभ और सुलभ होंगे।

यह परियोजना आंशिक रूप से निर्यात अवसंरचना और संबद्ध गतिविधियों (ASIDE) योजना के लिए राज्यों को सहायता के माध्यम से भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित की जाएगी, जो निर्यात से संबंधित परियोजनाओं के लिए है। 

EDC कला भवन का एक राज्य होगा जहां छोटे और मध्यम आकार की आईटी कंपनियां सॉफ्टवेयर विकास, आरएंडडी और अन्य उच्च मूल्य सेवाओं के लिए निर्मित स्थान पर कब्जा कर लेंगी, जो निर्यात उद्देश्यों के लिए होगा। यह केंद्र उन सभी युवा आईटी उद्यमियों के लिए ऊष्मायन सुविधाएं भी प्रदान करेगा, जिन्हें प्लग एन प्ले सुविधाएं दी जाएंगी। ईडीसी परियोजना, पीईसी, सेक्टर 12, चंडीगढ़ में स्थित एसपीआईसी इनक्यूबेशन सेंटर की तर्ज पर होगी जहां पहले से ही छोटी आईटी कंपनियां उपलब्ध कराई गई हैं। 

सॉफ्टवेयर निर्यात के लिए एसटीपीआई द्वारा एक इंटरनेट बैंडविड्थ कनेक्टिविटी और पहले से ही एसपीआईसी केंद्र रु। में सॉफ्टवेयर निर्यात में योगदान दे रहा है। 5 करोड़ प्रति वर्ष। इस सेगमेंट में बहुत बड़ी संभावनाएं थीं और विकास में तेजी आ सकती है, बशर्ते इस केंद्र की स्थापना से ऐसी सुविधा का निर्माण हो, क्योंकि मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर था।

यह अनुमान लगाया जाता है कि EDC परियोजना एक बड़ा सॉफ्टवेयर निर्यात केंद्र बन जाएगा, इसके अलावा युवा उद्यमियों के लिए रेडीमेड स्थान प्रदान करने के अलावा जिनके पास उज्ज्वल विचार हैं, लेकिन बुनियादी ढाँचा बनाने के लिए पूंजी नहीं है। राजीव गांधी चंडीगढ़ प्रौद्योगिकी पार्क में ईडीसी की स्थापना के साथ, शहर को निर्यात के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे के संचयी प्रभाव और रोजगार पर अर्थव्यवस्था में वृद्धि के निर्यात के प्रभाव और सभी समृद्धि पर लाभ होगा।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
परियोजना निदेशक -सीएम- निदेशक आईटी
चंडीगढ़ प्रशासन।

Sector 9 - D, Chandigarh - 160 009
Tel : +91 172 2740641
Fax: +91 172 2740005
Email : dit-chdut AT nic.in
शहर से सॉफ्टवेयर और आईटी सेवाओं का निर्यात बढ़कर रु। राजीव गांधी चंडीगढ़ टेक्नोलॉजी पार्क (RGCTP) के विकास के साथ अगले तीन वर्षों के भीतर 1000 करोड़।

एक आधिकारिक प्रवक्ता ने आज यहां कहा, चूंकि आरजीसीटीपी का विकास पूरी तरह से हो रहा है और आने वाले वर्षों में प्रशासन की सभी बड़ी पहलें हो रही हैं, इसलिए अकेले चंडीगढ़ से सॉफ्टवेयर निर्यात 1000 करोड़ रुपये के पार पहुंचने की उम्मीद है।

चंडीगढ़ की सॉफ्टवेयर कंपनियां इस वित्तीय वर्ष में तेजी से बढ़ेंगी

एक नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज (नैसकॉम) ने अपने वार्षिक शिखर सम्मेलन में पूरे देश में सूचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए अच्छी खबरें भेजीं। चंडीगढ़ में भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियां वित्तीय वर्ष से मार्च 2019 तक सॉफ्टवेयर सेवाओं के बढ़ते निर्यात का श्रेय 7-9 प्रतिशत की राजस्व वृद्धि देखेंगी। सॉफ्टवेयर सेवाओं के निर्यात में अधिक वृद्धि देखी जाएगी क्योंकि उद्योग देश के आईटी क्षेत्र के साथ-साथ अन्य उद्योगों की मांग में बढ़ रहा है जो इन्फो-टेक सेवाएं चाहते हैं।
जिसे घोंघा विकास वर्ष कहा जा रहा है, पिछले साल इस क्षेत्र की वास्तविकता थी। यह सर्वर रखरखाव से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मैनेजमेंट की विस्तृत अनुमानित पारी का परिणाम है।

चंडीगढ़ में, उद्योग में अपने नौसिखिए के कारण, सॉफ्टवेयर कंपनियों का विकास तेजी से देखा जाता है।
पिछले वर्ष के स्लग कार्यों के बाद, तेज को बहुत अधिक उत्साह की आवश्यकता है, यहां तक ​​कि भविष्यवाणी भी। ऐसा इसलिए हो सकता है कि अर्थव्यवस्था के समग्र मंदी के कारण बाद के आधे हिस्से में आर्थिक नीतियों को श्रेय दिया जाता है, न कि कई ओलों को। फिर भी, ये नीतियां कई व्यवसायों के लिए एक सकारात्मक परिणाम दिखाना शुरू कर रही हैं जो आईटी सेवाओं की मांग कर रहे हैं। खैर, क्या यह हमारे लिए बहुत अच्छी खबर नहीं है? आप जानते हैं, सॉफ्टवेयर विकास भी 2017 का सबसे पसंदीदा काम है और इस पर सबसे अधिक भुगतान किया जाता है। इसका मतलब है कि, अधिक व्यवसाय ऑनलाइन होंगे, और अधिक सॉफ्टवेयर कंपनियों को चंडीगढ़ में बुलाया जाएगा।
क्या आप जानना चाहते हैं कि चंडीगढ़ में सॉफ्टवेयर कंपनियां क्यों गुस्से में हैं? यहाँ क्यों है:

चंडीगढ़ में सॉफ्टवेयर कंपनियां एक भेदी विकास देख रही हैं, जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सूचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में योगदान देगा।
चंडीगढ़ राजधानी क्षेत्र से सॉफ्टवेयर निर्यात, जिसमें चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली शामिल हैं, ने पिछले वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले चालू वित्त वर्ष (2008-09) के पहले छह महीनों (अप्रैल-सितंबर) में मामूली वृद्धि दर्ज की है।
आंकड़ों के अनुसार, 2008-09 के पहले छह महीनों में सॉफ्टवेयर निर्यात 322.35 करोड़ रुपये था, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 321.47 करोड़ रुपये था।

उद्यमियों का विचार है कि सटीक तस्वीर चालू वित्त वर्ष की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में उभरेगी और अमेरिका में मौजूदा आर्थिक संकट के कारण प्रभाव की किसी भी संभावना से इंकार करेगी।
यह ध्यान देने योग्य है कि सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क ऑफ इंडिया (एसटीपीआई), मोहाली, ने चंडीगढ़ राजधानी क्षेत्र से 2008-09 में सॉफ्टवेयर और सेवाओं के निर्यात के कुल मूल्य में 32 प्रतिशत की और वृद्धि का अनुमान लगाया है।

बिजनेस स्टैंडर्ड से बात करते हुए, एसटीपीआई मोहाली के संयुक्त निदेशक और केंद्र प्रमुख, अजय पी।

श्रीवास्तव ने कहा: “फिलहाल, हम यह नहीं कह सकते हैं कि मौजूदा मंदी के कारण चंडीगढ़ राजधानी क्षेत्र से सॉफ्टवेयर निर्यात प्रभावित है। मौजूदा वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में सटीक तस्वीर स्पष्ट होगी क्योंकि अधिकांश कंपनियां उस अवधि में चालान कर रही हैं। ”
मोबेरा सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के सह-संस्थापक पुनीत वात्सायन कहते हैं, वर्तमान में चल रही मंदी ने हमारे व्यवसाय को प्रभावित नहीं किया है, लेकिन हम यह नहीं कह सकते हैं कि निकट भविष्य में क्या होगा।
श्रीवास्तव के अनुसार, 2007-08 में, क्षेत्र में सॉफ्टवेयर और सेवा उद्योग ने मजबूत वृद्धि देखी थी और 2006-07 के दौरान 560.76 करोड़ रुपये के मुकाबले कुल मूल्य 822.27 रुपये तक पहुंच गया था। कीमती विदेशी मुद्रा अर्जित करने के अलावा, इस क्षेत्र के सॉफ्टवेयर उद्योग ने लगभग 10,000 पेशेवरों को प्रत्यक्ष रोजगार भी दिया है।
इसके अलावा, इस क्षेत्र ने कई नई स्टार्ट-अप कंपनियों को आकर्षित किया है और कई आईटी / आईटीईएस इकाइयों की संख्या 2002-03 में 145 से बढ़कर 2007-08 में 253 हो गई है। 2008-09 के अंत तक यह आंकड़ा 300 के पार जाने की उम्मीद है।

एसटीपीआई का अनुमान है कि 2009-10 तक कुल निर्यात में 1,500 करोड़ रुपये का निर्यात करने वाली 25 नई इकाइयाँ बाजार में आएँगी।
श्रीवास्तव ने कहा कि इस क्षेत्र में विकास बड़े पैमाने पर छोटे और मध्यम उद्यमों (एसएमई) की वृद्धि से हुआ है।
इस वित्तीय वर्ष में एसटीपीआई, मोहाली के साथ पंजीकृत 13 नए लघु और मध्यम आईटी उद्यमों, वियना आईटी सॉल्यूशंस (पी) लिमिटेड, ऑप्टिमाइज़ेशन सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजीज, ओपीके ई सर्विसेज प्राइवेट। लिमिटेड, इंटेक्स इन्फोकॉम सॉल्यूशंस प्रा। लि।, स्टार्टअप फार्म (I) प्रा। लिमिटेड, एगिलिस्ट कंसल्टिंग प्रा। लिमिटेड, नेटस्मार्टज़ इन्फोटेक प्रा। लिमिटेड आदि 
STPI एक्सपोर्ट सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट्स को 32% चंदनगढ़ क्षेत्र से प्राप्त करना है
अर्चित द्वारा पोस्ट | गुरुवार, 11 सितंबर, 2008 |

सॉफ्टवेयर स्वर्णलीन कौर
द फाइनेंशियल एक्सप्रेस
सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (एसटीपीआई) ने वित्तीय वर्ष 2008-09 के दौरान चंडीगढ़, मोहाली, पंचकुला और पड़ोसी क्षेत्रों से 32% की दर से सॉफ्टवेयर और सेवाओं के निर्यात का अनुमान लगाया है।
मोहाली स्थित एसटीपीआई के अनुसार, इस क्षेत्र में इसकी इकाइयों और विशेष आर्थिक क्षेत्रों में 1,000 करोड़ रुपये का निर्यात होगा। पिछले वित्त वर्ष में एसटीपीआई इकाइयों का निर्यात 682.67 करोड़ रुपये था, जबकि एसईजेड इकाइयों ने 139.60 करोड़ रुपये का निर्यात किया और कुल 822.27 करोड़ रुपये का निर्यात किया।

एसईपीआई के संयुक्त निदेशक और केंद्र के प्रमुख, अजय पी श्रीवास्तव ने एफई से बात करते हुए कहा, “इस क्षेत्र में विकास बड़े पैमाने पर छोटे और मध्यम उद्यमों (एसएमई) की वृद्धि से हुआ है। यह वित्तीय वर्ष, ओपीके ई सर्विसेज प्राइवेट सहित छह नए छोटे और मध्यम आईटी उद्यम। लिमिटेड, इंटक इन्फोकॉम प्रा। लि।, स्टार्टअप फार्म (I) प्रा। लिमिटेड, एगिलिस्ट कंसल्टिंग प्रा। लिमिटेड, नेटस्मार्टज़ इन्फोटेक (आई) प्रा। लिमिटेड और AAA बेनेफिट्स सर्विसेज बैंडवागन में शामिल हो गए हैं। एसएमई क्षेत्र 32% की वृद्धि हासिल करने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा। ”

एसटीपीआई केंद्र सरकार के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त समाज है और सॉफ्टवेयर निर्यात कंपनियों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। एसटीपीआई मोहाली के साथ 250 से अधिक इकाइयां पंजीकृत हैं, जिनमें से लगभग 135 इकाइयां सक्रिय रूप से निर्यात में योगदान करती हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र में आईटी क्षेत्र में 10,000 पेशेवरों की जनशक्ति है।

पिछले 51 वर्षों से एक प्रमुख आईटी गंतव्य शहर

चंडीगढ़, भारत के पहले प्रधान मंत्री के सपनों का शहर, श्री। जवाहर लाल नेहरू, प्रसिद्ध फ्रांसीसी वास्तुकार ले कोर्बुसियर द्वारा योजना बनाई गई थी। शिवालिकों की तलहटी में स्थित, यह शहर भारत में 20 वीं शताब्दी में शहरी नियोजन और आधुनिक वास्तुकला में सर्वोत्तम प्रयोगों के लिए जाना जाता है। 01.11.1966 को शहर का पुनर्गठन, इसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया और केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में किया गया।

सॉफ्टवेयर उद्योग 1960 तक भारत में कुछ भी नहीं था। 1972 में, सरकार। भारत ने एक सॉफ्टवेयर निर्यात योजना तैयार की। हम कह सकते हैं कि 1972 भारत में सॉफ्टवेयर उद्योग के लिए एक स्थापना वर्ष था, और 1991 के बाद इस उद्योग ने भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी तस्वीर में प्रवेश किया। उद्योग ने वर्ष 2000 के बाद मजबूत वृद्धि दर्ज की।

पिछले 51 वर्षों में, चंडीगढ़ ने भौतिक बुनियादी ढाँचे और व्यावसायिक वातावरण के मामले में उत्कृष्ट प्रगति की है। एक उभरते हुए आर्थिक विकास केंद्र के रूप में, विशेष रूप से भारत के अन्य आईटी शहरों से आईटी हब के रूप में, चंडीगढ़ आईटीईएस कंपनियों के लिए एक पसंदीदा स्थान बन गया है। चंडीगढ़ बनाना, आईटी सक्षम सेवाओं के लिए एक प्रमुख केंद्र; एक पॉलिसी को सेक्टर और सिटी एडमिन उद्देश्यों की वृद्धि को सुविधाजनक बनाने और बढ़ाने के लिए बनाया गया है। सीआईआई द्वारा हाल ही के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2016 (वर्तमान मूल्य) में प्रति व्यक्ति आय 268,656 रुपये थी, जो देश में सबसे अधिक है और बड़ा हिस्सा आईटी और उनकी सेवाओं के बुनियादी ढांचे से आता है। संचार नेटवर्क, तकनीकी संस्थानों और अन्य राज्यों के साथ कनेक्टिविटी के उत्कृष्ट आधार के साथ, भारत के दूसरे हिस्से की तुलना में शहर की तुलना शिक्षा, बुनियादी स्वास्थ्य, या जीवन प्रत्याशा से बेहतर है।

सूचना प्रौद्योगिकी विभाग चंडीगढ़ के मार्गदर्शन में चंडीगढ़ (SPIC) में आईटी को बढ़ावा देने के लिए सोसाइटी की स्थापना की गई है। चंडीगढ़ प्रशासन चंडीगढ़ में आईटी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन की कई योजनाओं को क्रियान्वित कर रहा है। चंडीगढ़ देश के बढ़ते आईटी शहरों में से एक के रूप में उभर रहा है और कई M.N.Cs बैंगलोर से स्थानांतरित हो रहे हैं। सूचना के युग में नेतृत्व और उत्कृष्टता की स्थिति को पूरा करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने के लिए राज्य इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल को बढ़ावा देने के लिए ठोस प्रयास कर रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में, प्रशासन द्वारा योजनाबद्ध कुछ प्रमुख आईटी पहलों ने उत्कृष्ट परिणाम दिखाए हैं। चंडीगढ़ एक आधुनिक शहर है और दुनिया में शहर को शामिल करने के लिए, विश्व मानक परियोजनाओं की भविष्यवाणी करना महत्वपूर्ण है जो न केवल शहर की आर्थिक रूपरेखा को समृद्ध करते हैं, बल्कि अपने मानव संसाधनों के लिए कई रोजगार के अवसर भी प्रदान करते हैं। उत्तर भारत, एक पूरे के रूप में दक्षिणी राज्यों से पिछड़ गया था।

सिंधु उद्यमी, चंडीगढ़, पंचकुला और मोहाली क्षेत्र की उन्नति के लिए एक रोड मैप तैयार करते हैं। रोडमैप को ध्यान में रखते हुए, राजीव गांधी चंडीगढ़ टेक्नोलॉजी पार्क (RGCTP) की एक दूरदर्शी परियोजना की परिकल्पना चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा की गई, जिसका उद्घाटन सितंबर 2005 में डॉ। मनमोहन सिंह, पूर्व पीएम इंडिया ने किया था।
यहां राजीव गांधी चंडीगढ़ प्रौद्योगिकी पार्क (आरजीसीटीपी) की स्थापना क्षेत्र के आर्थिक परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई है। इसने न केवल कई सूचना प्रौद्योगिकी / सूचना प्रौद्योगिकी सक्षम सेवाओं (आईटी / आईटीईएस) कंपनियों को आकर्षित किया है, बल्कि आस-पास के शहरों जैसे पंजाब में मोहाली और हरियाणा में पंचकुला में आईटी गतिविधियों का विस्तार करने में भी मदद की है।

इसने शहर के आर्थिक परिदृश्य को बदल दिया है और अर्थव्यवस्था के विकास को सुविधाजनक बनाकर, विशेषकर सेवा क्षेत्र में। RGCTP को इस उन्नत मानव पूंजी को अपने यहां रोजगार के अवसर प्रदान करके बनाए रखने की योजना बनाई गई है। यहां RGCTP में, चंडीगढ़ प्रशासन और निजी क्षेत्र द्वारा 1500 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है।
आरजीसीटीपी की स्थापना से, हम एक क्षेत्र से कुल निर्यात में जबरदस्त वृद्धि देख सकते हैं, जो 2005-06 में 414.97 करोड़ और 2014-16 में 2890.72 करोड़ थी, (डेटा स्रोत: सूचना प्रौद्योगिकी विभाग चंडीगढ़)। यूटी में तेजी से वृद्धि के कई कारण थे, जैसे कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) से व्यापार के लिए आसान औद्योगिक / आईटी आवास और जिसमें निवेश करने वाली कंपनियों को सिंगल विंडो क्लीयरेंस प्राप्त होगी और एसईजेड की नीति के अनुसार लाभ प्राप्त करने में सक्षम होंगे भारत सरकार।

भारतीय आईटी-बीपीएम उद्योग 2025 तक $ 350 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है (रिपोर्ट: नैसकॉम)। इस क्षेत्र की वृद्धि के लिए DITC योजनाबद्ध पहल और दृष्टि विश्वसनीय है। शहर इस क्षेत्र में विकास के लिए एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है।युवा उद्यमी मोहाली के विकास की कहानी में नया अध्याय लिखते हैं
एसटीपीआई, मोहाली में अतिरिक्त निदेशक अजय प्रसाद श्रीवास्तव का कहना है कि स्टार्टअप शुरू करने के पीछे का विचार उन्हें अनुकूल उद्यमी पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करना है और साथ ही उन्हें अपने नवाचार और सॉफ्टवेयर उत्पाद विकास को बढ़ावा देने में मदद करना है।औद्योगिक क्षेत्र, मोहाली में एसटीपीआई भवन में अपने उद्यम शुरू करने वाले नवप्रवर्तक। (करुण शर्मा / एचटी)

चंडीगढ़, मोहाली और पंचकुला तीन वर्षों में लगभग 1,000 करोड़ रुपये के संयुक्त वार्षिक सॉफ्टवेयर निर्यात की उम्मीद कर रहे हैं। इसके अलावा, क्वार्क, डेल और आईडीएस इन्फोटेक मोहाली से चल रहे हैं।

चंडीगढ़ (मोहाली सहित) ने 270 करोड़ रुपये का आईटी निर्यात और पिछले वित्त वर्ष में 416 करोड़ रुपये का निर्यात कारोबार दर्ज किया।

प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा पिछले साल 24 सितंबर को (चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा 2001 में कल्पना की गई), उद्घाटन के पहले चरण में 123 एकड़ क्षेत्र में पार्क का निर्माण शुरू हुआ।

इन्फोसिस टेक्नोलॉजीज लिमिटेड को मुख्य एंकर कंपनी के रूप में 30 एकड़ का आवंटन किया गया था और उसने 525,000 वर्ग फुट के अत्याधुनिक परिसर का निर्माण किया है। इसके अलावा, पहले चरण में डीएलएफ लिमिटेड द्वारा विकसित तैयार निर्मित स्थान 12.5 एकड़ में फैला है और इसमें 650,000 वर्ग फुट के छह ब्लॉक शामिल हैं। आईबीएम दक्ष, आउटर बे और नेट सॉल्यूशन कंपनियों में से हैं।

पार्क का दूसरा चरण 250 एकड़ में फैला है। इसमें से 125 एकड़ आईटी / आईटीईएस कंपनियों के लिए और शेष क्षेत्र एक टेक्नोलॉजी हैबिटेट के लिए है, जो 125 एकड़ में फैला है, जिसमें आवासीय फ्लैट, सर्विस अपार्टमेंट, सामुदायिक बुनियादी ढांचा, आदि शामिल हैं। दूसरे चरण में, विप्रो, एक लंगर कंपनी के रूप में। को 30 एकड़, भारती टेली-वेंचर्स को 5 एकड़, ई-सीस 6 एकड़ और टेक महिंद्रा को 10 एकड़ आवंटित किया गया है।

आईटी विभाग पहले ही एसईजेड अनुमोदन के लिए अपेक्षित दस्तावेज प्रस्तुत कर चुका है और उम्मीद करता है कि इसे बहुत जल्द ही प्रदान किया जाएगा।

आईटी कंपनियों की अपार प्रतिक्रिया को देखते हुए, प्रशासन पार्क के तीसरे चरण के लिए भूमि का अधिग्रहण करने की प्रक्रिया में है, जो 250 एकड़ की अन्य भूमि में फैलेगी और उन्हें उम्मीद है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया 7- के भीतर पूरी हो जाएगी। 8 महीने। इसके अलावा, कोई भी इस तथ्य से अच्छी तरह से अवगत हो सकता है कि यह आईटी कंपनियों के लिए अगले गंतव्य के रूप में उभर रहा है क्योंकि पटनी कंप्यूटर और कई अन्य लोगों ने भूमि के अधिग्रहण से पहले ही तीसरे चरण में जगह के लिए आवेदन किया है।

अब तक मोहाली का संबंध है, क्वार्क, डेल और आईडीएस इन्फोटेक पहले ही अपने ऑपरेशन शुरू कर चुके हैं।

आईटी / आईटीईएस क्षेत्र को और गति देने के उद्देश्य से, यूटी प्रशासन अब विभिन्न खिलाड़ियों के लिए सही कारोबारी माहौल प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, क्योंकि यह ई-क्रांति शिखर सम्मेलन 2006 की मेजबानी के लिए तैयार है। विशेष रूप से, ई-क्रांति 2005 के बाद, राजीव गांधी चंडीगढ़ टेक्नोलॉजी पार्क ने 400 करोड़ रुपये के निवेश को आकर्षित किया है।

बिजनेस स्टैंडर्ड, भारत के सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क से बात करते हुए, अतिरिक्त निदेशक, संजय त्यागी ने कहा, “हमने 1998-99 में निर्यात कारोबार के रूप में लगभग 7.7 करोड़ के साथ शुरुआत की थी, और 2005-06 में 416 करोड़ रुपये को छूते हुए एक बड़ी वृद्धि हासिल की। एक निर्यात कारोबार के रूप में और आगे हम अगले तीन वर्षों में सॉफ्टवेयर निर्यात के रूप में 1000 करोड़ रुपये को छूने के लिए आशान्वित हैं। ”

उन्होंने आगे कहा, यह सम्मेलन क्षेत्र का निर्माण करने के लिए किया गया एक प्रयास है। यह शहर में दूसरा सम्मेलन होगा, जहां तीन राज्य सरकारें (पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़) एक साझा एजेंडा पर एक साथ खड़ी होंगी - व्यापार पारिस्थितिकी तंत्र में मूल्य पैदा करना आईटी-आईटीईएस / बीपीओ उद्योग और राष्ट्रीय ई-शासन पहल में साझा सेवाओं के महत्व के लिए। 

सम्मेलन का पहला दिन NASSCOM द्वारा आयोजित किया जाएगा और ध्यान उत्तरी राज्यों की क्षमता पर है, विशेष रूप से चंडीगढ़ कैपिटल रीजन (पंचकुला, बद्दी, मोहाली शामिल) में।

साझा सेवाओं पर दूसरे दिन के सत्र में परिसंपत्तियों के बंटवारे, सह-स्वामित्व बुनियादी ढांचे, सेवा मानकों को बनाए रखने और लागत-कुशलता से काम करना शामिल होगा।
नैसकॉम ने कहा कि 1 अप्रैल से शुरू होने वाले वर्ष के लिए सॉफ्टवेयर निर्यात मौजूदा वित्तीय वर्ष की तुलना में धीमी गति से बढ़ सकता है क्योंकि मुद्रा की अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक दबाव है।
सॉफ्टवेयर लॉबी बॉडी ने मंगलवार को अनुमान लगाया कि 2015-16 के लिए सॉफ्टवेयर निर्यात 12-14% के बीच बढ़कर 110-112 बिलियन डॉलर हो जाएगा, जबकि चालू वित्त वर्ष के लिए 13-15% की वृद्धि का अनुमान है। नैसकॉम के नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार, 31 मार्च तक आईटी क्षेत्र के लिए कुल राजस्व 13% से $ 146 बिलियन तक बढ़ने की उम्मीद है।
घरेलू मोर्चे पर, नैसकॉम ने अगले वित्त वर्ष में 15-17% की वृद्धि को 55-57 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया।

ई-कॉमर्स ग्रोथ के दम पर चालू वित्त वर्ष में भारतीय घरेलू बाजार 14% बढ़कर 48 बिलियन डॉलर होने की उम्मीद है। ई-कॉमर्स, सरकार की पहल और उद्योगों द्वारा प्रौद्योगिकी अपनाने के कारण घरेलू विकास की उम्मीद है। नैसकॉम ने कहा कि 2014-15 में $ 26 बिलियन के सरकारी निवेश ने भी घरेलू राजस्व वृद्धि में मदद की।

लॉबी समूह 2020 तक अपने पूरे क्षेत्र में लगातार वृद्धि के बल पर अपने $ 300 बिलियन भारतीय आईटी क्षेत्र के राजस्व लक्ष्य को पूरा करने के लिए आश्वस्त है।

विस्तार

आईटी उद्योग भारत में सबसे बड़ा निजी क्षेत्र का नियोक्ता बना हुआ है, 2014-15 में 230,000 कर्मचारियों को जोड़कर, उद्योग में नौकरियों की कुल संख्या को 3.5 मिलियन तक ले गया, जबकि सकल घरेलू उत्पाद का 9.5% हिस्सा है। आईटी उद्योग के पास कुल सेवाओं के निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा 38% है।

पूर्वानुमान की घोषणा करते हुए मुंबई में एक संवाददाता सम्मेलन के मौके पर, नासकॉम के अध्यक्ष आर। चंद्रशेखर ने कहा कि भारत अगले दो वर्षों में आसानी से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप हब बन सकता है, जो नए उद्यमों की तीव्र गति को देख रहा है। देश में।

अमेरिका में निर्यात, सबसे बड़ा बाजार, ऊपर-उद्योग औसत में वृद्धि हुई, एक आर्थिक पुनरुद्धार और उच्च प्रौद्योगिकी अपनाने के आधार पर। वित्त वर्ष की पहली छमाही के दौरान यूरोप से मांग मजबूत रही लेकिन मुद्रा की चाल और आर्थिक चुनौतियों के कारण दूसरी छमाही के दौरान नरम हो गई।
भारत की सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात पिछले कुछ वर्षों से बढ़ रहा है लेकिन देर से चिंता करने के कुछ कारण हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर और सूचना प्रौद्योगिकी-सक्षम सेवाओं के निर्यात के साथ-साथ अमेरिकी डॉलर के संदर्भ में 2015-16 के दौरान व्यापार प्रक्रिया आउटसोर्सिंग कंपनियों में तेजी से वृद्धि हुई है।

वैश्विक निकाय और भारतीय आईटी कंपनियों की कमजोर कमाई के बीच उद्योग संगठन नैसकॉम ने पिछले महीने 2016-17 के लिए निर्यात आय के लिए अपने विकास के दृष्टिकोण को 10-12% से 8-10% तक घटा दिया।
इसके अलावा, भारतीय आईटी उद्योग अभी भी अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर करता है, जो कुछ विविधीकरण के बावजूद, सॉफ्टवेयर निर्यात के साथ-साथ स्थानीय कंपनियों के विदेशी सहयोगियों द्वारा सॉफ्टवेयर व्यवसाय के लिए सबसे बड़ा गंतव्य बना हुआ है।
यहां भारत की सॉफ्टवेयर सेवाओं के निर्यात पर त्वरित नज़र है और सबसे अधिक राजस्व के लिए कौन से सेगमेंट और देश हैं

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चंडीगढ़ राजधानी क्षेत्र (चंडीगढ़, पंचकूला, मोहाली शामिल है) से सॉफ्टवेयर निर्यात 2010-11 में 1565.33 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग 31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करता है। 2009-10 में क्षेत्र से कुल निर्यात 1196.58 करोड़ रुपये था।

इंफोसिस लिमिटेड, डेल इंटरनेशन सर्विसेज (पी) लिमिटेड, आईडीएस इन्फोटेक लिमिटेड, एनवीश सॉल्यूशंस (पी) लिमिटेड और एमर्सन डिजाइन इंजीनियरिंग सेंटर शीर्ष पांच कंपनियां हैं जिन्होंने निर्यात के मामले में अच्छा प्रदर्शन किया है।

इस क्षेत्र ने कई नए स्टार्टअप को आकर्षित किया है। इसके अलावा, आईटी / आईटीईएस इकाइयों की संख्या 2002-03 में 145 से बढ़कर 2010-11 में 242 हो गई। इसके अलावा, एसटीपीआई ने पहले कहा था कि इस क्षेत्र में विकास बड़े पैमाने पर छोटे और मध्यम उद्यमों के विकास से हुआ है।

इकाइयां एसटीपीआई के साथ पंजीकृत हैं और 2010-11 में निर्यात के मामले में शीर्ष तीन पदों पर काबिज हैं: इंफोसिस टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (चंडीगढ़ से), डेल इंटरनेशनल सर्विसेज (आई) प्राइवेट लिमिटेड (पंजाब से) और आईडीएस इन्फोटेक लिमिटेड।

कुल मिलाकर, 2009-10 में, चंडीगढ़ क्षेत्र से सॉफ्टवेयर निर्यात 1196.58 करोड़ रुपये (एसईजेड से निर्यात सहित) के अनुरूप था। जबकि 2008-09 में एसटीपीआई इकाइयों से सॉफ्टवेयर निर्यात 731.85 करोड़ रुपये और एसईजेड से निर्यात 318.08 करोड़ रुपये था।

साथ ही, इसके साथ पंजीकृत आईटी कंपनियों की सुविधा के लिए, एसटीपीआई मोहाली (पंजाब) में 40 करोड़ रुपये के निवेश के साथ एक नया कार्यालय स्थापित कर रहा है। 1 लाख वर्ग फीट में फैले इस कार्यालय में प्रशासनिक कार्यालय के साथ-साथ डेटा और इन्क्यूबेशन के केंद्र होंगे। 60,000 वर्ग फीट में फैली प्रस्तावित सुविधा के दो साल में पूरा होने की संभावना है।
भारत में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) उद्योग का विकास!
सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के दो मुख्य घटक सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर हैं। सॉफ्टवेयर इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में प्रमुख उद्योग के रूप में उभरा है। इस उद्योग ने 1970 के दशक में एक मामूली शुरुआत की और 1980 के दशक के मध्य तक, पूर्वानुमानकर्ताओं, विश्लेषकों और नीति नियोजकों ने कंप्यूटर सॉफ्टवेयर अनुप्रयोग की क्षमता को समझना शुरू कर दिया।

इस उद्योग ने 1990 के दशक में एक बड़ी सफलता हासिल की और अब यह भारत के महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक है। सॉफ्टवेयर उद्योग के तेजी से विकास का मुख्य कारण तकनीकी रूप से कुशल जनशक्ति का विशाल भंडार है जिसने भारत को सॉफ्टवेयर सुपर पावर में बदल दिया है।
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अब देश में 500 से अधिक सॉफ्टवेयर फर्मों का एक महत्वपूर्ण द्रव्यमान है और इन कंपनियों के अलावा अतिरिक्त 1,000 स्टार्ट-अप कंपनियां हैं। आज, भारत एक ऐसा देश है जो लागत-प्रभावशीलता, महान गुणवत्ता, उच्च विश्वसनीयता, शीघ्र वितरण और सबसे बढ़कर, सॉफ्टवेयर उद्योग में अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करता है। वर्ष 1995-96 भारतीय कंप्यूटर उद्योग के लिए एक बूम वर्ष था और भारत का सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) उद्योग वास्तव में उस वर्ष में विस्फोट हो गया।
वैश्विक बाजार में जारी प्रौद्योगिकी मंदी, मजबूत बुनियादी बातों और सॉफ्टवेयर और सेवा उद्योग के मूल मूल्य की स्थिति जैसी चुनौतियों के बावजूद देश में अन्य सभी क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन हुआ। 2002-03 में इसका निर्यात 26.3 प्रतिशत बढ़ा, जो कि 46,100 करोड़ रुपये का राजस्व था।

भारतीय सॉफ्टवेयर और सेवा उद्योग दुनिया भर में बहुत कम क्षेत्रों में से एक है जिसने दोहरे अंक की वृद्धि देखी है (छवि 27.11)। इसने 1997 में अपने कुल निर्यात का 4.9 प्रतिशत से बढ़कर 2002-03 में 20.4 प्रतिशत हो गया। इससे चार मिलियन लोगों के लिए कुल रोजगार (समर्थन सेवाओं सहित) उत्पन्न होने की उम्मीद है, भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 7 प्रतिशत और वर्ष 2008 में भारत के विदेशी मुद्रा प्रवाह का 30 प्रतिशत।

सॉफ्टवेयर भारत में निर्यात का एक प्रमुख आइटम बन गया है। वर्ष 2004-05 में, भारत के सॉफ्टवेयर और सेवा निर्यात ने 34.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। 2004-05 में कुल सॉफ्टवेयर और सेवाओं का राजस्व 32 प्रतिशत बढ़कर $ 22 बिलियन और 2005-06 में 28.5 बिलियन डॉलर हो गया (देखें तालिका 27.21)।
आईटी उद्योग की तालिका 27.21Progress ($ अरब में आंकड़ा):
साल

आईटी सॉफ्टवेयर और सेवा निर्यात

ITE-BPO निर्यात करता है

घरेलू बाजार

संपूर्ण

नैसकॉम के अनुसार, उद्योग को निकट भविष्य में 30 से 32 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करने की उम्मीद है। नैसकॉम के अनुसार, घरेलू बाजार में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई। नैस्कॉम द्वारा किए गए सर्वेक्षण के निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि भारत में आउटसोर्सिंग का कुल मूल्य (2004- 05 में $ 17.2 बिलियन) दुनिया भर के कुल के 44 प्रतिशत के बराबर है।

यह मानने का अच्छा कारण है कि वर्तमान मजबूत गति इस उद्योग के विस्तार को आगे बढ़ाएगी। भारतीय कंपनियों ने अब तक केवल दो सबसे बड़े आईटी सेवा बाजारों पर ध्यान केंद्रित किया है, जैसे कि, यू.एस.ए और यू.के. देश जैसे कनाडा, जापान, जर्मनी और फ्रांस भारी विकास क्षमता का प्रतिनिधित्व करते हैं। नीदरलैंड, स्वीडन और ऑस्ट्रेलिया जैसे अन्य देशों में भी काफी संभावनाएं हैं। आईटी कंपनियां आक्रामक रूप से यूरोप, लैटिन अमेरिका और एशिया प्रशांत में अन्य बाजारों की खोज कर रही हैं।
हार्डवेयर:
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सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) उद्योग का हार्डवेयर खंड उत्पादन, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मामले में सबसे तेजी से बढ़ते उद्योगों में से एक है और यह नवाचार द्वारा विशेषता है। हाल के एक अध्ययन के अनुसार, 2010 तक, वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग $ 1 ट्रिलियन का आंकड़ा पार कर जाएगा और भारतीय इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर उद्योग तब तक $ 73 बिलियन से अधिक हो सकता है। घटक खंड में 2010 तक $ 11 बिलियन तक पहुंचने की क्षमता है। यह 5 मिलियन से अधिक व्यक्तियों को रोजगार के अवसर प्रदान करेगा।

चंडीगढ़ समस्त उत्तर भारत में एक प्रमुख शिक्षा केंद्र के रूप में जाना जाता है। नज़दीकी राज्यों पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर व उत्तराखण्ड आदि से भारी संख्या में विद्यार्थी पढ़ने के लिए यहाँ आते हैं। 

पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ भारत के सबसे खूबसूरत और नियोजित शहरों में एक है। इस केन्द्र शासित प्रदेश को प्रसिद्ध फ़्रांसीसी वास्तुकार ली कोर्बूजियर ने अभिकल्पित किया था। इस शहर का नाम एक दूसरे के निकट स्थित चंडी मंदिर और गढ़ किले के कारण पड़ा जिसे चंडीगढ़ के नाम से जाना जाता है। शहर में बड़ी संख्या में पार्क हैं जिनमें लेसर वैली, राजेन्द्र पार्क, बॉटोनिकल गार्डन, स्मृति उपवन, तोपियारी उपवन, टेरस्ड गार्डन और शांति कुंज प्रमुख हैं। चंडीगढ़ में ललित कला अकादमी, साहित्य अकादमी, प्राचीन कला केन्द्र और कल्चरल कॉम्प्लेक्स को भी देखा जा सकता है।

यहाँ हरियाणा और पंजाब के अनेक प्रशासनिक भवन हैं। विधानसभा, उच्च न्यायालय और सचिवालय आदि इमारतें यहाँ देखी जा सकती हैं। यह कॉम्प्लेक्स समकालीन वास्तुशिल्प का एक बेहतरीन उदाहरण है। यहाँ का ओपन हैंड स्मारक कला का उत्तम नमूना है।

कैपिटल कॉम्प्लेक्स को २०१६ में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।

चंडीगढ़ आने वाले पर्यटक रॉक गार्डन आना नहीं भूलते। इस गार्डन का निर्माण नेकचंद ने किया था। इसे बनवाने में औद्योगिक और शहरी कचरे का इस्तेमाल किया गया है। पर्यटक यहाँ की मूर्तियों, मंदिरों, महलों आदि को देखकर अचरज में पड़ जातें हैं। हर साल इस गार्डन को देखने हजारों पर्यटक आते हैं। गार्डन में झरनों और जलकुंड के अलावा ओपन एयर थियेटर भी देखा जा सकता, जहाँ अनेक प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियां होती रहती हैं।

जाकिर हुसैन रोज़ गार्डन के नाम से विख्यात यह गार्डन एशिया का सबसे बड़ा रोज़ गार्डन है। यहाँ गुलाब की 1600 से भी अधिक किस्में देखी जा सकती हैं। गार्डन को बहुत खूबसूरती से डिजाइन किया गया है। अनेक प्रकार के रंगीन फव्वारे इसकी सुंदरता में चार चाँद लगाते हैं। हर साल यहाँ गुलाब पर्व आयोजित होता है। इस मौके पर बड़ी संख्या में लोगों का यहाँ आना होता है।

यह मानव निर्मित झील 3 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इसका निर्माण 1958 में किया गया था। अनेक प्रवासी पक्षियों को यहाँ देखा जा सकता है। झील में बोटिंग का आनंद लेते समय दूर-दूर फैले पहाड़ियों के सुंदर नजारों के साथ-साथ सूर्यास्त के नजारे भी यहाँ से बड़े मनमोहक दिखाई देते हैं।

चंडीगढ़ में अनेक संग्रहालय हैं। यहाँ के सरकारी संग्रहालय और कला दीर्घा में गांधार शैली की अनेक मूर्तियों का संग्रह देखा जा सकता है। यह मूर्तियां बौद्ध काल से संबंधित हैं। संग्रहालय में अनेक लघु चित्रों और प्रागैतिहासिक कालीन जीवाश्म को भी रखा गया है। अन्तर्राष्ट्रीय डॉल्स म्युजियम में दुनिया भर की गुडियाओं और कठपुतियों को रखा गया है।

लगभग 2600 हेक्टेयर में फैले इस अभयारण्य में बड़ी संख्या में वन्यजीव और वनस्पतियां पाई जाती हैं। मूलरूप से यहाँ पाए जाने वाले जानवरों में बंदर, खरगोश, गिलहरी, साही, सांभर, भेड़िए, जंगली शूकर, जंगली बिल्ली आदि शामिल हैं। इसके अलावा सरीसृपों की अनेक प्रजातियों भी यहाँ देखी जा सकती हैं। अभयारण्य में पक्षियों की विविध प्रजातियों को भी देखा जा सकता है।

भारत की लोकसभा में चण्डीगढ़ के लिए एक सीट आवंटित है। वर्तमान सोलहवीं लोकसभा में यहाँ का प्रतिनिधित्व श्रीमती किरण खेर कर रही हैं जो कि भारतीय जनता पार्टी से संबद्ध हैं। इससे पहले कांग्रेस के श्री पवन बंसल यहाँ से साँसद थे जो कि एक समय में भारत के रेल मंत्री भी बने।

पंजाब के राज्यपाल ही चण्डीगढ़ के प्रशासक होते हैं। वर्तमान में चण्डीगढ़ के प्रशासक श्री वी पी सिंह बदनौर हैं।

हरियाणा तथा पंजाब की संयुक्त राजधानी होने के कारण राजनीतिक रूप से दोनों ही प्रदेशों के नेता इस शहर पर अपना-अपना दावा जताते रहते हैं।

चंडीगढ़ एयरपोर्ट सिटी सेंटर से करीब 11 किलोमीटर की दूरी पर, दिल्ली मार्ग पर है। देश के प्रमुख शहरों से यहाँ के लिए नियमित उड़ानें हैं।

चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन सिटी सेंटर से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित है। यह रेलवे स्टेशन शहर को देश के अन्य हिस्सों से रेलमार्ग द्वारा जोड़ता है। दिल्ली से यहाँ के लिए प्रतिदिन ट्रेने हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग 21 और 22 चंडीगढ़ को देश के अन्य हिस्सों से सड़क मार्ग द्वारा जोड़ते हैं। दिल्ली, जयपुर, ग्वालियर, जम्मू, शिमला, कुल्लू, कसौली, मनाली, अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, हरिद्वार, देहरादून, हल्द्वानी आदि शहरों से यहाँ के लिए नियमित बस सेवाएं हैं।




#Article 47: छत्तीसगढ़ (1604 words)


छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है। इसका गठन १ नवम्बर २००० को हुआ था और यह भारत का २६वां राज्य है। पहले यह मध्य प्रदेश के अन्तर्गत था। डॉ॰ हीरालाल के मतानुसार छत्तीसगढ़ 'चेदीशगढ़' का अपभ्रंश हो सकता है। कहते हैं किसी समय इस क्षेत्र में 36 गढ़ थे, इसीलिये इसका नाम छत्तीसगढ़ पड़ा। किंतु गढ़ों की संख्या में वृद्धि हो जाने पर भी नाम में कोई परिवर्तन नहीं हुआ,छत्तीसगढ़ भारत का ऐसा राज्य है जिसे 'महतारी'(मां) का दर्जा दिया गया है।भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया - एक तो 'मगध' जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण बिहार बन गया और दूसरा 'दक्षिण कौशल' जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण छत्तीसगढ़ बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। छत्तीसगढ़ तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है। एक संसाधन संपन्न राज्य, यह देश के लिए बिजली और इस्पात का एक स्रोत है, जिसका उत्पादन कुल स्टील का 15% है।छत्तीसगढ़ भारत में सबसे तेजी से विकसित राज्यों में से एक है।

छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोशल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला' था) का मत्स्य पुराण, महाभारत के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे।

इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।

छत्तीसगढ़ के उत्तर में उत्तर प्रदेश और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का शहडोल संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और झारखंड, दक्षिण में तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। यह प्रदेश ऊँची नीची पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ घने जंगलों वाला राज्य है। यहाँ साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्षों की अधिकता है। यहाँ सबसे ज्यादा मिस्रित वन पाया जाता है। सागौन की कुछ उन्नत किस्म भी छत्तीसगढ़ के वनो में पायी जाती है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि॰मी॰ चौड़ा और 322 कि॰मी॰ लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत शृंखला। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है। पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। छत्तीसगढ़ के तीन प्राकृतिक खण्ड हैं : उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार। राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं - महानदी, शिवनाथ, खारुन,सोंढूर, अरपा, पैरी तथा इंद्रावती नदी।

 

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के समय यहाँ सिर्फ 16 जिले थे पर बाद में 2 नए जिलो की घोषणा की गयी जो कि नारायणपुर व बीजापुर थे। पर इसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने 15 अगस्त 20नवरी 2012 से अस्तित्व में आ गये। 15 अगस्त 2019 को छत्तीसगढ़ की नई सरकार के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बिलासपुर जिले से काट कर 1 नए जिले के निर्माण की घोषणा की। इस तरह अब छत्तीसगढ़ में कुल 28 जिले हो गए हैं।

आदिवासी कला काफी पुरानी है। प्रदेश की आधिकारिक भाषा हिन्दी है और लगभग संपूर्ण जनसंख्या उसका प्रयोग करती है। प्रदेश की आदिवासी जनसंख्या हिन्दी की एक उपभाषा छत्तीसगढ़ी बोलती है।

छत्तीसगढ़ साहित्यिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में अति समृद्ध प्रदेश है। इस जनपद का लेखन हिन्दी साहित्य के सुनहरे पृष्ठों को पुरातन समय से सजाता-संवारता रहा है। छत्तीसगढ़ी और अवधी दोनों का जन्म अर्धमागधी के गर्भ से आज से लगभग 1080 वर्ष पूर्व नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था।
भाषा साहित्य पर और साहित्य भाषा पर अवलंबित होते है। इसीलिये भाषा और साहित्य साथ-साथ पनपते है। परन्तु हम देखते है कि छत्तीसगढ़ी लिखित साहित्य के विकास अतीत में स्पष्ट रूप में नहीं हुई है। अनेक लेखकों का मत है कि इसका कारण यह है कि अतीत में यहाँ के लेखकों ने संस्कृत भाषा को लेखन का माध्यम बनाया और छत्तीसगढ़ी के प्रति ज़रा उदासीन रहे। इसीलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है।

अनेक साहित्यको ने इस एक हजार वर्ष को इस प्रकार विभाजित किया है :

यह विभाजन किसी प्रवृत्ति की सापेक्षिक अधिकता को देखकर किया गया है। एक और उल्लेखनीय बत यह है कि दूसरे आर्यभाषाओं के जैसे छत्तीसगढ़ी में भी मध्ययुग तक सिर्फ पद्यात्मक रचनाएँ हुई है।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। यहाँ के लोकगीतों में विविधता है। गीत आकार में अमूमन छोटे और गेय होते है एवं गीतों का प्राणतत्व है -- भाव प्रवणता। छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों में से कुछ हैं: भोजली, पंडवानी, जस गीत, भरथरी लोकगाथा, बाँस गीत, गऊरा गऊरी गीत, सुआ गीत, देवार गीत, करमा, ददरिया, डण्डा, फाग, चनौनी, राउत गीत और पंथी गीत। इनमें से सुआ, करमा, डण्डा व पंथी गीत नाच के साथ गाये जाते हैं।

छत्तीसगढ़ी बाल खेलों में अटकन-बटकन लोकप्रिय सामूहिक खेल है। इस खेल में बच्चे आंगन परछी में बैठकर, गोलाकार घेरा बनाते है। घेरा बनाने के बाद जमीन में हाथों के पंजे रख देते है। एक लड़का अगुवा के रूप में अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उन उल्टे पंजों पर बारी-बारी से छुआता है। गीत की अंतिम अंगुली जिसकी हथेली पर समाप्त होती है वह अपनी हथेली सीधी कर लेता है। इस क्रम में जब सबकी हथेली सीधे हो जाते है, तो अंतिम बच्चा गीत को आगे बढ़ाता है। इस गीत के बाद एक दूसरे के कान पकड़कर गीत गाते है।

बालिकाओं द्वारा खेला जाने वाला फुगड़ी लोकप्रिय खेल है। चार, छः लड़कियां इकट्ठा होकर, ऊंखरु बैठकर बारी-बारी से लोच के साथ पैर को पंजों के द्वारा आगे-पीछे चलाती है। थककर या सांस भरने से जिस खिलाड़ी के पांव चलने रुक जाते हैं वह हट जाती है।

यह वृद्धि चातुर्थ और चालाकी का खेल है। यह छू छुओवल की भांति खेला जाता है। इसमें खिलाड़ी एड़ी मोड़कर बैठ जाते है और हथेली घुटनों पर रख लेते है। जो बच्चा हाथ रखने में पीछे होता है बीच में उठकर कहता है।

खुड़वा पाली दर पाली कबड्डी की भांति खेला जाने वाला खेल है। दल बनाने के इसके नियम कबड्डी से भिन्न है। दो खिलाड़ी अगुवा बन जाते है। शेष खिलाड़ी जोड़ी में गुप्त नाम धर कर अगुवा खिलाड़ियों के पास जाते है - चटक जा कहने पर वे अपना गुप्त नाम बताते है। नाम चयन के आधार पर दल बन जाता है। इसमें निर्णायक की भूमिका नहीं होती, सामूहिक निर्णय लिया जाता है।

डांडी पौहा गोल घेरे में खेला जाने वाला स्पर्द्धात्मक खेल है। गली में या मैदान में लकड़ी से गोल घेरा बना दिया जाता है। खिलाड़ी दल गोल घेरे के भीतर रहते है। एक खिलाड़ी गोले से बाहर रहता है। खिलाड़ियों के बीच लय बद्ध गीत होता है। गीत की समाप्ति पर बाहर की खिलाड़ी भीतर के खिलाड़ी किसी लकड़े के नाम लेकर पुकारता है। नाम बोलते ही शेष गोल घेरे से बाहर आ जाते है और संकेत के साथ बाहर और भीतर के खिलाड़ी एक दूसरे को अपनी ओर करने के लिए बल लगाते है, जो खींचने में सफल होता वह जीतता है। अंतिम क्रम तक यह स्पर्द्धा चलती है।

छत्तीसगढ़ मॆं कई जातियां और जनजातियां हैं। जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य की कुल जनसंख्या में से 30.62 प्रतिशत (78.22 लाख) जनसंख्या अनुसूचित जनजातियों की है। अघरीया, गोंड, कंवर|कंवर

तमसा पिप्पलीश्येनी तथा चित्रोत्पलापि च।।
मत्स्यपुराण - भारतवर्ष वर्णन प्रकरण - 50/25)

मन्दाकिनीं वैतरणीं कोषां चापि महानदीम्।।

तथान्यातिलघुश्रोणी विपाया शेवला नदी।।
ब्रह्मपुराण - भारतवर्ष वर्णन प्रकरण - 19/31)




#Article 48: झारखण्ड (1672 words)


भारत का 28वाँ राज्य 

झारखण्ड () भारत का एक राज्य है। राँची इसकी राजधानी है। झारखंड की सीमाएँ उत्तर में बिहार, पश्चिम में उत्तर प्रदेश एवं छत्तीसगढ़, दक्षिण में ओड़िशा और पूर्व में पश्चिम बंगाल को छूती हैं। लगभग संपूर्ण प्रदेश छोटानागपुर के पठार पर अवस्थित है। संपूर्ण भारत में वनों के अनुपात में प्रदेश एक अग्रणी राज्य माना जाता है। बिहार के दक्षिणी हिस्से को विभाजित कर झारखंड प्रदेश का सृजन किया गया था। इस प्रदेश के अन्य बड़े शहरों में धनबाद, बोकारो एवं जमशेदपुर शामिल हैं।

झारखण्ड का मतलब संताली में जाहेर खोंड (सरना स्थल) है, इसलिए जाहेर-खोंड ही झारखंड है।

झारखण्ड:
झाड़ का मतलब कुड़मालि में जंगल-झाड़ी है
इसलिए इसको झाड़ जंगलो का प्रदेश झाड़खंड कहा जाता है

प्राचीन काल

झारखण्ड के हजारीबाग जिले में लगभग 5000 साल पुराना गुफा चित्र मिला है। इस राज्य में ईसा पूर्व 1400 काल के लोहे के औज़ार और मिट्टी के बर्तन के अवशेष मिले हैं। 325 ईसा पूर्व में भारत के उत्तरी इलाके बिहार से उत्पन्न मौर्य साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। फणि मुकुट राय ने छोटानागपुर में नागवंशी वंश की स्थापना की थी।

मध्यकाल

मध्यकाल में इस क्षेत्र में चेरो राजवंश और नागवंशी राजवंश राजाओं का शासन था। मुगल प्रभाव इस क्षेत्र में सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान पहुंचा जब 1574 में राजा मानसिंह ने इस पर आक्रमण किया था। दुर्जन साल मध्य काल में छोटानागपुर महान नागवंशी राजा थे, उनके शासन काल में वे मुगल शासक जहांगीर के समकालीन के सेनापति ने इस क्षेत्र में आक्रमण किया था। राजा मेदिनी राय ने, 1658 से 1674 तक पलामू क्षेत्र पर शासन किया। चेरो राजवंश के कमजोर होने के साथ ईस्ट इण्डिया कम्पनी का इस क्षेत्र मे दखल हुआ। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने चेरो के पालामू किले पर कब्जा कर लिया।

आधुनिक काल

ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, टिकैत उमराँव सिंह, शेख भिखारी एवं बुधु बीर का सिपाही विद्रोह के दौरान आंदोलन

इन सभी विद्रोहों के भारतीय ब्रिटिश सेना द्वारा फौजों की भारी तादाद से निष्फल कर दिया गया था। इसके बाद 1914 में जातरा भगत के नेतृत्व में लगभग छब्बीस हजार आदिवासियों ने फिर से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया था जिससे प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने आजादी के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किया था।

झारखण्ड राज्य की मांग का इतिहास लगभग सौ साल से भी पुराना है जब 1938 इसवी के आसपास जयपाल सिंह जो भारतीय हॉकी खिलाड़ी थे और जिन्होंने खेलों में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान का भी दायित्व निभाया था, ने पहली बार तत्कालीन बिहार के दक्षिणी जिलों को मिलाकर झारखंड राज्य बनाने का विचार रखा था। लेकिन यह विचार 2 अगस्त सन 2000 में साकार हुआ जब संसद ने इस संबंध में एक बिल पारित किया। राज्य की गतिविधियाँ मुख्य रूप से राजधानी राँची और जमशेदपुर, धनबाद तथा बोकारो जैसे औद्योगिक केन्द्रों से सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। सन 2000, 15 नवम्बर को झारखंड राज्य ने मूर्त रूप ग्रहण किया और भारत के 28 वें प्रांत के रूप में प्रतिस्थापित हुआ ।

प्रदेश का ज्यादातर हिस्सा छोटानागपुर पठार का हिस्सा है जो 
कोयल, दामोदर, ब्रम्हाणी, खड़कई, एवं स्वर्णरेखा नदियों का उद्गम स्थल भी है जिनके जलक्षेत्र ज्यादातर झारखण्ड में है। प्रदेश का ज्यादातर हिस्सा वन-क्षेत्र है, जहाँ हाथियों एवं बाघों की बहुतायत है।

मिट्टी के वर्गीकरण के अनुसार, प्रदेश की ज्यादातर भूमि चट्टानों एवं पत्थरों के अपरदन से बनी है। जिन्हें इस प्रकार उप-विभाजित किया जा सकता है:-

झारखंड वानस्पतिक एवं जैविक विविधताओं का भंडार कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रदेश के अभयारण्य एवं वनस्पति उद्यान इसकी बानगी सही मायनों में पेश करते हैं। बेतला राष्ट्रीय अभयारण्य (पलामू), जो डाल्टेनगंज से 25 किमी की दूरी पर स्थित है, लगभग 250 वर्ग किमी में फैला हुआ है। विविध वन्य जीव यथा बाघ, हाथी, भैंसे सांभर, सैकड़ों तरह के जंगली सूअर एवं 20 फुट लंबा अजगर चित्तीदार हिरणों के झुंड, चीतल एवं अन्य स्तनधारी प्राणी इस पार्क की शोभा बढ़ाते हैं। इस पार्क को 1974 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत सुरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया था।

झारखण्ड की आबादी लगभग 32.98 मिलियन है।जो भारत की कुल जनसंख्या का2.72% हैं। यहाँ का लिंगानुपात 948 स्त्री प्रति 1000 पुरुष है। प्रतिवर्ग किलोमीटर जनसंख्या का घनत्व लगभग 414 है। 

झारखंड क्षेत्र विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों एवं धर्मों का संगम क्षेत्र कहा जा सकता है। द्रविड़, आर्य, एवं आस्ट्रो-एशियाई भाषायें यहां बोली जाती है। हिंदी,((ऊर्दू)) नगपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुड़मालि यहाँ की प्रमुख भाषायें हैं। इसके अलावा यहां कुड़ुख, संथाली, मुंडारी, हो बोली जाती है। झारखंड में बसनेवाले स्थानीय आर्य भाषी लोगों को सादान काहा जाता है। झारखंड मॆं कई जातियां और जनजातियां हैं। यहाँ की आबादी में 26% अनुसूचित जनजाति, 12% अनुसूचित जाति शामिल हैं।

राज्य की बहुसंख्यक आबादी हिन्दू धर्म (लगभग 67.8%) मानती है। दूसरे स्थान पर (14.5%) इस्लाम धर्म है।  राज्य की लगभग 12.8% आबादी सरना धर्म एवं 4.1% आबादी ईसाइयत को मानती है।

यहाँ की साक्षरता दर 64.4%है। जिसमें से पुरुष साक्षरता दर 76.8% तथा महिला साक्षरता दर 55.4% है।

झारखण्ड के मुखिया यहाँ के राज्यपाल हैं जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं परंतु वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ मुख्यमंत्री के हाथों में केन्द्रित होती है जो अपनी सहायता के लिए एक मंत्रीमंडल का भी गठन करता है। राज्य का प्रशासनिक मुखिया राज्य का मुख्य सचिव होता है जो प्रशासनिक सेवा द्वारा चुनकर आते हैं। न्यायिक व्यस्था का प्रमुख राँची स्थित उच्च न्यायलय के प्रमुख न्यायधीश होता है। झारखण्ड भारत के उन तेरह राज्यों में शामिल है जो नक्सलवाद की समस्या से बुरी तरह जूझ रहा है। अभी हाल ही में 5 मार्च 2007 को चौदहवीं लोकसभा से जमशेदपुर के सांसद सुनील महतो, की नक्सवादी उग्रवादियों द्वारा गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी।

राज्य का निर्माण होने के समय झारखण्ड में 18 जिले थे जो पहले दक्षिण बिहार का हिस्सा हुआ करते थे। इनमें से कुछ जिलों को पुनर्गठित करके छह नये जिले सृजित किए गये :- लातेहार, सराईकेला खरसाँवा जामताड़ा  खूँटी एवं रामगढ़। वर्तमान में राज्य में चौबीस जिले हैं झारखंड के जिले:

झारखंड में 24 जिले हैं जो इस प्रकार हैं:-

कोडरमा जिला, गढवा जिला, गिरीडीह जिला, गुमला जिला, चतरा जिला, जामताड़ा जिला, दुमका जिला, देवघर जिला, गोड्डा जिला, धनबाद जिला, पलामू जिला, पश्चिमी सिंहभूम जिला (मुख्यालय:चाईबासा), पूर्वी सिंहभूम जिला (मुख्यालय: जमशेदपुर), बोकारो जिला, पाकुड़ जिला, राँची जिला, लातेहार जिला, लोहरदग्गा जिला, सराइकेला खरसावाँ जिला, साहिबगंज जिला, सिमडेगा जिला, हजारीबाग जिला, खूंटी जिला और रामगढ़ जिला।

यह भी देखें:

झारखण्ड की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खनिज और वन संपदा से निर्देशित है। लोहा, कोयला, माइका, बाक्साइट, फायर-क्ले, ग्रेफाइट, कायनाइट, सेलीमाइट, चूना पत्थर, युरेनियम और दूसरी खनिज संपदाओं की प्रचुरता की वजह से यहाँ उद्योग-धंधों का जाल बिछा है। खनिज उत्पादों के खनन से झारखंड को सालाना तीस हजार करोड़ रुपये की आय होती है। झारखंड न केवल अपने उद्योग-धंधों में इसका इस्तेमाल करता है बल्कि दूसरे राज्यों को भी इसकी पूर्ति करता है। 2000 में बिहार से विभाजन के पश्चात झारखंड का जीडीपी 2004 में चौदह बिलियन डालर आंका गया था।

झारखण्ड में भारत के कुछ सर्वाधिक औद्योगिकृत स्थान यथा - जमशेदपुर, राँची, बोकारो एवं धनबाद इत्यादि स्थित हैं। झारखंड के उद्योगों में कुछ प्रमुख हैं :

 
झारखण्ड के कुछ प्रमुख त्योहार इस प्रकार हैं:-

झुमइर, डमकच, पाइका, छऊ, जदुर, नाचनी, नटुआ, अगनी, चौकारा, जामदा, घटवारी, मतहा,[झूमर]

झारखंड में अनेक भाषा में सिनेमा बनती है। इनमें मूल रूप से नागपुरी सिनेमा का निर्माण  है। इसके अलावा खोरठा भाषा एवं संथाली में भी फिल्में बनती हैं। झारखंड के सिनेमा को झॉलीवुड काहा जाता है।

झारखण्ड की शिक्षा संस्थाओं में कुछ अत्यंत प्रमुख शिक्षा संस्थान शामिल हैं। जनजातिय प्रदेश होने के बावज़ूद यहां कई नामी सरकारी एवं निजी कॉलेज हैं जो कला, विज्ञान, अभियांत्रिकी, मेडिसिन, कानून और मैनेजमेंट में उच्च स्तर की शिक्षा देने के लिये विख्यात हैं।

झारखण्ड की कुछ प्रमुख शिक्षा संस्थायें हैं :

विश्वविद्यालय

अन्य प्रमुख संस्थान

 
झारखण्ड की राजधानी राँची संपूर्ण देश से सड़क एवं रेल मार्ग द्वारा काफी अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय राजमार्ग 2, 27, 33 इस राज्य से होकर गुजरती है। इस प्रदेश का दूसरा प्रमुख शहर टाटानगर (जमशेदपुर) दिल्ली कोलकाता मुख्य रेलमार्ग पर बसा हुआ है जो राँची से 120 किलोमीटर दक्षिण में बसा है। राज्य का में एकमात्र अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा राँची का बिरसा मुंडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है जो देश के प्रमुख शहरों; मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और पटना से जुड़ा है। इंडियन एयरलाइन्स और एयर सहारा की नियमित उड़ानें आपको इस शहर से हवाई-मार्ग द्वारा जोड़ती हैं। सबसे नजदीकी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कोलकाता का नेताजी सुभाषचंद्र बोस हवाई अड्डा है।

राँची एक्सप्रेस एवं प्रभात खबर जैसे हिन्दी समाचारपत्र राज्य की राजधानी राँची से प्रकाशित होनेवाले प्रमुख समाचारपत्र हैं जो राज्य के सभी हिस्सों में उपलब्ध होते हैं। हिन्दी, बांग्ला एवं अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाले देश के अन्य प्रमुख समाचारपत्र भी बड़े शहरों में आसानी से मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक हिन्दुस्तान, खबर मन्त्र, आई नेक्स्ट उदितवाणी, चमकता आईना, उत्कल मेल,स्कैनर इंडिया,इंडियन गार्ड तथा आवाज जैसे हिन्दी समाचारपत्र भी प्रदेश के बहुत से हिस्सों में काफी पढ़े जाते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात करें तो झारखंड को केंद्र बनाकर खबरों का प्रसारण ई टीवी बिहार-झारखंड, सहारा समय बिहार-झारखंड, मौर्य टीवी, साधना न्यूज, न्यूज 11 आदि चैनल करते हैं। रांची में राष्ट्रीय समाचार चैनलों के ब्यूरो कार्यालय कार्यरत हैं।

जोहार दिसुम खबर झारखंडी भाषाओं में प्रकाशित होने वाला पहला पाक्षिक अखबार है। इसमें झारखंड की 10 आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषाओं तथा हिन्दी सहित 11 भाषाओं में खबरें छपती हैं। जोहार सहिया राज्य का एकमात्र झारखंडी मासिक पत्रिका है जो झारखंड की सबसे लोकप्रिय भाषा नागपुरी में प्रकाशित होती है। इसके अलावा झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा और गोतिया झारखंड की आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाली महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएं हैं।

राँची और जमशेदपुर में लगभग पांच रेडियो प्रसारण केन्द्र हैं और आकाशवाणी की पहुँच प्रदेश के हर हिस्से में है। दूरदर्शन का राष्ट्रीय प्रसारण भी प्रदेश के लगभग सभी हिस्सों में पहुँच रखता है। झारखंड के बड़े शहरों में लगभग हर टेलिविजन चैनल उपग्रह एवं केबल के माध्यम से सुलभता से उपलब्ध है।

लैंडलाइन टेलीफोन की उपलब्धता प्रदेश में भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल), टाटा टेलीसर्विसेज (टाटा इंडिकाम) एवं रिलायंस इन्फोकाम द्वारा हर हिस्से में की जाती है। मोबाइल सेवा प्रदाताओं में बीएसएनएल, एयरसेल, आइडिया, वोदाफोन रिलायंस[uninor] एवं एयरटेल प्रमुख हैं।

मुख्य लेख - झारखंड के पर्यटन स्थल

शेख भिखारी




#Article 49: पश्चिम बंगाल (703 words)


पश्चिम बंगाल (भारतीय बंगाल) (बंगाली: পশ্চিমবঙ্গ) भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक राज्य है। इसके पड़ोस में नेपाल, सिक्किम, भूटान, असम, बांग्लादेश, ओडिशा, झारखंड और बिहार हैं। इसकी राजधानी कोलकाता है। इस राज्य मे 23 ज़िले है। यहां की मुख्य भाषा बांग्ला है।प्रमुख फैसले क्या है?

बंगाल पर इस्लामी शासन १३ वीं शताब्दी से प्रारंभ हुआ तथा १६ वीं शताब्दी में मुग़ल शासन में व्यापार तथा उद्योग का एक समृद्ध केन्द्र में विकसित हुआ। १५ वीं शताब्दी के अंत तक यहाँ यूरोपीय व्यापारियों का आगमन हो चुका था तथा १८ वीं शताब्दी के अंत तक यह क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आ गया था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का उद्गम यहीं से हुआ। १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ और इसके साथ ही बंगाल, मुस्लिम प्रधान पूर्व बंगाल (जो बाद में बांग्लादेश बना) तथा हिंदू प्रधान पश्चिम बंगाल (भारतीय बंगाल) में विभाजित हुआ।

यह राज्य भारत के पूर्वी भाग में 88,853 वर्ग किमी के भूखंड पर फैला है। इसके उत्तर में सिक्किम, उत्तर-पूर्व में असम, पूर्व में बांग्लादेश, दक्षिण में बंगाल की खाड़ी तथा उड़ीसा तथा पश्चिम में बिहार तथा झारखंड है। 

उत्तर में हिमालय पर्वत श्रेणी का पूर्वी हिस्सा से लेकर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी तक प्रदेश की भौगोलिक दशा में खासी विविधता नजर आती है। उत्तर में दार्जिलिंग के शिखर, हिमालय पर्वतश्रेणी के अंग हैं। इसमें संदक्फू चोटी आती है जो राज्य का सर्वोच्च शिखर है। दक्षिण की ओर आने पर, एक छोटे तराई के बाद मैदानी भाग आरंभ होता है। यह मैदान दक्षिण में गंगा के डेल्टा के साथ खत्म होता है। यही मैदानी क्षेत्र, पूर्व में बांग्लादेश में भी काफी विस्तृत है। पश्चिम की ओर का भूखंड पठारी है।

गंगा की धारा मुख्य शाखा यहां कई भागों में बंट जाती है - एक शाखा बांग्लादेश में प्रवेश करती है जिसे पद्मा (पॉद्दा) नाम से जाना जाता है, दूसरी शाखाएं पश्चिम बंगाल (भारतीय बंगाल) में दक्षिण की ओर भागीरथी तथा हुगली नामों के साथ बहती हैं। उपरोक्त सभी शाखाएं दक्षिण की ओर बंगाल की खाड़ी में विसर्जित होती हैं। गंगा नदी का मुहाना (सुंदरवन) विश्व का सबसे बड़ा मुहाना (डेल्टा) है। उत्तरी पर्वतीय भाग में तीस्ता, महानंदा, तोरसा आदि नदियां बहती हैं। पश्चिमी पठारी भाग में दामोदर, अजय, कंग्साबाती आदि प्रमुख धाराएं हैं। 

पश्चिम बंगाल (भारतीय बंगाल) का मौसम मुख्यतः उष्णकटिबंधीय है।

पश्चिम बंगाल (भारतीय बंगाल) के जिलों की कुल संख्या 23 है। नीचे बायीं ओर दी गयी छवि के अनुसार जिलों के नाम सूचीबद्ध हैं। 

नृत्य, संगीत तथा चलचित्रों की यहां लंबी तथा सुव्यवस्थित परंपरा रही है।दुर्गापूजा (बांग्ला: দুর্গাপূজা दुर्गापूजा) यहां अति उत्साह तथा व्यापक जन भागीदारी के साथ मनाई जाती है। क्रिकेट तथा फुटबॉल यहां के लोकप्रियतम खेलों में से हैं। सौरभ गांगुली जैसे खिलाड़ी तथा मोहन बगान एवं ईस्ट बंगाल जैसी टीम इसी प्रदेश से हैं। अगर आंकड़ों पर जाये तो नक्सलवाद जैसे शब्दों का जन्म यहीं हुआ, पर यहां के लोगों की शांतिप्रियता ही वो चीज है जो सर्वत्र दर्शास्पद (देखने लायक) है। परस्पर बातचीत में तूइ(बांग्ला - তুই) (हिन्दी के तू के लगभग समकक्ष), तूमि (बांग्ला - তুমি) (हिन्दी के तुम के लगभग समकक्ष), तथा आपनि (बांग्ला - আপনি) (हिन्दी के आप के समकक्ष), का प्रयोग द्वितीय पुरूष की वरिष्ठता के आधार पर किया जाता है। शहरों में लोग प्रायः छोटे परिवारों में रहते हैं। यहां के लोग मछली-भात (बांग्ला - মাছ ভাত (माछ-भात)) बहुत पसंद करते हैं। यह प्रदेश अपनी मिठाईयों के लिये काफी प्रसिद्ध है - रसगुल्ले का आविष्कार भी यहीं हुआ था।

बांग्ला भाषा में एक ही साहित्य आंदोलन हुये हैं और वो हैं भुखी पीढी आंदोलन जिसने साठ के दशक में शक्ति चट्टोपाध्याय, मलय रायचौधुरी, देबी राय, सुबिमल बसाक, समीर रायचौधुरी प्रमुख कविगण बिहार के पटना शहर से शुरु किये थे एवं जो पुरे बंगाल में तहलका मचा दिया था; यहाँ तक की आंदोलनकारईयों के खिलाफ मुकदमा भी दायर किया गया था। बाद में सब बाइज्जत बरी हो गये थे, परंतु उन लोगों का ख्याति पुरे भारत में तथा अमेरिका, यूरोप में भी फैल गई थी ।

पश्चिम बंगाल (भारतीय बंगाल) मे तृणमूल कांग्रेस सरकार है। पश्चिम बंगाल (भारतीय बंगाल) की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी हैं। इससे पहले पिछले ३५ सालों से (१९७७ से) यहां वाम मोर्चे की सरकार थी।
पश्चिम बंगाल कुल लोकसभा सीटें: 42 (टीएमसी(TMC)-22, भाजपा (BJP)-18,भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस(INC)-2
पश्चिम बंगाल कुल राज्यसभा सीटें:16 (TMC-13,INC-2,IND-1)




#Article 50: बिहार (2396 words)


बिहार भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक राज्य है और इसकी राजधानी पटना है। बिहार नाम का प्रादुर्भाव बौद्ध सन्यासियों के ठहरने के स्थान विहार शब्द से हुआ, जिसे विहार के स्थान पर इसके अपभ्रंश रूप बिहार से संबोधित किया जाता है।

बिहार के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में झारखण्ड, पूर्व में पश्चिम बंगाल, और पश्चिम में उत्तर प्रदेश स्थित है। यह क्षेत्र गंगा नदी तथा उसकी सहायक नदियों के उपजाऊ मैदानों में बसा है। प्राचीन काल में विशाल साम्राज्यों का गढ़ रहा यह प्रदेश, वर्तमान में अर्थव्यवस्था के आकार के आधार पर भारत के राज्य के सामान्य योगदाताओं में से एक बनकर रह गया है।

भारत में क्षेत्रफल की दृष्टि से बिहार वर्तमान में 13 वाँ राज्य है। सन् 1936 ई• में ओडिशा और सन् 2000 ई॰ में झारखण्ड के अलग हो जाने से बिहार ने कृषि के दम पर और अपने मेधा को लेकर उन्नति की है। संघ लोक सेवा आयोग और आई आई टी

वर्तमान बिहार विभिन्न एतिहासिक क्षेत्रों से मिलकर बना है। बिहार के क्षेत्र जैसे-मगध, मिथिला और अंग- धार्मिक ग्रंथों और प्राचीन भारत के महाकाव्यों में वर्णित हैं।

सारण जिले में गंगा नदी के उत्तरी किनारे पर चिरांद, नवपाषाण युग (लगभग 4500-2345 ईसा पूर्व) और ताम्र युग ( 2345-1726 ईसा पूर्व) से एक पुरातात्विक रिकॉर्ड है।

मिथिला को पहली बार इंडो-आर्यन लोगों ने विदेह साम्राज्य की स्थापना के बाद प्रतिष्ठा प्राप्त की। देर वैदिक काल (सी। 1600-1100 ईसा पूर्व) के दौरान, विदेह् दक्षिण एशिया के प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्रों में से एक बन गया, कुरु और पंचाल् के साथ। वेदहा साम्राज्य के राजा यहांजनक कहलाते थे। मिथिला के जनक की पुत्री एक थी सीता   जिसका वाल्मीकि द्वारा लिखी जाने वाली हिंदू महाकाव्य, रामायण में भगवान राम की पत्नी के रूप में वर्णित है। बाद में विदेह राज्य के वाजिशि शहर में अपनी राजधानी था जो वज्जि समझौता में शामिल हो गया, मिथिला में भी है। वज्जि के पास एक रिपब्लिकन शासन था जहां राजा राजाओं की संख्या से चुने गए थे। जैन धर्म और बौद्ध धर्म से संबंधित ग्रंथों में मिली जानकारी के आधार पर, वज्जि को 6 ठी शताब्दी ईसा पूर्व से गणराज्य के रूप में स्थापित किया गया था, गौतम बुद्ध के जन्म से पहले 563 ईसा पूर्व में, यह दुनिया का पहला गणतंत्र था। जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म वैशाली में हुआ था।

आधुनिक-पश्चिमी पश्चिमी बिहार के क्षेत्र में मगध 1000 वर्षों के लिए भारत में शक्ति, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बने। ऋग्वेदिक् काल मे यह ब्रिहद्रत वंश का शासन था।सन् 684 ईसा पूर्व में स्थापित हरयंक वंश, राजगृह (आधुनिक राजगीर) के शहर से मगध पर शासन किया। इस वंश के दो प्रसिद्ध राजा बिंबिसार और उनके बेटे अजातशत्रु थे, जिन्होंने अपने पिता को सिंहासन पर चढ़ने के लिए कैद कर दिया था। अजातशत्रु ने पाटलिपुत्र शहर की स्थापना की जो बाद में मगध की राजधानी बन गई। उन्होंने युद्ध की घोषणा की और बाजी को जीत लिया। हिरुआँ वंश के बाद शिशुनाग वंश का पीछा किया गया था। बाद में नंद वंश ने बंगाल से पंजाब तक फैले विशाल साम्राज्य पर शासन किया।

भारत की पहली साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य द्वारा नंद वंश को बदल दिया गया था। मौर्य साम्राज्य और बौद्ध धर्म का इस क्षेत्र में उभार रहा है जो अब आधुनिक बिहार को बना देता है। 325 ईसा पूर्व में मगध से उत्पन्न मौर्य साम्राज्य, चंद्रगुप्त मौर्य ने स्थापित किया था, जो मगध में पैदा हुआ था। इसकी पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में इसकी राजधानी थी। मौर्य सम्राट, अशोक, जो पाटलीपुत्र (पटना) में पैदा हुए थे, को दुनिया के इतिहास में सबसे बड़ा शासक माना जाता है।
मौर्य सम्राजय भारत की आजतक की सबसे बड़ी सम्राजय थी ये पश्चिम मे ईरान से लेकर पूर्व मे बर्मा तक और उत्तर मे मध्य-एशिया से लेकर दक्षिण मे श्रीलंका तक पूरा भारतवर्ष मे फैला था। इस सम्राजय के पहले राजा चंद्रगुप्त मौर्य ने कै ग्रीक् सतराप् को हराकर अफ़ग़ानिस्तां के हिस्से को जीता। इनकी सबसे बड़ी विजय ग्रीस से पश्चिम-एशिय थक के यूनानी राजा सेलेक्यूज़ निकेटर को हराकर पर्शिया का बड़ा हिस्सा जीत लिया था और संधि मे यूनानी राजकुमारी हेलेन से विवाह किये जो कि सेलेक्यूज़ निकटोर कि पुत्री थी और हमेसा के लिए यूनाननियो को भारत से बाहर रखा। इनके प्रधानमंत्री चाणक्य ने अर्थशास्त्र कि रचना कि जो इनके गुरु और मार्गदर्शक थे। 
इनके पुत्र बिन्दुसार ने इस सम्राजय को और दूर थक फैलाया व दक्षिण तक स्थापित किया। 
सम्रात् अशोक इस सम्राजय के सबसे बड़े राजा थे। इनका पूरा राज नाम देवानामप्रिय प्रियादर्शी एवं राजा महान सम्रात् अशोक था। इन्होंने अपने उपदेश स्तंभ, पहाद्, शीलालेख पे लिखाया जो भारत इतिहास के लिया बहुत महातवपूर्ण है। येे लेख् ब्राह्मी, ग्रीक, अरमिक् मे पूरे अपने सम्राजय मे अंकित् किया। इनके मृत्या के बाद मौर्य सम्राजय को इनके पुत्रोने दो हिस्से मे बात कर पूर्व और पश्चिम मौर्य रज्या कि तरह रज्या किया। इस सम्राजय कि अंतिम शासक ब्रिहद्रत् को उनके ब्राह्मिन सेनापति पुष्यमित्र शूंग ने मारकर वे मगध पे अपना शासन स्थापित किया। 

सन् 240 ए में मगध में उत्पन्न गुप्त साम्राज्य को विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, वाणिज्य, धर्म और भारतीय दर्शन में भारत का स्वर्ण युग कहा गया। इस वंश के महान राजा समुद्रगुप्त ने इस सम्राजय को पूरे दक्षिण एशिय मे स्थापित किया। इनके पुत्र चँद्रगुप्त विक्रमादित्य ने भारत के सारे विदेशी घुसपैट्या को हरा कर देश से बाहर   किया इसीलिए इन्हे सकारी की उपादि दी गई। इन्ही गुप्त राजाओं मे से प्रमुख स्कंदगुप्त ने भारत मे हूणों का आक्रमं रोका और उनेे भारत से बाहर भगाया और देश की बाहरी लोगो से रक्षा की। 
उस समय गुप्त सम्राजय दुनिया कि सबसे बड़ी शक्ती साली राजया था। इसका राज पशिम मे पर्शिया या बग़दाद से पूर्व मे बर्मा तक और उत्तर मे मध्य एशिया से लेकर दक्षिण मे कांचीपुरम तक फैला था। इसकी राजधानी पटलीपुत्र था। इस सम्राजय का प्रभाव पूरी विश्व मे था रोम, ग्रीस, अरब से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिय तक था।

मगध में बौद्ध धर्म मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी के आक्रमण की वजह से गिरावट में पड़ गया, जिसके दौरान कई विहार और नालंदा और विक्रमशिला के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया गया। यह दावा किया गया कि 12 वीं शताब्दी के दौरान हजारों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या हुई थी। डी.एन. झा सुझाव देते हैं, इसके बजाय, ये घटनाएं सर्वोच्चता के लिए लड़ाई में बौद्ध ब्राह्मण की झड़पों का परिणाम थीं। 1540 में, महान पस्तीस के मुखिया, सासाराम के शेर शाह सूरी, सम्राट हुमायूं की मुगल सेना को हराकर मुगलों से उत्तरी भारत ले गए थे। शेर शाह ने अपनी राजधानी दिल्ली की घोषणा की और 11 वीं शताब्दी से लेकर 20 वीं शताब्दी तक, मिथिला पर विभिन्न स्वदेशीय राजवंशों ने शासन किया था। इनमें से पहला, जहां कर्नाट, अनवर राजवंश, रघुवंशी और अंततः राज दरभंगा के बाद। इस अवधि के दौरान मिथिला की राजधानी दरभंगा में स्थानांतरित की गई थी।ab

उत्तर भारत में 24°20'10 ~ 27°31'15 उत्तरी अक्षांश तथा 83°19'50 ~ 88°17'40 पूर्वी देशांतर के बीच बिहार एक हिंदी भाषी राज्य है। राज्य का कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर है जिसमें 92,257.51 वर्ग किलोमीटर ग्रामीण क्षेत्र है। झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार की भूमि मुख्यतः नदियों के मैदान एवं कृषियोग्य समतल भूभाग है। गंगा के पूर्वी मैदान में स्थित इस राज्य की औसत ऊँचाई १७३ फीट है। भौगोलिक तौर पर बिहार को तीन प्राकृतिक विभागो में बाँटा जाता है- उत्तर का पर्वतीय एवं तराई भाग, मध्य का विशाल मैदान तथा दक्षिण का पहाड़ी किनारा। 
उत्तर का पर्वतीय प्रदेश सोमेश्वर श्रेणी का हिस्सा है। इस श्रेणी की औसत उचाई 455 मीटर है परन्तु इसका सर्वोच्च शिखर 874 मीटर उँचा है। सोमेश्वर श्रेणी के दक्षिण में तराई क्षेत्र है। यह दलदली क्षेत्र है जहाँ साल वॄक्ष के घने जंगल हैं। इन जंगलों में प्रदेश का इकलौता बाघ अभयारण्य वाल्मिकीनगर में स्थित है। 
मध्यवर्ती विशाल मैदान बिहार के 95% भाग को समेटे हुए हैं। भौगोलिक तौर पर इसे चार भागों में बाँटा जा सकता है:-

गंगा नदी राज्य के लगभग बीचों-बीच बहती है। उत्तरी बिहार बागमती, कोशी, बूढी गंडक, गंडक, घाघरा और उनकी सहायक नदियों का समतल मैदान है। सोन, पुनपुन, फल्गू तथा किऊल नदी बिहार में दक्षिण से गंगा में मिलनेवाली सहायक नदियाँ है। बिहार के दक्षिण भाग में छोटानागपुर का पठार, जिसका अधिकांश हिस्सा अब झारखंड है, तथा उत्तर में हिमालय पर्वत की नेपाल श्रेणी है। हिमालय से उतरने वाली कई नदियाँ तथा जलधाराएँ बिहार होकर प्रवाहित होती है और गंगा में विसर्जित होती हैं। वर्षा के दिनों में इन नदियों में बाढ़  की एक बड़ी समस्या है।

राज्य का औसत तापमान गृष्म ऋतु में 35-45 डिग्री सेल्सियस तथा जाड़े में 5-15 डिग्री सेल्सियस रहता है। जाड़े का मौसम नवंबर से मध्य फरवरी तक रहता है। अप्रैल में गृष्म ऋतु का आरंभ होता है जो जुलाई के मध्य तक रहता है। जुलाई-अगस्त में वर्षा ऋतु का आगमन होता है जिसका अवसान अक्टूबर में होने के साथ ही ऋतु चक्र पूरा हो जाता है। औसतन 1205 मिलीमीटर वर्षा का का वार्षिक वितरण लगभग 52 दिनों तक रहता है जिसका अधिकांश भाग मानसून से होनेवाला वर्षण है।

उत्तर में भूमि प्रायः सर्वत्र उपजाऊ एवं कृषियोग्य है। धान, गेंहूँ, दलहन, मक्का, तिलहन, तम्बाकू,सब्जी तथा केला, आम और लीची जैसे कुछ फलों की खेती की जाती है। हाजीपुर का केला एवं मुजफ्फरपुर की लीची बहुत ही प्रसिद्ध है।

हिंदी बिहार की राजभाषा और उर्दू द्वितीय राजभाषा है।मैथिली भारतीय संविधान के अष्टम अनुसूची में सम्मिलित एकमात्र बिहारी भाषा है।भोजपुरी, मगही, अंगिका तथा बज्जिका बिहार में बोली जाने वाली अन्य प्रमुख भाषाओं और बोलियों में सम्मिलित हैं।प्रमुख पर्वों में छठ, होली, दीपावली, दशहरा, महाशिवरात्रि, नागपंचमी, श्री पंचमी, मुहर्रम, ईद,तथा क्रिसमस हैं। सिक्खों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म स्थान होने के कारण पटना सिटी (पटना) में उनकी जयन्ती पर भी भारी श्रद्धार्पण देखने को मिलता है। बिहार ने हिंदी को सबसे पहले  राज्य की अधिकारिक भाषा माना है।

बिहार अपने खानपान की विविधता के लिए प्रसिद्ध है। शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनो व्यंजन पसंद किये जाते हैं। मिठाईयों की विभिन्न किस्मों के अतिरिक्त अनरसा की गोली, खाजा, मोतीचूर लड्डू, तिलकुट यहाँ की खास पसंद है। सत्तू, चूड़ा-दही और लिट्टी-चोखा जैसे स्थानीय व्यंजन तो यहाँ के लोगों की कमजोरी हैं। लहसुन की चटनी भी बहुत पसंद करते हैं। लालू प्रसाद के रेल मंत्री बनने के बाद तो लिट्टी-चोखा भारतीय रेल के महत्वपूर्ण स्टेशनों पर भी मिलने लगा है। सुबह के नास्ते में चूड़ा-दही या पूरी-जलेबी खूब खाये जाते हैं। चावल-दाल-सब्जी और रोटी बिहार का सामान्य भोजन है।  की मालपुआ काफी स्वादिष्ट होता है। यह उत्तर भारत में बनाये जाने वाली डिश है। बिहार की बाकी व्यंजनों में दालपूरी, खाजा, मखाना खीर, पेरूकिया, खजुरी, बैगन का भरता आदि शामिल है।

भारत के अन्य कई जगहों की तरह क्रिकेट यहाँ भी सर्वाधिक लोकप्रिय है। इसके अलावा फुटबॉल, हाकी, टेनिस, खो-खो और गोल्फ भी पसन्द किया जाता है। बिहार का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण होने के कारण पारंपरिक भारतीय खेल कबड्डी हैं। 

राज्‍य के मुख्‍य उद्योग हैं -

बिहार में कुल सिंचाई क्षमता 28.63 लाख हेक्‍टेयर है। यह क्षमता बड़ी तथा मंझोली सिंचाई परियोजनाओं से जुटाई जाती है। यहाँ बड़ी और मध्‍यम सिंचाई परियोजनाओं का सृजन किया गया है और 48.97 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्रफल की सिंचाई प्रमुख सिंचाई योजनाओं के माध्‍यम से की जाती है। बिहार में शिचाई नलकूप, कुंआ,और मानसून पर निर्भर करता है

एक समय बिहार शिक्षा के सर्वप्रमुख केन्द्रों में गिना जाता था। नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा ओदंतपुरी विश्वविद्यालय प्राचीन बिहार के गौरवशाली अध्ययन केंद्र थे। १९१७ में खुलने वाला पटना विश्वविद्यालय काफी हदतक अपनी प्रतिष्ठा कायम रखने में सफल रहा। किंतु स्वतंत्रता के पश्चात शैक्षणिक संस्थानों में राजनीति तथा अकर्मण्यता  करने से शिक्षा के स्तर में गिरावट आई। हाल के दिनों में उच्च शिक्षा की स्थिति सुधरने लगी है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति भी अच्छी हो रही है। हाल में पटना में एक भारतीय प्राद्यौगिकी संस्थान और राष्ट्रीय प्राद्यौगिकी संस्थान तथा हाजीपुर में केंद्रीय प्लास्टिक इंजिनियरिंग रिसर्च इंस्टीच्युट तथा केंद्रीय औषधीय शिक्षा एवं शोध संस्थान खोला गया है, जो अच्छा संकेत है।
बिहार के सभी जिलों मे 2019 में एक-एक सरकारी इंजिनियरिंग कॉलेज खोला गया है।

बिहार राज्य भारतीय गणराज्य के संघीय ढाँचे में द्विसदनीय व्यवस्था के अन्तर्गत आता है। राज्य का संवैधानिक मुखिया राज्यपाल है लेकिन वास्तविक सत्ता मुख्यमंत्री और मंत्रीपरिषद के हाथ में होता है। विधानसभा में चुनकर आनेवाले विधायकों द्वारा मुख्यमंत्री का चुनाव पाँच वर्षों के लिए किया जाता है जबकि राज्यपाल की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। प्रत्यक्ष चुनाव में बहुमत प्राप्त करनेवाले राजनीतिक दल अथवा गठबंधन के आधार पर सरकार बनाए जाते हैं। उच्च सदन या विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष ढंग से ६ वर्षों के लिए होता है।

प्रशासनिक सुविधा के लिए बिहार राज्य को 9 प्रमंडल तथा 38 मंडल (जिला) में बाँटा गया है। जिलों को क्रमश: 101 अनुमंडल, 534 प्रखंड (अंचल), 8,471 पंचायत, 45,103 गाँव में बाँटा गया है। राज्य का मुख्य सचिव नौकरशाही का प्रमुख होता है जिसे श्रेणीक्रम में आयुक्त, जिलाधिकारी, अनुमंडलाधिकारी, प्रखंड विकास पदाधिकारी या अंचलाधिकारी तथा इनके साथ जुड़े अन्य अधिकारी एवं कर्मचारीगण रिपोर्ट करते हैं। पंचायत तथा गाँवों का कामकाज़ सीधेतौर पर चुनाव कराकर मुखिया, सरपंच तथा वार्ड सदस्यों के अधीन संचालित किया जाता है। नगरपालिका आम निर्वाचन 2017 के बाद बिहार में नगर निगमों की संख्या 12, नगर परिषदों की संख्या 49 और नगर पंचायतों की संख्या 80 है।

पटना, तिरहुत, सारण, दरभंगा, कोशी, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर तथा मगध प्रमंडल के अन्तर्गत आनेवाले जिले इस प्रकार हैं:

पटना राज्य की वर्तमान राजधानी तथा महान ऐतिहासिक स्थल है। अतीत में यह सत्ता, धर्म तथा ज्ञान का केंद्र रहा है। निम्न स्थल पटना के महत्वपूर्ण दार्शनिक स्थल हैं: 

माता सीता की जन्मस्थली(सीतामढ़ी), कवि विद्यापति सह उगना महादेव मंदिर(मधुबनी), द•भारत स्थापत्यकला विष्णु मंदिर(सुपौल), सिहेश्वरनाथ मंदिर(मधेपुरा), सबसे ऊँची काली मंदिर(अररिया), नृसिंह अवतार स्थल(पूर्णियाँ), सूर्य मंदिर,नवलख्खा मंदिर,थावे(गोपालगंज)माँ दुर्गा माता मंदिर,नेचुआ जलालपुर रामबृक्ष धाम, दुर्गा मंदिर, अमनौर वैष्णो धाम ,आमी अम्बिका दुर्गा मंदिर,माँ दुर्गा की मंदिर छपरा, सीता जी का जन्म स्थान, पादरी की हवेली, शेरशाह की मस्जिद, बेगू ह्ज्जाम की मस्जिद, पत्थर की मस्जिद, जामा मस्जिद, फुलवारीशरीफ में बड़ी खानकाह, मनेरशरीफ - सूफी संत हज़रत याहया खाँ मनेरी की दरगाह, भारत की प्रथम महिला सूफी संत हजरत बीबी कमाल का कब्र (जहानाबाद) mithilanchal

प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा से लगनेवाला सोनपुर मेला, सारण जिला का नवपाषाण कालीन चिरांद गाँव, कोनहारा घाट, नेपाली मंदिर, रामचौरा मंदिर, १५वीं सदी में बनी मस्जिद, दीघा-सोनपुर रेल-सह-सड़क पुल, महात्मा गाँधी सेतु, गुप्त एवं पालकालीन धरोहरों वाला चेचर गाँव

देव सूर्य मंदिर, देवार्क सूर्य मंदिर या केवल देवार्क के नाम से प्रसिद्ध, यह भारतीय राज्य बिहार के औरंगाबाद जिले में देव नामक स्थान पर स्थित एक हिंदू मंदिर है जो देवता सूर्य को  समर्पित  है। यह सूर्य मंदिर अन्य सूर्य मंदिरों की तरह पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है।


#Article 51: मध्य प्रदेश (2582 words)


मध्य प्रदेश भारत का एक राज्य है, इसकी राजधानी भोपाल है। मध्य प्रदेश 1 नवंबर, 2000 तक क्षेत्रफल के आधार पर भारत का सबसे बड़ा राज्य था। इस दिन मध्यप्रदेश राज्य से 16 जिले अलग कर छत्तीसगढ़ राज्य  छत्तीसगढ़ की स्थापना हुई थी। मध्य प्रदेश की सीमाऐं पाँच राज्यों की सीमाओं से मिलती है। इसके उत्तर में उत्तर प्रदेश, पूर्व में छत्तीसगढ़, दक्षिण में महाराष्ट्र, पश्चिम में गुजरात, तथा उत्तर-पश्चिम में राजस्थान है।

हाल के वर्षों में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही है। 

खनिज संसाधनों से समृद्ध, मध्य प्रदेश हीरे और तांबे का सबसे बड़ा भंडार है। अपने क्षेत्र की 30% से अधिक वन क्षेत्र के अधीन है। इसके पर्यटन उद्योग में काफी वृद्धि हुई है। राज्य ने वर्ष 2010-11 के लिये राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार जीता था।

मध्यप्रदेश मुख्य रूप से अपने पर्यटन के लिए भी जाना जाता है। महेश्वर मंडलेश्वर, चोली, भीमबैठका, पंचवटी, खजुराहो, साँची स्तूप, ग्वालियर का किला, और उज्जैन रीवा जल प्रपात मध्यप्रदेश के पर्यटन स्थल के प्रमुख उदाहरण हैं। उज्जैन जिले में प्रत्येक 12 वर्षों में कुंभ (सिंहस्थ) मेले का पुण्यपर्व विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है।

स्वत्रंता पूर्व मध्य प्रदेश क्षेत्र अपने वर्तमान स्वरूप से काफी अलग था। तब यह ३-४ हिस्सों में बटा हुआ था। १९५० में सर्वप्रथम मध्य प्रांत और बरार को छत्तीसगढ़ और मकराइ रियासतों के साथ मिलकर मध्य प्रदेश का गठन किया गया था। तब इसकी राजधानी नागपुर में थी। इसके बाद १ नवंबर १९५६ को मध्य भारत, विंध्य प्रदेश तथा भोपाल राज्यों को भी इसमें ही मिला दिया गया, जबकि दक्षिण के मराठी भाषी विदर्भ क्षेत्र को (राजधानी नागपुर समेत) बॉम्बे राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया। पहले जबलपुर को राज्य की राजधानी के रूप में चिन्हित किया जा रहा था, परन्तु अंतिम क्षणों में इस निर्णय को पलटकर भोपाल को राज्य की नवीन राजधानी घोषित कर दिया गया। जो कि सीहोर जिले की एक तहसील हुआ करता था। १ नवंबर २००० को एक बार फिर मध्य प्रदेश का पुनर्गठन हुआ, और छ्त्तीसगढ़ मध्य प्रदेश से अलग होकर भारत का २६वां राज्य बन गया।

भारत की संस्कृति में मध्यप्रदेश जगमगाते दीपक के समान है, जिसकी रोशनी की सर्वथा अलग प्रभा और प्रभाव है। यह विभिन्न संस्कृतियों की अनेकता में एकता का जैसे आकर्षक गुलदस्ता है, मध्यप्रदेश, जिसे प्रकृति ने राष्ट्र की वेदी पर जैसे अपने हाथों से सजाकर रख दिया है, जिसका सतरंगी सौन्दर्य और मनमोहक सुगन्ध चारों ओर फैल रहे हैं। यहाँ के जनपदों की आबोहवा में कला, साहित्य और संस्कृति की मधुमयी सुवास तैरती रहती है। यहाँ के लोक समूहों और जनजाति समूहों में प्रतिदिन नृत्य, संगीत, गीत की रसधारा सहज रूप से फूटती रहती है। यहाँ का हर दिन पर्व की तरह आता है और जीवन में आनन्द रस घोलकर स्मृति के रूप में चला जाता है। इस प्रदेश के तुंग-उतुंग शैल शिखर विन्ध्य-सतपुड़ा, मैकल-कैमूर की उपत्यिकाओं के अन्तर से गूँजते अनेक पौराणिक आख्यान और नर्मदा, सोन, सिन्ध, चम्बल, बेतवा, केन, धसान, तवा, ताप्ती, शिप्रा, काली सिंध आदि सर-सरिताओं के उद्गम और मिलन की मिथकथाओं से फूटती सहस्त्र धाराएँ यहाँ के जीवन को आप्लावित ही नहीं करतीं, बल्कि परितृप्त भी करती हैं।

मध्यप्रदेश में छह लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है। ये छह साँस्कृतिक क्षेत्र है-

प्रत्येक सांस्कृतिक क्षेत्र या भू-भाग का एक अलग जीवंत लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, कला, बोली और परिवेश है। मध्यप्रदेश लोक-संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान श्री वसन्त निरगुणे लिखते हैं- संस्कृति किसी एक अकेले का दाय नहीं होती, उसमें पूरे समूह का सक्रिय सामूहिक दायित्व होता है। सांस्कृतिक अंचल (या क्षेत्र) की इयत्त्ता इसी भाव भूमि पर खड़ी होती है। जीवन शैली, कला, साहित्य और वाचिक परम्परा मिलकर किसी अंचल की सांस्कृतिक पहचान बनाती है।

मध्यप्रदेश की संस्कृति विविधवर्णी है। गुजरात, महाराष्ट्र अथवा उड़ीसा की तरह इस प्रदेश को किसी भाषाई संस्कृति में नहीं पहचाना जाता। मध्यप्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहाँ कोई एक लोक संस्कृति नहीं है। यहाँ एक तरफ़ पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है, तो दूसरी ओर अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृति का विस्तृत फलक पसरा है।

निष्कर्षत: मध्यप्रदेश छह सांस्कृतिक क्षेत्र निमाड़, मालवा, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड, महाकौशल और ग्वालियर हैं। धार-झाबुआ, मंडला-बालाघाट, छिन्दवाड़ा, होशंगाबाद्, खण्डवा-बुरहानपुर, बैतूल, रीवा-सीधी, शहडोल आदि जनजातीय क्षेत्रों में विभक्त है।

 
निमाड़ मध्यप्रदेश के पश्चिमी अंचल में स्थित है। अगर इसके भौगोलिक सीमाओं पर एक दृष्टि डालें तो यह पता चला है कि निमाड़ के एक ओर विन्ध्य की उतुंग शैल श्रृंखला और दूसरी तरफ़ सतपुड़ा की सात उपत्यिकाएँ हैं, जबकि मध्य में है नर्मदा की अजस्त्र जलधारा। पौराणिक काल में निमाड़ अनूप जनपद कहलाता था। बाद में इसे निमाड़ की संज्ञा दी गयी। फिर इसे पूर्वी और पश्चिमी निमाड़ के रूप में जाना जाने लगा।

मालवा महाकवि कालिदास की धरती है। यहाँ की धरती हरी-भरी, धन-धान्य से भरपूर रही है। यहाँ के लोगों ने कभी भी अकाल को नहीं देखा। विन्ध्याचल के पठार पर प्रसरित मालवा की भूमि सस्य, श्यामल, सुन्दर और उर्वर तो है ही, यहाँ की धरती पश्चिम भारत की सबसे अधिक स्वर्णमयी और गौरवमयी भूमि रही है।

एक प्रचलित अवधारणा के अनुसार वह क्षेत्र जो उत्तर में यमुना, दक्षिण में विंध्य प्लेटों की श्रेणियों, उत्तर-पश्चिम में चंबल और दक्षिण पूर्व में पन्ना, अजमगढ़ श्रेणियों से घिरा हुआ है, बुंदेलखंड के नाम से जाना जाता है। इसमें उत्तर प्रदेश के चार जिले- जालौन, झाँसी, हमीरपुर और बाँदा तथा मध्यप्रेदश के पांच जिले- सागर, दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर और पन्ना के अलावा उत्तर-पश्चिम में चंबल नदी तक प्रसरित विस्तृत प्रदेश का नाम था। कनिंघम ने बुंदेलखंड के अधिकतम विस्तार के समय इसमें गंगा और यमुना का समस्त दक्षिणी प्रदेश जो पश्चिम में बेतवा नदी से पूर्व में चन्देरी और सागर के अशोक नगर जिलों सहित तुमैन का विंध्यवासिनी देवी के मन्दिर तक तथा दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने के निकट बिल्हारी तक प्रसरित था, माना है।

बघेलखण्ड की धरती का सम्बन्ध अति प्राचीन भारतीय संस्कृति से रहा है। यह भू-भाग रामायणकाल में कोसल प्रान्त के अन्तर्गत था। महाभारत के काल में विराटनगर बघेलखण्ड की भूमि पर था, जो आजकल सोहागपुर के नाम से जाना जाता है। भगवान राम की वनगमन यात्रा इसी क्षेत्र से हुई थी। यहाँ के लोगों में शिव, शाक्त और वैष्णव सम्प्रदाय की परम्परा विद्यमान है। यहाँ नाथपंथी योगियो का खासा प्रभाव है। कबीर पंथ का प्रभाव भी सर्वाधिक है। महात्मा कबीरदास के अनुयायी धर्मदास बाँदवगढ़ के निवासी थी।

जबलपुर संभाग का संपूर्ण हिस्सा महाकोशल कहलाता है। नर्मदा नदी किनारे बसा यह क्षेत्र सांस्कृतिक और प्राकृतिक समृद्धता में धनी है। यहां भेड़ाघाट जैसा विहंगम जल प्रपात है तो दूसरी ओर परमहंसी में ज्योतिष और द्वारिका  पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी का आश्रम है ।

मध्यप्रदेश का चंबल क्षेत्र भारत का वह मध्य भाग है, जहाँ भारतीय इतिहास की अनेक महत्वपूर्ण गतिविधियां घटित हुई हैं। इस क्षेत्र का सांस्कृतिक-आर्थिक केंद्र ग्वालियर शहर है। सांस्कृतिक रूप से भी यहाँ अनेक संस्कृतियों का आवागमन और संगम हुआ है। राजनीतिक घटनाओं का भी यह क्षेत्र हर समय केन्द्र रहा है। स्वतंत्रता से पहले यहां सिंधिया राजपरिवार का शासन रहा था। १८५७ का पहला स्वतंत्रता संग्राम झाँसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने इसी भूमि पर लड़ा था। सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र ग्वालियर अंचल संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, चित्रकला अथवा लोकचित्र कला हो या फिर साहित्य, लोक साहित्य की कोई विधा हो, ग्वालियर अंचल में एक विशिष्ट संस्कृति के साथ नवजीवन पाती रही है। ग्वालियर क्षेत्र की यही सांस्कृतिक हलचल उसकी पहचान और प्रतिष्ठा बनाने में सक्षम रही है।

जैसा की नाम से ही प्रतीत होता हैं यह भारत के बीचो-बीच, अक्षांश 21°6' उत्तरी अक्षांश से 26°30' उत्तरी अक्षांश देशांतर 74°9' पूर्वी देशांतर से 82°48' पूर्वी देशांतर में स्थित हैं। राज्य, नर्मदा नदी के चारो और फैला हुआ है, जोकि विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमाला के बीच पूरब से पश्चिम की और बहती हैं, जोकि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच पारंपरिक सीमा का काम करती हैं।

राज्य, दक्षिण में महाराष्ट्र से, पश्चिम में गुजरात से घिरा हुआ है, जबकि इसके उत्तर-पश्चिम में राजस्थान, पूर्वोत्तर पर उत्तर प्रदेश और पूर्व में छत्तीसगढ़ स्थित हैं।

मध्य प्रदेश में सबसे ऊँची चोटी, धूपगढ़(पंचमढ़ी) की है जिसकी ऊंचाई 1,350 मीटर (4,429 फुट) हैं।

राज्य, पश्चिम में गुजरात से, उत्तर-पश्चिम में राजस्थान से, उत्तर में उत्तर प्रदेश, पूर्व में छत्तीसगढ़ और दक्षिण में महाराष्ट्र से घिरा हुआ हैं।

मध्य प्रदेश में उपोष्णकटिबंधीय जलवायु है। अधिकांश उत्तर भारत की तरह, यहाँ ग्रीष्म ऋतू (अप्रैल-जून), के बाद मानसून की वर्षा (जुलाई-सितंबर) और फिर अपेक्षाकृत शुष्क शरदऋतु आती है। यहाँ औसत वर्षा 1371 मिमी (54.0 इंच) होती है। इसके दक्षिण-पूर्वी जिलों में भारी वर्षा होती है, कुछ स्थानों में तो 2,150 मिमी (84.6 इंच) तक बारिश होती हैं, पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी जिलों में 1,000 मिमी (39.4 में) या कम बारिश होती हैं।

राज्य में पाये जाने वाले मिट्टी के प्रमुख प्रकार हैं:

चूँकि प्रदेश में सबसे अधिक वनक्षेत्र हैं, इसीलिए यहाँ बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान, सतपुड़ा राष्ट्रीय अभ्यारण्य, संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान, माधव राष्ट्रीय उद्यान, वन विहार राष्ट्रीय उद्यान, जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान, पन्ना राष्ट्रीय उद्यान, और पेंच राष्ट्रीय उद्यान सहित 09 राष्ट्रीय उद्यान एवं विश्व का प्रथम वाइट टाइगर सफारी और ज़ू मुकुंदपुर सतना में है तथा इसके अलावा यह कई प्राकृतिक संरक्षण उपस्थित हैं जिनमे अमरकंटक, बाग गुफाएं, बालाघाट, बोरी प्राकृतिक रिजर्व, केन घड़ियाल, घाटीगाँव , कुनो पालपुर, नरवर, चंबल, कुकड़ेश्वर, नरसिंहगढ़, नोरा देही, पचमढ़ी, पनपथा, शिकारगंज, पातालकोट और तामिया सम्मलित हैं सतपुड़ा रेंज में पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व, अमरकंटक बायोस्फियर रिजर्व और पन्ना राष्ट्रीय उद्यान भारत में उपस्थित 18 बायोस्फीयर में से तीन हैं।

कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, पन्ना, और सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान बाघ परियोजना क्षेत्रों के रूप में काम करते हैं। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को, घड़ियाल और मगर, नदी डॉल्फिन, ऊदबिलाव और कई प्रकार के कछुओ के संरक्षण के लिए जाना जाता है।

राज्य के जंगलों में सागौन और साल के पेड़ बहुतायत में पाये जाते हैं।

नर्मदा नदी मध्य प्रदेश की सबसे प्रमुख और लंबी (1312 कि.मी.) नदी हैं। यह दरार घाटी के माध्यम से पश्चिम की ओर बहती हैं, इसके उत्तरी किनारे में विंध्य के विशाल पर्वतमाला , जबकि दक्षिण में सतपुड़ा के पहाड़ों की रेंज हैंं। इसकी सहायक नदियों में बंजार, तवा, मचना, शक्कर, देनवा और सोनभद्र नदियां आदि शामिल हैंं।ताप्ती नदी भी नर्मदा के समानांतर, दरार घाटी के माध्यम से बहती हैं। नर्मदा-ताप्ती सिस्टम, राज्य की प्रमुख नदियों में से हैंं और मध्य प्रदेश की लगभग एक चौथाई भूमि क्षेत्र को जल प्रदान करती हैंं।

बाकी की नदियां चंबल, शिप्रा, कालीसिंध, पार्वती, कुनो, सिंध, बेतवा, धसान और केन, जोकि पुर्व की और बहती हैंं, यमुना नदी में जाके मिलती हैंं क्षिप्रा नदी जिसके किनारे प्राचीन शहर उज्जैन बसा हुआ हैंं हिंदू धर्म के सबसे पवित्र नदियों में से एक हैं। यहाँ हर 12 साल में सिंहस्थ कुंभ मेला आयोजित किया जाता हैं। इन नदियों द्वारा बहा के लाई गई भूमि कृषि समृद्ध होती हैंं। गंगा बेसिन के पूर्वी भाग में सोन, टोंस ,बीहर(मध्यप्रदेश का सबसे ऊंचा जलप्रपात इसी नदी में बनता है) तथारिहंद नदिया हैंं। सोन , जो अमरकंटक के पास मैकल पहाड़ो से निकलती हैं, दक्षिणी से गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी हैं जो कि हिमालय से ही नहीं निकलती हैं। सोन और उसकी सहायक नदियों, गंगा में मानसून का अथाह जल प्रवाहित करती हैंं।

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद, महानदी बेसिन का बड़ा हिस्सा अब छत्तीसगढ़ में प्रवाहित होता हैं। वर्तमान में, अनूपपुर जिले में हसदेव के पास नदी का केवल 154 km2 बेसिन क्षेत्र ही मध्य प्रदेश में बहता हैं।वैनगंगा, वर्धा, पेंच, कान्हां नदियां, गोदावरी नदी प्रणाली में विशाल मात्रा में पानी का निर्वहन करती हैंं। यहाँ कई महत्वपूर्ण राज्य के विकास में सिंचाई परियोजनाएं कार्यत हैंं, जिसमे गोदावरी नदी घाटी सिंचाई परियोजना भी शामिल हैं।

मध्यप्रदेश को निम्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया है:

मध्य प्रदेश राज्य में कुल 52 जिले हैं।

वर्ष 2011 की जनगणना के अन्तिम आकडोँ के अनुसार मध्य प्रदेश की कुल जनसँख्या 72,626,809 है जिसमे 3,76,11,370(51.8%) पुरुष एँव 3,49,84,645(48.2%) महिलाएँ है मध्यप्रदेश का लिगाँनुपात 930 है। मध्य प्रदेश की जनसंख्या, में कई समुदाय, जातीय समूह और जनजातिया आते हैं जिनमे यहाँ के मूल निवासी आदिवासि और हाल ही में अन्य राज्यों से आये प्रवासी भी शामिल है। राज्य की आबादी में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एक बड़े हिस्से का गठन करते हैं। मध्यप्रदेश के आदिवासी समूहों में मुख्य रूप से गोंड, भील, बैगा, कोरकू, भड़िया (या भरिया), हल्बा, कौल, मरिया, मालतो और सहरिया आते हैं। धार, झाबुआ, मंडला और डिंडौरी जिलों में 50 प्रतिशत से अधिक जनजातीय आबादी की है। खरगोन, छिंदवाड़ा, सिवनी, सीधी, सिंगरौली और शहडोल जिलों में 30-50 प्रतिशत आबादी जनजातियों की है। 2001 की जनगणना के अनुसार, मध्य प्रदेश में आदिवासियों की जनसंख्या 12233000 थी, जोकि कुल जनसंख्या का 20.27% हैं। यहाँ 46 मान्यता प्राप्त अनुसूचित जनजाति हैं और उनमें से तीन को विशेष आदिम जनजातीय समूहों का दर्जा प्राप्त हैं।

विभिन्न भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक वातावरण और अन्य जटिलताओं के कारण मध्य प्रदेश के आदिवासी, बड़े पैमाने पर विकास की मुख्य धारा से कटा हुआ है। मध्य प्रदेश, मानव विकास सूचकांक के निम्न स्तर 0.375 (2011) पर हैं, जोकि राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे है। इंडिया स्टेट हंगर इंडेक्स (2008) के अनुसार, मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति, 'बेहद खतरनाक' हैं और इसका स्थान इथोपिया और चाड के बीच है। राज्य की कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति में भी, भारत में सबसे खराब प्रदर्शन है। राज्य का प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीडीपी)(2010-11), देश के सबसे कम में चौथा स्थान पर है। प्रदेश, भारत के राज्य हंगर इंडेक्स पर भी सबसे कम रैंकिंग वाले राज्य में से है।

मध्य प्रदेश कुपोषण के मामले में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में से एक है। हाल ही के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार, पन्ना जिले में 43.1 प्रतिशत बच्चे कुपोषित, 24.7 प्रतिशत क्षीण और 40.3 प्रतिशत कम वजन वाले बच्चों की श्रेणी में आते है। इसी तरह का मामला ग्रामीण छतरपुर में भी हैं जहां 44.4 प्रतिशत बच्चे कुपोषित, 17.8 प्रतिशत क्षीण और 41.2 प्रतिशत कम वजन के हैं।

राज्य में भारत के कई प्रमुख शैक्षिक और अनुसंधान संस्थान है जिनमे भारतीय प्रबंध संस्थान (IIM) इंदौर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान(IIT) इंदौर, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भोपाल, भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) भोपाल, भारतीय पर्यटन और यात्रा प्रबंधन संस्थान (IITTM) ग्वालियर, आईआईएफएम भोपाल, नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी भोपाल शामिल हैं राज्य में एक पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय (नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर) भी हैं जिसके तीन संस्थान जबलपुर, महू और रीवा में है। प्रदेश की पहली निजी विश्वविद्यालय जेपी अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गुना एनएच 3 पर खूबसूरत कैंपस के साथ बना हुआ हैं। जोकि एनआईआरएफ (NIRF) के शीर्ष 100 में 86 वें स्थान पर है।

यहाँ 500 डिग्री कॉलेज हैं, जोकि राज्य के ही विश्वविद्यालयों से सम्बंधित हैं। जिनमें निम्न शामिल है;

वर्ष 1970 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्री-मेडिकल टेस्ट बोर्ड के लिये व्यावसायिक परीक्षा मंडल गठन किया गया। कुछ वर्ष के बाद 1981 में, प्री-इंजीनियरिंग बोर्ड का गठन किया गया था। फिर उसके बाद, वर्ष 1982 में इन बोर्डों दोनों को समामेलित कर मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (M.P.P.E.B.) जिसे व्यापम के रूप में भी जाना जाता है का गठन किया गया।

राज्य की आधिकारिक भाषा हिंदी और सिंधी है। इसके अलावा कई इलाको में संस्कृत, उर्दू और मराठी भाषियों की अच्छी खासी आबादी हैं। क्युकी ये क्षेत्र कभी मराठा राज्य के अन्तर्गत आते थे, बल्कि प्रदेश में महाराष्ट्र के बाहर मराठी लोगों की सबसे ज्यादा आबादी हैं। यहाँ कई क्षेत्रीय बोलिया भी बोली जाती हैं, जोकि कुछ लोगों के अनुसार हिन्दी ही से निकल कर बनी हुई हैं जबकि कुछ के अनुसार ये अलग या अन्य भाषा से संबंधित हैं। इन बोलियों के अलावा मालवा में मालवी, निमाड़ में निमाड़ी, बुंदेलखंड में बुंदेली, और बघेलखंड और दक्षिण पूर्व में बघेली (रीवा)बोली जाती हैं। इन में से हर एक बोली एक दूसरे से बहुत अलग है। 
यहाँ की अन्य भाषाओं में तेलुगू, भिलोड़ी (भीली), गोंडी, कोरकू, कळतो (नहली), और निहाली (नाहली) आदि शामिल हैं, जोकि आदिवासी समूहों द्वारा बोली जाती हैं।




#Article 52: राजस्थान (2090 words)


राजस्थान भारत गणराज्य का क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में गुजरात, दक्षिण-पूर्व में मध्यप्रदेश, उत्तर में पंजाब (भारत), उत्तर-पूर्व में उत्तरप्रदेश और हरियाणा है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि॰मी॰ (132139 वर्ग मील) है। 2011 की गणना के अनुसार राजस्थान की साक्षरता दर 66.11% हैं।

जयपुर राज्य की राजधानी है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरुस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एक मात्र पर्वत श्रेणी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, माउंट आबू और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, विश्व प्रसिद्ध  रणथम्भौर एवं सरिस्का हैं और भरतपुर के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान है, जो सुदूर साइबेरिया से आने वाले सारसों और बड़ी संख्या में स्थानीय प्रजाति के अनेकानेक पक्षियों के संरक्षित-आवास के रूप में विकसित किया गया है।

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को  यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा (1985) पाने वाला एकमात्र अभ्यारण्य।। 

राजस्थान का सबसे नया संभाग भरतपुर है।
राजस्थान की राजधानी जयपुर को भारत का पेरिस कहा जाता हैं।
 
राजस्थान का सबसे छोटा जिला क्षेत्रफल कि दृष्टि से धोलपुर है, और सबसे बड़ा जिला जैसलमेर हैं।

प्राचीन समय में राजस्थान में आदिवासी कबीलों का  शासन था । 2500 ईसा पूर्व से पहले राजस्थान में बसा हुआ था और उत्तरी राजस्थान में सिंधु घाटी सभ्यता की नींव यहाँ थी। भील और मीना जनजाति इस क्षेत्र में रहने के लिए सबसे पहले थे। संसार के प्राचीनतम साहित्य में अपना स्थान रखने वाले आर्यों के धर्मग्रंथ ऋग्वेद में मत्स्य जनपद का उल्लेख आया है जो कि वर्तमान राजस्थान के स्थान पर अवस्थित था। महाभारत कथा में भी मत्स्य नरेश विराट का उल्लेख आता है, जहाँ पांडवों ने अज्ञातवास बिताया था। राजस्थान के आदिवासी इन्हीं मत्स्यों के वंशज आज मीना / मीणा कहलाते हैं। करीब 11 वी शताब्दी के पूर्व तक दक्षिण राजस्थान पर भील राजाओं का शासन था  उसके बाद मध्यकाल में राजपूत जाति के विभिन्न वंशो ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना कब्जा जमा लिया, तो उन भागों का नामकरण अपने-अपने वंश, क्षेत्र की प्रमुख बोली अथवा स्थान के अनुरूप कर दिया।ये राज्य थे- चित्तौडगढ, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, (जालोर) सिरोही, कोटा, बूंदी, जयपुर, अलवर,  करौली, झालावाड़ , मेरवाड़ा और टोंक(मुस्लिम पिण्डारी). ब्रिटिशकाल में राजस्थान 'राजपूताना' नाम से जाना जाता था राजा महाराणा प्रताप,और महाराणा सांगा,महाराजा सूरजमल, महाराजा जवाहर सिंह अपनी असाधारण राज्यभक्ति और शौर्य के लिये जाने जाते हैं।  पन्ना धाय जैसी बलिदानी माता, मीरां जैसी जोगिन यहां की एक बड़ी शान है।कर्मा बाई जैसी भक्तणी जिसने भगवान जगन नाथ जी को हाथों से खीचड़ा खिलाया था। इन राज्यों के नामों के साथ-साथ इनके कुछ भू-भागों को स्थानीय एवं भौगोलिक विशेषताओं के परिचायक नामों से भी पुकारा जाता रहा है। पर तथ्य यह है कि राजस्थान के अधिकांश तत्कालीन क्षेत्रों के नाम वहां बोली जाने वाली प्रमुखतम बोलियों पर ही रखे गए थे। उदाहरणार्थ ढ़ूंढ़ाडी-बोली के इलाकों को ढ़ूंढ़ाड़ (जयपुर) कहते हैं। 'मेवाती' बोली वाले निकटवर्ती भू-भाग अलवर को 'मेवात', उदयपुर क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली 'मेवाड़ी' के कारण उदयपुर को मेवाड़, ब्रजभाषा-बाहुल्य क्षेत्र को 'ब्रज', 'मारवाड़ी' बोली के कारण बीकानेर-जोधपुर इलाके को 'मारवाड़' और 'वागडी' बोली पर ही डूंगरपुर-बांसवाडा अदि को 'वागड' कहा जाता रहा है। डूंगरपुर तथा उदयपुर के दक्षिणी भाग में प्राचीन ५६ गांवों के समूह को छप्पन नाम से जानते हैं। माही नदी के तटीय भू-भाग को 'कोयल' तथा अजमेर-मेरवाड़ा के पास वाले कुछ पठारी भाग को 'उपरमाल' की संज्ञा दी गई है।

राजस्थान भारत का एक महत्वपूर्ण प्रांत है। यह 30 मार्च 1949 को भारत का एक ऐसा प्रांत बना, जिसमें तत्कालीन राजपूताना की ताकतवर रियासतें विलीन हुईं। भरतपुर के जाट शासक ने भी अपनी रियासत के विलय राजस्थान में किया था। राजस्थान शब्द का अर्थ है: 'राजाओं का स्थान' क्योंकि ये राजपूत राजाओ से रक्षित भूमि थी इस कारण इसे राजस्थान कहा गया था। भारत के संवैधानिक-इतिहास में राजस्थान का निर्माण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। ब्रिटिश शासकों द्वारा भारत को आजाद करने की घोषणा करने के बाद जब सत्ता-हस्तांतरण की कार्यवाही शुरू की, तभी लग गया था कि आजाद भारत का राजस्थान प्रांत बनना और राजपूताना के तत्कालीन हिस्से का भारत में विलय एक दूभर कार्य साबित हो सकता है। आजादी की घोषणा के साथ ही राजपूताना के देशी रियासतों के मुखियाओं में स्वतंत्र राज्य में भी अपनी सत्ता बरकरार रखने की होड़ सी मच गयी थी, उस समय वर्तमान राजस्थान की भौगालिक स्थिति के नजरिये से देखें तो राजपूताना के इस भूभाग में कुल बाईस देशी रियासतें थी। इनमें एक रियासत अजमेर-मेरवाडा प्रांत को छोड़ कर शेष देशी रियासतों पर देशी राजा महाराजाओं का ही राज था। अजमेर-मेरवाडा प्रांत पर ब्रिटिश शासकों का कब्जा था; इस कारण यह तो सीघे ही स्वतंत्र भारत में आ जाती, मगर शेष इक्कीस रियासतों का विलय होना यानि एकीकरण कर 'राजस्थान' नामक प्रांत बनाया जाना था। सत्ता की होड़ के चलते यह बड़ा ही दूभर लग रहा था, क्योंकि इन देशी रियासतों के शासक अपनी रियासतों के स्वतंत्र भारत में विलय को दूसरी प्राथमिकता के रूप में देख रहे थे। उनकी मांग थी कि वे सालों से खुद अपने राज्यों का शासन चलाते आ रहे हैं, उन्हें इसका दीर्घकालीन अनुभव है, इस कारण उनकी रियासत को 'स्वतंत्र राज्य' का दर्जा दे दिया जाए। करीब एक दशक की ऊहापोह के बीच 18 मार्च 1948 को शुरू हुई राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया कुल सात चरणों में एक नवंबर 1956 को पूरी हुई। इसमें भारत सरकार के तत्कालीन देशी रियासत और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और उनके सचिव वी॰ पी॰ मेनन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इनकी सूझबूझ से ही राजस्थान के वर्तमान स्वरुप का निर्माण हो सका। राजस्थान में कुल 21 राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरते हैं।

राजस्थान की आकृति लगभग पतंगाकार है। राज्य २३ ३ से ३० १२ अक्षांश और ६९ ३० से ७८ १७ देशान्तर के बीच स्थित है। इसके उत्तर में पाकिस्तान, पंजाब और हरियाणा, दक्षिण में मध्यप्रदेश और गुजरात, पूर्व में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश एवं पश्चिम में पाकिस्तान हैं।

सिरोही से अलवर की ओर जाती हुई ४८० कि॰मी॰ लम्बी अरावली पर्वत श्रृंखला प्राकृतिक दृष्टि से राज्य को दो भागों में विभाजित करती है। राजस्थान का पूर्वी सम्भाग शुरु से ही उपजाऊ रहा है। इस भाग में वर्षा का औसत ५० से.मी. से ९० से.मी. तक है। राजस्थान के निर्माण के पश्चात् चम्बल और माही नदी पर बड़े-बड़े बांध और विद्युत गृह बने हैं, जिनसे राजस्थान को सिंचाई और बिजली की सुविधाएं उपलब्ध हुई है। अन्य नदियों पर भी मध्यम श्रेणी के बांध बने हैं, जिनसे हजारों हैक्टर सिंचाई होती है। इस भाग में ताम्बा, जस्ता, अभ्रक, पन्ना, घीया पत्थर और अन्य खनिज पदार्थों के विशाल भण्डार पाये जाते हैं।

राज्य का पश्चिमी भाग देश के सबसे बड़े रेगिस्तान थार या 'थारपाकर' का भाग है। इस भाग में वर्षा का औसत १२ से.मी. से ३० से.मी. तक है। इस भाग में लूनी, बांड़ी आदि नदियां हैं, जो वर्षा के कुछ दिनों को छोड़कर प्राय: सूखी रहती हैं। देश की स्वतंत्रता से पूर्व बीकानेर राज्य गंगानहर द्वारा पंजाब की नदियों से पानी प्राप्त करता था। स्वतंत्रता के बाद राजस्थान इण्डस बेसिन से रावी और व्यास नदियों से ५२.६ प्रतिशत पानी का भागीदार बन गया। उक्त नदियों का पानी राजस्थान में लाने के लिए सन् १९५८ में 'राजस्थान नहर' (अब इंदिरा गांधी नहर) की विशाल परियोजना शुरु की गई। जोधपुर, बीकानेर, चूरू एवं बाड़मेर जिलों के नगर और कई गांवों को नहर से विभिन्न लिफ्ट परियोजनाओं से पहुंचाये गये पीने का पानी उपलब्ध होगा। इस प्रकार राजस्थान के रेगिस्तान का एक बड़ा भाग अन्तत: शस्य श्यामला भूमि में बदल जायेगा। सूरतगढ़ जैसे कई इलाको में यह नजारा देखा जा सकता है।
 
गंगा बेसिन की नदियों पर बनाई जाने वाली जल-विद्युत योजनाओं में भी राजस्थान भी भागीदार है। इसे इस समय भाखरा-नांगल और अन्य योजनाओं के कृषि एवं औद्योगिक विकास में भरपूर सहायता मिलती है। राजस्थान नहर परियोजना के अलावा इस भाग में जवाई नदी पर निर्मित एक बांध है, जिससे न केवल विस्तृत क्षेत्र में सिंचाई होती है, वरन् जोधपुर नगर को पेयजल भी प्राप्त होता है। यह सम्भाग अभी तक औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। पर उम्मीद है, इस क्षेत्र में ज्यो-ज्यों बिजली और पानी की सुविधाएं बढ़ती जायेंगी औद्योगिक विकास भी गति पकड़ लेगा। इस बाग में लिग्नाइट, फुलर्सअर्थ, टंगस्टन, बैण्टोनाइट, जिप्सम, संगमरमर आदि खनिज प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। बाड़मेर क्षेत्र में सिलिसियस अर्थ और कच्चा तेल के भंडार  प्रचुर मात्रा में हैं। हाल ही की खुदाई से पता चला है कि इस क्षेत्र में उच्च किस्म की प्राकृतिक गैस भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अब वह दिन दूर नहीं, जबकि राजस्थान का यह भाग भी समृद्धिशाली बन जाएगा।

राज्य का क्षेत्रफल ३.४२ लाख वर्ग कि.मी है जो भारत के कुल क्षेत्रफल का १०.४० प्रतिशत है। यह भारत का सबसे बड़ा राज्य है। वर्ष १९९६-९७ में राज्य में गांवों की संख्या ३७८८९ और नगरों तथा कस्बों की संख्या २२२ थी। राज्य में ३३ जिला परिषदें, २३५ पंचायत समितियां और ९१२५ ग्राम पंचायतें हैं। नगर निगम ४ और सभी श्रेणी की नगरपालिकाएं १८० हैं।

सन् १९९१ की जनगणना के अनुसार राज्य की जनसंख्या ४.३९ करोड़ थी। जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग कि॰मी॰ १२६ है। इसमें पुरुषों की संख्या २.३० करोड़ और महिलाओं की संख्या २.०९ करोड़ थी। राज्य में दशक वृद्धि दर २८.४४ प्रतिशत थी, जबकि भारत में यह औसत दर २३.५६ प्रतिशत थी। राज्य में साक्षरता ३८.८१ प्रतिशत थी। जबकि भारत की साक्षरता तो केवल २०.८ प्रतिशत थी जो देश के अन्य राज्यों में सबसे कम थी। राज्य में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति राज्य की कुल जनसंख्या का क्रमश: १७.२९ प्रतिशत और १२.४४ प्रतिशत है।

राजस्थान की जलवायु शुष्क से उप-आर्द्र मानसूनी जलवायु है। अरावली के पश्चिम में न्यून वर्षा, उच्च दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर, निम्न आर्द्रता तथा तीव्र हवाओं युक्त शुष्क जलवायु है। दूसरी ओर अरावली के पूर्व में अर्धशुष्क एवं उप-आर्द्र जलवायु है। अक्षांशीय स्थिति, समुद्र से दूरी, समुद्र ताल से से ऊंचाई, अरावली पर्वत श्रेणियों की स्थिति एवं दिशा, वनस्पति आवरण आदि सभी यहाँ की जलवायु को प्रभावित करते हैं।

राजस्थान के प्रथम व्यक्तित्व:-

मुख्य लेख : राजस्थान की महत्वपूर्ण कला-संस्कृति इकाइयां

आरटीडीसी - राजस्थान पर्यटन विकास निगम लिमिटेड राजस्थान की सभी पर्यटन सम्बंदित जानकारी एवं सेवा उपलब्धि कराती है | पूरे भारत वर्ष में सबसे ज्यादा पह्माणे में विदेशी पर्यटन सिर्फ राजस्थान आते है जो की भारत देश की संस्कृति, कला , वेश भूषा , आस्था का रूप है | राजस्थान पर्यटन विभाग राजस्थान के सभी प्रसिद्द राज महल, मंदिर, लोक कला, टाइगर रिसॉर्ट्स , होटल्स  जैसी सभी सेवाएं पर्यटकों को उपलब्ध कराती है |

यह राजस्थान का सबसे प्राचीन एवं सुसंगठित उद्योग है। राजस्थान में सबसे पहले १८८९ में द कृष्णा मिल्स लिमिटेड की स्थापना देशभक्त सेठ दामोदर दास ने ब्यावर नगर में की थी। यह राजस्थान की पहली सूती वस्त्र मिल थी। 

सर्वाजनिक क्षेत्र में तीन मिल है-

राजस्थान में सहकारी सूती मिल है - 

प्रमुख नीजि सुती मिलें 

राजस्थान में सर्वप्रथम चित्तौड़गढ़ ज़िले में भोपालसागर नगर में चीनी मिल द मेवाड़ सुगर मिल्स के नाम से सन् १९३२ में प्रारम्भ की गई। दूसरा कारखाना सन् १९३७ में श्रीगंगानगर में द श्रीगंगानगर सुगर मिल्स के नाम से स्थापित हुआ। इसमें मिल में शक्कर बनाने का कार्य १९४६ में प्रारम्भ हुआ। १९५६ में इस चीनी मिल को राज्य सरकार ने अधिगृहीत कर लिया तथा यह सार्वजनिक क्षेत्र में आ गई।

१९६५ में बूंदी ज़िले के केशोराय पाटन में चीनी मिल सहकारी क्षेत्र में स्थापित की गई। वर्तमान में बंद है

सन् १९७६ में उदयपुर में चीनी मिल निजी क्षेत्र में स्थापित की गई।

चुकन्दर से चीनी बनाने के लिए श्रीगंगनगर सुगर मिल्स लिमिटेड में एक योजना १९६८ में आरम्भ की गई थी।

चीनी उद्योग 

सीमेन्ट उद्योग की दृष्टि से राजस्थान का पूरे भारत में प्रथम स्थान है। यहां पर सर्वप्रथम १९०४ में समुद्री सीपियों से सीमेन्ट बनाने का प्रयास किया गया था। 
१९१५ ई. राजस्थान में लाखेरी, बूंदी में क्लिक निक्सन कम्पनी द्वारा सर्वप्रथम एक सीमेन्ट संयंत्र स्थापित किया गया। १९१७ में इस कारखाने में सीमेन्ट बनाने का कार्य प्रारम्भ किया गया।

राजस्थान में काँच प्राप्ति के मुख्य स्थल जयपुर, बीकानेर, बूंदी तथा धौलपुर ज़िले है जहां उपयुक्त रूप से काँच की प्राप्ति होती है। द हाई टेक्निकल प्रीसीजन ग्लास वर्क्स सार्वजनिक क्षेत्र में धौलपुर में राजस्थान सरकार का उपक्रम है जो श्रीगंगानगर सुगर मिल्स के अधीन है। काँच उद्योग के मामले में  राजस्थान उत्तर प्रदेश के बाद दुसरे स्थान पर है।

संपूर्ण भारतवर्ष में ४२% ऊन राजस्थान से उत्पादित होती है। इस कारण राजस्थान भर में कई ऊन उद्योग की मिलें विद्यमान है जिसमें स्टेट वूलन मिल्स (बीकानेर ), जोधपुर ऊन फैक्ट्री, विदेशी आयात - निर्यात संस्था, कोटा इत्यादि है।

नामकरण :

स्थिति :

विस्तार - उ. से द. तक लम्बाई 826 कि.मी. तथा  विस्तार उतर में कोणा गाँव (गंगानगर) से दक्षिण में बोरकुंड गाँव (बांसवाङ़ा) तक है।




#Article 53: हिमाचल प्रदेश (3539 words)


हिमाचल प्रदेश (अंग्रेज़ी: Himachal Pradesh, उच्चारण ) उत्तर-पश्चिमी भारत में स्थित एक राज्य है। यह 21,629 मील² (56019 किमी²) से अधिक क्षेत्र में फ़ैला हुआ है तथा उत्तर में जम्मू कश्मीर और लडाख ये कें,प्र, पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम में पंजाब (भारत), दक्षिण में हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में उत्तराखण्ड तथा पूर्व में तिब्बत से घिरा हुआ है। हिमाचल प्रदेश का शाब्दिक अर्थ बर्फ़ीले पहाड़ों का प्रांत है।
हिमाचल प्रदेश को देव भूमि भी कहा जाता है। इस क्षेत्र में आर्यों का प्रभाव ऋग्वेद से भी पुराना है। आंग्ल-गोरखा युद्ध के बाद, यह ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के हाथ में आ गया। सन 1857 तक यह महाराजा रणजीत सिंह के शासन के अधीन पंजाब राज्य (पंजाब हिल्स के सीबा राज्य को छोड़कर) का हिस्सा था।
सन 1956 मे इसे केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया, लेकिन 1971 मे इसे, हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम-1971 के अन्तर्गत इसे 25 जनवरी 1971 को भारत का अठारहवाँ राज्य बनाया गया।

हिमाचल प्रदेश प्रतिव्यक्ति आय के अनुसार भारत के राज्यों में पन्द्रहवें स्थान पर है। बारहमासी नदियों की बहुतायत के कारण, हिमाचल अन्य राज्यों को पनबिजली बेचता है जिनमे प्रमुख हैं दिल्ली, पंजाब (भारत) और राजस्थान। राज्य की अर्थव्यवस्था तीन प्रमुख कारकों पर निर्भर करती है जो हैं, पनबिजली, पर्यटन और कृषि।
हिंदु राज्य की जनसंख्या का 95% हैं और प्रमुख समुदायों मे राजपूत, ब्राह्मण, घिर्थ (चौधरी), गद्दी, कन्नेत, राठी और कोली शामिल हैं। ट्रान्सपरेन्सी इंटरनैशनल के 2005 के सर्वेक्षण के अनुसार, हिमाचल प्रदेश देश में केरल के बाद दूसरी सबसे कम भ्रष्ट राज्य है।

 का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि मानव अस्तित्व का अपना इतिहास है। इस बात की सत्यता के प्रमाण  के विभिन्न भागों में हुई खुदाई में प्राप्त सामग्रियों से मिलते हैं। प्राचीनकाल में इस प्रदेश के आदि निवासी दास, दस्यु और निषाद के नाम से जाने जाते थे। उन्नीसवीं शताब्दी में रणजीत सिंह ने इस क्षेत्र के अनेक भागों को अपने राज्य में मिला लिया। जब अंग्रेज यहां आए, तो उन्होंने गोरखा लोगों को पराजित करके कुछ राजाओं की रियासतों को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

बिलासपुर रियासत को 1948 ई. में प्रदेश से अलग रखा गया था। उन दिनों इस क्षेत्र में भाखड़ा-बांध परियोजना का कार्य चलाने के कारण इसे प्रदेश में अलग रखा गया। एक जुलाई, 1954 ई. को कहलूर रियासत को प्रदेश में शामिल करके इसे बिलासपुर का नाम दिया गया। उस समय बिलासपुर तथा घुमारवीं नामक दो तहसीलें बनाई गईं। यह प्रदेश का पांचवां जिला बना। 1954 में जब ‘ग’ श्रेणी की रियासत बिलासपुर को इसमें मिलाया गया, तो इसका क्षेत्रफल बढ़कर 28,241 वर्ग कि.मी.हो गया। 

एक मई, 1960 को छठे जिला के रूप में किन्नौर का निर्माण किया गया। इस जिला में महासू जिला की चीनी तहसील तथा रामपुर तहसील को 14 गांव शामिल गए गए। इसकी तीन तहसीलें कल्पा, निचार और पूह बनाई गईं।

वर्ष 1966 में पंजाब का पुनर्गठन किया गया तथा पंजाब व हरियाणा दो राज्य बना दिए गए। भाषा तथा तिहाड़ी क्षेत्र के पंजाब से लेकर हिमाचल प्रदेश में शामिल कर दिए गए। संजौली, भराड़ी, कुसुमपटी आदि क्षेत्र जो पहले पंजाब में थे तथा नालागढ़ आदि जो पंजाब में थे, उन्हें पुनः हिमाचल प्रदेश में शामिल कर दिया गया। सन 1966 में इसमें पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों को मिलाकर इसका पुनर्गठन किया गया तो इसका क्षेत्रफल बढ़कर 55,673 वर्ग कि॰मी॰ हो गया।

हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा २५ जनवरी १९७१ को मिला। 1 नवम्बर 1972 को कांगड़ा ज़िले के तीन ज़िले कांगड़ा, ऊना तथा हमीरपुर बनाए गए। महासू ज़िला के क्षेत्रों में से सोलन ज़िला बनाया गया।

हिमाचल प्रदेश हिमालय पर्वत की शिवालिक श्रेणी का हिस्सा है। शिवालिक पर्वत श्रेणी से ही घग्गर नदी निकलती है। राज्य की अन्य प्रमुख नदियों में सतलुज और व्यास शामिल है। हिमाचल हिमालय का सुदूर उत्तरी भाग लद्दाख के ठंडे मरुस्थल का विस्ता है और लाहौल एवं स्पिति जिले के स्पिति उपमंडल में है। हिमालय की तीनों मुख्य पर्वत श्रंखलाएँ, बृहत हिमालय, लघु हिमालय; जिन्हें हिमाचल में धौलाधार और उत्तरांचल में नागतीभा कहा जाता है और उत्तर-दक्षिण दिशा में फैली शिवालिक श्रेणी, इस हिमालय खंड में स्थित हैं। लघु हिमालय में 1000 से 2000 मीटर ऊँचाई वाले पर्वत ब्रिटिश प्रशासन के लिए मुख्य आकर्षण केंद्र रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में पांच प्रमुख नदियां बहती हैं। हिमाचल प्रदेश में बहने वाले पांचों नदियां एवं छोटे-छोटे नाले बारह मासी हैं। इनके स्रोत बर्फ से ढकी पहाडि़यों में स्थित हैं। हिमाचल प्रदेश में बहने वाली पांच नदियों में से चार का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। उस समय ये अन्य नामों से जानी जाती थीं जैसे अरिकरी (चिनाब) पुरूष्णी (रावी), अरिजिकिया (ब्यास) तथा शतदुई (सतलुज) पांचवी नदी  (कालिंदी) जो यमुनोत्तरी से निकलती है उसका सूर्य देव से पौराणिक संबंध दर्शाया जाता है।

रावी नदीः रावी नदी का प्राचीन नाम ‘इरावती और परोष्णी’ है। रावी नदी मध्य हिमालय की धौलाधार शृंखला की शाखा बड़ा भंगाल से निकलती है। रावी नदी ‘भादल’ और ‘तांतागिरि’ दो खड्डों से मिलकर बनती है। ये खड्डें बर्फ पिघलने से बनती है। यह नदी चंबा से खेड़ी के पास पंजाब (भारत) में प्रवेश करती है और पंजाब से पाकिस्तान में प्रवेश करती है। यह भरमौर और चंबा शहर में बहती है। यह बहुत ही उग्र नदी है। इसकी सहायक नदियां तृण दैहण, बलजैडी, स्यूल, साहो, चिडाचंद, छतराड़ी और बैरा हैं। इसकी लंबाई 720 किलोमीटर है, परंतु हिमाचल में इसकी लंबाई 158 किलोमीटर है। सिकंदर महान के साथ आए यूनानी इतिहासकार ने इसे ‘हाइड्रास्टर और रहोआदिस’ का नाम दिया था।

ब्यास नदीः ब्यास नदी का पुराना नाम ‘अर्जिकिया’ या ‘विपाशा’ था। यह कुल्लू में व्यास कुंड से निकलती है। व्यास कुंड पीर पंजाल पर्वत शृंखला में स्थित रोहतांग दर्रे में है। यह कुल्लू, मंडी, हमीरपुर और कांगड़ा में बहती है। कांगड़ा से मुरथल के पास पंजाब में चली जाती है। मनाली, कुल्लू, बजौरा, औट, पंडोह, मंडी, कांढापतन ( मिनी हरिद्धार ),  सुजानपुर टीहरा, नादौन और देहरा गोपीपुर इसके प्रमुख तटीय स्थान हैं। इसकी कुल लंबाई 460 कि॰मी॰ है। हिमाचल में इसकी लंबाई 260 कि॰मी॰ है। कुल्लू में पतलीकूहल, पार्वती, पिन, मलाणा-नाला, फोजल, सर्वरी और सैज इसकी सहायक नदियां हैं। कांगड़ा में सहायक नदियां बिनवा न्यूगल, गज और चक्की हैं। इस नदी का नाम महर्षि ब्यास के नाम पर रखा गया है। यह प्रदेश की जीवनदायिनी नदियों में से एक है।

चिनाव नदीः चिनाव नदी जम्मू-कश्मीर से होती हुई पंजाब राज्य में बहने वाली नदी है। पानी के घनत्व की दृष्टि से यह प्रदेश की सबसे बड़ी नदी है। यह नदी समुद्र तल से लगभग 4900 मीटर की ऊंचाई पर बारालाचा दर्रे (लाहौल स्पीति) के पास से निकलने वाली चन्द्रा और भागा नदियों के तांदी नामक स्थान पर मिलने से बनती है। इस नदी को वैदिक साहित्य में ‘अश्विनी’ नाम से संबोधित किया गया है। ऊपरी हिमालय पर टांडी में ‘चन्द्र’ और ‘भागा’ नदियां मिलती हैं, जो चिनाव नदी कहलाती है। महाभारत काल में इस नदी का नाम ‘चंद्रभागा’ भी प्रचलित हो गया था। ग्रीक लेखकों ने चिनाव नदी को ‘अकेसिनीज’ लिखा है, जो अश्विनी का ही स्पष्ट रूपांतरण है। चंद्रभागा नदी मानसरोवर (तिब्ब्त) के निकट चंद्रभागा नामक पर्वत से निस्तृत होती है और सिंधु नदी में गिर जाती है। चिनाव नदी की ऊपरी धारा को चद्रभागा कहकर, पुःन शेष नदी का प्राचीन नाम अश्विनी कहा गया है। इस नदी को हिमाचल से अदभुत माना गया है। इस नदी का तटवर्ती प्रदेश पूर्व गुप्त काल में म्लेच्छों तथा यवन शव आदि द्वारा शासित था।

हिमाचल में तीन ऋतुएं होती हैं - ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु और वर्षा ऋतु। हिमाचल प्रदेश की समुद्रतल से ऊंचाई की विविधता के कारण जलवायु में भी भिन्नता है। कहीं सारा वर्ष बर्फ गिरती है, तो कहीं गर्मी होती हे। हिमाचल में गर्म पानी के चशमें भी हैं और हिमनद भी है। ऐसा समुद्रतल से ऊंचाई की भिन्नता की वजह से है।

कृषि हिमाचल प्रदेश का प्रमुख व्‍यवसाय है। यह राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह 69 प्रतिशत कामकाजी आबादी को सीधा रोजगार मुहैया कराती है। कृषि और उससे संबंधित क्षेत्र से होने वाली आय प्रदेश के कुल घरेलू उत्‍पाद का 22.1 प्रतिशत है। कुल भौगोलिक क्षेत्र 55.673 लाख हेक्‍टेयर में से 9.79 लाख हेक्‍टेयर भूमि के स्‍वामी 9.14 लाख किसान हैं। मंझोले और छोटे किसानो के पास कुल भूमि का 86.4 प्रतिशत भाग है। राज्‍य में कृषि भूमि केवल 10.4 प्रतिशत है। लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र वर्षा-सिंचित है और किसान इंद्र देवता पर निर्भर रहते हैं।

प्रकृति ने हिमाचल प्रदेश को व्‍यापक कृषि जलवायु परिस्थितियां प्रदान की हैं जिसकी वजह से किसानों को विविध फल उगाने में सहायता मिली है। बागवानी के अंतर्गत आने वाले प्रमुख फल हैं-सेब, नाशपाती, आडू, बेर, खूमानी, गुठली वाले फल, नींबू प्रजाति के फल, आम, लीची, अमरूद और झरबेरी आदि। 1950 में केवल 792 हेक्‍टेयर क्षेत्र बागवानी के अंतर्गत था, जो बढ़कर 2.23 लाख हेक्‍टेयर हो गया है। इसी तरह,1950 में फल उत्‍पादन 1200 मीट्रिक टन था, जो 2007 में बढकर 6.95 लाख टन हो गया है।

राज्‍य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 55,673 वर्ग किलोमीटर है। वन रिकार्ड के अनुसार कुल वन क्षेत्र 37,033 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से 16,376 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है जहां पहाड़ी चरागाह वाली वनस्‍पतियां नहीं उगाई जा सकतीं क्‍योंकि यह स्‍थायी रूप से बर्फ से ढका रहता है।

राज्‍य में 2 राष्‍ट्रीय पार्क और 32 वन्‍यजीवन अभयारण्‍य हैं। वन्‍यजीवन अभयारण्‍य के अंतर्गत कुल क्षेत्र 5,562 कि.मी., राष्‍ट्रीय पार्क के अंतर्गत 1,440 कि॰मी॰ है। इस तरह कुल संरक्षित क्षेत्र 7,002 कि॰मी॰ है।

हिमाचल प्रदेश राज्‍य में यहां की सड़कें ही यहां की जीवन रेखा हैं और ये संचार के प्रमुख साधन हैं। इसके 55,673 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में से 36,700 किलोमीटर में बसाहट है, जिसमें से 16,807 गांव अनेक पर्वतीय श्रृखलाओं और घाटियों के ढलानों पर फैले हुए हैं। जब यह राज्‍य 1948 में अस्तित्‍व में आया, तो यहां केवल 288 कि॰मी॰ लंबी सड़कें थीं जो 15 अगस्‍त 2007 तक बढ़कर 30,264 हो गई हैं।

साल 2007 तक हिमाचल प्रदेश में कुल बुवाई क्षेत्र 5.83 लाख हेक्‍टेयर था। गांवों में पीने के पानी की सुविधा उपलब्‍ध कराई गई और अब तक राज्‍य में 14,611 हैंडपंप लगाए जा चुके हैं। हिमाचल प्रदेश में भूजल की उलब्धता 36,615.92 हैक्टेयर मीटर (है.मी.) है।

पर्यटन उद्योग को हिमाचल प्रदेश में उच्‍च प्राथमिकता दी गई है और हिमाचल सरकार ने इसके विकास के लिए समुचित ढांचा विकसित किया है जिसमें जनोपयोगी सेवाएं, सड़कें, संचार तंत्र हवाई अड्डे यातायात सेवाएं, जलापूर्ति और जन स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं शामिल है। राज्‍य पर्यटन विकास निगम राज्‍य की आय में 10 प्रतिशत का योगदान करता है। राज्‍य में तीर्थो और नृवैज्ञानिक महत्‍व के स्‍थलों का समृद्ध भंडार है। राज्‍य को व्‍यास, पाराशर, वसिष्‍ठ, मार्कण्‍डेय और लोमश आदि ऋषियों के निवास स्‍थल होने का गौरव प्राप्‍त है। गर्म पानी के स्रोत, ऐतिहासिक दुर्ग, प्राकृतिक और मानव निर्मित झीलें, उन्‍मुक्‍त विचरते चरवाहे पर्यटकों के लिए असीम सुख और आनंद का स्रोत हैं।

चंबा घाटी

चंबा घाटी (915 मीटर) की ऊंचाई पर रावी नदी के दाएं किनारे पर है। पुराने समय में राजशाही का राज्‍य होने के नाते यह लगभग एक शताब्‍दी पुराना राज्‍य है और 6वीं शताब्‍दी से इसका इतिहास मिलता है। यह अपनी भव्‍य वास्‍तुकला और अनेक रोमांचक यात्राओं के लिए एक आधार के तौर पर विख्‍यात है।

डलहौज़ी

पश्चिमी हिमाचल प्रदेश में डलहौज़ी नामक यह पर्वतीय स्‍थान पुरानी दुनिया की चीजों से भरा पड़ा है और यहां राजशाही युग की भाव्‍यता बिखरी पड़ी है। यह लगभग 14 वर्ग किलो मीटर फैला है और यहां काठ लोग, पात्रे, तेहरा, बकरोटा और बलूम नामक 5 पहाडियां है। इसे 19वीं शताब्‍दी में ब्रिटिश गवर्नर जनरल, लॉड डलहौज़ी के नाम पर बनाया गया था। इस कस्‍बे की ऊंचाई लगभग 525 मीटर से 2378 मीटर तक है और इसके आस पास विविध प्रकार की वनस्‍पति-पाइन, देवदार, ओक और फूलों से भरे हुए रोडो डेंड्रॉन पाए जाते हैं डलहौज़ी में मनमोहक उप निवेश यु‍गीन वास्‍तुकला है जिसमें कुछ सुंदर गिरजाघर शामिल है। यह मैदानों के मनोरम दृश्‍यों को प्रस्‍तुत करने के साथ एक लंबी रजत रेखा के समान दिखाई देने वाले रावी नदी के साथ एक अद्भुत दृश्‍य प्रदर्शित करता है जो घूम कर डलहौज़ी के नीचे जाती है। बर्फ से ढका हुआ धोलाधार पर्वत भी इस कस्‍बे से साफ दिखाई देता है।

धर्मशाला

धर्मशाला की ऊंचाई 1,250 मीटर (4,400 फीट) और 2,000 मीटर (6,460 फीट) के बीच है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, जहां पाइन के ऊंचे पेड़, चाय के बागान और इमारती लकड़ी पैदा करने वाले बड़े वृक्ष ऊंचाई, शांति तथा पवित्रता के साथ यहां खड़े दिखाई देते हैं। वर्ष 1960 से, जब से दलाई लामा ने अपना अस्‍थायी मुख्‍यालय यहां बनाया, धर्मशाला की अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति भारत के छोटे ल्‍हासा के रूप में बढ़ गई है।

कुफरी

अनंत दूरी तक चलता आकाश, बर्फ से ढकी चोटियां, गहरी घाटियां और मीठे पानी के झरने, कुफरी में यह सब है। यह पर्वतीय स्‍थान शिमला के पास समुद्री तल से 2510 मीटर की ऊंचाई पर हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी भाग में स्थित है। कुफरी में ठण्‍ड के मौसम में अनेक खेलों का आयोजन किया जाता है जैसे स्‍काइंग और टोबोगेनिंग के साथ चढ़ाडयों पर चढ़ना। ठण्‍ड के मौसम में हर वर्ष खेल कार्निवाल आयोजित किए जाते हैं और यह उन पर्यटकों के लिए एक बड़ा आकर्षण है जो केवल इन्‍हें देखने के लिए यहां आते हैं। यह स्‍थान ट्रेकिंग और पहाड़ी पर चढ़ने के लिए भी जाना जाता है जो रोमांचकारी खेल प्रेमियों का आदर्श स्‍थान है।

मनाली

कुल्‍लू से उत्तर दिशा में केवल 40 किलो मीटर की दूरी पर लेह की ओर जाने वाले राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर घाटी के सिरे के पास मनाली स्थित है। लाहुल, स्‍पीति, बारा भंगल (कांगड़ा) और जनस्‍कर पर्वत श्रृंखला पर चढ़ाई करने वालों के लिए यह एक मनपसंद स्‍थान है। मंदिरों से अनोखी चीजों तक, यहां से मनोरम दृश्‍य और रोमांचकारी गतिविधियां मनाली को हर मौसम और सभी प्रकार के यात्रियों के बीच लोकप्रिय बनाती हैं।

कुल्‍लू

कुल्लू घाटी को पहले कुलंथपीठ कहा जाता था। कुलंथपीठ का शाब्दिक अर्थ है रहने योग्‍य दुनिया का अंत। कुल्‍लू घाटी भारत में देवताओं की घाटी रही है। यहां के मंदिर, सेब के बागान और दशहरा हजारों पर्यटकों को कुल्‍लू की ओर आकर्षित करते हैं। यहां के स्‍थानीय हस्‍तशिल्‍प कुल्‍लू की सबसे बड़ी विशेषता है।

शिमला

हिमाचल प्रदेश की राजधानी और ब्रिटिश कालीन समय में ग्रीष्‍म कालीन राजधानी शिमला राज्‍य का सबसे महत्‍वपूर्ण पर्यटन केन्‍द्र है। यहां का नाम देवी श्‍यामला के नाम पर रखा गया है जो काली का अवतार है। शिमला लगभग 7267 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यह अर्ध चक्र आकार में बसा हुआ है। यहां घाटी का सुंदर दृश्‍य दिखाई देता है और महान हिमालय पर्वती की चोटियां चारों ओर दिखाई देती है। शिमला एक पहाड़ी पर फैला हुआ है जो करीब 12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है। इसके पड़ोस में घने जंगल और टेढ़े-मेढे़ रास्ते हैं, जहां पर हर मोड़ पर मनोहारी दृश्य देखने को मिलते हैं। यह एक आधुनिक व्यावसायिक केंद्र भी है। शिमला विश्व का एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। यहां प्रत्येक वर्ष देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग भ्रमण के लिए आते हैं। बर्फ से ढकी हुई यहां की पहाडि़यों में बड़े सुंदर दृश्य देखने को मिलते हैं जो पर्यटकों को बार-बार आने के लिए आकर्षित करते हैं। शिमला संग्रहालय हिमाचल प्रदेश की कला एवं संस्कृति का एक अनुपम नमूना है, जिसमें यहां की विभिन्न कलाकृतियां विशेषकर वास्तुकला, पहाड़ी कलम, सूक्ष्म कला, लकडि़यों पर की गई नक्काशियां, आभूषण एवं अन्य कृतियां संग्रहित हैं। शिमला में दर्शनीय स्थलों के अतिरिक्त कई अध्ययन केंद्र भी हैं, जिनमें लार्ड डफरिन द्वारा 1884-88 में निर्मित भारतीय उच्च अध्ययन केंद्र बहुत ही प्रसिद्ध है। यहां  कुछ ऐतिहासिक सरकारी भवन भी हैं, जैसे वार्नेस कोर्ट, गार्टन कैसल व वाइसरीगल लॉज ये भी बड़े ही दर्शनीय स्थल हैं। चैडविक झरना भी एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। इसके साथ ही ग्लेन नामक स्थल भी है। इसके समीप बहता हुआ झरना और सदाबहार जंगल बहुत ही आकर्षक हैं।

वर्ष 1971 में हिमाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा मिलने के बाद यहां कांग्रेस और भाजपा की बारी-बारी से सरकारें बनती रही है।

हिमाचल प्रदेश विधान सभा शिमला में स्थित है। वर्तमान हिमाचल प्रदेश विधानसभा एकसदनीय है।

नवम्बर 2017 में हिमाचल प्रदेश की हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए हुआ चुनाव था।
भाजपा ने इस चुनाव में जीत हासिल की। 68 सीटो में से 44 सीट जीत कर भाजपा पार्टी ने सरकार बनाई।

नवम्बर 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने राज्य का विधानसभा चुनाव प्रो० प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में लड़ा। 18 दिसम्बर 2017 को घोषित नतीजों में धूमल की हार के बाद केन्द्रीय नेतृत्व ने हिमाचल की बागडोर मण्डी ज़िला के सराज विधानसभा क्षेत्र से पांच बार रहे विधायक जयराम ठाकुर को सौंपी। हिमाचल के इतिहास में यह पहली बार है जब मण्डी ज़िले से कोई मुख्यमंत्री बना है।

जयराम ठाकुर (जन्म 06 जनवरी 1965) हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। दिसंबर 27, 2017 को उन्होने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

लोकसभा में हिमाचल प्रदेश के 4 निर्वाचन क्षेत्र हैं। कांगड़ा, मंडी, शिमला और हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश से चार सदस्य चुने जाते हैं। प्रदेश विधानसभा में 68 विधानसभा चुनाव क्षेत्र हैं। लोकसभा के चार चुनाव क्षेत्रों के अंतर्गत प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में 17-17 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। लाहुल-स्पीति, किन्नौर तथा भरमौर जनजातीय क्षेत्र हैं और ठंडे व दुर्गम क्षेत्र हैं। इस कारण इन क्षेत्रों में चुनाव प्रायः गर्मियों में करवाए जाते हैं।

सड़क मार्ग इस राज्य की यातायात का मुख्य माध्यम है। परंतु मानसून और ठंड के मौसम में भू-स्खलन और अन्य वजहों से यह काफी बाधित होता है।

भारत की 2011 जनगणना के अनुसार हिमाचल प्रदेश की कुल जनसंख्या 68,64,602 है। इनमें पुरुषों की जनसंख्या 34,81,873 तथा महिलाओं की जनसंख्या 33,82,729 है। 2011 की जनगणना आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश का लिंग अनुपात 972/1000 और साक्षरता दर 82.8% है।

राज्य की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी, काँगड़ी, पहाड़ी, पंजाबी और मंडियाली शामिल हैं। हिन्दू, बौद्ध और सिख यहाँ के प्रमुख धर्म हैं। पश्चिम में धर्मशाला, दलाई लामा की शरण स्थली है।

हिमाचल प्रदेश में चित्रकला का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। प्रदेश की चित्रकला का राष्ट्र के इतिहास में उल्लेखनीय योगदान है। यहां की चित्रकला की संपदा अज्ञात थी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हिमाचल तथा पंजाब के अनेक स्थानों पर चित्रों के नमूनों की खोज की गई। मैटकाफ प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने कांगड़ा के पुरात्न महलों में चित्रों की खोज की गुलेर, सुजानपुर टीहरा तथा कांगड़ा ऐसे ही स्थान थे, जहां पर यह धरोहर छिपी हुई थी।

हिमाचल में अनेक प्रकार के खनिज होते है। इनमें चूने का पत्थर, डोलोमाइट युक्त चूने की पत्थर, चट्टानी नमक, सिलिका रेत और स्लेट होते है। यहां लौह अयस्क, तांबा, चांदी, शीशा, यूरेनियम और प्राकृतिक गैस भी पाई जाती है।
चट्टानी नमकः चट्टानी नमक में स्थानीय भाषा में लेखन कहा जाता है। यह भारत की एकमात्र चट्टानी नमक की खान है। मैगली में नमकीन पानी को सुखाकर नमक तैयार किया जाता है। चट्टानी नमक दवाइयां और पशु चारे के काम में प्रयुक्त होता है।
प्राकृतिक तेल गैसः प्राकृतिक तेल गैस स्वारघाट (बिलासपुर) चौमुख (सुंदरनगर), चमकोल (हमीरपुर) तथा दियोटसिद्ध (हमीरपुर) में पाई जाती है। प्राकृतिक तेल गैस ज्वालामुखी (कांगड़ा) और रामशहर (सोलन) में भी पाई जाती है।
स्लेट : प्रदेश में स्लेट की लगभग 222 छोटी व बड़ी खाने हैं। खनियारा (धर्मशाला), मंडी, कांगड़ा और चंबा में अच्छी मात्रा में स्लेट प्राप्त होता है। मंडी में स्लेट से टाइलें बनाने का कारखाना है। स्लेट छत्त और फर्श बनाने में प्रयुक्त होता है। अच्छा स्लेट, भारी हिमपात से भी नहीं टूटता है।
सिलिका रेत : सिलिका रेत, बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, ऊना और मंडी की खड्डों व नालों में पाई जाती है। ऊना जिला के पलकवा, हरोली, बाथड़ी खड्डों में चमकदार पत्थर व रेत पाई जाती है। यह भवन निर्माण, पुल, बांध और सड़कें बनाने में प्रयुक्त होती है।
यूरेनियम : छिंजराढा, जरी (बंजार), ढेला, गढ़सा घाटी (कुल्लू) और हमीरपुर में यूरेनियम होने की संभावना का पता चला है। यह नाभिकीय ऊर्जा का स्रोत है।

प्रदेश के विकास में संचार माध्यम अहम भूमिका निभा रहे है। प्रदेश के दुर्गम इलाकों तक इन संचार माध्यमों का विस्तार हो चुका है। वर्तमान प्रदेश में रेडियो, टेलिविजन, दूरभाष, तार, फैक्स, डाक, ई-मेल, इंटरनेट आदि सुविधाएं उपलब्ध है। 1914 में शिमला में देश का प्रथम स्वचालित दूरभाष केंद्र स्थापित किया गया था। पांच नवंबर, 1983 को लाहुल-स्पीति के हिक्किम क्षेत्र में विश्व का सर्वाधिक ऊंचाई वाला डाकघर खोला गया था। शिमला में प्रदेश का प्रथम आकाशवाणी केंद्र खोला गया। हमीरपुर, धर्मशाला, कुल्लू, कसौली और किन्नौर में आकाशवाणी केंद, प्रसारण केंद्र स्थापित किए गए है। तरंग टावर मंडी जिला के जोगिंदर नगर तहसील में स्थापित किया गया था।

हिमाचल प्रदेश में कई प्रकार से विद्युत ऊर्जा प्राप्त होती है। यह नाभिकीय स्रोत, जल विद्युत, सौर ऊर्जा, कोयले और पेट्रोलियम पदार्थ आदि से प्राप्त होती है। हिमाचल प्रदेश में जल विद्युत उत्पादन की अधिक क्षमता है, क्योंकि प्रदेश में पांच प्रमुख नदियां और अनेक सहायक नदियां हैं। नदियों पर बांध बनाकर जल विद्युत उत्पन्न की जाती है। प्रदेश में अनेक परियोजनाएं हैं, जिनमें से कुछ तो पूरी हो चुकी हैं और कुछ निर्माणाधीन हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।
 
पौंग बांध परियोजना- यह बांध कांगड़ा जिला में व्यास नदी पर देहरा से 35 किलोमीटर दूर पौंग गांव की भूमि पर बना है, जो देश का सबसे ऊंचा राक-फिल डैम है। इसकी ऊंचाई 435 फुट है और इस पर 160 करोड़ रुपए व्यय हुए हैं। इसमें 5.6 मिलियन एकड़ फुट पानी जमा रखा जाता है, हालांकि इसमें कुल 6.6 एकड़ मिलियन फुट पानी जमा किया जा सकता है।

भाखड़ा बांध परियोजना-यह बांध सतलुज नदी पर जिला बिलासपुर के भाखड़ा गांव में बना है, जो सन् 1948 में शुरू होकर सन् 1963 में बनकर तैयार हुआ था। इसकी ऊंचाई 226 मीटर है। यह एशिया का सबसे ऊंचा बांध है। इसमें दो विद्युत घर हैं, जिनमें 1200 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है। इस बांध के कारण गोविंद सागर झील बनी है।




#Article 54: शहर (188 words)


 
 

शहर बड़ी और स्थायी मानव बस्ती होती है। शहर में आम तौर पर आवास, परिवहन, स्वच्छता, भूमि उपयोग और संचार के लिए निर्मित किया गया एक व्यापक सिस्टम होता हैं। ऐतिहासिक रूप से शहरवासियों का समग्र रूप से मानवता में छोटा सा अनुपात रहा है। लेकिन आज दो शताब्दियों से अभूतपूर्व और तेजी से शहरीकरण के कारण, कहा जाता है कि आज आधी आबादी शहरों में रह रही हैं। वर्तमान में शहर आमतौर पर बड़े महानगरीय क्षेत्र और शहरी क्षेत्र के केंद्र होते हैं। सबसे आबादी वाला उचित शहर शंघाई है।

एक शहर अन्य मानव बस्तियों से अपने अपेक्षाकृत बड़े आकार के कारण भिन्न होता है। शहर अकेले आकार से ही अलग नहीं है, बल्कि यह एक बड़े राजनीतिक संदर्भ में भूमिका निभाता है। शहर अपने आसपास के क्षेत्रों के लिए प्रशासनिक, वाणिज्यिक, धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में सेवा देता है। एक विशिष्ट शहर में पेशेवर प्रशासक, नियम-कायदे होते हैं और सरकार के कर्मचारियों को खिलाने के लिए कराधान भी। शहर शब्द फारसी से हिन्दी भाषा में आया है। पुराना संस्कृत शब्द नगर भी उपयोग किया जाता विशेषकर सरकारी कार्य में जैसे कि नगर निगम।

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#Article 55: लखनऊ (4938 words)


लखनऊ (; ,  भारत के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी है। इस शहर में लखनऊ जिले और लखनऊ मंडल के प्रशासनिक मुख्यालय भी स्थित हैं। लखनऊ शहर अपनी खास नज़ाकत और तहजीब वाली बहुसांस्कृतिक खूबी, दशहरी आम के बाग़ों तथा चिकन की कढ़ाई के काम के लिये जाना जाता है। २००६ मे इसकी जनसंख्या २,५४१,१०१ तथा साक्षरता दर ६८.६३% थी। भारत सरकार की २००१ की जनगणना, सामाजिक आर्थिक सूचकांक और बुनियादी सुविधा सूचकांक संबंधी आंकड़ों के अनुसार, लखनऊ जिला अल्पसंख्यकों की घनी आबादी वाला जिला है। कानपुर के बाद यह शहर उत्तर-प्रदेश का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है। शहर के बीच से गोमती नदी बहती है, जो लखनऊ की संस्कृति का हिस्सा है।

लखनऊ उस क्ष्रेत्र मे स्थित है जिसे ऐतिहासिक रूप से अवध क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। लखनऊ हमेशा से एक बहुसांस्कृतिक शहर रहा है। यहाँ के शिया नवाबों द्वारा शिष्टाचार, खूबसूरत उद्यानों, कविता, संगीत और बढ़िया व्यंजनों को हमेशा संरक्षण दिया गया। लखनऊ को नवाबों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। इसे पूर्व की स्वर्ण नगर (गोल्डन सिटी) और शिराज-ए-हिंद के रूप में जाना जाता है। आज का लखनऊ एक जीवंत शहर है जिसमे एक आर्थिक विकास दिखता है और यह भारत के तेजी से बढ़ रहे गैर-महानगरों के शीर्ष पंद्रह में से एक है। यह हिंदी और उर्दू साहित्य के केंद्रों में से एक है। यहां अधिकांश लोग हिन्दी बोलते हैं। यहां की हिन्दी में लखनवी अंदाज़ है, जो विश्वप्रसिद्ध है। इसके अलावा यहाँ उर्दू और अंग्रेज़ी भी बोली जाती हैं।

लखनऊ प्राचीन कोसल राज्य का हिस्सा था। यह भगवान राम की विरासत थी जिसे उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण को समर्पित कर दिया था। अत: इसे लक्ष्मणावती, लक्ष्मणपुर या लखनपुर के नाम से जाना गया, जो बाद में बदल कर लखनऊ हो गया। यहां से अयोध्या भी मात्र ८० मील दूरी पर स्थित है। लखनऊ का नाम कैसे पड़ा इस पर मतभेद है। मुस्लिम इतिहासकारों के मतानुसार बिजनौर के शेख यहां आये और १५२६ ए डी मे‌ बसे और रहने‌ के लिए उस समय के वास्तुविद लखना पासी की देखरेख में एक किला बनवाया ‌‌‌‌जो लखना किला के‌ नाम से जाना‌ गया।समय‌ के‌ साथ धीरे-धीरे लखना किला लखनऊ में परिवर्तित हो गया।प्राचीन हिन्दू साहित्य के अनुसार यहां भगवान राम के सौतेले भाई लक्ष्मण का‌ जन्म हुआ‌ था जो‌ लाखनपुर से बदलते बदलते लखनऊ हो गया जो अधिक सत्य प्रतीत होता है क्यों कि‌ आज तक किसी‌ वास्तुविद के नाम पर किसी नगर का नाम नहीं रखा गया।
लखनऊ के वर्तमान स्वरूप की स्थापना नवाब आसफ़ुद्दौला ने १७७५ ई. में की थी। अवध के शासकों ने लखनऊ को अपनी राजधानी बनाकर इसे समृद्ध किया। लेकिन बाद के नवाब विलासी और निकम्मे सिद्ध हुए। इन नवाबों के काहिल स्वभाव के परिणामस्वरूप आगे चलकर लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध का बिना युद्ध ही अधिग्रहण कर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। १८५० में अवध के अन्तिम नवाब वाजिद अली शाह ने ब्रिटिश अधीनता स्वीकार कर ली। लखनऊ के नवाबों का शासन इस प्रकार समाप्त हुआ।

सन १९०२ में नार्थ वेस्ट प्रोविन्स का नाम बदल कर यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे यूनाइटेड प्रोविन्स या यूपी कहा गया। सन १९२० में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद से बदल कर लखनऊ कर दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ स्थापित की गयी। स्वतन्त्रता के बाद १२ जनवरी सन १९५० में इस क्षेत्र का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रख दिया गया और लखनऊ इसकी राजधानी बना। इस तरह यह अपने पूर्व लघुनाम यूपी से जुड़ा रहा। गोविंद वल्लभ पंत इस प्रदेश के प्रथम मुख्यमन्त्री बने। अक्टूबर १९६३ में सुचेता कृपलानी उत्तर-प्रदेश एवं भारत की प्रथम महिला मुख्यमन्त्री बनीं।
१७९८-१८१४
File:Washah1.jpg|वाजिद अली शाह
File:United_Provinces_1903.gif|संयुक्त अवध आगरा प्रांत मानचित्र

विशाल गांगेय मैदान के हृदय क्षेत्र में स्थित लखनऊ शहर बहुत से ग्रामीण कस्बों एवं गांवों से घिरा हुआ है, जैसे अमराइयों का शहर मलिहाबाद, ऐतिहासिक काकोरी, मोहनलालगंज, गोसांईगंज, चिन्हट और इटौंजा। इस शहर के पूर्वी ओर बाराबंकी जिला है, तो पश्चिमी ओर उन्नाव जिला एवं दक्षिणी ओर रायबरेली जिला है। इसके उत्तरी ओर सीतापुर एवं हरदोई जिले हैं। गोमती नदी, मुख्य भौगोलिक भाग, शहर के बीचों बीच से निकलती है और लखनऊ को ट्रांस-गोमती एवं सिस-गोमती क्षेत्रों में विभाजित करती है। लखनऊ शहर भूकम्प क्षेत्र तृतीय स्तर में आता है। 

लखनऊ की अधिकांश जनसंख्या पूर्वार्ध उत्तर प्रदेश से है। फिर भी यहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के अलावा बंगाली, दक्षिण भारतीय एवं आंग्ल-भारतीय लोग भी बसे हुए हैं। यहां की कुल जनसंख्या का ७७% हिन्दू एवं २०% मुस्लिम लोग हैं। शेष भाग में सिख, जैन, ईसाई एवं बौद्ध लोग हैं। लखनऊ भारत के सबसे साक्षर शहरों में से एक है। यहां की साक्षरता दर ८२.५% है, स्त्रियों की ७८% एवं पुरुषों की साक्षरता ८९% हैं।

लखनऊ में गर्म अर्ध-उष्णकटिबन्धीय जलवायु है। यहां ठंडे शुष्क शीतकाल दिसम्बर-फरवरी तक एवं शुष्क गर्म ग्रीष्मकाल अप्रैल-जून तक रहते हैं। मध्य जून से मध्य सितंबर तक वर्षा ऋतु रहती है, जिसमें औसत वर्षा १०१० मि.मी. (४० इंच) अधिकांशतः दक्षिण-पश्चिमी मानसून हवाओं से होती है। 

शीतकाल का अधिकतम तापमान २१°से. एवं न्यूनतम तापमान ३-४°से. रहता है। दिसम्बर के अंत से जनवरी अंत तक कोहरा भी रहता है। ग्रीष्म ऋतु गर्म रहती है, जिसमें तापमान ४०-४५°से. तक जाता है और औसत उच्च तापमान ३०°से. तक रहता है।

पुराने लखनऊ में चौक का बाजार प्रमुख है। यह चिकन के कारीगरों और बाजारों के लिए प्रसिद्ध है। यह इलाका अपने चिकन के दुकानों व मिठाइयों की दुकाने की वजह से मशहूर है। चौक में नक्खास बाजार भी है। यहां का अमीनाबाद दिल्ली के चाँदनी चौक की तरह का बाज़ार है जो शहर के बीच स्थित है। यहां थोक का सामान, महिलाओं का सजावटी सामान, वस्त्राभूषण आदि का बड़ा एवं पुराना बाज़ार है। दिल्ली के ही कनॉट प्लेस की भांति यहां का हृदय हज़रतगंज है। यहां खूब चहल-पहल रहती है। प्रदेश का विधान सभा भवन भी यहीं स्थित है। इसके अलावा हज़रतगंज में जी पी ओ, कैथेड्रल चर्च, चिड़ियाघर, उत्तर रेलवे का मंडलीय रेलवे कार्यालय (डीआरएम ऑफिस), लाल बाग, पोस्टमास्टर जनरल कार्यालय (पीएमजी), परिवर्तन चौक, बेगम हज़रत महल पार्क भी काफी प्रमुख़ स्थल हैं। इनके अलावा निशातगंज, डालीगंज, सदर बाजार, बंगला बाजार, नरही, केसरबाग भी यहां के बड़े बाजारों में आते हैं।
अमीनाबाद लखनऊ का एक ऐसा स्थान है जो पुस्तकों के लिए मशहूर है।

यहां के आवासीय इलाकों में सिस-गोमती क्षेत्र में राजाजीपुरम, कृष्णानगर, आलमबाग, दिलखुशा, आर.डी.एस.ओ.कालोनी, चारबाग, ऐशबाग, हुसैनगंज, लालबाग, राजेंद्रनगर, मालवीय नगर, सरोजिनीनगर, हैदरगंज, ठाकुरगंज एवं सआदतगंज आदि क्षेत्र हैं। ट्रांस-गोमती क्षेत्र में गोमतीनगर,इंदिरानगर, महानगर, अलीगंज, डालीगंज, नीलमत्था कैन्ट, विकासनगर, खुर्रमनगर, जानकीपुरम एवं साउथ-सिटी (रायबरेली रोड पर) आवासीय क्षेत्र हैं।

लखनऊ उत्तरी भारत का एक प्रमुख बाजार एवं वाणिज्यिक नगर ही नहीं, बल्कि उत्पाद एवं सेवाओं का उभरता हुआ केन्द्र भी बनता जा रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी होने के कारण यहां सरकारी विभाग एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम बहुत हैं। यहां के अधिकांश मध्यम-वर्गीय वेतनभोगी इन्हीं विभागों एवं उपक्रमों में नियुक्त हैं। सरकार की उदारीकरण नीति के चलते यहां व्यवसाय एवं नौकरियों तथा स्व-रोजगारियों के लिए बहुत से अवसर खुल गये हैं। इस कारण यहां नौकरी पेशे वालों की संख्या निरंतर बढ़ती रहती है। लखनऊ निकटवर्ती नोएडा एवं गुड़गांव के लिए सूचना प्रौद्योगिकी एवं बीपीओ कंपनियों के लिए श्रमशक्ति भी जुटाता है। यहां के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लोग बंगलुरु एवं हैदराबाद में भी बहुतायत में मिलते हैं।

शहर में भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (एसआईडीबीआई) तथा प्रादेशिक औद्योगिक एवं इन्वेस्टमेंट निगम, उत्तर प्रदेश (पिकप) के मुख्यालय भी स्थित हैं। उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम का क्षेत्रीय कार्यालय भी यहीं स्थित है। यहां अन्य व्यावसायिक विकास में उद्यत संस्थानों में कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) एवं एन्टरप्रेन्योर डवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (ईडीआईआई) हैं।

लखनऊ में बड़ी उत्पादन इकाइयों में हिंदुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड, टाटा मोटर्स, एवरेडी इंडस्ट्रीज़, स्कूटर इंडिया लिमिटेड आते हैं। संसाधित उत्पाद इकाइयों में दुग्ध उत्पादन, इस्पात रोलिंग इकाइयाँ एवं एल पी जी भरण इकाइयाँ आती हैं।

शहर की लघु एवं मध्यम-उद्योग इकाइयाँ चिन्हट, ऐशबाग, तालकटोरा एवं अमौसी के औद्योगिक एन्क्लेवों में स्थित हैं। चिन्हट अपने टेराकोटा एवं पोर्सिलेन उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है। 

रियल एस्टेट अर्थव्यवस्था का एक सहसावृद्धि वाला क्षेत्र है। शहर में विभिन्न शॉपिंग मॉल्स, आवासीय परिसर एवं व्यावसायिक परिसर बढ़ते जा रहे हैं। पार्श्वनाथ, डीएलएफ़, ओमैक्स, सहारा, युनिटेक, अंसल एवं ए पी आई जैसे इस क्षेत्र के महाकाय निवेशक यहाँ उपस्थित हैं।

लखनऊ की प्रगति दिल्ली, मुंबई, सूरत एवं गाजियाबाद से कहीं कम नहीं है। यहां के उभरते क्षेत्रों में गोमती नगर, हज़रतगंज, एवं कपूरथला आदि प्रमुख हैं। यहां बड़े निजी अस्पतालों में से सहारा अस्पताल निर्माणाधीन है, जिसमें २५ तल हैं। इसके बाद मेट्रो, पार्श्वनाथ प्लानेट, ओमेक्स हाइट्स का नंबर आता है। शहर का संपत्ति विस्तार सूचकांक बहुत ऊंचा है। एक अनुमान के अनुसार शहर में २०१० तक २.५ बिलियन डालर की व्यवस्थित रियल एस्टेट होगी। ये उत्तर भारत में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बाद सबसे अधिक है।

परंपरानुसार लखनवी आम (खासकर दशहरी आम), खरबूजा एवं निकटवर्ती क्षेत्रों में उगाये जा रहे अनाज की मंडी रही है। यहां के मशहूर मलीहाबादी दशहरी आम को भौगोलिक संकेतक का विशेष कानूनी दर्जा प्राप्त हो चुका है। मलीहाबादी आम को यह विशेष दर्जा भारत सरकार के भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री कार्यालय, चेन्नई ने एक विशेष क़ानून के अंतर्गत्त दिया गया है। एक अलग स्वाद और सुगंध के कारण दशहरी आम की संसार भर में विशेष पहचान बनी हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मलीहाबादी दशहरी आम लगभग ६,२५३ हैक्टेयर में उगाए जाते हैं और ९५,६५८.३९ टन उत्पादन होता है।

गन्ने के खेत एवं चीनी मिलें भी निकट ही स्थित हैं। इनके कारण मोहन मेकिन्स ब्रीवरी जैसे उद्योगकर्ता यहां अपनी मिलें लगाने के लिए आकर्षित हुए हैं। मोहन मेकिन्स की इकाई १८५५ में स्थापित हुई थी। यह एशिया की प्रथम व्यापारिक ब्रीवरी थी।

लखनऊ का चिकन का व्यापार भी बहुत प्रसिद्ध है। यह एक लघु-उद्योग है, जो यहां के चौक क्षेत्र के घर घर में फ़ैला हुआ है। चिकन एवं लखनवी ज़रदोज़ी, दोनों ही देश के लिए भरपूर विदेशी मुद्रा कमाते हैं। चिकन ने बॉलीवुड एवं विदेशों के फैशन डिज़ाइनरों को सदा ही आकर्षित किया है। लखनवी चिकन एक विशिष्ट ब्रांड के रूप में जाना जाये और उसे बनाने वाले कारीगरों का आर्थिक नुकसान न हो, इसलिए केंद्र सरकार के वस्त्र मंत्रालय की टेक्सटाइल कमेटी ने चिकन को भौगोलिक संकेतक के तहत रजिस्ट्रार ऑफ जियोग्राफिकल इंडिकेटर के यहां पंजीकृत करा लिया है। इस प्रकार अब विश्व में चिकन की नकल कर बेचना संभव नहीं हो सकेगा।

नवाबों के काल में पतंग-उद्योग भी अपने चरमोत्कर्ष पर था। यह आज भी अच्छा लघु-उद्योग है। लखनऊ तम्बाकू का औद्योगिक उत्पादनकर्ता रहा है। इनमें किमाम आदि प्रसिद्ध हैं। इनके अलावा इत्र, कलाकृतियां जैसे चिन्हट की टेराकोटा, मृत्तिकाकला, चाँदी के बर्तन एवं सजावटी सामान, सुवर्ण एवं रजत वर्क तथा हड्डी-पर नक्काशी करके बनी कलाकृतियों के लघु-उद्योग बहुत चल रहे हैं।

शहर में सार्वजनिक यातायात के उपलब्ध साधनों में सिटी बस सेवा, टैक्सी, साइकिल रिक्शा, ऑटोरिक्शा, टेम्पो एवं सीएनजी बसें हैं। सीएनजी को हाल ही में प्रदूषण पर नियंत्रण रखने हेतु आरंभ किया गया है। नगर बस सेवा को लखनऊ महानगर परिवहन सेवा संचालित करता है। यह उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की एक इकाई है।
शहर के हज़रतगंज चौराहे से चार राजमार्ग निकलते हैं: राष्ट्रीय राजमार्ग २४ – दिल्ली को, राष्ट्रीय राजमार्ग २५ – झांसी और मध्य प्रदेश को, राष्ट्रीय राजमार्ग ५६ – वाराणसी को एवं राष्ट्रीय राजमार्ग २८ मोकामा, बिहार को। प्रमुख बस टर्मिनस में आलमबाग का डॉ॰भीमराव अम्बेडकर बस टर्मिनस आता है। इसके अलावा अन्य प्रमुख बस टर्मिनस केसरबाग, चारबाग आते थे, जिनमें से चारबाग का बस टर्मिनस, जो चारबाग रेलवे स्टेशन के ठीक सामने था, नगर बस डिपो बना कर स्थानांतरित कर दिया गया है। यह रेलवे स्टेशन के सामने की भीड़ एवं कंजेशन को नियंत्रित करने हेतु किया गया है।

लखनऊ में कई रेलवे स्टेशन हैं। शहर में मुख्य रेलवे स्टेशन चारबाग रेलवे स्टेशन है। इसकी शानदार महल रूपी इमारत १९२३ में बनी थी। मुख्य टर्मिनल उत्तर रेलवे का है (स्टेशन कोड: LKO)। दूसरा टर्मिनल पूर्वोत्तर रेलवे (एनईआर) मंडल का है। (स्टेशन कोड: LJN)। लखनऊ एक प्रधान जंक्शन स्टेशन है, जो भारत के लगभग सभी मुख्य शहरों से रेल द्वारा जुड़ा हुआ है। यहां और १३ रेलवे स्टेशन हैं:

अब मीटर गेज लाइन ऐशबाग से आरंभ होकर लखनऊ सिटी, डालीगंज एवं मोहीबुल्लापुर को जोड़ती हैं। मोहीबुल्लापुर के अलावा अन्य स्टेशन ब्रॉड गेज से भी जुड़े हैं। अन्य सभी स्टेशन शहर की सीमा के भीतर ही हैं, एवं एक दूसरे से सड़क मार्ग द्वारा भी जुड़े हैं। अन्य उपनगरीय स्टेशनों में निम्न स्टेशन हैं:

मुख्य रेलवे स्टेशन पर वर्तमान में १५ प्लेटफ़ॉर्म हैं और इसके २००९ तक देश के व्यस्ततम स्टेशनों में से एक बनने की आशा है। इस स्टेशन के २००९ के अंत तक विश्वस्तरीय स्टेशन बनने की आशा है।

अमौसी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा शहर का मुख्य विमानक्षेत्र है और शहर से लगभग २० किलोमीटर दूरी पर स्थित है। लखनऊ वायु सेवा द्वारा नई दिल्ली, पटना, कोलकाता एवं मुंबई एवं भारत के कई मुख्य शहरों से जुड़ा हुआ है। यह ओमान एयर, कॉस्मो एयर, फ़्लाई दुबई, साउदी एयरलाइंस एवं इंडिगो एयर तथा अन्य कई अंतर्राष्ट्रीय वायु सेवाओं द्वारा अंतर्राष्ट्रीय गंतव्यों से जुड़ा हुआ है। इन गंतव्यों में लंदन, दुबई, जेद्दाह, मस्कट, शारजाह, सिंगापुर एवं हांगकांग आते हैं। हज मुबारक के समय यहां से हज-विशेष उड़ानें सीधे जेद्दाह के लिए चलती हैं।

लखनऊ के लिए उच्च क्षमता मास ट्रांज़िट प्रणाली यानि लखनऊ मेट्रो महानगर में यातयात का एक प्रमुख साधन है। इसके लिए दिल्ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन ने ही योजनाएं बनाई थी और यह काम श्रेई इंटरनेशनल को दिया था। मेट्रो रेल के संचालन को मूर्त रूप देने और उस पर आने वाले खर्च को पूरा करने की व्यवस्था के लिए राज्य सरकार ने कई अधीनस्थ विभागों के प्रमुख सचिवों और लखनऊ के मंडलायुक्तगणों की एक समिति बनाई

लखनऊ में मेट्रो रेल शुरु होने के बाद सड़कों पर यातायात काफी कम हो गया है! वर्तमान में लखनऊ एवं कानपुर में हर महीने लगभग १००० नए चौपहिया वाहनों का पंजीकरण कराया जाता रहा है। लखनऊ में सभी राष्ट्रीय राजमार्गों पर बाइपास बना दिए जाने के बावजूद सड़कों पर गाड़ियों का दबाव बढ़ता ही जा रहा है। इस कारण से यहां मेट्रो का त्वरित निर्माण अत्यावश्यक हो गया था । लखनऊ शहर में आरंभ में चार गलियारे निश्चित किये गए हैं:

लखनऊ के अलावा कानपुर, मेरठ और गाजियाबाद शहरों में मेट्रो रेल चलाने की योजना है। इस परिवहन व्यवस्था की सफलता से प्रभावित होकर भारत के दूसरे राज्यों जैसे महाराष्ट्र, राजस्थान एवं कर्नाटक, आंध्र प्रदेश एवं महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों, में भी इसे चलाने की योजनाएं बन रही हैं।

लखनऊ में देश के कई उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान भी हैं। इनमें से कुछ हैं:  किंग जार्ज मेडिकल कालेज और बीरबल साहनी अनुसंधान संस्थान। यहां भारत के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद की चार प्रमुख प्रयोगशालाएँ (केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान, औद्योगिक विष विज्ञान अनुसंधान केन्द्र, राष्ट्रीय वनस्पति विज्ञान अनुसंधान संस्थान(एनबीआरआई) और केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान(सीमैप)) उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी हैं।

लखनऊ में छः विश्वविद्यालय हैं: लखनऊ विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय(यूपीटीयू), राममनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय(लोहिया लॉ विवि), बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, एमिटी विश्वविद्यालय एवं इंटीग्रल विश्वविद्यालय। यहां कई उच्च चिकित्सा संस्थान भी हैं: संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान(एसजीपीजीआई), छत्रपति शाहूजी महाराज आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (जिसे पहले किंग जॉर्ज मेडिकल कालिज कहते थे) के अलावा निर्माणाधीन सहारा अस्पताल, अपोलो अस्पताल, एराज़ लखनऊ मेडिकल कालिज भी हैं। प्रबंधन संस्थानों में भारतीय प्रबंधन संस्थान, लखनऊ (आईआईएम), इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज़(ल.वि.वि) आते हैं। यहां भारत के प्रमुखतम निजी विश्वविद्यालयों में से एक, एमिटी विश्वविद्यालय का भी परिसर है।

इसके अलावा यहां बहुत से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के भी सरकारी एवं निजी विद्यालय हैं। इनमें से कुछ प्रमुख हैं: सिटी मॉण्टेसरी स्कूल, ला मार्टिनियर महाविद्यालय, जयपुरिया स्कूल, कॉल्विन तालुकेदार्स कालेज, एम्मा थॉम्पसन स्कूल, सेंट फ्रांसिस स्कूल, महानगर बॉयज़ आदि।

लखनऊ अपनी विरासत में मिली संस्कृति को आधुनिक जीवनशैली के संग बड़ी सुंदरता के साथ संजोये हुए है। भारत के उत्कृष्टतम शहरों में गिने जाने वाले लखनऊ की संस्कृति में भावनाओं की गर्माहट के साथ उच्च श्रेणी का सौजन्य एवं प्रेम भी है। लखनऊ के समाज में नवाबों के समय से ही पहले आप! वाली शैली समायी हुई है। हालांकि स्वार्थी आधुनिक शैली की पदचाप सुनायी देती है, किंतु फिर भी शहर की जनसंख्या का एक भाग इस तहजीब को संभाले हुए है। यह तहजीब यहां दो विशाल धर्मों के लोगों को एक समान संस्कृति से बांधती है। ये संस्कृति यहां के नवाबों के समय से चली आ रही है। लखनवी पान यहां की संस्कृति का अभिन्न अंग है। इसके बिना लखनऊ अधूरा लगता है।

लखनऊ में हिन्दी एवं उर्दू दोनों ही बोली जाती हैं किंतु उर्दू को यहां सदियों से खास महत्त्व प्राप्त रहा है। जब दिल्ली खतरे में पड़ी तब बहुत से शायरों ने लखनऊ का रुख किया। तब उर्दू शायरी के दो ठिकाने हो गये- देहली और लखनऊ। जहां देहली सूफ़ी शायरी का केन्द्र बनी, वहीं लखनऊ गज़ल विलासिता और इश्क-मुश्क का अभिप्राय बन गया। जैसे नवाबों के काल में उर्दू खूब पनपी एवं भारत की तहजीब वाली भाषा के रूप में उभरी। यहां बहुत से हिन्दू कवि एवं मुस्लिम शायर हुए हैं, जैसे बृजनारायण चकबस्त, ख्वाजा हैदर अली आतिश, विनय कुमार सरोज, आमिर मीनाई, मिर्ज़ा हादी रुसवा, नासिख, दयाशंकर कौल नसीम, मुसाहफ़ी, इनशा, सफ़ी लखनवी और मीर तकी मीर तो प्रसिद्ध ही हैं, जिन्होंने उर्दू शायरी तथा लखनवी भाषा को नयी ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
लखनऊ शिया संस्कृति के लिए विश्व के महान शहरों में से एक है। मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर उर्दू शिया गद्य में मर्सिया शैली के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। मर्सिया इमाम हुसैन की कर्बला के युद्ध में शहादत का बयान करता है, जिसे मुहर्रमके अवसर पर गाया जाता है। काकोरी कांड के अभियुक्त प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने काकोरी में फांसी पर लटका दिया था, उर्दू शायरी से खासे प्रभावित थे, एवं बिस्मिल उपनाम से लिखते थे। कई निकटवर्ती कस्बों जैसे काकोरी, दरयाबाद, बाराबंकी, रुदौली एवं मलिहाबाद ने कई उर्दू शायरों को जन्म दिया है। इनमें से कुछ हैं मोहसिन काकोरवी, मजाज़, खुमार बाराबंकवी एवं जोश मलिहाबादी। हाल ही में २००८ में १८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की १५०वीं वर्षगांठ पर इस विषय पर एक उपन्यास का विमोचन किया गया था। इस विषय पर प्रथम अंग्रेज़ी उपन्यास रीकैल्सिट्रेशन, एक लखनऊ के निवासी ने ही लिखा था।

लखनऊ जनपद के काकोरी कांड के अभियुक्त प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने काकोरी में फांसी पर लटका दिया था बिस्मिल उपनाम से लिखते थे। लखनऊ जनपद के कुम्हरावां गांव में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को 13 स्वतंत्रता संग्रामी दिये जिन्होंने अलग अलग समय पर भारतीय जेलों में रहकर भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष को आगे बढाया इनके नाम इस प्रकार हैं 

प्रसिद्ध भारतीय नृत्य कथक  ने अपना स्वरूप यहीं पाया था। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह कथक के बहुत बड़े ज्ञाता एवं प्रेमी थे। लच्छू महाराज, अच्छन महाराज, शंभु महाराज एवं बिरजू महाराज ने इस परंपरा को जीवित रखा है।

लखनऊ प्रसिद्ध गज़ल गायिका बेगम अख्तर का भी शहर रहा है। वे गज़ल गायिकी में अग्रणी थीं और इस शैली को नयी ऊंचाइयों तक पहुंचाया। ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया – उनकी गायी बेहतरीन गज़लों में से एक है। लखनऊ के भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय का नाम यहां के महान संगीतकार पंडित विष्णु नारायण भातखंडे के नाम पर रखा हुआ है। यह संगीत का पवित्र मंदिर है। श्रीलंका, नेपाल आदि बहुत से एशियाई देशों एवं विश्व भर से साधक यहां नृत्य-संगीत की साधना करने आते हैं। लखनऊ ने कई विख्यात गायक दिये हैं, जिनमें से नौशाद अली, तलत महमूद, अनूप जलोटा और बाबा सेहगल कुछ हैं। संयोग से यह शहर ब्रिटिश पॉप गायक  का भी जन्म-स्थान है।

लखनऊ हिन्दी चलचित्र उद्योग की आरंभ से ही प्रेरणा रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति ना होगा कि लखनवी स्पर्श के बिना, बॉलीवुड कभी उस ऊंचाई पर नहीं आ पाता, जहां वह अब है। अवध से कई पटकथा लेखक एवं गीतकार हैं, जैसे मजरूह सुलतानपुरी, कैफ़े आज़मी, जावेद अख्तर, अली रज़ा, भगवती चरण वर्मा, डॉ॰कुमुद नागर, डॉ॰अचला नागर, वजाहत मिर्ज़ा (मदर इंडिया एवं गंगा जमुना के लेखक), अमृतलाल नागर, अली सरदार जाफरी एवं के पी सक्सेना जिन्होंने भारतीय चलचित्र को प्रतिभा से धनी बनाया। 
लखनऊ पर बहुत सी प्रसिद्ध फिल्में बनी हैं जैसे शशि कपूर की जुनून, मुज़फ्फर अली की उमराव जान एवं गमन, सत्यजीत राय की शतरंज के खिलाड़ी और इस्माइल मर्चेंट की शेक्स्पियर वाला की भी आंशिक शूटिंग यहीं हुई थी।

बहू बेगम, मेहबूब की मेहंदी, मेरे हुजूर, चौदहवीं का चांद, पाकीज़ा, मैं मेरी पत्नी और वो, सहर, अनवर और बहुत सी हिन्दी फिल्में या तो लखनऊ में बनी हैं, या उनकी पृष्ठभूमि लखनऊ की है। गदर फिल्म में भी पाकिस्तान के दृश्यों में लखनऊ की शूटिंग ही है। इसमें लाल पुल, लखनऊ एवं ला मार्टीनियर कालिज की शूटिंग हैं।

अवध क्षेत्र की अपनी एक अलग खास नवाबी खानपान शैली है। इसमें विभिन्न तरह की बिरयानियां, कबाब, कोरमा, नाहरी कुल्चे, शीरमाल, ज़र्दा, रुमाली रोटी और वर्की परांठा और रोटियां आदि हैं, जिनमें काकोरी कबाब, गलावटी कबाब, पतीली कबाब, बोटी कबाब, घुटवां कबाब और शामी कबाब प्रमुख हैं। शहर में बहुत सी जगह ये व्यंजन मिलेंगे। ये सभी तरह के एवं सभी बजट के होंगे। जहां एक ओर १८०५ में स्थापित राम आसरे हलवाई की मक्खन मलाई एवं मलाई-गिलौरी प्रसिद्ध है, वहीं अकबरी गेट पर मिलने वाले हाजी मुराद अली के टुण्डे के कबाब भी कम मशहूर नहीं हैं। इसके अलावा अन्य नवाबी पकवानो जैसे 'दमपुख़्त', लच्छेदार प्याज और हरी चटनी के साथ परोसे गय सीख-कबाब और रूमाली रोटी का भी जवाब नहीं है।
लखनऊ की चाट देश की बेहतरीन चाट में से एक है। और खाने के अंत में विश्व-प्रसिद्ध लखनऊ के पान जिनका कोई सानी नहीं है।

लखनऊ के अवधी व्यंजन जगप्रसिद्ध हैं। यहां के खानपान बहुत प्रकार की रोटियां भी होती हैं। ऐसी ही रोटियां यहां के एक पुराने बाज़ार में आज भी मिलती हैं, बल्कि ये बाजार रोटियों का बाजार ही है। अकबरी गेट से नक्खास चौकी के पीछे तक यह बाजार है, जहां फुटकर व सैकड़े के हिसाब से शीरमाल, नान, खमीरी रोटी, रूमाली रोटी, कुल्चा जैसी कई अन्य तरह की रोटियां मिल जाएंगी। पुराने लखनऊ के इस रोटी बाजार में विभिन्न प्रकार की रोटियों की लगभग १५ दुकानें हैं, जहां सुबह नौ से रात नौ बजे तक गर्म रोटी खरीदी जा सकती है। कई पुराने नामी होटल भी इस गली के पास हैं, जहां अपनी मनपसंद रोटी के साथ मांसाहारी व्यंजन भी मिलते हैं। एक उक्ति के अनुसार लखनऊ के व्यंजन विशेषज्ञों ने ही परतदार पराठे की खोज की है, जिसको तंदूरी परांठा भी कहा जाता है। लखनऊवालों ने भी कुलचे में विशेष प्रयोग किये। कुलचा नाहरी के विशेषज्ञ कारीगर हाजी जुबैर अहमद के अनुसार कुलचा अवधी व्यंजनों में शामिल खास रोटी है, जिसका साथ नाहरी बिना अधूरा है। लखनऊ के गिलामी कुलचे यानी दो भाग वाले कुलचे उनके परदादा ने तैयार किये थे।।

चिकन, यहाँ की कशीदाकारी का उत्कृष्ट नमूना है और लखनवी ज़रदोज़ी यहाँ का लघु उद्योग है जो कुर्ते और साड़ियों जैसे कपड़ों पर अपनी कलाकारी की छाप चढाते हैं। इस उद्योग का ज़्यादातर हिस्सा पुराने लखनऊ के चौक इलाके में फैला हुआ है। यहां के बाज़ार चिकन कशीदाकारी के दुकानों से भरे हुए हैं। मुर्रे, जाली, बखिया, टेप्ची, टप्पा आदि ३६ प्रकार के चिकन की शैलियां होती हैं। इसके माहिर एवं प्रसिद्ध कारीगरों में उस्ताद फ़याज़ खां और हसन मिर्ज़ा साहिब थे।

लखनऊ इतिहास में भी पत्रकारिता का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले आरंभ किया गया समाचार पत्र नेशनल हेराल्ड लखनऊ से ही प्रकाशित होता था। इसके तत्कालीन संपादक मणिकोण्डा चलपति राउ थे।

शहर के प्रमुख अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों में द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, द पाइनियर एवं इंडियन एक्स्प्रेस हैं। इनके अलावा भी बहुत से समाचार दैनिक अंग्रेज़ी, हिन्दी एवं उर्दू भाषाओं में शहर से प्रकाशित होते हैं। हिन्दी समाचार पत्रों में स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता एवं आई नेक्स्ट हैं। प्रमुख उर्दू समाचार दैनिकों में जायज़ा दैनिक, राष्ट्रीय सहारा, सहाफ़त, क़ौमी खबरें एवं आग हैं।

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया एवं यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया के कार्यालय शहर में हैं, एवं देश के सभी प्रमुख समाचार-पत्रों के पत्रकार लखनऊ में उपस्थित रहते हैं।

ऑल इंडिया रेडियो के आरंभिक कुछ स्टेशनों में से लखनऊ केन्द्र एक है। यहां मीडियम वेव पर प्रसारण करते हैं। इसके अलावा यहां एफ एम प्रसारण भी २००० से आरंभ हुआ था। शहर में निम्न रेडियो स्टेशन चल रहे हैं:. - 

शहर में इंटरनेट के लिए ब्रॉडबैण्ड इंटरनेट कनेक्टिविटी एवं वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग सुविधा उपलब्ध हैं। प्रमुख सेवाकर्ता भारत संचार निगम लिमिटेड, भारती एयरटेल, रिलायंस कम्युनिकेशन्स, टाटा कम्युनिकेशन्स एवं एसटीपीआई का बृहत अवसंरचना ढांचा है। इनके द्वारा गृह प्रयोक्ताओं एवं निगमित प्रयोक्ताओं को अच्छी गति का ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध होता है। शहर में ढेरों इंटरनेट कैफ़े भी उपलब्ध हैं।

शहर और आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं। इनमें ऐतिहासिक स्थल, उद्यान, मनोरंजन स्थल एवं शॉपिंग मॉल आदि हैं। यहां कई इमामबाड़े हैं। इनमें बड़ा एवं छोटा प्रमुख है। प्रसिद्ध बड़े इमामबाड़े का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। इस इमामबाड़े का निर्माण आसफउद्दौला ने १७८४ में अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत करवाया था। यह विशाल गुम्बदनुमा हॉल 50 मीटर लंबा और 15 मीटर ऊंचा है। यहां एक अनोखी भूल भुलैया है। इस इमामबाड़े में एक अस़फी मस्जिद भी है जहां गैर मुस्लिम लोगों के प्रवेश की अनुमति नहीं है। मस्जिद परिसर के आंगन में दो ऊंची मीनारें हैं। इसके अलावा छोटा इमामबाड़ा, जिसका असली नाम हुसैनाबाद इमामबाड़ा है मोहम्मद अली शाह की रचना है जिसका निर्माण १८३७ ई. में किया गया था। इसे छोटा इमामबाड़ा भी कहा जाता है।

सआदत अली का मकबरा बेगम हजरत महल पार्क के समीप है। इसके साथ ही खुर्शीद जैदी का मकबरा भी बना हुआ है। यह मकबरा अवध वास्तुकला का शानदार उदाहरण हैं। मकबरे की शानदार छत और गुम्बद इसकी खासियत हैं। ये दोनों मकबरे जुड़वां लगते हैं। बड़े इमामबाड़े के बाहर ही रूमी दरवाजा बना हुआ है। यहां की सड़क इसके बीच से निकलती है। इस द्वार का निर्माण भी अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत किया गया था। नवाब आसफउद्दौला ने यह दरवाजा १७८२ ई. में अकाल के दौरान बनवाया था ताकि लोगों को रोजगार मिल सके। जामी मस्जिद हुसैनाबाद इमामबाड़े के पश्चिम दिशा स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण मोहम्मद शाह ने शुरू किया था लेकिन १८४० ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने इसे पूरा करवाया। मोती महल गोमती नदी की सीमा पर बनी तीन इमारतों में से प्रमुख है। इसे सआदत अली खां ने बनवाया था।

लखनऊ रेज़ीडेंसी के अवशेष ब्रिटिश शासन की स्पष्ट तस्वीर दिखाते हैं। १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के समय यह रेजिडेन्सी ईस्ट इंडिया कम्पनी के एजेन्ट का भवन था। यह ऐतिहासिक इमारत हजरतगंज क्षेत्र में राज्यपाल निवास के निकट है। लखनऊ का घंटाघर भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है। हुसैनाबाद इमामबाड़े के घंटाघर के समीप १९वीं शताब्दी में बनी एक पिक्चर गैलरी है। यहां लखनऊ के लगभग सभी नवाबों की तस्वीरें देखी जा सकती हैं।

कुकरैल फारेस्ट एक पिकनिक स्थल है। यहां घड़ियालों और कछुओं का एक अभयारण्य है। यह लखनऊ के इंदिरा नगर के निकट, रिंग मार्ग पर स्थित है। बनारसी बाग वास्तव में एक चिड़ियाघर है, जिसका मूल नाम प्रिंस ऑफ वेल्स वन्य-प्राणी उद्यान है। स्थानीय लोग इस चिड़ियाघर को बनारसी बाग कहते हैं। यहां के हरे भरे वातावरण में जानवरों की कुछ प्रजातियों को छोटे पिंजरों में रखा गया है। यह देश के अच्छे वन्य प्राणी उद्यानों में से एक है। इस उद्यान में एक संग्रहालय भी है।

इनके अलावा रूमी दरवाजा, छतर मंजिल, हाथी पार्क, बुद्ध पार्क, नीबू पार्क मैरीन ड्राइव और इंदिरा गाँधी तारामंडल भी दर्शनीय हैं।
लखनऊ-हरदोइ राजमार्ग पर ही मलिहाबाद गांव है, जहां के दशहरी आम विश्व प्रसिद्ध हैं। लखनऊ का अमौसी हवाई अड्डा शहर से बीस किलोमीटर दूर अमौसी में स्थित है। शहर से ९० किलोमीटर की दूरी पर ही नैमिषारण्य तीर्थ है। इसका पुराणों में बहुत ऊंचा स्थान बताया गया है। यहीं पर ऋषि सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को पुराणों का आख्यान दिया था। लखनऊ के निकटवर्ती शहरों में कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, फैजाबाद, बाराबंकी, हरदोई हैं।

लखनऊ में वैसे तो सभी धर्मों के लोग सौहार्द एवं सद्भाव से रहते हैं, किंतु हिन्दुओं एवं मुस्लिमों का बाहुल्य है। यहां सभी धर्मों के अर्चनास्थल भी इस ही अनुपात में हैं। हिन्दुओं के प्रमुख मंदिरों में हनुमान सेतु मंदिर, मनकामेश्वर मंदिर, अलीगंज का हनुमान मंदिर, भूतनाथ मंदिर, इंदिरानगर, चंद्रिका देवी मंदिर, नैमिषारण्य तीर्थ और रामकृष्ण मठ, निरालानगर हैं। यहां कई बड़ी एवं पुरानी मस्जिदें भी हैं। इनमें लक्ष्मण टीला मस्जिद, इमामबाड़ा मस्जिद एवं ईदगाह प्रमुख हैं। प्रमुख गिरिजाघरों में कैथेड्रल चर्च, हज़रतगंज, इंदिरानगर (सी ब्लॉक) चर्च, सुभाष मार्ग पर सेंट पाउल्स चर्च एवं असेंबली ऑफ बिलीवर्स चर्च हैं। यहां हिन्दू त्यौहारों में होली, दीपावली, दुर्गा पूजा एवं दशहरा और ढेरों अन्य त्यौहार जहां हर्षोल्लास से मनाये जाते हैं, वहीं ईद और बारावफात तथा मुहर्रम के ताजिये भी फीके नहीं होते। साम्प्रदायिक सौहार्द यहां की विशेषता है। यहां दशहरे पर रावण के पुतले बनाने वाले अनेकों मुस्लिम एवं ताजिये बनाने वाले अनेकों हिन्दू कारीगर हैं।

लखनऊ का अमौसी अंतर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, बैंगलोर, जयपुर, पुणे, भुवनेश्वर, गुवाहाटी और अहमदाबाद से प्रतिदिन सीधी फ्लाइट द्वारा जुड़ा हुआ है।

चारबाग रेलवे जंक्शन भारत के प्रमुख शहरों से अनेक रेलगाड़ियों के माध्यम से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से लखनऊ मेल और शताब्दी एक्सप्रेस, मुम्बई से पुष्पक एक्सप्रेस, कोलकाता से दून एक्स्प्रेस और हावड़ा एक्स्प्रेस 3050 के माध्यम से लखनऊ पहुंचा जा सकता है। चारबाग स्टेशन के अलावा लखनऊ जिले में कई अन्य स्टेशन भी हैं:-

इसके अतिरिक्त मल्हौर में १३ कि.मी, गोमती नगर में १५ कि.मी, काकोरी १५ कि.मी, मोहनलालगंज १९ कि.मी, हरौनी २५ कि.मी, मलिहाबाद २६ कि.मी, सफेदाबाद २६ कि.मी, निगोहाँ ३५ कि.मी, बाराबंकी जंक्शन ३५ कि.मी, अजगैन ४२ कि.मी, बछरावां ४८ कि.मी, संडीला ५३ कि.मी, उन्नाव जंक्शन ५९ कि.मी तथा बीघापुर ६४ कि.मी पर स्थित हैं। इस प्रकार रेल यातायात लखनऊ को अनेक छोटे छोटे गाँवों और कस्बों से जोड़ता है।

राष्ट्रीय राजमार्ग २४ से दिल्ली से सीधे लखनऊ पहुंचा जा सकता है। लखनऊ का राष्ट्रीय राजमार्ग २ दिल्ली को आगरा, इलाहाबाद, वाराणसी और कानपुर के रास्ते कोलकाता से जोड़ता है। राष्ट्रीय राजमार्ग २५ झांसी को जोड़ता है। राष्ट्रीय राजमार्ग २८ मुजफ्फरपुर से, राष्ट्रीय राजमार्ग ५६ वाराणसी से जोड़ते हैं।




#Article 56: इलाहाबाद (5358 words)


 

इलाहाबाद (प्रयागराज) भारत के उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित एक नगर, इलाहाबाद जिला का प्रशासनिक मुख्यालय तथा हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। इसका प्राचीन नाम 'प्रयाग' है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः ये त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है। यहाँ हर छह वर्षों में अर्द्धकुम्भ और हर बारह वर्षों पर कुम्भ मेले का आयोजन होता है जिसमें विश्व के विभिन्न कोनों से करोड़ों श्रद्धालु पतितपावनी गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाने आते हैं। अतः इस नगर को संगमनगरी, कुंभनगरी, तंबूनगरी आदि नामों से भी जाना जाता है। सन् 1500 की शताब्दी में  मुस्लिम राजा द्वारा इस  शहर  का नाम प्रयागराज से बदलकर इलाहाबाद किया था जिसे सन् अक्टूबर 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वापस बदलकर प्रयागराज कर दिया। हिन्दू मान्यता अनुसार, यहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद प्रथम यज्ञ किया था। इसी प्रथम यज्ञ के 'प्र' और 'याग' अर्थात यज्ञ से मिलकर प्रयाग बना और उस स्थान का नाम प्रयाग पड़ा जहाँ भगवान श्री ब्रम्हा जी ने सृष्टि का सबसे पहला यज्ञ सम्पन्न किया था। इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ वेणीमाधव रूप में विराजमान हैं। भगवान के यहाँ बारह स्वरूप विद्यमान हैं जिन्हें 'द्वादश माधव' कहा जाता है। सबसे बड़े हिन्दू सम्मेलन महाकुंभ की चार स्थलियों में से एक है, शेष तीन हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक हैं। 

प्रयागराज (इलाहाबाद) में कई महत्त्वपूर्ण राज्य सरकार के कार्यालय स्थित हैं, जैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान  (एजी ऑफ़िस), उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग (पी.एस.सी), राज्य पुलिस मुख्यालय, उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय एवं उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद कार्यालय।
भारत सरकार द्वारा प्रयागराज को जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण योजना के लिये मिशन शहर के रूप में चुना गया है। जवाहरलाल शहरी नवीयन मिशन पर मिशन शहरों की सूची व ब्यौरे और यहां पर उपस्थित आनन्द भवन एक दर्शनीय स्थलों में से एक है।

शहर का प्राचीन नाम 'प्रयाग 'या प्रयागराज' है। हिन्दू मान्यता है कि, सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद सबसे प्रथम यज्ञ यहां किया था। इसी प्रथम यज्ञ के 'प्र' और 'याग' अर्थात यज्ञ की सन्धि द्वारा प्रयाग नाम बना। ऋग्वेद और कुछ पुराणों में भी इस स्थान का उल्लेख 'प्रयाग' के रूप में किया गया है। हिन्दी भाषा में प्रयाग का शाब्दिक अर्थ नदियों का संगम भी है - यहीं पर गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम होता है। अक्सर पांच प्रयागों का राजा कहलाने के कारण इस नगर को प्रयागराज भी कहा जाता रहा है।

मुगल काल में, यह कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर जब १५७५ में इस क्षेत्र का दौरा कर रहे थे, तो इस स्थल की सामरिक स्थिति से वह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यहाँ एक किले का निर्माण करने का आदेश दे दिया, और १५८४ के बाद से इसका नाम बदलकर 'इलाहबास' या ईश्वर का निवास कर दिया, जो बाद में बदलकर इलाहाबाद' हो गया। इस नाम के बारे में, हालांकि, कई अन्य विचार भी मौजूद हैं। आसपास के लोगों द्वारा इसे 'अलाहबास' कहने के कारण, कुछ लोगों ने इस विचार पर जोर दिया है कि इसका नाम आल्ह-खण्ड की कहानी के नायक आल्हा के नाम पर पड़ा था। १८०० के शुरुआती दिनों में ब्रिटिश कलाकार तथा लेखक जेम्स फोर्ब्स ने दावा किया था कि अक्षय वट के पेड़ को नष्ट करने में विफल रहने के बाद जहांगीर द्वारा इसका नाम बदलकर 'इलाहाबाद' या भगवान का निवास कर दिया गया था। हालाँकि, यह नाम उससे पहले का है, क्योंकि इलाहबास और इलाहाबाद - दोनों ही नामों का उल्लेख अकबर के शासनकाल से ही शहर में अंकित सिक्कों पर होता रहा है, जिनमें से बाद वाला नाम सम्राट की मृत्यु के बाद प्रमुख हो गया। यह भी माना जाता है कि इलाहाबाद नाम अल्लाह के नाम पर नहीं, बल्कि इल्हा (देवताओं) के नाम पर रखा गया है। शालिग्राम श्रीवास्तव ने प्रयाग प्रदीप में दावा किया कि नाम अकबर द्वारा जानबूझकर हिंदू (इलाहा) और मुस्लिम (अल्लाह) शब्दों के एकसमान होने के कारण दिया गया था।

१९४७ में भारत की स्वतन्त्रता के बाद कई बार उत्तर प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकारों द्वारा इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने के प्रयास किए गए। १९९२ में इसका नाम बदलने की योजना तब विफल हो गयी, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद विध्वंस प्रकरण के बाद अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। २००१ में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह की सरकार के नेतृत्व में एक और बार नाम बदलने का प्रयास हुआ, जो अधूरा रह गया। २०१८ में नगर का नाम बदलने का प्रयास आखिरकार सफल हो गया, जब १६ अक्टूबर २०१८ योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने आधिकारिक तौर पर इसका नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया।

प्राचीन काल में शहर को प्रयाग (बहु-यज्ञ स्थल) के नाम से जाना जाता था। ऐसा इसलिये क्योंकि सृष्टि कार्य पूर्ण होने पर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ यहीं किया था, वह उसके बाद यहां अनगिनत यज्ञ हुए। भारतवासियों के लिये प्रयाग एवं वर्तमान कौशाम्बी जिले के कुछ भाग यहां के महत्वपूर्ण क्षेत्र रहे हैं। यह क्षेत्र पूर्व से मौर्य एवं गुप्त साम्राज्य के अंश एवं पश्चिम से कुशान साम्राज्य का अंश रहा है। बाद में ये कन्नौज साम्राज्य में आया। 1526 में मुगल साम्राज्य के भारत पर पुनराक्रमण के बाद से इलाहाबाद मुगलों के अधीन आया। अकबर ने यहां संगम के घाट पर एक वृहत दुर्ग निर्माण करवाया था। शहर में मराठों के आक्रमण भी होते रहे थे। इसके बाद अंग्रेजों के अधिकार में आ गया। 1775 में इलाहाबाद के किले में थल-सेना के गैरीसन दुर्ग की स्थापना की थी। 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इलाहाबाद भी सक्रिय रहा। 1904 से 1949 तक इलाहाबाद संयुक्त प्रांतों (अब, उत्तर प्रदेश) की राजधानी था।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन यहां दरभंगा किले के विशाल मैदान में 1888 एवं पुनः 1892 में हुआ था।

भारत के स्वतत्रता आन्दोलन में भी इलाहाबाद की एक अहम् भूमिका रही। राष्ट्रीय नवजागरण का उदय इलाहाबाद की भूमि पर हुआ तो गाँधी युग में यह नगर प्रेरणा केन्द्र बना। 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' के संगठन और उन्नयन में भी इस नगर का योगदान रहा है। सन 1857 के विद्रोह का नेतृत्व यहाँ पर लियाक़त अली ख़ाँ ने किया था। कांग्रेस पार्टी के तीन अधिवेशन यहाँ पर 1888, 1892 और 1910 में क्रमशः जार्ज यूल, व्योमेश चन्द्र बनर्जी और सर विलियम बेडरबर्न की अध्यक्षता में हुए। महारानी विक्टोरिया का 1 नवम्बर 1858 का प्रसिद्ध घोषणा पत्र यहीं अवस्थित 'मिण्टो पार्क'[5] में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड केनिंग द्वारा पढ़ा गया था। नेहरू परिवार का पैतृक आवास ' स्वराज भवन' और 'आनन्द भवन' यहीं पर है। नेहरू-गाँधी परिवार से जुडे़ होने के कारण इलाहाबाद ने देश को प्रथम प्रधानमंत्री भी दिया। क्रांतिकारियों की शरणस्थली उदारवादी व समाजवादी नेताओं के साथ-साथ इलाहाबाद क्रांतिकारियों की भी शरणस्थली रहा है। चंद्रशेखर आज़ाद ने यहीं पर अल्फ्रेड पार्क में 27 फ़रवरी 1931 को अंग्रेज़ों से लोहा लेते हुए ब्रिटिश पुलिस अध्यक्ष नॉट बाबर और पुलिस अधिकारी विशेश्वर सिंह को घायल कर कई पुलिसजनों को मार गिराया औरं अंततः ख़ुद को गोली मारकर आजीवन आज़ाद रहने की कसम पूरी की। 1919 के रौलेट एक्ट को सरकार द्वारा वापस न लेने पर जून, 1920 में इलाहाबाद में एक सर्वदलीय सम्मेलन हुआ, जिसमें स्कूल, कॉलेजों और अदालतों के बहिष्कार के कार्यक्रम की घोषणा हुई, इस प्रकार प्रथम असहयोग आंदोलन और ख़िलाफ़त आंदोलन की नींव भी इलाहाबाद में ही रखी गयी थी।

इलाहाबाद(प्रयाग-राज) की भौगोलिक स्थिति  उत्तर प्रदेश के दक्षिणी भाग में 98 मीटर (322 फ़ीट) पर गंगा और यमुना नदियों के संगम पर स्थित है। यह क्षेत्र प्राचीन वत्स देश कहलाता था। इसके दक्षिण-पूर्व में बुंदेलखंड क्षेत्र है, उत्तर एवं उत्तर-पूर्व में अवध क्षेत्र एवं इसके पश्चिम में निचला दोआब क्षेत्र। इलाहाबाद भौगोलिक एवं संस्कृतिक दृष्टि, दोनों से ही महत्त्वपूर्ण रहा है। गंगा-जमुनी दोआब क्षेत्र के खास भाग में स्थित ये यमुना नदी का अंतिम पड़ाव है। दोनों नदियों के बीच की दोआब भूमि शेष दोआब क्षेत्र की भांति ही उपजाउ किंतु कम नमी वाली है, जो गेहूं की खेती के लिये उपयुक्त होती है। जिले के गैर-दोआबी क्षेत्र, जो दक्षिणी एवं पूर्वी ओर स्थित हैं, निकटवर्ती बुंदेलखंड एवं बघेलखंड के समान शुष्क एवं पथरीले हैं। भारत की नाभि जबलपुर से निकलने वाली भारतीय अक्षांश रेखा जबलपुर से  उत्तर में इलाहाबाद से निकलती है। 

इलाहाबाद मंडल एवं जिले में वर्ष 2000 में बड़े बदलाव हुए। इलाहाबाद मंडल के इटावा एवं फर्रुखाबाद जिले आगरा मंडल के अधीन कर दिये गए, जबकि कानपुर देहात को कानपुर जिले में से काटकर एक नया कानपुर मंडल सजित कर दिया गया। पश्चिमी इलाहाबाद के भागों को काटकर नया कौशांबी जिला बनाया गया। वर्तमान में इलाहाबाद मंडल के अंतर्गत इलाहाबाद(प्रयाग-राज), कौशांबी, प्रतापगढ़ एवं फतेहपुर जिले आते हैं। नवंबर २०१८ में योगी आदित्यनाथ ने इलाहाबाद मंडल का नाम प्रयाग-राज मंडल करवा दिया।

  इलाहाबाद (प्रयाग-राज) का क्षेत्रफल लगभग  है और ये सागर सतह से  ऊंचाई पर स्थित है।

हिन्दी-भाषी  इलाहाबाद (प्रयाग-राज) की बोली अवधी है, जिसे इलाहाबादी बोली भी कहते हैं। हालांकि अधिकांश शहरी क्षेत्र में खड़ी बोली ही बोली जाती है। जिले के पूर्वी गैर-दोआबी क्षेत्र में प्रायः बघेली बोली का चलन है।

इलाहाबाद(प्रयाग-राज) में सभी प्रधान धर्म के लोग निवास करते हैं। यहां हिन्दू कुल जनसंख्या का 85% और मुस्लिम 11% हैं। इनके अलावा सिख, ईसाई एवं बौद्ध लोगों की भी छोटी संख्या है।

प्रयागराज में तीन प्रमुख ऋतुएं आती हैं: ग्रीष्म ऋतु, शीत ऋतु एवं वर्षा ऋतु। ग्रीष्मकाल अप्रैल से जून तक चलता है, जिसमें अधिकतम तापमान 40°से. (104° फै.) से 45°से. (113°फै.) तक जाता है। मानसून काल आरंभिक जुलाई से सितंबर के अंत तक चलती है। इसके बाद शीतकाल दिसंबर से फरवरी तक रहता है। तापमान यदाकदा ही शून्य तक पहुंचता है। अधिकतम तापमान लगभग 22 °से. (72 ° फा.) एवं न्यूनतम तापमान 10° से. (50° फा.) तक पहुंचता है। प्रयागराज में जनवरी माह में घना कोहरा रहता है, जिसके कारण यातायात एवं यात्राओं में अत्यधिक विलंब भी हो जाते हैं। किंतु यहां हिमपात कभी नहीं होता है।

न्यूनतम अंकित तापमान, -2° से. (28.4° फै.) एवं अधिकतम 45° से. (118° फै.) 48 °से. तक पहुंचा है।

प्रयागराज नगर निगम, राज्य के प्राचीनतम नगर निगमों में से एक है। निगम 1864 में अस्तित्त्व में आया था, जब तत्कालीन भारत सरकार द्वारा लखनऊ म्युनिसिपल अधिनियम पास किया गया था। नगर के म्युनिसिपल क्षेत्र को कुल 80 वार्डों में विभाजित किया गया है व प्रत्येक वार्ड से एक सदस्य (कार्पोरेटर) चुनकर नगर परिषद का गठन किया जाता है।. पहले ये कॉर्पोरेटर शहर के महापौर को चुनते थे, लेकिन बाद में इस व्यवस्था को बदल दिया गया। अब नगर निगम क्षेत्र की जनता पार्षद के साथ-साथ अपना महापौर भी चुनती हैं। राज्य सरकार द्वारा चुने गए मुख्य कार्यपालक को इलाहाबाद का आयुक्त (कमिश्नर) नियुक्त किया जाता है।

प्रयागराज गंगा-यमुना नदियों के संगम पर स्थित है। ये एक भू-स्थित प्रायद्वीप रूप में देखा जा सकता है जिसे तीन ओर से नदियों ने घेर रखा है एवं मात्र एक ओर ही मुख्य भूमि से जुड़ा है। इस कारण ही शहर के भीतर व बाहर बढ़ते यातायात परिवहन हेतु अनेक सेतुओं द्वारा गंगा व यमुना नदियों के पार जाते हैं।

प्रयागराज का शहरी क्षेत्र तीन भागों एं वर्गीकृत किया जा सकता है: चौक, कटरा पुराना शहर जो शहर का आर्थिक केन्द्र रहा है। यह शहर का सबसे घना क्षेत्र है, जहां भीड़-भाड़ वाली सड़कें यातायात व बाजारों का कां देती हैं। नया शहर जो सिविल लाइंस क्षेत्र के निकट स्थित है; ब्रिटिश काल में स्थापित किया गया था। यह भली-भांति सुनियोजित क्षेत्र ग्रिड-आयरन रोड पैटर्न पर बना है, जिसमें अतिरिक्त कर्णरेखीय सड़कें इसे दक्ष बनाती हैं। यह अपेक्षाकृत कम घनत्व वाला क्षेत्र हैजिसके मार्गों पर वृक्षों की कतारें हैं। यहां प्रधान शैक्षिक संस्थान, उच्च न्यायालय, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग कार्यालय, अन्य कार्यालय, उद्यान एवं छावनी क्षेत्र हैं। यहां आधुनिक शॉपिंग मॉल एवं मल्टीप्लेक्स बने हैं, जिनमें निम्नलिखित मुख्य हैं-पीवीआर, बिग बाजार, कोलकाता मॉल, यूनिक बाजार ,जालौन,विशाल मेगामार्ट इत्यादि

अन्य पाँच माँल पर काम चल रहा हैं। बाहरी क्षेत्र में शहर से गुजरने वाले मुख्य राजमार्गों पर स्थापित सैटेलाइट टाउन हैं। इनमें गंगा-पार (ट्रांस-गैन्जेस) एवं यमुना पार (ट्रांस-यमुना) क्षेत्र आते हैं। विभिन्न रियल-एस्टेट बिल्डर इलाहाबाद में निवेश कर रहे हैं, जिनमें ओमेक्स लि. प्रमुख हैं। नैनी सैटेलाइट टाउन में १५३५ एकड़ की हाई-टेक सिटी बन रही है।

प्रयागराज शहर में कई बड़े अस्पताल हैं 

प्रयागराज में सभी वर्गों के लिए हेतु बड़े होटल, धर्मशालाएँ व गेस्ट हाउस इत्यादि हैं। इनमे से कुछ प्रमुख होटल का विवरण दिया जा रहा है।

प्रयागराज जिले में आठ तहसीले हैं, जो निम्नवत है।

शहरी क्षेत्र का सभी कार्य सदर द्वारा होता है।यह जिला कचहरी से जुड़ा हुआ है।

प्रयागराज से मिर्ज़ापुर मार्ग स्थित मेजारोड (लगभग दूरी ४०किलोमीटर) चौराहे से तथा मेजारोड रेलवे स्टेशन से १०किलोमीटर दक्षिण स्थित है। मेजा तहसील में तीन ब्लॉक क्रमश: मेजा,उरुवा और मांडा है। भारत के पूर्व-प्रधानमंत्री श्री विश्वप्रताप सिंह मांडा के राजा थे।

यहाँ कई क्रीड़ा परिसर हैं, जिनका उपयोग व्यावसायिक एवं अव्यवसायी खिलाड़ी करते रहे हैं। इनमें मदन मोहन मालवीय क्रिकेट स्टेडियम, मेयो हॉल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स एवं बॉयज़ हाई स्कूल एवं कॉलिज जिम्नेज़ियम हैं। जॉर्जटाउन में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का तरणताल परिसर भी है। झलवा (प्रयागराज पश्चिम) में नेशनल स्पोर्ट्स एकैडमी है, जहां विश्व स्तर के जिमनास्ट अभ्यासरत रहते हैं। अकादमी को आगामी राष्ट्रमंडल खेलों के लिये भारतीय जिमनास्ट हेतु आधिकारिक ध्वजधारक चुना गया है। 

मध्यकालीन इतिहासकार बदायूनी के अनुसार 1575 में सम्राट अकबर ने प्रयाग की यात्रा की और एक शाही शहर इलाहाबाद की स्थापना की 1583 में अकबर ने प्रयागराज में गंगा और यमुना के संगम पर एक किले का निर्माण प्रारम्म करवाया। यह किला चार भागो में बनवाया गया। पहले हिस्से में 12 भवन एवं कुछ बगीचे बनवाये गयें। दूसरे हिस्से में बेगमोँ और शहजादियों के लिऐ महलो का निर्माण करवाया गया। तीसरा हिस्सा शाही परिवार के दूर के रिश्तेदारों और नैकरों के लिऐ बनवाया गया और चौथा हिस्सा सैनिको के लिये बनवाया गया। इस किले में 93 महर, 3 झरोखा,25 दरवाजें, 277 इमारतें, 176 कोठियाँ 77 तहखानें व 20 अस्तबल और 5 कुएं हैं।

उल्टा किला
यह किला झूसी में स्थित है।
 

स्वराज भवन
प्रयागराज में
स्थित एक
ऐतिहासिक भवन
एवं संग्रहालय है।
इसका मूल नाम
'आनन्द भवन' था।
इस ऐतिहासिक
भवन का निर्माण
मोतीलाल नेहरू ने
करवाया था।

उन्होंने इसे
राष्ट्र
को समर्पित कर दिया था। इसके बाद
यहां कांग्रेस कमेटी का मुख्यालय बनाया गया।
भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री
श्रीमती इंदिरा गांधी का जन्म यहीं पर हुआ
था। आज इसे संग्रहालय का रूप दे दिया गया है।
परिचय

मोहल्ले में एक अव्यवस्थित इमारत खरीदी।
जब इस बंगले में नेहरु परिवार रहने के लिये
आया तब इसका नाम आनन्द भवन रखा गया।
पुरानी इमारत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
को सौँप दी गयी। 1931 में पं मोतीलाल
नेहरु की गूजरने के बाद उनके पुत्र जवाहर लाल
नेहरु ने एक ट्रस्ट बना कर स्वाराज भवन
भारतीय जनता के ज्ञान के विकास स्वास्थ्य
एंव सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये समर्पित
कर दिया। इस इमारत के एक हिस्से में अस्पताल
जो की आज कमाला नेहरु के नाम से
जाना जाता हैं। और शेष अखिल भारतीय
कांग्रेस समिति के उपयोग के लिये था। 1948
से 1974 तक इस ईमारत का उपयोग
बच्चोँ की शैक्षणिक गतिविधियोँ विकाय के
लिये किया जता रहा और इसमें एक बाल भवन
कि स्थापना कि गयी। बाल भवन में शैक्षिक
यथा संगित विग्यान खेल आदि के विषय में
बच्चोँ को सिखाया जता था। 1974 में
स्वंगीय प्रधानमत्री इंदिरा गाँधी ने जवाहर
लाल मेमोरियल फण्ड बना कर यह इमारत 20
वर्ष के लियें उसे पट्टे पर दे दिया। और उस
इमारत में बाल भवन चलता रहा। किन्तु अब
बाल भवन को स्वाराज भवन के ठीक बगल में
स्थित एक अन्य मकान स्थापित कर
दिया गया। और स्वाराज भवन को एक
सग्रहालय के रूप में विकसित कर दिया गया।
स्वाराज भवन एक बड़ा भवन हैं। और भारतीय
स्वाधीनता संग्राम के दिनोँ का एक
जीता जागता धरोहर हैं। यही वह स्थान हैं
जहा पं जवाहरलाल नेहरु ने अपना बचपन
बिताया। यहीँ से
वो राजनिति कि प्रारम्भिक शिक्षा लेने के
बाद में भारतीय स्वाधिनता संग्राम में शामिल
हुये। जवाहरलाल नेहरु ने 1916 में अपने
वैवाहिक जीवन का शुभ आरम्भ इसी भवन से
किया। इसके अतिरिक्त यह
राजनिति गतविधियोँ का एक मंच भी रहा।

अध्यक्ष मोतीलाल नेहरु एवं
महामंत्री जवाहरलाल नेहरु थे। 19 नवम्बर

भी इसी भवन में हुआ। 1920 में आल
इंडिया खिलाफत इसी भवन में बनायी गयी।
भारत का संविधान लिखने के लिये चुनी गयी आल
पार्टी का सम्मेलन भी इसी स्वाराज भवन में
हुआ था।

मोतीलाल नेहरु ने इसकी नींव 1926 रखी। वास्तुकला की द्ष्टि से यह भवन अपने आप में अनोखा है। यह दो मंजिली इमारत है आनन्द भवन भारतीय स्वाधीनता संघर्ष की एक ऐतिहासिक यादगार हैं और ब्रिटिश शासन के विरोध में किये गये अनेक विरोधों, कांग्रेस के अधिवेशनों एवं राष्टीय नेताओँ के अनेक सम्मेलनों से इसका सम्बन्ध रहा है।

यह मूल रूप से भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 के सद्र दीवानी अदालत जगह से आगरा में 17 मार्च 1866 को उत्तरी-पश्चिमी प्रांतों के लिए न्यायाधिकरण के उच्च न्यायालय के रूप में स्थापित किया गया था। सर वाल्टर मॉर्गन, बैरिस्टर पर कानून उत्तर - पश्चिमी प्रदेशों के उच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

स्थान 1869 में प्रयागराज में स्थानांतरित किया गया और नाम तदनुसार 11 से मार्च 1919 महकमा के उच्च न्यायालय इलाहाबाद में बदल गया था। 2 नवम्बर 1925 को, अवध न्यायिक आयुक्त के न्यायालय लखनऊ में अवध चीफ कोर्ट ने अवध सिविल न्यायालय अधिनियम 1925 की गवर्नर जनरल की मंजूरी के साथ संयुक्त प्रांत विधानमंडल द्वारा अधिनियमित द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था।

अकबर की राजपूत पत्नी जोधाबाई का महल जो रानी महल के नाम से जाना जाता हैं। यह महल किले में स्थित हैं।

शहर के सिविल लाइन में स्थित यह चर्च पत्थर गिरजाघर के नाम से प्रसिद्द है। इस चर्च को देखने से प्रतित होता हैं। कि मानोँ हम किसी रोमन साम्राज्य का राजगृह देख रहे हैं। 1879 में बन कर तैयार हुये इस चर्च का नक्शा सुप्रसिद्ध अंग्रेज वास्तुविद विलियन इमरसन ने बनवाया था। यह चर्च चौराहे के बीचो-बीच स्थित हैं।हम लोग यहाँ घूम भी सकते हैं

प्रयागराज गंगा यमुना और सरस्वती के संगम पर स्थित हैं। चूकि यहाँ तीन नदियाँ आकर मिलती हैं। अत: इस स्थान को त्रिवेणी के नाम से भी संबोधित किया जाता हैं। संगम का द्रश्य अत्यन्त मनोरम हैं। स्वेत गंगा और हरित यमुना अपने मिलने के स्थान पर स्पष्ट भेद बनाए रखती हैं अर्थात मात्र द्रिष्टिपात करने से ही यह बताया जा सकता हैं। कि यह गंगा नदी हैं और यह यमुना। हिमालय की गोद से निकल कर प्रयाग तक आते आते गंगा गुम्फिद नदी में बदल जाती हैं परन्तु यमुना के मिलने के उपरान्त इनमे पुन: अथाह जल हो जाता हैं।

संगम के निकट स्थित यह एक अद्भुत एवं अपने प्रकार का अनोखा मन्दिर हैं इस मन्दिर में हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा हैं। और उनके दर्शनार्थ लोगोँ को सीढियोँ से उतर कर नीचे जाना पड़ता हैं। यह प्रतिमा अत्यन्त विशाल एवं भव्य हैं। ऐसा विश्वास किया जाता हैं कि अंग्रेजी शासन ने इस मंदिर को यहाँ से हटवाने के आदेश दिये किन्तु जैसे जैसे मूर्ति को हटाने के लिये खुदाई की जाने लगी वैसे वैसे मुर्ति बाहर आने के बजाय अन्दर धसती गयी। यही कारण हैं कि यह मंदिर गड्ढे में हैं।

गंगा के तट पर स्थित यह एक आधुनिक मन्दिर हैं। यह मन्दिर चार मंजिलोँ का हैं। इस मन्दिर की कुल ऊँचाई लगभग 40 मीटर अर्थात 130 फुट हैं। इसकी प्रत्येक मंजिल पर अलग अलग देवताओँ का वास स्थान हैं।

यह मन्दिर सिविल लाइन में स्थित हैं यह एक आधुनिक मन्दिर हैं। जो मुख्य रूप से हनुमान जी को समर्पित हैं।

किले के भीतर स्थित इस पवित्र कूप के विषय में विश्वास किया जाता हैं। कि यही अद्रश्य सरस्वती नदी का स्रोत हैं।

गंगा पार स्थित झूँसी में समुद्र कूप स्थित है। यह कूप उल्टा किला के अन्दर स्थित है। यह बहूत उचे टिले पर है। माना जाता है कि इस कूप में समुद्र का स्रोत है। इस कूप का पानी खारा हैं।

यमुना के तट पर स्थित इस मन्दिर का धार्मिक महत्व अत्यधिक हैं। इस मन्दिर से चबूतरे से यमुना का नजारा अत्यन्त ही मनोहर हैं। इस मन्दिर की विशेषता यहाँ प्रतिदिन लोने वाला श्र्रगांर एवं भगवान शिव की दिव्य आरती हैं।

गंगा नदी के किनार स्थित शिवकुटी भगवान शिव को समर्पित है।

आनन्द भवन के सामने स्थित एक मन्दिर हैं। यही भगवान राम के वन गमन काल में महर्षि भारद्वाज का आश्रम हुआ करता था। यह आश्रम संत भारद्वाज से संबंधित है। और जब इसी संगम से आगे बडकर गंगा शिवजी की नगरी काशी में पहुँचती हैं तो यह जल से लभालब भरी रहती हैं। यमुना यमुनोत्री की निर्मल धारा लेकर मथुरा में क्रिष्ण की लीलाओँ को रूप देकर और आगरे में ताजमहल को नहला कर प्रयाग में गंगा में विलिन हो जाती हैं। प्रत्येक वर्ष के जनवरी फरवरी में इसकी महत्ता कई गुना बड जाती हैं। इस मेले में करोडोँ लोग संगम के पावन जल में डुबकी लगा कर पुण्य के भागीदार बनते हैं। कल्पवासी संगम के तट पर टेन्ट के बने घरोँ में निवास करते हैं।
भारद्वाज आश्रम कर्नलगंज इलाके में स्थित है
। यहाँ ऋषि भारद्वाज ने भार्द्वाजेश्वर महादेव
का शिवलिंग स्थापित किया था और इसके
अलावा यहाँ सैकड़ों मूर्तियांहैं उनमें से
महत्वपूर्ण हैं: राम लक्ष्मण, महिषासुर
मर्दिनी, सूर्य, शेषनाग, नर वराह।
महर्षि भारद्वाज आयुर्वेद के पहले संरक्षक थे।
भगवान राम ऋषि भारद्वाज के आश्रम में
उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आये थे।
आश्रम कहाँ था यह अनुसंधान का एक मामला है,
लेकिन वर्तमान में यह आनंद भवन के पास है।
यहाँ भी भारद्वाज, याज्ञवल्क्य और अन्य संतों,
देवी - देवताओं की प्रतिमा और शिव मंदिर है।
भारद्वाज वाल्मीकि के एक शिष्य थे।
यहाँ पहले एक विशाल मंदिर भी था और पहाड़
के ऊपर एक भरतकुंड था।
नाग वासुकी मंदिर
यह मंदिर संगम के उत्तर में गंगा तट पर
दारागंज के उत्तरी कोने में स्थित है।
यहाँ नाग राज, गणेश, पार्वती और भीष्म
पितामाह की एक मूर्ति हैं। परिसर में एक शिव
मंदिर है। नाग- पंचमी के दिन एक
बड़ा मेला आयोजित किया जाता है।
मनकामेश्वर मंदिर
यह मिंटो पार्क के पास यमुना नदी के किनारे
किले के पश्चिम में स्थित है। यहाँ एक काले
पत्थर की शिवलिंग और गणेश और
नंदी की प्रतिमाएं हैं। हनुमान की भव्य
प्रतिमा और मंदिर के पास एक प्राचीन पीपल
का पेड़ है। यह प्राचीन शिव मंदिर
इलाहाबाद के बर्रा तहसील से 40
किमी दक्षिण पश्चिम में स्थित है। शिवलिंग
सुरम्य वातावरण के बीच एक ८० फुट
ऊंची पहाड़ी की चोटी पर स्थापित है।
कहा जाता है कि शिवलिंग ३.५ फुट भूमिगत है
और यह भगवान राम द्वारा स्थापित
किया गया था। यहाँ कई विशाल बरगद के पेड़
और मूर्तियाँ हैं

गोस्वामी तुलसीदास जी रामकथा का आरंभ त्रिवेणी संगम के समीप स्थित प्रयागराज में भरद्वाज मुनि के आश्रम पर परमविवेकी मुनि याज्ञवल्क्य के पावन संवाद से करते हैं ।यहाँ ‘राम पद’, ‘माधव पद जलजाता’का उल्लेख दो चौपाइयों में हुआ है, जो इस भाष्य से संबद्ध है –

तिन्हहि राम पद अति अनुराग।।1/44/1

परसि अखय बटु हरषहिं गाता।। 1/44/5
अर्थात् भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं,उनका श्रीराम जी के चरणों में अत्यंत प्रेम है ।
तीर्थराज प्रयाग में आने वाले श्री वेणीमाधवजी के चरण कमलों को पूजते हैं और अक्षयवट का स्पर्श कर उनके शरीर पुलकित होते हैं ।

आनंद भवन के बगल में स्थित इस प्लेनेटेरियम में खगोलीय और वैज्ञानिक जानकारी हासिल करने के लिए जाया जा सकता है। और यह प्लेनेटेरियम 3 डी है।

कम्पनी बाग के अन्दर सन् 1931 में एक सग्रहालय का निर्माण करवाया गया था। इस सग्रहालय में भारत के प्राचीन इतिहास से सम्बन्धित अनेक वस्तुएँ रखीँ हुयीं हैं।
इन वस्तुओँ में कौशाम्बी के अनेक अवशेष संग्रहीत है। कौशाम्बी में प्राप्त बुद्ध की मुर्तियाँ भी इसमें संरक्षित हैं। इस संग्रहालय में प्राचीन सिक्के का एक अनमोल खजाना हैं। पंचमार्क सिक्के ताबे के सिक्के कुषाणोँ तथा गुप्त शासकोँ द्रारा प्राप्त सिक्कोँ के अतिरिक्त यहाँ कुछ मुगलकालीन सिक्के भी हैं। यहाँ मुगलकाल अनेक पेंटिँग देखने को हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ पर एक रुसी चित्रकार द्रारा निर्मित अत्यन्त सुन्दर पेंटिँग भी रखी हुयी हैं। प्रयागराज से सम्बन्धित कुछ लेखकोँ यथा महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा आदि के कुछ हस्तलिखित अभिलेख भी इस संग्रहालय में हैं। इस सबसे बडकर यहाँ पर महान स्वाधिनता संग्राम सेनानी चन्द्रशेखर आजाद की वह पिस्तौल भी रखी हैं। जिससे उन्होने अंग्रेज़ सिपाहियोँ का मुकाबला किया था।
 

कम्पनी बाग के अन्दर एक पब्लिक लाइब्रेरी स्थिय है। इसकी इमारत अंग्रजी शासन के समय की है। एवं बडी शानदार है। यह लाइब्रेरी उत्तर प्रदेश की सबसे बडी और सबसे प्राचीन लाइब्रेरी हैं। इसकी इमारत बडी शानदार हैं। प्रवेश द्रार के ठीक सामने के कोरीडोरा में बढे खम्भोँ पर बहुत ही सुन्दर रोमन नक्कासी हैं।

चौक घंटाघर उत्तर प्रदेश में स्थित एक घड़ी का टॉवर है। यह चौक, इलाहाबाद में स्थित है, जो भारत के सबसे पुराने बाजारों में से एक है और मुगलों की कलात्मक और संरचनात्मक कौशल का एक उदाहरण है। यह 1913 में बनाया गया था और लखनऊ के घंटाघर बाद यह उत्तर प्रदेश का दूसरा सबसे पुराना घड़ी का टावर है। इसके खम्भोँ पर बहुत ही सुन्दर रोमन नक्कासी हैं।

अरैल यमुना के तट स्थित यह एक भव्य स्थल हैं। यह सबसे सुन्दर स्थान हैं। यहाँ पर कई एतिहासिक चीजे आपको देखने को मिलेगा। जैसे रामजन्मभूमि, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गौतम बुद्ध, बहुत सी मन्दिर हैं। यहाँ पर एक बहुत बड़ा गुम्बज (मिनार) देखने को मिलेगा।

देखने योग्य स्थल बहुत हैं। जैसे-

आदि देखने योग्य स्थान है। यहाँ सड़क मार्ग या नाव द्वारा जाया जा सकता है।

प्रयागराज में पक्के घाट हैं। जो क्रमश: हैं।

यमुना के तट स्थित यह एक नवनिर्मित रमणीय स्थल हैं। तीन ओर से सीढियाँ यमुना के हरे जल तक उतर कर जाती हैं। और ऊपर एक पार्क हैं जो सदैव हरी घास से ढका रहता हैं। यहाँ पर बोँटिग करने की भी सुविधा हैं। यहाँ से नाव द्रारा संगम पहुचने का भी मार्ग हैं।

यह प्रयागराज का सबसे बड़ा घाट है और यह सबसे आधुनिक घाट हैं। यह एक भव्य स्थान हैं और टहलने का सबसे अच्छा स्थान हैं। यह एक दशर्नीय स्थल हैं। यहाँ पर बोँटिग करने की भी सुविधा हैं यहाँ पर स्नानार्थियों के लिये सिटिंग प्लाजा भी हैं।

इनके अतिरिक्त सौ से अधिक कच्चे घाट हैं।

प्रयागराज में लगने वाला कुंभ मेला शहर के आकर्षण का सबसे बड़ा केन्द्र है। अनगिनत श्रद्धालु इस मेले में आते हैं। यहाँ मेला एक वर्ष माघ मेला तीन वर्ष छः वर्ष अर्द्धकुम्भ और बारह वर्ष महाकुंभ लगता है। भारत में यह धार्मिक मेला चार जगहों पर लगता है। यह जगह नाशिक, प्रयाग, उज्जैन और हरिद्वार में हैं। प्रयागराज में लगने वाला कुंभ का मेला सबसे बड़ा धार्मिक मेला है। इस मेले में हर बार विशाल संख्या में भक्त आते हैं। यहाँ पर जनवरी फरवरी में विश्व का सबसे बड़ा शहर कहा जाता हैं। यहाँ कि जनसख्या करीब दस करोड में होती हैं।

इस मेले में आए लाखों श्रद्धालु संगम में स्नान करते हैं। अर्थात गंगा यमुना सरस्वती नदी हैं। यह माना जाता है कि इस पवित्र नदी में स्नान करने से आत्मा की शुद्धि और पापों से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा प्रत्येक वर्ष आने वाले शिवरात्रि के त्योहार को भी यहां बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हजारों की संख्या में आए तीर्थयात्री इस पर्व को भी पूरे उमंग और उत्साह के साथ मनाते हैं।
इस त्योहार में आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए राज्य सरकार कुछ विशेष प्रकार का प्रबंध करती है। यहां दर्शन करने आए तीर्थयात्रियों के रहने के लिए बहुत से होटल गेस्ट हाउस और धर्मशाला की सुविधा मुहैया कराई जाती है। यहां स्थित घाट बहुत ही साफ और सुंदर है। त्योहारों के समय यहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाते हैं।

प्रयागराज प्राचीन काल से ही शैक्षणिक नगर के रूप में प्रसिद्ध है। प्रयागराज केवल गंगा और यमुना जैसी दो पवित्र नदियों का ही संगम नही, अपितु आध्यात्म के साथ शिक्षा का भी संगम है, जैहा भारत के सभी राज्यो से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जँहा से अनेकानेक विद्वान ने शिक्षा ग्रहण कर देश व समाज के अनेक भागो में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय को पूर्व का आक्सफोर्ड (Oxford of the East) भी कहा जाता है। प्रयागराज में कई विश्वविद्यालय, शिक्षा परिषद, इंजीनियरी महाविद्यालय, मेडिकल कालेज तथा मुक्त विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे है।

प्रयागराज में स्थापित विश्वविद्यालय के नाम निम्नलिखित हैं-

प्रयागराज में स्थापित इंजीनिरिंग कालेज के नाम निम्नलिखित है-

प्रयागराज में शीशा और तार कारखाने काफी हैं। यहां के मुख्य औद्योगिक क्षेत्र हैं नैनी और फूलपुर, जहां कई सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों की इकाइयां, कार्यालय और निर्माणियां स्थापित हैं। इनमें अरेवा टी एण्ड डी इण्डिया (बहुराष्ट्रीय  का एक प्रभाग), भारत पंप्स एण्ड कंप्रेसर्स लि. यानी बीपीसीएल) जिसे जल्दी ही मिनिरत्न घोषित किया जाने वाला है, इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज (आई.टी.आई), रिलायंस इंडस्ट्रीज़-इलाहाबाद निर्माण प्रखंड, हिन्दुस्तान केबल्स, त्रिवेणी स्ट्रक्चरल्स लि. (टी.एस.एल. भारत यंत्र निगम की एक गौण इकाई), शीशा कारखाना, इत्यादि। बैद्यनाथ की नैनी में एक निर्माणी स्थापित है, जिनमें कई कुटीर उद्योग जैसे रसायन, पॉलीयेस्टर, ऊनी वस्त्र, नल, पाईप्स, टॉर्च, कागज, घी, माचिस, साबुन, चीनी, साइकिल एवं पर्फ़्यूम आदि निर्माण होते हैं। इंडीयन फार्मर्स फर्टिलाइजर्स को-ऑपरेटिव इफको फूलपुर क्षेत्र में स्थापित है। यहाम इफको की दो इकाइयां हैं, जिनमें विश्व का सबसे बड़ा नैफ्था आधारित खाद निर्माण परिसर स्थापित है। इलाहाबाद में पॉल्ट्री और कांच उद्योग भी बढ़ता हुआ है। राहत इंडस्ट्रीज़ का नूरानी तेल, काफी अच्छा और पुराना दर्दनिवारक तैल है, जिसकी निर्माणी नैनी में स्थापित है। तीन विद्युत परियोजनाएं मेजा, बारा और करछना तहसीलों में जेपी समूह एवं नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन द्वारा तैयार की जा रही हैं।

प्रयागराज का भारतीय जिम्नास्टिक्स में प्रमुख स्थान है। यहां की टीम सार्क और एशियाई देशों में अग्रणी रही है। झालवा में खेलगांव पब्लिक स्कूल जिम्नास्टिक्स का प्रशिक्षण उपलब्ध कराता है। यहां के जिम्नास्ट्स को ३३वें ट्यूलिट पीटर स्मारक कप-२००७, हंगरी में २ स्वर्ण पदक मिले हैं। हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद का जन्म भी इलाहाबाद में ही २९ अगस्त १९०६ को हुआ था। उन्होंने तीन लगातार ऑलंपिक खेलों में एम्स्टर्डैम (१९२८), लॉस एंजिलिस (१९३२) और बर्लिन (१९३६) में तीन स्वर्ण पदक प्राप्त किये थे। मोहम्मद कैफ, भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी यहीं के हैं। अभिन्न श्याम गुप्ता भी एक उभरते हुए बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, जिन्होंने २००२ में राष्ट्रीय पदक प्राप्त किया था।

प्रयागराज में वायु सेवा का विकास प्रगतिशील हैं। अभी इलाहाबाद विमानक्षेत्र से दिल्ली, कोलकाता, जयपुर, अहमदाबाद, चेन्नई, बैंगलुरू, हैदराबाद के लिए सीधी या वाया उडानें हैं। अभी यहां का हवाई अड्डा एयरफोर्स स्टेशन बमरौली में ही है। उड़ान योजना के तहत लखनऊ और पटना भी इलाहाबाद से जुड़ गए हैं। जनवरी 2019 में होने वाले कुम्भ से पहले एक नया टर्मिनल बनाने की सरकार की योजना है। निकटवर्ती बड़े विमानक्षेत्रों में वाराणसी विमानक्षेत्र ) एवं लखनऊ (अमौसी अंतर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र  हैं।

प्रयागराज में जलमार्ग का विकास अभी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में हैं 22 अक्टूबर 1986 ई, राष्ट्रिय जलमार्ग एक, जो कि इलाहाबाद से हल्दिया (पं बंगाल) 1620 KM तक हैं।

प्रयागराज दिल्ली-कोलकाता मार्ग के बीच स्थित है। स्वर्ण चतुर्भुज के मार्गों में से एक, राष्ट्रीय राजमार्ग २ दिल्ली और कोलकाता के लिये उपयुक्त है।

विश्व बैंक द्वारा वित्त-पोषित ८४.७ कि॰मी॰ लंबा बायपास मार्ग प्रयागराज एक्सप्रेसवे हाइवे है।
 इसके द्वारा न केवल राजमार्गों का यातायात ही सुलभ होगा, बल्कि शहर के हृदय से गुजरने वाला यातायात भी हल्का होगा। अन्य कई राज्य-राजमार्ग शहर को देश के अन्य भागों से जोड़ते हैं।

प्रयागराज से कुछ महत्वपूर्ण स्थलो की दूरी इस प्रकार हैं -

प्रयागराज में राज्य परिवन निगम के तीन डिपो (बस-अड्डे) हैं:

और झूँसी डिपो, नैनी डिपो फाफामऊ डिपो बस स्टैंड सिविल लाइंस और जीरो रोड पर जो विभिन्न मार्गों पर बस-सेवा सुलभ कराते हैं। दोनों नदियों पर बड़ी संख्या में बने सेतु शहर को अपने उपनगरों जैसे नैनी, झूँसी फाफामऊ आदि से जोड़ते हैं। नया आठ-लेन नियंत्रित एक्स्प्रेसवे- गंगा एक्स्प्रेसवे इलाहाबाद से गुजरना प्रस्तावित है। इलाहाबाद जिले में एक नयी ८-लेन मुद्रिका मार्ग सड़क भी प्रतावित है। स्थानीय यातायात हेतु नगर बस सेवा, ऑटोरिक्शा, रिक्शा एवं टेम्पो उपलब्ध हैं। इनमें से सबसे सुविधाजनक साधन साइकिल रिक्शा है। 

भारतीय रेल द्वारा जुड़ा हुआ, प्रयागराज जंक्शन उत्तर मध्य रेलवे का मुख्यालय है। ये अन्य प्रधान शहरों जैसे कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, इंदौर, लखनऊ, छपरा, पटना, भोपाल, ग्वालियर,जौनपुर, जबलपुर, बंगलुरु जयपुर एवं कानपुर से भली भांति जुड़ा हुआ है। कुछ अन्य शहरों जैसे बांदा,फतेहपुर आदि से जुड़ा हुआ है।

शहर में 11 रेलवे-स्टेशन हैं:

भारत के १४ प्रधानमंत्रियों में से ७ का इलाहाबाद से घनिष्ट संबंध रहा है:

जवाहर लाल नेहरु,

लालबहादुर शास्त्री,

इंदिरा गांधी,

राजीव गांधी,

गुलजारी लाल नंदा,

विश्वनाथ प्रताप सिंह एवं

चंद्रशेखर;

ये या तो यहां जन्में हैं, या इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़े हैं या इलाहाबाद निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए हैं।




#Article 57: आगरा (2364 words)


आगरा भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में यमुना नदी के तट पर स्थित एक नगर है। यह राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के २०६ किलोमीटर (१२८ मील) दक्षिण में स्थित है। भारत की २०११ की जनगणना के अनुसार १५,८५,७०४ की जनसंख्या के साथ आगरा उत्तर प्रदेश का चौथा और भारत का २३वां सर्वाधिक जनसंख्या वाला नगर है।

दिल्ली सल्तनत के उदय से पहले आगरा का इतिहास स्पष्ट नहीं है। १७ वीं शताब्दी के एक वृत्तांत में सिकंदर लोदी (१४८८-१५१७) के समय से पहले आगरा को एक पुरानी बस्ती के रूप में बुलाया था, जो महमूद गजनवी द्वारा इसके विनाश के कारण महज एक गाँव था। ११ वीं सदी के फ़ारसी कवि मासूद सलमान ने आगरा के किले पर गजनवी के आक्रमण का उल्लेख किया है, जो तब राजा जयपाल के शासनाधीन था। जयपाल के आत्मसमर्पण के बावजूद, महमूद ने किले को लूट लिया था। १५०४ में सिकंदर लोदी ने अपनी राजधानी को दिल्ली से आगरा स्थानांतरित किया था। उनके काल में किले में कई महल, कुएँ और एक मस्जिद का निर्माण किया गया। १५२६ में पानीपत के प्रथम युद्ध में हार के बाद यह मुगल शासन के अंतर्गत आया। १५४० और १५५६ के बीच, शेरशाह सूरी ने इस क्षेत्र पर शासन किया। यह १५५६ से १६४८ तक मुगल साम्राज्य की राजधानी रहा। आगरा पर बाद में मराठों का अधिपत्य रहा, जिनके बाद यह ब्रिटिश राज के अंतर्गत आ गया।

आगरा अपनी कई मुगलकालीन इमारतों के कारण एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, विशेषकर ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी के लिये, जो सभी यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं। दिल्ली और जयपुर के साथ आगरा गोल्डन ट्राइंगल टूरिस्ट सर्किट में शामिल है; और लखनऊ और वाराणसी के साथ यह उत्तर प्रदेश राज्य के एक पर्यटक सर्किट, उत्तर प्रदेश हेरिटेज आर्क का हिस्सा है। सांस्कृतिक रूप से आगरा ब्रज क्षेत्र में स्थित है। आगरा २७.१८° उत्तर ७८.०२° पूर्व में यमुना नदी के तट पर स्थित है। समुद्र-तल से इसकी औसत ऊँचाई क़रीब १७१ मीटर (५६१ फ़ीट) है। यह यमुना एक्सप्रेसवे के माध्यम से दिल्ली से और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के माध्यम से लखनऊ से जुड़ा हुआ है।

आगरा एक ऐतिहासिक नगर है, जिसके प्रमाण यह अपने चारों ओर समेटे हुए है। वैसे तो आगरा का इतिहास मुख्य रूप से मुगल काल से जाना जाता है लेकिन इसका सम्बन्ध महर्षि अन्गिरा से है जो १००० वर्ष ईसा पूर्व हुए थे। इतिहास में पहला ज़िक्र आगरा का महाभारत के समय से माना जाता है, जब इसे अग्रबाण या अग्रवन के नाम से संबोधित किया जाता था। कहते हैं कि पहले यह नगर आयॅग्रह के नाम से भी जाना जाता था। तौलमी पहला ज्ञात व्यक्ति था जिसने इसे आगरा नाम से संबोधित किया।

आगरा शहर को सिकंदर लोदी ने सन् 1506 ई. में बसाया था। आगरा मुगल साम्राजय की चहेती जगह थी। आगरा 1526 से 1658 तक मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रहा। आज भी आगरा मुग़लकालीन इमारतों जैसे - ताज महल, लाल किला, फ़तेहपुर सीकरी आदि की वजह से एक विख्यात पर्यटन-स्थल है। ये तीनों इमारतें यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल हैं। बाबर (मुग़ल साम्राज्य का जनक) ने यहाँ चौकोर (आयताकार एवं वर्गाकार) बाग़ों का निर्माण कराया।

आगरा की जलवायु अर्द्ध शुष्क है जो आर्द्र अर्ध-कटिबन्धीय जलवायु पर सीमा बनाती है। शहर में हल्की सर्दियाँ, गर्म और शुष्क गर्मी और मानसून का मौसम होता है। हालांकि आगरा में पर्याप्त मानसून रहता है, परन्तु यह भारत के अन्य हिस्सों जितना भारी नहीं होता है। जून से सितंबर के दौरान औसत मॉनसून वर्षा ६२८.६ मिलीमीटर है। आगरा भारत के सबसे गर्म और सबसे ठंडे शहरों में से एक है। ग्रीष्मकाल में शहर के तापमान में अचानक वृद्धि देखी जाती है और कई बार बहुत उच्च स्तर की आर्द्रता के साथ पारा ४६ डिग्री सेल्सियस के निशान को भी पार कर जाता है। गर्मियों के दौरान, दिन का तापमान ४०-४५ डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। रातें अपेक्षाकृत ठंडी होती यहीं और तब तापमान ३० डिग्री सेल्सियस तक कम हो जाता है। सर्दियाँ थोड़ी सर्द होती हैं लेकिन यह आगरा में घूमने के लिए सबसे अच्छा समय है। न्यूनतम तापमान कभी-कभी -२ या -२.५ डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है, लेकिन आमतौर पर ६ से ८ डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है।

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार, आगरा की जनसंख्या 1587704 है। आगरा की जनसंख्या का ५३% पुरूष और ४७% महिलाएँ हैं। यहाँ की औसत साक्षरता दर ६५% है, जिनमें ७६% पुरुष और ५३% महिलाएँ साक्षर हैं। यह राष्ट्रीय औसत ५९.५% से अधिक है। आगरा की ११% जनसंख्या ६ वर्ष से नीचे के बच्चों की है।

आगरे का ताजमहल, शाहजहाँ की प्रिय बेगम मुमताज महल का मकबरा, विश्व की सबसे प्रसिद्ध इमारतों में से एक है। यह विश्व के नये ७ अजूबों में से एक है और आगरा की तीन विश्व सांस्कृतिक धरोहरों में से एक है। अन्य दो धरोहर आगरा किला और फतेहपुर सीकरी jay mahakal हैं।

खुलने का समय : ६ प्रातः से ७:३० साँयः (शुक्रवार बन्द)

आगरा का एक अन्य विश्व धरोहर स्थल है आगरा का किला। यह आगरा का एक प्रधान निर्माण है, जो शहर के बीचों बीच है। इसे कभी कभार लाल किला भी कहा जाता है। यह अकबर द्वारा 1565 में बनवाया गया था। बाद में शाहजहां द्वारा इस किले का पुनरोद्धार लाल बलुआ पत्थर से करवाया गया, व इसे किले से प्रासाद में बदला गया। यहां संगमरमर और पीट्रा ड्यूरा नक्काशी का क्महीन कार्य किया गया है। इस किले की मुख्य इमारतों में मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जहाँगीर महल, खास महल, शीश महल एवं मुसम्मन बुर्ज आते हैं।
 
मुगल सम्राट अकबर ने इसे 1565 में बनवाया था, जिसमें उसके पौत्र शाहजहाँ के समय तक निर्माण कार्य बढ़ते रहे। इस किले के निषिद्ध क्षेत्रों में अंदरूनी छिपा हुआ स्वर्ग जैसा स्थान है। यह किला अर्ध-चंद्राकार है, जो पूर्व में कुछ चपटा है, पास की सीधी दीवार नदी की ओर वाली है। इसकी पूरी परिधि है 2.4 किलो मीटर, जो दोहरे परकोटे वाली किलेनुमा चहारदीवारी से घिरी है। इस दीवार में छोटे अंतरालों पर बुर्जियां हैं, जिनपर रक्षा छतरियां बनीं हैं। इस दीवार  की ओर एक 9 मीटर चौड़ी व 10 मीटर गहरी खाई घेरे हुए है।
 
शिवाजी यहां 1666 में पुरंदर संधि हेतु आये थे। उनकी याद में एक बड़ी मूर्ति यहां स्थापित है। यह किला मुगल स्थापत्य कला का एक जीवंत उदाहरण है। यहीं दिखता है, कैसे उत्तर भारतीय दुर्ग शैली दक्षिण से पृथक थी। दक्षिण भारत में अनेकों दुर्ग हैं, जिनमें से अधिकांश सागर तट पर हैं।
आगरा का किला देख

मुगल सम्राट अकबर ने फतेहपुर सीकरी बसाई, व अपनी राजधानी वहां स्थानांतरित की। यह आगरा से 35 कि॰मी॰ दूर है। यहां अनेकों भव्य इमारतें बनवायीं। बाद में पानी की कमी के चलते, वापस आगरा लौटे। यहां भी बुलंद दरवाजा, एक विश्व धरोहर स्थल है।
बुलंद दरवाजा या 'उदात्त प्रवेश द्वार' मुगल सम्राट द्वारा बनाया गया था, बुलंद दरवाजा 52 कदम से संपर्क किया है। बुलंद दरवाजा 53.63 मीटर ऊँचे और 35 मीटर चौड़ा है। यह लाल और शौकीन बलुआ पत्थर से बना है, नक्काशी और काले और सफेद संगमरमर द्वारा सजाया। बुलंद दरवाजा के मध्य चेहरे पर एक शिलालेख अकबर धार्मिक समझ का दायरा दर्शाता है।

सम्राज्ञी नूरजहां ने एतमादुद्दौला का मकबरा बनवाया था। यह उसके पिता घियास-उद-दीन बेग़, जो जहाँगीर के दरबार में मंत्री भी थे, की याद में बनवाया गया था। मुगल काल के अन्य मकबरों से अपेक्षाकृत छोटा होने से, इसे कई बार श्रंगारदान भी कहा जाता है। यहां के बाग, पीट्रा ड्यूरा पच्चीकारी, व कई घटक ताजमहल से मिलते हुए हैं।

जामा मस्जिद एक विशाल मस्जिद है, जो शाहजहाँ की पुत्री, शाहजा़दी जहाँआरा बेगम़ को समर्पित है। इसका निर्माण १६४८ में हुआ था और यह अपने मीनार रहित ढाँचे तथा विशेष प्रकार के गुम्बद के लिये जानी जाती है।

चीनी का रोजा शाहजहाँ के मंत्री, अल्लामा अफज़ल खान शकरउल्ला शिराज़, को समर्पित है और अपने पारसी शिल्पकारी वाले चमकीले नीले रंग के गुम्बद के लिये दर्शनीय है।

भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान, रामबाग, मुग़ल शासक बाबर ने सन् १५२८ में बनवाया था। यह उद्यान ताजम़हल से २.३४ किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में स्थित है।

स्वामीबाग समाधि हुजूर स्वामी महाराज (श्री शिव दयाल सिंह सेठ) का स्मारक/ समाधि है। यह नगर के बाहरी क्षेत्र में है, जिसे स्वामी बाग कहते हैं। वे राधास्वामी मत के संस्थापक थे। उनकी समाधि उनके अनुयाइयों के लिये पवित्र है। इसका निर्माण 1908 में आरम्भ हुआ था और कहते हैं कि यह कभी समाप्त नहीं होगा। इसमें भी श्वेत संगमरमर का प्रयोग हुआ है। साथ ही नक्काशी व बेलबूटों के लिये रंगीन संगमरमर व कुछ अन्य रंगीन पत्थरों का प्रयोग किया गया है। यह नक्काशी व बेल बूटे एकदम जीवंत लगते हैं। यह भारत भर में कहीं नहीं दिखते हैं। पूर्ण होने पर इस समाधि पर एक नक्काशीकृत गुम्बद शिखर के साथ एक महाद्वार होगा। इसे कभी कभार दूसरा ताज भी कहा जाता है।

आगरा किला से मात्र १३ किलोमीटर की दूरी पर, सिकंदरा में महान मुगल सम्राट अकबर का मकबरा है। यह मकबरा उसके व्यक्तित्व की पूर्णता को दर्शाता है। सुंदर वृत्तखंड के आकार में, लाल बलुआ-पत्थर से निर्मित यह विशाल मकबरा हरे भरे उद्यान के बीच स्थित है। अकबर ने स्वयं ही अपने मकबरे की रूपरेखा तैयार करवाई थी और स्थान का चुनाव भी उसने स्वयं ही किया था। अपने जीवनकाल में ही अपने मकबरे का निर्माण करवाना एक तुर्की प्रथा थी, जिसका मुगल शासकों ने धर्म की तरह पालन किया। अकबर के पुत्र जहाँगीऱ ने इस मकबरे का निर्माण कार्य १६१३ में संपन्न कराया।

मरियम मकबरा, अकबर की राजपूत (आमेर के राजा भारमल की पुत्री हरखू बाई) बेग़म का मकबरा है, इस बेगम को अकबर ने मरियम मकानी अर्थात संसार की माँ की उपाधि या उपनाम दिया था । यह मकबरा आगरा और सिकन्दरा के बीच में है।

मेहताब बाग, यमुना के ताजमहल से विपरीत दूसरे किनारे पर है।

ताजमहल और अन्य ऐतिहासिक स्मारकों की उपस्थिति के कारण, आगरा में एक समृद्ध पर्यटन उद्योग है। इसके अतिरिक्त यहाँ पर्चिनकारी, संगमरमर की जड़ों और कालीन संबंधित उद्योग भी हैं।

आगरा वित्तीय पैठ सूचकांक, जो एटीएम और बैंक शाखाओं की उपस्थिति पर चीजों को मापता है, और खपत सूचकांक, जो क्षेत्र के नगरीकरण का संकेत देता है, दोनों में भारत में पांचवें स्थान पर है। भारत के शहर प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक में, नगर २०१० में २६वें स्थान पर, २०११ में ३२वें स्थान पर, और २०१२ में ३७वें स्थान पर था।

आगरा की लगभग ४०% जनसंख्या काफी हद तक कृषि पर, चमड़े और जूते के व्यापार पर, और लोहे की ढलाई पर निर्भर करती है। वाराणसी के बाद २००७ में भारत में आगरा दूसरा सबसे अधिक स्वरोजगार वाला नगर था। राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षण संगठन के अनुसार नगर में १९९९-२००० में प्रत्येक १,००० नियोजित पुरुषों में से स्व-नियोजित पुरुषों की संख्या ४३१ थी, जो २००४–०५ में बढ़कर ६०३ व्यक्ति प्रति १,००० तक हो गयी। आगरा की अर्थव्यवस्था में पर्यटन का प्रमुख योगदान है। आईएचसीएल द्वारा निर्मित ताजव्यू होटल शहर में खुले पांच सितारा श्रेणी के होटलों में पहला था। एशिया का सबसे बड़ा स्पा काया कल्प - द रॉयल स्पा आगरा के मुगल होटल में है।

आगरा में कई उद्योग हैं। उत्तर प्रदेश की पहली प्लांट बायोटेक कंपनी हरिहर बायोटेक ताज के पास स्थित है। लगभग ७,००० लघु उद्योग इकाइयाँ हैं। आगरा शहर अपने चमड़े के सामानों के लिए भी जाना जाता है, सबसे पुराना और प्रसिद्ध चमड़ा फर्म ताज लेदर वर्ल्ड सदर बाजार में है। इसके अतिरिक्त यहाँ कालीन, हस्तशिल्प, जरी और जरदोजी (कढ़ाई का काम), संगमरमर और पत्थर की नक्काशी संबंधित उद्योग भी स्थित हैं। आगरा अपनी मिठाइयों (पेठा और गजक) और स्नैक्स (दालमोठ), कपड़ा निर्माताओं और निर्यातकों और ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए जाना जाता है। मुगल सम्राट बाबर द्वारा नगर के कालीन उद्योग की नींव रखी गई थी और तब से यह कला फल-फूल रही है।

आगरा में सिटी सेंटर स्थान पर आभूषण और कपड़ों की दुकानें हैं। सिल्वर और गोल्ड ज्वैलरी हब चौबे जी का फाटक पर है। शाह मार्केट क्षेत्र एक इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार है जबकि संजय प्लेस आगरा का व्यापारिक केंद्र है।

मुग़ल काल से ही आगरा इस्लाम की शिक्षा का एक केंद्र रहा है। ब्रिटिश शासन के समय अंग्रेज़ों ने यहाँ आगरा में पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा दिया। वर्ष १८२३ में यहां भारत के प्राचीनतम महाविद्यालयों में प्रमुख आगरा कॉलेज आगरा की स्थापना हुई । अन्य प्रमुख महाविद्यालय हैं राजा बलबंत सिंह महाविद्यालय, जिसे क्षेत्रफल की दृष्टि से एशिया के सबसे बड़े महाविद्यालय होने का गौरव प्राप्त है, सेंट जोन्स कॉलेज, बैकुंठी देवी कन्या महाविद्यालय, तथा बी डी जैन कन्या महाविद्यालय। यह सभी महाविद्यालय बी आर अम्बेडकर विश्वविद्यालय ( पूर्व में आगरा विश्वविद्यालय)से सम्बद्ध हैं।  आगरा स्थित एक अन्य प्रमुख विश्वविद्यालय है दयालबाग विश्व विद्यालय ।भारतीय लेखकों में प्रमुख बाबू गुलाबराय की जन्म और कर्म भूमि यही थी। वर्तमान में यहाँ माध्यमिक शिक्षा परिषद् (यू.पी. बोर्ड), इलाहाबाद; केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई. बोर्ड), दिल्ली; और आई.सी.एस.ई. बोर्ड से सम्बद्ध हिन्दी व अंग्रेजी माध्यम के कई विद्यालय हैं:

आगरा जिले में प्रमुख रूप से हिंदी दैनिक जैसे कि अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान (समाचार पत्र), आज, दाता सन्देश, दीपशील भारत इत्यादि समाचार-पत्र प्रकाशित होते हैं।

आगरा शहर प्रमुख शहर दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, मेरठ, हरिद्वार, देहरादून एवं जयपुर आदि शहरों से सीधे रेल एवम् सड़क मार्ग द्वारा चौबीसों घंटे जुड़ा हुआ है। दिल्ली-मुम्बई एवम् दिल्ली-चेन्नई के लिए मध्य-पश्चिम एवम् मध्य-दक्षिण रेलवे नेटवर्क है। दिल्ली से आगरा के लिये रा.राजमार्ग-2 है जिसकी दूरी 200 कि॰मी॰ है जो कि लगभग 4 घंटे में तय की जाती है।

आगरा में भारतीय रेलवे द्वारा संचालित ५ रेलवे स्टेशन हैं। ये सभी रेलवे के उत्तर-मध्य अंचल के आगरा मण्डल के अंतर्गत आते हैं। आगरा में उत्तर-दक्षिण दिशा में एक ब्रॉड गेज रेलवे लाइन है, जो पूर्व-पश्चिम दिशा की एक अन्य ब्रॉड गेज लाइन को काटती है। दोनों की क्रॉसिंग रुई की मंडी क्षेत्र के आसपास होती है, जहां पूर्व-पश्चिम लाइन उत्तर-दक्षिण लाइन के नीचे से गुजरती है। उत्तर-दक्षिण दिशा की लाइन उत्तर की ओर से दिल्ली से आती है, और आगरा छावनी रेलवे स्टेशन होते हुए दक्षिण में ग्वालियर की ओर निकल जाती है। इस लाइन पर राजा की मण्डी रेलवे स्टेशन से एक ब्रांच लाइन पूर्व की ओर निकलती है, जिस पर आगरा सिटी रेलवे स्टेशन स्थित है। पश्चिम दिशा से भरतपुर और बयाना से क्रमशः दो ब्रॉड गेज लाइनें आती हैं। ये दोनों लाइनें सिंगल लाइन हैं हालाँकि बाद वाली लाइन विद्युतीकृत है। ये दोनों लाइनें ईदगाह जंक्शन रेलवे स्टेशन से ठीक पहले मिल जाती हैं, और फिर आगरा फोर्ट के रास्ते टुंडला जंक्शन की ओर पूर्व दिशा में आगे बढ़ते हुए दिल्ली - हावड़ा मुख्य लाइन का हिस्सा बनती हैं।

खेरिया हवाई अड्डा




#Article 58: शास्त्रीय संगीत (650 words)


भारतीय शास्त्रीय संगीत या मार्ग, भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है। शास्त्रीय संगीत को ही ‘क्लासिकल म्यूजिक भी कहते हैं। शास्त्रीय गायन ध्वनि-प्रधान होता है, शब्द-प्रधान नहीं। इसमें महत्व ध्वनि का होता है (उसके चढ़ाव-उतार का, शब्द और अर्थ का नहीं)। इसको जहाँ शास्त्रीय संगीत-ध्वनि विषयक साधना के अभ्यस्त कान ही समझ सकते हैं, अनभ्यस्त कान भी शब्दों का अर्थ जानने मात्र से देशी गानों या लोकगीत का सुख ले सकते हैं। इससे अनेक लोग स्वाभाविक ही ऊब भी जाते हैं पर इसके ऊबने का कारण उस संगीतज्ञ की कमजोरी नहीं, लोगों में जानकारी की कमी है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की परम्परा भरत मुनि के नाट्यशास्त्र और उससे पहले सामवेद के गायन तक जाती है। भरत मुनि द्वारा रचित भरत नाट्य शास्त्र, भारतीय संगीत के इतिहास का प्रथम लिखित प्रमाण माना जाता है। इसकी रचना के समय के बारे में कई मतभेद हैं। आज के भारतीय शास्त्रीय संगीत के कई पहलुओं का उल्लेख इस प्राचीन ग्रंथ में मिलता है। भरत मुनि के नाटयशास्त्र के बाद मतंग मुनि की बृहद्देशी और शारंगदेव रचित संगीत रत्नाकर, ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। बारहवीं सदी के पूर्वार्द्ध में लिखे सात अध्यायों वाले इस ग्रंथ में संगीत व नृत्य का विस्तार से वर्णन है।

संगीत रत्नाकर में कई तालों का उल्लेख है व इस ग्रंथ से पता चलता है कि प्राचीन भारतीय पारंपरिक संगीत में बदलाव आने शुरू हो चुके थे व संगीत पहले से उदार होने लगा था मगर मूल तत्व एक ही रहे। 11वीं और 12वीं शताब्दी में मुस्लिम सभ्यता के प्रसार ने उत्तर भारतीय संगीत की दिशा को नया आयाम दिया। राजदरबार संगीत के प्रमुख संरक्षक बने और जहां अनेक शासकों ने प्राचीन भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा को प्रोत्साहन दिया वहीं अपनी आवश्यकता और रुचि के अनुसार उन्होंने इसमें अनेक परिवर्तन भी किए। इसी समय कुछ नई शैलियाँ भी प्रचलन में आईं जैसे खयाल, गज़ल आदि और भारतीय संगीत का कई नये वाद्यों से भी परिचय हुआ जैसे सरोद, सितार इत्यादि। 

भारतीय संगीत के आधुनिक मनीषी स्थापित कर चुके हैं कि वैदिक काल से आरम्भ हुई भारतीय वाद्यों की यात्रा क्रमश: एक के बाद दूसरी विशेषता से इन यंत्रों को सँवारती गयी। एक-तंत्री वीणा ही त्रितंत्री बनी और सारिका युक्त होकर मध्य-काल के पूर्व किन्नरी वीणा के नाम से प्रसिद्ध हुई। मध्यकाल में यह यंत्र जंत्र कहलाने लगा जो बंगाल के कारीगरों द्वारा आज भी इस नाम से पुकारा जाता है। भारत में पहुँचे मुस्लिम संगीतकार तीन तार वाली वीणा को सह (तीन) + तार = सहतार या सितार कहने लगे। इसी प्रकार सप्त तंत्री अथवा चित्रा-वीणा, सरोद कहलाने लगी। उत्तर भारत में मुगल राज्य ज्यादा फैला हुआ था जिस कारण उत्तर भारतीय संगीत पर मुसलिम संस्कृति व इस्लाम का प्रभाव ज्यादा महसूस किया गया। जबकि दक्षिण भारत में प्रचलित संगीत किसी प्रकार के मुस्लिम प्रभाव से अछूता रहा।

बाद में सूफी आन्दोलन ने भी भारतीय संगीत पर अपना प्रभाव जमाया। आगे चलकर देश के विभिन्न हिस्सों में कई नई पद्धतियों व घरानों का जन्म हुआ। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान कई नये वाद्य प्रचलन में आए पाश्चात्य संगीत से भी भारतीय संगीत का परिचय हुआ। आम जनता में लोकप्रिय आज का वाद्य हारमोनियम, उसी समय प्रचलन में आया। इस तरह भारतीय संगीत के उत्थान व उसमें परिवर्तन लाने में हर युग का अपना महत्वपूर्ण योगदान रहा। 

आमतौर पर हिन्दुस्तानी संगीत में इस्तेमाल किए गए उपकरणों में सितार, सरोद, सुरबहार, ईसराज, वीणा, तनपुरा, बन्सुरी, शहनाई, सारंगी, वायलिन, संतूर, पखवज और तबला शामिल हैं। आमतौर पर कर्नाटिक संगीत में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों में वीना, वीनू, गोत्वादम, हार्मोनियम, मृदंगम, कंजिर, घमत, नादाश्वरम और वायलिन शामिल हैं।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख पद्धतियां हैं- हिन्दुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत।

यह शास्त्रीय संगीत, उत्तर भारत में प्रचलित हुआ। 

यह दक्षिण भारत में प्रचलित हुआ। हिन्दुस्तानी संगीत मुगल बादशाहों की छत्रछाया में विकसित हुआ और कर्नाटक संगीत दक्षिण के मन्दिरों में। इसी कारण दक्षिण भारतीय कृतियों में भक्ति रस अधिक मिलता है और हिन्दुस्तानी संगीत में शृंगार रस।

राग हंसध्वनि




#Article 59: महात्मा गांधी (10503 words)


 

मोहनदास करमचन्द गांधी (जन्म:2 अक्टूबर १८६९; निधन:३० जनवरी १९४८) जिन्हें महात्मा गांधी के नाम से भी जाना जाता है, भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे, उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया। उन्हें दुनिया में आम जनता महात्मा गांधी के नाम से जानती है। संस्कृत भाषा में महात्मा अथवा महान आत्मा एक सम्मान सूचक शब्द है। गांधी को महात्मा के नाम से सबसे पहले १९१५ में राजवैद्य जीवराम कालिदास ने संबोधित किया था। एक अन्य मत के अनुसार स्वामी श्रद्धानन्द ने 1915 मे महात्मा की उपाधि दी थी, तीसरा मत ये है कि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने महात्मा की उपाधि प्रदान की थी 12अप्रैल 1919 को अपने एक लेख मे | । उन्हें बापू (गुजराती भाषा में બાપુ बापू यानी पिता) के नाम से भी याद किया जाता है। एक मत के अनुसार गांधीजी को बापू सम्बोधित करने वाले प्रथम व्यक्ति उनके साबरमती आश्रम के शिष्य थे सुभाष चन्द्र बोस ने ६ जुलाई १९४४ को रंगून रेडियो से गांधी जी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित करते हुए आज़ाद हिन्द फौज़ के सैनिकों के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं थीं। प्रति वर्ष २ अक्टूबर को उनका जन्म दिन भारत में गांधी जयंती के रूप में और पूरे विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के नाम से मनाया जाता है।

सबसे पहले गान्धी जी ने प्रवासी वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों के नागरिक अधिकारों के लिये संघर्ष हेतु सत्याग्रह करना शुरू किया। १९१५ में उनकी भारत वापसी हुई। उसके बाद उन्होंने यहाँ के किसानों, मजदूरों और शहरी श्रमिकों को अत्यधिक भूमि कर और भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाने के लिये एकजुट किया। १९२१ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर संभालने के बाद उन्होंने देशभर में गरीबी से राहत दिलाने, महिलाओं के अधिकारों का विस्तार, धार्मिक एवं जातीय एकता का निर्माण व आत्मनिर्भरता के लिये अस्पृश्‍यता के विरोध में अनेकों कार्यक्रम चलाये। इन सबमें विदेशी राज से मुक्ति दिलाने वाला स्वराज की प्राप्ति वाला कार्यक्रम ही प्रमुख था। गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों पर लगाये गये नमक कर के विरोध में १९३० में नमक सत्याग्रह और इसके बाद १९४२ में अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन से खासी प्रसिद्धि प्राप्त की। दक्षिण अफ्रीका और भारत में विभिन्न अवसरों पर कई वर्षों तक उन्हें जेल में भी रहना पड़ा।

गांधी जी ने सभी परिस्थितियों में अहिंसा और सत्य का पालन किया और सभी को इनका पालन करने के लिये वकालत भी की। उन्होंने साबरमती आश्रम में अपना जीवन गुजारा और परम्परागत भारतीय पोशाक धोती व सूत से बनी शाल पहनी जिसे वे स्वयं चरखे पर सूत कातकर हाथ से बनाते थे। उन्होंने सादा शाकाहारी भोजन खाया और आत्मशुद्धि के लिये लम्बे-लम्बे उपवास रखे।

मोहनदास करमचन्द गान्धी का जन्म पश्चिमी भारत में वर्तमान गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर नामक स्थान पर २ अक्टूबर सन् १८६९ को हुआ था। उनके पिता करमचन्द गान्धी सनातन धर्म की पंसारी जाति से सम्बन्ध रखते थे और ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान अर्थात् प्रधान मन्त्री थे। गुजराती भाषा में गान्धी का अर्थ है पंसारी जबकि हिन्दी भाषा में गन्धी का अर्थ है इत्र फुलेल बेचने वाला जिसे अंग्रेजी में परफ्यूमर कहा जाता है। उनकी माता पुतलीबाई परनामी वैश्य समुदाय की थीं। पुतलीबाई करमचन्द की चौथी पत्नी थी। उनकी पहली तीन पत्नियाँ प्रसव के समय मर गयीं थीं। भक्ति करने वाली माता की देखरेख और उस क्षेत्र की जैन परम्पराओं के कारण युवा मोहनदास पर वे प्रभाव प्रारम्भ में ही पड़ गये थे जिसने आगे चलकर महात्मा गांधी के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इन प्रभावों में शामिल थे दुर्बलों में जोश की भावना, शाकाहारी जीवन, आत्मशुद्धि के लिये उपवास तथा विभिन्न जातियों के लोगों के बीच सहिष्णुता। 

मई १८८३ में साढे १३ साल की आयु पूर्ण करते ही उनका विवाह १४ साल की कस्तूर बाई मकनजी से कर दिया गया। पत्नी का पहला नाम छोटा करके कस्तूरबा कर दिया गया और उसे लोग प्यार से बा कहते थे। यह विवाह उनके माता पिता द्वारा तय किया गया व्यवस्थित बाल विवाह था जो उस समय उस क्षेत्र में प्रचलित था। लेकिन उस क्षेत्र में यही रीति थी कि किशोर दुल्हन को अपने माता पिता के घर और अपने पति से अलग अधिक समय तक रहना पड़ता था। १८८५ में जब गान्धी जी १५ वर्ष के थे तब इनकी पहली सन्तान ने जन्म लिया। लेकिन वह केवल कुछ दिन ही जीवित रही। और इसी साल उनके पिता करमचन्द गांधी भी चल बसे। मोहनदास और कस्तूरबा के चार सन्तान हुईं जो सभी पुत्र थे। हरीलाल गान्धी १८८८ में, मणिलाल गान्धी १८९२ में, रामदास गान्धी १८९७ में और देवदास गांधी १९०० में जन्मे। पोरबंदर से उन्होंने मिडिल और राजकोट से हाई स्कूल किया। दोनों परीक्षाओं में शैक्षणिक स्तर वह एक औसत छात्र रहे। मैट्रिक के बाद की परीक्षा उन्होंने भावनगर के शामलदास कॉलेज से कुछ परेशानी के साथ उत्तीर्ण की। जब तक वे वहाँ रहे अप्रसन्न ही रहे क्योंकि उनका परिवार उन्हें बैरिस्टर बनाना चाहता था।

अपने १९वें जन्मदिन से लगभग एक महीने पहले ही ४ सितम्बर १८८८ को गांधी यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये इंग्लैंड चले गये। भारत छोड़ते समय जैन भिक्षु बेचारजी के समक्ष हिन्दुओं को मांस, शराब तथा संकीर्ण विचारधारा को त्यागने के लिए अपनी अपनी माता जी को दिए गये एक वचन ने उनके शाही राजधानी लंदन में बिताये गये समय को काफी प्रभावित किया। हालांकि गांधी जी ने अंग्रेजी रीति रिवाजों का अनुभव भी किया जैसे उदाहरण के तौर पर नृत्य कक्षाओं में जाने आदि का। फिर भी वह अपनी मकान मालकिन द्वारा मांस एवं पत्ता गोभी को हजम.नहीं कर सके। उन्होंने कुछ शाकाहारी भोजनालयों की ओर इशारा किया। अपनी माता की इच्छाओं के बारे में जो कुछ उन्होंने पढा था उसे सीधे अपनाने की बजाय उन्होंने बौद्धिकता से शाकाहारी भोजन का अपना भोजन स्वीकार किया। उन्होंने शाकाहारी समाज की सदस्यता ग्रहण की और इसकी कार्यकारी समिति के लिये उनका चयन भी हो गया जहाँ उन्होंने एक स्थानीय अध्याय की नींव रखी। बाद में उन्होने संस्थाएँ गठित करने में महत्वपूर्ण अनुभव का परिचय देते हुए इसे श्रेय दिया। वे जिन शाकाहारी लोगों से मिले उनमें से कुछ थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य भी थे। इस सोसाइटी की स्थापना १८७५ में विश्व बन्धुत्व को प्रबल करने के लिये की गयी थी और इसे बौद्ध धर्म एवं सनातन धर्म के साहित्य के अध्ययन के लिये समर्पित किया गया था।

उन्हों लोगों ने गांधी जी को श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने के लिये प्रेरित किया। हिन्दू, ईसाई, बौद्ध, इस्लाम और अन्य धर्मों .के बारे में पढ़ने से पहले गांधी ने धर्म में विशेष रुचि नहीं दिखायी। इंग्लैंड और वेल्स बार एसोसिएशन में वापस बुलावे पर वे भारत लौट आये किन्तु बम्बई में वकालत करने में उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। बाद में एक हाई स्कूल शिक्षक के रूप में अंशकालिक नौकरी का प्रार्थना पत्र अस्वीकार कर दिये जाने पर उन्होंने जरूरतमन्दों के लिये मुकदमे की अर्जियाँ लिखने के लिये राजकोट को ही अपना स्थायी मुकाम बना लिया। परन्तु एक अंग्रेज अधिकारी की मूर्खता के कारण उन्हें यह कारोबार भी छोड़ना पड़ा। अपनी आत्मकथा में उन्होंने इस घटना का वर्णन अपने बड़े भाई की ओर से परोपकार की असफल कोशिश के रूप में किया है। यही वह कारण था जिस वजह से उन्होंने सन् १८९३ में एक भारतीय फर्म से नेटाल दक्षिण अफ्रीका में, जो उन दिनों ब्रिटिश साम्राज्य का भाग होता था, एक वर्ष के करार पर वकालत का कारोवार स्वीकार कर लिया।

 
दक्षिण अफ्रीका में गान्धी को भारतीयों पर भेदभाव का सामना करना पड़ा। आरम्भ में उन्हें प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इन्कार करने के लिए ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था। इतना ही नहीं पायदान पर शेष यात्रा करते हुए एक यूरोपियन यात्री के अन्दर आने पर चालक की मार भी झेलनी पड़ी। उन्होंने अपनी इस यात्रा में अन्य भी कई कठिनाइयों का सामना किया। अफ्रीका में कई होटलों को उनके लिए वर्जित कर दिया गया। इसी तरह ही बहुत सी घटनाओं में से एक यह भी थी जिसमें अदालत के न्यायाधीश ने उन्हें अपनी पगड़ी उतारने का आदेश दिया था जिसे उन्होंने नहीं माना। ये सारी घटनाएँ गान्धी के जीवन में एक मोड़ बन गईं और विद्यमान सामाजिक अन्याय के प्रति जागरुकता का कारण बनीं तथा सामाजिक सक्रियता की व्याख्या करने में मददगार सिद्ध हुईं। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अन्याय को देखते हुए गान्धी ने अंग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत अपने देशवासियों के सम्मान तथा देश में स्वयं अपनी स्थिति के लिए प्रश्न उठाये।

१९०६ में, ज़ुलु () दक्षिण अफ्रीका में नए चुनाव कर के लागू करने के बाद दो अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला गया। बदले में अंग्रेजों ने जूलू के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। गांधी जी ने भारतीयों को भर्ती करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों को सक्रिय रूप से प्रेरित किया। उनका तर्क था अपनी नागरिकता के दावों को कानूनी जामा पहनाने के लिए भारतीयों को युद्ध प्रयासों में सहयोग देना चाहिए। तथापि, अंग्रेजों ने अपनी सेना में भारतीयों को पद देने से इंकार कर दिया था। इसके बावजूद उन्होने गांधी जी के इस प्रस्ताव को मान लिया कि भारतीय घायल अंग्रेज सैनिकों को उपचार के लिए स्टेचर पर लाने के लिए स्वैच्छा पूर्वक कार्य कर सकते हैं। इस कोर की बागडोर गांधी ने थामी।२१ जुलाई (July 21), १९०६ को गांधी जी ने भारतीय जनमत इंडियन ओपिनिय () में लिखा कि २३ भारतीय निवासियों के विरूद्ध चलाए गए आप्रेशन के संबंध में प्रयोग द्वारा नेटाल सरकार के कहने पर एक कोर का गठन किया गया है।दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों से इंडियन ओपिनियन में अपने कॉलमों के माध्‍यम से इस युद्ध में शामिल होने के लिए आग्रह किया और कहा, यदि सरकार केवल यही महसूस करती हे कि आरक्षित बल बेकार हो रहे हैं तब वे इसका उपयोग करेंगे और असली लड़ाई के लिए भारतीयों का प्रशिक्षण देकर इसका अवसर देंगे।

गांधी की राय में, १९०६ का मसौदा अध्यादेश भारतीयों की स्थिति में किसी निवासी के नीचे वाले स्तर के समान लाने जैसा था। इसलिए उन्होंने सत्याग्रह (), की तर्ज पर काफिर ()s  .का उदाहरण देते हुए भारतीयों से अध्यादेश का विरोध करने का आग्रह किया। उनके शब्दों में,  यहाँ तक कि आधी जातियां और काफिर जो हमसे कम आधुनिक हैं ने भी सरकार का विरोध किया है। पास का नियम उन पर भी लागू होता है किंतु वे पास नहीं दिखाते हैं।

गांधी १९१५ में दक्षिण अफ्रीका से भारत में रहने के लिए लौट आए। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों पर अपने विचार व्य‍क्त किए, लेकिन उनके विचार भारत के मुख्य मुद्दों, राजनीति तथा उस समय के कांग्रेस दल के प्रमुख भारतीय नेता गोपाल कृष्ण गोखले  पर ही आधारित थे जो एक सम्मानित नेता थे। 

 
गांधी की पहली बड़ी उपलब्धि १९१८ में चम्पारन सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह  में मिली हालांकि अपने निर्वाह के लिए जरूरी खाद्य फसलों की बजाए नील () नकद पैसा देने वाली खाद्य फसलों की खेती वाले आंदोलन भी महत्वपूर्ण रहे। जमींदारों (अधिकांश अंग्रेज) की ताकत से दमन हुए भारतीयों को नाममात्र भरपाई भत्ता दिया गया जिससे वे अत्यधिक गरीबी से घिर गए। गांवों को बुरी तरह गंदा और अस्वास्थ्यकर (); और शराब, अस्पृश्यता और पर्दा से बांध दिया गया। अब एक विनाशकारी अकाल के कारण शाही कोष की भरपाई के लिए अंग्रेजों ने दमनकारी कर लगा दिए जिनका बोझ दिन प्रतिदिन बढता ही गया। यह स्थिति निराशजनक थी। खेड़ा (), गुजरात में भी यही समस्या थी। गांधी जी ने वहां एक आश्रम () बनाया जहाँ उनके बहुत सारे समर्थकों और नए स्वेच्छिक कार्यकर्ताओं को संगठित किया गया। उन्होंने गांवों का एक विस्तृत अध्ययन और सर्वेक्षण किया जिसमें प्राणियों पर हुए अत्याचार के भयानक कांडों का लेखाजोखा रखा गया और इसमें लोगों की अनुत्पादकीय सामान्य अवस्था को भी शामिल किया गया था। ग्रामीणों में विश्‍वास पैदा करते हुए उन्होंने अपना कार्य गांवों की सफाई करने से आरंभ किया जिसके अंतर्गत स्कूल और अस्पताल बनाए गए और उपरोक्त वर्णित बहुत सी सामाजिक बुराईयों को समाप्त करने के लिए ग्रामीण नेतृत्व प्रेरित किया।

लेकिन इसके प्रमुख प्रभाव उस समय देखने को मिले जब उन्हें अशांति फैलाने के लिए पुलिस ने गिरफ्तार किया और उन्हें प्रांत छोड़ने के लिए आदेश दिया गया। हजारों की तादाद में लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए ओर जेल, पुलिस स्टेशन एवं अदालतों के बाहर रैलियां निकालकर गांधी जी को बिना शर्त रिहा करने की मांग की। गांधी जी ने जमींदारों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन और हड़तालों को का नेतृत्व किया जिन्होंने अंग्रेजी सरकार के मार्गदर्शन में उस क्षेत्र के गरीब किसानों को अधिक क्षतिपूर्ति मंजूर करने तथा खेती पर नियंत्रण, राजस्व में बढोतरी को रद्द करना तथा इसे संग्रहित करने वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस संघर्ष के दौरान ही, गांधी जी को जनता ने बापू पिता और महात्मा (महान आत्मा) के नाम से संबोधित किया। खेड़ा में सरदार पटेल ने अंग्रेजों के साथ विचार विमर्श के लिए किसानों का नेतृत्व किया जिसमें अंग्रेजों ने राजस्व संग्रहण से मुक्ति देकर सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप, गांधी की ख्याति देश भर में फैल गई।

गांधी जी ने असहयोग, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार को अंग्रेजों के खिलाफ़ शस्त्र के रूप में उपयोग किया। पंजाब में अंग्रेजी फोजों द्वारा भारतीयों पर जलियावांला नरसंहार जिसे अमृतसर नरसंहार के नाम से भी जाना जाता है ने देश को भारी आघात पहुँचाया जिससे जनता में क्रोध और हिंसा की ज्वाला भड़क उठी। गांधीजी ने ब्रिटिश राज तथा भारतीयों द्वारा ‍प्रतिकारात्मक रवैया दोनों की की। उन्होंने ब्रिटिश नागरिकों तथा दंगों के शिकार लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की तथा पार्टी के आरम्भिक विरोध के बाद दंगों की भंर्त्सना की। गांधी जी के भावनात्मक भाषण के बाद अपने सिद्धांत की वकालत की कि सभी हिंसा और बुराई को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। किंतु ऐसा इस नरसंहार और उसके बाद हुई हिंसा से गांधी जी ने अपना मन संपूर्ण सरकार आर भारतीय सरकार के कब्जे वाली संस्थाओं पर संपूर्ण नियंत्रण लाने पर केंद्रित था जो जल्‍दी ही स्वराज अथवा संपूर्ण व्यक्तिगत, आध्‍यात्मिक एवं राजनैतिक आजादी में बदलने वाला था।

दिसम्बर १९२१ में गांधी जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस.का कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में कांग्रेस को स्वराज.के नाम वाले एक नए उद्देश्‍य के साथ संगठित किया गया। पार्दी में सदस्यता सांकेतिक शुल्क का भुगताने पर सभी के लिए खुली थी। पार्टी को किसी एक कुलीन संगठन की न बनाकर इसे राष्ट्रीय जनता की पार्टी बनाने के लिए इसके अंदर अनुशासन में सुधार लाने के लिए एक पदसोपान समिति गठित की गई। गांधी जी ने अपने अहिंसात्मक मंच को स्वदेशी नीति — में शामिल करने के लिए विस्तार किया जिसमें विदेशी वस्तुओं विशेषकर अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करना था। इससे जुड़ने वाली उनकी वकालत का कहना था कि सभी भारतीय अंग्रेजों द्वारा बनाए वस्त्रों की अपेक्षा हमारे अपने लोगों द्वारा हाथ से बनाई गई खादी पहनें। गांधी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन को सहयोग देने के लिएपुरूषों और महिलाओं को प्रतिदिन खादी के लिए सूत कातने में समय बिताने के लिए कहा। यह अनुशासन और समर्पण लाने की ऐसी नीति थी जिससे अनिच्छा और महत्वाकाक्षा को दूर किया जा सके और इनके स्थान पर उस समय महिलाओं को शामिल किया जाए जब ऐसे बहुत से विचार आने लगे कि इस प्रकार की गतिविधियां महिलाओं के लिए सम्मानजनक नहीं हैं। इसके अलावा गांधी जी ने ब्रिटेन की शैक्षिक संस्थाओं तथा अदालतों का बहिष्कार और सरकारी नौकरियों को छोड़ने का तथा सरकार से प्राप्त तमगों और सम्मान () को वापस लौटाने का भी अनुरोध किया।

असहयोग को दूर-दूर से अपील और सफलता मिली जिससे समाज के सभी वर्गों की जनता में जोश और भागीदारी बढ गई। फिर जैसे ही यह आंदोलन अपने शीर्ष पर पहुँचा वैसे फरवरी १९२२ में इसका अंत चौरी-चोरा, उत्तरप्रदेश में भयानक द्वेष के रूप में अंत हुआ। आंदोलन द्वारा हिंसा का रूख अपनाने के डर को ध्‍यान में रखते हुए और इस पर विचार करते हुए कि इससे उसके सभी कार्यों पर पानी फिर जाएगा, गांधी जी ने व्यापक असहयोग के इस आंदोलन को वापस ले लिया। गांधी पर गिरफ्तार किया गया १० मार्च, १९२२, को राजद्रोह के लिए गांधी जी पर मुकदमा चलाया गया जिसमें उन्हें छह साल कैद की सजा सुनाकर जैल भेद दिया गया। १८ मार्च, १९२२ से लेकर उन्होंने केवल २ साल ही जैल में बिताए थे कि उन्हें फरवरी १९२४ में आंतों के ऑपरेशन के लिए रिहा कर दिया गया।

गांधी जी के एकता वाले व्यक्तित्व के बिना इंडियन नेशनल कांग्रेस उसके जेल में दो साल रहने के दौरान ही दो दलों में बंटने लगी जिसके एक दल का नेतृत्व सदन में पार्टी की भागीदारी के पक्ष वाले चित्त रंजन दास तथा मोतीलाल नेहरू ने किया तो दूसरे दल का नेतृत्व इसके विपरीत चलने वाले चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया। इसके अलावा, हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अहिंसा आंदोलन की चरम सीमा पर पहुँचकर सहयोग टूट रहा था। गांधी जी ने इस खाई को बहुत से साधनों से भरने का प्रयास किया जिसमें उन्होंने १९२४ की बसंत में सीमित सफलता दिलाने वाले तीन सप्ताह का उपवास करना भी शामिल था।

गांधी जी सक्रिय राजनीति से दूर ही रहे और १९२० की अधिकांश अवधि तक वे स्वराज पार्टी और इंडियन नेशनल कांग्रेस के बीच खाई को भरने में लगे रहे और इसके अतिरिक्त वे अस्पृश्यता, शराब, अज्ञानता और गरीबी के खिलाफ आंदोलन छेड़ते भी रहे। उन्होंने पहले १९२८ में लौटे .एक साल पहले अंग्रेजी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक नया संवेधानिक सुधार आयोग बनाया जिसमें एक भी सदस्य भारतीय नहीं था। इसका परिणाम भारतीय राजनैतिक दलों द्वारा बहिष्कार निकला। दिसम्बर १९२८ में गांधी जी ने कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस के एक अधिवेशन में एक प्रस्ताव रखा जिसमें भारतीय साम्राज्य को सत्ता प्रदान करने के लिए कहा गया था अथवा ऐसा न करने के बदले अपने उद्देश्य के रूप में संपूर्ण देश की आजादी के लिए असहयोग आंदोलन का सामना करने के लिए तैयार रहें। गांधी जी ने न केवल युवा वर्ग सुभाष चंद्र बोस तथा जवाहरलाल नेहरू जैसे पुरूषों द्वारा तत्काल आजादी की मांग के विचारों को फलीभूत किया बल्कि अपनी स्वयं की मांग को दो साल की बजाए एक साल के लिए रोक दिया। अंग्रेजों ने कोई जवाब नहीं दिया।.नहीं ३१ दिसम्बर १९२९, भारत का झंडा फहराया गया था लाहौर में है।२६ जनवरी १९३० का दिन लाहौर में भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने मनाया। यह दिन लगभग प्रत्येक भारतीय संगठनों द्वारा भी मनाया गया। इसके बाद गांधी जी ने मार्च १९३० में नमक पर कर लगाए जाने के विरोध में नया सत्याग्रह चलाया जिसे १२ मार्च से ६ अप्रेल तक नमक आंदोलन के याद में ४०० किलोमीटर (२४८ मील) तक का सफर अहमदाबाद से दांडी, गुजरात तक चलाया गया ताकि स्वयं नमक उत्पन्न किया जा सके। समुद्र की ओर इस यात्रा में हजारों की संख्‍या में भारतीयों ने भाग लिया। भारत में अंग्रेजों की पकड़ को विचलित करने वाला यह एक सर्वाधिक सफल आंदोलन था जिसमें अंग्रेजों ने ८०,००० से अधिक लोगों को जेल भेजा।

लार्ड एडवर्ड इरविन द्वारा प्रतिनिधित्व वाली सरकार ने गांधी जी के साथ विचार विमर्श करने का निर्णय लिया। यह इरविन गांधी की सन्धि मार्च १९३१ में हस्ताक्षर किए थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन को बंद करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने सभी राजनैतिक कैदियों को रिहा करने के लिए अपनी रजामन्दी दे दी। इस समझौते के परिणामस्वरूप गांधी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन में आयोजित होने वाले गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमन्त्रित किया गया। यह सम्मेलन गांधी जी और राष्ट्रीयवादी लोगों के लिए घोर निराशाजनक रहा, इसका कारण सत्ता का हस्तांतरण करने की बजाय भारतीय कीमतों एवं भारतीय अल्पसंख्‍यकों पर केन्द्रित होना था। इसके अलावा, लार्ड इरविन के उत्तराधिकारी लार्ड विलिंगटन, ने राष्‍ट्रवादियों के आंदोलन को नियंत्रित एवं कुचलने का एक नया अभियान आरम्भ करदिया। गांधी फिर से गिरफ्तार कर लिए गए और सरकार ने उनके अनुयाईयों को उनसे पूर्णतया दूर रखते हुए गांधी जी द्वारा प्रभावित होने से रोकने की कोशिश की। लेकिन, यह युक्ति सफल नहीं थी।

१९३२ में, दलित नेता और प्रकांड विद्वान डॉ॰ बाबासाहेब अम्बेडकर के चुनाव प्रचार के माध्यम से, सरकार ने अछूतों को एक नए संविधान के अंतर्गत अलग निर्वाचन मंजूर कर दिया। इसके विरोध में दलित हतों के विरोधी गांधी जी ने सितंबर १९३२ में छ: दिन का अनशन ले लिया जिसने सरकार को सफलतापूर्वक दलित से राजनैतिक नेता बने पलवंकर बालू द्वारा की गई मध्‍यस्ता वाली एक समान व्यवस्था को अपनाने पर बल दिया। अछूतों के जीवन को सुधारने के लिए गांधी जी द्वारा चलाए गए इस अभियान की शुरूआत थी। गांधी जी ने इन अछूतों को हरिजन का नाम दिया जिन्हें वे भगवान की संतान मानते थे। ८ मई १९३३ को गांधी जी ने हरिजन आंदोलन में मदद करने के लिए आत्म शुद्धिकरण का २१ दिन तक चलने वाला उपवास किया। यह नया अभियान दलितों को पसंद नहीं आया तथापि वे एक प्रमुख नेता बने रहे। डॉ॰ अम्बेडकर ने गांधी जी द्वारा हरिजन शब्द का उपयोग करने की स्पष्ट निंदा की, कि दलित सामाजिक रूप से अपरिपक्व हैं और सुविधासंपन्न जाति वाले भारतीयों ने पितृसत्तात्मक भूमिका निभाई है। अम्बेडकर और उसके सहयोगी दलों को भी महसूस हुआ कि गांधी जी दलितों के राजनीतिक अधिकारों को कम आंक रहे हैं। हालांकि गांधी जी एक वैश्य जाति में पैदा हुए फिर भी उन्होनें इस बात पर जोर दिया कि वह डॉ॰ अम्बेडकर जैसे दलित मसिहा के होते हुए भी वह दलितों के लिए आवाज उठा सकता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिन्दुस्तान की सामाजिक बुराइयों में में छुआछूत एक प्रमुख बुराई थी जिसके के विरूद्ध महात्मा गांधी और उनके अनुयायी संघर्षरत रहते थे। उस समय देश के प्रमुख मंदिरों में हरिजनों का प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित था। केरल राज्य का जनपद त्रिशुर दक्षिण भारत की एक प्रमुख धार्मिक नगरी है। यहीं एक प्रतिष्ठित मंदिर है गुरुवायुर मंदिर, जिसमें कृष्ण भगवान के बालरूप के दर्शन कराती भगवान गुरूवायुरप्पन की मूर्ति स्थापित है। आजादी से पूर्व अन्य मंदिरों की भांति इस मंदिर में भी हरिजनों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध था।

केरल के गांधी समर्थक श्री केलप्पन ने महात्मा की आज्ञा से इस प्रथा के विरूद्ध आवाज उठायी और अंततः इसके लिये सन् १९३३ ई0 में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ की गयी। मन्दिर के ट्रस्टियों को इस बात की ताकीद की गयी कि नये वर्ष का प्रथम दिवस अर्थात १ जनवरी १९३४ को अंतिम निश्चय दिवस के रूप में मनाया जायेगा और इस तिथि पर उनके स्तर से कोई निश्चय न होने की स्थिति मे महात्मा गांधी तथा श्री केलप्पन द्वारा आन्दोलनकारियों के पक्ष में आमरण अनशन किया जा सकता है। इस कारण गुरूवायूर मन्दिर के ट्रस्टियो की ओर से बैठक बुलाकर मन्दिर के उपासको की राय भी प्राप्त की गयी। बैठक मे ७७ प्रतिशत उपासको के द्वारा दिये गये बहुमत के आधार पर मन्दिर में हरिजनों के प्रवेश को स्वीकृति दे दी गयी और इस प्रकार १ जनवरी १९३४ से केरल के श्री गुरूवायूर मन्दिर में किये गये निश्चय दिवस की सफलता के रूप में हरिजनों के प्रवेश को सैद्वांतिक स्वीकृति मिल गयी। गुरूवायूर मन्दिर जिसमें आज भी गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है तथापि कई धर्मों को मानने वाले भगवान भगवान गुरूवायूरप्पन के परम भक्त हैं। महात्मा गांधी की प्रेरणा से जनवरी माह के प्रथम दिवस को निश्चय दिवस के रूप में मनाया गया और किये गये निश्चय को प्राप्त किया गया। ।
१९३४ की गर्मियों में, उनकी जान लेने के लिए उन पर तीन असफल प्रयास किए गए थे।

जब कांग्रेस पार्टी के चुनाव लड़ने के लिए चुना और संघीय योजना के अंतर्गत सत्ता स्वीकार की तब गांधी जी ने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देने का निर्णय ले लिया। वह पार्टी के इस कदम से असहमत नहीं थे किंतु महसूस करते थे कि यदि वे इस्तीफा देते हैं तब भारतीयों के साथ उसकी लोकप्रियता पार्टी की सदस्यता को मजबूत करने में आसानी प्रदान करेगी जो अब तक कम्यूनिसटों, समाजवादियों, व्यापार संघों, छात्रों, धार्मिक नेताओं से लेकर व्यापार संघों और विभिन्न आवाजों के बीच विद्यमान थी। इससे इन सभी को अपनी अपनी बातों के सुन जाने का अवसर प्राप्त होगा। गांधी जी राज के लिए किसी पार्टी का नेतृत्व करते हुए प्रचार द्वारा कोई ऐसा लक्ष्‍य सिद्ध नहीं करना चाहते थे जिसे राज के साथ अस्थायी तौर पर राजनैतिक व्यवस्‍था के रूप में स्वीकार कर लिया जाए।

गांधी जी नेहरू प्रेजीडेन्सी और कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के साथ ही १९३६ में भारत लौट आए। हालांकि गांधी की पूर्ण इच्छा थी कि वे आजादी प्राप्त करने पर अपना संपूर्ण ध्‍यान केन्द्रित करें न कि भारत के भविष्य के बारे में अटकलों पर। उसने कांग्रेस को समाजवाद को अपने उद्देश्‍य के रूप में अपनाने से नहीं रोका। १९३८ में पार्टी अध्यक्ष पद के लिए चुने गए सुभाष बोस के साथ गांधी जी के मतभेद थे। बोस के साथ मतभेदों में गांधी के मुख्य बिंदु बोस की लोकतंत्र में प्रतिबद्धता की कमी तथा अहिंसा में विश्वास की कमी थी। बोस ने गांधी जी की आलोचना के बावजूद भी दूसरी बार जीत हासिल की किंतु कांग्रेस को उस समय छोड़ दिया जब सभी भारतीय नेताओं ने गांधी जी द्वारा लागू किए गए सभी सिद्धातों का परित्याग कर दिया गया।

द्वितीय विश्व युद्ध १९३९ में जब छिड़ने नाजी जर्मनी आक्रमण पोलैंड.आरम्भ में गांधी जी ने अंग्रेजों के प्रयासों को अहिंसात्मक नैतिक सहयोग देने का पक्ष लिया किंतु दूसरे कांग्रेस के नेताओं ने युद्ध में जनता के प्रतिनिधियों के परामर्श लिए बिना इसमें एकतरफा शामिल किए जाने का विरोध किया। कांग्रेस के सभी चयनित सदस्यों ने सामूहिक तौर पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। लंबी चर्चा के बाद, गांधी ने घोषणा की कि जब स्वयं भारत को आजादी से इंकार किया गया हो तब लोकतांत्रिक आजादी के लिए बाहर से लड़ने पर भारत किसी भी युद्ध के लिए पार्टी नहीं बनेगी। जैसे जैसे युद्ध बढता गया गांधी जी ने आजादी के लिए अपनी मांग को अंग्रेजों को भारत छोड़ो आन्दोलन नामक विधेयक देकर तीव्र कर दिया। यह गांधी तथा कांग्रेस पार्टी का सर्वाधिक स्पष्ट विद्रोह था जो भारत देश से अंग्रेजों को खदेड़ने पर लक्षित था।

गांधी जी के दूसरे नम्बर पर बैठे जवाहरलाल नेहरू की पार्टी के कुछ सदस्यों तथा कुछ अन्य राजनैतिक भारतीय दलों ने आलोचना की जो अंग्रेजों के पक्ष तथा विपक्ष दोनों में ही विश्‍वास रखते थे। कुछ का मानना था कि अपने जीवन काल में अथवा मौत के संघर्ष में अंग्रेजों का विरोध करना एक नश्वर कार्य है जबकि कुछ मानते थे कि गांधी जी पर्याप्त कोशिश नहीं कर रहे हैं। भारत छोड़ो इस संघर्ष का सर्वाधिक शक्तिशाली आंदोलन बन गया जिसमें व्यापक हिंसा और गिरफ्तारी हुई। पुलिस की गोलियों से हजारों की संख्‍या में स्वतंत्रता सेनानी या तो मारे गए या घायल हो गए और हजारों गिरफ्तार कर लिए गए। गांधी और उनके समर्थकों ने स्पष्ट कर दिया कि वह युद्ध के प्रयासों का समर्थन तब तक नहीं देंगे तब तक भारत को तत्‍काल आजादी न दे दी जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बार भी यह आन्दोलन बन्द नहीं होगा यदि हिंसा के व्यक्तिगत कृत्यों को मूर्त रूप दिया जाता है। उन्होंने कहा कि उनके चारों ओर अराजकता का आदेश असली अराजकता से भी बुरा है। उन्होंने सभी कांग्रेसियों और भारतीयों को अहिंसा के साथ करो या मरो  (अंग्रेजी में डू ऑर डाय) के द्वारा अन्तिम स्वतन्त्रता के लिए अनुशासन बनाए रखने को कहा।

गांधी जी और कांग्रेस कार्यकारणी समिति के सभी सदस्यों को अंग्रेजों द्वारा मुबंई में ९ अगस्त १९४२ को गिरफ्तार कर लिया गया। गांधी जी को पुणे के आंगा खां महल में दो साल तक बंदी बनाकर रखा गया। यही वह समय था जब गांधी जी को उनके निजी जीवन में दो गहरे आघात लगे। उनका ५० साल पुराना सचिव महादेव देसाई ६ दिन बाद ही दिल का दौरा पड़ने से मर गए और गांधी जी के १८ महीने जेल में रहने के बाद २२ फरवरी १९४४ को उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी का देहांत हो गया। इसके छ: सप्ताह बाद गांधी जी को भी मलेरिया का भयंकर शिकार होना पड़ा। उनके खराब स्वास्थ्‍य और जरूरी उपचार के कारण ६ मई १९४४ को युद्ध की समाप्ति से पूर्व ही उन्हें रिहा कर दिया गया। राज उन्हें जेल में दम तोड़ते हुए नहीं देखना चाहते थे जिससे देश का क्रोध बढ़ जाए। हालांकि भारत छोड़ो आंदोलन को अपने उद्देश्य में आशिंक सफलता ही मिली लेकिन आंदोलन के निष्‍ठुर दमन ने १९४३ के अंत तक भारत को संगठित कर दिया। युद्ध के अंत में, ब्रिटिश ने स्पष्ट संकेत दे दिया था कि संत्ता का हस्तांतरण कर उसे भारतीयों के हाथ में सोंप दिया जाएगा। इस समय गांधी जी ने आंदोलन को बंद कर दिया जिससे कांग्रेसी नेताओं सहित लगभग १००,००० राजनैतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया।

गांधी जी ने १९४६ में कांग्रेस को ब्रिटिश केबीनेट मिशन () के प्रस्ताव को ठुकराने का परामर्श दिया क्योकि उसे मुस्लिम बाहुलता वाले प्रांतों के लिए प्रस्तावित समूहीकरण के प्रति उनका गहन संदेह होना था इसलिए गांधी जी ने प्रकरण को एक विभाजन के पूर्वाभ्यास के रूप में देखा। हालांकि कुछ समय से गांधी जी के साथ कांग्रेस द्वारा मतभेदों वाली घटना में से यह भी एक घटना बनी (हालांकि उसके नेत्त्व के कारण नहीं) चूंकि नेहरू और पटेल जानते थे कि यदि कांग्रेस इस योजना का अनुमोदन नहीं करती है तब सरकार का नियंत्रण मुस्लिम लीग के पास चला जाएगा। १९४८ के बीच लगभग ५००० से भी अधिक लोगों को हिंसा के दौरान मौत के घाट उतार दिया गया। गांधी जी किसी भी ऐसी योजना के खिलाफ थे जो भारत को दो अलग अलग देशों में विभाजित कर दे। भारत में रहने वाले बहुत से हिंदुओं और सिक्खों एवं मुस्लिमों का भारी बहुमत देश के बंटवारे  के पक्ष में था। इसके अतिरिक्त मुहम्मद अली जिन्ना, मुस्लिम लीग के नेता ने, पश्चिम पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत और पूर्वी बंगाल  में व्यापक सहयोग का परिचय दिया। व्यापक स्तर पर फैलने वाले हिंदु मुस्लिम लड़ाई को रोकने के लिए ही कांग्रेस नेताओं ने बंटवारे की इस योजना को अपनी मंजूरी दे दी थी। कांगेस नेता जानते थे कि गांधी जी बंटवारे का विरोध करेंगे और उसकी सहमति के बिना कांग्रेस के लिए आगे बझना बसंभव था चुकि पाटर्ठी में गांधी जी का सहयोग और संपूर्ण भारत में उनकी स्थिति मजबूत थी। गांधी जी के करीबी सहयोगियों ने बंटवारे को एक सर्वोत्तम उपाय के रूप में स्वीकार किया और सरदार पटेल ने गांधी जी को समझाने का प्रयास किया कि नागरिक अशांति वाले युद्ध को रोकने का यही एक उपाय है। मज़बूर गांधी ने अपनी अनुमति दे दी।

उन्होंने उत्तर भारत के साथ-साथ बंगाल में भी मुस्लिम और हिंदु समुदाय के नेताओं के साथ गर्म रवैये को शांत करने के लिए गहन विचार विमर्श किया। १९४७ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बावजूद उन्हें उस समय परेशान किया गया जब सरकार ने पाकिस्तान को विभाजन परिषद द्वारा बनाए गए समझौते के अनुसार ५५ करोड़ रू0 न देने का निर्णय लियाथा। सरदार पटेल जैसे नेताओं को डर था कि पाकिस्तान इस धन का उपयोग भारत के खिलाफ़ जंग छेड़ने में कर सकता है। जब यह मांग उठने लगी कि सभी मुस्लिमों को पाकिस्तान भेजा जाए और मुस्लिमों और हिंदु नेताओं ने इस पर असंतोष व्य‍क्त किया और एक दूसरे के साथ समझौता करने से मना करने से गांधी जी को गहरा सदमा पहुंचा। उन्होंने दिल्ली में अपना पहला आमरण अनशन आरंभ किया जिसमें साम्प्रदायिक हिंसा को सभी के लिए तत्काल समाप्त करने और पाकिस्तान को 55 करोड़ रू0 का भुगतान करने के लिए कहा गया था। गांधी जी को डर था कि पाकिस्तान में अस्थिरता और असुरक्षा से भारत के प्रति उनका गुस्सा और बढ़ जाएगा तथा सीमा पर हिंसा फैल जाएगी। उन्हें आगे भी डर था कि हिंदु और मुस्लिम अपनी शत्रुता को फिर से नया कर देंगे और उससे नागरिक युद्ध हो जाने की आशंका बन सकती है। जीवन भर गांधी जी का साथ देने वाले सहयोगियों के साथ भावुक बहस के बाद गांधी जी ने बात का मानने से इंकार कर दिया और सरकार को अपनी नीति पर अडिग रहना पड़ा तथा पाकिस्तान को भुगतान कर दिया। हिंदु मुस्लिम और सिक्ख समुदाय के नेताओं ने उन्हें विश्‍वास दिलाया कि वे हिंसा को भुला कर शांति लाएंगे। इन समुदायों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा शामिल थे। इस प्रकार गांधी जी ने संतरे का जूस पीकर अपना अनशन तोड़ दिया।

मैनचेस्टर गार्जियन, १८ फरवरी, १९४८, की गलियों से ले जाते हुआ दिखाया गया था।

३० जनवरी, १९४८, गांधी की उस समय नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई जब वे नई दिल्ली के बिड़ला भवन (बिरला हाउस के मैदान में रात चहलकदमी कर रहे थे। गांधी का हत्यारा नाथूराम गौड़से हिन्दू राष्ट्रवादी थे जिनके कट्टरपंथी हिंदु महासभा के साथ संबंध थे जिसने गांधी जी को पाकिस्तान को भुगतान करने के मुद्दे को लेकर भारत को कमजोर बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया था। गोड़से और उसके उनके सह षड्यंत्रकारी नारायण आप्टे को बाद में केस चलाकर सजा दी गई तथा १५ नवंबर १९४९ को इन्हें फांसी दे दी गई। राज घाट, नई दिल्ली, में गांधी जी के स्मारक पर देवनागरी में  हे राम  लिखा हुआ है। ऐसा व्यापक तौर पर माना जाता है कि जब गांधी जी को गोली मारी गई तब उनके मुख से निकलने वाले ये अंतिम शब्द थे। हालांकि इस कथन पर विवाद उठ खड़े हुए हैं।जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित किया :

गांधी जी की राख को एक अस्थि-रख दिया गया और उनकी सेवाओं की याद दिलाने के लिए संपूर्ण भारत में ले जाया गया। इनमें से अधिकांश को इलाहाबाद में संगम पर १२ फरवरी १९४८ को जल में विसर्जित कर दिया गया किंतु कुछ को अलग पवित्र रूप में रख दिया गया। १९९७ में, तुषार गाँधी ने बैंक में नपाए गए एक अस्थि-कलश की कुछ सामग्री को अदालत के माध्यम से, इलाहाबाद में संगम नामक स्थान पर जल में विसर्जित कर दिया। ३० जनवरी२००८ को दुबई में रहने वाले एक व्यापारी द्वारा गांधी जी की राख वाले एक अन्य अस्थि-कलश को मुंबई संग्रहालय में भेजने के उपरांत उन्हें गिरगाम चौपाटी नामक स्थान पर जल में विसर्जित कर दिया गया। एक अन्य अस्थि कलश आगा खान जो पुणे में है, (जहाँ उन्होंने १९४२ से कैद करने के लिए किया गया था १९४४) वहां समाप्त हो गया और दूसरा आत्मबोध फैलोशिप झील मंदिर में लॉस एंजिल्स. रखा हुआ है। इस परिवार को पता है कि इस पवित्र राख का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए दुरूपयोग किया जा सकता है लेकिन उन्हें यहां से हटाना नहीं चाहती हैं क्योंकि इससे मन्दिरों . को तोड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।

गाँधी जी पर हवाई बहस करने एवं मनमाना निष्कर्ष निकालने की अपेक्षा यह युगीन आवश्यकता ही नहीं वरन् समझदारी का तकाजा भी है कि गाँधीजी की मान्यताओं के आधार की प्रामाणिकता को ध्यान में रखा जाए। सामान्य से विशिष्ट तक -- सभी संदर्भों में दस्तावेजी रूप प्राप्त गाँधी जी का लिखा-बोला प्रायः प्रत्येक शब्द अध्ययन के लिए उपलब्ध है। इसलिए स्वभावतः यह आवश्यक है कि इनके मद्देनजर ही किसी बात को यथोचित मुकाम की ओर ले जाया जाए। लिखने की प्रवृत्ति गाँधीजी में आरम्भ से ही थी। अपने संपूर्ण जीवन में उन्होंने वाचिक की अपेक्षा कहीं अधिक लिखा है। चाहे वह टिप्पणियों के रूप में हो या पत्रों के रूप में। कई पुस्तकें लिखने के अतिरिक्त उन्होंने कई पत्रिकाएँ भी निकालीं और उनमें प्रभूत लेखन किया। उनके महत्त्वपूर्ण लेखन कार्य को निम्न बिंदुओं के अंतर्गत देखा जा सकता है:

गाँधी जी एक सफल लेखक थे। कई दशकों तक वे अनेक पत्रों का संपादन कर चुके थे जिसमे हरिजन, इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया आदि सम्मिलित हैं। जब वे भारत में वापस आए तब उन्होंने 'नवजीवन' नामक मासिक पत्रिका निकाली। बाद में नवजीवन का प्रकाशन हिन्दी में भी हुआ। इसके अलावा उन्होंने लगभग हर रोज व्यक्तियों और समाचार पत्रों को पत्र लिखा

गाँधी जी द्वारा मौलिक रूप से लिखित पुस्तकें चार हैं-- हिंद स्वराज, दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास, सत्य के प्रयोग (आत्मकथा), तथा गीता पदार्थ कोश सहित संपूर्ण गीता की टीका। गाँधी जी आमतौर पर गुजराती में लिखते थे, परन्तु अपनी किताबों का हिन्दी और अंग्रेजी में भी अनुवाद करते या करवाते थे।

हिंद स्वराज (मूलतः हिंद स्वराज्य) नामक अल्पकाय ग्रंथरत्न गाँधीजी ने इंग्लैंड से लौटते समय किल्डोनन कैसिल नामक जहाज पर गुजराती में लिखा था और उनके दक्षिण अफ्रीका पहुँचने पर इंडियन ओपिनियन में प्रकाशित हुआ था। आरम्भ के बारह अध्याय 11 दिसंबर 1909 के अंक में और शेष 18 दिसंबर 1909 के अंक में। पुस्तक रूप में इसका प्रकाशन पहली बार जनवरी 1910 में हुआ था और भारत में बम्बई सरकार द्वारा 24 मार्च 1910 को इसके प्रचार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। बम्बई सरकार की इस कार्रवाई का जवाब गाँधीजी ने इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित करके दिया। इस पुस्तक के परिशिष्ट-1 में पुस्तक में प्रतिपादित विषय के अधिक अध्ययन के लिए 20 पुस्तकों की सूची भी दी गयी है जिससे गाँधीजी के तत्कालीन अध्ययन के विस्तार की एक झलक भी मिलती है।

'दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास' मूलतः गुजराती में 'दक्षिण आफ्रिकाना सत्याग्रहनो इतिहास' नाम से 26 नवंबर 1923 को, जब वे यरवदा जेल में थे, लिखना शुरू किया। 5 फरवरी 1924 को रिहा होने के समय तक उन्होंने प्रथम 30 अध्याय लिख डाले थे। यह इतिहास लेखमाला के रूप में 13 अप्रैल 1924 से 22 नवंबर 1925 तक 'नवजीवन' में प्रकाशित हुआ। पुस्तक के रूप में इसके दो खंड क्रमशः 1924 और 1925 में छपे। वालजी देसाई द्वारा किये गये अंग्रेजी अनुवाद का प्रथम संस्करण अपेक्षित संशोधनों के साथ एस० गणेशन मद्रास ने 1928 में और द्वितीय और तृतीय संस्करण नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद ने 1950 और 1961 में प्रकाशित किया था।

आत्मकथा के मूल गुजराती अध्याय धारावाहिक रूप से 'नवजीवन' के अंकों में प्रकाशित हुए थे। 29 नवंबर 1925 के अंक में 'प्रस्तावना' के प्रकाशन से उसका आरम्भ हुआ और 3 फरवरी 1929 के अंक में 'पूर्णाहुति' शीर्षक अंतिम अध्याय से उसकी समाप्ति। गुजराती अध्यायों के प्रकाशन के साथ ही हिन्दी नवजीवन में उनका हिन्दी अनुवाद और यंग इंडिया में उनका अंग्रेजी अनुवाद भी दिया जाता रहा। तदनुसार 'प्रस्तावना' का अनुवाद 'हिन्दी नवजीवन' के 3 दिसंबर 1925 के अंक में प्रकाशित हुआ था। हिन्दी अनुवाद में आत्मकथा का पहला खंड पुस्तक के रूप में पहली बार सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली से सन् 1928 में प्रकाशित हुआ था। गाँधी जी की रचनाओं के स्वत्वाधिकारी नवजीवन ट्रस्ट ने अपनी ओर से उसके हिन्दी अनुवाद का प्रकाशन सन् 1957 में किया था।

श्रीमद्भगवद्गीता से गाँधी जी का हार्दिक लगाव प्रायः आजीवन रहा। गीता पर उनका चिंतन-मनन तथा लेखन भी लंबे समय तक चलते रहा। सम्पूर्ण गीता का गुजराती अनुवाद, प्रस्तावना सहित, उन्होंने जून 1929 में पूरा किया था और 12 मार्च 1930 को नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद से 'अनासक्ति योग' नाम से उसका पुस्तकाकार प्रकाशन हुआ था। उसका हिंदी, बांग्ला एवं मराठी में अनुवाद भी तत्काल हो गया था। अंग्रेजी अनुवाद इसके बाद जनवरी 1931 में संपन्न हुआ था तथा पहले यंग इंडिया के अंक में प्रकाशित हुआ था।

गीता के प्रत्येक श्लोक का अनुवाद सामान्य पाठकों के लिए सहज बोधगम्य न होने से गाँधी जी ने गीता के प्रत्येक अध्याय के भावों को सामान्य पाठकों के लिए सहज बोधगम्य रूप में लिखा। यरवदा सेंट्रल जेल में 1930 और 1932 में प्रत्येक सप्ताह पत्र के रूप में ये भाव भी नारायणदास गांधी को भेजे जाते रहे ताकि उन्हें आश्रम की प्रार्थना सभाओं में पढ़े जायें। इन्हीं का प्रकाशन बाद में पुस्तक रूप में 'गीता-बोध' नाम से हुआ। इनके अतिरिक्त भी उन्होंने गीता पर प्रार्थना सभाओं में अनेक प्रवचन दिये थे। गीता से गाँधी जी का जुड़ाव इस कदर था कि अपने अत्यंत व्यस्त जीवन के बावजूद उन्होंने गीता के प्रत्येक पद का अक्षर क्रम से कोश तैयार किया जिसमें पद के अर्थ के साथ-साथ उनके प्रयोग-स्थल भी निर्दिष्ट थे। इन समस्त सामग्रियों का एकत्र प्रकाशन ही 'गीता माता' के नाम से हुआ है।

गाँधी जी के लिखित एवं वाचिक समग्र साहित्य के प्रकाशन हेतु भारत सरकार द्वारा एक ग्रंथमाला के प्रकाशन का निर्णय प्रकाशन जगत में निःसंदेह एक ऐतिहासिक कदम रहा है। इस ग्रंथमाला का उद्देश्य गाँधी जी ने दिन-प्रति-दिन और वर्ष-प्रति-वर्ष जो कुछ कहा और लिखा उस सबको एकत्र करना था।

इसी निर्णय के तहत अनेक अधीत विद्वानों के सहयोग से सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय का प्रकाशन हुआ। यह प्रकाशन तीन भाषाओं में हुआ। अंग्रेजी में पहली बार 100 खंडों में (THE COLLECTED WORKS OF MAHATMA GANDHI नाम से) तथा संशोधित रूप (pdf) में 98 खंडों में इसका प्रकाशन हुआ है। हिन्दी में 97 खंडों में तथा गुजराती में 70 खंडों में यह प्रकाशकीय महाकुंभ संपन्न हुआ है। सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय (हिन्दी) में दो अतिरिक्त वैशिष्ट्य भी सम्मिलित हैं। एक तो यह कि प्रत्येक खंड के अंत में अक्षरक्रम से शब्दानुक्रमणिका दी गयी है जिससे अध्ययन तथा विभिन्न कार्यवश पुनरावलोकन में अत्यंत सुविधा हो गयी है; तथा दूसरी यह कि प्रत्येक खंड के अंत में गाँधी जी का तारीखवार जीवन-वृत्तान्त दिया गया है, जिससे सरलतापूर्वक एक नज़र में गाँधीजी के जीवन की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं एवं बातों की संक्षिप्त जानकारी उपलब्ध हो जाती है।

इनके अतिरिक्त गाँधी जी के समग्र साहित्य से चुनिंदा अंशों के संचयन तथा विभिन्न विषयों पर केन्द्रित छोटी-छोटी पुस्तिकाओं का भी विभिन्न नामों से प्रकाशन होते रहा है। इनमें दो संचयन अति प्रसिद्ध तथा अत्युपयोगी रहे हैं और इन दोनों का प्रकाशन भी गाँधी जी के जीवन-काल में ही (अंग्रेजी में, 1945 एवं 1947 में) हो गया था:

गाँधी जी ने जॉन रस्किन की अन्टू दिस लास्ट () की गुजराती में व्याख्या भी की है। अन्तिम निबंध को उनका अर्थशास्त्र से सम्बंधित कार्यक्रम कहा जा सकता है उन्होंने शाकाहार, भोजन और स्वास्थ्य, धर्म, सामाजिक सुधार पर भी विस्तार से लिखा है। 

सन् २००० में गाँधी जी के संपूर्ण कार्य (CWMG) का संशोधित संस्करण विवादों के घेरे में आ गया क्योंकि गाँधी जी के अनुयायियों ने सरकार पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए परिवर्तन शामिल करने का आरोप लगाया.

कई जीवनी लेखकों ने गाँधी के जीवन-वर्णन का कार्य किया है। उनमें से दो कार्य व्यापक एवं अपने आप में उदाहरण हैं:

इस दूसरे महाग्रंथ के अंतिम खण्ड (Last Phase) का चार खण्डों में हिन्दी अनुवाद महात्मा गांधी : पूर्णाहुति नाम से प्रकाशित है।

कर्नल जी बी अमेरिकी सेना के सिंह ने कहा कि अपनी तथ्यात्मक शोध पुस्तक 'देवत्व के मुखौटे के पीछे गाँधी' (गाँधी: बिहाइंड द मास्क ऑफ़ डिविनिटी) के मूल भाषण और लेखन के लिए उन्होंने अपने २० वर्ष लगा दिए।

२०११ में प्रकाशित किताब ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विद इंडिया में पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता लेखक जोसेफ़ लेलीवेल्ड ने महात्मा गाँधी और उनके दक्षिण अफ़्रीका में रहे सहयोगी हर्मन केलेनबाख के रिश्तों को अनन्य प्रेम सम्बन्ध बताया है। पुस्तक के प्रकाशन के समय इस कारण से भारत में विवाद हो गया, और गाँधी के गृह राज्य गुजरात की विधान सभा ने एक संकल्प के माध्यम से इस पुस्तक की बिक्री प्र रोक लगा दी। लेलीवेल्ड के मुताबिक, उनकी पुस्तक के आधार पर गाँधी की समलैंगी या द्विलिंगी होने के लगाए जा रहे आंकलन गलत हैं। उन्होंने कहा, यह किताब ये नहीं कहती कि गाँधी समलैंगिक या द्विलिंगी थे।यह [किताब] कहती है कि [गाँधी] ब्रह्मचारी थे, और कैलेनबाख से गहरे [दिल] से जुडे थे। और यह कोई नई जानकारी नहीं है। (यथाशब्द)।

महात्मा गांधी और उनके दक्षिण अफ्रीकी मित्र हरमन कालेनबाख से संबंधित दस्तावेजों को 1.28 मिलियन डॉलर (करीब 6.88 करोड़ रुपए) में खरीद कर भारत लाया गया है। 2012 में नीलाम होने से पहले भारत सरकार ने इन्हें सोदबी नीलामी घर से गोपनीय करार में खरीदा था। कालेनबाख दक्षिण अफ्रीका में जिम्नास्ट, बॉडी बिल्डर और आर्किटेक्ट थे। उन्होंने एमके गांधी को कुछ ऐसे भी पत्र भेजे थे जिन्हें कुछ समीक्षक ‘प्रेम पत्र’ कहते हैं। इन दोनों लोगों का रिश्ता काफी विवादित रहा था।

महत्वपूर्ण नेता और राजनीतिक गतिविधियाँ गाँधी से प्रभावित थीं। अमेरिका के नागरिक अधिकार आन्दोलन के नेताओं में मार्टिन लूथर किंग और जेम्स लाव्सन गाँधी के लेखन जो उन्हीं के सिद्धांत अहिंसा को विकसित करती है, से काफी आकर्षित हुए थे। विरोधी-रंगभेद कार्यकर्ता और दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला, गाँधी जी से प्रेरित थे। और दुसरे लोग खान अब्दुल गफ्फेर खान,स्टीव बिको और औंग सू कई () हैं।

गाँधी का जीवन तथा उपदेश कई लोगों को प्रेरित करती है जो गाँधी को अपना गुरु मानते है या जो गाँधी के विचारों का प्रसार करने में अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। यूरोप के, रोमेन रोल्लांड पहला व्यक्ति था जिसने १९२४ में अपने किताब महात्मा गाँधी में गाँधी जी पर चर्चा की थी और ब्राज़ील की अराजकतावादी () और नारीवादी मारिया लासर्दा दे मौरा ने अपने कार्य शांतिवाद में गाँधी के बारें में लिखा.१९३१ में उल्लेखनीय भौतिक विज्ञानी अलबर्ट आइंस्टाइन, गाँधी के साथ पत्राचार करते थे और अपने बाद के पत्रों में उन्हें आने वाले पीढियों का आदर्श कहा.लांजा देल वस्तो () महात्मा गाँधी के साथ रहने के इरादे से सन १९३६ में भारत आया; और बाद में गाँधी दर्शन को फैलाने के लिए वह यूरोप वापस आया और १९४८ में उसने कम्युनिटी ऑफ़ द आर्क की स्थापना की। (गाँधी के आश्रम से प्रभावित होकर)मदेलिने स्लेड (मीराबेन) ब्रिटिश नौसेनापति की बेटी थी जिसने अपना अधिक से अधिक व्यस्क जीवन गाँधी के भक्त के रूप में भारत में बिताया था।

इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश संगीतकार जॉन लेनन ने गाँधी का हवाला दिया जब वे अहिंसा पर अपने विचारों को व्यक्त कर रहे थे। २००७ में केन्स लिओंस अन्तर राष्ट्रीय विज्ञापन महोत्सव (), अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति और पर्यावरणविद अल गोर ने उन पर गाँधी के प्रभाव को बताया। 

 
२ अक्टूबर गाँधी का जन्मदिन है इसलिए गाँधी जयंती के अवसर पर भारत में राष्ट्रीय अवकाश होता है १५ जून २००७ को यह घोषणा की गई थी कि संयुक्त राष्ट्र महासभा  एक प्रस्ताव की घोषणा की, कि २ अक्टूबर () को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाएगा.

अक्सर पश्चिम में महात्मा शब्द का अर्थ ग़लत रूप में ले लिया जाता है उनके अनुसार यह संस्कृत से लिया गया है जिसमे महा का अर्थ महान और आत्म का अर्थ आत्मा होता है। ज्यादातर सूत्रों के अनुसार जैसे दत्ता और रोबिनसन के रबिन्द्रनाथ टगोर: संकलन में कहा गया है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सबसे पहले गाँधी को महात्मा का खिताब दिया था। अन्य सूत्रों के अनुसार नौतामलाल भगवानजी मेहता ने २१ जनवरी १९१५ में उन्हें यह खिताब दिया था। हालाँकि गाँधी ने अपनी आत्मकथा में कहा है कि उन्हें कभी नहीं लगा कि वे इस सम्मान के योग्य हैं। मानपत्र के अनुसार, गाँधी को उनके न्याय और सत्य के सराहनीये बलिदान के लिए महात्मा नाम मिला है।

१९३० में टाइम पत्रिका ने महात्मा गाँधी को वर्ष का पुरूष का नाम दियाI १९९९ में गाँधी अलबर्ट आइंस्टाइन जिन्हे सदी का पुरूष नाम दिया गया के मुकाबले द्वितीय स्थान जगह पर थे। टाइम पत्रिका ने दलाई लामा, लेच वालेसा, डॉ मार्टिन लूथर किंग, जूनियर, सेसर शावेज़, औंग सान सू कई, बेनिग्नो अकुइनो जूनियर, डेसमंड टूटू और नेल्सन मंडेला को गाँधी के अहिंसा के आद्यात्मिक उत्तराधिकारी के रूप में कहा गया. भारत सरकार प्रति वर्ष उल्लेखनीय सामाजिक कार्यकर्ताओं, विश्व के नेताओं और नागरिकों को महात्मा गाँधी शान्ति पुरस्कार से पुरस्कृत करती है। दक्षिण अफ्रीकी नेल्सन मंडेला, जो कि जातीय मतभेद और पार्थक्य के उन्मूलन में संघर्षरत रहे, इस पुरूस्कार को पाने वाले पहले गैर-भारतीय थे।

१९९६ में, भारत सरकार ने महात्मा गाँधी की श्रृंखला के नोटों के मुद्रण को १, ५, १०, २०, ५०, १००, ५०० और १००० के अंकन के रूप में आरम्भ किया। आज जितने भी नोट इस्तेमाल में हैं उनपर महात्मा गाँधी का चित्र है। १९६९ में यूनाइटेड किंगडम ने डाक टिकेट की एक श्रृंखला महात्मा गाँधी के शत्वर्शिक जयंती के उपलक्ष्य में जारी की। 
 
यूनाइटेड किंगडम में ऐसे अनेक गाँधी जी की प्रतिमाएँ उन ख़ास स्थानों पर हैं जैसे लन्दन विश्वविद्यालय कालेज के पास ताविस्तोक चौक, लन्दन जहाँ पर उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की। यूनाइटेड किंगडम में जनवरी ३० को “राष्ट्रीय गाँधी स्मृति दिवस” मनाया जाता है।संयुक्त राज्य में, गाँधी की प्रतिमाएँ न्यू यार्क शहर में यूनियन स्क्वायर के बहार और अटलांटा में मार्टिन लूथर किंग जूनियर राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल और वाशिंगटन डी.सी में भारतीय दूतावास के समीप मेसासुशैट्स मार्ग में हैं। भारतीय दूतावास के समीप पितर्मरित्ज़्बर्ग, दक्षिण अफ्रीका, जहाँ पर १८९३ में गाँधी को प्रथम-श्रेणी से निकल दिया गया था वहां उनकी स्मृति में एक प्रतिमा स्थापित की गए है। गाँधी की प्रतिमाएँ मदाम टुसौड के मोम संग्रहालय, लन्दन में, न्यू यार्क और विश्व के अनेक शहरों में स्थापित हैं।

गाँधी को कभी भी शान्ति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ, हालाँकि उनको १९३७ से १९४८ के बीच, पाँच बार मनोनीत किया गया जिसमे अमेरिकन फ्रेंड्स सर्विस कमिटी द्वारा दिया गया नामांकन भी शामिल है . दशको उपरांत नोबेल समिति ने सार्वजानिक रूप में यह घोषित किया कि उन्हें अपनी इस भूल पर खेद है और यह स्वीकार किया कि पुरूस्कार न देने की वजह विभाजित राष्ट्रीय विचार थे। महात्मा गाँधी को यह पुरुस्कार १९४८ में दिया जाना था, परन्तु उनकी हत्या के कारण इसे रोक देना पड़ा.उस साल दो नए राष्ट्र भारत और पाकिस्तान में युद्ध छिड़ जाना भी एक जटिल कारण था। गाँधी के मृत्यु वर्ष १९४८ में पुरस्कार इस वजह से नहीं दिया गया कि कोई जीवित योग्य उम्मीदवार नहीं था और जब १९८९ में दलाई लामा को पुरस्कृत किया गया तो समिति के अध्यक्ष ने यह कहा कि यह महात्मा गाँधी की याद में श्रद्धांजलि का ही हिस्सा है।

बिरला भवन (या बिरला हॉउस), नई दिल्ली जहाँ पर ३०जन्वरी, १९४८ को गाँधी की हत्या की गयी का अधिग्रहण भारत सरकार ने १९७१ में कर लिया तथा १९७३ में गाँधी स्मृति के रूप में जनता के लिए खोल दिया। यह उस कमरे को संजोय हुए है जहाँ गाँधी ने अपने आख़िर के चार महीने बिताये और वह मैदान भी जहाँ रात के टहलने के लिए जाते वक्त उनकी हत्या कर दी गयी। एक शहीद स्तम्भ अब उस जगह को चिन्हित करता हैं जहाँ पर उनकी हत्या कर दी गयी थी।

प्रति वर्ष ३० जनवरी को, महात्मा गाँधी के पुण्यतिथि पर कई देशों के स्कूलों में अहिंसा और शान्ति का स्कूली दिन (DENIP मनाया जाता है जिसकी स्थापना १९६४ स्पेन में हुयी थी। वे देश जिनमें दक्षिणी गोलार्ध कैलेंडर इस्तेमाल किया जाता हैं, वहां ३० मार्च को इसे मनाया जाता है।

 
गाँधी के कठोर अहिंसा का नतीजा शांतिवाद () है, जो की राजनैतिक क्षेत्र से आलोचना का एक मूल आधार है।

नियम के रूप में गाँधी विभाजन की अवधारणा के खिलाफ थे क्योंकि यह उनके धार्मिक एकता के दृष्टिकोण के प्रतिकूल थी। ६ अक्टूबर १९४६ में हरिजन में उन्होंने भारत का विभाजन पाकिस्तान बनाने के लिए, के बारे में लिखा:

(पाकिस्तान की मांग) जैसा की मुस्लीम लीग द्वारा प्रस्तुत किया गया गैर-इस्लामी है और मैं इसे पापयुक्त कहने से नही हिचकूंगाइस्लाम मानव जाति के भाईचारे और एकता के लिए खड़ा है, न कि मानव परिवार के एक्य का अवरोध करने के लिए॰इस वजह से जो यह चाहते हैं कि भारत दो युद्ध के समूहों में बदल जाए वे भारत और इस्लाम दोनों के दुश्मन हैं। वे मुझे टुकडों में काट सकते हैं पर मुझे उस चीज़ के लिए राज़ी नहीं कर सकते जिसे मैं ग़लत समझता हूँ[...] हमें आस नही छोडनी चाहिए, इसके बावजूद कि ख्याली बाते हो रही हैं कि हमें मुसलमानों को अपने प्रेम के कैद में अबलाम्बित कर लेना चाहिए॰

फिर भी, जैक होमर गाँधी के जिन्ना के साथ पाकिस्तान के विषय को लेकर एक लंबे पत्राचार पर ध्यान देते हुए कहते हैं- हालाँकि गांधी वैयक्तिक रूप में विभाजन के खिलाफ थे, उन्होंने सहमति का सुझाव दिया जिसके तहत कांग्रेस और मुस्लिम लीग अस्थायी सरकार के नीचे समझौता करते हुए अपनी आजादी प्राप्त करें जिसके बाद विभाजन के प्रश्न का फैसला उन जिलों के जनमत द्वारा होगा जहाँ पर मुसलमानों की संख्या ज्यादा है।.

भारत के विभाजन के विषय को लेकर यह दोहरी स्थिति रखना, गाँधी ने इससे हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों तरफ़ से आलोचना के आयाम खोल दिए। मुहम्मद अली जिन्ना तथा समकालीन पाकिस्तानियों ने गाँधी को मुस्लमान राजनैतिक हक़ को कम कर आंकने के लिए निंदा की। विनायक दामोदर सावरकार और उनके सहयोगियों ने गाँधी की निंदा की और आरोप लगाया कि वे राजनैतिक रूप से मुसलमानों को मनाने में लगे हुए हैं तथा हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार के प्रति वे लापरवाह हैं और पाकिस्तान के निर्माण के लिए स्वीकृति दे दी है (हालाँकि सार्वजानिक रूप से उन्होंने यह घोषित किया था कि विभाजन से पहले मेरे शरीर को दो हिस्सों में काट दिया जाएगा). यह आज भी राजनैतिक रूप से विवादस्पद है, जैसे कि पाकिस्तानी-अमरीकी इतिहासकार आयेशा जलाल यह तर्क देती हैं कि विभाजन की वजह गाँधी और कांग्रेस मुस्लीम लीग के साथ सत्ता बांटने में इक्छुक नहीं थे, दुसरे मसलन हिंदू राष्ट्रवादी राजनेता प्रवीण तोगडिया भी गाँधी के इस विषय को लेकर नेतृत्व की आलोचना करते हैं, यह भी इंगित करते हैं कि उनके हिस्से की अत्यधिक कमजोरी की वजह से भारत का विभाजन हुआ।

गाँधी ने १९३० के अंत-अंत में विभाजन को लेकर इस्राइल के निर्माण के लिए फिलिस्तीन के विभाजन के प्रति भी अपनी अरुचि जाहिर की थी। २६ अक्टूबर १९३८ को उन्होंने हरिजन में कहा था:

मुझे कई पत्र प्राप्त हुए जिनमे मुझसे पूछा गया कि मैं घोषित करुँ कि जर्मनी में यहूदियों के उत्पीडन और अरब-यहूदियों के बारे में क्या विचार रखता हूँ (). ऐसा नही कि इस कठिन प्रश्न पर अपने विचार मैं बिना झिझक के दे पाउँगा. मेरी सहानुभूति यहुदिओं के साथ है। मैं उनसे दक्षिण अफ्रीका से ही नजदीकी रूप से परिचित हूँ कुछ तो जीवन भर के लिए मेरे साथी बन गए हैं। इन मित्रों के द्वारा ही मुझे लंबे समय से हो रहे उत्पीडन के बारे में जानकारी मिली. वे ईसाई धर्म के अछूत रहे हैं पर मेरी सहानुभूति मुझे न्याय की आवश्यकता से विवेकशून्य नही करती यहूदियों के लिए एक राष्ट्र की दुहाई मुझे ज्यादा आकर्षित नही करती. जिसकी मंजूरी बाईबल में दी गयी और जिस जिद से वे अपनी वापसी में फिलिस्तीन को चाहने लगे हैं। क्यों नही वे, पृथ्वी के दुसरे लोगों से प्रेम करते हैं, उस देश को अपना घर बनाते जहाँ पर उनका जन्म हुआ और जहाँ पर उन्होंने जीविकोपार्जन किया। फिलिस्तीन अरबों का हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह इनलैंड अंग्रेजों का और फ्रांस फ्रंसिसिओं का. यहूदियों को अरबों पर अधिरोपित करना अनुचित और अमानवीय है जो कुछ भी आज फिलिस्तीन में हो रहा हैं उसे किसी भी आचार संहिता से सही साबित नही किया जा सकता.

जो लोग हिंसा के जरिये आजादी हासिल करना चाहते थे गाँधी उनकी आलोचना के कारण भी थोड़ा सा राजनैतिक आग की लपेट में भी आ गये भगत सिंह, सुखदेव, उदम सिंह, राजगुरु की फांसी के ख़िलाफ़ उनका इनकार कुछ दलों में उनकी निंदा का कारण बनी। 

इस आलोचना के लिए गाँधी ने कहा,एक ऐसा समय था जब लोग मुझे सुना करते थे की किस तरह अंग्रेजो से बिना हथियार लड़ा जा सकता है क्योंकि तब हथयार नही थे।..पर आज मुझे कहा जाता है कि मेरी अहिंसा किसी काम की नही क्योंकि इससे हिंदू-मुसलमानों के दंगो को नही रोका जा सकता इसलिए आत्मरक्षा के लिए सशस्त्र हो जाना चाहिए.

उन्होंने अपनी बहस कई लेखो में की, जो की होमर जैक्स के द गाँधी रीडर: एक स्रोत उनके लेखनी और जीवन का . १९३८ में जब पहली बार यहूदीवाद और सेमेटीसम विरोधी लिखी गई, गाँधी ने १९३० में हुए जर्मनी में यहूदियों पर हुए उत्पीडन () को सत्याग्रह के अंतर्गत बताया उन्होंने जर्मनी में यहूदियों द्वारा सहे गए कठिनाइयों के लिए अहिंसा के तरीके को इस्तेमाल करने की पेशकश यह कहते हुए की

अगर मैं एक यहूदी होता और जर्मनी में जन्मा होता और अपना जीविकोपार्जन वहीं से कर रहा होता तो जर्मनी को अपना घर मानता इसके वावजूद कि कोई सभ्य जर्मन मुझे धमकाता कि वह मुझे गोली मार देगा या किसी अंधकूपकारागार में फ़ेंक देगा, मैं तडीपार और मतभेदीये आचरण के अधीन होने से इंकार कर दूँगा . और इसके लिए मैं यहूदी भाइयों का इंतज़ार नाहे करूंगा कि वे आयें और मेरे वैधानिक प्रैत्रोध में मुझसे जुडें, बल्कि मुझे आत्मविश्वास होगा कि आख़िर में सभी मेरा उदहारण मानने के लिए बाध्य हो जायेंगे. यहाँ पर जो नुस्खा दिया गया है अगर वह एक भी यहूदी या सारे यहूदी स्वीकार कर लें, तो उनकी स्थिति जो आज है उससे बदतर नही होगी. और अगर दिए गए पीडा को वे स्वेच्छापूर्वक सह लें तो वह उन्हें अंदरूनी शक्ति और आनन्द प्रदान करेगा और हिटलर की सुविचारित हिंसा भी यहूदियों की एक साधारण नर संहार के रूप में निष्कर्षित हो तथा यह उसके अत्याचारों की घोषणा के खिलाफ पहला जवाब होगी. अगर यहूदियों का दिमाग स्वेच्छयापूर्वक पीड़ा सहने के लिए तयार हो, मेरी कल्पना है कि संहार का दिन भी धन्यवाद ज्ञापन और आनन्द के दिन में बदल जाएगा जैसा कि जिहोवा ने गढा.. एक अत्याचारी के हाथ में अपनी ज़ाति को देकर किया। इश्वर का भय रखने वाले, मृत्यु के आतंक से नही डरते.

गाँधी की इन वक्तव्यों के कारण काफ़ी आलोचना हुयी जिनका जवाब उन्होंने यहूदियों पर प्रश्न लेख में दिया साथ में उनके मित्रों ने यहूदियों को किए गए मेरे अपील की आलोचना में समाचार पत्र कि दो कर्तने भेजीं दो आलोचनाएँ यह संकेत करती हैं कि मैंने जो यहूदियों के खिलाफ हुए अन्याय का उपाय बताया, वह बिल्कुल नया नहीं है।...मेरा केवल यह निवेदन हैं कि अगर हृदय से हिंसा को त्याग दे तो निष्कर्षतः वह अभ्यास से एक शक्ति सृजित करेगा जो कि बड़े त्याग कि वजह से है। उन्होंने आलोचनाओं का उत्तर यहूदी मित्रो को जवाब और यहूदी और फिलिस्तीन में दिया यह जाहिर करते हुए कि मैंने हृदय से हिंसा के त्याग के लिए कहा जिससे निष्कर्षतः अभ्यास से एक शक्ति सृजित करेगा जो कि बड़े त्याग कि वजह से है।

यहूदियों की आसन्न आहुति को लेकर गाँधी के बयान ने कई टीकाकारों की आलोचना को आकर्षित किया।मार्टिन बूबर (), जो की स्वयं यहूदी राज्य के एक विरोधी हैं ने गाँधी को २४ फरवरी, १९३९ को एक तीक्ष्ण आलोचनात्मक पत्र लिखा. बूबर ने दृढ़ता के साथ कहा कि अंग्रेजों द्वारा भारतीय लोगों के साथ जो व्यवहार किया गया वह नाजियों द्वारा यहूदियों के साथ किए गए व्यवहार से भिन्न है, इसके अलावा जब भारतीय उत्पीडन के शिकार थे, गाँधी ने कुछ अवसरों पर बल के प्रयोग का समर्थन किया।

गाँधी ने १९३० में जर्मनी में यहूदियों () के उत्पीडन को सत्याग्रह के भीतर ही सन्दर्भित कहा। नवम्बर १९३८ में उपरावित यहूदियों के नाजी उत्पीडन के लिए उन्होंने अहिंसा के उपाय को सुझाया:

आभास होता है कि यहूदियों के जर्मन उत्पीडन का इतिहास में कोई सामानांतर नही. पुराने जमाने के तानाशाह कभी इतने पागल नही हुए जितना कि हिटलर हुआ और इसे वे धार्मिक उत्साह के साथ करते हैं कि वह एक ऐसे अनन्य धर्म और जंगी राष्ट्र को प्रस्तुत कर रहा है जिसके नाम पर कोई भी अमानवीयता मानवीयता का नियम बन जाती है जिसे अभी और भविष्य में पुरुस्कृत किया जायेगा. जाहिर सी बात है कि एक पागल परन्तु निडर युवा द्वारा किया गया अपराध सारी जाति पर अविश्वसनीय उग्रता के साथ पड़ेगा.यदि कभी कोई न्यायसंगत युद्ध मानवता के नाम पर, तो एक पुरी कॉम के प्रति जर्मनी के ढीठ उत्पीडन के खिलाफ युद्ध को पूर्ण रूप से उचित कहा जा सकता हैं। पर मैं किसी युद्ध में विश्वास नही रखता. इसे युद्ध के नफा-नुकसान के बारे में चर्चा मेरे अधिकार क्षेत्र में नही है। परन्तु जर्मनी द्वारा यहूदियों पर किए गए इस तरह के अपराध के खिलाफ युद्ध नही किया जा सकता तो जर्मनी के साथ गठबंधन भी नही किया जा सकता यह कैसे हो सकता हैं कि ऐसे देशों के बीच गठबंधन हो जिसमे से एक न्याय और प्रजातंत्र का दावा करता हैं और दूसरा जिसे दोनों का दुश्मन घोषित कर दिया गया है?

गाँधी के दक्षिण अफ्रीका को लेकर शुरुआती लेख काफी विवादस्पद हैं ७ मार्च, १९०८ को, गाँधी ने इंडियन ओपिनियन में दक्षिण अफ्रीका में उनके कारागार जीवन के बारे में लिखा काफिर शासन में ही असभ्य हैं - कैदी के रूप में तो और भी. वे कष्टदायक, गंदे और लगभग पशुओं की तरह रहते हैं। १९०३ में अप्रवास के विषय को लेकर गाँधी ने टिप्पणी की कि मैं मानता हूँ कि जितना वे अपनी जाति की शुद्धता पर विश्वास करते हैं उतना हम भी...हम मानते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में जो गोरी जाति है उसे ही श्रेष्ट जाति होनी चाहिए॰ दक्षिण अफ्रीका में अपने समय के दौरान गाँधी ने बार-बार भारतीयों का अश्वेतों के साथ सामाजिक वर्गीकरण को लेकर विरोध किया, जिनके बारे में वे वर्णन करते हैं कि  निसंदेह पूर्ण रूप से काफिरों से श्रेष्ठ हैं. यह ध्यान देने योग्य हैं कि गाँधी के समय में काफिर का वर्तमान में () इस्तेमाल हो रहे अर्थ से एक अलग अर्थ था (). गाँधी के इन कथनों ने उन्हें कुछ लोगों द्वारा नसलवादी होने के आरोप को लगाने का मौका दिया है।

इतिहास के दो प्रोफ़ेसर सुरेन्द्र भाना और गुलाम वाहेद, जो दक्षिण अफ्रीका के इतिहास पर महारत रखते हैं, ने अपने मूलग्रन्थ द मेकिंग ऑफ़ अ पोलिटिकल रिफोर्मार : गाँधी इन साऊथ अफ्रीका, १८९३ - १९१४ में इस विवाद की जांच की है।(नई दिल्ली:मनोहर,२००५). अध्याय एक के केन्द्र में,गाँधी, औपनिवेशिक स्थिति में जन्मे अफ्रीकी और भारतीय जो कि श्वेत आधिपत्य में अफ्रीकी और भारतीय समुदायों के संबंधों पर है तथा उन नीतियों पर जिनकी वजह से विभाजन हुआ (और वे तर्क देते हैं कि इन समुदायों के बीच संघर्ष लाजिमी सा है) इस सम्बन्ध के बारे में वे कहते हैं, युवा गाँधी १८९० में उन विभाजीय विचारों से प्रभावित थे जो कि उस समय प्रबल थीं। साथ ही साथ वे यह भी कहते हैं, गाँधी के जेल के अनुभव ने उन्हें उन लोगों कि स्थिति के प्रति अधीक संवेदनशील बना दिया था।..आगे गाँधी दृढ़ हो गए थे; वे अफ्रीकियों के प्रति अपने अभिव्यक्ति में पूर्वाग्रह को लेकर बहुत कम निर्णायक हो गए और वृहत स्तर पर समान कारणों के बिन्दुओं को देखने लगे थे। जोहान्सबर्ग जेल में उनके नकारात्मक दृष्टिकोण में ढीठ अफ्रीकी कैदी थे न कि आम अफ्रीकी.

दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला गाँधी के अनुयायी हैं, २००३ में गाँधी के आलोचकों द्वारा प्रतिमा के अनावरण को रोकने की कोशिश के बावजूद उन्होंने उसे जोहान्सबर्ग में अनावृत किया। भाना और वाहेद ने अनावरण के इर्द-गिर्द होने वाली घटनाओं पर द मेकिंग ऑफ़ अ पोलिटिकल रिफोर्मार : गाँधी इन साऊथ अफ्रीका, १९१३-१९१४ में टिप्पणी किया है। अनुभाग  दक्षिण अफ्रीका के लिए गाँधी के विरासत में वे लिखते हैं  गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका के सक्रिय कार्यकर्ताओं के आने वाली पीढियों को श्वेत अधिपत्य को ख़त्म करने के लिये प्रेरित किया। यह विरासत उन्हें नेल्सन मंडेला से जोड़ती हैं।.माने यह कि जिस कम को गाँधी ने शुरू किया था उसे मंडेला ने खत्म किया। वे जारी रखते हैं उन विवादों का हवाला देते हुए जो गाँधी कि प्रतिमा के अनावरण के दौरान उठे थे। गाँधी के प्रति इन दो दृष्टिकोणों के प्रतिक्रिया स्वरुप, भाना और वाहेद तर्क देते हैं : वे लोग को दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के पश्चात अपने राजनैतिक उद्देश्य के लिए गाँधी को सही ठहराना चाहते हैं वे उनके बारे में कई तथ्यों को नजरंदाज करते हुए कारण  में कुछ ज्यादा मदद नहीं करते; और जो उन्हें केवल एक नस्लवादी कहते हैं वे भी ग़लत बयानी के उतने ही दोषी हैं/विकृति के उतने ही दोषी हैं।

गाँधी राज विरोधी () उस रूप में थे जहाँ उनका दृष्टिकोण उस भारत का हैं जो कि किसी सरकार के अधीन न हो।  उनका विचार था कि एक देश में सच्चे स्वशासन () का अर्थ है कि प्रत्यक व्यक्ति ख़ुद पर शासन करता हैं तथा कोई ऐसा राज्य नहीं जो लोगों पर कानून लागु कर सके।  कुछ मौकों पर उन्होंने स्वयं को एक दार्शनिक अराजकतावादी कहा है (). उनके अर्थ में एक स्वतंत्र भारत का अस्तित्व उन हजारों छोटे छोटे आत्मनिर्भर समुदायों से है (संभवतः टालस्टोय का विचार) जो बिना दूसरो के अड़चन बने ख़ुद पर राज्य करते हैं। इसका यह मतलब नहीं था कि ब्रिटिशों द्वारा स्थापित प्रशाशनिक ढांचे को भारतीयों को स्थानांतरित कर देना जिसके लिए उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान को इंगलिस्तान बनाना है. ब्रिटिश ढंग के संसदीय तंत्र पर कोई विश्वास न होने के कारण वे भारत में आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी को भंग कर प्रत्यक्ष लोकतंत्र () प्रणाली को स्थापित करना चाहते थे।

गांधी के सिद्धान्तों और करनी को लेकर प्रयः उनकी आलोचना भी की जाती है। उनकी आलोचना के मुख्य बिन्दु हैं-




#Article 60: पाकिस्तान (2103 words)


इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान () या पाकिस्तान इस्लामी गणतंत्र या सिर्फ़ पाकिस्तान भारत के पश्चिम में स्थित एक इस्लामी गणराज्य है। 20 करोड़ की आबादी के साथ ये दुनिया का छठा बड़ी आबादी वाला देश है। यहाँ की प्रमुख भाषाएँ उर्दू, पंजाबी, सिंधी, बलूची और पश्तो हिन्दी हैं। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद और अन्य महत्वपूर्ण नगर कराची व लाहौर रावलपिंडी हैं। पाकिस्तान के चार सूबे हैं: पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान और ख़ैबर​-पख़्तूनख़्वा। क़बाइली इलाक़े और इस्लामाबाद भी पाकिस्तान में शामिल हैं। इन के अलावा पाक अधिकृत कश्मीर (तथाकथित आज़ाद कश्मीर) और गिलगित-बल्तिस्तान भी पाकिस्तान द्वारा नियंत्रित हैं हालाँकि भारत इन्हें अपना भाग मानता है।

पाकिस्तान का जन्म सन् 1947 में भारत के विभाजन के फलस्वरूप हुआ था। सर्वप्रथम सन् 1930 में कवि (शायर) मुहम्मद इक़बाल ने द्विराष्ट्र सिद्धान्त का ज़िक्र किया था। उन्होंने भारत के उत्तर-पश्चिम में सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब तथा अफ़गान (सूबा-ए-सरहद) को मिलाकर एक नया राष्ट्र बनाने की बात की थी। सन् 1933 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली ने पंजाब, सिन्ध, कश्मीर तथा बलोचिस्तान के लोगों के लिए पाक्स्तान (जो बाद में पाकिस्तान बना) शब्द का सृजन किया। सन् 1947 से 1970 तक पाकिस्तान दो भागों में बंटा रहा - पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान। दिसम्बर, सन् 1971 में भारत के साथ हुई लड़ाई के फलस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बना और पश्चिमी पाकिस्तान पाकिस्तान रह गया।

पाकिस्तान शब्द का जन्म सन् 1933 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली के द्वारा हुआ पाक्स्तान के रूप में हुआ था।

आज के पाकिस्तानी भूभाग का मानवीय इतिहास कम से कम 5000 साल पुराना है, यद्यपि इतिहास पाकिस्तान शब्द का जन्म सन् 1933 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली के द्वारा हुआ। आज का पाकिस्तानी भूभाग कई संस्कृतियों का गवाह रहा है।

ईसापूर्व 3300-1800 के बीच यहाँ सिन्धुघाटी सभ्यता का विकास हुआ। यह विश्व की चार प्राचीन ताम्र-कांस्यकालीन सभ्यताओं में से एक थी। इसका क्षेत्र सिन्धु नदी के किनारे अवस्थित था पर गुजरात (भारत) और राजस्थान में भी इस सभ्यता के अवशेष पाए गए हैं। मोहेन्जो-दारो, हड़प्पा इत्यादि स्थल पाकिस्तान में इस सभ्यता के प्रमुख अवशेष-स्थल हैं। इस सभ्यता के लोग कौन थे इसके बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। कुछ इसे आर्यों की पूर्ववर्ती शाखा कहते हैं तो कुछ इसे द्रविड़। कुछ इसे बलोची भी ठहराते हैं। इस मतभेद का एक कारण सिन्धु-घाटी सभ्यता की लिपि का नहीं पढ़ा जाना भी है।

ऐसा माना जाता है कि 1500 ईसापूर्व के आसपास आर्यों का आगमन पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों के मार्फ़त भारत में हुआ। आर्यों का निवास स्थान कैस्पियन सागर के पूर्वी तथा उत्तरी हिस्सों में माना जाता है जहाँ से वे इसी समय के करीब ईरान, यूरोप और भारत की ओर चले गए थे। सन् 543 ईसापूर्व में पाकिस्तान का अधिकांश इलाका ईरान (फारस) के हख़ामनी साम्राज्य के अधीन आ गया। लेकिन उस समय इस्लाम का उदय नहीं हुआ था; ईरान के लोग ज़रदोश्त के अनुयायी थे और देवताओं की पूजा करते थे। सन् 330 ईसापूर्व में मकदूनिया (यूनान) के विजेता सिकन्दर ने दारा तृतीय को तीन बार हराकर हखामनी वंश का अन्त कर दिया। इसके कारण मिस्र से पाकिस्तान तक फैले हखामनी साम्राज्य का पतन हो गया और सिकन्दर पंजाब तक आ गया। ग्रीक स्रोतों के मुताबिक उसने सिन्धु नदी के तट पर भारतीय राजा पुरु (ग्रीक - पोरस) को हरा दिया। पर उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया और वह भारत में प्रवेश किये बिना वापस लौट गया। इसके बाद उत्तरी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में यूनानी-बैक्ट्रियन सभ्यता का विकास हुआ। सिकन्दर के साम्राज्य को उसके सेनापतियों ने आपस में बाँट लिया। सेल्युकस नेक्टर सिकन्दर के सबसे शक्तिशाली उत्तराधिकारियों में से एक था।

मौर्यों ने 300 ईसापूर्व के आसपास पाकिस्तान को अपने साम्राज्य के अधीन कर लिया। इसके बाद पुनः यह ग्रीको-बैक्ट्रियन शासन में चला गया। इन शासकों में सबसे प्रमुख मिनांदर ने बौद्ध धर्म को प्रोत्साहित किया। पार्थियनों के पतन के बाद यह फारसी प्रभाव से मुक्त हुआ। सिन्ध के राय राजवंश (सन् 489-632) ने इसपर शासन किया। इसके बाद यह उत्तर भारत के गुप्त और फारस के सासानी साम्राज्य के बीच बँटा रहा।

सन् 712 में फारस के सेनापति मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिन्ध के राजा को हरा दिया। यह फारसी विजय न होकर इस्लाम की विजय थी। बिन कासिम एक अरब था और पूर्वी ईरान में अरबों की आबादी और नियंत्रण बढ़ता जा रहा था। हालांकि इसी समय केन्द्रीय ईरान में अरबों के प्रति घृणा और द्वेष बढ़ता जा रहा था पर इस क्षेत्र में अरबों की प्रभुसत्ता स्थापित हो गई थी। इसके बाद पाकिस्तान का क्षेत्र इस्लाम से प्रभावित होता चला गया। पाकिस्तानी सरकार के अनुसार इसी समय 'पाकिस्तान की नींव' डाली गई थी। इसके 1192 में दिल्ली के सुल्तान पृथ्वीराज चौहान को हराने के बाद ही दिल्ली की सत्ता पर फारस से आए तुर्कों, अरबों और फारसियों का नियंत्रण हो गया। पाकिस्तान दिल्ली सल्तनत का अंग बन गया।

सोलहवीं सदी में मध्य-एशिया से भाग कर आए हुए बाबर ने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया और पाकिस्तान मुगल साम्राज्य का अंग बन गया। मुगलों ने काबुल तक के क्षेत्र को अपने साम्राज्य में मिला लिया था। अठारहवीं सदी के अन्त तक विदेशियों (खासकर अंग्रेजों) का प्रभुत्व भारतीय उपमहाद्वीप पर बढ़ता गया।  सन् 1857 के गदर के बाद सम्पूर्ण भारत अंग्रेजों के शासन में आ गया।

अंग्रेज़ों के शासन काल में, ख़ासकर पंजाब में कई विरोध आंदोलन हुए। इस दौरान पंजाब और सिंध में अच्छी ख़ासी हिंदू आबादी थी। पर जनतंत्र की मांग को लेकर और मुस्लिमों के अल्पमत में होने के कारण अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग होने लगी। पहले सन् 1930 में शायर मुहम्मद इक़बाल ने भारत के उत्तर-पश्चिमी चार प्रान्तों -सिन्ध, बलूचिस्तान, पंजाब तथा अफ़गान (सूबा-ए-सरहद)- को मिलाकर एक अलग राष्ट्र की मांग की थी। 1947 अगस्त में भारत के विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान का जन्म हुआ। उस समय पाकिस्तान में वर्तमान पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों सम्मिलित थे। सन् 1971 में भारत के साथ हुए युद्ध में पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा (जिसे उस समय तक पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था) बांग्लादेश के रूप में स्वतंत्र हो गया।

७११ ईस्वी में पाकिस्तान का पश्चिमी भाग हिंदू राजपूतों द्वारा शासित था। १०७६ इस्वी में गजनी ने राजा जयपाल शाही से इस क्षेत्र को जीत लिया। इसी समय बहुत सी हिंदू जातिया इस्लाम में जाने लगी। इनको अरबो द्वारा शेख का पद दिया गया।
हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन के कई कारण  थे जिसमे इस्लाम के प्रति झुकाव और आर्थिक दबाव प्रमुख थे। मुस्लिम शासकों शासन में संरक्षण और सामाजिक गतिशीलाता के कारण  यह परिवर्तन हो पाया। इसका अन्य कारण जिजिया कर जो धिम्मी (काफ़िर) लोगो पर लगाया जाता था से भी बचा जा सकता था।तत्कालीन कठोर जाति व्यवस्था के कारण दलित जातीय, ऊँची हिंदू जातियों द्वारा सामाजिक अत्याचार अपमान से परेशान होकर सूफीयों द्वारा मुस्लिम बन गई।  
हिंदू जातियों का मुस्लिम परिवर्तन मुख्यत: १३ वी और १४ वी सदी में हुआ था। मुस्लिम आक्रांताओं की विजय का इसमे बहुत प्रभाव था।
उच्च हिंदू जातियाँ भी मुस्लिम धर्म में आर्थिक, राजनैतिक फायदे के कारण आ गई लेकिन फिर भी उनका सामाजिक ढांचा पूर्ववत ही बना रहा। ये परिवर्तन सामूहिक हुए थे जिसके द्वारा सम्पूर्ण जाति को बचाये जाने की धारणा थी।

पाकिस्तान का क्षेत्रफल कोई 8,03,940 वर्ग किलोमीटर है जो ब्रिटेन और फ्रांस के सम्मिलित क्षेत्रफल के करीब आता है। क्षेत्रफल के हिसाब से यह विश्व में 36  स्थान पर है। अरब सागर से लगी इसकी सामुद्रिक सीमा रेखा कोई 1046 किलोमीटर लम्बी है। इसकी ज़मीनी सीमारेखा कुल 6,744 किलोमीटर लम्बी है - उत्तर-पश्चिम में 2430 कि॰मी॰ अफ़ग़ानिस्तान के साथ, दक्षिण पूर्व में 909 किमी ईरान के साथ, उत्तर-पूर्व में 512 कि॰मी॰ चीन के साथ (गुलाम कश्मीर से लगी सीमा) तथा पूर्व में 2912 कि॰मी॰ भारत के साथ।

पाकिस्तान का उत्तरी इलाका पहाड़ी है। यहाँ हिमालय पर्वतों के कई उच्चतम शिखर पाए जाते हैं। इन्हीं के बीच से गुज़रता सकरा रास्ता 'खैबर पास' के नाम से प्रसिद्ध है। भारत से उद्भवित होने वाली पाँच नदियाँ झेलम, चिनाब, रावी, सतलज ऑर बियास यहाँ से बहकर जब समतल भूमि को छूती हँ तो एक अत्यंत उपजाऊ जमीन बनाती हॅ जिसे 'पंजाब' के नाम से जाना जाता हॅ। दक्षिण की ओर इनके संगम से सिन्धु नदी बनती हॅ जिसकी घाटी और भी उपजाऊ है। दक्षिण में यह अरबी समुद्र से जाकर मिलती हैं।

दक्षिण में समुद्री घाटों (बीच, या दीघा) से लेकर उत्तर में हिमालय (काराकोरम) और हिन्दूकुश की बर्फ़ीली चोटियों तक पाकिस्तान में बहुत भौगोलिक विविधता है। पर औसतन रूप से यह क्षेत्र शुष्क है। औसतन 100 सेन्टीमीटर सालाना वर्षा होती है। पाकिस्तान की 5 चोटियाँ 8000 मीटर से भी ज़्यादा ऊँची हैं। उत्तरी क्षेत्रों में मौसमी विविधता अधिक है। वहाँ की गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेन्टीग्रेड से अधिक चला जाता है जबकि सर्दियों में तापमान हिमांक तक पहुँच जाता है। दक्षिण में यह विविधता अपेक्षाकृत कम होती है।

सिन्धु यहाँ की प्रमुख नदी है। इसके अलावा सिन्धु की सहायक नदियाँ पंजाब के आसपास होकर बहती है जिसके कारण पंजाब में कृषियोग्य जलवायु होती है। सिन्धु नदी के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में बलोचिस्तान का इलाका मरुस्थल है। सिन्ध के पूर्वी भाग में थार मरुस्थल का विस्तृत भाग है पर सिन्ध में ही थारपारकार विश्व का एकमात्र उर्वर मरुस्थल है। देश की कुल 27% भूमि कृषियोग्य है।

पाकिस्तान एक विकासशील देश है। सन् 2007 तक पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत की वार्षिक दर से घट रही थी। यहाँ की मुद्रा पाकिस्तानी रुपया है, जो पैसे में बाँटा जा सकता है। एक अमरीकी डालर की कीमत लगभग 104 पाकिस्तानी रुपये (सन् २००६) हैं। सन् 2005 तक पाकिस्तान पर 240 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी कर्ज था जो अमेरिका द्वारा दिए गए ऋणमाफ़ी और अन्य संस्थाओं द्वारा दिए गए वित्तीय मदद के कारण कम होता जा रहा है पर अब अमेरिका पाकिस्तान की कोई सहायता नहीँ करेगा।

यहाँ की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान कम होता जा रहा है। आज कृषि सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 2 फ़ीसदी हिस्सा है जबकि 3 फ़ीसदी सेवा क्षेत्र से आता है। लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल के कारण आज यह दिवालिया होने के कगार पर आ गया

अपने प्रथम चरण में यह पार्टी कराची तक सीमित थी। आज इस पार्टी के अंकुर देश के कोने कोने में दिखाई देते है, अब यह पार्टी एक शहर की नहीं देश के चारो प्रान्त की है
(द्वारा एम क्यु एम प्रान्तीय कमिटी पेशावर)

पाकिस्तान में चार प्रान्त हैं:-

क्षेत्र:

अगस्त 2017 के आँकड़ों के अनुसार पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 20,77,74,520 (लगभग 20.7 करोड़) पाकिस्तान का स्थान विश्व में छठा है, यानि इसकी जनसँख्या ब्राजील से कम और रूस से अधिक है। यहाँ की जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होने के कारण भविष्य में इसके तेजी से बढ़ने की संभावना है। आम हितों की परिषद 25 अगस्त, 2017 को अस्थाई परिणाम प्रस्तुत की गई। इन परिणामों के अनुसार, पाकिस्तान की कुल आबादी 207.8 मिलियन थी, जो 1 9 वर्षों में 57% वृद्धि का प्रतिनिधित्व करती है।  पाकिस्तान की जनगणना के अस्थायी परिणामों में गिलगित-बल्तिस्तान और आज़ाद कश्मीर के आंकड़ों को शामिल नहीं किया गया है, जो कि अंतिम रिपोर्ट में शामिल होने की संभावना है जो 2018 में आ जाएगा। ट्रांसजेंडर आबादी पाकिस्तान में 10,418 है, जो 0.005% है।

पाकिस्तान की शहरी आबादी 75.58 मिलियन है, जो देश की आबादी का लगभग 36.4% है।  महिला जनसंख्या कुल मुख्यालय का 48.8% है।

प्रमुख जातियों का प्रतिशत है: - 

हाल में अफगानिस्तान में चल रहे युद्धों के कारण कई अफगान शरणार्थी भी इस देश में रहने लगे हैं। यहाँ का प्रमुख धर्म इस्लाम है और लगभग 96 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं (77 प्रतिशत सुन्नी और 20 प्रतिशत शिया)। इसके अलावा 1.85 प्रतिशत हिन्दू और 1.6 प्रतिशत ईसाई यहाँ के प्रमुख अल्पसंख्यक हैं।

पाकिस्तान की संवैधानिक भाषा अंग्रेज़ी और राष्ट्रीय भाषा उर्दू है। पंजाबी यहाँ सबसे अधिक बोली जाने वाली स्थानीय भाषा है पर इसको कोई संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है।

पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है, अतः यहाँ की संस्कृति पर इस्लाम का प्रभाव रहा है। नृत्य और संगीत पर इस्लाम की पाबंदी की वजह से सार्वजनिक जीवन में इनका प्रचलन उच्च वर्ग तथा निम्न तबके के बीच रह गया है। सूफ़ी मज़ारों पर मेले और अन्य परंपराएँ सदियों से चली आ रही है।
। शायर इक़बाल, फ़ैज़ अहमद फैज़, अहमद फ़राज़ के अलावे ग़ालिब, मीर, दाग़, जिगर इत्यादि उर्दू शायरों की गज़ले आज भी पसंद की जातीं हैं। ग़ुलाम अली, मेहदी हसन, नुसरत फतह अली खान और उनके भतीजे राहत फ़तेह अली खान प्रमुख गायक हैं। इसके अलावे फ़ारसी शायरी गाई जाती है - इक़बाल, हाफ़िज़, रूमी, निज़ामी गंजवी, अमीर ख़ुसरो और सादी का कलाम कई जगह गाया और मदरसों में भी पढ़ाया जाता है।

उत्तर-पश्चिम के सूबा सरहद में ट्रकों पर की गई चित्रकारी प्रसिद्ध है।

पाकिस्तान 7 हिस्सों में बाँटा गया है :

हॉकी यहाँ का राष्ट्रीय खेल है। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी विश्व कप 2009 में जीता था इसी कारण क्रिकेट की लोकप्रियता बहुत अधिक है। देश की क्रिकेट टीम ने एक बार विश्व कप (सन् १९९२ में) जीता है। पाकिस्तान में क्रिकेट बहोत लोकप्रिय खेल है।




#Article 61: परवेज़ मुशर्रफ़ (221 words)


परवेज़ मुशर्रफ़ (उर्दू: پرويز مشرف; जन्म अगस्त 11, 1943) पाकिस्तान के राष्ट्रपति और सेना प्रमुख रह चुके हैं। इन्होंने साल 1999 में नवाज़ शरीफ की लोकतान्त्रिक सरकार का तख्ता पलट कर पाकिस्तान की बागडोर संभाली और 20 जून, 2001 से 18 अगस्त 2008 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे।

मुशर्रफ़ का जन्म दिल्ली शहर में दरियागंज में हुआ था। भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार कराची में जाकर बसा।

अप्रैल से जून 1999 तक भारत और पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध के दौरान मुशर्रफ़ ही पाकिस्तान के सेना-प्रमुख थे।

अक्टूबर 1999 में नवाज़ शरीफ़ ने जब मुशर्रफ़ को उनके पद से हटाने की कोशिश की तो मुशर्रफ़ के प्रति वफ़ादार जनरलों ने शरीफ़ का ही तख्ता पलट करके सरकार पर कब्जा कर लिया। मई 2000 में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि पाकिस्तान में चुनाव कराए जाएं। मुशर्रफ़ ने जून 2001 में तत्कालीन राष्ट्रपति रफीक़ तरार को हटा दिया व खुद राष्ट्रपति बन गए। अप्रैल 2002 में उन्होंने राष्ट्रपति बने रहने के लिए जनमत-संग्रह कराया जिसका अधिकतर राजनैतिक दलों ने बहिष्कार किया। अक्टूबर 2002 में पाकिस्तान में चुनाव हुए जिसमें मुशर्रफ़ का समर्थन करने वाली मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमाल पार्टी को बहुमत मिला। इनकी सहायता से मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान के संविधान में कई परिवर्तन कराए जिनसे 1999 के तख्ता-पलट और मुशर्रफ़ के अन्य कई आदेशों को वैधानिक सम्मति मिल गई। 


#Article 62: अटल बिहारी वाजपेयी (1617 words)


अटल बिहारी वाजपेयी (25 दिसंबर 1924 ndash; 16 अगस्त 2018) भारत के दो बार के प्रधानमंत्री थे। वे पहले 16 मई से 1 जून 1996 तक, तथा फिर 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वे हिंदी कवि, पत्रकार व एक प्रखर वक्ता थे। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में एक थे, और 1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने लंबे समय तक राष्‍ट्रधर्म, पाञ्चजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। 

वह चार दशकों से भारतीय संसद के सदस्य थे, लोकसभा, निचले सदन, दस बार, और दो बार राज्य सभा, ऊपरी सदन में चुने गए थे। उन्होंने लखनऊ के लिए संसद सदस्य के रूप में कार्य किया, 2009 तक उत्तर प्रदेश जब स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण सक्रिय राजनीति से सेवानिवृत्त हुए। अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारंभ करने वाले वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने गैर काँग्रेसी प्रधानमंत्री पद के 5 वर्ष बिना किसी समस्या के पूरे किए। आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेने के कारण इन्हे भीष्मपितामह भी कहा जाता है। उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से सरकार बनाई थी जिसमें 81 मंत्री थे।

उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे। वहीं शिन्दे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटल जी का जन्म हुआ था। पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में अध्यापन कार्य तो करते ही थे इसके अतिरिक्त वे हिंदी व ब्रज भाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे। पुत्र में काव्य के गुण वंशानुगत परिपाटी से प्राप्त हुए। महात्मा रामचन्द्र वीर द्वारा रचित अमर कृति विजय पताका पढ़कर अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी। अटल जी की बी॰ए॰ की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज (वर्तमान में लक्ष्मीबाई कालेज) में हुई। छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे। 

कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम॰ए॰ की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उसके बाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ-साथ कानपुर में ही एल॰एल॰बी॰ की पढ़ाई भी प्रारम्भ की लेकिन उसे बीच में ही विराम देकर पूरी निष्ठा से संघ के कार्य में जुट गये। डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही, साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलता पूर्वक करते रहे।

सर्वतोमुखी विकास के लिये किये गये योगदान तथा असाधारण कार्यों के लिये 2015 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

वह भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक थे और सन् १९६८ से १९७३ तक वह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके थे। सन् 1952 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, परन्तु सफलता नहीं मिली। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और सन् १९५७ में बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँचे। सन् १९५७ से १९७७ तक जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। मोरारजी देसाई की सरकार में सन् १९७७ से १९७९ तक विदेश मन्त्री रहे और विदेशों में भारत की छवि बनायी।

१९८० में जनता पार्टी से असन्तुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की। ६ अप्रैल १९८० में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व भी वाजपेयी को सौंपा गया। दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए। लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने सन् १९९६ में प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली। १९ अप्रैल १९९८ को पुनः प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली और उनके नेतृत्व में १३ दलों की गठबन्धन सरकार ने पाँच वर्षों में देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम छुए।

सन् २००४ में कार्यकाल पूरा होने से पहले भयंकर गर्मी में सम्पन्न कराये गये लोकसभा चुनावों में भा॰ज॰पा॰ के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (एन॰डी॰ए॰) ने वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और भारत उदय (अंग्रेजी में इण्डिया शाइनिंग) का नारा दिया। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। ऐसी स्थिति में वामपंथी दलों के समर्थन से काँग्रेस ने भारत की केन्द्रीय सरकार पर कायम होने में सफलता प्राप्त की और भा॰ज॰पा॰ विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई। सम्प्रति वे राजनीति से संन्यास ले चुके हैं और नई दिल्ली में ६-ए कृष्णामेनन मार्ग स्थित सरकारी आवास में रहते थे।

अटल सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीक से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊँचाईयों को छुआ।

कुछ ही समय पश्चात पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतरराष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया। इस युद्ध में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण भारतीय सेना को जान माल का बहुत नुकसान हुआ और पाकिस्तान के साथ शुरु किए गए संबंध सुधार एकबार पुनः शून्य हो गए।

भारत भर के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना (अंग्रेजी में- गोल्डन क्वाड्रिलेट्रल प्रोजैक्ट या संक्षेप में जी॰क्यू॰ प्रोजैक्ट) की शुरुआत की गई। इसके अंतर्गत दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई व मुम्बई को राजमार्गों से जोड़ा गया। ऐसा माना जाता है कि अटल जी के शासनकाल में भारत में जितनी सड़कों का निर्माण हुआ इतना केवल शेरशाह सूरी के समय में ही हुआ था।

ये सारे तथ्य सरकारी विज्ञप्तियों के माध्यम से समय समय पर प्रकाशित होते रहे हैं।

वाजपेयी अपने पूरे जीवन अविवाहित रहे। उन्होंने लंबे समय से दोस्त राजकुमारी कौल और बी॰एन॰ कौल की बेटी नमिता भट्टाचार्य को उन्होंने दत्तक पुत्री के रूप में स्वीकार किया। राजकुमारी कौल की मृत्यु वर्ष 2014 में हो चुकी है। अटल जी के साथ नमिता और उनके पति रंजन भट्टाचार्य रहते थे 
 वह हिंदी में लिखते हुए एक प्रसिद्ध कवि थे। उनके प्रकाशित कार्यों में कैदी कविराई कुंडलियां शामिल हैं, जो 1975-77 आपातकाल के दौरान कैद किए गए कविताओं का संग्रह था, और अमर आग है। अपनी कविता के संबंध में उन्होंने लिखा, मेरी कविता युद्ध की घोषणा है, हारने के लिए एक निर्वासन नहीं है। यह हारने वाले सैनिक की निराशा की ड्रमबीट नहीं है, लेकिन युद्ध योद्धा की जीत होगी। यह निराशा की इच्छा नहीं है लेकिन जीत का हलचल चिल्लाओ। 

अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी थे। मेरी इक्यावन कविताएँ अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहल थी। इसमें शृंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया। वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। 

अटल जी ने किशोर वय में ही एक अद्भुत कविता लिखी थी - हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय, जिससे यह पता चलता है कि बचपन से ही उनका रुझान देश हित की तरफ था।   

राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी। विख्यात गज़ल गायक जगजीत सिंह ने अटल जी की चुनिंदा कविताओं को संगीतबद्ध करके एक एल्बम भी निकाला था।

वाजपेयी को २००९ में एक दौरा पड़ा था, जिसके बाद वह बोलने में असक्षम हो गए थे। उन्हें ११ जून २०१८ में किडनी में संक्रमण और कुछ अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया था, जहाँ १६ अगस्त २०१८ को शाम ०५:०५ बजे उनकी मृत्यु हो गयी। उनके निधन पर जारी एम्स के औपचारिक बयान में कहा गया:

उन्हें अगले दिन १७ अगस्त को हिंदू रीति रिवाज के अनुसार उनकी दत्‍तक पुत्री नमिता कौल भट्टाचार्या ने उन्हें मुखाग्नि दी। उनका समाधि स्थल राजघाट के पास शान्ति वन में बने स्मृति स्थल में बनाया गया है। उनकी अंतिम यात्रा बहुत भव्य तरीके से निकाली गयी।  जिसमे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सैंकड़ों नेता गण पैदल चलते हुए गंतव्य तक पहुंचे।  वाजपेयी के निधन पर भारत भर में सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गयी। अमेरिका, चीन, बांग्लादेश, ब्रिटेन, नेपाल और जापान समेत विश्व के कई राष्ट्रों द्वारा उनके निधन पर दुःख जताया गया।

अटल जी की अस्थियों को देश की सभी प्रमुख नदियों में विसर्जित किया गया।

उनकी कुछ प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ इस प्रकार हैं :

चाहे प्रधान मन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष; बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की; नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटल जी कभी नहीं चूके। यहाँ पर उनकी कुछ टिप्पणियाँ दी जा रही हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी :  




#Article 63: क्रिकेट (7881 words)


क्रिकेट एक बल्ले और गेंद का दलीय खेल है जिसकी शुरुआत दक्षिणी इंग्लैंड में हुई थी।
इसका सबसे प्राचीन निश्चित संदर्भ १५९८ में मिलता है, अब यह १०० से अधिक देशों में खेला जाता है। क्रिकेट के कई प्रारूप हैं, इसका उच्चतम स्तर टेस्ट क्रिकेट है, जिसमें वर्तमान प्रमुख राष्ट्रीय टीमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैण्ड, श्रीलंका, वेस्टइंडीज, न्यूजीलैण्ड, पाकिस्तान, ज़िम्बाब्वे , बांग्लादेश अफ़ग़ानिस्तान और आयरलैण्ड हैं। अप्रैल 2018 में, आईसीसी ने घोषणा की कि वह 1 जनवरी 2019 से अपने सभी 120सदस्यों को ट्वेन्टी-२० अंतरराष्ट्रीय की मान्यता प्रदान  क्रिकेट के बल्ले से गेंद को खेलता है। इसी बीच गेंदबाज की टीम के अन्य सदस्य मैदान में क्षेत्ररक्षक के रूप में अलग-अलग स्थितियों में खड़े रहते हैं, ये खिलाड़ी बल्लेबाज को दौड़ बनाने से रोकने के लिए गेंद को पकड़ने का प्रयास करते हैं और यदि सम्भव हो तो उसे आउट करने की कोशिश करते हैं। बल्लेबाज यदि आउट नहीं होता है तो वो विकेटों के बीच में भाग कर दूसरे बल्लेबाज (गैर स्ट्राइकर) से अपनी स्थिति को बदल सकता है, जो पिच के दूसरी ओर खड़ा होता है। इस प्रकार एक बार स्थिति बदल लेने से एक रन बन जाता है। यदि बल्लेबाज गेंद को मैदान की सीमारेखा तक हिट कर देता है तो भी रन बन जाते हैं। स्कोर किए गए रनों की संख्या और आउट होने वाले खिलाड़ियों की संख्या मैच के परिणाम को निर्धारित करने वाले मुख्य कारक हैं।

यह कई बातों पर निर्भर करता है कि क्रिकेट के खेल को ख़त्म होने में कितना समय लगेगा। पेशेवर क्रिकेट में यह सीमा हर पक्ष के लिए २० ओवरों से लेकर ५ दिन खेलने तक की हो सकती है। खेल की अवधि के आधार पर विभिन्न नियम हैं जो खेल में जीत, हार, अनिर्णीत (ड्रा), या बराबरी (टाई) का निर्धारण करते हैं।

क्रिकेट मुख्यतः एक बाहरी खेल है और कुछ मुकाबले कृत्रिम प्रकाश (फ्लड लाइट्स) में भी खेले जाते हैं। उदाहरण के लिए, गरमी के मौसम में इसे संयुक्त राजशाही (UK), ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में खेला जाता है जबकि वेस्ट इंडीज, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश में ज्यादातर मानसून के बाद सर्दियों में खेला जाता है।

मुख्य रूप से इसका प्रशासन दुबई में स्थित अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के द्वारा किया जाता है, जो इसके सदस्य राष्ट्रों के घरेलू नियंत्रित निकायों के माध्यम से विश्व भर में खेल का आयोजन करती है। आईसीसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले पुरूष और महिला क्रिकेट दोनों का नियंत्रण करती है। हालांकि पुरूष, महिला क्रिकेट नहीं खेल सकते हैं पर नियमों के अनुसार महिलाएं पुरुषों की टीम में खेल सकती हैं।

मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप, आस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड, दक्षिणी अफ्रीका और वेस्टइंडीज में क्रिकेट का पालन किया जाता है। नियम संहिता के रूप में होते हैं जो, क्रिकेट के कानून कहलाते हैं और इनका अनुरक्षण लंदन में स्थित मेरीलेबोन क्रिकेट क्लब (एम सी सी) के द्वारा किया जाता है। इसमें आई सी सी और अन्य घरेलू बोर्डों का परामर्श भी शामिल होता है।

क्रिकेट मुकाबला दो दलों (टीमों) या पक्षों के बीच खेला जाता है। हर टीम में ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। इसका मैदान कई आकार और आकृतियों का हो सकता है। मैदान घास का होता है और इसे ग्राउंड्समैन के द्वारा तैयार किया जाता है, जिसके कार्य में उर्वरण, कटाई, रोलिंग और सतह को समतल करना शामिल होता है। मैदान का व्यास  सामान्य होता है। मैदान की परिधि को सीमा कहा जाता है और इसे कभी कभी रंग दिया जाता है या कभी कभी एक रस्सी के द्वारा मैदान की बाहरी सीमा को चिह्नित किया जाता है। मैदान गोल, चौकोर या अंडाकार हो सकता है, क्रिकेट का सबसे प्रसिद्ध मैदान है ओवल। 
प्रत्येक टीम का उद्देश्य होता है दूसरी टीम से अधिक रन बनाना और दूसरी टीम के सभी खिलाड़ियों को आउट करना। क्रिकेट में खेल को ज्यादा रन बना कर भी जीता जा सकता है, चाहे दूसरी टीम को पूरी तरह से आउट न किया गया हो। दूसरे रूप में खेल को जीतने के लिए अधिक रन बनाना और दूसरी टीम को आउट करना जरुरी होता है, अन्यथा मुकाबला बिना किसी नतीजे के समाप्त हो जाता है। खेल शुरू होने से पहले दोनों टीमों के कप्तान एक सिक्के को उछाल करके निर्धारित करते हैं कि कौन सी टीम पहले बल्लेबाजी या गेंदबाजी करेगी। टॉस जीतने वाला कप्तान पिच और मौसम की वर्तमान और प्रत्याशित स्थिति के अनुसार अपना फैसला लेता है।

मुख्य आकर्षण मैदान के विशेष रूप से तैयार किए गए क्षेत्र में होता है (आमतौर पर केन्द्र में) जो पिच कहलाता है। पिच के दोनों और  विकेट लगाए जाते हैं। ये गेंदबाजी उर्फ क्षेत्ररक्षण पक्ष के लिए लक्ष्य होते हैं और बल्लेबाजी पक्ष के द्वारा इनका बचाव किया जाता है जो रन बनाने की कोशिश में होते हैं। मूलतः एक रन तब बनता है जब एक बल्लेबाज गेंद को अपने बल्ले से मारने के बाद पिच के बीच भागता है, हालाँकि नीचे बताये गए विवरण के अनुसार रन बनाने के कई और तरीके हैं। यदि बल्लेबाज और रन बनाने का प्रयास नहीं करता है तो गेंद डेड हो जाती है और गेंदबाज के पास वापिस गेंदबाजी के लिए आ जाती है। गेंदबाजी पक्ष विभिन्न तरीकों से बल्लेबाजों को आउट करने की कोशिश करता है जब तक बल्लेबाजी पक्ष आल आउट न हो जाए। इसके बाद गेंदबाजी वाला पक्ष बल्लेबाजी करता है और बल्लेबाजी वाला पक्ष गेंदबाजी के लिए मैदान में आ जाता है। पेशेवर मैचों में, खेल के दौरान मैदान पर १५ लोग होते हैं। इनमें से दो अंपायर होते हैं जो मैदान में होने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। दो बल्लेबाज होते हैं, उनमें से एक स्ट्राइकर होता है जो गेंद का सामना करता है और और दूसरा नॉन स्ट्राइकर कहा जाता है। बल्लेबाजों की भूमिका रन बनने के साथ और ओवर पूरे होने के साथ बदलती रहती है। क्षेत्ररक्षण टीम के सभी ११ खिलाड़ी एक साथ मैदान पर होते हैं। उनमें से एक गेंदबाज होता है, दूसरा विकेटकीपर और अन्य नौ क्षेत्ररक्षक कहलाते हैं। विकेटकीपर (या कीपर) हमेशा एक विशेषज्ञ होता है लेकिन गेंदबाजी पिच विकेटों के बीच की लम्बाई होती है और चौड़ी होती है। 
यह एक समतल सतह है, इस पर बहुत ही कम घास होती है जो खेल के साथ कम हो सकती है। पिच की हालत मैच और टीम की रणनीति पर प्रभाव डालती है, पिच की वर्तमान और प्रत्याशित स्थिति टीम की रणनीति को निर्धारित करती है।

प्रत्येक विकेट में तीन लकड़ी के स्टंप होते हैं जिन्हें एक सीधी रेखा में रखा जाता है इनके ऊपर दो लकड़ी के बेल्स ([रखे जाते हैं; बेल्स सहित विकेट की कुल ऊंचाई है और तीनों स्टाम्पों की कुल चौड़ाई है .

चार लाइनें, जिन्हें क्रीज के रूप में जाना जाता है, पिच पर विकेट के चारों और पेंट की जाती हैं, ये बल्लेबाज के सुरक्षित क्षेत्र और गेंदबाज की सीमा को निर्धारित करती हैं। ये पोप्पिंग (या बल्लेबाजी) क्रीज या बालिंग क्रीज या दो रिटर्न क्रीज कहलाती हैं।

स्टंप को गेंदबाजी क्रीज की लाइन में रखा जाता है और इन्हें एक दूसरे से थोड़ी दूरी पर रखा जाता है। बीच वाली स्टंप को बिल्कुल केन्द्र पर गेंदबाजी क्रीज की लम्बाई में रखा जाता है पोप्पिंग क्रीज की लम्बाई समान होती है, यह गेंदबाजी की क्रीज के समांतर होती है और विकेट के सामने होती है। रिटर्न क्रीज बाकी दोनों के लम्बवत होती है; ये दोनों पोप्पिंग क्रीज के अंत से जुड़ी होती हैं और इन्हें गेंदबाजी की क्रीज के अंत तक कम से कम इसकी लम्बाई में चित्रित किया जाता है। 

गेंदबाजी करते समय गेंदबाज का पिछला पैर उसकी डिलीवरी स्ट्राइड में दो रिटर्न क्रीजों के बीच में होना चाहिए, जबकि उसका अगला पैर पोप्पिंग क्रीज के ऊपर या उसके पीछे पढ़ना चाहिए। अगर गेंदबाज इस नियम को तोड़ता है, तो अंपायर नो बाल घोषित कर देता है।

बल्लेबाज के लिए पोप्पिंग क्रीज का महत्त्व यह है कि यह उसके सुरक्षित क्षेत्र की सीमा को निर्धारित करता है जब वह अपने इस क्षेत्र से बाहर होता है तो उसका विकेट उखाड़ दिए जाने पर वह स्टंप या रन आउट हो सकता है (नीचे Dismissals देखें)|

पिच की स्थिरता भिन्न हो सकती है जिसके कारण गेंदबाज को मिलने वाला उछाल, स्पिन और गति अलग अलग हो सकती है। सख्त पिच पर बल्लेबाजी करना आसान होता है, क्योंकि इस पर उछाल ऊँचा लेकिन समान होता है। सूखी पिच बल्लेबाजी के लिए खराब मानी जाती है क्यों की इस पर दरारें आ जाती हैं और जब ऐसा होता है तो स्पिनर एक अहम भूमिका अदा कर सकता है। नम पिच या घास से ढकी पिचें (जो हरी पिचें कहलाती हैं) अच्छे तेज गेंदबाज को अतिरिक्त उछाल देने में मदद करती है। इस तरह की पिच पूरे मेच के दौरान तेज गेंदबाज की मदद करती है लेकिन जैसे जैसे मेच आगे बढ़ता है ये बल्लेबाजी के लिए और भी बेहतर होती जाती है।

इस खेल का सार है कि एक गेंदबाज अपनी ओर की पिच से बल्लेबाज की तरफ़ गेंद डालता है जो दूसरे अंत पर बल्ला लेकर उसे स्ट्राइक करने के लिए तैयार रहता है।

बल्ला लकड़ी से बना होता है इसका आकर ब्लेड के जैसा होता है और शीर्ष पर बेलनाकार हेंडल होता है। हेंडल की चौडाई
ब्लेड की चौडाई से अधिक नहीं होनी चाहिए और बल्ले की कुल लम्बाई से अधिक नहीं होनी चाहिए

गेंद एक सख्त चमड़े का गोला होती है जिसकी परिधि गेंद की कठोरता जिसे से अधिक गति से फेंका जा सकता है, वो एक विचारणीय मुद्दा है और बल्लेबाज सुरक्षात्मक कपड़े पहनता है जिसमें शामिल है पेड (जो घुटनों और पाँव के आगे वाले भाग की रक्षा के लिए पहने जाते हैं), बल्लेबाजी के दस्ताने हाथों के लिए, हेलमेट सर के लिए और एक बॉक्स जो पतलून के अन्दर पहना जाता है और क्रोच क्षेत्र को सुरक्षित करता है। कुछ बल्लेबाज अपनी शर्ट और पतलून के अन्दर अतिरिक्त पेडिंग पहनते हैं जैसे थाई पेड, आर्म पेड, रिब संरक्षक और कंधे के पैड

मैदान पर खेल को दो अंपायर नियंत्रित करते हैं, उनमें से एक विकेट के पीछे गेंदबाज की तरफ़ खड़ा रहता है और दूसरा स्क्वेयर लेग की स्थिति में जो स्ट्राइकिंग बल्लेबाज से कुछ गज पीछे होता है। जब गेंदबाज गेंद डालता है तो विकेट वाला अम्पायर गेंदबाज और नॉन स्ट्राइकर के बीच रहता है। यदि खेल की स्थिति पर कुछ संदेह होता है तो अम्पायर परामर्श करता है और यदि आवश्यक होता है तो वो खिलाड़ियों को फ़ील्ड से बहार ले जाकर मैच को स्थगित कर सकता है, जैसे बारिश होने पर या रोशनी कम होने पर|

मैदान से बहार और टी वी पर प्रसारित होने वाले मैचों में अक्सर एक तीसरा अंपायर होता है जो विडियो साक्ष्य की सहायता से विशेष स्थितियों में फ़ैसला ले सकता है। टेस्ट मैचों और दो आईसीसी के पूर्ण सदस्यों के बीच खेले जाने वाले सीमित ओवरों के अंतरराष्ट्रीय खेल में तीसरा अंपायर जरुरी होता है। इन मैचों में एक मैच रेफरी भी होता है जिसका काम है यह सुनिश्चित करना होता है कि खेल क्रिकेट के नियमों के तहत खेल की भावना से खेला जाये|

मैदान के बाहर दो अधिकारिक स्कोरर रनों और आउट होने वाले खिलाड़ियों का रिकॉर्ड रखते हैं, प्रत्येक अधिकारी एक टीम से होता है। 
स्कोरर अंपायर के हाथ के संकेतों द्वारा निर्देशित होते हैं। उदाहरण के लिए, अंपायर एक तर्जनी अंगुली उठा कर बताता है कि बल्लेबाज आउट हो गया है; और यदि बल्लेबाज ने छ: रन बनाए हैं तो वो दोनों हाथों को ऊपर उठाता है। 
स्कोरर क्रिकेट के नियमों के अनुसार सभी रनों, विकेटों और ओवरों का रिकॉर्ड रखते हैं। व्यवहार में, वे अतिरिक्त डेटा भी संचित करते हैं जैसे गेंदबाजी विश्लेषण और रन की दरें|

पारी (हमेशा बहुवचन रूप में प्रयुक्त होती है) बल्लेबाजी पक्ष के सामूहिक प्रदर्शन के लिए एक शब्द है।  सिद्धांत के तौर में, बल्लेबाजी पक्ष के सभी ग्यारह सदस्य बारी बारी से बल्लेबाजी करते हैं, लेकिन कई कारणों से पारी इससे पहले भी ख़त्म हो सकती है (नीचे देखें)|

खेले जा रहे मैच के प्रकार के अनुसार हर टीम की एक या दो परियां होती हैं। पारी शब्द का उपयोग कभी कभी एक बल्लेबाज के व्यक्तिगत योगदान को बताने के लिए भी किया जाता है। (जैसे उसने एक अच्छी पारी खेली,उसकी पारी से टीम ने मैच जीता आदि)

गेंदबाज का मुख्य उद्देश्य क्षेत्ररक्षकों की सहायता से बल्लेबाज को आउट करना होता है। एक बल्लेबाज जब बर्खास्त कर दिया जाता है तब कहा जाता है कि वह आउट हो गया है अर्थात उसे मैदान छोड़ कर जाना होगा और उसकी टीम का अगला बल्लेबाज अब बल्लेबाजी करने आएगा| जब दस बल्लेबाज बर्खास्त (अर्थात आउट) हो जाते हैं तो पूरी टीम बर्खास्त हो जाती है और पारी समाप्त हो जाती है। अंतिम बल्लेबाज, जो आउट नहीं हुआ है, वह अब बल्लेबाजी नहीं कर सकता क्योंकि हमेशा दो बल्लेबाजों को एक साथ मैदान में रहना होता है। यह बल्लेबाज नॉट आउट कहलाता है।

यदि दस बल्लेबाजों के आउट होने से पहले ही एक पारी समाप्त हो जाए तो दो बल्लेबाज नॉट आउट कहलाते हैं। एक पारी तीन कारणों से जल्दी ख़त्म हो सकती है: यदि बल्लेबाजी पक्ष का कप्तान घोषित कर दे की परी समाप्त हो गई है (जो एक सामरिक निर्णय होता है), या बल्लेबाजी पक्ष ने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया हो और खेल को जीत लिया हो, या खेल ख़राब मौसम या समय ख़त्म हो जाने के कारण समाप्त कर दिया जाये| सीमित ओवरों के क्रिकेट में, जब अंतिम ओवर किया जा रहा हो तब भी दो बल्लेबाज बचे हो सकते हैं।

ओवर या षटक ६ गेंदों का समुच्चय या समूह होता है। यह शब्द इस तरह से आया है क्योंकि अंपायर कहता है ओवर यानि पूरा। जब ६ गेंदें डाली जा चुकी होती हैं, तब दूसरा गेंदबाज दूसरे छोर पर आ जाता है और क्षेत्ररक्षक भी अपना स्थान बदल लेते हैं। एक गेंदबाज लगातार दो ओवर नहीं डाल सकता है, हालांकि एक गेंदबाज छोर को बिना बदले उसी छोर से कई ओवर डाल सकता है। बल्लेबाज साइड या छोर को बदल नहीं सकते हैं, इसलिए जो नॉन स्ट्राइकर था वह स्ट्राइकर बन जाता है और स्ट्राइकर अब नॉन स्ट्राइकर बन जाता है। अंपायर भी अपनी स्थिति को बदलते हैं ताकि जो अंपायर स्क्वेयर लेग की स्थिति में था वह विकेट के पीछे चला जाता है और इसका विपरीत भी होता है।

एक टीम में ११ खिलाड़ी होते हैं। प्राथमिक कुशलता के आधार पर एक खिलाड़ी को बल्लेबाज या गेंदबाज के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। एक अच्छी तरह से संतुलित टीम में आमतौर पर पाँच या छह विशेषज्ञ बल्लेबाज और चार या पाँच विशेषज्ञ गेंदबाज होते हैं।
टीम में हमेशा एक विशेषज्ञ विकेट रक्षक होता है क्योंकि यह क्षेत्ररक्षण स्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। प्रत्येक टीम का नेतृत्व कप्तान करता है जो सामरिक निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार होता है, जैसे बल्लेबाजी क्रम का निर्धारण करना, क्षेत्ररक्षकों के स्थान निर्धारित करना और गेंदबाजों की बारी तय करना।
एक खिलाड़ी जो बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों का विशेषज्ञ होता है हरफनमौला कहलाता है। जो बल्लेबाज और विकेट कीपर दोनों का काम करता है वह विकेट कीपर/बल्लेबाज कहलाता है, कभी कभी उसे हरफनमौला भी कहा जाता है, वास्तव में हरफनमौला खिलाड़ी कम ही देखने को मिलते हैं क्योंकि अधिकांश खिलाड़ी बल्लेबाजी या गेंदबाजी में से किसी एक पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं।

क्षेत्ररक्षण के पक्ष के सभी ग्यारह खिलाड़ी मैदान में एक साथ रहते हैं। उनमें से एक विकेट कीपर उर्फ कीपर होता है जो स्ट्राइकर बल्लेबाज के द्वारा बचाए जाने वाले विकेट के पीछे खड़ा रहता है। विकेट कीपिंग सामान्यत: एक विशेषज्ञ ही कर सकता है, उसका मुख्य कम उन गेंदों को पकड़ना होता है जो बल्लेबाज हिट नहीं करता है। जिससे की बल्लेबाज बाई के रन ना ले सके। वह विशेष दस्ताने पहनता हैं, (क्षेत्र रक्षकों में केवल उसी को ऐसा करने की अनुमति होती है) साथ ही अपने नीचले टांगों को कवर करने के लिए पैड भी पहनता है। चूँकि वह सीधे स्ट्राइकर के पीछे खड़ा रहता है, अत: उसके पास इस बात की बहुत अधिक संभावना होती है कि वो बल्लेबाज के बल्ले के किनारे से छू कर निकलती हुई बॉल को कैच करके बल्लेबाज को आउट कर सके। केवल वही एक ऐसा खिलाड़ी है जो बल्लेबाज को स्टम्पड आउट कर सकता है।

वर्तमान गेंदबाज के अलावा शेष ९ क्षेत्र रक्षक कप्तान के द्वारा मैदान में चुने हुए स्थानों पर तैनात रहते हैं।

ये स्थान तय नहीं होते हैं लेकिन ये विशेष और कभी कभी अच्छे नामों से जाने जाते हैं जैसे स्लिप, थर्ड मेन, सिली मिड ऑन और लाँग लेग| हमेशा कुछ असुरक्षित क्षेत्र रहते हैं।

कप्तान क्षेत्ररक्षण पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य होता है क्योंकि वह सभी रणनीतियां निर्धारित करता है, जैसे किसे गेंदबाजी करनी चाहिए (और कैसे); और वह क्षेत्र की सेटिंग के लिए भी जिम्मेदार होता है।

क्रिकेट के सभी रूपों में, यदि एक मैच के दौरान एक क्षेत्ररक्षक घायल या बीमार हो जाता है तो उसके स्थान पर किसी और को प्रतिस्थापित किया जा सकता है। प्रतिस्थापित खिलाड़ी गेंदबाज़ी, कप्तानी या विकेट कीपिंग नहीं कर सकता है। यदि घायल खिलाड़ी ठीक होकर वापस मैदान में आ जाए तो अतिरिक्त खिलाड़ी को मैदान छोड़ना होता है।

गेंदबाज अक्सर दौड़ कर गेंद डालने के लिए आते हैं, हालाँकि कुछ गेंदबाज एक या दो कदम ही दौड़ कर आते हैं और गेंद डाल देते हैं। एक तेज गेंदबाज को संवेग की जरुरत होती है जिसके कारण वह तेजी से और दूरी से दौड़ कर आता है।

तेज गेंदबाज बहुत तेजी से गेंद को डाल सकता है  और कभी कभी वह बल्लेबाज को आउट करने के लिए बहुत ही तेज गति की गेंद डालता है जिससे बल्लेबाज पर तीव्रता से प्रतिक्रिया करने का दबाव बन जाता है। अन्य तेज गेंदबाज गति के साथ साथ किस्मत पर भी भरोसा करते हैं। कई तेज गेंदबाज गेंद को इस तरह से डालते हैं कि वह हवा में झूलती हुई या घूमती हुई आती है, जिसे गेंद का स्विंग होना कहते हैं।

इस प्रकार की डिलीवरी बल्लेबाज को धोखा दे सकती है जिसके कारण उसके शॉट खेलने की टाइमिंग ग़लत हो जाती हैं, जिससे गेंद बल्ले के बाहरी किनारे को छूती हुई निकलती है और उसे विकेट कीपर या स्लिप क्षेत्र रक्षक के द्वारा केच किया जा सकता है।

गेंदबाजों में एक अन्य प्रकार है स्पिनर जो धीमी गति से स्पिन करती हुई गेंद डालता है और बल्लेबाज को धोखा देने की कोशिश करता है। एक स्पिनर अक्सर “विकेट लेने के लिए” गेंद को थोड़ा ऊपर से डालता है और बल्लेबाज को ग़लत शॉट खेलने के लिए उकसाता है। बल्लेबाज को इस तरह की गेंदों से बहुत अधिक सावधान रहना होता है क्योंकि यह गेंद अक्सर बहुत ऊँची और घूर्णन करती हुई आती है और वो उस तरह से व्यवाहर नहीं करती है जैसा कि बल्लेबाज ने सोचा होता है और वो आउट हो सकता है।

तेज़ गेंदबाज़ और स्पिनर के मध्य होते हैं मध्यमगति के गेंदबाज़ जो अपनी सटीक गेंदबाजी से रनों की गति को कम करने पर भरोसा करते हैं और बल्लेबाजों का ध्यान भंग करते हैं।

सभी गेंदबाजों को उनकी गति और शैली के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। ज्यादा क्रिकेट शब्दावली के अनुसार वर्गीकरण () बहुत भ्रमित कर सकते हैं। इस प्रकार से एक गेंदबाज को एल एफ में वर्गीकृत किया जा सकता है जिसका अर्थ है बाएं हाथ का तेज गेंदबाज या एल बी जी में वर्गीकृत किया जा सकता है जिसका अर्थ है दायें हाथ का स्पिन गेंदबाज जो लेग ब्रेक या गूगली डाल सकता है।

गेंदबाजी के दौरान कोहनी को किसी भी कोण पर रखा जा सकता है या मोड़ा जा सकता है लेकिन इस दौरान उसे सीधा नहीं किया जा सकता है। यदि कोहनी अवैध रूप से सीधी हो जाती है तो स्क्वेर लेग अम्पायर इसे नो बॉल () घोषित कर सकता है। वर्तमान नियमों के अनुसार एक गेंदबाज अपनी भुजा को १५ डिग्री या उससे कम तक सीधा कर सकता है।

किसी भी एक समय पर, मैदान में दो बल्लेबाज होते हैं। एक स्ट्राइकर छोर पर रह कर विकेट की रक्षा करता है और संभव हो तो रन बनाता है। उसका साथी, जो नॉन स्ट्राइकर होता है वो उस छोर पर होता है जहाँ से गेंदबाजी की जाती है।

बल्लेबाज बल्लेबाजी क्रम () में आते हैं, यह क्रम कप्तान के द्वारा निर्धारित किया जाता है, पहले दो बल्लेबाज ओपनर कहलाते हैं। उन्हें सामान्यत: सबसे खतरनाक गेंदबाजी का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उस समय तेज गेंदबाज नई गेंद का उपयोग करते हैं। शीर्ष बल्लेबाजी के लिए आम तौर पर टीम में सबसे अधिक सक्षम बल्लेबाज को भेजा जाता है और गैर बल्लेबाजों को अंत में भेजा जाता है। पहले से निर्धारित किया गया बल्लेबाजी क्रम अनिवार्य नहीं है और जब भी एक विकेट गिर जाता है तो कोई भी खिलाड़ी जिसने बल्लेबाजी नहीं की है उसे भेजा जा सकता है।

अगर एक बल्लेबाज मैदान छोड़ के जाता है (आम तौर पर चोट के कारण) और वापस नहीं लौट पता है तो वह वास्तव में नॉट आउट होता है और उसका बहार जाना आउट नहीं माना जाता है, परन्तु उसे बर्खास्त कर दिया जाता है क्योंकि उसकी पारी समाप्त हो चुकी होती है। प्रतिस्थापित बल्लेबाज को अनुमति नहीं होती है। (कुछ जगहों को छोडकर, 2019 से लागू)

एक कुशल बल्लेबाज सुरक्षात्मक और आक्रामक दोनों रूपों में कई प्रकार के शॉट या 'स्ट्रोक' लगा सकता है। मुख्य काम है गेंद को बल्ले की समतल सतह से हिट करना। यदि गेंद बल्ले के किनारे को छूती है तो यह बाहरी किनारा कहलाता है। बल्लेबाज हमेशा ही गेंद को जोर से हिट करने की कोशिश नहीं करता है, एक अच्छा खिलाड़ी एक हल्के चतुर स्ट्रोक से या केवल अपनी कलाई को हल्के से घुमा कर रन बना सकता है। लेकिन वह गेंद को क्षेत्ररक्षकों से दूर हिट करता है ताकि उसे रन बनाने का समय मिल सके।

क्रिकेट में कई प्रकार के शॉट खेले जाते हैं। बल्लेबाज के द्वारा लगाये गए स्ट्रोक को गेंद के स्विंग या उसकी दिशा के अनुसार कई नाम दिए जा सकते हैं जैसे कट ()” ड्राइव,हुक या पुल.

ध्यान दें कि बल्लेबाज को हर शॉट को नहीं खेलना होता है, यदि उसे लगता है कि गेंद विकेट से नहीं टकराएगी तो वह गेंद को विकेट कीपर तक जाने के लिए छोड़ सकता है। इसके साथ ही, वह जब अपने बल्ले से गेंद को हिट करता है तो उसे रन लेने का प्रयास नहीं करना होता है। वह जानबूझकर अपने पैर का प्रयोग करके गेंद को रोक सकता है और उसे अपनी टांग से दूर कर सकता है लेकिन यह एल बी डबल्यू नियम के अनुसार जोखिम भरा हो सकता है।

यदि एक घायल बल्लेबाज बल्लेबाजी करने के लिए फिट हो जाता है लेकिन भाग नहीं सकता हो तो अंपायर और क्षेत्ररक्षण टीम का कप्तान बल्लेबाजी पक्ष के एक अन्य सदस्य को दोड़ने () की अनुमति दे सकता है। यदि संभव हो तो, इस धावक को अपने साथ बल्ला रखना होता है। इस धावक का एक मात्र काम होता है घायल बल्लेबाज के स्थान पर दोड़ना. इस धावक को वो सभी उपकरण पहनने और उठाने होते हैं जो एक बल्लेबाज ने पहने हैं। दोनों बल्लेबाजों के लिए धावक रखना संभव है।

स्ट्राइकर बल्लेबाज की प्राथमिकता होती है गेंद को विकेट पर टकराने से रोकना. और दूसरी प्राथमिकता होती है बल्ले से गेंद को हिट कर के रन () बनाना ताकि इससे पहले कि क्षेत्ररक्षण पक्ष की ओर से गेंद वापस आए, उसे और उसके सहयोगी को रन बनाने का समय मिल जाए. एक रन रजिस्टर करने के लिए, दोनों धावकों को अपने बल्ले से या शरीर के किसी भाग से क्रीज के पीछे की भूमि को छुना होता है। (बल्लेबाज दोड़ते समय बल्ला लिए होते हैं) प्रत्येक रन स्कोर में जुड़ जाता है।

एक ही हिट पर एक से अधिक रन बनाये जा सकते हैं, एक हिट में एक से तीन रन आम हैं, मैदान का आकार इस प्रकार का होता है कि सामान्यत: चार या अधिक रन बनाना कठिन होता है। इसकी क्षतिपूर्ति करने के लिए, यदि गेंद मैदान की सीमा की भूमि को छूती है तो इसे चार रन गिना जाता है। और यदि गेंद सीमा को हवा में पार करके निकल जाती है तो इसे छ: रन गिना जाता है। यदि गेंद सीमा पार चली जाती है तो बल्लेबाज को भागने की जरुरत नहीं होती है।

पाँच रन बहुत ही असामान्य हैं और आमतौर पर यह क्षेत्र रक्षक के द्वारा वापस फेंकी गई गेंद, ओवर थ्रो पर निर्भर करता है। यदि स्ट्राइकर विषम संख्या में रन बनाता है तो बल्लेबाजों का स्थान आपस में बदल जाता है और नॉन स्ट्राइकर अब स्ट्राइकर बन जाता है। केवल स्ट्राइकर ही व्यक्तिगत रूप से रन बनता है लेकिन सभी रन टीम के कुल स्कोर में जोड़े जाते हैं।

रन लेने का फ़ैसला बल्लेबाज, जिसको गेंद की दिशा और गति का ज्ञान होता है, उसके द्वारा किया जाता है और इसको वह हाँ, ना या रुको कहके बताता है।

रन लेने में बहुत जोखिम होता है क्योंकि यदि एक क्षेत्र रक्षक विकेट को गिरा देता है, जब नजदीकी बल्लेबाज अपनी क्रीज से बाहर होता है तो (यानि उसके शरीर का कोई भाग या बल्ला पोप्पिंग क्रीज के संपर्क में नहीं है) बल्लेबाज रन आउट () कहलाता है।

एक टीम के स्कोर को उसके द्वारा बनाये गए रनों की संख्या और आउट हुए बल्लेबाजो की संख्या से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि पाँच बल्लेबाज आउट हो गए हैं और टीम ने २२४ रन बनाये हैं तो कहा जाता है कि उन्होंने ५ विकेट की हानि पर २२४ रन बनाये हैं (इसे साधारणत: २२४ पर ५ और २२४/५ के रूप में लिखा जाता है, ऑस्ट्रेलिया में, ५ पर २२४ और ५/२२४)।

क्षेत्ररक्षण पक्ष की और से की गई त्रुटियों के कारण बल्लेबाजी पक्ष को जो रन प्राप्त होते हैं वे अतिरिक्त () कहलाते हैं। (ऑस्ट्रेलिया में सनड्रिज कहलाते हैं)। यह चार प्रकार से प्राप्त किये जा सकते हैं:

वाइड – दंड के रूप में दी गई एक अतिरिक्त गेंद होती है जो तब दी जाती है जब गेंदबाज ऐसी गेंद डालता है जो बल्लेबाज की पहुँच से बाहर हो। 

जब कोई गेंदबाज एक वाइड या नो बॉल डालता है, तो उसकी टीम को दंड भुगतना पड़ता है क्योंकि उन्हें एक अतिरिक्त गेंद डालनी पड़ती है जिससे बल्लेबाजी पक्ष को अतिरिक्त रन बनने का मौका मिल जाता है। बल्लेबाज को भाग कर रन लेना ही होता है ताकि वह बाईज और लेग बाईज का दावा कर सके। (सिवाय इसके जब गेंद चार रन के लिए सीमा पार चली जाती है) लेकिन ये रन केवल टीम के कुल स्कोर में जुड़ते हैं, स्ट्राइकर के व्यक्तिगत स्कोर में नहीं।

एक बल्लेबाज दस तरीके से आउट हो सकता है और कुछ तरीके इतने असामान्य हैं कि खेल के पूरे इतिहास में इसके बहुत कम उदाहरण मिलते हैं। आउट होने के सबसे सामान्य प्रकार हैं बोल्ड, केच, एल बी डबल्यू, रन आउट, स्टंपड और हिट विकेट.असामान्य तरीके हैं गेंद का दो बार हिट करना, मैदान को बाधित करना, गेंद को हेंडल करना और समय समाप्त.

इससे पहले कि अंपायर बल्लेबाज के आउट होने की घोषणा करें सामान्यत: क्षेत्ररक्षण पक्ष का कोई सदस्य (आमतौर पर गेंदबाज) अपील करता है। यह हाउज़ देट? बोल कर या चिल्ला कर किया जाता है। इसका मतलब है हाउ इस देट? यदि अंपायर अपील से सहमत हैं, तो वह तर्जनी अंगुली उठा कर कहता है आउट!अन्यथा वह सिर हिला कर कहता है नॉट आउट.अपील उस समय तेज आवाज में की जाती है जब आउट होने की परिस्थिति स्पष्ट न हो। यह एल बी डबल्यू की स्थिति में हमेशा होता है और अक्सर रन आउट और स्टंप की स्थिति में होता है।

अधिकांश मामलों में स्ट्राइकर ही आउट होता है। यदि गैर स्ट्राइकर आउट है तो वह रन आउट होता है, लेकिन वह मैदान को बाधित कर के, बॉल को पकड़ कर या समय समाप्त होने पर भी आउट हो सकता है।

एक बल्लेबाज बिना आउट हुए भी मैदान को छोड़ सकता है। अगर उसे चोट लग जाए या वह घायल हो जाए तो वह अस्थायी रूप से जा सकता है, उसे अगले बल्लेबाज के द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। इसे रिटायर्ड हर्ट () या रिटायर्ड बीमार ()के रूप में दर्ज किया जाता है। रिटायर्ड बल्लेबाज नॉट आउट होता है और बाद में फ़िर से आ सकता है। एक अछूता बल्लेबाज, रिटायर हो सकता है उसे रिटायर आउट () कहा जाता है; जिसका श्रेय किसी भी खिलाड़ी को नहीं जाता है। बल्लेबाज नो बॉल पर बोल्ड, केच, लेग बिफोर विकेट ,  स्टंप्डया हिट विकेट आउट नहीं हो सकता है। वो वाइड बॉलपर बोल्ड, केच, लेग बिफोर विकेट , या  बॉल को दो बार हिट करने पर  आउट हो सकता है। इनमें से कुछ प्रकार के आउट गेंदबाज के द्वारा बिना गेंद डाले ही हो सकते हैं। नॉन-स्ट्राइकर बल्लेबाज भी रन आउट () हो सकता है यदि वह गेंदबाज के द्वारा गेंद डालने से पहले क्रीज को छोड़ दे और एक बल्लेबाज क्षेत्ररक्षण बाधित करने पर  या रिटायर आउट होने पर किसी भी समय  आउट हो सकता है। समय समाप्त , बिना डिलीवरी के होने वाली बर्खास्तगी है। आउट होने के किसी भी तरीके में, केवल एक ही बल्लेबाज एक गेंद पर आउट हो सकता है।

एक पारी समाप्त होती है जब: 

एक कप्तान अपनी टीम की पारी को समाप्त घोषित () कर सकता है जब उसके कम से कम दो बल्लेबाज नॉट आउट हों, (यह एक दिवसीय के मैच में लागु नहीं होता है।)

दोनों टीमों के द्वारा बनाये गए रनों की संख्या का अन्तर है।) यदि बाद में खेलने वाली टीम जीतने के लिए पर्याप्त रन बना लेती है तो कहा जाता है कि वह n विकेटों से जीत गई। जहां n बचे हुए विकेटों की संख्या है। उदहारण के लिए यदि कोई टीम केवल ६ विकेट खो कर विरोधी टीम के स्कोर को पार कर लेती है तो कहा जाता है कि वह चार विकेट से मैच जीत गई है

दो पारी के मैच में एक टीम का पहली और दूसरी पारी का कुल स्कोर दुसरे पक्ष की पहली परी के कुल स्कोर से भी कम हो सकता है। तब कहा जाता है कि टीम एक पारी और n रनों से जीत गई है और उसे फ़िर से बल्लेबाजी करने की कोई जरुरत नहीं है: n दोनों टीमों कुल स्कोर के बीच का अंतर है।

यदि अंत में बल्लेबाजी करने वाली टीम ऑल आउट हो जाती है और दोनों साइडों ने समान रन बनाये हैं, तो मैच टाई () हो जाता है; यह नतीजा काफी दुर्लभ होता है। खेल के परंपरागत स्वरूप में, किसी भी पक्ष के जीतने से पहले यदि समय ख़त्म हो जाता है तो खेल को ड्रा () घोषित कर दिया जाता है।

अगर मैच में हर पक्ष के लिए केवल एक पारी है तो हर पारी के लिए की अधिकतम गेंदों की संख्या अक्सर निश्चित कर दी जाती है। इस तरह के मैच सीमित ओवरों के मैच या एक दिवसीय मैच कहलाते हैं और विकेटों की संख्या को ध्यान में न रखते हुए अधिक रन बनाने वाली टीम जीत जाती है। जिससे ड्रा नहीं हो सकता है। यदि इस प्रकार का मैच अस्थायी रूप से ख़राब मौसम के कारण बाधित हो जाता है तो एक जटिल गणितीय सूत्र जो डकवर्थ -लुईस पद्धति कहलाती है उसके मध्यम से एक नया लक्ष्य स्कोर फ़िर से आकलित किया जाता है। एक दिवसीय मैच को भी परिणाम रहित  घोषित किया जा सकता है यदि किसी एक टीम के द्वारा पूर्व निर्धारित ओवर डाले जा चुके हैं और किसी परिस्थिती जैसे गीले मौसम के कारण आगे खेल को नहीं खेला जा सकता है।

व्यापक अर्थों में क्रिकेट एक बहु आयामी खेल है, इसे खेल के पैमानों के आधार पर मेजर क्रिकेट () और माइनर क्रिकेट में विभाजित किया जा सकता है। एक और अधिक उचित विभाजन, विशेष रूप से मेजर क्रिकेट के शब्दों में, मैचों के बीच किया जाता है, जिसमें कुल दो पारियां होती हैं, प्रत्येक टीम को एक पारी खेलनी होती है। इसे पूर्व में प्रथम श्रेणी क्रिकेट () के रूप में जाना जाता था, इसकी अवधि तीन से पाँच दिन होती है, (ऐसे मैचों के उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें समय की कोई सीमा नहीं रही है); बाद में इन्हें सीमित ओवरों के क्रिकेट () के रूप में जाना जाने लगा क्योंकि प्रत्येक टीम प्रारूपिक रूप से सीमित ५० ओवर में गेंदें डालती है, इसकी पूर्व निर्धारित अवधि केवल १ दिन होती है। (एक मेच की अवधि को ख़राब मौसम जैसे किसी कारण से भी बढाया जा सकता है।)

आमतौर पर, दो पारी के मैच में प्रति दिन कम से कम ६ घंटे खेलने के समय () के रूप में दिए जाते हैं। सीमित ओवरों के मैच अक्सर ६ घंटे या अधिक में समाप्त हो जाते हैं। पेय के लिए संक्षिप्त अनौपचारिक अन्तराल के आलावा आम तौर पर भोजन और चाय के लिए औपचारिक अंतराल होते हैं। पारियों के बीच एक छोटा अन्तराल भी होता है। ऐतिहासिक रूप से, क्रिकेट का एक रूप जो सिंगल विकेट () के नाम से जाना जाता था, बेहद सफल रहा था और 18 वीं और 19 वीं सदी में इन स्पर्धाओं में से अधिकांश को मुख्य क्रिकेट का दर्जा दिया गया था। इस रूप में, हालांकि प्रत्येक टीम में १ से ६ खिलाड़ी होते थे और एक समय में केवल एक बल्लेबाज होता था, उसे अपनी पारी की समाप्ति तक हर गेंद का सामना करना होता था। सीमित ओवरों के क्रिकेट की शुरुआत के बाद से सिंगल विकेट क्रिकेट को कभी कभी ही खेला गया है।

टेस्ट क्रिकेट () प्रथम श्रेणी क्रिकेट के सर्वोच्च मानक है। एक टेस्ट मैच उन देशों का प्रतिनिधित्व करने वाली टीमों के बीच एक अंतर्राष्ट्रीय स्थिरता है जो आईसीसी के पूर्ण सदस्य हैं।

जनवरी 2005 में दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड के बीच 

हालांकि शब्द टेस्ट मैच का प्रयोग काफी समय तक नहीं किया गया, ऐसा माना जाता है कि 1876-77 में ऑस्ट्रेलियाई मौसम () में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच इसकी शुरुआत हुई। इसके बाद आठ अन्य राष्ट्रीय दलों ने टेस्ट दर्जा हासिल किया: दक्षिण अफ्रीका (1889), वेस्ट इंडीज (1928), न्यूजीलैंड (1929), भारत (1932), पाकिस्तान ()(1952), श्रीलंका ()(1982), जिम्बाब्वे (1992) और बंगलादेश (2000)। 
बाद में २००६ में जिम्बाब्वे को टेस्ट दर्जे से निलंबित कर दिया गया, क्योंकि यह दूसरी टीमों से स्पर्धा नहीं कर पा रही थी। और अभी तक यह निलंबित है।

वेल्श खिलाड़ी इंग्लैंड के लिए खेलने के लिए पात्र हैं, यह इंग्लैंड और वेल्स की टीम के बीच प्रभावी है। वेस्ट इंडीज टीम में कई राज्यों के खिलाड़ी हैं, कैरेबियन, विशेषकर बारबाडोस, गुयाना, जमैका, त्रिनिडाड और टोबैगोसे और लीवर्ड द्वीप और विंड वार्ड द्वीप से खिलाड़ी इसमें शामिल हैं।

दो टीमों के बीच आमतौर पर टेस्ट मैचों को मकान के एक समूह में खेला जाता है जिसे श्रृंखला कहा जाता है। मैच ५ दिनों तक चल सकते हैं, सामान्य रूप से एक श्रृंखला में ३ से ५ मैच हो सकते हैं। टेस्ट मैच जो दिए गए समय में ख़त्म नहीं होते हैं वह ड्रा हो जाते हैं।

सीमित ओवरों के क्रिकेट () को कभी कभी एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि हर मैच के लिए एक दिन का समय ही निर्धारित किया जाता है।

व्यवहार में, कभी-कभी मैच दूसरे दिन भी जारी रहते हैं यदि वे ख़राब मौसम के कारण बाधित हो जायें या स्थगित कर दिए जायें। एक सीमित ओवरों के मैच का मुख्य उद्देश्य है परिणाम उत्पन्न करना और इसलिए एक परंपरागत ड्रा सम्भव नहीं होता है; लेकिन कई बार परिणाम घोषित नहीं हो पता जब स्कोर टाई हो जाए या ख़राब मौसम के कारण इसे बीच में ही रोकना पड़े। प्रत्येक टीम केवल एक ही पारी खेलती है और एक सीमित संख्या में ओवरों का सामना करती है। आमतौर पर, सीमा है 40 या 50 ओवर, ट्वेन्टी ट्वेन्टी  क्रिकेट में प्रत्येक टीम को केवल 20 ओवरों का सामना करना होता है। एक सीमित ओवरों अंतर्राष्ट्रीय () के दौरान 
मानक सीमित ओवरों के क्रिकेट की शुरुआत इंग्लैंड में 1963 के मौसम में हुई, जब प्रथम श्रेणी के काउंटी क्लबों द्वारा एक नॉक आउट कप पर स्पर्धा हुई। 1969 में एक राष्ट्रीय लीग प्रतियोगिता की स्थापना की गई थी। इसके पीछे अवधारणा थी कि अन्य मुख्य खेलाें में क्रिकेट को शामिल किया जाए और पहला सीमित ओवरों का अंतर्राष्ट्रीय मैच १९७१ में खेला गया। 1975 में, प्रथम क्रिकेट वर्ल्ड कप इंग्लैंड में हुआ। सीमित ओवरों के क्रिकेट में कई बदलाव लाये गए जिसमें बहुल रंगों के किट का उपयोग और एक सफ़ेद गेंद से फ्लड लिट मैच शामिल हैं।

ट्वेंटी २० सीमित ओवर का नया रूप है जिसका उद्देश्य है कि मैच ३ घंटे में ख़त्म हो जाए, सामान्यत: इसे शाम के समय में खेला जाता है। मूल विचार, जब अवधारणा इंग्लैंड में 2003 में पेश की गई, यह था कि कर्मचारियों को शाम के समय में मनोरंजन उपलब्ध कराया जा सके। यह व्यावसायिक रूप से सफल हुआ और इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया है। पहली ट्वेंटी 20 विश्व चैम्पियनशिप () 2007 में आयोजित किया गई। अगली ट्वेंटी 20 विश्व चैम्पियनशिप इंग्लैंड में 2009 में आयोजित की जायेगी

प्रथम श्रेणी क्रिकेट () में टेस्ट क्रिकेट शामिल है लेकिन इस शब्द का उपयोग सामान्यत: पूर्ण आइ सी सी सदस्यता वाले देशों में उच्चतम स्तर के घरेलु क्रिकेट के लिए किया जाता है। हालांकि इसके अपवाद हैं। प्रथम श्रेणी क्रिकेट 18 काउंटी क्लबों के द्वारा इंग्लैंड के बहुत से भाग में खेला जाता है जो काउंटी चैम्पियनशिप () में हिस्सा लेते हैं। काउंटी चैंपियन () की अवधारणा 18 वीं शताब्दी के बाद से ही अस्तित्व में है, लेकिन सरकारी प्रतियोगिता 1890 तक स्थापित नहीं की गई थी। 
यॉर्कशायर काउंटी क्रिकेट क्लब () सबसे सफल क्लब रहा है जिसके पास 30 आधिकारिक शीर्षक हैं।

ऑस्ट्रेलिया ने अपनी राष्ट्रीय प्रथम श्रेणी चैम्पियनशिप की स्थापना 1892-93 में की जब शेफील्ड शील्ड () शुरू की गई थी। ऑस्ट्रेलिया में, प्रथम श्रेणी की टीमें विभिन्न राज्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं। न्यू साउथ वेल्स () ने 2008 तक ४५ के साथ सबसे ज्यादा खिताब जीते हैं।

राष्ट्रीय चैंपियनशिप ट्राफियां कई स्थानों पर स्थापित है रणजी ट्रॉफी () (भारत), प्लुनकेट शील्ड () (न्यूजीलैंड), क्युरी कप () (दक्षिण अफ्रीका) और शैल शील्ड () (वेस्ट इंडीज)। इनमें से कुछ प्रतियोगिताओं का अद्यतन किया गया है और हाल के वर्षों में नए नाम दिए गए हैं।

घरेलू सीमित ओवरों की प्रतियोगिताये इंग्लैंड के जिलेट कप () नोक आउट के साथ १९६३ में शुरू हुई। आमतौर पर देश नोक आउट और लीग दोनों प्रारूपों में मौसमी सीमित ओवरों की प्रतियोगिताओं को करते हैं। हाल के वर्षों में, राष्ट्रीय ट्वेंटी 20 प्रतियोगिताये शुरू हुई हैं। ये सामान्यतया नोक आउट रूप में शुरू की गई हैं लेकिन कुछ मिनी लीग के रूप में भी हैं।

दुनिया भर में खेले जाने वाले इस खेल के असंख्य अनौपचारिक रूप हैं, जिसमें शामिल है इनडोर क्रिकेट, फ्रांसीसी क्रिकेट, बीच क्रिकेट, क्विक क्रिकेट और सभी प्रकार के कार्ड खेल और बोर्ड खेल जो क्रिकेट से प्रेरित हैं। इन रूपों में, अक्सर नियम बदल दिए जाते हैं ताकि सिमित स्रोतों में खेल को खेलने योग्य बनाया जा सके, या सहभागियों के लिए इसे अधिक मनोरंजक और आसन बनाया जा सके।

इंडोर क्रिकेट () को एक जाल युक्त इनडोर क्षेत्र में खेला जाता है, यह बहुत औपचारिक है लेकिन अधिकांश आउटडोर रूप अनौपचारिक हैं

परिवार और किशोर उपनगरीय क्षेत्रों में बेक यार्ड क्रिकेट () खेलते हैं और भारत और पाकिस्तान में गलियों (लम्बी संकरी गलियों में खेला जाता है) में गली क्रिकेट या टेप बॉल खेला जाता है। इसमें ऐसे नियम होते हैं कि एक बाउंस में केच मान लिया जाता है ऐसे नियमों के कारण और स्थान की कमी के कारण बल्लेबाज को ध्यान से खेलना होता है। टेनिस की गेंद और और घर के बल्लों का उपयोग किया जाता है और कई प्रकार की चीजें विकेट के रूप में काम में ली जाती हैं, जाती हैं, उदाहरण के लिए, फ़्रेंच क्रिकेट () में बैटर लेग, यह मूल रूप से फ्रांस में उत्पन्न नहीं हुआ और आम तौर पर छोटे बच्चों के द्वारा खेला जाता है। कभी कभी नियमों में सुधार किया जाता है: जैसे ऐसा स्वीकृत किया जा सकता है कि क्षेत्र रक्षक एक बाउंस के बाद एक हाथ से गेंद को केच कर सकते हैं। या यदि बहुत कम खिलाड़ी उपलब्ध हैं तो हर कोई क्षेत्र रक्षण कर सकता है और खिलाड़ी एक एक कर के बल्लेबाजी करते हैं।

क्विक क्रिकेट () में गेंदबाज बल्लेबाज के तैयार होने का इन्तजार नहीं करता है, यह अधिक थका देने वाला खेल बच्चों के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह अक्सर अंग्रेजी स्कूलों में पी ई पाठ के लिए प्रयुक्त किया जाता है। इस खेल की गति बढ़ाने के लिए इसमें एक और संशोधन किया गया है ये हैं टिप और रन, “टिप्टी रन” टिप्सी रन या टिप्पी- गो नियम. इसमें जब गेंद बल्ले को छूती है तो बल्लेबाज को भागना ही होता है चाहे यह स्पर्श जान बूझ कर न किया गया हो या बहुत ही कम हो। यह नियम, तत्काल खेल में ही देखा जा सकता है, इसमें बल्लेबाज के द्वारा गेंद को रोकने के अधिकार को हटा कर इसकी गति को बढ़ने की कोशिश की गई है।

समोआ में क्रिकेट का एक रूप जो किलिक्ति () कहलाता है, खेला जाता है इसमें हॉकी स्टिक () के आकर के बल्ले का उपयोग किया जाता है। मूल अंग्रेज़ी क्रिकेट में १७६० में हॉकी स्टिक के आकर के बल्ले को आधुनिक सीधे बल्ले से प्रतिस्थापित कर दिया गया, जब गेंदबाजों ने इसे घुमाने के बजाय पिच करना शुरू कर दिया। एस्टोनिया में टीमें आइस क्रिकेट () टूर्नामेंट के लिए सर्दियों में इकठ्ठी होती हैं। खेल में कठोर सर्दी में गर्मी वाले सभी नियमों का पालन करना होता है। अन्यथा सभी नियम छह-एक-पक्ष के सामान होते हैं।

पुराने समय में कभी कभी क्रिकेट को इन रूपों में वर्णित किया जाता था जैसे एक गेंद को टकराता हुआ एक क्लब, या प्राचीन क्लब-गेंद, स्टूल -गेंद, ट्रेप-गेंद, स्टब-गेंद. क्रिकेट को निश्चित रूप से 16 वीं शताब्दी में इंग्लैंड में ट्यूडर समय से प्रचलित माना जाता है, लेकिन यह शायद इससे पहले भी उत्पन्न हो चुका था। इसकी उत्पत्ति का सबसे सामान्य सिद्धांत यह है कि यह मध्यकालीन अवधि के दौरान कैंट और सुस्सेक्स के बीच में वील्ड में कृषि और धातु कार्यों में लगे हुए समुदायों के बच्चों के द्वारा शुरू किया गया था। खेल के लिखित साक्ष्य क्रेग के नाम से जाने जाते हैं, जो १३०१ में न्युन्देन केंट में एडवर्ड I () के बेटे प्रिंस एडवर्ड () के द्वारा खेला जाता था। इस पर सट्टा भी लगाया जाता था, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि यह क्रिकेट का ही रूप था।

खेल ने 18 वीं शताब्दी में प्रमुख विकास किया और यह इंग्लैंड का राष्ट्रीय खेल बन गया। शर्त नें उस विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई साथ ही अमीर समर्थकों ने अपनी XI खिलाड़ियों की टीम तैयार की। लंदन में १७०७ में क्रिकेट बहुत प्रसिद्ध था और फिन्सबरी में आर्टिलरी ग्राउंड () के मैच में बहुत बड़ी भीड़ इकठ्ठी होती थी। खेल के सिंगल विकेट () रूप ने बहुत बड़ी संख्या में भरी भीड़ को आकर्षित किया। गेंदबाजी १७६० के आस पास शुरू हुई जब गेंदबाज ने गेंद को बल्लेबाज की ओर रोल या स्कीम करने के बजाय उसे पिच करना शुरू कर दिया। बाउंस होती हुई गेंद का सामना करने के लिए बल्ले के डिजाइन में क्रन्तिकारी परिवर्तन आया, पुराने हॉकी के आकार के बल्ले को आधुनिक सीधे बल्ले से प्रतिस्थापित करना अनिवार्य था। १७६० में हैम्ब्लडन कप () की स्थापना की गई, अगले २० सालों तक जब तक एम सी सी () की स्थापना हुई और १७८७ में लॉर्ड्स के पुराने ग्राउंड () की शुरुआत हुई, तब तक हैम्ब्लडन खेल का सबसे बड़ा क्लब था और इसका केन्द्र बिन्दु भी था। एमसीसी जल्दी ही खेल का प्रिमिअर क्लब बन गया और क्रिकेट के नियमों () का संरक्षक बन गया। 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध भाग में नए नियम बनाये गए जिसमें तीन स्टम्प का विकेट और लेग बिफोर विकेट शामिल था।

१८५९ में, इंग्लैंड की टीम के खिलाड़ी पहली बार उत्तरी अमेरिका के विदेशी दौरे पर गए थे और १८६२ में, इंग्लिश टीम ने पहली बार ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया। 1876-77 में, एक इंग्लैंड की टीम ने पहली बार ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध मेलबोर्न क्रिकेट मैदान में टेस्ट मैच () में भाग लिया।

डब्लू जी ग्रेस () ने १८६५ में अपना लंबा केरियर शुरू किया; अक्सर कहा जाता है कि उसके केरियर ने खेल में क्रन्तिकारी परिवर्तन किया।इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच प्रतिद्वंद्विता ने 1882 में दी ऐशस () को जन्म दिया। यह टेस्ट क्रिकेट की सबसे प्रसिद्ध प्रतियोगिता थी। टेस्ट क्रिकेट 1888-89 में विस्तृत हो गया जब दक्षिण अफ्रीका ने इंग्लैंड के विरुद्ध खेला प्रथम विश्व युद्धसे पहले के दो दशक क्रिकेट के स्वर्ण युग के नाम से जाने जाते हैं। यह उदासीन नाम युद्ध की हानि के परिणामस्वरूप सामूहिक अर्थ में उत्पन्न हुआ। लेकिन इस अवधि में महान खिलाड़ी हुए और यादगार मैच खेले गए। विशेष रूप से काउंटी में आयोजित प्रतियोगिता और टेस्ट स्तर का विकास हुआ।

युद्ध के दौरान के वर्षों में एक खिलाड़ी का बोलबाला रहा, डॉन ब्रेडमैन जो आंकडों के अनुसार अब तक के सबसे महानतम बल्लेबाज रहें हैं। इंग्लैंड की टीम ने १९३२-३३ में जो असफलता () झेली उसे दूर करने के लिए और कुशलता पाने के लिए उसने दृढ़ संकल्प कर लिया। 20 वीं सदी के दौरान भी टेस्ट क्रिकेट का विस्तार हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध से पहले वेस्ट इंडीज, भारत और न्यूजीलैंड इसमें शामिल हो गए। और युद्ध काल के बाद पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश भी इस श्रेणी में शामिल हो गए। हालांकि, दक्षिण अफ्रीका को 1970 से 1992 तक सरकार की रंगभेद की नीति के कारण अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से प्रतिबंधित कर दिया गया थाक्रिकेट ने 1963 में एक नए युग में प्रवेश किया जब इंग्लिश काउंटी ने सीमित ओवरों () की किस्म की शुरुआत की। चूँकि इसमें परिणाम निश्चित होता था, सीमित ओवरों के क्रिकेट आकर्षक था इससे मैचों की संख्या में वृद्धि हुई। पहला सीमित ओवरों का अंतर्राष्ट्रीय () मैच 1971 में खेला गया। नियंत्रक अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने इसकी क्षमता को देखा और १९७५ में पहले सीमित ओवरों के क्रिकेट वर्ल्ड कप का मंचन किया। 21 वीं सदी में, सीमित ओवरों के एक नए रूप ट्वेंटी 20 (), ने तत्काल प्रभाव उत्पन्न किया।

महिलाओं का क्रिकेट पहली बार 1745 में सरे में दर्ज किया गया था। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में अंतर्राष्ट्रीय विकास शुरू हुआ और दिसंबर 1934 में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच पहला टेस्ट मैच खेला गया। अगले वर्ष, न्यूजीलैंड की महिलाएं उनसे जुड़ गईं, और 2007 में नीदरलैंड महिलाएं दसवीं महिला टेस्ट राष्ट्र बन गईं जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका महिलाओं के खिलाफ अपनी शुरुआत की। 1958 में, अंतर्राष्ट्रीय महिला क्रिकेट परिषद की स्थापना की गई (यह 2005 में आईसीसी के साथ विलय हो गई)। 1973 में, इंग्लैंड में एक महिला विश्व कप आयोजित होने पर पहले क्रिकेट विश्व कप का कोई भी आयोजन हुआ।  2005 में, इंटरनेशनल विमेन क्रिकेट काउंसिल को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के साथ मिलाकर एक एकीकृत निकाय बनाने के लिए क्रिकेट का प्रबंधन और विकास करने में मदद मिली। आईसीसी महिला रैंकिंग 1 अक्टूबर 2015 को महिलाओं के क्रिकेट के सभी तीन प्रारूपों को कवर किया गया था। अक्टूबर 2018 में सभी सदस्यों को टी 20 अंतर्राष्ट्रीय दर्जा देने के आईसीसी के फैसले के बाद, महिलाओं की रैंकिंग को अलग-अलग ओडीआई (पूर्ण सदस्यों के लिए) और टी 20 आई सूचियों में विभाजित किया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी), जिसका मुख्यालय दुबई में है, क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय शासी निकाय है। इसे १९०९ में ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के प्रतिनिधियों के द्वारा इंपीरियल क्रिकेट कॉन्फ्रेंस के रूप में स्थापित किया गया था। १९६५ में इसे अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट सम्मेलन का नाम दिया गया १९८९ में इसे अपना वर्तमान नाम मिला।

अई सी सी के १०४ सदस्य हैं; १० पूरे सदस्य जो अधिकारिक टेस्ट मेच खेलते हैं, ३४ सहयोगी सदस्य हैं और ६० संबद्ध सदस्य हैं। आईसीसी क्रिकेट के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खासकर क्रिकेट विश्व कप के संगठन और शासन के लिए उत्तरदायी है, यह सभी स्वीकृत टेस्ट मैचों, एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय और ट्वेंटी २० अंतरराष्ट्रीय के लिए अंपायर और रेफरियों की नियुक्ति करता है। प्रत्येक राष्ट्र का एक राष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड है जो देश में खेले जाने वाले क्रिकेट मैचों को नियंत्रित करता है। क्रिकेट बोर्ड राष्ट्रीय टीम का भी चयन करता है और राष्ट्रीय टीम के लिए घर में और बाहर दौरों का आयोजन करता है।

विज्डन क्रिकेटर्स अल्मनैक 




#Article 64: बांग्लादेश (1219 words)


बांग्लादेश गणतन्त्र () (बांग्ला) (गणप्रजातन्त्री बांग्लादेश) दक्षिण जंबूद्वीप का एक राष्ट्र है। देश की उत्तर, पूर्व और पश्चिम सीमाएँ भारत और दक्षिणपूर्व सीमा म्यान्मार देशों से मिलती है; दक्षिण में बंगाल की खाड़ी है। बांग्लादेश और भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल एक बांग्लाभाषी अंचल, बंगाल हैं, जिसका ऐतिहासिक नाम “বঙ্গ” बंग या “বাংলা” बांग्ला है। इसकी सीमारेखा उस समय निर्धारित हुई जब 1947 में भारत के विभाजन के समय इसे पूर्वी पाकिस्तान के नाम से पाकिस्तान का पूर्वी भाग घोषित किया गया।

पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान के मध्य लगभग 1600 किलोमीटर (1000 मील) की भौगोलिक दूरी थी। पाकिस्तान के दोनों भागों की जनता का धर्म (इस्लाम) एक था, पर उनके बीच जाति और भाषागत काफ़ी दूरियाँ थीं। पश्चिम पाकिस्तान की तत्कालीन सरकार के अन्याय के विरुद्ध 1971 में भारत के सहयोग से एक रक्तरंजित युद्ध के बाद स्वाधीन राष्ट्र बांग्लादेश का उदभव हुआ। स्वाधीनता के बाद बांग्लादेश के कुछ प्रारंभिक वर्ष राजनैतिक अस्थिरता से परिपूर्ण थे, देश में 13 राष्ट्रशासक बदले गए और 4 सैन्य बगावतें हुई। विश्व के सबसे जनबहुल देशों में बांग्लादेश का स्थान आठवां है। किन्तु क्षेत्रफल की दृष्टि से बांग्लादेश विश्व में 93वाँ है। फलस्वरूप बांग्लादेश विश्व की सबसे घनी आबादी वाले देशों में से एक है। मुसलमान- सघन जनसंख्या वाले देशों में बांग्लादेश का स्थान 4था है, जबकि बांग्लादेश के मुसलमानों की संख्या भारत के अल्पसंख्यक मुसलमानों की संख्या से कम है। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मुहाने पर स्थित यह देश, प्रतिवर्ष मौसमी उत्पात का शिकार होता है और चक्रवात भी बहुत सामान्य हैं। बांग्लादेश दक्षिण एशियाई आंचलिक सहयोग संस्था,सार्क(saarc)और बिम्सटेक का प्रतिष्ठित सदस्य है। यह ओआइसी और डी-8 का भी सदस्य है।

बांग्लादेश में सभ्यता का इतिहास काफी पुराना रहा है। आज के भारत का अंधिकांश पूर्वी क्षेत्र कभी बंगाल के नाम से जाना जाता था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार इस क्षेत्र में आधुनिक सभ्यता की शुरुआत ७०० इसवी ईसा पू. में आरंभ हुआ माना जाता है। यहाँ की प्रारंभिक सभ्यता पर बौद्ध और हिन्दू धर्म का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। उत्तरी बांग्लादेश में स्थापत्य के ऐसे हजारों अवशेष अभी भी मौज़ूद हैं जिन्हें मंदिर या मठ कहा जा सकता है।

बंगाल का इस्लामीकरण मुगल साम्राज्य के व्यापारियों द्वारा १३ वीं शताब्दी में शुरु हुआ और १६ वीं शताब्दी तक बंगाल एशिया के प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र के रूप में उभरा। युरोप के व्यापारियों का आगमन इस क्षेत्र में १५ वीं शताब्दी में हुआ और अंततः १६वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा उनका प्रभाव बढ़ना शुरु हुआ। १८ वीं शताब्दी आते-आते इस क्षेत्र का नियंत्रण पूरी तरह उनके हाथों में आ गया जो धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गया। जब स्वाधीनता आंदोलन के फलस्वरुप १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ तब राजनैतिक कारणों से भारत को हिन्दू बहुल भारत और मुस्लिम बहुल पाकिस्तान में विभाजित करना पड़ा।

पाकिस्तान के गठन के समय पश्चिमी क्षेत्र में सिंधी, पठान, बलोच और मुजाहिरों की बड़ी संख्या थी, जिसे पश्चिम पाकिस्तान कहा जाता था, जबकि पूर्व हिस्से में बंगाली बोलने वालों का बहुमत था, जिसे पूर्व पाकिस्तान कहा जाता था। हालांकि पूरबी भाग में राजनैतिक चेतना की कभी कमी नहीं रही लेकिन पूर्वी हिस्सा देश की सत्ता में कभी भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं पा सका एवं हमेशा राजनीतिक रूप से उपेक्षित रहा। इससे पूर्वी पाकिस्तान के लोगों में जबर्दस्त नाराजगी थी। और इसी नाराजगी के परिणाम स्वरुप उस समय पूर्व पाकिस्तान के नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने अवामी लीग का गठन किया और पाकिस्तान के अंदर ही और स्वायत्तता की मांग की। 1970 में हुए आम चुनाव में पूर्वी क्षेत्र में शेख की पार्टी ने जबर्दस्त विजय हासिल की। उनके दल ने संसद में बहुमत भी हासिल किया लेकिन बजाए उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के उन्हें जेल में डाल दिया गया। और यहीं से पाकिस्तान के विभाजन की नींव रखी गई।

बांग्लादेश बनने से पहले पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने स्थानीय नेताओं और धार्मिक चरमपंथियों की मदद से मानवाधिकारों का हनन किया। २५ मार्च १९७१ को शुरू हुए ऑपरेशन सर्च लाइट से लेकर पूरे बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पूर्वी पाकिस्तान में जमकर हिंसा हुई। बांग्लादेश सरकार के मुताबिक इस दौरान करीब ३० लाख लोग मारे गए। हालांकि, पाकिस्तान सरकार की ओर से गठित किए गए हमूदूर रहमान आयोग ने इस दौरान सिर्फ २६ हजार आम लोगों की मौत का नतीजा निकाला।

बांग्लादेश की राजनीति में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रधान होता है, जबकि प्रधानमंत्री देश का प्रशासनिक प्रमुख होता है। राष्ट्रपति को हर पाँच साल बाद चुना जाता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, प्रधानमंत्री ऐसे व्यक्ति को चुना जाता है जो उस समय संसद का सदस्य हो और राष्ट्रपति को विश्वास दिलाये कि उसे संसद में बहुमत का समर्थन हासिल है। प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों की कैबिनेट गठित करता है जिसके नियुक्ति की मंजूरी राष्ट्रपति देता है।

बांग्लादेश की संसद को जातीय संसद कहा जाता है जिसके 300 सदस्य प्रत्यक्ष मतदान द्वारा चुनकर आते हैं और पाँच साल तक अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। देश की सबसे बड़ी वैधानिक संस्था बांग्लादेशी सर्वोच्च न्यायालय जिसके प्रधान न्यायाधीश और अन्य न्यायधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

बांग्लादेश को छः उपक्षेत्रों में बांटा गया है जिनका नाम उन राज्यों की राजधानियों के नाम पर रखा गया है।

बांग्लादेश का अधिकतर हिस्सा समुद्र की सतह से बहुत कम ऊँचाई पर स्थित है। ज्यादातर हिस्सा भारतीय उपमहाद्वीप में नदियों के मुहाने पर स्थित है जो सुंदरवन के नाम से जाना जाता है। ये मुहाने गंगा (स्थानीय नाम पद्मा नदी), ब्रम्हपुत्र, यमुना और मेघना नदियों के हैं जो बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में अवस्थित हैं जो ज्यादातर हिमालय से निकलती हैं। बांग्लादेश की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है लेकिन बाढ और अकाल दोनों से काफी प्रभावित होती रहती है। पहाड़ी क्षेत्र सिर्फ़ चिटागांग जिले में स्थित हैं जिसकी सबसे ऊँची चोटी केओक्रादांग 1,230 मीटर ऊँची है जो सिलहट मंडल के दक्षिण पूर्व में स्थित है।

बांग्ला देश की जलवायु उष्णकटिबंधीय जलवायु है, यहाँ अक्तूबर से मार्चतक जाड़े का मौसम होता है। मार्च से जून तक उमस भरी गर्मी होती है और मार्च से जून तक मानसून के मौसम की बारिश होती है। बांग्लादेश को प्राय: हर साल चक्र्वातीय तूफान का सामन करना पड़ता है। मिट्टी का अपरदन और वनों की अंधाधुंध कटाई यहाँ की कुछ बड़ी समस्याएँ हैं। ढाका यहाँ का सबसे बड़ा शहर है, अन्य बड़े शहरों में चिटागांग, राजशाही और खुलना हैं। चिटागांग के दक्षिण में स्थित काक्स बाजार विश्व के सबसे लंबी बीच में से एक है।

एक अनुमान के मुताबिक 2007 से 2010 के बीच बांग्लादेश की जनसंख्या 1500 से 1700 लाख के बीच होना चाहिए था, किन्तु अनुमान से कम है, लेकिन यह दुनिया का 8 वां सबसे अधिक आबादी वाला देश है। यद्यपि 1951 में, इस देश की जनसंख्या 44 लाख थी। यह दुनिया का सबसे घनी आबादी वाला देश है और बहुत छोटे देशों तथा शहर राज्यों शामिल कराते हुये जनसंख्या घनत्व के मामले में यह विश्व में 11 वें स्थान पर है।

बांग्लादेश ने 2018 सरकारी नोकरियों से आरक्षण का प्रावधान खत्म किया।

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्व के एकमात्र व्यक्ति हैं, जिनकी रचना को एक से अधिक देशों क्रमश: भारत और बांग्लादेश में राष्ट्रगान का दर्जा प्राप्त है। उनकी कविता 'आमार सोनार बाँग्ला' बांग्लादेश का राष्ट्रगान है।

बांग्लादेश में अपनी मूल भाषा के रूप में 98% से अधिक बंगाली भाषा बोलते हैं, जो यहाँ की आधिकारिक भाषा है। अंग्रेजी का भी मध्य और उच्च वर्ग के बीच एक दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग किया जाता है और भी व्यापक रूप से उच्च शिक्षा और कानूनी प्रणाली में इसका इस्तेमाल होता है।




#Article 65: लाहौर (1172 words)


लाहौर ( / ਲਹੌਰ,  ) पाकिस्तान के प्रांत पंजाब की राजधानी है एवं कराची के बाद पाकिस्तान में दूसरा सबसे बडा आबादी वाला शहर है। इसे पाकिस्तान का दिल नाम से भी संबोधित किया जाता है क्योंकि इस शहर का पाकिस्तानी इतिहास, संस्कृति एवं शिक्षा में अत्यंत विशिष्ट योगदान रहा है। इसे अक्सर पाकिस्तान बागों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। लाहौर शहर रावी एवं वाघा नदी के तट पर भारत पाकिस्तान सीमा पर स्थित है।

लाहौर का ज्यादातर स्थापत्य मुगल कालीन एवं औपनिवेशिक ब्रिटिश काल का है जिसका अधिकांश आज भी सुरक्षित है। आज भी बादशाही मस्जिद, अली हुजविरी शालीमार बाग एवं नूरजहां तथा जहांगीर के मकबरे मुगलकालीन स्थापत्य की उपस्थिती एवं उसकी महत्ता का आभास करवाता है। महत्वपूर्ण ब्रिटिश कालीन भवनों में लाहौर उच्च न्यायलय जनरल पोस्ट ऑफिस, इत्यादि मुगल एवं ब्रिटिश स्थापत्य का मिश्रित नमूना बनकर लाहौर में उपस्थित है एवं ये सभी महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल के रूप में लोकप्रिय हैं।

मुख्य तौर पर लाहौर में पंजाबी को मातृ भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाती है हलाकि उर्दू एवं अंग्रेजी भाषा भी यहां प्रचलन में है एवं नौजवानों में लोकप्रिय है। लाहौर की पंजाबी शैली को लाहौरी पंजाबी के नाम से भी जाना जाता है जिसमे पंजाबी एवं उर्दू का सुंदर मिश्रण होता है। १९९८ की जनगणना के अनुसार शहर की जनगणना लगभग ७ लाख आंकी गयी थी जिसके जून २००६ में १० लाख होने की गणना गयी थी। इस अनुमान के अनुसार लाहौर् दक्षिण एशिया में पांचवी सबसे बडी जनसंख्या वाला एवं दुनिया में २३वीं सबसे बडी आबादी वाला शहर है।

ऐसा माना जाता है कि लाहौर की स्थापना भगवान श्री राम के पुत्र लव ने की थी। आज भी कुछ ऐसे अंश मिलते हैं जिन से राम के दिनो की याद ताज़ा हो जाती हे इन अंश में लव का मंदिर भी है। लव का उच्चारण लह भी किया जाता है, जिससे कि लाहौर शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है।

पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा शहर लाहौर यहां की सांस्कृतिक राजधानी के रूप विख्यात है। यह शहर पिछली कई शताब्दियों से बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक गतिविधियों का गढ़ रहा है। रावी नदी के किनारे स्थित यह शहर पंजाब प्रांत की वाणिज्यिक गतिविविधों का केन्द्र है। पर्यटकों के देखने के लिए यहां लोकप्रिय और चर्चित पर्यटन स्थलों की भरमार है। लाहौर फोर्ट, बादशाही मस्जिद, अकबरी गेट, कश्मीरी गेट, चिड़ियाघर, शालीमार गार्डन, वजीर खान मस्जिद आदि चर्चित स्थल हैं।

कन्हैयालाल लिखते हैं कि पुराने स्थापत्य और कला के मंदिर, हिंदूओं के प्रार्थना स्थल बहुत हैं जिन का उल्लेख नहीं हो सकता। छोटे छोटे शिवाले-ओ-ठाकुरद्वारे-ओ-देवी द्वारे अगणित हैं। इन में से-ओ-जदीद दोनों किस्म के हैं। मगर सखी अह्द में पुरानी इमारात के मंदिर भी अज सर-ए-नौ नबाए गए थे जिन की इमारात ताज़ा नज़र आती हैं। बाअज़ मंदिर जो उन से नामी गिरामी हैं और ख़ास-ओ-आम वहां जा कर पूजा करते हैं इस क़िस्म में लिखे जाते हैं। (1) मगर याद रहे कि ये कन्हैयालाल ने 1882ई. में अपने पुस्तक तारीख़ लाहौर में लिखा था। और आज बहुत से स्थापत्य का विनाश हो चुका हैं।

पुराने शहर की यह मस्जिद अपनी टाइल की कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है। बहुत बार इसे लाहौर के गाल के जासूस के नाम से भी संबोधित किया जाता है। यह मस्जिद 1634-35 ई. में मुगल सम्राट शाहजहां के काल में बननी शुरू हुई थी और इससे बनने में सात वर्ष का समय लगा था। मस्जिद को चिनिओट के शेख इलमुद्दीन अंसानी ने बनवाया था। बाद में उसे लाहौर का गवर्नर अर्थात वजीर बना दिया गया था। मस्जिद में फारसी भाषा में अनेक प्रकार के अभिलेख मुद्रित हैं।

इस मस्जिद को 1673 ई. में मुगल सम्राट औरंगजेब ने बनवाया था। यह मस्जिद मुगल काल की सौंदर्य और भव्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। पाकिस्तान की इस दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद में एक साथ 55000 हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं। बादशाही मस्जिद का डिजाइन दिल्ली की जामा मस्जिद से काफी मिलता-जुलता है । मस्जिद लाहौर किले के नजदीक स्थित है। हाल में मस्जिद परिसर में एक छोटा संग्रहालय भी जोड़ा गया है।

किम्स गन या भंगियावाला तोप लाहौर संग्रहालय में रखी एक विशाल तोप है। यह गन 14 फीट या 4.38 मीटर लंबी है। गन का औसत व्यास 9.5 इंच है। यह गन लाहौर में 1757 ई. में शाहवाली खान के निर्देश पर शाह नजीर द्वारा लाई गई थी। यह ऐतिहासिक गन एशिया महाद्वीप की सबसे विशाल गनों में एक है। माना जाता है कि इस गन को तांबे और पीतल से बनाया गया है। 1761 में पानीपत के युद्ध में अहमदशाह अब्दाली ने इस गन का इस्तेमाल किया था।

लाहौर के उत्तर-पश्चिम किनारे में स्थित यह किला यहां का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। किले के भीतर शीश महल, आलमगीर गेट, नौलखा पेवेलियन और मोती मस्जिद देखी जा सकती है। यह किला 1400 फीट लंबा और 1115 फीट चौड़ा है। यूनेस्को ने 1981 में इसे विश्वदाय धरोहरों सूची में शामिल किया है। माना जाता है कि इस किले को 1560 ई. में अकबर ने बनवाया था। आलमगीर दरवाजे से किले में प्रवेश किया जाता है जिसे 1618 में जहांगीर ने बनवाया था। दीवाने आम और दीवाने खास किले के मुख्य आकर्षण हैं।

यह म्युजियम 1894 में स्थापित किया गया था। ओल्ड यूनिवर्सिटी हॉल के निकट स्थित इस म्युजियम को दक्षिण एशिया के सबसे विशाल म्युजियमों में एक माना जाता है। म्युजियम में मुगलों, सिक्खों और ब्रिटिश काल की अनेक बहुमूल्य और दुर्लभ कलाकृतियों को देखा जा सकता है। यहां वाद्ययंत्रों, प्राचीन आभूषणों, कपड़ों, मिट्टी के बर्तनों और हथियारों का विस्तृत संग्रह देखा जा सकता है। दौड़ते हुए बुद्ध की मूर्ति म्युजियम की एक अमूल्य एवं दुर्लभ निधि है।

इस गार्डन को मुगल सम्राट शाहजहां ने 1641 ई. में बनवाया था। चारों ओर से ऊंची दीवारों से घिरा यह गार्डन अपने जटिल फ्रेमवर्क के लिए प्रसिद्ध है। 1981 में यूनेस्को ने इसे लाहौर किले के साथ विश्वदाय धरोहरों में शामिल किया था। फराह बख्स, फैज बख्स और हयात बख्स नामक चबूतरे गार्डन की सुंदरता में वृद्धि करते हैं।

शाहदरा नगर के निकट स्थित जहांगीर मकबरा मुगल सम्राट जहांगीर को समर्पित है। इसे जहांगीर की मृत्‍यु के 10 साल बाद उनके पुत्र शाहजहां ने बनवाया था। एक बगीचे के अंदर स्थित मकबरे की मीनारें 30 मीटर ऊंची हैं। मकबरे के भीतरी हिस्से में भित्तिचित्रों की सुंदर सजावट है।

लाहौर के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में यह खूबसूरत बाग शामिल है। इसके पूर्व में लाहौर किला, उत्तर में रणजीत सिंह की समाधि, पश्चिम में बादशाही मस्जिद और दक्षिण में रोशनई दरवाजा स्थित है। इस बाग का निमार्ण 1813 ई. में पंजाब के महान शासक महाराजा रणजीत सिंह ने बनवाया था। इस बाग को कोहिनूर हीर को अफगान के शासक शाह शुजा से पुन: भारत लाए जाने के उपलक्ष्य में बनवाया गया था।

लाहौर का अल्लामा इकबाल अन्तर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र दिल्ली के इंदिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र से वायुमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। दिल्ली और लाहौर के बीच नियमित फ्लाइटें हैं।

दिल्ली और लाहौर के बीच चलने वाली बस के माध्यम से सड़क मार्ग द्वारा लाहौर पहुंचा जा सकता है।

लाहौर के मस़हूर खेलों मैं क्रिकेट, हाकी, और फ़ुटबाल स़ामिल हैं। लाहौर स्थित गद्दाफी स्टेडियम पाकिस्तान का एक प्रमुख क्रिकेट का मैदान है।

लाहौर के सात भगिनी शहर है:




#Article 66: नेपाल (4650 words)


नेपाल (आधिकारिक रूप में, संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल ) एक दक्षिण एशियाई स्थलरुद्ध राष्ट्र है। नेपाल के उत्तर मे चीन का स्वायत्तशासी प्रदेश तिब्बत है और दक्षिण, पूर्व व पश्चिम में भारत अवस्थित है। नेपाल के 85 प्रतिशत नागरिक हिन्दू धर्मावलंबी हैं। नेपाल विश्व के प्रतिशत आधार पर सबसे बड़ा हिन्दू धर्मावलंबी राष्ट्र है। नेपाल की राजभाषा नेपाली है और नेपाल के लोगों को भी नेपाली कहा जाता है।

एक छोटे से क्षेत्र के लिए नेपाल की भौगोलिक विविधता बहुत उल्लेखनीय है। यहाँ तराई के उष्ण फाँट से लेकर ठण्डे हिमालय की श्रृंखलाएँँ अवस्थित हैं। संसार का सबसे ऊँची 14 हिम श्रृंखलाओं में से आठ नेपाल में हैं जिसमें संसार का सर्वोच्च शिखर सागरमाथा एवरेस्ट (नेपाल और चीन की सीमा पर) भी एक है। नेपाल की राजधानी और सबसे बड़ा नगर काठमांडू है। काठमांडू उपत्यका के अन्दर ललीतपुर (पाटन), भक्तपुर, मध्यपुर और किर्तीपुर नाम के नगर भी हैं अन्य प्रमुख नगरों में पोखरा, विराटनगर, धरान, भरतपुर, वीरगंज, महेन्द्रनगर, बुटवल, हेटौडा, भैरहवा, जनकपुर, नेपालगंज, वीरेन्द्रनगर, महेन्द्रनगर आदि है।

वर्तमान नेपाली भूभाग अठारहवीं सदी में गोरखा के शाह वंशीय राजा पृथ्वी नारायण शाह द्वारा संगठित नेपाल राज्य का एक अंश है। अंग्रेज़ों के साथ हुई संधियों में नेपाल को उस समय (1814 में) एक तिहाई नेपाली क्षेत्र ब्रिटिश इंडिया को देने पड़े, जो आज भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड तथा पश्चिम बंगाल में विलय हो गये हैं। बींसवीं सदी में प्रारंभ हुए जनतांत्रिक आन्दोलनों में कई बार विराम आया जब राजशाही ने जनता और उनके प्रतिनिधियों को अधिकाधिक अधिकार दिए। अंततः २००८ में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि माओवादी नेता प्रचण्ड के प्रधानमंत्री बनने से यह आन्दोलन समाप्त हुआ। लेकिन सेना अध्यक्ष के निष्कासन को लेकर राष्ट्रपति से हुए मतभेद और टीवी पर सेना में माओवादियों की नियुक्ति को लेकर वीडियो फ़ुटेज के प्रसारण के बाद सरकार से सहयोगी दलों द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद प्रचण्ड को इस्तीफा देना पड़ा। ग़ौरतलब है कि माओवादियों के सत्ता में आने से पहले सन् 2006 में राजा के अधिकारों को अत्यंत सीमित कर दिया गया था।

नेपाल एशिया का हिस्सा है। दक्षिण एशिया में नेपाल की सेना पाँचवीं सबसे बड़ी सेना है और विशेषकर विश्व युद्धों के दौरान, अपने गोरखा इतिहास के लिए उल्लेखनीय रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के लिए महत्वपूर्ण योगदानकर्ता रही है।

'नेपाल' शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों की विभिन्न धारणाएँ हैं। नेपाल शब्द की उत्त्पत्ति के बारे में ठोस प्रमाण कुछ नहीं है, लेकिन एक प्रसिद्ध विश्वास अनुसार यह शब्द 'ने' ऋषि तथा पाल (गुफा) मिलकर बना है। माना जाता है कि एक समय नेपाल की राजधानी काठमांडू 'ने' ऋषि का तपस्या स्थल था। 'ने' मुनि द्वारा पालित होने के कारण इस भूखंड का नाम नेपाल पड़ा, ऐसा कहा जाता है।
तिब्बती भाषा में 'ने' का अर्थ 'मध्य' और 'पा' का अर्थ 'देश' होता है। तिब्बती लोग 'नेपाल' को 'नेपा' ही कहते हैं। 'नेपाल' और 'नेवार' शब्द की समानता के आधार पर डॉ॰ ग्रियर्सन और यंग ने एक ही मूल शब्द से दोनों की व्युत्पत्ति होने का अनुमान किया है। टर्नर ने नेपाल, नेवार, अथवा नेवार, नेपाल दोनों स्थिति को स्वीकार किया है। 'नेपाल' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में किया है। उस काल में बिहार में जो मागधी भाषा प्रचलित थी उसमें 'र' का उच्चारण नहीं होता था। सम्राट् अशोक के शिलालेखों में 'राजा' के स्थान पर 'लाजा' शब्द व्यवहार हुआ है। अत: नेपार, नेबार, नेवार इस प्रकार विकास हुआ होगा।

हिमालय क्षेत्र में मनुष्यों का आगमन लगभग ९,००० वर्ष पहले होने के तथ्य की पुष्टि काठमांडू उपत्यका में पाये गये नव पाषाण औजारों से होती है। सम्भवतः तिब्बती-बर्माई मूल के लोग नेपाल में २,५०० वर्ष  पूर्व आ चुके थे। 
५५०० ईसा पुर्व महाभारत काल मेंं जब कुंती पुत्र पांचों पाण्डव स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान कर रहे थे तभी पाण्डुपुत्र भीम ने भगवान महादेव को दर्शन देने हेतु विनती की। तभी भगवान शिवजी ने उन्हे दर्शन एक लिंग के रुप मे दिये जो आज पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग  के नाम से जाना जाता है । १५०० ईसा पूर्व के आसपास हिन्द-आर्यन जातियों ने काठमांडू उपत्यका में प्रवेश किया। करीब १००० ईसा पूर्व में छोटे-छोटे राज्य और राज्य संगठन बनें। नेपाल स्थित जनकपुर में भगवान श्रीरामपत्नी माता सिताजी का जन्म ७५०० ईसा पुर्व हुआ।सिद्धार्थ गौतम (ईसापूर्व ५६३–४८३) शाक्य वंश के राजकुमार थे, उनका जन्म नेपाल के लुम्बिनी में हुआ था, जिन्होंने अपना राज-पाट त्याग कर तपस्वी का जीवन निर्वाह किया और वह बुद्ध बन गए।

२५० ईसा पूर्व तक इस क्षेत्र में उत्तर भारत के मौर्य साम्राज्य का प्रभाव पड़ा और बाद में चौथी शताब्दी में गुप्तवंश के अधीन में कठपुतली राज्य हो गया। इस क्षेत्र में ५वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आकर वैशाली के लिच्छवियों के राज्य की स्थापना हुई। ८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लिच्छवि वंश का अस्त हो गया और सन् ८७९ से नेवार (नेपाल की एक जाति) युग का उदय हुआ, फिर भी इन लोगों का नियन्त्रण देशभर में कितना हुआ था, इसका आकलन कर पाना कठिन है। ११वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दक्षिण भारत से आए चालुक्य साम्राज्य का प्रभाव नेपाल के दक्षिणी भूभाग में दिखा। चालुक्यों के प्रभाव में आकर उस समय राजाओं ने बौद्ध धर्म को छोड़कर हिन्दू धर्म का समर्थन किया और नेपाल में धार्मिक परिवर्तन होने लगा।

१३वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में संस्कृत शब्द मल्ल का थर वाले वंश का उदय होने लगा। २०० वर्ष में इन राजाओं ने शक्ति एकजुट की। १४वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देश का बहुत ज्यादा भाग एकीकृत राज्य के अधीन में आ गया। लेकिन यह एकीकरण कम समय तक ही टिक सका: १४८२ में यह राज्य तीन भाग में विभाजित हो गया - कान्तिपुर, ललितपुर और भक्तपुर – जिसके बीच मे शताव्दियौं तक मेल नही हो सका।

१७६५ में, गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल के छोटे-छोटे बाइसे व चोबिसे राज्य के उपर चढ़ाई करते हुए एकीकृत किया, बहुत ज्यादा रक्तरंजित लड़ाइयों के पश्चात् उन्होंने ३ वर्ष बाद कान्तीपुर, पाटन व भादगाँउ के राजाओं को हराया और अपने राज्य का नाम गोरखा से नेपाल में परिवर्तित किया। तथापि उन्हे कान्तिपुर विजय में कोई युद्ध नही करना पड़ा। वास्तव में, उस समय इन्द्रजात्रा पर्व में कान्तिपुर की सभी जनता फ़सल के देवता भगवान इन्द्र की पूजा और महोत्सव (जात्रा) मना रहे थे, जब पृथ्वी नारायण शाह ने अपनी सेना लेकर धावा बोला और सिंहासन पर  क़ब्ज़ा कर लिया। इस घटना को आधुनिक नेपाल का जन्म भी कहते है।

तिब्बत से हिमाली (हिमालयी) मार्ग के नियन्त्रण के लिए हुआ विवाद और उसके पश्चात युद्ध में तिब्बत की सहायता के लिए चीन के आने के बाद नेपाल पीछे हट गया। नेपाल की सीमा के नज़दीक का छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने के कारण से शुरु हुआ विवाद ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ दुश्मनी का कारण बना। इसी वजह से १८१४–१६ रक्तरंजित एंग्लो-नेपाल युद्ध हो गया, जिसमें नेपाल को अपनी दो तिहाई भूभाग से हाथ धोना पड़ा लेकिन अपनी सार्वभौमसत्ता और स्वतन्त्रता को कायम रखा। दक्षिण एशियाई मुल्कों में यही एक खण्ड है जो कभी भी किसी बाहरी सामन्त (उपनिवेशों) के अधीन में नही आया। विलायत से लड़ने में पश्चिम में सतलुज से पुर्व में तीस्ता नदी तक फैला हुआ विशाल नेपाल सुगौली सन्धि के बाद पश्चिम में महाकाली और मेची नदियों के बीच सिमट गया लेकिन अपनी स्वाधीनता को बचाए रखने में नेपाल सफल रहा, बाद मे अंग्रेज़ो ने १८२२ में मेची नदी व राप्ती नदी के बीच की तराई का हिस्सा नेपाल को वापस किया उसी तरह १८६० में राणा प्रधानमंत्री जंगबहादुर से ख़ुश होकर 'भारतीय सैनिक बिद्रोह को कूचलने मे नेपाली सेना का भरपूर सहयोग के बदले अंग्रेज़ों ने राप्तीनदी से महाकाली नदी के बीच का तराई का थोड़ा और हिस्सा नेपाल को लौटाया। लेकिन सुगौली सन्धी के बाद नेपाल ने जमीन का बहुत बडा हिस्सा गँवा दिया, यह क्षेत्र अभी उत्तराखंड राज्य और हिमाचल प्रदेश और पंजाब पहाड़ी राज्य में सम्मिलित है। पूर्व में दार्जिलिंग और उसके आसपास का नेपाली मूल के लोगों का भूमि (जो अब पश्चिम बंगाल मे है) भी ब्रिटिश इन्डिया के अधीन मे हो गया तथा नेपाल का सिक्किम पर प्रभाव और शक्ति भी नेपाल को त्यागने पड़े।

राज परिवार व भारदारो के बीच गुटबन्दी के कारण युद्ध के बाद स्थायित्व कायम हुआ। सन् १८४६ में शासन कर रही रानी का सेनानायक जंगबहादुर राणा को पदच्युत करने के षड़यंत्र का खुलासा होने से कोतपर्व नाम का नरसंहार हुवा। हथियारधारी सेना व रानी के प्रति वफादार भाइ-भारदारो के बीच मारकाट चलने से देश के सयौँ राजखलाक, भारदारलोग व दूसरे रजवाड़ों की हत्या हुई। जंगबहादुर की जीत के बाद राणा ख़ानदान उन्होंने सुरुकिया व राणा शासन लागु किया। राजा को नाममात्र में सीमित किया व प्रधानमन्त्री पद को शक्तिशाली वंशानुगत किया गया। राणाशासक पूर्णनिष्ठा के साथ ब्रिटिश के पक्ष में रहते थे व ब्रिटिश शासक को १८५७ की सेपोई रेबेल्योन (प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम), व बाद में दोनो विश्व युद्धसहयोग किया था। सन १९२३ में यूनाइटेड किंगडम व नेपाल बीच आधिकारिक रूप में मित्रता के समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें नेपाल की स्वतन्त्रता को यूनाइटेड किंगडम ने स्वीकार किया। दक्षिण एशियाई मुल्कों में पहला, नेपाली राजदूतावास ब्रिटेन की राजधानी लंडन मे खुल गया।

१९४० दशक के उत्तरार्ध में लोकतन्त्र-समर्थित आन्दोलनों का उदय होने लगा व राजनैतिक पार्टियां राणा शासन के विरुद्ध हो गईं। उसी समय चीन ने १९५० में तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लिया जिसकी वजह से बढ़ती हुई सैनिक गतिविधियों को टालने के लिए भारत नेपाल की स्थायित्व पर चाख बनाने लगा। फलस्वरुप राजा त्रिभुवन को भारत ने समर्थन किया १९५१ में सत्ता लेने में सहयोग किया, नई सरकार का निर्माण हो गया, जिसमें ज्यादा आन्दोलनकारी नेपाली कांग्रेस पार्टी के लोगों की सहभागिता थी। राजा व सरकार के बीच वर्षों की शक्ति खींचातानी के पश्चात्, १९५९ में राजा महेन्द्र ने लोकतान्त्रिक अभ्यास अन्त किया व निर्दलीय पंचायत व्यवस्था लागू करके राज किया। सन् १९८९के जनआन्दोलन ने राजतन्त्र को सांवैधानिक सुधार करने व बहुदलीय संसद बनाने का वातावरण बन गया सन १९९०मा कृष्णप्रसाद भट्टराई अन्तरिम सरकारके प्रधानमन्त्री बन गए, नये संविधान का निर्माण हुआ राजा बीरेन्द्र ने १९९० में नेपाल के इतिहास में दूसरा प्रजातन्त्रिक बहुदलीय संविधान जारी किया व अन्तरिम सरकार ने संसद के लिए प्रजातान्त्रिक चुनाव करवाए। नेपाली कांग्रेस ने राष्ट्र के दूसरे प्रजातन्त्रिक चुनाव में बहुमत प्राप्त किया व गिरिजा प्रसाद कोइराला प्रधानमन्त्री बने।

इक्कीसवीं सदी के आरम्भ से नेपाल में माओवादियों का आन्दोलन तेज होता गया। मधेशियों के मुद्दे पर भी आन्दोलन हुए। अन्त में सन् 2008 में राजा ज्ञानेन्द्र ने प्रजातांत्रिक चुनाव करवाए जिसमें माओवादियों को बहुमत मिला और प्रचण्ड नेपाल के प्रधानमंत्री बने और नेपाली कांग्रेस नेता रामबरन यादव ने राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला।

मानचित्र पर नेपाल का आकार एक तिरछे सामानान्तर चतुर्भुज का है। नेपाल की कुल लम्बाई करीब 800 किलोमीटर और चौड़ाई 200 किलोमीटर है। नेपाल का कुल क्षेत्रफल 147516 वर्ग किलोमीटर है। नेपाल भौगोलिक रूप से तीन भागों में विभाजित है– पर्वतीय क्षेत्र, शिवालिक क्षेत्र और तराई क्षेत्र। साथ में 'भित्री मधेस' कहलाने वाले उपत्यकाओं का एक समूह पहाड़ी क्षेत्र के महाभारत पर्वत शृंखला व चुरिया शृंखला के बीच स्थित है। यह क्षेत्र पहाड़ व तराई के बीच में स्थित है। हिमाली पहाड़ी व तराई क्षेत्र पूर्व-पश्चिम दिशा मे देशभर में फैले हुए है और यिनी क्षेत्र को नेपाल की प्रमुख नदियों ने जगह-जगह पर विभाजन किया है।

भारत के साथ जुड़ा हुआ तराई फांट भारतीय-गंगा के मैदान का उत्तरी भाग है। इस भाग की सिंचाई तथा भरण-पोषण मे तीन नदियों का मुख्य योगदान है: कोशी, गण्डकी (भारत मे गण्डक नदी) और कर्णाली नदी। इस भूभाग की जलवायु उष्ण और संतृप्त (आर्द्र) है।

पहाड़ी भूभाग मे १,००० लेकर ४,००० मीटर तक की ऊंचाई के पर्वत पड़ते हैं। इस क्षेत्र में महाभारत लेख व शिवालिक (चुरिया) नाम की दो मुख्य पर्वत शृंखलायें हैं। पहाड़ी क्षेत्र मे ही काठमांडू उपत्यका, पोखरा उपत्यका, सुर्खेत उपत्यका के साथ टार, बेसी, पाटन माडी कहे जाने वाले बहुत से उपत्यका पड़ते है। यह उपत्यका नेपाल की सबसे उर्वर भूमि है तथा काठमांडू उपत्यका नेपाल का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है। पहाड़ी क्षेत्र की उपत्यका को छोड़ कर २,५०० मीटर (८,२०० फ़ुट) की ऊंचाई पर जनघनत्व बहुत कम है।

हिमाली क्षेत्र में संसार की सबसे ऊंची हिम शृंखलायें पड़ती हैं। इस क्षेत्र की उत्तर में चीन की सीमा के पास में संसार का सर्वोच्च शिखर, ऐवरेस्ट (सगरमाथा) ८,८४८ मीटर (२९,०३५ फ़ुट) अवस्थित है। संसार की 8000 मीटर से ऊँची 14 चोटियों में से 8 नेपाल की हिमालयी क्षेत्र में पड़ती हैं। संसार का तीसरा सर्वोच्च शिखर कंचनजंघा, भी इसी हिमालयी क्षेत्र मे पड़ता है।

नेपाल मे पाँच मौसमी क्षेत्र है जो ऊंचाई के साथ कुछ मात्रा में मेल खाते हैं। उष्णकटिबन्धीय तथा उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र १,२०० मीटर (३,९४० फ़ी) से नीचे, शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र १,२०० लेकर २,४०० मीटर (३,९००–७,८७५ फ़ी), ठण्डा क्षेत्र २,४०० से लेकर ३,६०० मीटर (७,८७५–११,८०० फ़ी), उप-आर्कटिक क्षेत्र ३,६०० से लेकर ४,४०० मीटर (११,८००–१४,४०० फ़ी), व आर्कटिक क्षेत्र ४,४०० मीटर (१४,४०० फ़ीट) से ऊपर। नेपाल मे पाँच ऋतुएं होती हैं: उष्म, मनसून, अटम, शिषिर व बसन्त। हिमालय मध्य एशिया से बहने वाली ठन्डी हवा को नेपाल के अन्दर जाने से रोकता है तथा मानसून की वायु का उत्तरी परिधि के रूप में पानी काम करताहै।
नेपाल व बंगलादेश की सीमा नहि जुडता है फिर भी ये दोनों राष्ट्र २१ किलोमीटर (१३ मील) की एक सँकरी चिकेन्स् नेक (मुर्गे की गर्दन) कहे जाने वाले क्षेत्र से अलग है। इस क्षेत्र को स्वतन्त्र-व्यापार क्षेत्र बनाने का प्रयास हो रहा है।

संसार का सर्वोच्च शिखर सगरमाथा (एवरेस्ट) नेपाल व तिब्बती सीमा पर अवस्थित है। इस हिमालकी नेपाल में पडने वाले दक्षिण-पूर्वी रिज (ridge) प्राविधिक रूपमे चढना सहज माना जाता है। जिसकी वजहसे हरेक वर्ष इस स्थान मे बहुत पर्यटक जाते है। अन्य चढे जाने वाले हिमशिखर मे अन्नपूर्णा (१,२,३,४) अन्नपूर्णा श्रखला मे पड़ता है।

कृषि जनसंख्या के ७६% रोज़गार का स्रोत है और कुल ग्राह्यस्थ उत्पादन का ३९% योगदान करता है और सेवा क्षेत्र ३९% साथ में उद्योग २१% आय का स्रोत है। देश की उत्तरी दो-तिहाई भाग में पहाडी और हिमालयी भूभाग सडकें, पुल तथा अन्य संरचना निर्माण करने में कठिन और महंगा बनाता है। सन् २००३ तक पिच -सडकों की कुल लम्बाई ८,५०० किमी से कुछ ज़्यादा और दक्षिण में रेल्वे-लाइन की कुल लम्बाई ५९ किमी मात्र है। ४८ धावनमार्ग और उनमे से १७ पिचहोनेसे हवाईमार्गकी स्थिति बहुत अच्छी है। यहाँ ज़्यादा में प्रति १२ व्यक्तिके लिए १ टेलिफ़ोन सुविधा उपल्ब्ध है; तारजडित सेवा देशभर में है लेकिन शहरों और जिला मुख्यालयों में ज़्यादा केन्द्रित है; सेवामें जनताकी पहुँच बढने और सस्ता होते जानेसे मोबाइल (या तार-रहित) सेवाकी स्थिति देशभर बहुत अच्छा है। सन् २००५ मे १,७५,००० इन्टरनेट जडाने (connections) थे, लेकिन संकटकाल लागू होनेकेपश्चात् कुछ समय सेवा अवरूद्ध होगयी था। कुछ अन्योल बाद नेपालकी दुसरी बृहत जनआन्दोलनने राजाकी निरंकुश अधिकार समाप्त करनेके पश्चात सभी इन्टरनेट सेवाए बिना रोकटोक सुचारू होगएहैं।

नेपालकी भूपरिवेष्ठित स्थिति, प्राविधिक कमज़ोरी और लम्बे द्वन्द ने अर्थतन्त्र को पूर्ण रूपमे विकासशील होने नहीं दिया है। नेपाल भारत, जापान, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन, स्विट्ज़रलैंड और स्कैंडिनेवियन राष्ट्रों से वैदेशिक सहयोग पाता है। वित्तीय वर्ष २००५/०६में सरकार का बजट क़रीब १.१५३ अरब अमेरिकी डालर था, लेकिन कुल खर्च १.७८९ अरब हुआ था। १९९० दशक की बढती मुद्रा स्फीति दर घटकर २.९% पहुंची है। कुछ वर्षों से नेपाली मुद्रा रूपैयाँ को भारतीय रूपैया के साथ का सटहीदर १.६ मा स्थिर रखा गया है। १९९० दशकमे खुली बनायीगयी मुद्रा बिनिमय दर निर्धारण नीतिके कारण विदेशी मुद्रा की कालाबाजारी लगभग समाप्त हो चुकी है। एक दीर्घकालीन आर्थिक समझौते ने भारत के साथ अच्छे संबन्ध में मदद दी है।
जनता बीच का सम्पत्ति वितरण अन्य विकसित और विकासोन्मुख देशों के तुलना में ही है: ऊपरवाले १०% गृहस्थी के साथ कुल राष्ट्रिय सम्पत्ति का ३९.१% पर नियन्त्रण है और निम्नतम १०% के साथ केवल २.६%।

नेपाल की १ करोड़ जितने का कार्यबलमे दक्ष कामदारका कमी है। ८१% कार्यबलको कृषि, १६% सेवा और ३% उत्पादन/कला-आधारित उद्योग रोज़गार प्रदान करता है।

नेपालके संविधान, २०७२ की धारा 295 (ख) के अनुसार प्रदेशों का नामाकरण सम्वन्धित प्रदेश के संसद (विधान सभा) में दो तिहाई बहुमत से होने का प्रावधान है।

नेपाल की संस्कृति तिब्बत एवं भारत से मिलती-जुलती है। यहाँ की भेषभूषा, भाषा तथा पकवान इत्यादि एक जैसे ही हैं। नेपाल का सामान्य खाना चने की दाल, भात, तरकारी, अचार है। इस प्रकार का खाना सुबह एवं रात में दिन में दोनो जून खाया जाता है। खाने में चिवड़ा और चाय का भी चलन है। मांस-मछली तथा अंडा भी खाया जाता है। हिमालयी भाग में गेहूँ, मकई, कोदो, आलू आदि का खाना और तराई में गेहूँ की रोटी का प्रचलन है। कोदो के मादक पदार्थ तोङबा, छ्याङ, रक्सी आदि का सेवन हिमालयी भाग में बहुत होता है। नेवार समुदाय अपने विशेष क़िस्म के नेवारी परिकारों का सेवन करते हैं।

नेपाली सामाजिक जीवन की मान्यता, विश्वास और संस्कृति हिंदू भावना में आधारित है। धार्मिक सहिष्णुता और जातिगत सहिष्णुता का आपस का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध नेपाल की अपनी मौलिक संस्कृति है। यहाँ के पर्वों में वैष्णव, शैव, बौद्ध, शाक्त सब धर्मों का प्रभाव एक-दूसरे पर समान रूप से पड़ा है। किसी भी एक धार्मिक पर्व को धर्मावलम्बी विशेष का कह सकना और अलग कर पाना बहुत कठिन है। सभी धर्मावलंबी आपस में मिलकर उल्लासमय वातावरण में सभी पर्वों में भाग लेते हैं। नेपाल में छुआछूत का भेद न कट्टर रूप में है और न जन्मसंस्कार के आधार पर ही है। शक्तिपीठों में चांडाल और भंगी, चमार, देवपाल और पुजारी के रूप में प्रसिद्ध शक्ति पीठ गुह्येश्वरी देवी, शोभा भागवती के चांडाल तथा भंगी, चमार पुजारियों को प्रस्तुत किया जा सकता है।

उपासना की पद्धति और उपासना के प्रतीकों में भी समन्वय स्थापित किया गया है। नेपाल में बौद्ध धर्म ने भी मूर्तिपूजा और कर्मकांड अपनाया है। बौद्ध पशुपतिनाथ की पूजा आर्यावलोकितेश्वर के रूप में करते हैं और हिंदू मंजुश्री की पूजा सरस्वती के रूप में करते हैं। नेपाल की यह समन्वयात्मक संस्कृति लिच्छवि काल से अद्यावधि चली आ रही है।

नेपाल अनुग्रहपरायण देश है। वह किसी के मैत्रीपूर्ण अनुग्रह को कभी भूल नहीं सकता। नेपाल का पराक्रम विश्वविख्यात है। नेपाल की सांस्कृतिक परम्परा को कायम रखने के लिए वि॰सं॰ 2017 साल में संयुक्त राज्य अमरीका के काँग्रेस के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधन करते हुए श्री 5 महेन्द्र ने स्पष्टरूप में कहा था कि 'सैनिक कार्यों में लगने वाले खर्च संसार की ग़रीबी हटाने में व्यय हों'।

नेपाल एक छोटा स्वतंत्र राष्ट्र है, किंतु जाति के आधार पर नेपाल राज्य की मित्र राष्ट्र भारत के समान विभिन्न जातियों के रहने का एक अजायबघर जैसा है। उत्तरी भाग की ओर भोटिया, तामां‌, लिंबू, शेरपा, महाभारत शृंखला में मगर, किरात, नेवार, गुरुं‌, सुनुवार और भीतरी तराई क्षेत्र में घिमाल, थारू, मेचै, दनवार आदि जातियों की बहुलता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ठाकुर, खस, जैसी, क्षत्री जातियों तथा ब्राह्मणों की संख्या नेपाल में यत्र-तत्र काफ़ी है। यहाँ पर प्रवासी भारतीयों की संख्या भी पर्याप्त है।

नेपाल मे आधुनिक शिक्षा की शुरूवात राणा प्रधानमन्त्री जंगबहादुर राणा की विदेश यात्रा के बाद सन् 1854 में स्थापित दरबार हाईस्कूल (हाल रानीपोखरी किनारे अवस्थित भानु मा.बि.) से हुई थी, इससे पहले नेपाल मे कुछ धर्मशास्त्रीय दर्शन पर आधारित शिक्षा मात्र दी जाती थी। आधुनिक शिक्षा की शुरूवात 1854 में होते हुए भी यह आम नेपाली जनता के लिए सर्वसुलभ नहीं था। लेकिन देशके विभिन्न भागों में कुछ विद्यालय दरबार हाईस्कूलकी शुरूवात के बाद खुलना शुरू हुए। लेकिन नेपाल में पहला उच्च शिक्षा केन्द्र काठमान्डू में राहहुवा त्रिचन्द्र कैम्पस है। राणा प्रधानमन्त्री चन्द्र सम्सेर ने अपने साथ राजा त्रिभुवन का नाम जोडके इस कैंपसका नाम रखाथा। इस कैंपसकी स्थापना बाद नेपालमे उच्च शिक्षा अर्जन बहुत सहज होनगया लेकिन सन 1959 तक भी देश मे एकभी विश्वविद्यालय स्थापित नहीं हो सकाथा राजनितिक परिवर्तन के पश्चात् राणा शासन मुक्त देशने अन्ततः 1959 मे त्रिभुवन विश्वविद्यालयकी स्थापना की। उसके बाद महेन्द्र संस्कृत के साथ अन्य विश्वविद्यालय खुलते गए। हाल ही में मात्र सरकार ने ४ थप विश्वविद्यालय भी स्थापित करने की घोषणा की है। नेपाल की शिक्षा का सबसे मुख्य योजनाकार शिक्षामन्त्रालय है उसके अलावा शिक्षा विभाग, पाँच क्षेत्रीय शिक्षा निदेशालय, पचहतर जिल्ला शिक्षा कार्यालय, परीक्षा नियन्त्रण कार्यालय सानोठिमी, उच्चमाध्यामिक शिक्षा परिषद्, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, विभिन्न विश्वविद्यालयों के परीक्षा नियन्त्रण कार्यालय नेपालकी शिक्षाका विकास विस्तार तथा नियन्त्रणके क्षेत्र में कार्यरत हैं।

नेपाल मे बहुत पहिले से आयुर्वेद (प्राकृतिक चिकित्सा) पद्धति उपयोग मे था। वैद्य और परंपरागत चिकित्सक गाँवघर और शहरो मे स्वास्थ्य सेवा पहुचाते थे। उनलोगो की औषधि के श्रोत नेपाल के हिमाल से तराइ तक मिलनेवाले जडीबुटी ही होते थे। आधुनिक चिकित्सा पद्धती की शुरूवात राणा प्रधानमन्त्री जंगवाहादुर राणा की बेलायत यात्रा के बाद दरवार के अन्दर शुरू हुवा लेकिन नेपाल में आधुनिक चिकित्सा संस्था के रूप में राणा प्रधानमन्त्री वीर सम्सेर के काल मे काठामाण्डौ में सन १८८९ मे स्थापित वीर अस्पताल ही है। तत्पश्चात चन्द्र समसेर के काल मे स्थापित त्रिचन्द्र सैनिक अस्पताल है। हाल में नेपाल के हस्पताल सामन्यतया आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा तथा आधुनिक चिकीत्सा करके सरकारी सेवा विद्यमान हे।

नेपाल मे नेपाली सेना, नेपाली सैनिक विमान सेवा, नेपाल ससस्त्र प्रहरी बल, नेपाल प्रहरी, नेपाल ससस्त्र वनरक्षक तथा राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग नेपाल लगायत सस्सत्र, तथा गुप्तचर सुरक्षा निकाय रहेहै।दक्षिण एशिया में नेपाल की सेना पांचवीं सबसे बड़ी है और विशेषकर विश्व युद्धों के दौरान, अपने गोरखा इतिहास के लिए उल्लेखनीय रही है। गोरखा सेना को सबसे अधिक बार विक्टोरिया क्रॉस दिया गया है।

भारत के उत्तर में बसा नेपाल रंगों से भरपूर एक ख़ूबसूरत है। यहां वह सब कुछ है जिसकी तमन्ना एक आम सैलानी को होती है। देवताओं का घर कहे जाने वाले नेपाल विविधाताओं से पूर्ण है। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां एक ओर यहां बर्फ़ से ढ़कीं पहाड़ियां हैं, वहीं दूसरी ओर तीर्थस्थान है। रोमांचक खेलों के शौकीन यहां रिवर राफ्टिंग, रॉक क्लाइमिंग, जंगल सफ़ारी और स्कीइंग का भी मज़ा ले सकते हैं।

लुंबिनी महात्मा बुद्ध की जन्म स्थली है। यह उत्तर प्रदेश की उत्तरी सीमा के निकट वर्तमान नेपाल में स्थित है। यूनेस्को तथा विश्व के सभी बौद्ध सम्प्रदाय (महायान, बज्रयान, थेरवाद आदि) के अनुसार यह स्थान नेपाल के कपिलवस्तु में है जहाँ पर युनेस्को का आधिकारिक स्मारक लगायत सभी बुद्ध धर्म के सम्प्रयायौं ने अपने संस्कृति अनुसार के मन्दिर, गुम्बा, बिहार आदि निर्माण किया है। इस स्थान पर सम्राट अशोक द्वारा स्थापित अशोक स्तम्भ पर ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा में बुद्ध का जन्म स्थान होने का वर्णन किया हुआ शिलापत्र अवस्थित है।

जनकपुर नेपाल का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, जहां सीता मां माता का जन्म हुवा था। ये नगर प्राचीन काल में मिथिला की राजधानी माना जाता है। यहाँ पर प्रसिद्ध राजा जनक थे जो सीता माता जी के पिता थे। सीता माता का जन्म मिट्टी के घड़े से हुआ था। यह शहर भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की ससुराल के रूप में विख्यात है।

मुक्तिनाथ वैष्‍णव संप्रदाय के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह तीर्थस्‍थान शालिग्राम भगवान के लिए प्रसिद्ध है। भारत में बिहार के वाल्मीकि नगर शहर से कुछ दूरी पर  जाने पर  गंडक  नदी  से होते हुए जाने का मार्ग है ा दरअसल एक पवित्र पत्‍थर होता है जिसको हिंदू धर्म में पूजनीय माना जाता है। यह मुख्‍य रूप से नेपाल की ओर प्रवाहित होने वाली काली गण्‍डकी नदी में पाया जाता है। जिस क्षेत्र में मुक्तिनाथ स्थित हैं उसको मुक्तिक्षेत्र' के नाम से जाना जाता हैं। हिंदू धार्मिक मान्‍यताओं के अनुसार यह वह क्षेत्र है, जहां लोगों को मुक्ति या मोक्ष प्राप्‍त होता है। मुक्तिनाथ की यात्रा काफ़ी मुश्किल है। फिर भी हिंदू धर्मावलंबी बड़ी संख्‍या में यहां तीर्थाटन के लिए आते हैं। यात्रा के दौरान हिमालय पर्वत के एक बड़े हिस्‍से को लांघना होता है। यह हिंदू धर्म के दूरस्‍थ तीर्थस्‍थानों में से एक है।

काठमांडु शहर से 29 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में छुट्टियां बिताने की ख़ूबसूरत जगह ककनी स्थित है। यहां से हिमालय का ख़ूबसूरत नजारा देखते ही बनता है। ककनी से गणोश हिमल, गौरीशंकर 7134 मी., चौबा भामर 6109 मी., मनस्लु 8163 मी., हिमालचुली 7893 मी., अन्नपूर्णा 8091 मी. समेत अनेक पर्वत चोटियों को करीब से देखा जा सकता है।

समुद्र तल से 4360 मी. की ऊंचाई पर स्थित गोसाई कुण्ड झील नेपाल के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। काठमांडु से 132 किलोमीटर दूर धुंचे से गोसाई कुंड पहुंचना सबसे सही विकल्प है। उत्तर में पहाड़ और दक्षिण में विशाल झील इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। यहां और भी नौ प्रसिद्ध झीलें हैं। जैसे सरस्वती भरव, सौर्य और गणोश कुंड आदि।

यह प्राचीन नगर काठमांडु से 30 किलोमीटर पूर्व अर्निको राजमार्ग काठमांडु-कोदारी राजमार्ग के एक ओर बसा है। यहां से पूर्व में कयरेलुंग और पश्चिम में हिमालचुली श्रृंखलाओं के ख़ूबसूरत दृश्यों का आनंद उठाया जा सकता है।

भगवान पशुपतिनाथ का यह ख़ूबसूरत मंदिर काठमांडु से क़रीब 5 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। बIगमती नदी के किनारे इस मंदिर के साथ और भी मंदिर बने हुए हैं। विश्मवप्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत  जो महर्षि वेदव्यासद्वारा ५५०० ईसा पुर्व भारतवर्ष मे हुआ। उसीमे कुंतीपुञ धर्मराज युधिष्टीर , अर्जुन, भिम, नकुल, सहदेव तथा द्रोपदी जब स्वर्गारोहण कर रहे थे तब वे जिस विशाल पर्वत श्रृखंला से गये उसे  महाभारत पर्वत श्रृखंला  तथा जहा पर कैलासनाथ आदियोगी महादेव जी ने ज्योतिर्लिंग के रुप मे प्रकट हुये वो स्थान  श्री पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर  के नाम से जाना जाता है। पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग देवस्थान के बारे में माना जाता है कि यह नेपाल में हिंदुओं का सबसे प्रमुख और पवित्र तीर्थस्थल है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर प्रतिवर्ष हजारों देशी-विदेशी श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है। गोल्फ़ कोर्स और हवाई अड्डे के पास बने इस मंदिर को भगवान का निवास स्थान माना जाता है।

पशुपति शिव (केदार )के शिर , उत्तराखण्डका केदारनाथ शिव (केदार)का शरीर ,डोटी बोगटानका बड्डीकेदार, शिव (केदार )का पाउ (खुट्टा)के रुपमे शिवका तीन अंग प्रसिद्द ज्योतिर्लिंग धार्मिक तीर्थ है । डोटीके केदार व कार्तिकेय (मोहन्याल)का  इतिहास अयोध्याका राजवंश से जुड़ा है । उत्तराखण्ड के सनातनी देवता डोटी ,सुर्खेत ,काठमाडौँ के देबिदेवाताका धार्मिक तीर्थ के लिए प्राचीन कालमे महाभारत पर्वत,चुरे पर्वत क्षेत्र से आवत जावत होता था । यिसी लिए यह क्षेत्र पवित्र धार्मिक इतिहास से सम्बन्धित है ।

रॉयल चितवन राष्ट्रीय उद्यान देश की प्राकृतिक संपदा का ख़ज़ाना है। 932 वर्ग किलोमीटर में फैला यह उद्यान दक्षिण- मध्य नेपाल में स्थित है। 1973 में इसे नेपाल के प्रथम राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा हासिल हुआ। इसकी अद्भुत पारिस्थितिकी को देखते हुए यूनेस्को ने 1984 में इसे विश्‍व धरोहर का दर्जा दिया।

इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह काठमांडु घाटी का सबसे पुराना विष्णु मंदिर है। मूल रूप से इस मंदिर का निर्माण चौथी शताब्दी के आस-पास हुआ था। वर्तमान पैगोडा शैली में बना यह मंदिर 1702 में पुन: बनाया गया जब आग के कारण यह नष्ट हो गया था। यह मंदिर घाटी के पूर्वी ओर पहाड़ की चोटी पर भक्तपुर से चार किलोमीटर उत्तर में ख़ूबसूरत और शांतिपूर्ण स्थान पर स्थित है। यह मंदिर यूनेस्को विश्‍व धरोहर सूची का हिस्सा है। 2072 वैशाख 12 का भुकम्प ने इस मन्दिरका कुछ संरचना विगड गया है।

भक्तपुर के दरबार स्क्वैयर का निर्माण 16वीं और 17वीं शताब्दी में हुआ था। इसके अंदर एक शाही महल दरबार और पारंपरिक नेवाड़, पैगोडा शैली में बने बहुत सारे मंदिर हैं। स्वर्ण द्वार, जो दरबार स्क्वैयर का प्रवेश द्वार है, काफी आकर्षक है। इसे देखकर अंदर की ख़ूबसूरती का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह जगह भी युनेस्को की विश्‍व धरोहर का हिस्सा है।

यूनेस्को की आठ सांस्कृतिक विश्‍व धरोहरों में से एक काठमांडु दरबार प्राचीन मंदिरों, महलों और गलियों का समूह है। यह राजधानी की सामाजिक, धार्मिक और शहरी ज़िंदगी का मुख्य केंद्र है।

ख़ूबसूरती की मिसाल स्वर्ण द्वार नेपाल की शान है। बेशक़ीमती पत्थरों से सजे इस दरवाज़े का धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व है। शाही अंदाज में बने इस द्वार के ऊपर देवी काली और गरुड़ की प्रतिमाएं लगी हैं। यह माना जाता है कि स्वर्ण द्वार स्वर्ग की दो अप्सराएं हैं। इसका वास्तुशिल्प और सुंदरता पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। तथा मनमोहक सुंदर दृश्य पर्यटकों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण जगह है।

काठमांडु घाटी के मध्य में स्थित बोधनाथ स्तूप तिब्बती संस्कृति का केंद्र है। 1959 में चीन के हमले के बाद यहां बड़ी संख्या में तिब्बतियों ने शरण ली और यह स्थान तिब्बती बौद्धधर्म का प्रमुख केंद्र बन गया। बोधनाथ नेपाल का सबसे बड़ा स्तूप है। इसका निर्माण 14वीं शताब्दी के आस-पास हुआ था, जब मुग़लों ने आक्रमण किया।

 संदर्भ  - इस स्तूप को नेपाली में बौद्ध नाम से पुकारा जाता है। इसकी प्रारम्भिक ऐतिहासिक सामग्री इसकी ही नीचे दबा हुवा अनुमानित है। लिच्छवि राजाओं मानदेव द्वारा निर्मित और शिवदेव द्वारा विस्तारित माना जाता है। हालाँकि इसकी वर्तमान स्वरूप की निर्माण की तिथि भी अज्ञात ही है। इसकी गर्भ-बेदी की दीवार पर स्थापित छोटे-छोटे प्रस्तर मूर्तियां और ऊपर की छत्रावली संस्कृत बौद्ध-धर्म का प्रतीक माना जाता है। संस्कृत बौद्ध वाङ्मय का तिब्बती भा




#Article 67: बेनज़ीर भुट्टो (533 words)


बेनज़ीर भुट्टो(उर्दू: بینظیر بھٹو) (जन्म 21 जून 1953,कराची- मृत्यु 27 दिसम्बर 2007,रावलपिंडी) पाकिस्तान की १२वीं (1988 में) व १६वीं (1993 में) प्रधानमंत्री थीं। रावलपिंडी में एक राजनैतिक रैली के बाद आत्मघाती बम और गोलीबारी से दोहरा अक्रमण कर, उनकी हत्या कर दी गई। पूरब की बेटी के नाम से जानी जाने वाली बेनज़ीर किसी भी मुसलिम देश की पहली महिला प्रधानमंत्री तथा दो बार चुनी जाने वाली पाकिस्तान की पहली प्रधानमंत्री थीं। वे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की प्रतिनिधि तथा मुसलिम धर्म की शिया शाखा की अनुयायी थीं।

बेनज़ीर भुट्टो का जन्म पाकिस्तान के धनी ज़मींदार परिवार में हुआ।
वे पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो, जो सिंध प्रांत के पाकिस्तानी थे तथा बेगम नुसरत भुट्टो, जो मूल रूप से ईरान और कुर्द देश से संबंधित पाकिस्तानी थीं, की पहली संतान थीं। उनके बाबा सर शाह नवाज़ भुट्टो अविभाजित भारत के सिंध प्रांत स्थित लरकाना ज़िले में भुट्टोकलाँ गाँव के निवासी थे। यह स्थान अब भारत के हरियाणा प्रांत में है। 18 दिसम्बर 1987 में उनका विवाह आसिफ़ अली ज़रदारी के साथ हुआ। आसिफ़ अली ज़रदारी सिंध के एक प्रसिद्ध नवाब, शाह परिवार के बेटे और सफल व्यापारी थे। बेनज़ीर भुट्टो के तीन बच्चे हैं। पहला बेटा बिलावल और दो बेटियाँ बख़्तावर और और असीफ़ा।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा कराची के लेडी जेनिंग नर्सरी स्कूल तथा कॉन्वेंट जीजस एंड मेरी में हुई। 15 वर्ष की आयु में उन्होंने कराची ग्रामर स्कूल से 'ओ' लेवेल की परीक्षा उत्तीर्ण की।. सोलह साल की उम्र में वो अमरीका गईं, जहाँ 1969 से 1973 तक वे रैडक्लिफ़ कॉलेज में पढ़ाई की तथा उसके बाद हार्वर्ड विश्वविद्यालय से कला-स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में उन्होंने इंगलैंड के ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय से भी अंतर्राष्ट्रीय कानून, दर्शन और राजनीति विषय का अध्ययन किया।. ऑक्सफ़ोर्ड में अध्ययन के दौरान वे ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन की अध्यक्ष चुनी जाने वाली वे पहली एशियाई महिला थीं।

पढ़ाई पूरी करने के बाद वे 1977 में पाकिस्तान वापस पहुँचीं, किंतु लेकिन घर वापस आने के कुछ ही दिनों के अंदर उनके पिता और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो का तख़्तापलट हो गया। वे चुनाव जीत कर सत्ता में आए थे, लेकिन उनके विरोधियों का आरोप था कि चुनाव में धांधली हुई है। भुट्टो के चुनाव के विरोध में पाकिस्तान की सड़कों पर प्रदर्शन हुए। इसी बीच सेना प्रमुख जनरल ज़िया उल हक ने भुट्टो को बंदी बना लिया और शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। भुट्टो पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने सहयोगियों की हत्या करवाई है। 4 अप्रैल 1979 में भुट्टो को फांसी दे दी गई। भुट्टो को फांसी देने के बाद सैनिक सरकार द्वारा बेनज़ीर को हिरासत में ले लिया गया। 1977 से 1984 के बीच बेनज़ीर अनेक बार रिहा हुई और अनेक बार कैद हुईं। 1984 में तीन साल की क़ैद के बाद उन्हें पाकिस्तान से बाहर जाने की अनुमति दी गई। उस समय वे लंदन जाकर रहीं। इसी समय 1985 में पेरिस में उनके भाई शाहनवाज़ भुट्टो की मौत संदिग्ध हालात में हो गई। अपने भाई की अंतिम क्रिया के लिए बेनज़ीर पाकिस्तान पहुँचीं, जहाँ सैनिक सरकार के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों का नेतृत्त्व करने के आरोप में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। लेकिन जल्दी ही उन्हें रिहा करने के बाद वहाँ आम चुनाव की घोषणा कर दी गई।




#Article 68: अफ़ग़ानिस्तान (988 words)


अफ़ग़ानिस्तान इस्लामी गणराज्य दक्षिण एशिया में अवस्थित देश है, जो विश्व का एक भूूूूूू-आवेष्ठित देश है। अप्रैल २००७ में अफगानिस्तान सार्क का  आठवां सदस्य बना। अफगानिस्तान के पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है।

अफ़ग़ानिस्तान रेशम मार्ग और मानव प्रवास का एक प्राचीन केन्द्र बिन्दु रहा है। पुरातत्वविदों को मध्य पाषाण काल ​​के मानव बस्ती के साक्ष्य मिले हैं। इस क्षेत्र में नगरीय सभ्यता की शुरुआत 3000 से 2,000 ई.पू. के रूप में मानी जा सकती है। यह क्षेत्र एक ऐसे भू-रणनीतिक स्थान पर अवस्थित है जो मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति से जोड़ता है। इस भूमि पर कुषाण, हफ्थलिट, समानी, गजनवी, मोहमद गौरी, मुगल, दुर्रानी और अनेक दूसरे प्रमुख साम्राज्यों का उत्थान हुआ है। प्राचीन काल में फ़ारस तथा शक साम्राज्यों का अंग रहा अफ़्ग़ानिस्तान कई सम्राटों, आक्रमणकारियों तथा विजेताओं की कर्मभूमि रहा है। इनमें सिकन्दर, फारसी शासक दारा प्रथम, तुर्क,मुगल शासक बाबर, मुहम्मद गौरी, नादिर शाह सिख साम्राज्य इत्यादि के नाम प्रमुख हैं।  ब्रिटिश सेनाओं ने भी कई बार अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया। वर्तमान में अमेरिका द्वारा तालेबान पर आक्रमण किये जाने के बाद नाटो(NATO) की सेनाएं वहां बनी हुई हैं।

अफ़ग़ानिस्तान के प्रमुख नगर हैं- राजधानी काबुल, कंधार (गंधार  प्रदेश)  भारत के प्राचीन ग्रंथ महाभारत में इसे गंधार प्रदेश कहा जाता था। यहाँ कई नस्ल के लोग रहते हैं जिनमें पश्तून (पठान या अफ़ग़ान) सबसे अधिक हैं। इसके अलावा उज्बेक, ताजिक, तुर्कमेन और हज़ारा शामिल हैं। यहाँ की मुख्य भाषा पश्तो है। फ़ारसी भाषा के अफ़गान रूप को दरी कहते हैं।.

अफ़्ग़ानिस्तान का नाम अफगान और स्थान या (स्तान )जिसका मतलब भूमि होता है से लकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है अफ़गानों की भूमि।  स्थान या (स्तान) भारत की प्राचीन भाषा  संस्कृत का शब्द है- पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज़ाख़स्तान, हिन्दुस्तान ( हिंदुस्थान )इत्यादि जिसका अर्थ है भूमि या देश। अफ़्गान का अर्थ यहां के सबसे अधिक वसित नस्ल (पश्तून) को कहते है। अफ़्गान शब्द को संस्कृत अवगान से निकला हुआ माना जाता है। ध्यान रहे की अफ़्ग़ान शब्द में ग़ की ध्वनी है और ग की नहीं।

मानव बसाहट १०,००० साल से भी अधिक पुराना हो सकता है। ईसा के १८०० साल पहले आर्यों का आगमन इस क्षेत्र में हुआ। ईसा के ७०० साल पहले इसके उत्तरी क्षेत्र में गांधार महाजनपद था जिसके बारे में भारतीय स्रोत महाभारत तथा अन्य ग्रंथों में वर्णन मिलता है। ईसापूर्व ५०० में फ़ारस के हखामनी शासकों ने इसको जीत लिया। सिकन्दर के फारस विजय अभियान के तहते अफ़गानिस्तान भी यूनानी साम्राज्य का अंग बन गया। इसके बाद यह शकों के शासन में आए। शक स्कीथियों के भारतीय अंग थे। ईसापूर्व २३० में मौर्य शासन के तहत अफ़ग़ानिस्तान का संपूर्ण इलाका आ चुका था पर मौर्यों का शासन अधिक दिनों तक नहीं रहा। इसके बाद पार्थियन और फ़िर सासानी शासकों ने फ़ारस में केन्द्रित अपने साम्राज्यों का हिस्सा इसे बना लिया। सासनी वंश इस्लाम के आगमन से पूर्व का आखिरी ईरानी वंश था। अरबों ने ख़ुरासान पर सन् ७०७ में अधिकार कर लिया। सामानी वंश, जो फ़ारसी मूल के पर सुन्नी थे, ने ९८७ इस्वी में अपना शासन गजनवियों को खो दिया जिसके फलस्वरूप लगभग संपूर्ण अफ़ग़ानिस्तान ग़ज़नवियों के हाथों आ गया। ग़ोर के शासकों ने गज़नी पर ११८३ में अधिकार कर लिया।

मध्यकाल में कई अफ़्गान शासकों ने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया या करने का प्रयत्न किया जिनमें लोदी वंश का नाम प्रमुख है। अफगानिस्तान  पर सिख साम्राज्य के प्रतापी राजा दिलीप सिंह  का कई वर्षों तक अधिकार रहा l अफगान से मिलकर बाबर, नादिर शाह तथा अहमद शाह अब्दाली ने दिल्ली पर आक्रमण किए  अफ़ग़ानिस्तान के कुछ क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के अंग थे।

उन्नीसवीं सदी में आंग्ल-अफ़ग़ान युद्धों के कारण अफ़ग़ानिस्तान का काफी हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के अधीन हो गया जिसके बाद अफ़ग़ानिस्तान में यूरोपीय प्रभाव बढ़ता गया। १९१९ में अफ़ग़ानिस्तान ने विदेशी ताकतों से एक बार फिर स्वतंत्रता पाई। आधुनिक काल में १९३३-१९७३ के बाच का काल अफ़ग़ानिस्तान का सबसे अधिक व्यवस्थित काल रहा जब ज़ाहिर शाह का शासन था। पर पहले उसके जीजा तथा बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्तापलट के कारण देश में फिर से अस्थिरता आ गई। सोवियत सेना ने कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग के लिए देश में कदम रखा और मुजाहिदीन ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और बाद में अमेरिका तथा पाकिस्तान के सहयोग से सोवियतों को वापस जाना पड़ा। ११ सितम्बर २००१ के हमले में मुजाहिदीन के सहयोग होने की खबर के बाद अमेरिका ने देश के अधिकांश हिस्से पर सत्तारुढ़ मुजाहिदीन (तालिबान), जिसको कभी अमेरिका ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने में हथियारों से सहयोग दिया था, के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

अफगानिस्तान नाम अफ्गान समुदाय की जगह के रूप में प्रयुक्त किया गया है, यह नाम सबसे पहले 10 वीं शताब्दी में हूदूद उल-आलम (विश्व की सीमाएं) नाम की भौगोलिक किताब में आया था इसके रचनाकार का नाम अज्ञात है' साल 2006 में पारित देश के संविधान में अफगानिस्तान के सभी नागरिकों को अफ्गान कहा गया है जो अफगानिस्तान के सभी नागरिक अफ्गान है'

वर्तमान में (फरवरी २००७) देश में नाटो(NATO) की सेनाएं बनी हैं और देश में लोकतांत्रिक सरकार का शासन है। हालांकि तालिबान ने फिर से कुछ क्षेत्रों पर अधिपत्य जमा लिया है, अमेरिका का कहना है कि तालिबान को पाकिस्तानी जमीन पर फलने-फूलने दिया जा रहा है।

अफ़ग़ानिस्तान में कुल ३४ प्रशासनिक विभाग हैं। इनके नाम हैं - 

बदख़्शान
बदगीश
बाग़लान
बाल्क़
बमयन
दायकुंडी
फ़राह
फ़रयब
ग़ज़नी
ग़ोर
हेलमंद
हेरात
ज़ोजान
क़ाबुल
कांदहार (कांधार)
क़पिसा
ख़ोस्त
कोनार
कुन्दूज
लगमान
लोगर
नांगरहर
निमरूज़
नूरेस्तान
ओरुज़्ग़ान
पक़्तिया
पक़्तिका
पंजशिर
परवान
समंगान
सरे पोल
तक़ार
वारदाक़
ज़बोल

अफ़ग़ानिस्तान चारों ओर से ज़मीन से घिरा हुआ है और इसकी सबसे बड़ी सीमा पूर्व की ओर पाकिस्तान से लगी है। इसे डूरण्ड रेखा भी कहते हैं। केन्द्रीय तथा उत्तरपूर्व की दिशा में पर्वतमालाएँ हैं जो उत्तरपूर्व में ताजिकिस्तान स्थित हिन्दूकुश पर्वतों का विस्तार हैं। अक्सर तापमान का दैनिक अन्तरण अधिक होता है। 1934 में लीग आफ नेशन का सदस्य हुआ 1945 में है संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल हुआ




#Article 69: शेन वॉर्न (285 words)


शेन कीथ वॉर्न (जन्म: 13 सितंबर 1969, ) ऑस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी है जिन्हें व्यापक रूप से खेल के इतिहास में सबसे महान गेंदबाजों में से एक माना जाता है। 1992 में वॉर्न ने अपना पहला टेस्ट मैच खेला था और श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन के बाद वह दूसरे गेंदबाज बने थे जिन्होंने 1000 अंतरराष्ट्रीय विकेट (टेस्ट और वनडे मैचों में) लिये। वॉर्न के 708 विकेट टेस्ट क्रिकेट में किसी भी गेंदबाज द्वारा लिये गए सर्वाधिक विकेट थे, जब तक कि मुरलीधरन ने इससे ज्यादा विकेट नहीं ले लिये थे। वॉर्न उपयोगी निचले क्रम के बल्लेबाज भी थे। वह एकमात्र खिलाड़ी है जिन्होंने 3000+ टेस्ट रन बनाए लेकिन कभी शतक नहीं जड़ा। उनका करियर मैदान के बाहर विवादों से ग्रस्त रहा। इन में प्रतिबंधित पदार्थ के लिए सकारात्मक परीक्षण पाए जाने पर क्रिकेट से प्रतिबंध शामिल था। साथ ही सट्टेबाजों से पैसा स्वीकार करके खेल को बदनामी में लाने का आरोप और भी कई विवाद।

वह जनवरी 2007 में ऑस्ट्रेलिया की इंग्लैंड पर 5-0 की द एशेज की जीत के अंत में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से सेवानिवृत्त हुए। उस समय ऑस्ट्रेलियाई टीम के अभिन्न अंग में से तीन अन्य खिलाड़ी भी रिटायर हुए- ग्लेन मैकग्रा, डेमियन मार्टिन और जस्टिन लैंगर। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से अपनी सेवानिवृत्ति के बाद वॉर्न ने हैम्पशायर काउंटी क्रिकेट क्लब के लिये प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेला। 2008 में आईपीएल की टीम राजस्थान रॉयल्स के कोच और कप्तान की भूमिका निभाई और टीम को जीत दिलाई। कुल मिलाकर उन्होंने 1992 से 2007 तक 145 टेस्ट मैच खेलें थे जिसमें उन्होंने 25.41 की गेंदबाज़ी औसत से 708 विकेट लिये। 1993 से 2005 तक उन्होंने 194 एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय में 293 विकेट लिये। 1999 क्रिकेट विश्व कप की विजेता टीम में उनका अहम योगदान था।




#Article 70: पंजाब (भारत) (1017 words)


पंजाब (पंजाबी: ਪੰਜਾਬ) उत्तर-पश्चिम भारत का एक राज्य है जो वृहद्तर पंजाब क्षेत्र का एक भाग है। इसका दूसरा भाग पाकिस्तान में है। पंजाब क्षेत्र के अन्य भाग (भारत के) हरियाणा और हिमाचल प्रदेश राज्यों में हैं। इसके पश्चिम में पाकिस्तानी पंजाब, उत्तर में जम्मू और कश्मीर, उत्तर-पूर्व में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में हरियाणा, दक्षिण-पूर्व में केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ और दक्षिण-पश्चिम में राजस्थान राज्य हैं। राज्य की कुल जनसंख्या 2,77,43,336 है एंव कुल क्षेत्रफल 50,362 वर्ग किलोमीटर है। केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी है जोकि हरियाणा राज्य की भी राजधानी है। पंजाब के प्रमुख नगरों में अमृतसर, लुधियाना, जालंधर, पटियाला और बठिंडा हैं।

युनानी लोग पंजाब को पैंटापोटाम्या नाम के साथ जानते थे जो कि पाँच इकठ्ठा होते दरियाओं का अंदरूनी डेल्टा है। पारसियों के पवित्र ग्रंथ अवैस्टा में पंजाब क्षेत्र को पुरातन हपता हेंदू या सप्त-सिंधु (सात दरियाओं की धरती) के साथ जोड़ा जाता है। बर्तानवी लोग इस को हमारा प्रशिया कह कर बुलाते थे। ऐतिहासिक तौर पर पंजाब युनानियों, मध्य एशियाईओं, अफ़ग़ानियों और ईरानियों के लिए भारतीय उपमहाद्वीप का प्रवेश-द्वार रहा है।

कृषि पंजाब का सब से बड़ा उद्योग है; यह भारत का सब से बड़ा गेहूँ उत्पादक है। यहाँ के प्रमुख उद्योग हैं: वैज्ञानिक साज़ों सामान, कृषि, खेल और बिजली सम्बन्धित माल, सिलाई मशीनें, मशीन यंत्रों, स्टार्च, साइकिलों, खादों आदि का निर्माण, वित्तीय रोज़गार, सैर-सपाटा और देवदार के तेल और खंड का उत्पादन। पंजाब में भारत में से सब से अधिक इस्पात के लुढ़का हुआ मीलों के कारख़ाने हैं जो कि फ़तहगढ़ साहब की इस्पात नगरी मंडी गोबिन्दगढ़ में हैं।

'पंजाब' शब्द, फ़ारसी के शब्दों 'पंज' (پنج) पांच और 'आब' (آب) पानी के मेल से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ 'पांच नदियों का क्षेत्र' है। यह फ़ारसी शब्द संस्कृत के 'पञ्चनाद' के आधार पर हुआ था जिसका अर्थ वही 'पांच नदियों का क्षेत्र' है। ये पांच नदियां हैं: सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम। धार्मिक आधार पर सन् १९४७ में हुए भारत के विभाजन के दौरान चिनाब और झेलम नदियां पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में चली गयीं।

पंजाब 1900 में 

पंजाब अखंड भारत का हिस्सा रहा है। यहां मौर्य, बैक्ट्रियन, यूनानी, शक, कुषाण, गुप्त जैसी अनेक शक्तियों का उत्थान और पतन हुआ। मध्यकाल में पंजाब मुसलमानों के अधीन रहा। सबसे पहले गज़नवी, ग़ोरी, गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुग़लक़, लोधी और मुगल वंशो का पंजाब पर अधिकार रहा। पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में पंजाब के इतिहास ने नया मोड़ लिया। गुरु नानक देव की शिक्षाओं से यहां भक्ति आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। सिख पंथ ने एक धार्मिक और सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया, जिसका मुख्य उद्देश्य धर्म और समाज में फैली कुरीतियों को दूर करना था। दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने सिखों को खालसा पंथ के रूप में संगठित किया तथा एकजुट किया। उन्होंने देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता और मानवीय मूल्यों पर आधारित पंजाबी राज की स्थापना की। एक फारसी लेख के शब्दों में महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब को सिख साम्राज्य में बदल दिया। किंतु उनके देहांत के बाद अंदरूनी साजिशों और अंग्रेजों की चालों के कारण पूरा साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। अंग्रेजों और सिखों के बीच दो निष्फल युद्धों के बाद 1849 में पंजाब ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया।

स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी के आगमन से बहुत पहले ही पंजाब में ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष आरंभ हो चुका था। अंग्रेजों के खिलाफ यह संघर्ष सुधारवादी आंदोलनों के रूप में प्रकट हो रहा था। सबसे पहले आत्म अनुशासन और स्वशासन में विश्वास करने वाले नामधारी संप्रदाय ने संघर्ष का बिगुल बजाया। बाद में लाला लाजपतराय ने स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई। चाहे देश में हो या विदेश में, पंजाब स्वतंत्रता संग्राम में हर मोर्चे पर आगे रहा। देश की आज़ादी के बाद पंजाब को विभाजन की विभीषिका का सामना करना पड़ा जिसमें बड़े पैमाने पर रक्तपात तथा विस्थापन हुआ। विस्थापित लोगों के पुनर्वास के साथ-साथ राज्य को नए सिरे से संगठित करने की भी चुनौती थी।

पूर्वी पंजाब की आठ रियासतों को मिलाकर नए राज्य 'पेप्सू' तथा पूर्वी पंजाब राज्य सघ-पटियाला का निर्माण किया गया। पटियाला को इसकी राजधानी बनाया गया। सन 1956 में पेप्सू को पंजाब में मिला दिया गया। बाद में पंजाबी सूबा आंदोलन के कारण 1966 में पंजाब से कुछ हिस्से निकालकर हरियाणा बनाया गया।

पंजाब देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर में जम्मू और कश्मीर, उत्तर-पूर्व में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में हरियाणा तथा राजस्थान है।

सिख धर्म पंजाब का मुख्य धर्म है। राज्य के लगभग 60 प्रतिशत नागरिक सिख धर्म के अनुयायी हैं। पंजाब भारत के उन छ: राज्यों में से है जहां हिन्दुओं का बहुमत नहीं है। सिखों का प्रमुख धार्मिक स्थल, हरिमन्दिर साहिब, पंजाब के अमृतसर नगर में है, जोकि सिक्खों का पवित्रतम नगर है। अमृतसर जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों ओर के पंजाबों की भाषा पंजाबी है, परंतु लिपि भिन्न है। भारतीय पंजाब में जहां गुरुमुखी का प्रयोग होता है वहीं पाकिस्तानी पंजाब में शाहमुखी लिपि का प्रयोग होता है। भारतीय पंजाब की लगभग २५ % जनता हिन्दी बोलती है, विशेष तौर पर हरियाणा और राजस्थान से सटे इलाकों में। हिन्दी को लगभग पूरी जनसंख्या द्वारा समझा जाता है जबकि शहरों में रहने वाले धाराप्रवाह हिन्दी बोल भी सकते हैं।

पंजाब राज्य 22 जिलों में बंटा हुआ है। ये जिले है:

पंजाब का सन २००४ का अनुमानित कुल सकल घरेलू उत्पाद २७ अरब डॉलर है। यह एक विकसित राज्य है।

पंजाब एक कृषि प्रधान राज्य है। यहां गेंहू की सबसे अधिक बिजाई की जाती है। अन्य मुख्य फसलों में चावल, कपास, गन्ना, बाजरा, मक्का, चना और फल शामिल हैं। प्रमुख उद्योगों में कपड़ा और आटा शामिल है।

पंजाब  पृथ्वी का सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र रहा है। यह गेहूं उत्पादन के लिए आदर्श क्षेत्र है। चावल, गन्ना, सब्जियों एंव फलों भी यहां अच्छा उत्पादन होता है। भारतीय पंजाब को भारत का अन्न-भण्डार कहा जाता है। यहां भारत के कुल गेहूं उत्पादन का ६०% और चावल का ४०% उत्पादन होता है। विश्व के परिदृश्य में इन फसलों का विश्व के कुल उत्पादन का १/३० वां अथवा ३% का योगदान करता है।

भारतीय पंजाब का आधारभूत ढांचा पूरे भारत में सर्वाधिक बेहतर में से है। यहां के निवासी औसत के आधार पर भारत के सर्वाधिक धनी लोग हैं।




#Article 71: जापान (2380 words)


जापान, एशिया महाद्वीप में स्थित देश है। जापान चार बड़े और अनेक छोटे द्वीपों का एक समूह है। ये द्वीप एशिया के पूर्व समुद्रतट, यानि प्रशांत महासागर में स्थित हैं। इसके निकटतम पड़ोसी चीन, कोरिया तथा रूस हैं। जापान में वहाँ का मूल निवासियों की जनसंख्या ९८.५% है। बाकी 0.5% कोरियाई, 0.4 % चाइनीज़ तथा 0.6% अन्य लोग है। जापानी अपने देश को निप्पॉन कहते हैं, जिसका मतलब सूर्योदय है। जापान की राजधानी टोक्यो है और उसके अन्य बड़े महानगर योकोहामा, ओसाका और क्योटो हैं। बौद्ध धर्म देश का प्रमुख धर्म है और जापान की जनसंख्या में 96% बौद्ध अनुयायी है। यहाँ की राजभाषा जापानी है।

जापानी लोककथाओं के अनुसार विश्व के निर्माता ने सूर्य देव तथा चन्द्र देव को भी रचा। फिर उसका पोता क्यूशू द्वीप पर आया और बाद में उनकी संतान होंशू द्वीप पर फैल गए।

जापान का प्रथम लिखित साक्ष्य ५७ ईस्वी के एक चीनी लेख से मिलता है। इसमें एक ऐसे राजनीतिज्ञ के चीन दौरे का वर्णन है, जो पूर्व के किसी द्वीप से आया था। धीरे-धीरे दोनों देशों के बीच राजनैतिक और सांस्कृतिक सम्बंध स्थापित हुए। उस समय जापानी एक बहुदैविक धर्म का पालन करते थे, जिसमें कई देवता हुआ करते थे। छठी शताब्दी में चीन से होकर बौद्ध धर्म जापान पहुंचा। इसके बाद पुराने धर्म को शिंतो की संज्ञा दी गई जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - देवताओं का पंथ। बौद्ध धर्म ने पुरानी मान्यताओं को खत्म नहीं किया पर मुख्य धर्म बौद्ध ही बना रहा। चीन से बौद्ध धर्म का आगमन उसी प्रकार हुआ जिस प्रकार लोग, लिखने की प्रणाली (लिपि) तथा मंदिरो का सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक कार्यों के लिए उपयोग।

शिंतो मान्यताओं के अनुसार जब कोई राजा मरता है तो उसके बाद का शासक अपना राजधानी पहले से किसी अलग स्थान पर बनाएगा। बौद्ध धर्म के आगमन के बाद इस मान्यता को त्याग दिया गया। ७१० ईस्वी में राजा ने नॉरा नामक एक शहर में अपनी स्थायी राजधानी बनाई। शताब्दी के अन्त तक इसे हाइरा नामक नगर में स्थानान्तरित कर दिया गया जिसे बाद में क्योटो का नाम दिया गया। सन् ९१० में जापानी शासक फूजीवारा ने अपने आप को जापान की राजनैतिक शक्ति से अलग कर लिया। इसके बाद तक जापान की सत्ता का प्रमुख राजनैतिक रूप से जापान से अलग रहा। यह अपने समकालीन भारतीय, यूरोपी तथा इस्लामी क्षेत्रों से पूरी तरह भिन्न था जहाँ सत्ता का प्रमुख ही शक्ति का प्रमुख भी होता था। इस वंश का शासन ग्यारहवीं शताब्दी के अन्त तक रहा। कई लोगों की नजर में यह काल जापानी सभ्यता का स्वर्णकाल था। चीन से सम्पर्क क्षीण पड़ता गया और जापान ने अपना खुद की पहचान बनाई। दसवी सदी में बौद्ध धर्म का मार्ग अपनाया। इसके बाद से जापान ने अपने आप को एक आर्थिक शक्ति के रूप में सुदृढ़ किया और अभी तकनीकी क्षेत्रों में उसका नाम अग्रणी राष्ट्रों में गिना जाता है।

जापान कई द्वीपों से बना देश है। जापान कोई ६८०० द्वीपों से मिलकर बना है। इनमें से केवल ३४० द्वीप १ वर्ग किलोमीटर से बड़े हैं। जापान को प्रायः चार बड़े द्वीपों का देश कहा जाता है। ये द्वीप हैं - होक्काइडो, होन्शू, शिकोकू तथा क्यूशू। जापानी भूभाग का ७६.२ प्रतिशत भूभाग पहाड़ों से घिरा होने के कारण यहां कृषि योग्य भूमि मात्र १३.४ प्रतिशत है, ३.५ प्रतिशत क्षेत्र में पानी है और ४.६ प्रतिशत भूमि आवासीय उपयोग में है। जापान खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। चारों ओर समुद्र से घिरा होने के बावजूद इसे अपनी जरुरत की २८ प्रतिशत मछलियां बाहर से मंगानी पड़ती है।

यद्यपि ऐसा कहीं लिखा नहीं है पर जापान की राजनैतिक सत्ता का प्रमुख राजा होता है। उसकी शक्तियां सीमित हैं। जापान के संविधान के अनुसार राजा देश तथा जनता की एकता का प्रतिनिधित्व करता है। संविधान के अनुसार जापान की स्वायत्तता की बागडोर जापान की जनता के हाथों में है।

सैनिक रूप से जापान के सम्बन्ध अमेरिका से सामान्य है।

जापान का वर्तमान संविधान इसे दूसरे देशों पर सैनिक अभियान या चढ़ाई करने से मना करता है।

एक अनुमान के अनुसार जापान विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है परन्तु जापान की अर्थव्यवस्था स्थिर नहीं है। यहां के लोगो की औसत वार्षिक आय लगभग ५०,०० अमेरिकी डॉलर है जो काफी अधिक है।

जापान पिछले कुछ दशकों से विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी हो गया है। जापान के वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्रों, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी, मशीनरी और जैव चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी देशों में से एक है। लगभग 700,000 शोधकर्ताओं शेयर एक अमेरिका में 94 130 अरब डॉलर का अनुसंधान एवं विकास बजट, विश्व में तीसरी सबसे बड़ी [.] जापान मौलिक वैज्ञानिक अनुसंधान में एक विश्व नेता हैं, होने भी भौतिकी में तेरह नोबेल पुरस्कार विजेताओं का उत्पादन किया, रसायन विज्ञान या चिकित्सा, 95 तीन फील्ड्स पदक 96 और एक गॉस पुरस्कार विजेता

जापान के अधिक प्रमुख तकनीकी योगदान के कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में, मशीनरी, भूकंप इंजीनियरिंग, औद्योगिक रोबोटिक्स, प्रकाशिकी, रसायन, अर्धचालक और धातुओं पाए जाते हैं। जापान रोबोटिक्स उत्पादन और उपयोग करते हैं, आधे से अधिक रखने (402200 742500 के) दुनिया के औद्योगिक रोबोटों के विनिर्माण के लिए इस्तेमाल किया [98] यह भी QRIO, ASIMO और AIBO का उत्पादन किया। दुनिया में ले जाता है। जापान दुनिया के मोटर वाहन का सबसे बड़ा उत्पादक है 99] [और चार दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल पन्द्रह निर्माताओं के लिए घर और आज के रूप में सात दुनिया के बीस सबसे बड़ी अर्धचालक बिक्री नेताओं की

जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जाक्सा) जापान की अंतरिक्ष एजेंसी है जो अंतरिक्ष और ग्रह अनुसंधान, उड्डयन अनुसंधान आयोजित करता है और रॉकेट और उपग्रह विकसित करता है। यह अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में भागीदार है और जापानी प्रयोग मॉड्यूल (Kibo है) किया गया था 2008 में अंतरिक्ष शटल विधानसभा उड़ानों के दौरान अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में जोड़ा [100.] यह वीनस जलवायु शुरू की परिक्रमा के रूप में अंतरिक्ष की खोज में की योजना बनाई है (ग्रह 2010 में सी), [101] [102 बुध Magnetospheric परिक्रमा विकासशील] 2013 में शुरू किया जाना है, [103] [104] और 2030 से एक moonbase निर्माण

कुछ लोग जापान की संस्कृति को चीन की संस्कृति का ही विस्तार समझते हैं। जापानी लोगो ने कई विधाओं में चीन की संस्कृति का अंधानुकरण किया है। बौद्ध धर्म यहां चीनी तथा कोरियाई भिक्षुओं के माध्यम से पहुंचा। जापान की संस्कृति की सबसे खास बात ये हैं कि यहां के लोग अपनी संस्कृति से बहुत लगाव रखते हैं। मार्च का महीना उत्सवों का महीना होता है। जापानी संगीत उदार है,
होने उपकरणों तराजू, पड़ोसी संस्कृतियों और शैलियों से उधार लिया। Koto जैसे कई उपकरणों, नौवें और दसवें शताब्दियों में पेश किए गए। चौदहवें शताब्दी और लोकप्रिय लोक संगीत से Noh नाटक तारीखों के साथ भाषण, गिटार की तरह shamisen के साथ, सोलहवीं से [144] पश्चिमी शास्त्रीय संगीत, देर से उन्नीसवीं सदी में शुरू की। अब का एक अभिन्न अंग संस्कृति. युद्ध के बाद जापान भारी कर दिया गया है अमेरिकी और यूरोपीय आधुनिक संगीत, जो लोकप्रिय बैंड जम्मू, पॉप संगीत बुलाया के विकास के लिए नेतृत्व किया गया है द्वारा प्रभावित किया।

कराओके सबसे व्यापक रूप से सांस्कृतिक गतिविधि अभ्यास है। सांस्कृतिक मामलों एजेंसी द्वारा एक नवंबर 1993 सर्वेक्षण में पाया गया कि अधिक जापानी कराओके गाया था कि वर्ष की तुलना में परंपरागत सांस्कृतिक गतिविधियों में व्यवस्था या चाय समारोह के फूल के रूप में भाग लिया था।

जापानी साहित्य की जल्द से जल्द काम दो इतिहास की पुस्तकों में शामिल हैं और Kojiki Nihon Shoki और आठवीं शताब्दी कविता पुस्तक Man'yōshū, मान्योशू सभी चीनी अक्षरों में लिखा है। हीयान काल के शुरुआती दिनों में, के रूप में जाना प्रतिलेखन की व्यवस्था काना (हीरागाना और काताकाना) phonograms के रूप में बनाया गया था। बांस कटर की कथा पुराना जापानी कथा माना जाता है हीयान अदालत जीवन के एक खाते. है तकिया सेई Shōnagon द्वारा लिखित पुस्तक के द्वारा दिया है, जबकि लेडी मुरासाकी द्वारा गेंजी की कथा अक्सर दुनिया के पहले उपन्यास के रूप में वर्णित है।

ईदो अवधि के दौरान, साहित्य इतना chōnin की है कि के रूप में सामुराई शिष्टजन का मैदान नहीं बन गया, साधारण लोग हैं। Yomihon, उदाहरण के लिए, लोकप्रिय बन गया है और पाठकों और ग्रन्थकारिता में इस गहरा बदलाव का पता चलता है [148] मीजी युग पारंपरिक साहित्यिक रूपों, जिसके दौरान जापानी साहित्य पश्चिमी प्रभाव एकीकृत की गिरावट देखी.. Natsume Sōseki और मोरी Ōgai पहली जापान के आधुनिक 'उपन्यासकार, Ryūnosuke Akutagawa, Jun'ichirō Tanizaki, Yasunari Kawabata, युकिओ मिशिमा और, द्वारा और अधिक हाल ही में पीछा किया, Haruki Murakami थे। जापान के दो नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक-Yasunari Kawabata (1968) और Kenzaburo ँ (1994) है।

मान्योशू जापान का सबसे पुराना काव्य संकलन है। हाइकु जापान की प्रसिद्ध काव्य विधा रही है तथा मात्सुओ बाशो जापानी हाइकु कविता के प्रसिद्ध कवि हैं।

जापान की 96 प्रतिशत जनता बौद्ध धर्म का अनुसरण करती है। चीन के बाद बौद्ध आबादी वाला जापान सबसे बड़ा देश है। शिंतो धर्म भी यहाँ काफी प्रसिद्ध है, इस धर्म के अधिकतर लोग बौद्ध धर्म का ही पालन करते है। ताओ धर्म, कन्फ्यूशीवाद और बौद्ध धर्म चीन से भी जापानी विश्वासों और सीमा शुल्क को प्रभावित किया है। जापान में धर्म प्रकृति में समधर्मी हो जाता है और प्रथाओं का एक माता पिता, परीक्षा से पहले प्रार्थना छात्रों मना बच्चों के रूप में ऐसी किस्म, में यह परिणाम, जोड़ों एक क्रिश्चियन चर्च पर एक शादी पकड़ होने के बौद्ध मंदिर में आयोजित किया। एक अल्पसंख्यक (2,595,397 या 2.04%) ईसाई धर्म को पेशे के अलावा है, क्योंकि 19 वीं सदी के मध्य, कई धार्मिक संप्रदायों (Shinshūkyō) जापान में Tenrikyo और Aum (शिनरिक्यो या Aleph) जैसे उभरा है।

लगभग ९९% जनता जापानी भाषा बोलती है। 
लेखन प्रणाली कांजी (चीनी अक्षर) और काना के दो सेट के रूप में अच्छी तरह से लैटिन वर्णमाला और अरबी अंकों का उपयोग करता है। भाषाओं में भी जापान भाषा परिवार का हिस्सा है जो जापानी अंतर्गत आता है, ओकिनावा में बोली जाती हैं, लेकिन कुछ बच्चों को इन भाषाओं के लिए सीख लो. भाषा मरणासन्न केवल कुछ बुजुर्ग होकाईदो में शेष देशी वक्ताओं के साथ है। अधिकांश सार्वजनिक और निजी स्कूलों के छात्रों को दोनों जापानी और अंग्रेजी में पाठ्यक्रमों लेने के लिए आवश्यकता होती है।

अपनी जापान यात्रा के बाद निशिकांत ठाकुर लिखते हैं - 
 आज जापान में हर व्यक्ति के पास रंगीन टेलीविजन है, करीब 83 प्रतिशत लोगों के पास कार है, 80 प्रतिशत घरों में एयरकंडीशन लगे हैं, 76 प्रतिशत लोगों के पास वीसीआर हैं, 91 प्रतिशत घरों में माइक्रोवेव ओवन हैं और करीब 25 प्रतिशत लोगों के पास पर्सनल कम्प्यूटर हैं। यह है विकास और ऊंचे जीवन स्तर की एक झलक। आम जापानी स्वभाव से शर्मीला, विनम्र, ईमानदार, मेहनती और देशभक्त होता है। यही कारण है कि विकसित देशों की तुलना में जापान में अपराध दर कम है। 
जापान में दुनिया के सबसे ज्यादा बुजुर्ग लोग रहते हैं। जापान तकनीक क्षेत्र में बहुत आगे है

परंपरागत रूप से, सूमो जापान के राष्ट्रीय खेल माना जाता हैऔर यह जापान में एक लोकप्रिय दर्शक खेल है। जूडो जैसे मार्शल आर्ट, कराटे और आधुनिक Kendo भी व्यापक रूप से प्रचलित है और देश में दर्शकों ने आनंद उठाया. मीजी पुनरुद्धार के बाद कई पश्चिमी खेल जापान में शुरू किया गया और शिक्षा प्रणाली के माध्यम से फैल शुरू किया।

जापान में पेशेवर बेसबॉल लीग 1936 में स्थापित किया गया था आज बेसबॉल सबसे लोकप्रिय देश में दर्शक खेल है।. एक के सबसे प्रसिद्ध जापानी बेसबॉल खिलाड़ियों के Ichiro सुजुकी, जो 1994 में जापान की सबसे मूल्यवान प्लेयर अवार्ड, 1995 और 1996 है, अब उत्तर अमेरिकी मेजर लीग बेसबॉल के सिएटल Mariners के लिए खेलता है जीत रही है। उसके पहले, Sadaharu ओह अच्छी तरह से किया गया था जापान के बाहर जाना जाता है, कर अधिक घर मारा अपने समकालीन, हांक हारून, संयुक्त राज्य अमेरिका में किया था की तुलना में अपने कैरियर के दौरान जापान में चलाता है।

गोल्फ भी जापान, के रूप में लोकप्रिय है सुपर जी.टी. स्पोर्ट्स कार श्रृंखला और निप्पॉन फॉर्मूला फार्मूला रेसिंग के रूप में ऑटो रेसिंग के रूप हैं जुड़वा अँगूठी Motegi था होंडा द्वारा 1997 में पूरा करने के लिए IndyCar लाने के लिए दौड़ जापान.

जापान में टोक्यो में 1964 में ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की मेजबानी की। जापान के शीतकालीन ओलंपिक की मेजबानी की है दो बार, नागानो में 1998 में और 1972 में साप्पोरो

 
जापान के पास रखता आर्थिक और सैन्य संबंधों इसके प्रमुख सहयोगी अमेरिका के साथ, अमेरिका और जापान सुरक्षा अपनी विदेश नीति के आधार के रूप में सेवा के साथ गठबंधन 1956 के बाद से संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य राज्य, जापान के रूप में सेवा की है एक गैर 19 साल की कुल के लिए स्थायी सुरक्षा परिषद के सदस्य, 2009 और 2010 के लिए सबसे हाल ही में. यह भी एक G4 सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग देशों की

जी -8, APEC, आसियान प्लस तीन और पूर्व एशिया शिखर बैठक में एक भागीदार के एक सदस्य के रूप में, जापान सक्रिय रूप से अंतरराष्ट्रीय मामलों में भाग लेता है और दुनिया भर में अपने महत्वपूर्ण सहयोगी के साथ राजनयिक संबंधों को बढ़ाती है। जापान मार्च 2007 और भारत के साथ अक्टूबर 2008 में ऑस्ट्रेलिया के साथ एक सुरक्षा समझौतेयह भी दुनिया की सरकारी विकास सहायता का तीसरा सबसे बड़ा दाता है पर हस्ताक्षर किए। होने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका 2004 में 8,86 अरब डॉलर का दान.  जापान इराक युद्ध करने के लिए गैर लड़नेवाला सैनिक भेजे हैं, लेकिन बाद में इराक से अपनी सेना वापस ले लिया जापानी समुद्री सेल्फ डिफेंस फोर्स. RIMPAC समुद्री अभ्यास में एक नियमित रूप से भागीदार है।

जापान ने भी जापानी नागरिकों और अपने परमाणु हथियार और मिसाइल कार्यक्रम के अपने अपहरण पर एक उत्तरी कोरिया के साथ चल रहेविवाद के चेहरे (देखें भी छह पक्षीय वार्ता). कुरील द्वीप विवाद का एक परिणाम के रूप में, जापान तकनीकी रूप से अब भी रूस के साथ युद्ध में कोई मुद्दा सुलझाने संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे के बाद से कभी भी है।

जापान की सेना द्वारा प्रतिबंधित है अनुच्छेद 9 जापानी संविधान है, जो जापान के युद्ध की घोषणा करने के लिए या अंतर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान का एक साधन के रूप में सैन्य बल के प्रयोग का अधिकार त्याग की। जापान के सैन्य रक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित है और मुख्य रूप से जापान ग्राउंड सेल्फ डिफेंस फोर्स (JGSDF) के होते हैं, जापान मेरीटाइम सेल्फ डिफेंस (JMSDF) सेना और जापान एयर सेल्फ डिफेंस फोर्स (JASDF). सेना ने हाल ही में आपरेशन किया गया है शांति और जापानी सैनिकों की इराक में तैनाती में प्रयुक्त विश्व युद्ध के द्वितीय के बाद से पहली बार अपने सैन्य उपयोग के विदेशी चिह्नित




#Article 72: थाईलैण्ड (1799 words)


ठइलैण्ड जिसका प्राचीन भारतीय नाम श्यामदेश (या स्याम) है दक्षिण पूर्वी एशिया में एक देश है। इसकी पूर्वी सीमा पर लाओस और कम्बोडिया, दक्षिणी सीमा पर मलेशिया और पश्चिमी सीमा पर म्यानमार है। 'स्याम' ही ११ मई, १९४९ तक ठइलैण्ड का अधिकृत नाम था। ठइ शब्द का अर्थ थाई भाषा में 'स्वतन्त्र' होता है। यह शब्द ठइ नागरिकों के सन्दर्भ में भी इस्तेमाल किया जाता है। इस कारण कुछ लोग विशेष रूप से यहाँ बसने वाले चीनी लोग, ठइलैंड को आज भी स्याम नाम से पुकारना पसन्द करते हैं। ठइलैण्ड की राजधानी बैंकाक है।

हिंदू धर्म का थाईलैंड के राज परिवार पर सदियों से गहरा प्रभाव रहा है। माना यह जाता है कि थाईलैंड के राजा भगवान विष्णु के अवतार हैं। इसी भावना का सम्मान करते हुए थाईलैंड का राष्ट्रीय प्रतीक गरुड़ है।

थाईलैंड में राजा को राम कहा जाता है। राज परिवार अयोध्या नामक शहर में रहता है। ये स्थान बैंकॉक से कोई 50-60 किलोमीटर दूर होगा। यहां पर बौद्ध मंदिरों की भी भरमार है जिनमें भगवान बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां स्थापित हैं। क्या ये कम हैरानी की बात है कि बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने के चलते विष्णु का अवतार मानते हैं। इसलिए थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है। वहां के राजा को भगवान राम का वंशज माना जाता है। थाईलैंड में 94 प्रतिशत आबादी बौद्ध धर्मावलंबी है। फिर भी इधर का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़ है। हिंदू पौराणिक कथाओं में गरुड़ को विष्णु की सवारी माना गया है। गरुड़ के लिए कहा जाता है कि वह आधा पक्षी और आधा पुरुष है। उसका शरीर इंसान की तरह का है, पर चेहरा पक्षी से मिलता है। उसके पंख हैं।
अब प्रश्न उठता है कि जिस देश का सरकारी धर्म बौद्ध हो वहां पर हिंदू धर्म का प्रतीक क्यों है? इसका उत्तर ये है कि चूंकि थाईलैंड मूल रूप से हिंदू धर्म था, इसलिए उसे इस में कोई विरोधाभास नजर नजर नहीं आता कि वहां पर हिंदू धर्म का प्रतीक राष्ट्रीय चिन्ह हो। एक सामान्य थाई गर्व से कहता है कि उसके पूर्वज हिंदू थे और उसके लिए हिंदू धर्म भी आदरणीय है। आपको थाईलैंड एक के बाद एक आश्चर्य देता है। वहां का राष्ट्रीय ग्रंथ रामायण है। वैसे थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के मानने वाले बहुमत में हैं, फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रंथ रामायण है। जिसे थाई भाषा में ‘राम-कियेन’ कहते हैं, जिसका अर्थ राम-कीर्ति होता है, जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक के सबसे बड़े और भव्य हॉल का नाम ‘रामायण हॉल’ है। यहां पर राम कियेन पर आधारित नृत्य नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन प्रतिदिन होता है। राम कियेन के मुख्य पात्रों में राम (राम), लक (लक्ष्मण), पाली (बाली), सुक्रीप (सुग्रीव), ओन्कोट (अंगद), खोम्पून ( जाम्बवन्त), बिपेक ( विभीषण), रावण, जटायु आदि हैं।

नवरात्र पर बैंकॉक के सिलोम रोड पर स्थित श्री नारायण मंदिर थाईलैंड के हिंदुओं का केंद्र बन जाता है। यहां के सभी हिंदू इधर कम से एक बार जरूर आते हैं, पूजा या फिर सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए। इस दौरान भजन, कीर्तन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान जारी रहते हैं। दिन-रात प्रसाद और भोजन की व्यवस्था रहती है। इस दौरान दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जी की एक दिन सवारी भी मुख्य मार्गो से निकलती है। इसमें भगवान गणपति, कृष्ण, सुब्रमण्यम और दूसरे देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी सजाकर किसी वाहन में रखा गया होता है। इस आयोजन में हजारों बौद्ध भी भाग लेते हैं। ये सवारी अपना तीन किलोमीटर का रास्ता सात घंटे में पूरा करती है। इसमें संगीत और नृत्य टोलियां भी रहती हैं।

दक्षिण पूर्व एशिया के इस देश में हिंदू देवी-देवताओं और प्रतीकों को आप चप्पे-चप्पे पर देखते हैं। यूं थाईलैंड बौद्ध देश हैं। पर राम भी अराध्य हैं। राजधानी बैंकॉक से सटा है अयोध्या शहर। मान्यता है कि यही थी भगवान श्रीराम की राजधानी। थाईलैंड के बौद्ध मंदिरों में आपको ब्रह्मा,विष्णु और महेश की मूर्तियां और चित्र मिल जाएंगे। इन सभी देवी-देवताओं के अलग से मंदिर भी हैं। इनमें रोज बड़ी संख्या में हिंदू और बौद्ध पूजा अर्चना के लिए आते हैं। यानी थाईलैंड बौद्ध और हिंदू धर्म का सुंदर मिश्रण पेश करता है। कहीं कोई कटुता या वैमनस्थ का भाव नहीं है।

बैंकॉक स्थित शिव मंदिर, दुर्गा मंदिर विष्णु मंदिर वगैरह का निर्माण हिन्दुओं के साथ-साथ यहां के बौद्धों ने भी करवाया है। ये वास्तव में कमाल है। जहां तक हिंदू मंदिरों की बात है तो इन्हें यहां पर दशकों से बस गए भारत वंशियों ने बनवाया है। कुछ मंदिर निजी प्रयासों से भी बने हैं। थाईलैंड में तमिल और उत्तर भारत के भारतवंशी हैं। इसलिए मंदिर पर दक्षिण और उत्तर भारत के मंदिरों की तरह से बने हुए हैं। बैंकॉक के प्रमुख रथचेप्रयोंग चौराहे पर ब्रह्मा जी के मंदिर में लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां देखने लायक हैं। इनमें हिंदुओं साथ-साथ बौद्ध भी आ रहे हैं। कहीं कोई भेदभाव नहीं है। गौरतलब यह है कि कई बौद्ध मंदिरों में हिंदू देवी-देवताओं के चित्र और मूर्तियां हैं। ये सब देखकर लगता है कि हिंदू और बौद्ध सहअस्तित्व में विश्वास करते है। ये सहनशील है। पृथक धर्म होने पर भी एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव स्पष्ट है।

बौद्ध अनुयायी थाईलैंड लाखों की संख्या में पहुंचते हैं। थाईलैंड में प्रति वर्ष 80 लाख पर्यटक पहुंच रहे हैं। इनमें से अधिकतर भगवान बुद्ध से जुड़े मंदिरों के दर्शन करने के लिए वहां पर जाते हैं।

आज के ठइ भू भाग में मानव पिछले कोई १०,००० वर्षों से रह रहें हैं। ख्मेर साम्राज्य के पतन के पहले यहाँ कई राज्य थे - ताई, मलय, ख्मेर इत्यादि। सन् १२३८ में सुखोठइ राज्य की स्थापना हुई जिसे पहला बौद्ध ठइ (स्याम) राज्य माना जाता है। लगभग एक सदी बाद अयुध्या के राज्य ने सुखाठइ के ऊपर अपनी प्रभुता स्थापित कर ली। सन् १७६७ में अयुध्या के पतन (बर्मा द्वारा) के बाद थोम्बुरी राजधानी बनी। सन् १७८२ में बैंकॉक में चक्री राजवंश की स्थापना हुई जिसे आधुनिक ठइलैँड का आरंभ माना जाता है।

यूरोपीय शक्तियों के साथ हुई लड़ाई में स्याम को कुछ प्रदेश लौटाने पड़े जो आज बर्मा और मलेशिया के अंश हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में यह जापान का सहयोगी रहा और विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका का। १९९२ में हुई सत्ता पलट में ठइलैंड एक नया संवैधानिक राजतंत्र घोषित कर दिया गया।

धर्म और राजतंत्र ठइ संस्कृति के दो स्तंभ हैं और यहां की दैनिक जिंदगी का हिस्सा भी। बौद्ध धर्म यहां का मुख्य धर्म है। गेरुए वस्त्र पहने बौद्ध भिक्षु और सोने, संगमरमर व पत्थर से बने बुद्ध यहां आमतौर पर देखे जा सकते हैं। यहां मंदिर में जाने से पहले अपने कपड़ों का विशेष ध्यान रखें। इन जगहों पर छोटे कपड़े पहन कर आना मना है।

ठइलैंड का शास्त्रीय संगीत चीनी, जापानी, भारतीय और इंडोनेशिया के संगीत के बहुत समीप जान पड़ता है। यहां बहुत की नृत्य शैलियां हैं जो नाटक से जुड़ी हुई हैं। इनमें रामायण का महत्वपूर्ण स्थान है। इन कार्यक्रमों में भारी परिधानों और मुखौटों का प्रयोग किया जाता है।

प्राचीन समय यह हिंदू सभ्यता से परिपूर्ण देश था। आज भी यहां हिंदू संस्कृति की झलक देखने को मिल ही जाती है। रामायण यहां बहुत लोकप्रिय है। कालांतर में भारतीय बौद्ध राजाओं ने यहां बौद्ध धर्म का प्रचार किया और यह देश बौद्ध देश के रूप में प्रख्यात हुआ।

बैंकॉक थाइलैंड की राजधानी है। यहां ऐसी अनेक चीजें जो पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध हैं मरीन पार्क और सफारी। मरीन पार्क में प्रशिक्षित डॉल्फिन अपने करतब दिखाती हैं। यह कार्यक्रम बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी खूब लुभाता है। सफारी वर्ल्‍ड विश्‍व का सबसे बड़ा खुला चिड़ियाघर (प्राणीउद्यान) है। यहां एशिया और अफ्रीका के लगभग सभी वन्य जीवों को देखा जा सकता है। यहां की यात्रा थकावट भरी लेकिन रोमांचक होती है। रास्ते में खानपान का इंतजाम भी है।

बैंकॉक के बाद पट्टया थाइलैंड का सबसे प्रमुख पर्यटक स्थल है। यहां भी घूमने-फिरने लायक अनेक खूबसूरत जगह हैं। इसमें सबसे पहले नंबर आता है रिप्लेज बिलीव इट और नॉट संग्रहालय का। यहां का इन्फिनिटी मेज और 4 डी मोशन थिएटर की सैर बहुत ही रोमांचक है। यहां की भूतिया सुरंग लोगों को भूतों का अहसास कराती है फिर भी सैलानी बड़ी संख्या में यहां आते हैं।

यहां के कोरल आइलैंड पर पैरासेलिंग और वॉटर स्पोट्स का आनंद उठाया जा सकता है। यहां पर काँच के तले वाली नाव भी उपलब्ध होती हैं जिससे जलीय जीवों और कोरल को देखा जा सकता है। कोरल आइलैंड में एक रत्न दीर्घा भी है जहां बहुमूल्य से रत्नों के बार में जानकारी ली जा सकती है। लेकिन इस आइलैंड में आने से पहले यह जान लें कि यहां का एक ड्रेस कोड है जिसका पालन करना आवश्यक है।

कोई पर्यटक पट्टया आए और अलकाजर कैबरट न जाए ऐसा नहीं हो सकता। यहां पर नृत्य, संगीत व अन्य कार्यक्रमों का आनंद उठाया जा सकता है। यहां होने वाले कार्यक्रमों की खास बात यह है कि इसमें काम करने वाली खूबसूरत अभिनेत्रियां वास्तव में पुरुष होते हैं।

यह थाइलैंड का सबसे बड़ा, सबसे अधिक आबादी वाला द्वीप है। सबसे ज्यादा पर्यटक यहां आते हैं। रंगों से भरी इस जगह का विकास मुख्य रूप से पर्यटन की वजह से ही हुआ है। इस द्वीप में कुछ रोचक बाजार, मंदिर और चीनी-पुर्तगाली सभ्यता का अनोखा संगम देखा जा सकता है। यहाँ सब्से ज्यादा आबादि ठइ और नेपाली की है।

नदी के साथ बसा अयूथया उद्यान यूनेस्को की विश्‍व धरोहर सूची का हिस्सा है। यहां सभी ओर मंदिर बने हुए हैं। किसी समय यहां पर नगर बसा हुआ था। बहुत से अवशेष अभी भी यहां देखे जा सकते हैं, जैसे- वट फ्ररा सी सैनपुटे, वट मोगखों बोफिट, वट ना फ्रा मेरु, वट थम्मीकरट, वट रतबुरना और वट फ्रा महाथट। इन जगहों पर गाड़ी नहीं जा सकती इसलिए यहां पैदल की आएं।

बैंकॉक से करीब ७०० किलोमीटर दूर चियांग माई ठइलैंड का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। पुरानी दुनिया का अहसास कराते इस शहर में करीब ३०० से ज्यादा मंदिर हैं। यहां से आप पर्वतों को भी देख सकते हैं। यह शहर आधुनिक भी हैं जहां आपको पूरी दुनिया के रंग मिल जाएंगे। चियांग माई खानपान व खरीदारी के शौकीनों और आशियाने की तलाश कर रहे लोगों के लिए बिल्कुल सही जगह है। बहुत सारे मंदिरों के अलावा यहां पर आरामदायक उद्यान, रात को लगने वाले बाजार, खूबसूरत संग्रहालय भी हैं जहां पर आराम से समय गुजारा जा सकता है।

बैंकॉक के पश्चिम में स्थित नखोन पथोम को ठइलैंड का सबसे पुराना शहर माना जाता है। यहां के फ्रा पथोम चेडी को विश्‍व का सबसे ऊंचा बौद्ध स्मारक माना जाता है। तेरावड बौद्धों द्वारा 6ठीं शताब्दी में बनाया गया मूल स्मारक अब एक विशाल गुंबद के नीचे स्थित है।

बैंकॉक में खरीदारी के लिए कई जगहें हैं। इंद्रा मार्केट हाथ से बने सामान के लिए मशहूर है। एमबीके प्लाजा ब्रैंडिड सामान की खरीदारी के लिए उपयुक्त स्थान है। द सुप्रीम टोक्यो से कपड़ों और ठइ नाइफ की खरीदारी की जा सकती है। इसके अलावा ठइलैंड से रेशम, कीमती रत्न और पेंटिंग्स भी खरीदी जा सकती हैं।




#Article 73: बैंकॉक (146 words)


बैंकाक दक्षिण पूर्वी एशियाई देश थाईलैंड की राजधानी है। बैंकॉक थाइलैंड की राजधानी है। यहां ऐसी अनेक चीजें जो पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध हैं मरीन पार्क और सफारी। मरीन पार्क में प्रशिक्षित डॉल्फिन्स अपने करतब दिखाती हैं। यह कार्यक्रम बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी खूब लुभाता है। सफारी वर्ल्‍ड विश्‍व का सबसे बड़ा खुला चिड़ियाघर है। यहां एशिया और अफ्रीका के लगभग सभी वन्य जीवों को देखा जा सकता है। यहां की यात्रा थकावट भरी लेकिन रोमांचक होती है। रास्ते में खानपान का इंतजाम भी है।

बैंकॉक का पूरा नाम पालि और संस्कृत भाषाओं से आता है। यह नाम ही औपचारिक रूप से प्रयोग किया जाता है। यह रूप में हिन्दी में सुनाया जा सकता है: क्रुंग देवमहानगर अमररत्नकोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महातिलकभव नवरत्नराजधानी पुरीरम्य उत्तमराजनिवेशन महास्थान अमरविमान अवतारस्थित्य शक्रदत्तिय विष्णुकर्मप्रसिद्धि ()।

Bangkok has a number of sister cities. They are:

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#Article 74: हीरा (657 words)


हीरा एक पारदर्शी रत्न है। यह रासायनिक रूप से कार्बन का शुद्धतम रूप है। हीरा में प्रत्येक कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ सह-संयोजी बन्ध द्वारा जुड़ा रहता है। कार्बन परमाणुओं के बाहरी कक्ष में उपस्थित सभी चारों इलेक्ट्रान सह-संयोजी बन्ध में भाग ले लेते हैं तथा एक भी इलेक्ट्रान संवतंत्र नहीं होता है। इसलिए हीरा ऊष्मा तथा विद्युत का कुचालन होता है। हीरा में सभी कार्बन परमाणु बहुत ही शक्तिशाली सह-संयोजी बन्ध द्वारा जुड़े होते हैं, इसलिए यह बहुत कठोर होता है। हीरा प्राक्रतिक पदार्थो में सबसे कठोर पदा‍र्थ है इसकी कठोरता के कारण इसका प्रयोग कई उद्योगो तथा आभूषणों में किया जाता है। हीरे केवल सफ़ेद ही नहीं होते अशुद्धियों के कारण इसका शेड नीला, लाल, संतरा, पीला, हरा व काला होता है। हरा हीरा सबसे दुर्लभ है। हीरे को यदि ओवन में ७६३ डिग्री सेल्सियस पर गरम किया जाये, तो यह जलकर कार्बन डाइ-आक्साइड बना लेता है तथा बिल्कूल ही राख नहीं बचती है। इससे यह प्रमाणित होता है कि हीरा कार्बन का शुद्ध रूप है। हीरा रासायनिक तौर पर बहुत निष्क्रिय होता है एव सभी घोलकों में अघुलनशील होता है। इसका आपेक्षिक घनत्व ३.५१ होता है। बहुत अधिक चमक होने के कारण हीरा को जवाहरात के रूप में उपयोग किया जाता है। हीरा उष्मीय किरणों के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील होता है, इसलिए अतिशुद्ध थर्मामीटर बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। काले हीरे का उपयोग काँच काटने, दूसरे हीरे के काटने, हीरे पर पालिश करने तथा चट्टानों में छेद करने के लिए किया जाता है।

दुनिया का सबसे बड़ा हीरा कलिनन हीरा (Cullinan Diamond) है जो 3106 कैरेट का है। इसका पता 1905 में दक्षिण अफ्रीका में लगाया गया था। यह अभी ब्रिटेन राजघरानों के शाही संग्रह में शोभायमान है।  अब तक ढूंढ़ा गया दुनिया का सबसे दूसरा बड़ा अपरिष्कृत हीरा 1758 कैरेट का सेवेलो डायमंड (Sewelo Diamond) है, सेत्स्वाना भाषा में जिसका अर्थ 'दुर्लभ खोज' है।

हीरा खान से निकाला जाता है और बाद में पॉलिश कर के चमकाया जाता है। १८वीं शताब्दी में दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में हीरों की खानों का पता चलने से पहले तक दुनिया भर में भारत की गोलकुंडा खान से निकले हीरों की धाक थी। लेकिन यहाँ से निकले अधिकांश भारतीय हीरे या तो लापता हैं या विदेशी संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमें से एक हीरा ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा कोहिनूर भी है। सबसे अधिक वजन वाला हीरा ग्रेट मुगल गोलकुंडा की खान से १६५० में जब निकला तो इसका वजन ७८७ कैरेट था। जो कोहिनूर से करीब छह गुना अधिक था आज यह हीरा आज कहाँ है किसी को पता नहीं। ऐसा ही एक बहुमूल्य हीरा अहमदाबाद डायमंड था जो बाबर ने १५२६ में पानीपत की लड़ाई के बाद ग्वालियर के राजा विक्रमजीत को हराकर हासिल किया था। इस दुर्लभ हीरे को आखिरी बार १९९० में लंदन के क्रिस्ले ऑक्सन हाउस की नीलामी में देखा गया था। द रिजेंट नामक १७०२ के आसपास गोलकुंडा की खान से निकला हीरा ४१० कैरेट था। जो बाद में नेपोलियन के पास पहुँचा। यह हीरा अब १४० कैरेट का हो चुका है और पेरिस के लेवोरे म्यूजियम में रखा गया है। इसी प्रकार ब्रोलिटी ऑफ इंडिया का। ९०.८ कैरेट के ब्रोलिटी जिसे कोहिनूर से भी पुराना बताया जाता है, १२वीं शताब्दी में फ्रांस की महारानी ने खरीदा। आज यह कहाँ है कोई नहीं जानता। एक और गुमनाम हीरा २०० कैरेट का ओरलोव था जिसे १८वीं शताब्दी में मैसूर के मंदिर की एक मूर्ति की आंख से फ्रांस के व्यापारी ने चुराया था। 
कुछ गुमनाम भारतीय हीरे: ग्रेट मुगल (२८० कैरेट), ओरलोव (२०० कैरेट), द रिजेंट (१४० कैरेट), ब्रोलिटी ऑफ इंडिया (९०.८ कैरेट), 
अहमदाबाद डायमंड (७८.८ कैरेट), द ब्लू होप (४५.५२ कैरेट), आगरा डायमंड (३२.२ कैरेट), द नेपाल (७८.४१)

हीरे का कारोबार करने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी डी बियर्स की सहयोगी इकाई डायमंड ट्रेडिंग कंपनी (डीटीसी) के मुताबिक दुनिया के ९० फीसदी हीरों के तराशने का काम भारत में होता है, ऐसे में यहाँ हीरा उद्योग के फलने-फूलने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं।




#Article 75: माइक्रोसॉफ़्ट (5692 words)


माइक्रोसॉफ्ट, विश्व की एक जानी मानी बहुराष्ट्रीय कम्पनी है जो मुख्यत: संगणक अभियान्त्रिकी के क्षेत्र में काम करती है। माईक्रोसॉफ्ट दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कम्पनी है। 100 से भी अधिक देशों में फैली इसकी शाखाओं में 70000 से भी अधिक लोग काम करते हैं। इसका वार्षिक व्यापार लगभग 20 खरब रूपयों (~ 45 बिलियन डॉलर्स) का है। कम्पनी का मुख्यालय अमेरिका में रेडमण्ड, वॉशिंगटन में स्थित है। इसकी स्थापना बिल गेट्स ने 4 अप्रैल 1975 को की थी। इसका मुख्य उत्पाद विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम है। इसके अलावा माईक्रोसॉफ्ट नाना प्रकार के सॉफ्टवेयर भी बनाती है।Microsoft Corporation एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी कंपनी है जिसका मुख्यालय रेडमंड, वाशिंगटन में है। यह कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, व्यक्तिगत कंप्यूटर और संबंधित सेवाओं का विकास, निर्माण, लाइसेंस, समर्थन और बिक्री करता है। इसके सबसे प्रसिद्ध सॉफ्टवेयर उत्पाद ऑपरेटिंग सिस्टम, माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस सूट और इंटरनेट एक्सप्लोरर और एज वेब ब्राउजर के माइक्रोसॉफ्ट विंडोज लाइन हैं। इसके प्रमुख हार्डवेयर उत्पाद Xbox वीडियो गेम कंसोल और टचस्क्रीन पर्सनल कंप्यूटर के Microsoft सरफेस लाइनअप हैं। 2016 में, यह राजस्व द्वारा दुनिया का सबसे बड़ा सॉफ्टवेयर निर्माता था (वर्तमान में वर्णमाला / Google के पास अधिक राजस्व है)। [3] माइक्रोसॉफ्ट शब्द माइक्रो कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर का एक पोर्टमांटे है। [4] Microsoft कुल राजस्व से सबसे बड़े संयुक्त राज्य निगमों की 2018 फॉर्च्यून 500 रैंकिंग में 30 वें स्थान पर है। [5]

Microsoft की स्थापना बिल गेट्स और पॉल एलन द्वारा 4 अप्रैल, 1975 को की गई थी, जिसने Altair 8800 के लिए BASIC दुभाषियों को विकसित करने और बेचने के लिए। यह 1980 के दशक के मध्य तक MS-DOS के साथ पर्सनल कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम के बाजार पर हावी हो गया, Microsoft Windows के बाद । कंपनी के 1986 के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) और उसके शेयर की कीमत में बाद में वृद्धि ने तीन अरबपति और माइक्रोसॉफ्ट के कर्मचारियों के बीच अनुमानित 12,000 करोड़पति पैदा किए। 1990 के दशक के बाद से, इसने ऑपरेटिंग सिस्टम के बाजार से तेजी से विविधता हासिल की है और कई कॉर्पोरेट अधिग्रहण किए हैं, उनका सबसे बड़ा दिसंबर 2016 में लिंक्डइन का अधिग्रहण $ 26.2 बिलियन में किया जा रहा है, [6] इसके बाद स्काइप टेक्नोलॉजीज का अधिग्रहण 8.5 बिलियन डॉलर में हो गया। मई 2011. [7]

अंतर्वस्तु

इतिहास
मुख्य लेख: Microsoft का इतिहास, Microsoft की समयरेखा और Microsoft Windows संस्करण इतिहास

पॉल एलन और बिल गेट्स 19 अक्टूबर 1981 को कैमरे के लिए पोज़ देते हैं, जो आईबीएम के साथ एक पिवट कॉन्ट्रैक्ट साइन करने के बाद पीसी से घिरे होते हैं। [16]: 228
बचपन के दोस्त बिल गेट्स और पॉल एलन ने कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में अपने साझा कौशल का उपयोग करते हुए एक व्यवसाय बनाने की मांग की। [१ates] 1972 में उन्होंने अपनी पहली कंपनी की स्थापना की, जिसका नाम ट्राफ-ओ-डेटा था, जिसने ऑटोमोबाइल ट्रैफ़िक डेटा को ट्रैक और विश्लेषण करने के लिए एक अल्पविकसित कंप्यूटर बेचा। जबकि गेट्स ने हार्वर्ड में दाखिला लिया, एलन ने वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की, हालांकि बाद में वह हनीवेल में काम करने के लिए स्कूल से बाहर हो गए। [१ लोकप्रिय इलेक्ट्रॉनिक्स के जनवरी 1975 के अंक में माइक्रो इंस्ट्रूमेंटेशन एंड टेलीमेट्री सिस्टम्स (एमआईटीएस) अल्टेयर 8800 माइक्रो कंप्यूटर, [19] को दिखाया गया, जिसने एलन को यह सुझाव देने के लिए प्रेरित किया कि वे डिवाइस के लिए एक बेसिक दुभाषिया का कार्यक्रम कर सकते हैं। गेट्स के एक कॉल के बाद काम करने वाले दुभाषिया होने का दावा करते हुए, MITS ने एक प्रदर्शन का अनुरोध किया। चूँकि वे अभी तक एक नहीं हुए थे, एलेन ने Altair के लिए एक सिम्युलेटर पर काम किया जबकि गेट्स ने दुभाषिया विकसित किया। हालांकि उन्होंने विकास किया
एक सिम्युलेटर पर दुभाषिया और वास्तविक उपकरण नहीं, यह त्रुटिपूर्ण रूप से काम करता है जब उन्होंने मार्च 1975 में दुभाषियों को अल्बुकर्क, न्यू मैक्सिको में प्रदर्शन किया। MITS ने इसे वितरित करने पर सहमति व्यक्त की, इसे अल्टेयर बेसिक के रूप में विपणन किया। [१६]: १० 112, ११२-११४ गेट्स और एलन ने आधिकारिक तौर पर ४ अप्रैल १ ९ 1975५ को गेट्स के साथ सीईओ के रूप में माइक्रोसॉफ्ट की स्थापना की। [२०] माइक्रो-सॉफ्ट (माइक्रो कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर के लिए संक्षिप्त) का मूल नाम एलन द्वारा सुझाया गया था। [२१] [२२] अगस्त 1977 में कंपनी ने जापान में ASCII मैगज़ीन के साथ एक समझौता किया, जिसके परिणामस्वरूप पहला अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय, ASCII Microsoft था। जनवरी 1979 में Microsoft ने अपने मुख्यालय को Bellevue, Washington में स्थानांतरित कर दिया। [20]

Microsoft ने 1980 में यूनिक्स के अपने स्वयं के संस्करण के साथ ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) व्यवसाय में प्रवेश किया, जिसे Xenix कहा जाता है। [२४] हालांकि, यह एमएस-डॉस था जिसने कंपनी के प्रभुत्व को मजबूत किया। डिजिटल अनुसंधान के साथ वार्ता विफल होने के बाद, आईबीएम ने सीपीसी / एम ओएस का एक संस्करण प्रदान करने के लिए नवंबर 1980 में माइक्रोसॉफ्ट को एक अनुबंध प्रदान किया, जिसे आगामी आईबीएम पर्सनल कंप्यूटर (आईबीएम पीसी) में उपयोग करने के लिए निर्धारित किया गया था। [25] इस सौदे के लिए, माइक्रोसॉफ्ट ने सिएटल कंप्यूटर उत्पादों से 86-डॉस नामक एक सीपी / एम क्लोन खरीदा, जिसे उसने एमएस-डॉस के रूप में ब्रांड किया, हालांकि आईबीएम ने इसे आईबीएम पीसी डॉस के लिए रीब्रांड किया। अगस्त 1981 में IBM PC की रिलीज़ के बाद, Microsoft ने MS-DOS के स्वामित्व को बनाए रखा। चूंकि आईबीएम ने आईबीएम पीसी BIOS को कॉपीराइट किया था, इसलिए आईबीएम पीसी कॉम्पिटिबल्स के रूप में चलाने के लिए गैर-आईबीएम हार्डवेयर के लिए अन्य कंपनियों को इसे रिवर्स करना पड़ता था, लेकिन ऑपरेटिंग सिस्टम पर ऐसा कोई प्रतिबंध लागू नहीं था। विभिन्न कारकों के कारण, जैसे कि MS-DOS के लिए उपलब्ध सॉफ़्टवेयर चयन, Microsoft अंततः अग्रणी पीसी ऑपरेटिंग सिस्टम विक्रेता बन गया। [२६] [२ such]: २१० कंपनी १ ९ such३ में Microsoft माउस की रिलीज़ के साथ नए बाजारों में विस्तारित हुई। साथ ही साथ माइक्रोसॉफ्ट प्रेस नामक एक प्रकाशन प्रभाग के साथ। [१६]: २३२ पॉल एलन ने 1983 में हॉजकिन की बीमारी के विकास के बाद माइक्रोसॉफ्ट से इस्तीफा दे दिया। [२ publishing] एलन ने दावा किया, उनकी पुस्तक आइडिया मैन: ए मेमॉयर इन द को-फाउंडर ऑफ माइक्रोसॉफ्ट, कि गेट्स कंपनी में अपने हिस्से को पतला करना चाहते थे, जब उन्हें हॉजकिन की बीमारी का पता चला क्योंकि उन्हें नहीं लगता था कि वह काफी मेहनत कर रहे थे। [29] ] एलन ने बाद में कम-तकनीकी क्षेत्रों, खेल टीमों, वाणिज्यिक अचल संपत्ति, तंत्रिका विज्ञान, निजी अंतरिक्ष यान और बहुत कुछ में निवेश किया।

विंडोज 1.0 को 20 नवंबर 1985 को माइक्रोसॉफ्ट विंडोज लाइन के पहले संस्करण के रूप में जारी किया गया था
अगस्त 1985 में आईबीएम के साथ संयुक्त रूप से एक नया ऑपरेटिंग सिस्टम, OS / 2 विकसित करने के बावजूद, [31] Microsoft ने Microsoft Windows, MS-DOS के लिए 20 नवंबर को एक चित्रमय एक्सटेंशन जारी किया। [16]: 242–243, 246 Microsoft 26 फरवरी, 1986 को बेलेव्यू से रेडमंड, वाशिंगटन में अपना मुख्यालय स्थानांतरित कर दिया, और 13 मार्च को सार्वजनिक हो गया, [32] जिसके परिणामस्वरूप स्टॉक में वृद्धि हुई और अनुमानित रूप से चार अरबपति और 12,000 करोड़पति Microsoft कर्मचारियों से बन गए। [33] Microsoft ने 2 अप्रैल, 1987 को मूल उपकरण निर्माताओं (ओईएम) के लिए OS / 2 का अपना संस्करण जारी किया। [16] 1990 में, आईबीएम के साथ साझेदारी के कारण, संघीय व्यापार आयोग ने संभव मिलीभगत के लिए Microsoft पर अपनी नज़र रखी, और अमेरिकी सरकार के साथ एक दशक से अधिक कानूनी संघर्ष की शुरुआत को चिह्नित किया। [34] : २४३-२४४ इस बीच, कंपनी ३२-बिट ओएस, माइक्रोसॉफ्ट विंडोज एनटी पर काम कर रही थी, जो उनके ओएस / २ कोड की कॉपी पर आधारित था। यह 21 जुलाई, 1993 को एक नए मॉड्यूलर कर्नेल और Win32 एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफ़ेस (एपीआई) के साथ, 16-बिट (MS-DOS- आधारित) विंडोज से पोर्टिंग को आसान बनाता है। एक बार जब Microsoft ने IBM के NT को सूचित कर दिया, तो OS / 2 की साझेदारी बिगड़ गई। [३५]

कंप्यूटर नेटवर्किंग और वर्ल्ड वाइड वेब में अपनी उत्पाद लाइन का विस्तार और विस्तार करना। [४०] नेटस्केप जैसी नई कंपनियों के कुछ अपवादों के साथ, माइक्रोसॉफ्ट एकमात्र प्रमुख और स्थापित कंपनी थी जिसने शुरुआत से ही व्यावहारिक रूप से वर्ल्ड वाइड वेब का एक हिस्सा बनने के लिए पर्याप्त तेजी से काम किया। अन्य कंपनियों जैसे बोरलैंड, वर्डप्रफेक्ट, नोवेल, आईबीएम और लोटस, नई स्थिति के अनुकूल होने के लिए बहुत धीमी हैं, माइक्रोसॉफ्ट को एक बाजार का प्रभुत्व देगी। [४१] कंपनी ने 24 अगस्त, 1995 को विंडोज 95 जारी किया, जिसमें प्री-इप्टिव मल्टीटास्किंग, एक नई शुरुआत बटन के साथ पूरी तरह से नया यूजर इंटरफेस और 32-बिट संगतता थी; NT के समान, इसने Win32 API प्रदान किया। [४२] [४३]: २० विंडोज ९ ० ऑनलाइन सेवा एमएसएन के साथ बंडल आया, जो पहले इंटरनेट पर एक प्रतियोगी होने का इरादा था, [संदिग्ध - चर्चा] और (ओईएम के लिए) ) इंटरनेट एक्सप्लोरर, एक वेब ब्राउज़र। इंटरनेट एक्सप्लोरर को खुदरा विंडोज 95 बक्से के साथ बंडल नहीं किया गया था, क्योंकि टीम वेब ब्राउज़र को समाप्त करने से पहले बक्से मुद्रित किए गए थे, और इसके बजाय विंडोज 95 प्लस में शामिल किया गया था! पैक। [44] 1996 में नए बाजारों में पहुंची, माइक्रोसॉफ्ट और जनरल इलेक्ट्रिक की एनबीसी यूनिट ने एक नया 24/7 केबल न्यूज चैनल, एमएसएनबीसी बनाया। [45] Microsoft ने विंडोज़ CE 1.0 बनाया, एक नया ओएस जिसे कम मेमोरी और अन्य बाधाओं वाले उपकरणों के लिए डिज़ाइन किया गया था, जैसे व्यक्तिगत डिजिटल सहायक। [४६] अक्टूबर 1997 में, न्याय विभाग ने संघीय जिला न्यायालय में एक प्रस्ताव दायर किया, जिसमें कहा गया कि Microsoft ने 1994 में हस्ताक्षरित एक समझौते का उल्लंघन किया और अदालत से विंडोज़ के साथ इंटरनेट एक्सप्लोरर के बंडल को रोकने के लिए कहा। [16]: 323–324

Microsoft ने 2001 में कंसोल की Xbox श्रृंखला में पहली किस्त जारी की। Xbox, अपने प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में ग्राफिक रूप से शक्तिशाली है, जिसमें एक मानक पीसी का 733 मेगाहर्ट्ज इंटेल पेंटियम III प्रोसेसर है।

जनवरी 2007 में जारी, विंडोज, विस्टा के अगले संस्करण में, सुविधाओं, सुरक्षा और एक पुन: डिज़ाइन किए गए उपयोगकर्ता इंटरफ़ेस पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो एयरो को डूबा हुआ था। [५ero] [५ माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस 2007, एक ही समय में जारी किया गया, जिसमें एक रिबन यूजर इंटरफेस था, जो अपने पूर्ववर्तियों से एक महत्वपूर्ण प्रस्थान था। 2007 में दोनों उत्पादों की अपेक्षाकृत मजबूत बिक्री ने रिकॉर्ड लाभ कमाने में मदद की। [59] यूरोपीय संघ ने माइक्रोसॉफ्ट के 27 फरवरी, 2008 के फैसले के अनुपालन की कमी के लिए € 899 मिलियन ($ 1.4 बिलियन) का एक और जुर्माना लगाया, यह कहते हुए कि कंपनी ने अपने कार्यसमूह और बैकग्राउंड सर्वर के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी के लिए प्रतिद्वंद्वियों से अनुचित मूल्य वसूला। Microsoft ने कहा कि यह अनुपालन में था और ये जुर्माना पिछले मुद्दों के बारे में है जिन्हें हल किया गया है। [60] सन और आईबीएम जैसी सर्वर कंपनियों के कदमों का अनुसरण करते हुए 2007 ने Microsoft में एक मल्टी-कोर यूनिट का निर्माण भी देखा। [61]

गेट्स 27 जून, 2008 को मुख्य सॉफ्टवेयर वास्तुकार के रूप में अपनी भूमिका से सेवानिवृत्त हुए, एक निर्णय जून 2006 में घोषित किया गया, जबकि अन्य पॉज़िटियो को बरकरार रखा गया।
धित ns। [62] [63] विंडोज के लिए क्लाउड कंप्यूटिंग बाजार में कंपनी की एज़्योर सर्विसेज प्लेटफ़ॉर्म, 27 अक्टूबर 2008 को लॉन्च हुई। [64] 12 फरवरी, 2009 को, Microsoft ने Microsoft-ब्रांडेड खुदरा स्टोरों की एक श्रृंखला खोलने के अपने इरादे की घोषणा की, और 22 अक्टूबर, 2009 को स्कॉटलैंड, एरिज़ोना में पहला खुदरा Microsoft स्टोर खोला; उसी दिन विंडोज 7 आधिकारिक तौर पर जनता के लिए जारी किया गया था। विंडोज 7 का ध्यान विस्टा को आसानी से उपयोग करने की विशेषताओं और प्रदर्शन में वृद्धि के साथ परिष्कृत करने पर था, बजाय विंडोज के एक व्यापक कार्यकारी के। [६५] [६६] [६।

जैसा कि 2007 में स्मार्टफोन उद्योग में उछाल आया था, Microsoft ने आधुनिक स्मार्टफोन ऑपरेटिंग सिस्टम प्रदान करने में अपने प्रतिद्वंद्वियों Apple और Google के साथ बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था। परिणामस्वरूप, 2010 में माइक्रोसॉफ्ट ने अपने पुराने फ्लैगशिप मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम विंडोज मोबाइल को नया विंडोज फोन ओएस के साथ बदल दिया। Microsoft ने सॉफ़्टवेयर उद्योग के लिए एक नई रणनीति लागू की जिसमें उन्हें स्मार्टफोन निर्माताओं, जैसे कि नोकिया के साथ और अधिक निकटता से काम करना था, और विंडोज फोन ओएस का उपयोग करके सभी स्मार्टफोन में एक सुसंगत उपयोगकर्ता अनुभव प्रदान करना था। इसने एक नई उपयोगकर्ता इंटरफ़ेस डिज़ाइन भाषा का उपयोग किया, जिसका नाम मेट्रो था, जिसमें न्यूनतम आकार की अवधारणा का उपयोग करते हुए सरल आकृतियों, टाइपोग्राफी और आइकनोग्राफी को प्रमुखता से इस्तेमाल किया गया था। Microsoft 23 मार्च 2011 को शुरू हुई ओपन नेटवर्किंग फाउंडेशन का एक संस्थापक सदस्य है। फेलो संस्थापक गूगल, एचपी, याहू, !, वेरिजॉन कम्युनिकेशंस, ड्यूश टेलीकॉम और 17 अन्य कंपनियां थीं। यह गैर-लाभकारी संगठन सॉफ्टवेयर-परिभाषित नेटवर्किंग नामक एक नई क्लाउड कंप्यूटिंग पहल के लिए सहायता प्रदान करने पर केंद्रित है। [68] यह पहल दूरसंचार नेटवर्क, वायरलेस नेटवर्क, डेटा केंद्र और अन्य नेटवर्किंग क्षेत्रों में सरल सॉफ्टवेयर परिवर्तनों के माध्यम से नवाचार को गति देने के लिए है। [६ ९]

भूतल प्रो 3, माइक्रोसॉफ्ट द्वारा लैपलेट्स की सरफेस श्रृंखला का हिस्सा
विंडोज फोन के विमोचन के बाद, माइक्रोसॉफ्ट ने निगम के लोगो, उत्पादों, सेवाओं और वेबसाइटों के साथ-साथ मेट्रो डिजाइन भाषा के सिद्धांतों और अवधारणाओं को अपनाने के साथ 2011 और 2012 के दौरान अपने उत्पाद रेंज का क्रमिक पुन: संचालन किया। [70] जून 2011 में ताइपे में माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज 8, एक ऑपरेटिंग सिस्टम का अनावरण किया, जो पर्सनल कंप्यूटर और टैबलेट कंप्यूटर दोनों को बिजली देने के लिए बनाया गया था। [71] एक डेवलपर पूर्वावलोकन 13 सितंबर को जारी किया गया था, जिसे बाद में 29 फरवरी, 2012 को उपभोक्ता पूर्वावलोकन द्वारा बदल दिया गया और मई में जनता के लिए जारी किया गया। [72] 18 जून को द सरफेस का अनावरण किया गया, जो कंपनी के इतिहास का पहला ऐसा कंप्यूटर बन गया, जिसमें उसका हार्डवेयर Microsoft द्वारा बनाया गया था। [73] 74] 25 जून को, Microsoft ने सोशल नेटवर्क यमर को खरीदने के लिए US $ 1.2 बिलियन का भुगतान किया। [75] 31 जुलाई को, उन्होंने Gmail से प्रतिस्पर्धा करने के लिए Outlook.com वेबमेल सेवा शुरू की। [76] 4 सितंबर 2012 को, माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज सर्वर 2012 जारी किया। [77]

जुलाई 2012 में, Microsoft ने एमएसएनबीसी में अपनी 50% हिस्सेदारी बेच दी, जिसे उसने 1996 से एनबीसी के साथ एक संयुक्त उद्यम के रूप में चलाया था। [78] 1 अक्टूबर को, माइक्रोसॉफ्ट ने न्यूज ऑपरेशन, एक नए रूप वाले एमएसएन का हिस्सा लॉन्च करने की घोषणा की, जिसमें बाद में महीने में विंडोज 8 था। 26 अक्टूबर 2012 को, माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज 8 और माइक्रोसॉफ्ट सरफेस लॉन्च किया। [74] [80] तीन दिन बाद, विंडोज फोन 8 लॉन्च किया गया। [81] उत्पादों और सेवाओं की मांग में वृद्धि की संभावना का सामना करने के लिए, Microsoft ने 2012 में खुलने वाले ईंटों-और-मोर्टार Microsoft स्टोरों की बढ़ती संख्या के पूरक के लिए अमेरिका भर में कई हॉलिडे स्टोर खोले। [82] 29 मार्च 2013 को, Microsoft ने एक पेटेंट ट्रैकर लॉन्च किया। [83]

अगस्त 2012 में, न्यूयॉर्क सिटी पुलिस विभाग ने डोमेन अवेयरनेस सिस्टम के विकास के लिए Microsoft के साथ एक साझेदारी की घोषणा की, जिसका उपयोग न्यूयॉर्क शहर में पुलिस निगरानी के लिए किया जाता है। [84]

Xbox One कंसोल, 2013 में रिलीज़ किया गया
Kinect, Microsoft द्वारा बनाया गया एक मोशन-सेंसिंग इनपुट डिवाइस है और वीडियो गेम कंट्रोलर के रूप में डिज़ाइन किया गया है, जिसे पहली बार नवंबर 2010 में पेश किया गया था, इसे 2013 में Xbox One वीडियो गेम कंसोल के रिलीज़ के लिए अपग्रेड किया गया था। मई 2013 में किनेक्ट की क्षमताओं का पता चला: एक अल्ट्रा-वाइड 1080p कैमरा, अंधेरे में एक इन्फ्रारेड सेंसर, हाई-एंड प्रोसेसिंग पावर और नए सॉफ्टवेयर के कारण काम करना, बारीक मूवमेंट्स के बीच अंतर करने की क्षमता (जैसे अंगूठा मूवमेंट), और उनके चेहरे को देखकर उपयोगकर्ता की हृदय गति निर्धारित करना। [rate५] Microsoft ने 2011 में एक पेटेंट आवेदन दायर किया था जो बताता है कि निगम काइनेट कैमरा सिस्टम का उपयोग कर सकता है ताकि देखने के अनुभव को और अधिक इंटरैक्टिव बनाने के लिए एक योजना के हिस्से के रूप में टेलीविजन दर्शकों के व्यवहार की निगरानी कर सके। 19 जुलाई 2013 को, चौथी तिमाही के बाद रिपोर्ट में निवेशकों के बीच विंडोज 8 और सर्फेस टैबलेट दोनों के खराब प्रदर्शन पर चिंता व्यक्त की गई थी, Microsoft स्टॉक ने वर्ष 2000 के बाद से अपनी सबसे बड़ी एक दिवसीय प्रतिशत बिक्री को बंद कर दिया। Microsoft को 32 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ। [86]

जुलाई 2013 में परिपक्व पीसी व्यवसाय के अनुरूप, माइक्रोसॉफ्ट ने घोषणा की
 करेगा, अर्थात् ऑपरेटिंग सिस्टम, ऐप्स, क्लाउड और डिवाइसेस। पिछले सभी विभाजनों को बिना किसी कार्यबल में कटौती के नए प्रभागों में भंग कर दिया जाएगा। [be be] 3 सितंबर, 2013 को, माइक्रोसॉफ्ट ने एमी हुड को सीएफओ की भूमिका निभाने के बाद नोकिया की मोबाइल इकाई को $ 7 बिलियन [88] में खरीदने पर सहमति व्यक्त की। [89]

सत्य नडेला ने फरवरी 2014 में स्टीव बाल्मर को माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ के रूप में कामयाबी दिलाई

नोकिया लूमिया 1320, माइक्रोसॉफ्ट लूमिया 535 और नोकिया लूमिया 530, जो सभी अब बंद किए गए विंडोज फोन ऑपरेटिंग सिस्टम में से एक पर चलते हैं।
जनवरी 2018 में, माइक्रोसॉफ्ट ने इंटेल के मेल्टडाउन सुरक्षा उल्लंघन से संबंधित सीपीयू समस्याओं के लिए विंडोज 10 को पैच किया। पैच इंटेल के CPU आर्किटेक्चर पर निर्भर Microsoft Azure वर्चुअल मशीनों के साथ समस्याओं का कारण बना। 12 जनवरी को, Microsoft ने MacOS और लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए PowerShell Core 6.0 जारी किया। [111] फरवरी 2018 में, Microsoft ने अपने विंडोज फोन उपकरणों के लिए अधिसूचना समर्थन को मार दिया, जिसने बंद किए गए उपकरणों के लिए फर्मवेयर अपडेट को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया। [111] मार्च 2018 में, माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज 10 एस को एक अलग और अद्वितीय ऑपरेटिंग सिस्टम के बजाय विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए एक मोड में बदलने के लिए याद किया। मार्च में कंपनी ने दिशानिर्देश भी स्थापित किए जो Office 365 के उपयोगकर्ताओं को निजी दस्तावेजों में अपवित्रता का उपयोग करने से रोकते हैं। [१११] अप्रैल 2018 में, Microsoft ने कार्यक्रम की 20 वीं वर्षगांठ मनाने के लिए MIT लाइसेंस के तहत विंडोज फ़ाइल प्रबंधक के लिए स्रोत कोड जारी किया। अप्रैल में कंपनी ने आगे चलकर लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के अपने व्युत्पन्न के रूप में Azure क्षेत्र की घोषणा करके खुले स्रोत की पहल को अपनाने की इच्छा व्यक्त की। [१११] मई 2018 में, Microsoft ने अमेरिकी नागरिकों को ट्रैक करने वाले उत्पादों को विकसित करने के लिए 17 अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के साथ भागीदारी की। परियोजना को एज़ुर सरकार करार दिया गया है और इसमें संयुक्त उद्यम रक्षा अवसंरचना (जेईडीआई) निगरानी कार्यक्रम है। [१११] 4 जून, 2018 को, Microsoft ने आधिकारिक तौर पर $ 7.5 बिलियन के लिए GitHub के अधिग्रहण की घोषणा की, जो कि क्लो
icrosoft ने जनता के लिए सरफेस गो प्लेटफॉर्म का खुलासा किया। बाद में महीने में इसने माइक्रोसॉफ्ट टीम्स को ग्रिटिस में बदल दिया। [111] अगस्त 2018 में, Microsoft ने Microsoft AccountGuard और Defending Democracy नामक दो प्रोजेक्ट जारी किए। इसने एआरएम वास्तुकला पर विंडोज 10 के लिए स्नैपड्रैगन 850 संगतता का भी अनावरण किया। [114] [115] [111]

सितंबर 2016 में Microsoft HoloLens मिश्रित वास्तविकता हेडसेट का उपयोग कर अपोलो 11 अंतरिक्ष यात्री बज़ एल्ड्रिन
अगस्त 2018 में, टोयोटा त्सुशो ने जल प्रबंधन से संबंधित इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) प्रौद्योगिकियों के लिए Microsoft Azure एप्लिकेशन सूट का उपयोग करके मछली पालन उपकरण बनाने के लिए Microsoft के साथ साझेदारी शुरू की। किंडई विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा भाग में विकसित, पानी पंप तंत्र कृत्रिम बुद्धि का उपयोग करके एक कन्वेयर बेल्ट पर मछलियों की संख्या की गणना करते हैं, मछली की संख्या का विश्लेषण करते हैं, और मछली द्वारा प्रदान किए गए डेटा से पानी के प्रवाह की प्रभावशीलता को कम करते हैं। प्रक्रिया में उपयोग किए जाने वाले विशिष्ट कंप्यूटर प्रोग्राम Azure Machine Learning और Azure IoT Hub प्लेटफार्मों के अंतर्गत आते हैं। [११६] सितंबर 2018 में, माइक्रोसॉफ्ट ने स्काइप क्लासिक को बंद कर दिया। [111] 10 अक्टूबर, 2018 को, Microsoft 60,000 से अधिक पेटेंट रखने के बावजूद ओपन इन्वेंशन नेटवर्क समुदाय में शामिल हो गया। [117] नवंबर 2018 में, Microsoft ने संयुक्त राज्य अमेरिका के सैन्य को 100,000 शत्रु से पहले पता लगाने, निर्णय लेने और संलग्न करने की क्षमता को बढ़ाकर घातकता को बढ़ाने के लिए Microsoft HoloLens हेडसेट की आपूर्ति करने पर सहमति व्यक्त की। Microsoft Azure के लिए कारक प्रमाणीकरण [119] दिसंबर 2018 में, Microsoft ने Microsoft सरफेस और हाइपर- V उत्पादों में उपयोग किए गए यूनिफाइड एक्स्टेंसिबल फ़र्मवेयर इंटरफ़ेस (UEFI) कोर के एक ओपन सोर्स रिलीज़ प्रोजेक्ट म्यू की घोषणा की। परियोजना एक सेवा के रूप में फर्मवेयर के विचार को बढ़ावा देती है। [१२०] उसी महीने, माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज फॉर्म और विंडोज प्रेजेंटेशन फाउंडेशन (डब्ल्यूपीएफ) के ओपन सोर्स कार्यान्वयन की घोषणा की, जो कंपनी के आगे के आंदोलन के लिए विंडोज डेस्कटॉप एप्लिकेशन और सॉफ्टवेयर विकसित करने में उपयोग किए जाने वाले महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क की पारदर्शी रिलीज की अनुमति देगा। दिसंबर में कंपनी ने अपने ब्राउज़र के लिए क्रोमियम बैकएंड के पक्ष में Microsoft एज प्रोजेक्ट को बंद कर दिया। [११ ९]

निगमित मामलों
इसे भी देखें: Microsoft की आलोचना; चीन में इंटरनेट सेंसरशिप; और गले लगाओ, विस्तार करो, और बुझाओ
निदेशक मंडल
कंपनी का संचालन निदेशक मंडल द्वारा किया जाता है, जो ज्यादातर कंपनी बाहरी लोगों से बना होता है, जैसा कि सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए प्रथागत है। जनवरी 2018 तक निदेशक मंडल के सदस्य बिल गेट्स, सत्या नडेला, रीड हॉफमैन, ह्यूग जॉनसन, टेरी लिस्ट-स्टोल, चार्ल्स नोस्की, हेल्मुट पैंके, सैंडी पीटरसन, पेनी प्रिट्जकर, चार्ल्स श्राफ, अर्ने सोरेनसन, जॉन डब्ल्यू स्टैंटनन हैं। , जॉन डब्ल्यू। थॉम्पसन और पद्मश्री योद्धा। [123] बोर्ड के सदस्य हर साल बहुमत के वोट सिस्टम का उपयोग करते हुए वार्षिक शेयरधारकों की बैठक में चुने जाते हैं। बोर्ड के भीतर पाँच समितियाँ हैं जो अधिक विशिष्ट मामलों की देखरेख करती हैं। इन समितियों में लेखा परीक्षा समिति शामिल है, जो लेखा परीक्षा और रिपोर्टिंग सहित कंपनी के साथ लेखांकन मुद्दों को संभालती है; मुआवजा समिति, जो कंपनी के सीईओ और अन्य कर्मचारियों के मुआवजे को मंजूरी देती है; वित्त समिति, जो विलय और अधिग्रहण के प्रस्ताव जैसे वित्तीय मामलों को संभालती है; शासन और नामांकन समिति, जो बोर्ड के नामांकन सहित विभिन्न कॉर्पोरेट मामलों को संभालती है; और एंटीट्रस्ट कम्प्लायंस कमेटी, जो कंपनी प्रथाओं को विरोधाभासी कानूनों का उल्लंघन करने से रोकने का प्रयास करती है। [१२४]

वित्तीय

NASDAQ का पांच साल का इतिहास ग्राफ: 17 जुलाई 2013 को MSFT स्टॉक [125]
जब Microsoft ने सार्वजनिक किया और 1986 में अपनी आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (IPO) लॉन्च की, तो स्टॉक की शुरुआती कीमत $ 21 थी; कारोबारी दिन के बाद, मूल्य $ 27.75 पर बंद हुआ। जुलाई 2010 तक, कंपनी के नौ स्टॉक विभाजन के साथ, किसी भी आईपीओ शेयरों को 288 से गुणा किया जाएगा; अगर कोई आज आईपीओ खरीदता है, तो स्प्लिट्स और अन्य कारकों को देखते हुए, इसकी कीमत लगभग 9 सेंट होगी। [१६]: २३५-२३६ [१२६] [१२ १ ९९९ में स्टॉक की कीमत लगभग $ ११ ९ ($ ६०.९ २,) पर पहुंच गई, जिसके लिए समायोजन किया गया। विभाजन)। [128] कंपनी ने 16 जनवरी, 2003 को लाभांश की पेशकश शुरू की, जिसके बाद वित्त वर्ष के लिए प्रति शेयर आठ सेंट शुरू हुआ और उसके बाद आने वाले वर्ष में प्रति शेयर सोलह सेंट का लाभांश था, जो 2005 में वार्षिक तिमाही से बढ़कर आठ सेंट प्रति शेयर था। तिमाही और वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही के लिए प्रति शेयर तीन डॉलर का एक विशेष भुगतान। [१२ [१२ ९] हालांकि कंपनी ने बाद में लाभांश भुगतान में वृद्धि की थी, माइक्रोसॉफ्ट के स्टोक की कीमत

स्टैंडर्ड एंड पूअर्स एंड मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस, दोनों ने माइक्रोसॉफ्ट को एएए रेटिंग दी है, जिसकी संपत्ति असुरक्षित ऋण में केवल 8.5 बिलियन डॉलर की तुलना में 41 बिलियन डॉलर थी। नतीजतन, फरवरी 2011 में Microsoft ने सरकारी बॉन्ड की तुलना में अपेक्षाकृत कम उधार दरों के साथ 2.25 बिलियन डॉलर की राशि का कॉर्पोरेट बॉन्ड जारी किया। [११ February] 20 साल में पहली बार Apple इंक ने Q1 2011 में Microsoft को पीछे छोड़ दिया और पीसी की बिक्री में मंदी और Microsoft के ऑनलाइन सर्विसेज डिवीजन (जिसमें इसका सर्च इंजन बिंग शामिल है) में भारी नुकसान जारी है। Microsoft का मुनाफा 5.2 बिलियन डॉलर था, जबकि Apple Inc. का मुनाफा क्रमशः $ 14.5 बिलियन और $ 24.7 बिलियन के राजस्व पर $ 6 बिलियन था। [82] Microsoft का ऑनलाइन सेवा प्रभाग 2006 से लगातार घाटे में चल रहा है और Q1 2011 में इसने 726 मिलियन डॉलर का नुकसान किया। यह वर्ष 2010 के लिए $ 2.5 बिलियन का नुकसान है। [133]

वर्ष राजस्व
सैन्य में। यूएस $ [१३ ९] शुद्ध आय
सैन्य में। यूएस $ [१३ ९] कुल संपत्ति
सैन्य में। यूएस $ [139] कर्मचारियों [139]

नवंबर 2018 में, कंपनी ने अमेरिकी सैनिकों के साथ अमेरिकी सैनिकों के हथियार प्रदर्शनों की सूची में संवर्धित वास्तविकता (एआर) हेडसेट प्रौद्योगिकी लाने के लिए $ 480 मिलियन का सैन्य अनुबंध जीता। बोली प्रक्रिया का वर्णन करने वाले दस्तावेज के अनुसार, दो साल के अनुबंध के परिणामस्वरूप 100,000 से अधिक हेडसेट्स के फॉलो-ऑन ऑर्डर हो सकते हैं। संवर्धित वास्तविकता प्रौद्योगिकी के लिए अनुबंध की टैग लाइनों में से एक पहली लड़ाई से पहले 25 रक्तहीन लड़ाई को सक्षम करने की अपनी क्षमता प्रतीत होती है, यह सुझाव देते हुए कि वास्तविक मुकाबला प्रशिक्षण संवर्धित वास्तविकता हेडसेट क्षमताओं का एक अनिवार्य पहलू होने जा रहा है। [140]

विपणन

le, Google के सशुल्क विज्ञापनदाताओं के पक्ष में धांधली करने वाले खोज परिणामों के साथ पेंच कर रहा है, जो Gmail अपने उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता का उल्लंघन करता है, ताकि उनके ईमेल और खरीदारी के परिणामों से संबंधित विज्ञापन परिणाम प्राप्त हो सकें Google उत्पाद। TechCrunch जैसे तकनीकी प्रकाशन विज्ञापन अभियान के अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, [149] जबकि Google कर्मचारियों ने इसे अपनाया है। [150]

छंटनी
मुख्य लेख: Microsoft की आलोचना
जुलाई 2014 में, Microsoft ने 18,000 कर्मचारियों को बंद करने की योजना की घोषणा की। Microsoft ने 5 जून 2014 तक 127,104 लोगों को रोजगार दिया, जिससे इसके कार्यबल में लगभग 14 प्रतिशत की कमी आई, क्योंकि यह अब तक का सबसे बड़ा Microsoft था। इसमें 12,500 पेशेवर और कारखाने के कर्मचारी शामिल थे। इससे पहले, Microsoft ने 2008–2017 के महान मंदी के अनुरूप 2009 में 5,800 नौकरियों को समाप्त कर दिया था। [151] [152] सितंबर 2014 में, माइक्रोसॉफ्ट ने सिएटल-रेडमंड क्षेत्र में 747 लोगों सहित 2,100 लोगों को रखा, जहां कंपनी का मुख्यालय है। पहले की घोषणा की गई छंटनी की दूसरी लहर के रूप में फायरिंग आई। इसने 18,000 अपेक्षित कटौती में से 15,000 को कुल संख्या में लाया। [153] अक्टूबर 2014 में, Microsoft ने बताया कि यह लगभग 18,000 कर्मचारियों को खत्म करने के साथ किया गया था, जो इसकी सबसे बड़ी छंटनी थी। [154] जुलाई 2015 में, Microsoft ने अगले कई महीनों में 7,800 नौकरियों में कटौती की घोषणा की। [155] मई 2016 में, Microsoft ने (Nokia) मोबाइल फोन डिवीजन में 1,850 नौकरियों में कटौती की घोषणा की। नतीजतन, कंपनी लगभग $ 950 मिलियन के एक हानि और पुनर्गठन शुल्क को रिकॉर्ड करेगी, जिसमें से लगभग $ 200 मिलियन विच्छेद भुगतान से संबंधित होंगे। [156]

संयुक्त राज्य सरकार
मुख्य लेख: Microsoft की आलोचना
Microsoft फिक्स के सार्वजनिक रिलीज़ से पहले संयुक्त राज्य सरकार की खुफिया एजेंसियों को अपने सॉफ़्टवेयर में सूचना दी बग के बारे में जानकारी प्रदान करता है। Microsoft के एक प्रवक्ता ने कहा है कि निगम कई कार्यक्रम चलाता है जो अमेरिकी सरकार के साथ ऐसी जानकारी साझा करने की सुविधा प्रदान करते हैं। [157] मई 2013 में, PRISM, NSA के विशाल इलेक्ट्रॉनिक निगरानी कार्यक्रम के बारे में मीडिया रिपोर्टों के बाद, कई प्रौद्योगिकी कंपनियों को प्रतिभागियों के रूप में पहचाना गया, जिसमें Microsoft भी शामिल था। [158] उक्त कार्यक्रम के लीक के अनुसार, Microsoft 2007 में PRISM कार्यक्रम में शामिल हुआ। [159] हालाँकि, जून 2013 में, Microsoft के एक आधिकारिक बयान ने कार्यक्रम में उनकी भागीदारी से इनकार कर दिया:

अप्रैल 2016 में, कंपनी ने अमेरिकी सरकार पर मुकदमा दायर किया, यह तर्क देते हुए कि गोपनीयता आदेश कंपनी को ग्राहकों और कंपनी के अधिकारों के उल्लंघन में वारंट का खुलासा करने से रोक रहे थे। Microsoft ने तर्क दिया कि Microsoft द्वारा उपयोगकर्ताओं को यह सूचित करने से रोकना कि सरकार उनके ईमेल और अन्य दस्तावेजों का अनुरोध करने के लिए अनिश्चित काल के लिए असंवैधानिक थी, और चौथा संशोधन ने इसे बना दिया ताकि लोगों को या व्यवसायों को यह जानने का अधिकार था कि क्या सरकार खोजती है या जब्त करती है उनकी संपत्ति। 23 अक्टूबर, 2017 को, Microsoft ने कहा कि यह यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस (DoJ) द्वारा एक नीति परिवर्तन के परिणामस्वरूप मुकदमा छोड़ देगा। DoJ ने इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को उनकी जानकारी तक पहुंचने वाली एजेंसियों के बारे में सचेत करने के लिए डेटा अनुरोध नियमों को बदल दिया था।

कॉर्पोरेट पहचान
कॉर्पोरेट संस्कृति
डेवलपर्स के लिए तकनीकी संदर्भ और विभिन्न Microsoft पत्रिकाओं जैसे Microsoft सिस्टम्स जर्नल (MSJ) के लिए तकनीकी संदर्भ Microsoft डेवलपर नेटवर्क (MSDN) के माध्यम से उपलब्ध हैं। MSDN भी कंपनियों और व्यक्तियों के लिए सदस्यता प्रदान करता है, और अधिक महंगी सदस्यता आमतौर पर Microsoft सॉफ़्टवेयर के पूर्व-रिलीज़ बीटा संस्करणों तक पहुँच प्रदान करती है। [165] [166] अप्रैल 2004 में माइक्रोसॉफ्ट ने लॉन्च किया
 उपयोगकर्ताओं के लिए एक सामुदायिक साइट, जिसका शीर्षक चैनल 9 है, जो विकि और इंटरनेट मंच प्रदान करता है। [१६ 3 मार्च 2006 को लॉन्च की गई एक और सामुदायिक साइट, जो दैनिक वीडियोज़ और अन्य सेवाएं प्रदान करती है, On10.net। [168] नि: शुल्क तकनीकी सहायता पारंपरिक रूप से ऑनलाइन यूज़नेट न्यूज़ग्रुप्स के माध्यम से प्रदान की जाती है, और अतीत में कंपूवेर, Microsoft कर्मचारियों द्वारा निगरानी की जाती है; किसी एकल उत्पाद के लिए कई समाचार समूह हो सकते हैं। Microsoft सर्वाधिक मूल्यवान व्यावसायिक (MVP) स्थिति के लिए सहकर्मी या Microsoft कर्मचारियों द्वारा मददगार लोगों का चुनाव किया जा सकता है, जो उन्हें पुरस्कार और अन्य लाभों के लिए विशेष सामाजिक स्थिति और संभावनाओं के एक प्रकार की ओर आकर्षित करता है। [१६ ९]

इसकी आंतरिक व्याख्या के लिए, अभिव्यक्ति अपने कुत्ते के भोजन को खाने का उपयोग Microsoft के अंदर उत्पादों के पूर्व-रिलीज़ और बीटा संस्करणों का उपयोग करने की नीति का वर्णन करने के लिए किया जाता है, ताकि वे वास्तविक दुनिया स्थितियों में परीक्षण कर सकें। [170] यह आमतौर पर सिर्फ कुत्ते के भोजन के लिए छोटा किया जाता है और इसे संज्ञा, क्रिया और विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता है। शब्दजाल, FYIFV या FYIV (भाड़ में जाओ तुम, मैं [पूरी तरह से] निहित हूं) का एक और प्रयोग, एक कर्मचारी द्वारा यह इंगित करने के लिए किया जाता है कि वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं और वे जब चाहें काम से बच सकते हैं। [171] कंपनी को अपनी भर्ती प्रक्रिया के लिए भी जाना जाता है, अन्य संगठनों में नकल की और माइक्रोसॉफ्ट साक्षात्कार को डब किया, जो ऑफ-द-वॉल सवालों के लिए कुख्यात है जैसे मैनहोल कवर राउंड क्यों? [172]

Microsoft H-1B वीजा पर टोपी का एक मुखर प्रतिद्वंद्वी है, जो अमेरिकी कंपनियों को कुछ विदेशी श्रमिकों को रोजगार देने की अनुमति देता है। बिल गेट्स का दावा है कि H1B वीज़ा पर कैप को कंपनी के लिए कर्मचारियों को नियुक्त करना मुश्किल हो जाता है, 2005 में मुझे निश्चित रूप से H1B कैप से छुटकारा मिलेगा। [173] एच 1 बी वीजा के आलोचकों का तर्क है कि सीमा को कम करने से एच 1 बी श्रमिकों के कम वेतन पर काम करने के कारण अमेरिकी नागरिकों के लिए बेरोजगारी बढ़ जाएगी। [174] ह्यूमन राइट्स कैम्पेन कॉर्पोरेट इक्वैलिटी इंडेक्स, एलजीबीटी कर्मचारियों के प्रति कंपनी की नीतियों को कितना प्रगतिशील बताता है, की एक रिपोर्ट ने 2002 से 2004 तक माइक्रोसॉफ्ट को 87% और 2005 से 2010 तक 100% रेटिंग दी, जब उन्होंने लिंग अभिव्यक्ति की अनुमति दी। [175]

अगस्त 2018 में, Microsoft ने सभी कंपनियों के लिए एक नीति लागू की, जो प्रत्येक कर्मचारी को 12 सप्ताह का भुगतान माता-पिता की छुट्टी के लिए आवश्यक थी। यह 2015 से पूर्व आवश्यकता पर विस्तार करता है और प्रत्येक वर्ष 15 दिनों के भुगतान की छुट्टी और बीमार अवकाश की आवश्यकता होती है। [176] 2015 में, Microsoft ने जन्म देने वाले माता-पिता के लिए अतिरिक्त 8 सप्ताह के साथ माता-पिता की छुट्टी के लिए 12 सप्ताह की छूट देने के लिए अपनी स्वयं की अभिभावकीय अवकाश नीति की स्थापना की। [177]

वातावरण

मुख्यालय

Microsoft रेडमंड परिसर का पश्चिम परिसर
कॉर्पोरेट मुख्यालय, जिसे अनौपचारिक रूप से Microsoft Redmo के रूप में जाना जाता है
टन में वन माइक्रोसॉफ्ट वे पर स्थित है। Microsoft शुरू में 26 फरवरी, 1986 को परिसर के मैदान में चला गया था। कंपनी 13 मार्च को सार्वजनिक हुई थी। मुख्यालय की स्थापना के बाद से कई विस्तार हुए हैं। यह अनुमानित रूप से 8 मिलियन ft2 (750,000 m2) कार्यालय स्थान और 30,000-40,000 कर्मचारियों से अधिक है। [187] अतिरिक्त कार्यालय बेलव्यू और इस्साक्वा, वाशिंगटन (दुनिया भर में 90,000 कर्मचारी) में स्थित हैं। कंपनी अपने माउंटेन व्यू, कैलिफोर्निया, कैंपस को भव्य पैमाने पर अपग्रेड करने की योजना बना रही है। कंपनी ने 1981 से इस परिसर पर कब्जा कर रखा है। 2016 में, कंपनी ने 32-एकड़ परिसर खरीदा, जिसमें 25% की मरम्मत और विस्तार करने की योजना थी। [188] Microsoft शार्लोट, उत्तरी कैरोलिना में एक पूर्वी तट मुख्यालय का संचालन करता है। [१ headquarters ९]

फ्लैगशिप स्टोर

माइक्रोसॉफ्ट के टोरंटो फ्लैगशिप स्टोर

प्रतीक चिन्ह
Microsoft ने 1987 में स्कॉट बेकर द्वारा डिजाइन किए गए तथाकथित पीएसी-मैन लोगो को अपनाया। बेकर ने कहा हेल्वेटिका इटैलिक टाइपफेस में नया लोगो, ओ और एस के बीच एक स्लैश है जो नरम भाग पर जोर देता है। नाम और संदेश गति और गति। [१ ९ ४] डेव नॉरिस ने पुराने लोगो को बचाने के लिए एक आंतरिक मजाक अभियान चलाया, जो हरे रंग में था, सभी अपरकेस में, और एक काल्पनिक पत्र O को चित्रित किया, जिसमें ब्लिबेट का उपनाम दिया गया था, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया था। [१ ९ ५ ९] ] टैगलाइन के साथ Microsoft का लोगो आपकी क्षमता। हमारा जुनून। - मुख्य कॉर्पोरेट नाम के नीचे - 2008 में उपयोग किए गए एक नारा Microsoft पर आधारित है। 2002 में, कंपनी ने संयुक्त राज्य में लोगो का उपयोग करना शुरू कर दिया और आखिरकार नारा के साथ एक टेलीविजन अभियान शुरू किया, जो आप कहाँ हैं की पिछली टैगलाइन से बदल गया है आज जाना चाहते हैं? [१ ९ ६] [१ ९ 19] [१ ९ the] २०१० में निजी एमजीएक्स (माइक्रोसॉफ्ट ग्लोबल एक्सचेंज) सम्मेलन के दौरान, माइक्रोसॉफ्ट ने कंपनी की अगली टैगलाइन बी वॉट्स नेक्स्ट का अनावरण किया। [१ ९९] उन्होंने एक नारा भी दिया था / टैगलाइन यह सब समझ में आता है। [200]

Microsoft लोगो इतिहास

प्रायोजन
कंपनी यूरोस्केट 2015 में फिनलैंड की राष्ट्रीय बास्केटबॉल टीम की आधिकारिक जर्सी प्रायोजक थी। [206

[
Dharme]




#Article 76: कोफ़ी अन्नान (257 words)


कोफ़ी अन्नान(जन्म: 8 अप्रैल 1938 - निधन: 18 अगस्त 2018) एक घानाई कूटनीतिज्ञ हैं। वे 1962 से 1974 तक और 1974 से 2006 तक संयुक्त राष्ट्र में कार्यरत रहे। वे 1 जनवरी 1997 से 31 दिसम्बर 2006 तक दो कार्यकालों के लिये संयुक्त राष्ट्र के महासचिव रहे। उन्हें संयुक्त राष्ट्र के साथ 2001 में नोबेल शांति पुरस्कार से सह-पुरस्कृत किया गया। लंबी बीमारी के चलते अन्नान का 18 अगस्त 2018 को निधन हो गया।

कोफ़ी अन्नान का जन्म 8 अप्रैल 1938 को गोल्ड कोस्ट (वर्तमान देश घाना) के कुमसी नामक शहर में हुआ। 1954 से 1957 तक कोफ़ी अन्नान ने मफिन्तिस्म स्कूल में शिक्षा ली। अन्नान 1957 में फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन की दी छात्रावृत्ति पर अमेरिका गए। वहाँ 1958 से 1961 तक उन्होंने मिनेसोटा राज्य के सन्त पौल शहर में मैकैलेस्टर कॉलेज में अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और 1961 में उन्हें स्नातक की डिग्री मिली। 1961 में अन्नान ने अंतरराष्ट्रीय संबंध में जिनेवा के ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनैशनल स्टडीज़ से डी॰ई॰ए की डिग्री की। उन्होंने 1971 से जून 1972 में ऐल्फ़्रॅड स्लोअन फ़ॅलो के तौर पर एम॰आई॰टी से मैनेजमेंट में एम॰एस की डिग्री प्राप्त की। अन्नान अंग्रेजी, फ्रेंच, क्रू, अकान की अन्य बोलियों और अन्य अफ़्रीकी भाषाओं में धाराप्रवाह है।

अन्नान 1 जनवरी 1997 से 31 दिसम्बर 2006 तक संयुक्त राष्ट्र के महासचिव रहे। 2001 में उन्हें और संयुक्त राष्ट्र को नोबेल शांति पुरस्कार से सह-पुरस्कृत किया गया।

उनका विवाह तिती से हुआ था और उनकी बेटी आमा का जन्म नवंबर 1969 में नाइजीरिया के लागोस शहर में हुआ। जुलाई 1973 में उनके पुत्र कोजो का जन्म हुआ।




#Article 77: संयुक्त राष्ट्र (2014 words)


संयुक्त राष्ट्र () एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसके उद्देश्य में उल्लेख है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून को सुविधाजनक बनाने के सहयोग, अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति, मानव अधिकार और विश्व शांति के लिए कार्यरत है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अधिकारपत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर होने के साथ हुई।

द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र को अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से स्थापित किया था। वे चाहते थे कि भविष्य में फ़िर कभी द्वितीय विश्वयुद्ध की तरह के युद्ध न उभर आए। संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुरक्षा परिषद वाले सबसे शक्तिशाली देश (संयुक्त राज्य अमेरिका, फ़्रांस, रूस और यूनाइटेड किंगडम) द्वितीय विश्वयुद्ध में बहुत अहम देश थे।

वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र में १९३ देश है, विश्व के लगभग सारे अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त देश। इस संस्था की संरचन में आम सभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक व सामाजिक परिषद, सचिवालय और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय सम्मिलित है।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1929 में राष्ट्र संघ का गठन किया गया था। राष्ट्र संघ काफ़ी हद तक प्रभावहीन था और संयुक्त राष्ट्र का उसकी जगह होने का यह बहुत बड़ा फायदा है कि संयुक्त राष्ट्र अपने सदस्य देशों की सेनाओं को शांति संभालने के लिए तैनात कर सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के बारे में विचार पहली बार द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उभरे थे। द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी होने वाले देशों ने मिलकर कोशिश की कि वे इस संस्था की संरचना, सदस्यता आदि के बारे में कुछ निर्णय कर पाए।

संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में पचासी लाख डॉलर के लिए खरीदी भूसंपत्ति पर स्थापित है। इस इमारत की स्थापना का प्रबंध एक अंतर्राष्ट्रीय शिल्पकारों के समूह द्वारा हुआ। इस मुख्यालय के अलावा और अहम संस्थाएं जनीवा, कोपनहेगन आदि में भी है। 
यह संस्थाएं संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अधिकार क्षेत्र तो नहीं हैं, परंतु उनको काफ़ी स्वतंत्रताएं दी जाती है।

संयुक्त राष्ट्र ने 6 भाषाओं को राज भाषा स्वीकृत किया है (अरबी, चीनी, अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, रूसी और स्पेनी), परंतु इन में से केवल दो भाषाओं को संचालन भाषा माना जाता है (अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी)।

स्थापना के समय, केवल चार राजभाषाएं स्वीकृत की गई थी (चीनी, अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, रूसी) और 1973 में अरबी और स्पेनी को भी सम्मिलित किया गया। इन भाषाओं के बारे में विवाद उठता रहता है। कुछ लोगों का मानना है कि राजभाषाओं की संख्या 6 से एक (अंग्रेज़ी) तक घटाना चाहिए, परंतु इनके विरोध है वे जो मानते है कि राजभाषाओं को बढ़ाना चाहिए। इन लोगों में से कई का मानना है कि हिंदी को भी संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाया जाना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र अमेरिकी अंग्रेज़ी की जगह ब्रिटिश अंग्रेज़ी का प्रयोग करता है। 1971 तक चीनी भाषा के परम्परागत अक्षर का प्रयोग चलता था क्योंकि तब तक संयुक्त राष्ट्र तईवान के सरकार को चीन का अधिकारी सरकार माना जाता था। जब तईवान की जगह आज के चीनी सरकार को स्वीकृत किया गया, संयुक्त राष्ट्र ने सरलीकृत अक्षर के प्रयोग का प्रारंभ किया।

संयुक्त राष्ट्र में किसी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिए जाने के लिए कोई विशिष्ट मानदंड नहीं है। किसी भाषा को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किए जाने की प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा में साधारण बहुमत द्वारा एक संकल्प को स्वीकार करना और संयुक्त राष्ट्र की कुल सदस्यता के दो तिहाई बहुमत द्वारा उसे अंतिम रूप से पारित करना होता है। 

भारत काफी लम्बे समय से यह कोशिश कर रहा है कि हिंदी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाओं में शामिल किया जाए। भारत का यह दावा इस आधार पर है कि हिन्दी, विश्व में बोली जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी भाषा है और विश्व भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी है। भारत का यह दावा आज इसलिए और ज्यादा मजबूत हो जाता है क्योंकि आज का भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ चुनिंदा आर्थिक शक्तियों में भी शामिल हो चुका है।

२०१५ में भोपाल में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन के एक सत्र का शीर्षक ‘विदेशी नीतियों में हिंदी’ पर समर्पित था, जिसमें हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा में से एक के तौर पर पहचान दिलाने की सिफारिश की गई थी। हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के तौर पर प्रतिष्ठित करने के लिए फरवरी 2008 में मॉरिसस में भी  विश्व हिंदी सचिवालय खोला गया था।

संयुक्त राष्ट्र अपने कार्यक्रमों का संयुक्त राष्ट्र रेडियो  पर हिंदी भाषा में भी प्रसारण करता है। कई अवसरों पर भारतीय नेताओं ने यू एन में हिंदी में वक्तव्य दिए हैं जिनमें १९७७ में अटल बिहारी वाजपेयी का हिन्दी में भाषण, सितंबर, 2014 में 69वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वक्तव्य, सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास शिखर सम्मेलन में उनका संबोधन, अक्तूबर, 2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा 70वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधन  और सितंबर, 2016 में 71वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा को विदेश मंत्री द्वारा संबोधन शामिल है।

संयुक्त राष्ट्र के  मुख्य उद्देश्य हैं युद्ध रोकना, मानव अधिकारों की रक्षा करना, अंतर्राष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया , सामाजिक और आर्थिक विकास  उभारना, जीवन स्तर सुधारना और बिमारियों की मुक्ति हेतु इलाज। सदस्य राष्ट्र को अंतर्राष्ट्रीय चिंताएं और राष्ट्रीय मामलों को संभालने का मौका मिलता है। इन उद्देश्य को निभाने के लिए 1948 में मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा प्रमाणित की गई।

द्वितीय विश्वयुद्ध के जातिसंहार के बाद, संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों को बहुत आवश्यक समझा था। ऐसी घटनाओं को भविष्य में रोकना अहम समझकर, 1948 में सामान्य सभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत किया। यह अबंधनकारी घोषणा पूरे विश्व के लिए एक समान दर्जा स्थापित करती है, जो कि संयुक्त राष्ट्र समर्थन करने की कोशिश करेगी। 
 

आज मानव अधिकारों के संबंध में सात संघ निकाय स्थापित है। यह सात निकाय हैं:

विश्व में महिलाओं के समानता के मुद्दे को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विश्व निकाय के भीतर एकल एजेंसी के रूप में संयुक्त राष्ट्र महिला के गठन को ४ जुलाई २०१० को स्वीकृति प्रदान कर दी गयी। वास्तविक तौर पर ०१ जनवरी २०११ को इसकी स्थापना की गयी। मुख्यालय अमेरिका के न्यूयार्क शहर में बनाया गया है। यूएन वूमेन की वर्तमान प्रमुख चिली की पूर्व प्रधानमंत्री सुश्री मिशेल बैशलैट हैं। संस्था का प्रमुख कार्य महिलाओं के प्रति सभी तरह के भेदभाव को दूर करने तथा उनके सशक्तिकरण की दिशा में प्रयास करना होगा। उल्लेखनीय है कि १९५३ में ८वें संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव भारत की विजयलक्ष्मी पण्डित को प्राप्त है। संयुक्त राष्ट्र के ४ संगठनों का विलय करके नई इकाई को संयुक्त राष्ट्र महिला नाम दिया गया है। ये संगठन निम्नवत हैं:

संयुक्त राष्ट्र के शांतिरक्षक वहां भेजे जाते हैं जहां हिंसा कुछ देर पहले से बंद है ताकि वह शांति संघ की शर्तों को लगू रखें और हिंसा को रोककर रखें। यह दल सदस्य राष्ट्र द्वारा प्रदान होते हैं और शांतिरक्षा कर्यों में भाग लेना वैकल्पिक होता है। विश्व में केवल दो राष्ट्र हैं जिनने हर शांतिरक्षा कार्य में भाग लिया है: कनाडा और पुर्तगाल। संयुक्त राष्ट्र स्वतंत्र सेना नहीं रखती है। शांतिरक्षा का हर कार्य सुरक्षा परिषद द्वारा अनुमोदित होता है।

संयुक्त राष्ट्र के संस्थापकों को ऊंची उम्मीद थी की वह युद्ध को हमेशा के लिए रोक पाएंगे, पर शीत युद्ध (1945 - 1991) के समय विश्व का विरोधी भागों में विभाजित होने के कारण, शांतिरक्षा संघ को बनाए रखना बहुत कठिन था।

संयुक्त राष्ट्र संघ के अपने कई कार्यक्रमों और एजेंसियों के अलावा १४ स्वतंत्र संस्थाओं से इसकी व्यवस्था गठित होती है। स्वतंत्र संस्थाओं में विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व स्वास्थ्य संगठन शामिल हैं। इनका संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहयोग समझौता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की अपनी कुछ प्रमुख संस्थाएं और कार्यक्रम हैं। ये इस प्रकार हैं:

भारत, संयुक्त राष्ट्र के उन प्रारंभिक सदस्यों में शामिल था जिन्होंने 01 जनवरी, 1942 को वाशिंग्टन में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे तथा 25 अप्रैल से 26 जून, 1945 तक सेन फ्रांसिस्को में ऐतिहासिक संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय संगठन सम्मेलन में भी भाग लिया था। संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत, संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पुरजोर समर्थन करता है और चार्टर के उद्देश्यों को लागू करने तथा संयुक्त राष्ट्र के विशिष्ट कार्यक्रमों और एजेंसियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

अंग्रेजों से स्वतंत्र होने के बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी सदस्यता को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने की एक महत्वपूर्ण गारंटी के रूप में देखा। भारत, संयुक्त राष्ट्र के उपनिवेशवाद और रंगभेद के विरूद्ध संघर्ष के अशांत दौर में सबसे आगे रहा। भारत औपनिवेशिक देशों और कौमों को आजादी दिए जाने के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक घोषणा 1960 का सह-प्रायोजक था जो उपनिवेशवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों को बिना शर्त समाप्त किए जाने की आवश्यकता की घोषणा करती है। भारत राजनीतिक स्वतंत्रता समिति (24 की समिति) का पहला अध्यक्ष भी निर्वाचित हुआ था जहां उपनिवेशवाद की समाप्ति के लिए उसके अनवरत प्रयास रिकार्ड पर हैं

भारत, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और नस्लीय भेदभाव के सर्वाधिक मुखर आलोचकों में से था। वस्तुतः भारत संयुक्त राष्ट्र (1946 में) में इस मुद्दे को उठाने वाला पहला देश था और रंगभेद के विरूद्ध आम सभा द्वारा स्थापित उप समिति के गठन में अग्रणी भूमिका निभाई थी।

गुट निरपेक्ष आंदोलन और समूह-77 के संस्थापक सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में भारत की हैसियत, विकासशील देशों के सरोकारों और आकांक्षाओं तथा अधिकाधिक न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना के अग्रणी समर्थक के रूप में मजबूत हुई।

भारत सभी प्रकार के आतंकवाद के प्रति 'पूर्ण असहिष्णुता' के दृष्टिकोण का समर्थन करता रहा है। आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक कानूनी रूपरेखा प्रदान करने के उद्देश्य से भारत ने 1996 में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के संबंध में व्यापक कन्वेंशन का मसौदा तैयार करने की पहल की थी और उसे शीघ्र अति शीघ्र पारित किए जाने के लिए कार्य कर रहा है।

भारत का संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना अभियानों में भागीदारी का गौरवशाली इतिहास रहा है और यह 1950 के दशक से ही इन अभियानों में शामिल होता रहा है। अब तक भारत ४३ शांति स्थापना अभियानों में भागीदारी कर चुका है।

भारत, परमाणु हथियारों से संपन्न एक मात्र ऐसा राष्ट्र है जो परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने और उन्हें समाप्त करने के लिए परमाणु अस्त्र कन्वेंशन की स्पष्ट रूप से मांग करता रहा है। भारत समयबद्ध, सार्वभौमिक, निष्पक्ष, चरणबद्ध और सत्यापन योग्य रूप में परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है जैसा कि सन् 1998 में आम सभा के निरस्त्रीकरण से संबंधित विशेष अधिवेशन में पेश की गई राजीव गांधी कार्य योजना में प्रतिबिम्बित होता है।

आज भारत स्थायी और अस्थायी दोनों वर्गों में सुरक्षा परिषद के विस्तार के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सुधारों के प्रयासों में सबसे आगे है ताकि वह समकालीन वास्तविकताओं को प्रदर्शित कर सके।

जून २०२० में भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना गया है। यह भारत का दो साल का कार्यकाल ०१ जनवरी २०२१ से प्रारम्भ होगा। संयुक्‍त राष्‍ट्र के इतिहास में भारत आठवीं बार प्रतिष्ठित सुरक्षा परिषद के लिए निर्वाचित हुआ है।  इससे पूर्व 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में भारत सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रहा है।

भारत में संयुक्त राष्ट्र के 26 संगठन सेवाएँ दे रहे हैं। स्थानीय समन्वयक (रेज़िडेंट कॉर्डिनेटर), भारत सरकार के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के मनोनीत प्रतिनिधि हैं। 
संयुक्त राष्ट्र भारत को रणनीतिक सहायता देता है ताकि वह गरीबी और असमानता मिटाने की अपनी आकाँक्षाएं पूरी कर सके तथा वैश्विक स्तर पर स्वीकृत सतत् विकास लक्ष्यों के अनुरूप सतत् विकास को बढ़ावा दे सके। संयुक्त राष्ट्र, विश्व में सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को तेज़ी से बदलाव और विकास प्राथमिकताओं के प्रति महत्वाकाँक्षी संकल्पों को पूरा करने में भी समर्थन देता है। 

सतत् विकास लक्ष्य सहित 2030 के एजेंडा के प्रति भारत सरकार के दृढ़ संकल्प का प्रमाण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में प्रधानमंत्री और सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के वक्तव्यों से मिलता है। भारत के राष्ट्रीय विकास लक्ष्य और समावेशी विकास के लिए “सबका साथ सबका विकास” नीतिगत पहल सतत् विकास लक्ष्यों के अनुरूप है और भारत दुनियाभर में सतत् विकास लक्ष्यों की सफलता निर्धारित करने में अग्रणी भूमिका निभाएगा। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, ” इन लक्ष्यों से हमारे जीवन को निर्धारित करने वाले  सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं के बारे में हमारी विकसित होती समझ की झलक मिलती है।”




#Article 78: कोलकाता (5255 words)


बंगाल की खाड़ी के शीर्ष तट से १८० किलोमीटर दूर हुगली नदी के बायें किनारे पर स्थित कोलकाता (बंगाली: কলকাতা, पूर्व नाम: कलकत्ता) पश्चिम बंगाल की राजधानी है। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा महानगर तथा पाँचवा सबसे बड़ा बन्दरगाह है। यहाँ की जनसंख्या २ करोड २९ लाख है। इस शहर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसके आधुनिक स्वरूप का विकास अंग्रेजो एवं फ्रांस के उपनिवेशवाद के इतिहास से जुड़ा है। आज का कोलकाता आधुनिक भारत के इतिहास की कई गाथाएँ अपने आप में समेटे हुए है। शहर को जहाँ भारत के शैक्षिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों के प्रारम्भिक केन्द्र बिन्दु के रूप में पहचान मिली है वहीं दूसरी ओर इसे भारत में साम्यवाद आंदोलन के गढ़ के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। महलों के इस शहर को 'सिटी ऑफ़ जॉय' के नाम से भी जाना जाता है।

अपनी उत्तम अवस्थिति के कारण कोलकाता को 'पूर्वी भारत का प्रवेश द्वार' भी कहा जाता है। यह रेलमार्गों, वायुमार्गों तथा सड़क मार्गों द्वारा देश के विभिन्न भागों से जुड़ा हुआ है। यह प्रमुख यातायात का केन्द्र, विस्तृत बाजार वितरण केन्द्र, शिक्षा केन्द्र, औद्योगिक केन्द्र तथा व्यापार का केन्द्र है। अजायबघर, चिड़ियाखाना, बिरला तारमंडल, हावड़ा पुल, कालीघाट, फोर्ट विलियम, विक्टोरिया मेमोरियल, विज्ञान नगरी आदि मुख्य दर्शनीय स्थान हैं। कोलकाता के निकट हुगली नदी के दोनों किनारों पर भारतवर्ष के प्रायः अधिकांश जूट के कारखाने अवस्थित हैं। इसके अलावा मोटरगाड़ी तैयार करने का कारखाना, सूती-वस्त्र उद्योग, कागज-उद्योग, विभिन्न प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योग, जूता तैयार करने का कारखाना, होजरी उद्योग एवं चाय विक्रय केन्द्र आदि अवस्थित हैं। पूर्वांचल एवं सम्पूर्ण भारतवर्ष का प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र के रूप में कोलकाता का महत्त्व अधिक है।

आधिकारिक रूप से इस शहर का नाम कोलकाता १ जनवरी, २००१ को रखा गया। इसका पूर्व नाम अंग्रेजी में कैलकटा' था लेकिन बांग्ला भाषी इसे सदा कोलकाता या कोलिकाता के नाम से ही जानते है एवं हिन्दी भाषी समुदाय में यह कलकत्ता के नाम से जाना जाता रहा है। सम्राट अकबर के चुंगी दस्तावेजों और पंद्रहवी सदी के विप्रदास की कविताओं में इस नाम का बार-बार उल्लेख मिलता है। इसके नाम की उत्पत्ति के बारे में कई तरह की कहानियाँ मशहूर हैं। सबसे लोकप्रिय कहानी के अनुसार हिंदुओं की देवी काली के नाम से इस शहर के नाम की उत्पत्ति हुई है। इस शहर के अस्तित्व का उल्लेख व्यापारिक बंदरगाह के रूप में चीन के प्राचीन यात्रियों के यात्रा वृत्तांत और फारसी व्यापारियों के दस्तावेजों में मिलता है। महाभारत में भी बंगाल के कुछ राजाओं का नाम है जो कौरव सेना की तरफ से युद्ध में शामिल हुए थे। नाम की कहानी और विवाद चाहे जो भी हों इतना तो तय है कि यह आधुनिक भारत के शहरों में सबसे पहले बसने वाले शहरों में से एक है। १६९० में इस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जाब चारनाक ने अपने कंपनी के व्यापारियों के लिये एक बस्ती बसाई थी। १६९८ में इस्ट इंडिया कंपनी ने एक स्थानीय जमींदार परिवार सावर्ण रायचौधुरी से तीन गाँव (सूतानुटि, कोलिकाता और गोबिंदपुर) के इजारा लिये। अगले साल कंपनी ने इन तीन गाँवों का विकास प्रेसिडेंसी सिटी के रूप में करना शुरू किया। १७२७ में इंग्लैंड के राजा जार्ज द्वतीय के आदेशानुसार यहाँ एक नागरिक न्यायालय की स्थापना की गयी। कोलकाता नगर निगम की स्थापना की गयी और पहले मेयर का चुनाव हुआ। १७५६ में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कोलिकाता पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। उसने इसका नाम अलीनगर रखा। लेकिन साल भर के अंदर ही सिराजुद्दौला की पकड़ यहाँ ढीली पड़ गयी और अंग्रेजों का इस पर पुन: अधिकार हो गया। १७७२ में वारेन हेस्टिंग्स ने इसे ब्रिटिश शासकों की भारतीय राजधानी बना दी। कुछ इतिहासकार इस शहर की एक बड़े शहर के रूप में स्थापना की शुरुआत १६९८ में फोर्ट विलियम की स्थापना से जोड़ कर देखते हैं। १९१२ तक कोलकाता भारत में अंग्रेजो की राजधानी बनी रही।

१७५७ के बाद से इस शहर पर पूरी तरह अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो गया और १८५० के बाद से इस शहर का तेजी से औद्योगिक विकास होना शुरु हुआ खासकर कपड़ों के उद्योग का विकास नाटकीय रूप से यहाँ बढा हलाकि इस विकास का असर शहर को छोड़कर आसपास के इलाकों में कहीं परिलक्षित नहीं हुआ। ५ अक्टूबर १८६५ को समुद्री तूफान (जिसमे साठ हजार से ज्यादा लोग मारे गये) की वजह से कोलकाता में बुरी तरह तबाही होने के बावजूद कोलकात अधिकांशत: अनियोजित रूप से अगले डेढ सौ सालों में बढता रहा और आज इसकी आबादी लगभ १ करोड़ ४० लाख है। कोलकाता १९८० से पहले भारत की सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर था, लेकिन इसके बाद मुंबई ने इसकी जगह ली। भारत की आज़ादी के समय १९४७ में और १९७१ के भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से यहाँ शरणार्थियों की बाढ आ गयी जिसने इस शहर की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोरा।

ऐतिहासिक रूप से कोलकाता भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के हर चरण में केन्द्रीय भूमिका में रहा है। भारतीया राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ साथ कई राजनैतिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों जैसे हिन्दू मेला और क्रांतिकारी संगठन युगांतर, अनुशीलन इत्यादी की स्थापना का गौरव इस शहर को हासिल है। प्रांभिक राष्ट्रवादी व्यक्तित्वों में अरविंद घोष, इंदिरा देवी चौधरानी, विपिनचंद्र पाल का नाम प्रमुख है। आरंभिक राष्ट्रवादियों के प्रेरणा के केन्द्र बिन्दू बने रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अध्यक्ष बने श्री व्योमेश चंद्र बैनर्जी और स्वराज की वकालत करने वाले पहले व्यक्ति श्री सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी भी कोलकाता से ही थे। १९ वी सदी के उत्तरार्द्ध और २० वीं शताब्दी के प्रारंभ में बांग्ला साहित्यकार बंकिमचंद्र चटर्जी ने बंगाली राष्ट्रवादियों के बहुत प्रभावित किया। इन्हीं का लिखा आनंदमठ में लिखा गीत वन्दे मातरम आज भारत का राष्ट्र गीत है। सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन कर अंग्रेजो को काफी साँसत में रखा। इसके अलावा रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर सैकड़ों स्वाधीनता के सिपाही विभिन्न रूपों में इस शहर में मौजूद रहे हैं।

ब्रिटिश शासन के दौरान जब कोलकाता एकीकृत भारत की राजधानी थी, कोलकाता को लंदन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता था। इस शहर की पहचान महलों का शहर, पूरब का मोती इत्यादि के रूप में थी। इसी दौरान बंगाल और खासकर कोलकाता में बाबू संस्कृति का विकास हुआ जो ब्रिटिश उदारवाद और बंगाली समाज के आंतरिक उथल पुथल का नतीजा थी जिसमे बंगाली जमींदारी प्रथा हिंदू धर्म के सामाजिक, राजनैतिक और नैतिक मूल्यों में उठापटक चल रही थी। यह इन्हीं द्वंदों का नतीजा था कि अंग्रेजों के आधुनिक शैक्षणिक संस्थानों में पढे कुछ लोगों ने बंगाल के समाज में सुधारवादी बहस को जन्म दिया। मूल रूप से बाबू उन लोगों को कहा जाता था जो पश्चिमी ढंग की शिक्षा पाकर भारतीय मूल्यों को हिकारत की दृष्टि से देखते थे और खुद को ज्यादा से ज्याद पश्चिमी रंग ढंग में ढालने की कोशिश करते थे। लेकिन लाख कोशिशों के बावज़ूद जब अंग्रेजों के बीच जब उनकी अस्वीकार्यता बनी रही तो बाद में इसके सकारत्म परिणाम भी आये, इसी वर्ग के कुछ लोगो ने नयी बहसों की शुरुआत की जो बंगाल के पुनर्जागरण के नाम से जाना जाता है। इसके तहत बंगाल में सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक सुधार के बहुत से अभिनव प्रयास हुये और बांग्ला साहित्य ने नयी ऊँचाइयों को छुआ जिसको बहुत तेजी से अन्य भारतीय समुदायों ने भी अपनाया।

कोलकाता भारत की आजादी और उसके कुछ समय बाद तक एक समृद्ध शहर के रूप में स्थापित रहा लेकिन बाद के वर्षों में जनसँख्या के दवाब और मूलभूत सुविधाओं के आभाव में इस शहर की सेहत बिगड़ने लगी। १९६० और १९७० के दशकों में नक्सलवाद का एक सशक्त आंदोलन यहाँ उठ खड़ा हुआ जो बाद में देश के दूसरे क्षेत्रों में भी फैल गया। १९७७ के बाद से यह वामपंथी आंदोलन के गढ के रूप में स्थापित हुआ और तब से इस राज्य में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का बोलबाला है।

 
कोलकाता पूर्वी भारत एवं पूर्वोत्तर राज्यों का प्रधान व्यापारिक, वाणिज्यिक एवं वित्तीय केन्द्र है। यहां कोलकाता स्टॉक एक्स्चेंज भी है, जो भारत का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा स्टोक एक्स्चेंज है। यहां प्रमुख वाणिज्यिक एवं सैन्य बंदरगाह भी है। इनके साथ ही इस क्षेत्र का एकमात्र अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा भी यहीं है। कभी भारत का मुख्य शहर रहे कोलकाता ने स्वतंत्रता पश्चात कुछ आरंभिक वर्षों में अन्वरत आर्थिक पतन को देखा। इसका मुख्य कारण राजनैतिक अस्थिरता एवं व्यापारिक यूनियनों का बढ़ना था। १९६० के दशक से १९९० के मध्य दशक तक शहर की प्रगति गिरती ही गयी, जिसका कारण यहां बंद या यहां से स्थानांतरित होती फैक्ट्रियां और व्यापार थे। इस वजह से पूंजी निवेश एवं संसाधनों की कमी उत्पन्न हुई, जो कि यहां की गिरती आर्थिक स्थिति के भरपूर सहायक कारक सिद्ध हुए। भारतीय आर्थिक नीति के उदारीकरण की प्रक्रिया ने १९९० के दशक में शहर की भाग्यरेखा को नई दिशा दी। इसके बाद उत्पादन भी बढ़ा एवं बेकार श्रमिकों को भी काम मिला। उदाहरणार्थ, यहां के सड़कों पर फेरीवाले लगभग ८७२२ करोड़ रुपये (२००५ के आंकड़ों के अनुसार) का व्यापार कर रहे थे। 

 
नगर की श्रमशक्ति में सरकारी एवं निजी कंपनियों के कर्मचारी एक बड़ा भाग बनाते हैं। यहां बड़ी संख्या में अकुशल एवं अर्ध-कुशल श्रमिक हैं, जिनके साथ अन्य कुशल कारीगर भी अच्छी संख्या में कार्यरत हैं। शहर की आर्थिक स्थिति के पुनरुत्थान में सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं का बड़ा हाथ रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र यहां प्रतिवर्ष लगभग ७०% की उन्नति कर रहा है, जो राष्ट्रीय औसत का दोगुना है। 
 हाल के वर्षों में यहां गृह-निर्माण एवं रियल एस्टेट क्षेत्र में भी निवेशक उमड़े हैं। इसका कारण एवं परिणाम शहर में कई नई परियोजनाओं का आरंभ होना है। कोलकाता में कई बड़ी भारतीय निगमों की औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, जिनके उत्पाद जूट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान तक हैं। कुछ उल्लेखनीय कंपनियां जिनके यहां मुख्यालय हैं, आईटीसी लिमिटेड, बाटा शूज़, बिरला कॉर्पोरेशन, कोल इंडिया लिमिटेड, दामोदर वैली कॉर्पोरेशन, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक और इलाहाबाद बैंक, आदि प्रमुख हैं। हाल ही में भारत सरकार की पूर्व-देखो (लुक ईस्ट) नीति, नाथू ला दर्रा के सिक्किम में खोले जाने एवं चीन तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से व्यापारिक संबंध बढ़ाने की नीतियों के कारण यहां कई देशों ने भरतीय बाजार में पदार्पण किया है। इसके चलते कोलकाता में निवेश होने से यहां की अर्थ-व्यवस्था को अप-थर्स्ट मिला है।

कोलकाता में उष्णकटिबंधीय आर्द्र-शुष्क जलवायु रहती है। यह कोप्पेन जलवायु वर्गीकरण के अनुसार Aw श्रेणी में आती है। वार्षिक औसत तापमान २६.८ °से. (८० °फ़ै.); मासिक औसत तापमान १९ °से. से ३० °से. (67 °फ़ै. से ८६ °फ़ै.) रहता है। ग्रीष्म ऋतु गर्म एवं आर्द्र रहती है, जिसमें न्यूनतम तापमान ३० डिग्री के दशक में रहता है तथा शुष्क कालों में यह ४० °से (104 °फ़ै) को भी पार कर जाता है। ऐसा मई और जून माह में होता है। शीत ऋतु ढाई माह तक ही रहती हैं; जिसमें कई बार न्यूनतम तापमान १२ °से – १२ °से. (54 °फ़ै. – ५७ °फ़ै.) तक जाता है। ऐसा दिसम्बर से फरवरी के बीच होता है। उच्चतम अंकित तापमान ४९°से.  °से. (११३ °फ़ै.) एवं न्यूनतम ५ °से. (४१ °फ़ै.) किया गया है। प्रायः ग्रीष्मकाल के आरंभ में धूल भरी आंधियां आती हैं, जिनके पीछे तड़ित सहित तेज वर्षाएं शहर को भिगोती हैं, एवं शहर को भीषण गर्मी से राहत दिलाती हैं। ये वर्षाएं काल बैसाखी () कहलाती हैं। 

दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी वाली शाखा द्वारा लाई गई वर्षाएं शहर को जून अंत से सितंबर के बीच यहां की अधिकतम वार्षिक वर्षा १५८२ मि.मी. (६२.३ इंच) दिलाती हैं। मानसून काल में अधिकतम वर्षाएं अगस्त में होती हैं जो (३०६ मि.मी.) तक जाती हैं। शहर में वार्षिक २,५२८ घंटे खुली धूप उपलब्ध रहती है, जिसमें अधिकतम दैनिक अंतराल मार्च के महीने में होता है। कोलकाता की प्रधान समस्या प्रदूषण की है। यहां का सस्पेन्डेड पर्टिकुलेट मैटर स्तर भारत के अन्य प्रधान शहरों की अपेक्षा बहुत है, जो गहरे स्मॉग और धुंध का कारण बनता है। शहर में भीषण प्रदूषण ने प्रदूषण-संबंधी श्वास रोगों जैसे फेफड़ों के कैंसर को बढावा दिया है।

कोलकाता नगर निगम (के.एम.सी) के अनुरक्षन में कोलकाता शहर का क्षेत्रफल  है। हालांकि कोलकाता की शहरी बसावट काफ़ी बढ़ी है, जो २००६ में कोलकाता शाहरी क्षेत्र  में फैली है। इसमें १५७ पिन क्षेत्र है। यहां की शहरी बसावट के क्षेत्रों को औपचारिक रूप से ३८ स्थानीय नगर पालिकाओं के अधीन रखा गया है। इन क्षेत्रों में ७२ शहर, ५२७ कस्बे एवं ग्रामीण क्षेत्र हैं। कोलकाता महानगरीय जिले के उपनगरीय क्षेत्रों में उत्तर २४ परगना, दक्षिण २४ परगना, हावड़ा एवं नदिया आते हैं। 

मुख्य शहर की पूर्व-पश्चिम चौड़ाई काफ़ी कम है, जो पश्चिम में हुगली नदी से पूर्वी मेट्रोपॉलिटन बायपास तक मात्र – होती है। शहर के उत्तर-दक्षिणी विस्तार को मुख्यतः उत्तरी, मध्य एवं दक्षिणी भाग में बांटा जा सकता है। उत्तरी भाग सबसे पुराने भागों में से एक है, जिसमें १९वीं शाताब्दी के स्थापत्य और संकरे गली कूचे दिखायी देते हैं। स्वतंत्रता उपरांत अधिकतम दक्षिणी भाग ने प्रगति की है और यहां कई पॉश एवं समृद्ध क्षेत्र हैं जैसे बॉलीगंज, भोवानीपुर, अलीपुर, न्यू अलीपुर, जोधपुर पार्क, आदि। शहर के उत्तर-पूर्वी ओर सॉल्ट लेक सिटी (बिधाननगर) क्षेत्र यहां का व्यवस्थित क्षेत्र है। वहीं निकट ही राजारहाट भी व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध क्षेत्र विकसित हो रहा है, जिसे न्यू टाउन भी कहते हैं। 

मध्य कोलकाता में बी.बी.डीबाग के पास सेंट्रल बिज़नेस जिला है। यहां बंगाल सरकार सचिवालय, प्रधान डाकघर, उच्च न्यायालय, लाल बाज़ार पुलिस मुख्यालय आदि कई सरकारी इमारतें तथा निजि कार्यालय स्थापित हैं। मैदान कोलकाता के हृदय क्षेत्र में विस्तृत खुला मैदान है, जहां बहुत सी क्रीड़ा और विशाल जन-सम्मेलन आदि आयोजित हुआ करते हैं। बहुत सी कंपनियों ने अपने कार्यालय पार्क स्ट्रीट के दक्षिणी क्षेत्र में बनाये हैं, जिसके कारण यह भी द्वितीयक सेंट्रल बिज़नेस जिला बनता जा रहा है।

कोलकाता पूर्वी भारत में  निर्देशांक पर गंगा डेल्टा क्षेत्र में  से  की ऊंचाई पर स्थित है। शहर हुगली नदी के किनारे किनारे उत्तर-दक्षिण रैखिक फैला हुआ है। शहर का बहुत सा भाग एक वृहत नम-भूमि क्षेत्र था, जिसे भराव कर शहर की बढ़ती आबादी को बसाया गया है। शेष बची नम-भूमि जिसे अब ईस्ट कैल्कटा वेटलैंड्स कहते हैं, को रामसर सम्मेलन के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की नम-भूमि घोषित किया गया है।

अन्य गांगेय क्षेत्रों की तरह यहां की मिट्टी भी उपजाऊ जलोढ़ (अल्यूवियल) ही है। मिट्टी की ऊपरी पर्त के नीचे चतुर्धात्विक अवसाद, मिट्टी, गाद, एवं रेत की विभिन्न श्रेणियां अतथा बजरी आदि है। ये कण मिट्टी की दो पर्तों के बीच बिछे हुए हैं। इनमें से निचली पर्त  तथा  और ऊपरी पर्त  तथा  की मोटाई की है। भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार, शहर भूकंप प्रभावी क्षेत्र श्रेणी-तृतीय में आता है। यह श्रेणियां १-४ के बीच बढ़ते क्रम में होती हैं। यूएनडीपी रिपोर्ट के अनुसार वायु और चक्रवात के लिए यह अत्योच्च क्षति जोखिम क्षेत्र में आता है।

 

के एम सी शहर की जलापूर्ति हुगली नदी से प्राप्त जल से करता है। जल को उत्तर २४ परगना के निकट पाल्टा जल पंपिंग स्टेशन में शोधित किया जाता है। शहर का दैनिक अवशिष्ट लगभग २५०० टन धापा के निकट शहर के पूर्वी क्षेत्र में डम्प किया जाता है। इस डंपिंग स्थल पर कृषि को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे कि यह अवशिष्ट और शहर का मल (सीवर) प्राकृतिक तौर पर पुनर्चक्रित हो पाये। शहर के कुछ भागों में सीवर द्वारा मल निकास का अभाव होने से अस्वास्थवर्धक मल निकास को बढ़ावा मिलता है। शहर की विद्युत आपूर्ति कैल्कटा इलेक्ट्रिक सप्लाई कार्पोरेशन (सी.ई.एस.सी) द्वारा शहर क्षेत्र में, तथा पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा उपनगरीय क्षेत्रों में की जाती है। १९९० के दशक के मध्य तक विद्युत आपूर्ति में अत्यधिक व्यवधान एवं कटौती की समस्या थी; जो कि अब इसकी दशा में काफ़ी सुधार हुआ है, एवं अब कटौती बहुत ही कम की जाती है। शहर में २० अग्नि-शमन स्टेशन पश्चिम बंगाल अग्नि-शमन सेवा के अन्तर्गत वार्षिक औसत ७५०० अग्निकांडों को शमन करते हैं।

कोलकाता में सरकारी बी एस एन एल तथा निजी उपक्रम जैसे वोडाफ़ोन, एयरटेल, रिलायंस कम्युनिकेशंस, टाटा इंडिकॉम आदि दूरभाष एवं मोबाइल सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। शहर में जी एस एम और सी डी एम ए, दोनों ही प्रकार की सेलुलर सेवाएं उपलब्ध हैं। यहां बी एस एन एल, टाटा कम्युनिकेशंस, एयरटेल तथा रिलायंस कम्युनिकेशंस द्वारा ब्रॉडबैंड सेवा भी उपलब्ध है। इनके अलावा सिफ़ी और एलायंस भी यह सेवा उपलब्ध कराते हैं। 

बहुत से बांग्ला समाचार-पत्र यहां प्रकाशित होते हैं, जिनमें आनंद बाजार पत्रिका, आजकल, बर्तमान, संगबाद प्रतिदिन, गणशक्ति तथा दैनिक स्टेट्स्मैन प्रमुख हैं। अंग्रेज़ी समाचार पत्रों में द टेलीग्राफ, द स्टेट्स्मैन, एशियन एज, हिन्दुस्तान टाइम्स एवं टाइम्स ऑफ इंडिया प्रमुख हैं। कुछ मुख्य सामयिक पत्रिकाओं में से देश, सनंद, उनिश कुरी, किंड्ल, आनंदलोक तथा आनंद मेला प्रमुख हैं। पूर्वी भारत में सबसे बड़े व्यापारिक केन्द्र होने से कई वित्तीय दैनिक जैसे इकॉनोमिक टाइम्स, फाइनेंशियल एक्स्प्रेस तथा बिज़नेस स्टैन्डर्ड आदि के पर्याप्त पाठक हैं। यहां के अन्य भाषाओं के अल्पसंख्यकों के लिए हिन्दी, गुजराती, उड़िया, उर्दु, पंजाबी तथा चीनी पत्र भी प्रकाशित होते हैं। 

यहां सरकारी रेडियो स्टेशन ऑल इंडिया रेडियो से कई ए एम रेडियो चैनल प्रसारित करता है। कोलकाता में ग्यारह एफ़ एम रेडियो स्टेशन प्रसारित होते हैं। इनमें से दो ऑल इंडिया रेडियो के हैं। सरकारी टीवी प्रसारणकर्ता दूरदर्शन से दो टेरेस्ट्रियल चैनल प्रसारित किये जाते हैं। चार बहु-प्रणाली ऑपरेटार (एम एस ओ) द्वारा बांग्ला, हिन्दी, अंग्रेज़ी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल केबल टीवी द्वारा दिखाए जाते हैं। बांग्ला उपग्रह चैनलों में एबीपी आनंद, २४ घंटा, कोलकाता टीवी, चैनल १० तथा तारा न्यूज़ प्रमुख हैं।

  
कोलकाता में जन यातायात कोलकाता उपनगरीय रेलवे, कोलकाता मेट्रो, ट्राम और बसों द्वारा उपलब्ध है। व्यापक उपनगरीय जाल सुदूर उपनगरीय क्षेत्रों तक फैला हुआ है। भारतीय रेल द्वारा संचालित कोलकाता मेट्रो भारत में सबसे पुरानी भूमिगत यातायात प्रणाली है। ये शहर में उत्तर से दक्षिण दिशा में हुगली नदी के समानांतर शहर की लंबाई को १६.४५ कि.मी. में नापती है। यहां के अधिकांश लोगों द्वारा बसों को प्राथमिक तौर पर यातायात के लिए प्रयोग किया जाता है। यहां सरकारी एवं निजी ऑपरेटरों द्वारा बसें संचालित हैं। भारत में कोलकाता एकमात्र शहर है, जहाँ ट्राम सेवा उपलब्ध है। ट्राम सेवा कैल्कटा ट्रामवेज़ कंपनी द्वारा संचालित है। ट्राम मंद-गति चालित यातायात है, व शहर के कुछ ही क्षेत्रों में सीमित है। मानसून के समय भारी वर्षा के चलते कई बार लोक-यातायात में व्यवधान पड़ता है।

भाड़े पर उपलब्ध यांत्रिक यातायात में पीली मीटर-टैक्सी और ऑटो-रिक्शॉ हैं। कोलकाता में लगभग सभी पीली टैक्सियाँ एम्बेसैडर ही हैं। कोलकाता के अलावा अन्य शहरों में अधिकतर टाटा इंडिका या फिएट ही टैसी के रूप में चलती हैं। शहर के कुछ क्षेत्रों में साइकिल-रिक्शा और हाथ-चालित रिक्शा अभी भी स्थानीय छोटी दूरियों के लिए प्रचालन में हैं। अन्य शहरों की अपेक्षा यहां निजी वाहन काफ़ी कम हैं। ऐसा अनेक प्रकारों के लोक यातायात की अधिकता के कारण है। हालांकि शहर ने निजी वाहनों के पंजीकरण में अच्छी बड़ोत्तरी देखी है। वर्ष २००२ के आंकड़ों के अनुसार पिछले सात वर्षों में वाहनों की संख्या में ४४% की बढ़त दिखी है। शहर के जनसंख्या घनत्व की अपेक्षा सड़क भूमि मात्र ६% है, जहाँ दिल्ली में यह २३% और मुंबई में १७% है। यही यातायात जाम का मुख्य कारण है। इस दिशा में कोलकाता मेट्रो रेलवे तथा बहुत से नये फ्लाई-ओवरों तथा नयी सड़कों के निर्मान ने शहर को काफ़ी राहत दी है।
 

कोलकाता में दो मुख्य लंबी दूरियों की गाड़ियों वाले रेलवे स्टेशन हैं- हावड़ा जंक्शन और सियालदह जंक्शन। कोलकाता रेलवे स्टेशन नाम से एक नया स्टेशन २००६ में बनाया गया है। कोलकाता शहर भारतीय रेलवे के दो मंडलों का मुख्यालय है – पूर्वी रेलवे और दक्षिण-पूर्व रेलवे।

शहर के विमान संपर्क हेतु नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा दम दम में स्थित है। यह विमानक्षेत्र शहर के उत्तरी छोर पर है व यहां से दोनों, अन्तर्देशीय और अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानें चलती हैं। यह नगर पूर्वी भारत का एक प्रधान बंदरगाह है। कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट ही कोलकाता पत्तन और हल्दिया पत्तन का प्रबंधन करता है। यहां से अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में पोर्ट ब्लेयर के लिये यात्री जहाज और भारत के अन्य बंदरगाहों तथा विदेशों के लिए भारतीय शिपिंग निगम के माल-जहाज चलते हैं। यहीं से कोलकाता के द्वि-शहर हावड़ा के लिए फेरी-सेवा भी चलती है।
कोलकाता में दो बड़े रेलवे स्टेशन हैं जिनमे एक हावड़ा और दूसरा सियालदह में है, हावड़ा तुलनात्मक रूप से ज्यादा बड़ा स्टेशन है जबकि सियालदह से स्थानीय सेवाएँ ज्यादा हैं। शहर में उत्तर में दमदम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा जो शहर को देश विदेश से जोड़ता है। शहर से सीधे ढाका यांगून, बैंकाक लंदन पारो सहित मध्य पूर्व एशिया के कुछ शहर जुड़े हुये हैं। कोलकाता भारतीय उपमहाद्वीप का एकमात्र ऐसा शहर है जहाँ ट्राम यातायात का प्रचलन है। इसके अलावा यहाँ कोलकाता मेट्रो की भूमिगत रेल सेवा भी उपलब्ध है। गंगा की शाखा हुगली में कहीं कहीं स्टीमर यातायात की सुविधा भी उपलब्ध है। सड़कों पर नीजी बसों के साथ साथ पश्चिम बंगाल यातायात परिवहन निगम की भी काफी बसें चलती हैं। शहर की सड़कों पे काली-पीली टैक्सियाँ चलती हैं। धुंएँ, धूल और प्रदूषण से राहत शहर के किसी किसी इलाके में ही मिलती है।

कोलकाता में कोलकाता विश्वविद्यालय समेत कई नामचीन शैक्षिक संस्थान एवं हमाविद्यालय हैं यहाँ चार मेडिकल कालेज भी हैं। अस्सी के दशकों के बाद कलकत्ता की शैक्षिक हैसियत में गिरावट हुई लेकिन कोलकाता अब भी शैक्षिक माहौल के लिये जाना जाता है। कोलकाता विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय, नेताजी सुभाष मुक्त विश्वविद्यालय, बंगाल अभियांत्रिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय,पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल पशुपालन एवं मतस्य पालन विज्ञान विश्वविद्यालय,
पश्चिम बंगाल तकनीकी विश्वविद्यालय कोलकाता के विभिन्न भागों में स्थित हैं। इन विश्वविद्यालयों से सैकड़ो महाविद्यालय संबद्ध एवं अंगीभूत इकाई के रूप में काम करते हैं। एशियाटिक सोसायटी, भारतीय साँख्यिकी संस्थान, भारतीय प्रबंधन संस्थान, मेघनाथ साहा आण्विक भौतिकी संस्थान, सत्यजीत रे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान राष्ट्रीय महत्व के संस्थान हैं। अन्य उल्लेखनीय संस्थानों मेंरामकृष्ण मिशन संस्कृति संस्थान, एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, बोस संस्थान, बोटैनिकल सर्वे ऑफ इंडिया, जियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इनफार्मेशन टेक्नालजी, राष्ट्रीय होमियोपैथी संस्थान, श्रीरामपुर कालेज, प्रेसीडेंसी कालेज, स्काटिश चर्च कालेज प्रमुख हैं।

कोलकाता निवासियों को कलकतिया कहा जाता है। वर्ष २००१ की जनगणनानुसार कोलकाता शहर की कुल जनसंख्या ४,५८०,५४४ है, जबकि यहां के सभी शहरी क्षेत्रों को मिलाकर १३,२१६,५४६ है। २००९ वर्ष की परियोजनाओं के वर्तमान अनुमान के अनुसार शहर की जनसंख्या ५,०८०,५१९ है। यहां का लिंग अनुपात ९२८ स्त्रियां प्रति १०० पुरुष है। जो कि राष्ट्रीय औसत से कम है। इसका कारण ग्रामीण क्षेत्रों से काम के लिए आने वाले पुरुष हैं। शहर की साक्षरता दर ८१% है जो राष्ट्रीय औसत ८०% से अधिक है। कोलकाता नगर निगम के क्शेत्रों की पंजीकृत विकार दर ४.१% है, जो  वाले शहरों में न्यूनतम है।

बंगाली लोग ही कोलकाता की जनसंख्या का अधिकांश भाग बनाते हैं (५५%), जिनके अलावा मारवाड़ी और बिहारी लोग यहां अल्पसंख्यकों का बड़ा भाग (२०%) हैं। कोलकाता में अल्पसंख्यक समुदायों में चीनी, तमिल, नेपाली, उड़िया, तेलुगु, असमी, गुजराती, आंग्ल-भारतीय, उड़िया और भोजपुरी समुदाय आते हैं। 

जनगणना के अनुसार कोलकाता की जनसंख्या का ८०% भाग हिन्दू हैं। शेष १८% मुस्लिम, १% ईसाई और १% जैन लोग हैं। अन्य अल्पसंख्यक समुदायों में सिख बौद्ध, यहूदी और पारसी समुदाय आते हैं। नगर की जनसंख्या का एक-तिहाई भाग यानि १५ लाख लोग २,०११ पंजीकृत क्षेत्रों और कालोनियों तथा ३,५०० अनाधिकृत क्षेत्रों और झुग्गियों में वास करते हैं।

सन २००४ में भारत के ३५ महानगरों और बड़े शहरों में हुए कुल विशिष्ट और स्थानीय विधि अपराधों का ६७.६% रिपोर्ट हुए थे। कोलकाता जिला पुलिस ने वर्ष २००४ में आई.पी.सी के अंतर्गत १०,५७५ मामले दर्ज किए थे, जो देश में दसवें स्थान पर सबसे अधिक थे। २००६ में शहर की अपराध दर ७१ प्रति १ लाख रही, जो राष्ट्रीय अपराध दर १६७.७ से बहुत कम है और सभी बड़े शहरों से न्यूनतम है। कोलकाता का सोनागाची क्षेत्र १०,००० वेश्याओं सहित, एशिया का सबसे बड़ा रेड-लाइट क्षेत्र है।

 
कोलकाता को लंबे समय से अपने साहित्यिक, क्रांतिकारी और कलात्मक धरोहरों के लिए जाना जाता है। भारत की पूर्व राजधानी रहने से यह स्थान आधुनिक भारत की साहित्यिक और कलात्मक सोच का जन्मस्थान बना। कोलकातावासियों के मानस पटल पर सदा से ही कला और साहित्य के लिए विशेष स्थान रहा है। यहां नयी प्रतिभाको सदा प्रोत्साहन देने की क्षमता ने इस शहर को अत्यधिक सृजनात्मक ऊर्जा का शहर (सिटी ऑफ फ़्यूरियस क्रियेटिव एनर्जी) बना दिया है। Cited by:  इन कारणों से ही कोलकाता को कभी कभी भारत की सांस्कृतिक राजधानी भी कह दिया जाता है, जो अतिश्योक्ति न होगी।
 
कोलकाता का एक खास अंग है पारा, यानि पास-पड़ोस के क्षेत्र। इनमें समुदाय की सशाक्त भावना होती है। प्रत्येक पारा में एक सामुदायिक केन्द्र, क्रीड़ा स्थल आदि होते हैं। लोगों में यहां फुर्सत के समय अड्डा (यानि आराम से बातें करना) में बैठक करने, चर्चाएं आदि में सामयिक मुद्दों पर बात करने की आदत हैं। ये आदत एक मुक्त-शैली बुद्धिगत वार्तालाप को उत्साहित करती है। 

कोलकाता में बहुत सी इमारतें गोथिक, बरोक, रोमन और इंडो-इस्लामिक स्थापत्य शैली की हैं। ब्रिटिश काल की कई इमारतें अच्छी तरह से संरक्षित हैं व अब धरोहर घोषित हैं, जबकि बहुत सी इमारतें ध्वंस के कगार पर भी हैं। १८१४ में बना भारतीय संग्रहालय एशिया का प्राचीनतम संग्रहालय है। यहां भारतीय इतिहास, प्राकृतिक इतिहास और भारतीय कला का विशाल और अद्भुत संग्रह है। विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। यहां के संग्रहालय में शहर का इतिहास अभिलेखित है। यहां का भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय भारत का एक मुख्य और बड़ा पुस्तकालय है। फाइन आर्ट्स अकादमी और कई अन्य कला दीर्घाएं नियमित कला-प्रदर्शनियां आयोजित करती रहती हैं। 

शहर में नाटकों आदि की परंपरा जात्रा, थियेटर और सामूहिक थियेटर के रूप में जीवित है। यहां हिन्दी चलचित्र भी उतना ही लोकप्रिय है, जितना कि बांग्ला चलचित्र, जिसे टॉलीवुड नाम दिया गया है। यहां का फिल्म उद्योग टॉलीगंज में स्थित है। यहां के लंबे फिल्म-निर्माण की देन है प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक जैसे सत्यजीत राय, मृणाल सेन, तपन सिन्हा और ऋत्विक घटक। इनके समकालीन क्षेत्रीय निर्देशक हैं, अपर्णा सेन और रितुपर्णो घोष।

कोलकाता के खानपान के मुख्य घटक हैं चावल और माछेर झोल, और संग में रॉसोगुल्ला और मिष्टि दोइ डेज़र्ट के रूप में। बंगाली लोगों के प्रमुख मछली आधारित व्यंजनों में हिल्सा व्यंजन पसंदीदा हैं। अल्पाहार में बेगुनी (बैंगन भाजा), काठी रोल, फुचका और चाइना टाउन के चीनी व्यंजन शहर के पूर्वी भाग में अधिक लोकप्रिय हैं।

बंगाली महिलायें सामान्यतया साड़ी ही पहनती हैं। इनकी घरेलू तौर पर साड़ी पहनने की एक विशेष शैली होती है, जो खास बंगाली पहचान है। साड़ियों में यहां की बंगाली सूती और रेशमी विश्व-साड़ियां प्रसिद्ध हैं, जिन्हें तांत नाम दिया गया है। पुरुषों में प्रायः पश्चिमी पेन्ट-शर्ट ही चलते हैं, किंतु त्यौहारों, मेल-मिलाप आदि के अवसरों पर सूती और रेशमी तांत के कुर्ते धोती के साथ पहने जाते हैं। यहां पुरुषों में भी धोती का छोर हाथ में पकड़ कर चलने का चलन रहा है, जो एक खास बंगाली पहचान देता है। धोती अधिकांशातः श्वेत वर्ण की ही होती है। 
 
दुर्गा पूजा कोलकाता का सबसे महत्त्वपूर्ण और चकाचौंध वाला उत्सव है। यह त्यौहार प्रायः अक्टूबर के माह में आता है, पर हर चौथे वर्ष सितंबर में भी आ सकता है। अन्य उल्लेखनीय त्यौहारों में जगद्धात्री पूजा, पोइला बैसाख, सरस्वती पूजा, रथ यात्रा, पौष पॉर्बो, दीवाली, होली, क्रिस्मस, ईद, आदि आते हैं। सांस्कृतिक उत्सवों में कोलकाता पुस्तक मेला, कोलकाता फिल्मोत्सव, डोवर लेन संगीत उत्सव और नेशनल थियेटर फेस्टिवल आते हैं।

नगर में भारतीय शास्त्रीय संगीत और बंगाली लोक संगीत को भी सराहा जाता रहा है। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी से ही बंगाली साहित्य का आधुनिकिकरण हो चुका है। यह आधुनिक साहित्यकारों की रचनाओं में झलकता है, जैसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, माइकल मधुसूदन दत्त, रविंद्रनाथ ठाकुर, काजी नज़रुल इस्लाम और शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, आदि। इन साहित्यकारों द्वारा तय की गयी उच्च श्रेणी की साहित्य परंपरा को जीबनानंददास, बिभूतिभूषण बंधोपाध्याय, ताराशंकर बंधोपाध्याय, माणिक बंदोपाध्याय, आशापूर्णा देवी, शिशिरेन्दु मुखोपाध्याय, बुद्धदेव गुहा, महाश्वेता देवी, समरेश मजूमदार, संजीव चट्टोपाध्याय और सुनील गंगोपाध्याय ने आगे बढ़ाया है। 

साठ के दशक में भुखी पीढी (हंगरी जेनरेशन) नामके एक साहित्यिक अंदोलनकारीयों का आगमन हुया जिसके सदस्यों ने पुरे कोलकाता शहर को अपने करतुतों और लेखन के जरिये हिला दिया था। उसके चर्चे विदेशों तक जा पंहुचा था। उस अंदोलन के सदस्यों में प्रधान थे मलय रायचौधुरी, सुबिमल बसाक। देबी राय, समीर रायचौधुरी, फालगुनि राय, अनिल करनजय, बासुदेब दाशगुप्ता, त्रिदिब मित्रा, शक्ति चट्टोपध्याय प्रमुख हस्तियां।

१९९० के आरंभिक दशक से ही भारत में जैज़ और रॉक संगीत का उद्भव हुआ था। इस शाइली से जुड़े कई बांग्ला बैण्ड हैं, जिसे जीबोनमुखी गान कहा जाता है। इन बैंडों में चंद्रबिंदु, कैक्टस, इन्सोम्निया, फॉसिल्स और लक्खीचरा आदि कुछ हैं। इनसे जुड़े कलाकारों में कबीर सुमन, नचिकेता, अंजना दत्त, आदि हैं।

मैदान और फोर्ट विलियम, हुगली नदी के समीप भारत के सबसे बड़े पार्कों में से एक है। यह 3 वर्ग कि॰मी॰ के क्षेत्र में फैला है। मैदान के पश्चिम में फोर्ट विलियम है। चूंकि फोर्ट विलियम को अब भारतीय सेना के लिए उपयोग में लाया जाता है यहां प्रवेश करने के लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। ईडन गार्डन्स मेंएक छोटे से तालाब में बर्मा का पेगोडा स्थापित किया गया है, जो इस गार्डन का विशेष आकर्षण है। यह स्थान स्थानीय जनता में भी लोकप्रिय है। विक्टोरिया मेमोरियल, १906-2१ के बीच निर्मित यह स्मारक रानी विक्टोरिया को समर्पित है। इस स्मारक में शिल्पकला का सुंदर मिश्रण है। इसके मुगल शैली के गुंबदों में सारसेनिक और पुनर्जागरण काल की शैलियां दिखाई पड़ती हैं। मेमोरियल में एक शानदार संग्रहालय है, जहां रानी के पियानो और स्टडी-डेस्क सहित 3000 से अधिक वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। यह रोजाना प्रात: १0.00 बजे से सायं 4.30 बजे तक खुलता है, सोमवार को यह बंद रहता है। सेंट पॉल कैथेड्रल चर्च शिल्पकला का अनूठा उदाहरण है, इसकी रंगीन कांच की खिड़कियां, भित्तिचित्र, ग्रांड-ऑल्टर, एक गॉथिक टावर दर्शनीय हैं। यह रोजाना प्रात: 9.00 बजे से दोपहर तक और सायं 3.00 बजे से 6.00 बजे तक खुलता है। नाखोदा मस्जिद लाल पत्थर से बनी इस विशाल मस्जिद का निर्माण १926 में हुआ था, यहां १0,000 लोग आ सकते हैं। मार्बल पैलेस, एम जी रोड पर स्थित आप इस पैलेस की समृद्धता देख सकते हैं। १800 ई. में यह पैलेस एक अमीर बंगाली जमींदार का आवास था। यहां कुछ महत्वपूर्ण प्रतिमाएं और पेंटिंग हैं। सुंदर झूमर, यूरोपियन एंटीक, वेनेटियन ग्लास, पुराने पियानो और चीन के बने नीले गुलदान आपको उस समय के अमीरों की जीवनशैली की झलक देंगे। पारसनाथ जैन मंदिर, १867 में बना यह मंदिर वेनेटियन ग्लास मोजेक, पेरिस के झूमरों और ब्रूसेल्स, सोने का मुलम्मा चढ़ा गुंबद, रंगीन शीशों वाली खिड़कियां और दर्पण लगे खंबों से सजा है। यह रोजाना प्रात: 6.00 बजे से दोपहर तक और सायं 3.00 बजे से 7.00 बजे तक खुलता है। बेलूर मठ, बेलूर मठ रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय है, इसकी स्थापना १899 में स्वामी विवेकानंद ने की थी, जो रामकृष्ण के शिष्य थे। यहां १938 में बना मंदिर हिंदु, मुस्लिम और इसाईशैलियों का मिश्रण है। यह अक्टूबर से मार्च केदौरान प्रात: 6.30 बजे से ११.30 बजे तक और सायं 3.30 बजे से 6.00 बजे तक तथा अप्रैल से सितंबर तक प्रात: 6.30 बजे से ११.30 बजे तक और सायं 4.00 बजे से 7.00 बजे तक खुलता है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर हुगली नदी के पूर्वी तट पर स्थित यह मां काली का मंदिर है, जहां श्री रामकृष्ण परमहंस एक पुजारी थे और जहां उन्हें सभी धर्मों में एकता लाने की अनुभूति हुई। काली मंदिर सडर स्ट्रीट से 6 कि॰मी॰ दक्षिण में यह शानदार मंदिर कोलकाता की संरक्षक देवी काली को समर्पित है। काली का अर्थ है काला। काली की मूर्ति की जिह्वा खून से सनी है और यह नरमुंडों की माला पहने हुए है। काली, भगवान शिव की अर्धांगिनी, पार्वती का ही विनाशक रूप है। पुराने मंदिर के स्थान पर ही वर्तमान मंदिर १809 में बना था। यह प्रात: 3.00 बजे से रात्रि 8.00 बजे तक खुलता है। मदर टेरेसा होम्स इस स्थान की यात्रा आपकी कोलकाता यात्रा को एक नया आयाम देगी। काली मंदिर के निकट स्थित यह स्थान सैंकड़ों बेघरों और गरीबों में से भी गरीब लोगों का घर है - जो मदर टेरेसा को उद्धृत करता है। आप अपने अंशदान से जरुरतमंदों की मदद कर सकते हैं। बॉटनिकल गार्डन्स कई एकड़ में फैली हरियाली, पौधों की दुर्लभ प्रजातियां, सुंदर खिले फूल, शांत वातावरण...यहां प्रकृ ति के साथ शाम गुजारने का एक सही मौका है। नदी के पश्चिमी ओर स्थित इस गार्डन में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बरगद का पेड़ है, जो १0,000 वर्ग मीटर में फैला है, इसकी लगभग 420 शाखाएं हैं।




#Article 79: लीबिया (888 words)


लीबिया (), आधिकारिक तौर पर 'महान समाजवादी जनवादी लिबियाई अरब जम्हूरिया' (‎ Al-Jamāhīriyyah al-ʿArabiyyah al-Lībiyyah aš-Šaʿbiyyah al-Ištirākiyyah al-ʿUẓmā), उत्तरी अफ़्रीका में स्थित एक देश है। इसकी सीमाएं उत्तर में भूमध्य सागर, पूर्व में मिस्र, उत्तरपूर्व में सूडान, दक्षिण में चाड व नाइजर और पश्चिम में अल्जीरिया और ट्यूनीशिया से मिलती है।

करीबन १,८००,०० वर्ग किमी (६९४,९८४ वर्ग मील) क्षेत्रफल वाला यह देश, जिसका ९० प्रतिशत हिस्सा मरुस्थल है, अफ़्रीका का चौथा और दुनिया का १७ वां बड़ा देश है। देश की ५७ लाख की आबादी में से १७ लाख राजधानी त्रिपोली में निवास करती है। सकल घरेलू उत्पाद के लिहाज से यह इक्वीटोरियल गिनी के बाद अफ्रीका का दूसरा समृद्ध देश है। इसके पीछे मुख्य कारण विपुल तेल भंडार और कम जनसंख्या है।

लीबिया १९५१ मे आजाद हुआ था एवं इस्क नाम 'युनाइटेड लीबियन किंगडम' () रखा गया। जिसका नाम १९६३ मे 'किंगडम ऑफ लीबिया' () हो गया। १९६९ के तख्ता-पलट के बाद इस देश का नाम 'लिबियन अरब रिपब्लिक' रखा गया। १९७७ में इसका नाम बदलकर 'महान समाजवादी जनवादी लिबियाई अरब जम्हूरिया' रख दिया गया।

लिबिया राज्य उत्तर में भूमध्य सागर से, दक्षिण में चैड प्रजातंत्र एवं नाइजर प्रजातंत्र से, पश्चिम में ट्युनिज़िया एवं अजलीरिया से तथा पूर्व में संयुक्त अरब गणराज्य एवं सूडान से घिरा हुआ है। इस संघ राज्य का संपूर्ण क्षेत्रफल १७,५९,५०० वर्ग किलोमीटर है।

भूमध्य सागर एवं रेगिस्तान के प्रभाव के कारण मौसमी परिवर्तन हुआ करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में ट्रिपोलिटैनिया के समुद्री किनारे का ताप ४१ डिग्री सें. से ४६ डिग्री सें. के मध्य रहता है। सुदूर दक्षिण में ताप्त अपेक्षाकृत ऊँचा रहता है। उत्तरी सिरेनेइका का ताप २७ डिग्री सें. से लेकर ३२ डिग्री सें. के मध्य रहता है। टोब्रुक (Tobruk) का जनवरी का औसत ताप १३ डिग्री सें. तथा जुलाई और औसत ताप २६ डिग्री सें. रहता है। भिन्न भिन्न क्षेत्रों में वर्षा का औसत भिन्न भिन्न है। ट्रिपोलिटैनिया तथा सिरेनेइका के जाबाल क्षेत्र में वार्षिक वर्षा का औसत १५ से २० इंच तक है। अन्य क्षेत्रों में आठ इंच से कम वर्षा होती है। वर्षा प्राय: अल्पकालीन शीत ऋतु में होती है और इसके कारण बाढ़ आ जाती है।

यहाँ अनेक प्रकार के आवर्धित फल के पेड़, छुहारा, सदाबहार वृक्ष तथा मस्तगी (mastic) के वृक्ष हैं। सुदूर उत्तर में बकरियाँ तथा मवेशी पाले जाते हैं। दक्षिण में भेड़ों और ऊटों की संख्या अधिक है। चमड़ा कमाने, जूते, साबुन, जैतून का तले निकालने तथा तेल के शोधन करने के कारखाने हैं। यहाँ सन् १९६३ में एक सीमेंट फैक्टरी की स्थापना की गई है। जौ और गेहूँ की खेती होती है।

यहाँ पेट्रोलियम के अतिरिक्त फ़ॉस्फ़ेट, मैंगनीज़, मैग्नीशियम तथा पोटैशियम मिलते हैं। खानेवाला समुद्री नमक यहाँ का प्रमुख खनिज है।

ट्रिपोली तथा बेंगाज़ि यहाँ की संयुक्त राजधानियाँ हैं। अप्रैल, १९६३ ई. में संविधान का संशोधन हुआ, जिसके अनुसार स्त्रियों को मताधिकार दिया गया और संघीय शासनव्यवस्था के स्थान पर केंद्रीय शासनव्यवस्था लागू की गई। इस नई व्यवस्था की दस इकाइयाँ हैं, जिनके प्रधान अधिकारी 'मुहाफिद' कहलाते हैं।

सेबहा से ट्रिपोली तक तट के साथ साथ तथा देश के भीतरी भाग में अच्छी सड़कें हैं। यहाँ पर्याप्त संख्या में हल्की रेल लाइनें हैं। ट्रिपोली, बेंगाज़ि तथा टाब्रुक बंदरगाह है। इद्रिस तथा बेनिना यहाँ के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं।

लीबिया 1,75 9,540 वर्ग किलोमीटर (679,362 वर्ग मील) से अधिक है, जो इसे आकार में दुनिया का 16 वां सबसे बड़ा देश बनाता है। लीबिया भूमध्य सागर से उत्तर में है, पश्चिम में ट्यूनीशिया और अल्जीरिया, दक्षिणपश्चिम नाइजर, चाड द्वारा दक्षिण, सूडान द्वारा दक्षिणपूर्व और पूर्व में मिस्र द्वारा। लीबिया अक्षांश 19 डिग्री और 34 डिग्री एन, और अक्षांश 9 डिग्री और 26 डिग्री ई के बीच है।

प्राकृतिक रूप गर्म, शुष्क, धूल से भरे सिरोको के रूप में आती हैं (लीबिया में गिब्ली के रूप में जाना जाता है)। यह वसंत और शरद ऋतु में एक से चार दिनों तक उड़ने वाली दक्षिणी हवा है। वहां धूल तूफान और मिट्टी के तूफ़ान भी हैं। ओसा भी पूरे लीबिया में बिखरे हुए पाए जा सकते हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण घाडम्स और कुफरा हैं। रेगिस्तान पर्यावरण की मौजूदा उपस्थिति के कारण लीबिया दुनिया के सबसे सुन्दर और सूखे देशों में से एक है।

लीबिया के पहले निवासी बर्बर जनजाति  के थे। 7 वीं शताब्दी में ईसापूर्व में , फोएनशियनों ने लीबिया के पूर्वी हिस्से को उपनिवेशित किया, जिसे साइरेनाका कहा जाता है, और यूनानियों ने पश्चिमी भाग का उपनिवेश किया, जिसे त्रिपोलिटानिया कहा जाता है। त्रिपोलिटानिया कार्थगिनियन नियंत्रण हिस्सा था। यह 46 ईस्वी से रोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया। पहली शताब्दी ईस्वी में  साइरेनिका रोमन साम्राज्य से संबंधित था। जिसके बाद 642 ईस्वी में अरबो ने हमला किया था और विजयी प्राप्त की। 16 वीं शताब्दी में, त्रिपोलिटानिया और साइरेनाका दोनों नाममात्र रूप से तुर्क साम्राज्य का हिस्सा बन गए।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लीबिया एक रेगिस्तानी लड़ाई का दृश्य था। 23 जनवरी, 1943 को त्रिपोली के पतन के बाद, यह सहयोगी प्रशासन के अधीन आया। 1949 में, संयुक्त राष्ट्र ने मतदान किया कि लीबिया स्वतंत्र होना चाहिए, और 1951 में यह लीबिया यूनाइटेड किंगडम बन गया। 1958 में गरीब देश में तेल की खोज हुई और अंततः इसकी अर्थव्यवस्था में बदलाव आया।

इस राष्ट्र में निम्न लिखित प्रान्त है-

लीबिया में लगभग 97% आबादी मुसलमान हैं, जिनमें से अधिकतर सुन्नी शाखा से संबंधित हैं। इबादी मुसलमानों और अहमदीयो की छोटी संख्या देश में रहती है।. जिसके बाद ईसाई, बुद्ध, यहूदी धर्मो के अनुयायी एक अल्पशंकयक के रूप में निवास करते है।




#Article 80: मलेशिया (1000 words)


मलेशिया दक्षिण पूर्व एशिया में स्थित एक उष्णकटिबंधीय देश है। यह दक्षिण चीन सागर से दो भागों में विभाजित है। मलय प्रायद्वीप पर स्थित मुख्य भूमि के पश्चिम तट पर मलक्का जलडमरू और इसके पूर्व तट पर दक्षिण चीन सागर है। देश का दूसरा हिस्सा, जिसे कभी-कभी पूर्व मलेशिया के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण चीन सागर में बोर्नियो द्वीप के उत्तरी भाग पर स्थित है। मलय प्रायद्वीप पर स्थित कुआलालंपुर देश की राजधानी है, लेकिन हाल ही में संघीय राजधानी को खासतौर से प्रशासन के लिए बनाए गए नए शहर पुत्रजया में स्थानांतरित कर दिया गया है। यह 13 राज्यों से बनाया गया एक एक संघीय राज्य है।

मलेशिया में चीनी, मलय और भारतीय जैसे विभिन्न जातीय समूह निवास करते हैं। यहाँ की आधिकारिक भाषा मलय है, लेकिन शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में ज्यादातर अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाता है। मलेशिया में १३० से ज्यादा बोलियाँ बोली जाती हैं, इनमें से ९४ मलेशियाई बोर्नियो में और ४० प्रायद्वीप में बोली जाती हैं,युवा वर्ग मे अंग्रेजी भाषा अधिक लोकप्रिय है। यद्यपि देश सरकारी धर्म इस्लाम है, लेकिन नागरिकों को अन्य धर्मों को मानने की स्वतंत्रता है।

मलेशिया, चीन और भारत के बीच प्राचीन काल से व्यापारिक केंद्र था। जब यूरोपीय लोग इस क्षेत्र में आए तो उन्होंने मलक्का को महत्वपूर्ण व्यापार बंदरगाह बनाया। कालांतर में मलेशिया ब्रिटिश साम्राज्य का एक उपनिवेश बन गया। इसका प्रायद्वीपीय भाग ३१ अगस्त १९५७ को फेडरेशन मलाया के रूप में स्वतंत्र हुआ। १९६३ में मलाया, सिंगापुर और बोर्नियो हिस्से साथ मिलकर मलेशिया बन गए। १९६५ सिंगापुर अलग होकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।

मलेशिया 13 राज्य हैं और तीन संघीय प्रदेश है। मलेशिया का प्रमुख यांग डी-पेर्तुआन अगांग के रूप में जाना जाता है, जिसे सामान्यतः मलेशिया का राजा कहा जाता है। यह पदवी वर्तमान में सुल्तान मिज़ान जैनुल अबीदीन धारण किए हुए हैं। मलेशिया में शासन के प्रमुख प्रधानमंत्री हैं। मलेशिया आसियान का सदस्य है। इसकी अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है और यह दक्षिण पूर्व एशिया में एक अपेक्षाकृत समृद्ध देश है। देश के प्रमुख शहरों में कुआलालंपुर, जॉर्ज टाउन, ईपोह और जोहोर बाहरु हैं।

मलेशिया में मलय और सम्बन्धित जातियों का बाहुल्य है और सन् 2012 में जनसंख्या में उनका हिस्सा 67% मापा गया था। लेकिन साबाह में यह केवल 26% और सारावाक में केवल 21% था। क्षेत्रफल में मुख्यभूमि मलेशिया (जो पश्चिमी मलेशिया भी कहलाता है) देश के कुल क्षेत्रफल का केवल 40% है, जबकि साबाह-सारावाक 60% है, लेकिन मुख्यभूमि का जन-घनत्व साबाह-सारावाक से बहुत अधिक है। मलेशिया की सरकार पर आरोप है कि वह जातीयता बदलने के लिए मुख्यभूमि से साबाह व सारावाक में मलय लोग भेज रही है, जिस से अलगाववादी भावना भड़कती है। साबाह सारावाक केलुआर मलेशिया जैसे संगठन साबाह और सारावाक को मलेशिया से स्वतंत्र करवाने का प्रयास कर रहे हैं।

मलेशिया एक बहु धार्मिक समाज है और मलेशिया में प्रमुख धर्म इस्लाम है। २०१० में सरकार की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, यहां के प्रमुख धर्मावलंबियों में मुस्लिम (६१.३%), बौद्ध (१९.८%), ईसाई (९.२%), हिंदू (६.३%) और कन्फ्यूशीवाद, ताओ धर्म और अन्य पारंपरिक चीनी धर्मों (१.३%), शामिल हैं।

मलेशिया एक बहु जातीय, बहु सांस्कृतिक और बहुभाषी समाज है, जहां मलय और अन्य देशी जनजाति ६५%, चीनी 25% और 7% भारतीय शामिल है। देश की बहुसंख्यक समुदाय के रूप में सभी मलय मुस्लिम हैं, क्योंकि मलेशियाई कानून के तहत मलय होने के लिए मुस्लिम होना जरूर है। मलय राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं और इनकी भूमिपुत्र के रूप में पहचान होती है। उनकी मूल भाषा मलय (Bahasa Melayu) है।

कुआलालम्पुर शहर में सड़कों का जाल बिछा हुआ है। सब कुछ इतना सुनियोजित है कि आगंतुक को कोई दिक्कत नहीं होती। शहर को जानने के लिए सबसे पहली जगह है इस्ताना निगारा। यह मलेशिया के राजा के रहने का स्थान है। इसके अलावा शहर की पहचान पेट्रोनस जुड़वा मीनार से भी है, जो कुआलालम्पुर शहर में कहीं से भी थोड़ी सी ऊँचाई से नजर आ जाते हैं। 451.9 मीटर ऊँचे इन टॉवर्स में 86 मंजिलें हैं, परंतु पर्यटकों को 41वीं मंजिल पर स्थित पुल तक जाने दिया जाता है। इसके लिए कोई भी शुल्क नहीं लिया जाता और एक दिन में निश्चित संख्या में ही पर्यटक जा सकते हैं। पेट्रोनस टॉवर्स के पास ही कुआलालम्पुर सिटी सेन्टर पार्क बनाया गया है, जिसमें 1900 से ज्यादा पॉम के पेड़ लगाए गए हैं। इसके अलावा केएल टॉवर, केएलसीसी एक्वेरियम देखने लायक हैं। पाँच हजार स्के.फुट में फैले इस एक्वेरियम में 150 तरह की मछलियाँ हैं। इसमें एक 90 मीटर की टनल भी है, जिसमें ऐसा एहसास होता है कि आप समुद्र के भीतर से ही इन्हें देख रहे हैं। इसके अलावा नेशनल प्लेनेटोरियम, आर्किड पार्क, बटरफ्लाई पार्क आदि भी काफी खूबसूरत हैं।

कुआलालम्पुर में शॉपिंग करने के लिए काफी सारे मॉल्स हैं। 3450000 स्के. फुट में फैले बरजाया टाइम स्क्वेअर मॉल मलेशिया का सबसे बड़ा मॉल है। इसमें विश्व के सर्वश्रेष्ठ ब्रांड्स उपलब्ध हैं।
यहाँ के कुछ छोटे मॉल्स में मोल-भाव भी किया जा सकता है। सन वे सिटी होटल में स्थित वॉटर पार्क काफी बड़ा है। इसके पास ही लगा हुआ मॉल छः मंजिला है तथा इसमें आईस स्केटिंग करने की व्यवस्था भी है।

मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर है, परंतु बढ़ती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कुआलालम्पुर से आधे घंटे की दूरी पर प्रशासनिक राजधानी पुत्रजया को बनाया गया है। यह इतनी भव्य है कि इसे देखकर सहसा विश्वास नहीं होता कि कोई भी सरकारी काम इतने कम समय में कैसे पूर्ण हो सकता है। यहाँ झील भी बनाई गई है और आधुनिक सुविधाओं से लैसे बहुत बड़े कन्वेशन सेंटर भी हैं।

सरकारी कर्मचारियों के रहने के लिए झील के किनारे मकान बनाए गए हैं तो प्रधानमंत्री कार्यालय भी काफी खूबसूरत है। धीरे-धीरे यहाँ विभिन्न देशों के दूतावास भी बनाए जा रहे हैं। सम्पूर्ण पुत्रजया घूमने के लिए क्रुज यात्रा काफी अच्छी सुविधाजनक है।

कैमरुन हाईलैंड्स से 5 घंटे का सफर तय कर कुवाला कैद्दाह पहुँचा जा सकता है। यहाँ से लंकावी आईलैंड लगभग डेढ़ घंटे की दूरी पर है। यह सफर फैरी से तय करना पड़ता है। फैरी सम्पूर्ण सुविधायुक्त होती है तथा इसमें बाकायदा फिल्म दिखाने की व्यवस्था होती है। लंकावी ड्यूटी फ्री आईलैंड है।




#Article 81: पृथ्वी (3655 words)


पृथ्वी( अर्थ(Earth), टेरा(Terra)) सौरमंडल का एक ग्रह है  जिसे विश्व (The World) भी कहा जाता है। यह दूरी के आधार पर सूर्य से तीसरा ग्रह है। यह एक ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन पाया जाता है।  इसकी सतह का ७१ प्रतिशत भाग जल से तथा ७१ प्रतिशत  भाग भूमि से ढका हुआ है। इसकी सतह विभिन्न प्लेटों से बनी हुए है। इस पर पानी तीनो अवस्थाओं में पाया जाता है। इसके दोनों ध्रुवों पर बर्फ की एक मोटी परत है।

रेडियोमेट्रिक डेटिंग अनुमान और अन्य सबूतों के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति 4.54 अरब साल पहले हुई थी। पृथ्वी के इतिहास के पहले अरब वर्षों के भीतर जीवों का विकास महासागरों में हुआ और पृथ्वी के वायुमंडल और सतह को प्रभावित करना शुरू कर दिया जिससे एनारोबिक और बाद में, एरोबिक जीवों का प्रसार हुआ। कुछ भूगर्भीय साक्ष्य इंगित करते हैं कि जीवन का आरंभ 4.1 अरब वर्ष पहले हुआ होगा। पृथ्वी पर जीवन के विकास के दौरान जैवविविधता का अत्यंत विकास हुआ। हजारों प्रजातियां लुप्त होती गयी और हजारों नई प्रजातियां उत्पन्न हुई। इसी क्रम में पृथ्वी पर रहने वाली 99% से अधिक प्रजातियां विलुप्त हैं। सूर्य से उत्तम दूरी, जीवन के लिए उपयुक्त जलवायु और तापमान ने जीवों में विविधता को बढ़ाया।

पृथ्वी का वायुमंडल कई परतों से बना हुआ है। नाइट्रोजन और ऑक्सीजन की मात्रा सबसे अधिक है। वायुमंडल में ओजोन गैस की एक परत है जो सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकती है। वायुमंडल के घने होने से इस सूर्य का प्रकाश कुछ मात्रा में प्रवर्तित हो जाता है जिससे इसका तापमान नियंत्रित रहता है। अगर कोई उल्कापिंड पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जाता है तो वायु के घर्षण के कारण या तो जल कर नष्ट हो जाता है या छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाता है।

पृथ्वी की ऊपरी सतह कठोर है। यह पत्थरों और मृदा से बनी है। पृथ्वी का भूपटल कई कठोर खंडों या विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है जो भूगर्भिक इतिहास के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान को विस्थापित हुए हैं। इसकी सतह पर विशाल पर्वत, पठार, महाद्वीप, द्वीप, नदियां, समुद्र आदि प्राकृतिक सरंचनाएं है। पृथ्वी की आतंरिक रचना तीन प्रमुख परतों में हुई है भूपटल, भूप्रावार और क्रोड। इसमें से बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है और एक ठोस लोहे और निकल के आतंरिक कोर के साथ क्रिया करके पृथ्वी मे चुंबकत्व या चुंबकीय क्षेत्र को पैदा करता है। पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र विभिन्न प्रकार के आवेशित कणों को प्रवेश से रोकता है। 

पृथ्वी सूर्य से लगभग १५ करोड़ किलोमीटर दूर स्थित है। दूरी के आधार पर यह सूर्य से तीसरा ग्रह है। यह सौरमंडल का सबसे बड़ा चट्टानी पिंड है। पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर ३६५ दिनों में पूरा करती है। पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर ३६५ दिनों में पूरा करती है। यह अपने अक्ष पर लम्बवत २३.५ डिग्री झुकी हुई है। इसके कारण इस पर विभिन्न प्रकार के मौसम आते हैं। अपने अक्ष पर यह २४ घंटे में एक चक्कर पूरा करती है जिससे इस पर दिन और रात होती है। चन्द्रमा के पृथ्वी के निकट होने के कारण यह पृथ्वी पर मौसम के लिए उत्तरदायी है। इसके आकर्षण के कारण इस पर ज्वार-भाटे उत्पन्न होता है। चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है।

पृथ्वी अथवा पृथिवी एक संस्कृत शब्द हैं जिसका अर्थ  एक विशाल धरा निकलता हैं। एक अलग पौराणिक कथा के अनुसार, महाराज पृथु के नाम पर इसका नाम पृथ्वी रखा गया। इसके अन्य नामो में- धरा, भूमि, धरित्री, रसा, रत्नगर्भा इत्यादि सम्मलित हैं। अन्य भाषाओ इसे जैसे- अंग्रेजी में अर्थ(Earth) और लातिन भाषा में टेरा (Terra) कहा जाता हैं। हालकि सभी नामो में इसका अर्थ लगभग सामान ही रहा हैं।

पृथ्वी की आकृति अंडाकार है। घुमाव के कारण, पृथ्वी भौगोलिक अक्ष में चिपटा हुआ और भूमध्य रेखा के आसपास उभार लिया हुआ प्रतीत होता है। भूमध्य रेखा पर पृथ्वी का व्यास, अक्ष-से-अक्ष के व्यास से 43 किलोमीटर (27 मील) ज्यादा बड़ा है। इस प्रकार पृथ्वी के केंद्र से सतह की सबसे लंबी दूरी , इक्वाडोर के भूमध्यवर्ती चिंबोराज़ो ज्वालामुखी का शिखर तक की है। इस प्रकार पृथ्वी का औसत व्यास 12,742 किलोमीटर (7, 918 मील) है। कई जगहों की स्थलाकृति इस आदर्श पैमाने से अलग नजर आती हैं हालांकि वैश्विक पैमाने पर यह पृथ्वी के त्रिज्या की तुलना नजरअंदाज ही दिखाई देता है: सबसे अधिकतम विचलन 0.17% का मारियाना गर्त (समुद्रीस्तर से 10,911 मीटर (35,797 फुट) नीचे) में है, जबकि माउंट एवरेस्ट (समुद्र स्तर से 8,848 मीटर (29,029 फीट) ऊपर) 0.14% का विचलन दर्शाता है। यदि पृथ्वी, एक बिलियर्ड गेंद के आकार में सिकुड़ जाये तो, पृथ्वी के कुछ क्षेत्रों जैसे बड़े पर्वत श्रृंखलाएं और महासागरीय खाईयाँ , छोटे खाइयों की तरह महसूस होंगे, जबकि ग्रह का अधिकतर भू-भाग, जैसे विशाल हरे मैदान और सूखे पठार आदि, चिकने महसूस होंगे.

पृथ्वी की रचना में निम्नलिखित तत्वों का योगदान है 
 

 
धरती का घनत्व पूरे सौरमंडल मे सबसे ज्यादा है।
बाकी चट्टानी ग्रह की संरचना कुछ अंतरो के साथ पृथ्वी के जैसी ही है। चन्द्रमा का केन्द्रक छोटा है, बुध का केन्द्र उसके कुल आकार की तुलना मे विशाल है, मंगल और चंद्रमा का मैंटल कुछ मोटा है, चन्द्रमा और बुध मे रासायनिक रूप से भिन्न भूपटल नही है, सिर्फ पृथ्वी का अंत: और बाह्य मैंटल परत अलग है। ध्यान दे कि ग्रहो (पृथ्वी भी) की आंतरिक संरचना के बारे मे हमारा ज्ञान सैद्धांतिक ही है।

पृथ्वी की आतंरिक संरचना शल्कीय अर्थात परतों के रूप में है जैसे प्याज के छिलके परतों के रूप में होते हैं। इन परतों की मोटाई का सीमांकन रासायनिक विशेषताओं अथवा यांत्रिक विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है। यांत्रिक लक्षणों के आधार पर पृथ्वी, स्थलमण्डल, दुर्बलता मण्डल, मध्यवर्ती आवरण, बाह्य सत्व(कोर) और आतंरिक सत्व(कोर) से बना हुआ हैं। रासायनिक संरचना के आधार पर इसे भूपर्पटी, ऊपरी आवरण, निचला आवरण, बाहरी सत्व(कोर) और आतंरिक सत्व(कोर) में बाँटा गया है।

पृथ्वी की ऊपरी परत भूपर्पटी एक ठोस परत है, मध्यवर्ती आवरण अत्यधिक गाढ़ी परत है और बाह्य सत्व(कोर) तरल तथा आतंरिक सत्व(कोर) ठोस अवस्था में है। आंतरिक सत्व(कोर) की त्रिज्या, पृथ्वी की त्रिज्या की लगभग पांचवां हिस्सा है।

पृथ्वी के अंतरतम की यह परतदार संरचना भूकंपीय तरंगों के संचलन और उनके परावर्तन तथा प्रत्यावर्तन पर आधारित है जिनका अध्ययन भूकंपलेखी के आँकड़ों से किया जाता है। भूकंप द्वारा उत्पन्न प्राथमिक एवं द्वितीयक तरंगें पृथ्वी के अंदर स्नेल के नियम के अनुसार प्रत्यावर्तित होकर वक्राकार पथ पर चलती हैं। जब दो परतों के बीच घनत्व अथवा रासायनिक संरचना का अचानक परिवर्तन होता है तो तरंगों की कुछ ऊर्जा वहाँ से परावर्तित हो जाती है। परतों के बीच ऐसी जगहों को दरार कहते हैं।

पृथ्वी की आतंरिक संरचना के बारे में जानकारी का स्रोतों को दो हिस्सों में विभक्त किया जा सकता है। प्रत्यक्ष स्रोत, जैसे ज्वालामुखी से निकले पदार्थो का अध्ययन, वेधन से प्राप्त आंकड़े इत्यादि, कम गहराई तक ही जानकारी उपलब्ध करा पते हैं। दूसरी ओर अप्रत्यक्ष स्रोत के रूप में भूकम्पीय तरंगों का अध्ययन अधिक गहराई की विशेषताओं के बारे में जानकारी देता है।

पृथ्वी की आंतरिक गर्मी, अवशिष्ट गर्मी के संयोजन से आती है ग्रहों में अनुवृद्धि से (लगभग 20%) और रेडियोधर्मी क्षय के माध्यम से (80%) ऊष्मा उत्पन्न होती हैं। पृथ्वी के भीतर, प्रमुख ताप उत्पादक समस्थानिक (आइसोटोप) में पोटेशियम-40, यूरेनियम-238 और थोरियम-232 सम्मलित है। पृथ्वी के केंद्र का तापमान 6,000 डिग्री सेल्सियस (10,830 डिग्री फ़ारेनहाइट) तक हो सकता है, और दबाव 360 जीपीए तक पहुंच सकता है। क्योंकि सबसे अधिक गर्मी रेडियोधर्मी क्षय द्वारा उत्पन्न होती है, वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि पृथ्वी के इतिहास की शुरुआत में, कम या आधा-जीवन के समस्थानिक के समाप्त होने से पहले, पृथ्वी का ऊष्मा उत्पादन बहुत अधिक था। धरती से औसतन ऊष्मा का क्षय 87 एमडब्ल्यू एम -2 है, वही वैश्विक ऊष्मा का क्षय 4.42×1013 डब्ल्यू हैं। कोर की थर्मल ऊर्जा का एक हिस्सा मेंटल प्लम्स द्वारा पृष्ठभागो की ओर ले जाया जाता है, इन प्लम्स से प्रबल ऊर्जबिंदु तथा असिताश्म बाढ़ का निर्माण होता है। ऊष्माक्षय का अंतिम प्रमुख माध्यम लिथोस्फियर से प्रवाहकत्त्व के माध्यम से होता है, जिसमे से अधिकांश महासागरों के नीचे होता है क्योंकि यहाँ भु-पपर्टी, महाद्वीपों की तुलना में बहुत पतली होती है।

पृथ्वी का कठोर भूपटल कुछ ठोस प्लेटो मे विभाजित है जो निचले द्रव मैंटल पर स्वतण्त्र रूप से बहते रहते है, जिन्हें विवर्तनिक प्लेटें कहते है। ये प्लेटें, एक कठोर खंड की तरह हैं जोकि परस्पर तीन प्रकार की सीमाओं से एक दूसरे की ओर बढ़ते हैं: अभिसरण सीमाएं, जिस पर दो प्लेटें एक साथ आती हैं, , जिस पर दो प्लेटें अलग हो जाती हैं, और सीमाओं को बदलना, जिसमें दो प्लेटें एक दूसरे के ऊपर-नीचे स्लाइड करती हैं। इन प्लेट सीमाओं पर भूकंप, ज्वालामुखीय गतिविधि, पहाड़-निर्माण, और समुद्री खाई का निर्माण हो सकता है।

जैसे ही विवर्तनिक प्लेटों स्थानांतरित होती हैं, अभिसरण सीमाओं पर महासागर की परत किनारों के नीचे घटती जाती है। उसी समय, भिन्न सीमाएं से ऊपर आने का प्रयास करती मेन्टल पदार्थ, मध्य-समुद्र में उभार बना देती है। इन प्रक्रियाओं के संयोजन से समुद्र की परत फिर से मेन्टल में पुनर्नवीनीकरण हो जाती हैं। इन्हीं पुनर्नवीनीकरण के कारण, अधिकांश समुद्र की परत की उम्र 100 मेगा-साल से भी कम हैं। सबसे पुराना समुद्री परत पश्चिमी प्रशांत सागर में स्थित है जिसकी अनुमानित आयु 200 मेगा-साल है।

(वर्तमान में) आठ प्रमुख प्लेट:

पृथ्वी की कुल सतह क्षेत्र लगभग 510 मिलियन किमी2 (197 मिलियन वर्ग मील) है। जिसमे से 70.8%, या 361.13 मिलियन किमी2 (139.43 मिलियन वर्ग मील) क्षेत्र समुद्र तल से नीचे है और जल से भरा हुआ है। महासागर की सतह के नीचे महाद्वीपीय शेल्फ का अधिक हिस्सा है, महासागर की सतह, महाद्वीपीय शेल्फ, पर्वत, ज्वालामुखी, समुद्री खंदक, समुद्री-तल दर्रे, महासागरीय पठार, अथाह मैदानी इलाके, और मध्य महासागर रिड्ज प्रणाली से बहरी पड़ी हैं। शेष 29.2% (148.94 मिलियन किमी2, या 57.51 मिलियन वर्ग मील) जोकि पानी से ढंका हुआ नहीं है, जगह-जगह पर बहुत भिन्न है और पहाड़ों, रेगिस्तान, मैदानी, पठारों और अन्य भू-प्राकृतिक रूप में बटा हुआ हैं। भूगर्भीय समय पर धरती की सतह को लगातार नयी आकृति प्रदान करने वाली प्रक्रियाओं में विवर्तनिकी और क्षरण, ज्वालामुखी विस्फोट, बाढ़, अपक्षय, हिमाच्छेद, प्रवाल भित्तियों का विकास, और उल्कात्मक प्रभाव इत्यादि सम्मलित हैं।

महाद्वीपीय परत, कम घनत्व वाली सामग्री जैसे कि अग्निमय चट्टानों ग्रेनाइट और एंडसाइट के बने होते हैं। वही बेसाल्ट प्रायः काम पाए जाने वाला, एक सघन ज्वालामुखीय चट्टान हैं जोकि समुद्र के तल का मुख्य घटक है। अवसादी शैल, तलछट के संचय बनती है जोकि एक साथ दफन और समेकित हो जाती है।
 
महाद्वीपीय सतहों का लगभग 75% भाग अवसादी शैल से ढका हुआ हैं, हालांकि यह सम्पूर्ण भू-पपटल का लगभग 5% हिस्सा ही हैं। पृथ्वी पर पाए जाने वाले चट्टानों का तीसरा रूप कायांतरित शैल है, जोकि पूर्व-मौजूदा शैल के उच्च दबावों, उच्च तापमान या दोनों के कारण से परिवर्तित होकर बनता है। पृथ्वी की सतह पर प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले सिलिकेट खनिजों में स्फटिक, स्फतीय (फेल्डस्पर्स), एम्फ़िबोले, अभ्रक, प्योरॉक्सिन और ओलिविइन शामिल हैं। आम कार्बोनेट खनिजों में कैल्साइट (चूना पत्थर में पाए जाने वाला) और डोलोमाइट शामिल हैं।

भूमि की सतह की ऊंचाई, मृत सागर में सबसे कम -418 मीटर, और माउंट एवरेस्ट के शीर्ष पर सबसे अधिक 8,848 मीटर है। समुद्र तल से भूमि की सतह की औसत ऊंचाई 840 मीटर है। पेडोस्फीयर पृथ्वी की महाद्वीपीय सतह की सबसे बाहरी परत है और यह मिट्टी से बना हुआ है तथा मिट्टी के गठन की प्रक्रियाओं के अधीन है। कुल कृषि योग्य भूमि, भूमि की सतह का 10.9% हिस्सा है, जिसके 1.3% हिस्से पर स्थाईरूप से फसलें ली जाती हैं। धरती की 40% भूमि की सतह का उपयोग चारागाह और कृषि के लिए किया जाता है।

पृथ्वी की सतह पर पानी की बहुतायत एक अनोखी विशेषता है जो सौर मंडल के अन्य ग्रहों से इस नीले ग्रह को अलग करती है। पृथ्वी के जलमंडल में मुख्यतः महासागर हैं, लेकिन तकनीकी रूप से दुनिया में उपस्थित अन्य जल के स्रोत जैसे: अंतर्देशीय समुद्र, झीलों, नदियों और 2,000 मीटर की गहराई तक भूमिगत जल सहित इसमें शामिल हैं। पानी के नीचे की सबसे गहरी जगह 10,911.4 मीटर की गहराई के साथ, प्रशांत महासागर में मारियाना ट्रेंच की चैलेंजर डीप है।

महासागरों का द्रव्यमान लगभग 1.35×1018 मीट्रिक टन या पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का 1/4400 हिस्सा है। महासागर औसतन 3682 मीटर की गहराई के साथ, 3.618×108 किमी2 का क्षेत्रफल में फैला हुआ है, जिसकी अनुमानित मात्रा 1.332 ×109 किमी3 हो सकती है। यदि सभी पृथ्वी की उबड़-खाबड़ सतह यदि एक समान चिकने क्षेत्र में के रूप में हो तो, महासागर की गहराई 2.7 से 2.8 किमी होगी। लगभग 97.5% पानी खारा है; शेष 2.5% ताजा पानी है, अधिकतर ताजा पानी, लगभग 68.7%, बर्फ के पहाड़ो और ग्लेशियरों के बर्फ के रूप में मौजूद है।

पृथ्वी के महासागरों की औसत लवणता लगभग 35 ग्राम नमक प्रति किलोग्राम समुद्री जल (3.5% नमक) होती है। ये नमक अधिकांशत: ज्वालामुखीय गतिविधि से निकालकर या शांत अग्निमय चट्टानों से निकल कर सागर में मिलते हैं। महासागर विघटित वायुमंडलीय गैसों के लिए एक भंडारण की तरह भी है, जो कई जलीय जीवन के अस्तित्व के लिए अति आवश्यक हैं। समुद्रीजल विश्व के जलवायु के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है, यह एक बड़े ऊष्मा संग्रह की तरह कार्य करता हैं। समुद्री तापमान वितरण में बदलाव, मौसम बदलाव में गड़बड़ी का कारण हो सकता हैं, जैसे; एल नीनो।

पृथ्वी के वातावरण मे ७७% नायट्रोजन, २१% आक्सीजन, और कुछ मात्रा मे आर्गन, कार्बन डाय आक्साईड और जल बाष्प है। पृथ्वी पर निर्माण के समय कार्बन डाय आक्साईड की मात्रा ज्यादा रही होगी जो चटटानो मे कार्बोनेट के रूप मे जम गयी, कुछ मात्रा मे सागर द्वारा अवशोषित कर ली गयी, शेष कुछ मात्रा जीवित  प्राणियो द्वारा प्रयोग मे आ गयी होगी। प्लेट टेक्टानिक और जैविक गतिविधी कार्बन डाय आक्साईड का थोड़ी मात्रा का उत्त्सर्जन और अवशोषण करते रहते है। कार्बनडाय आक्साईड पृथ्वी के सतह का तापमान का ग्रीन हाउस प्रभाव द्वारा नियंत्रण करती है। ग्रीन हाउस प्रभाव द्वारा पृथ्वी सतह का तापमान ३५ डीग्री सेल्सीयस होता है अन्यथा वह -२१ डीग्री सेल्सीयस से १४ डीग्री सेल्सीयस रहता; इसके ना रहने पर समुद्र जम जाते और जीवन  असंभव हो जाता। जल बाष्प भी एक आवश्यक ग्रीन हाउस गैस है।

रासायनिक दृष्टि  से मुक्त आक्सीजन भी आवश्यक है। सामान्य परिस्थिती मे आक्सीजन विभिन्न तत्वो से क्रिया कर विभिन्न यौगिक बनाती है। पृथ्वी के वातावरण मे आक्सीजन का निर्माण और नियंत्रण विभिन्न जैविक प्रक्रियाओ से होता है। जीवन के बिना मुक्त आक्सीजन संभव नही है।

पृथ्वी के वायुमंडल की कोई निश्चित सीमा नहीं है, यह आकाश की ओर धीरे-धीरे पतला होता जाता है और बाह्य अंतरिक्ष में लुप्त हो जाता है। वायुमंडल के द्रव्यमान का तीन-चौथाई हिस्सा, सतह से 11 किमी (6.8 मील) के भीतर ही निहित है। सबसे निचले परत को ट्रोफोस्फीयर कहा जाता है। सूर्य की ऊर्जा से यह परत ओर इसके नीचे तपती है, और जिसके कारण हवा का विस्तार होता हैं। फिर यह कम-घनत्व वाली वायु ऊपर की ओर जाती है और एक ठण्डे, उच्च घनत्व वायु में प्रतिस्थापित हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप ही वायुमंडलीय परिसंचरण बनता है जो तापीय ऊर्जा के पुनर्वितरण के माध्यम से मौसम और जलवायु को चलाता है। 

प्राथमिक वायुमंडलीय परिसंचरण पट्टी, 30° अक्षांश से नीचे के भूमध्य रेखा क्षेत्र में और 30° और 60° के बीच मध्य अक्षांशों में पच्छमी हवा की व्यापारिक पवन से मिलकर बने होते हैं। 
जलवायु के निर्धारण करने में महासागरीय धारायें भी एक महत्वपूर्ण कारक हैं, विशेष रूप से थर्मोहेलिन परिसंचरण, जो भूमध्यवर्ती महासागरों से ध्रुवीय क्षेत्रों तक थर्मल ऊर्जा वितरित करती है। 

सतही वाष्पीकरण से उत्पन्न जल वाष्प परिसंचरण तरीको द्वारा वातावरण में पहुंचाया जाता है। जब वायुमंडलीय स्थितियों के कारण गर्म, आर्द्र हवा ऊपर की ओर जाती है, तो यह वाष्प सघन हो वर्षा के रूप में पुनः सतह पर आ जाती हैं। तब अधिकांश पानी, नदी प्रणालियों द्वारा नीचे की ओर ले जाया जाता है और आम तौर पर महासागरों या झीलों में जमा हो जाती है। यह जल चक्र भूमि पर जीवन हेतु एक महत्वपूर्ण तंत्र है, और कालांतर में सतही क्षरण का एक प्राथमिक कारक है। वर्षा का वितरण व्यापक रूप से भिन्न हैं, कही पर कई मीटर पानी प्रति वर्ष तो कही पर एक मिलीमीटर से भी कम वर्षा होती हैं। वायुमंडलीय परिसंचरण, स्थलाकृतिक विशेषताएँ और तापमान में अंतर, प्रत्येक क्षेत्र में औसत वर्षा का निर्धारण करती है।

बढ़ते अक्षांश के साथ पृथ्वी की सतह तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा कम होते जाती है। उच्च अक्षांशों पर, सूरज की रोशनी निम्न कोण से सतह तक पहुँचती है, और इसे वातावरण के मोटे क़तार के माध्यम से गुजरना होता हैं। परिणामस्वरूप, समुद्री स्तर पर औसत वार्षिक हवा का तापमान, भूमध्य रेखा की तुलना में अक्षांशो में लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस (0.7 डिग्री फारेनहाइट) प्रति डिग्री कम होता है। पृथ्वी की सतह को विशिष्ट अक्षांशु पट्टी में, लगभग समरूप जलवायु से विभाजित किया जा सकता है। भूमध्य रेखा से लेकर ध्रुवीय क्षेत्रों तक, ये उष्णकटिबंधीय (या भूमध्य रेखा), उपोष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण और ध्रुवीय जलवायु में बटा हुआ हैं। 

इस अक्षांश के नियम में कई विसंगतियां हैं:

पृथ्वी का अपना चुंबकिय क्षेत्र है जो कि बाह्य केन्द्रक के विद्युत प्रवाह से निर्मित होता है। सौर वायू, पृथ्वी के चुंबकिय क्षेत्र और उपरी वातावरण मीलकर औरोरा बनाते है। इन सभी कारको मे आयी अनियमितताओ से पृथ्वी के चुंबकिय ध्रुव गतिमान रहते है, कभी कभी विपरित भी हो जाते है।
पृथ्वी का चुंबकिय क्षेत्र और सौर वायू मीलकर वान एण्डरसन विकिरण पट्टा बनाते है, जो की प्लाज्मा से बनी हुयी डोनट आकार के छल्लो की जोड़ी है जो पृथ्वी के चारो की वलयाकार मे है। बाह्य पट्टा १९००० किमी से ४१००० किमी तक है जबकि अतः पट्टा १३००० किमी से ७६०० किमी तक है।

सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी की परिक्रमण अवधि (सौर दिन) 86,400 सेकेंड (86,400.0025 एसआई सेकंड) का होता है। अभी पृथ्वी में सौर दिन, 19वीं शताब्दी की अपेक्षा प्रत्येक दिन 0 और 2 एसआई एमएस अधिक लंबा होता हैं जिसका कारण ज्वारीय मंदी का होना माना जाता हैं।

स्थित सितारों के सापेक्ष पृथ्वी की परिक्रमण अवधि, जिसे अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी परिक्रमण और संदर्भ सिस्टम सेवा (आईआईएस) द्वारा एक तारकीय दिन भी कहा जाता है, औसत सौर समय (यूटी1) 86,164.0989091 सेकंड, या 23 घण्टे 56 मिनट और 4.098909191986 सेकेंड का होता है। वातावरण और निचली कक्षाओं के उपग्रहों के भीतर उल्काओं के अलावा, पृथ्वी के आकाश में आकाशीय निकायों का मुख्य गति पश्चिम की ओर 15 डिग्री/ घंटे = 15 '/ मिनट की दर से होती है।

धरती में ऐसे कई संसाधन हैं जिसका मनुष्यों द्वारा शोषण किया गया है अनवीकरणीय संसाधन जैसे कि जीवाश्म ईंधन, केवल भूवैज्ञानिक समय-कालों पर नवीनीकृत होते हैं। कोयला, पेट्रोलियम, और प्राकृतिक गैस आदि जीवाश्म ईंधन के बड़े भंडार पृथ्वी की सतह के अंदर से प्राप्त होते हैं। मनुष्यों द्वारा इन संशाधनो का उपयोग ऊर्जा उत्पादन तथा फीडस्टॉक के तौर पर रासायनिक उत्पादन के लिए किया जाता है। अयस्क उत्पत्ति की प्रक्रिया के माध्यम से खनिज अयस्क निकायों का भी निर्माण यही होता है, 

धरती में मनुष्य के लिए कई उपयोगी कई जैविक उत्पादों जैसे भोजन, लकड़ी, औषधि, ऑक्सीजन और कई जैविक अपशिष्टों के पुनर्चक्रण सहित का उत्पादन होता है, भूमि आधारित पारिस्थितिकी तंत्र, ऊपरी मिट्टी और ताजे पानी पर निर्भर करता है, और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र जमीन से बाह कर आये पोषक तत्वों पर निर्भर करता है। 1980 में, पृथ्वी की जमीन की सतह के 5,053 मिलियन हैक्टेयर (50.53 मिलियन किमी2) क्षेत्र पर जंगल थे, 6,788 मिलियन हैक्टेयर (67.88 मिलियन किमी2) पर घास के मैदान और चरागाह थे, और 1,501 मिलियन हैक्टेयर (15.01 मिलियन किमी2) क्षेत्र पर फसल उगाया जाता था। 1993 में सिंचित भूमि की अनुमानित क्षेत्र 2,481,250 वर्ग किलोमीटर (958,020 वर्ग मील) था। भवन निर्माण करके मनुष्य भी भूमि पर ही रहते हैं।

पृथ्वी की सतह का एक बड़ा क्षेत्र, चरम मौसम जैसे; उष्णकटिबंधीय चक्रवात, तूफ़ान, या आँधी के अधीन हैं जोकि उन क्षेत्रों में जीवन को प्रभावित करते है। 1980 से 2000 के बीच, इन घटनाओं के कारण औसत प्रति वर्ष 11,800 मानव मारे गए हैं। कई स्थान भूकंप, भूस्खलन, सूनामी, ज्वालामुखी विस्फोट, बवंडर, सिंकहोल, बर्फानी तूफ़ान, बाढ़, सूखा, जंगली आग, और अन्य आपदाओं के अधीन हैं।

कई स्थानीय क्षेत्रों में वायु एवं जल प्रदूषण, अम्ल वर्षा और जहरीले पदार्थ, फसल का नुकसान (अत्यधिक चराई, वनों की कटाई, मरुस्थलीकरण), वन्यजीवों की हानि, प्रजातियां विलुप्त होने, मिट्टी की क्षमता में गिरावट, मृदा अपरदन और क्षरण आदि मानव निर्मित हैं।

एक वैज्ञानिक सहमति है की भूमण्डलीय तापक्रम वृद्धि के लिए मानव गतिविधियाँ ही जिम्मेदार हैं, जैसे: औद्योगिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन। जिसके कारण ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों के पिघलने जैसे परिवर्तनों की भविष्यवाणी की गई है, अधिक चरम तापमान पर पर्वतमाला के बर्फो का पिघलना, मौसम में महत्वपूर्ण बदलाव और औसत समुद्री स्तरों में वैश्विक वृद्धि आदि सम्मलित हैं।

चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। यह सौरमंडल का पाचवाँ सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी का एक चौथाई तथा द्रव्यमान १/८१ है। बृहस्पति के उपग्रह lo के बाद चन्द्रमा दूसरा सबसे अधिक घनत्व वाला उपग्रह है। सूर्य के बाद आसमान में सबसे अधिक चमकदार निकाय चन्द्रमा है। समुद्री ज्वार और भाटा चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण आते है। चन्द्रमा की तात्कालिक कक्षीय दूरी, पृथ्वी के व्यास का ३० गुना है इसीलिए आसमान में सूर्य और चन्द्रमा का आकार हमेशा सामान नजर आता है। पृथ्वी के मध्य से चन्द्रमा के मध्य तक कि दूरी ३८४,४०३ किलोमीटर है। यह दूरी पृथ्वी कि परिधि के ३० गुना है। चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से १/६ है। यह पृथ्वी की परिक्रमा २७.३ दिन मे पूरा करता है और अपने अक्ष के चारो ओर एक पूरा चक्कर भी २७.३ दिन में लगाता है। यही कारण है कि हम हमेशा चन्द्रमा का एक ही पहलू पृथ्वी से देखते हैं। यदि चन्द्रमा पर खड़े होकर पृथ्वी को देखे तो पृथ्वी साफ़-साफ़ अपने अक्ष पर घूर्णन करती हुई नजर आएगी लेकिन आसमान में उसकी स्थिति सदा स्थिर बनी रहेगी अर्थात पृथ्वी को कई वर्षो तक निहारते रहो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं होगी। पृथ्वी- चन्द्रमा-सूर्य ज्यामिति के कारण चन्द्र दशा हर २९.५ दिनों में बदलती है।

पृथ्वी के करीब एक छोटा क्षुद्रग्रह 2006 आरएच120, हर बीस साल में पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली के लगभग करीब तक पहुच जाता है। इस दौरान, यह संक्षिप्त अवधि के लिए पृथ्वी की परिक्रमा करने लगता है।

जून 2016 तक, 1,419 मानव निर्मित उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं। वर्तमान में कक्षा में सबसे पुराना और निष्क्रिय उपग्रह वैनगार्ड 1, और 16,000 से अधिक अंतरिक्ष मलबे के टुकड़े भी घूम रहे हैं। पृथ्वी का सबसे बड़ा कृत्रिम उपग्रह, अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन है।




#Article 82: बीसवीं शताब्दी (150 words)


ग्रेगरी पंचांग (कलेंडर) के अनुसार ईसा की बीसवीं शताब्दी 1 जनवरी 1901 से 31 दिसम्बर 2000 तक मानी जाती है। कुछ इतिहासवेत्ता 1914 से 1992 तक को संक्षिप्त बीसवीं शती का नाम भी देते हैं।

(उन्नीसवी शताब्दी - बीसवी शताब्दी - इक्कीसवी शताब्दी - और शताब्दियाँ)

दशक: १९०० का दशक १९१० का दशक १९२० का दशक १९३० का दशक १९४० का दशक १९५० का दशक १९६० का दशक १९७० का दशक १९८० का दशक १९९० का दशक

समय के गुज़रने को रेकोर्ड करने के हिसाब से देखा जाये तो बीसवी शताब्दी वह शताब्दी थी जो १९०१ - २००० तक चली थी।

मनुष्य जाति के जीवन का लगभग हर पहलू बीसवी शताब्दी में बदल गया।

 में एक मुख्य शक्ति बन गयी जो पूरे विश्व में फ़ैली: पूर्वी युरोप, चीन, इन्डोचीन और क्यूबा। इससे पश्चिमी दुनिया जिसका नेतृत्व अमरीका ने किया उसके साथ ठंडा युद्ध हुआ। 

(मौत के आँकडों में गिनी गयी)




#Article 83: भोपाल (1366 words)


भोपाल भारत देश में मध्य प्रदेश राज्य की राजधानी है और भोपाल जिले का प्रशासनिक मुख्यालय भी है। भोपाल को राजा भोज की नगरी तथा 'झीलों की नगरी' कहा जाता है क्योंकि यहाँ कई छोटे-बड़े ताल हैं। यह शहर अचानक सुर्ख़ियों में तब आ गया जब १९८४ में अमरीकी कंपनी, यूनियन कार्बाइड से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव से लगभग बीस हजार लोग मारे गये थे।

भोपाल में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) का एक कारखाना है। हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ने अपना दूसरा 'मास्टर कंट्रोल फ़ैसिलटी' स्थापित की है। भोपाल में ही भारतीय वन प्रबंधन संस्थान भी है जो भारत में वन प्रबंधन का एकमात्र संस्थान है। साथ ही भोपाल उन छह नगरों में से एक है जिनमे २००३ में भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान खोलने का निर्णय लिया गया था तथा वर्ष २०१५ से यह कार्यशील है। इसके अतिरिक्त यहाँ अनेक विश्वविद्यालय राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय,बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय,अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय,मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय,माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय,भारतीय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय हैं। इसके अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय संस्थान जैसे मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भोपाल,भारतीय वन प्रबंधन संस्थान,भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान ,राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान इंजीनियरिंग महाविद्यालय, गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी तथा अनेक शासकीय एवं पब्लिक स्कूल हैं। भोपाल में कोलार, केरवा नदियां हैं। बेतवा नदी का उद्गम स्थल कोलार बांध के पास झिरी में है।

एक मान्यता के अनुसार भोपाल का प्राचीन नाम भूपाल था अर्थात् भूपाल, भू-पाल भू = भूमि, पाल=दूध। । एक दूसरा मत यह है कि इस शहर का नाम एक अन्य राजा भूपाल शाह के नाम पर पड़ा। 

भोपाल की स्थापना परमार राजा भोज ने १०००-१०५५ ईस्वी में की थी। उनके राज्य की राजधानी धार थी, जो अब मध्य प्रदेश का एक जिला है। शहर का पूर्व नाम 'भोजपाल' था जो भोज और पाल के संधि से बना था। परमार राजाओं के अस्त के बाद यह शहर कई बार लूट का शिकार बना। परमारों के बाद भोपाल शहर में अफ़गान सिपाही दोस्त मोहम्मद (1708-1740) का शासन रहा; इसलिये भोपाल को नवाबी शहर माना जाता है। मुगल साम्रज्य के विघटन का फ़ायदा उठाते हुए खान ने बेरासिया तहसील हड़प ली। कुछ समय बाद गोण्ड महारानी कमलापती की मदद करने के लिए खान को भोपाल गाँव भेंट किया गया। रानी की मौत के बाद खान ने छोटे से गोण्ड राज्य पर कब्ज़ा जमा लिया।

महारानी कमलापति जो की यह गौड़ महाराजा निजाम शाह की रानी थी । राजा निजाम शाह की मृत्यु हो जाने पर महारानी कमलापति ने राज्य की बागडोर संभाली। जिनके नाम आप आज भी भोपाल शहर के अंदर बड़े तालाब के पास उनकी स्मृति के रूप में कमला पार्क का निर्माण किया गया है।

१७२०-१७२६ के दौरान दोस्त मुहम्मद खान ने भोपाल गाँव की किलाबन्दी कर इसे एक शहर में तब्दील किया। साथ ही उन्होंने नवाब की पदवी अपना ली और इस तरह से भोपाल राज्य की स्थापना हुई। मुगल दरबार के सिद्दीकी बन्धुओं से दोस्ती के नाते खान ने हैदराबाद के निज़ाम मीर क़मर-उद-दीन (निज़ाम-उल-मुल्क) से दुश्मनी मोल ले ली। सिद्दीकी बन्धुओं से निपटने के बाद १७२३ में निज़ाम ने भोपाल पर हमला कर  दिया और दोस्त मुहम्मद खान को निज़ाम का आधिपत्य स्वीकार करना पड़ा।

मराठाओं ने भी भोपाल राज्य से चौथ (कुल लगान का चौथा हिस्सा) वसूली की। १७३७ में मराठाओं ने मुगलों को भोपाल की लड़ाई में मात दी। खान के उत्तराधिकारियों ने १८१८ में ब्रिटिश हुकुमत के साथ सन्धि कर ली और भोपाल राज्य ब्रिटिश राज की एक रियासत बन गया। १९४७ में जब भारत को आज़ादी मिली, तब भोपाल राज्य की वारिस आबिदा सुल्तान पाकिस्तान चली गईं। उनकी छोटी बहन बेगम साजिदा सुल्तान को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया। १ जून १९४९ में भोपाल राज्य का भारत में विलय हो गया।

भोपाल मेट्रो, भोपाल की एक निर्माणाधीन यातायात प्रणाली है। वर्तमान समय में भोपाल मेट्रो में दो मार्गों पर काम हो रहा है

लाइन २:
करोंद चौराहा - भोपाल टॉकीज - रेलवे स्टेशन - भारत टॉकीज - पुल बोगदा - सुभाष नगर अंडरपास - डीबी मॉल - बोर्ड ऑफिस चौराहा - हबीबगंज नाका - अलकापुरी बस स्टॉप - अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान

मार्ग की लम्बाई : १४. ९९  किमी 

लाइन ५:
डिपो चौराहा - जवाहर चौक - रोशनपुरा चौराहा - मिंटो हॉल - लिली टॉकीज़ - जिन्सी डिपो - बोगदा पुल - प्रभात चौराहा - अप्सरा टॉकीज - गोविंदपुरा इंडस्ट्रियल एरिया - जे के रोड - रत्नागिरी चौराहा

मार्ग की लम्बाई : १२ . ८८  किमी

भोपाल गैस काण्ड विस्तार में देखें।

भोपाल भारत के मध्य भाग में स्थित है और इसके निर्देशांक २३.२७º उ. एवं ७७.४º पू. हैं। यह विंध्य पर्वत श्रृंखला के पूर्व में है। भोपाल एक पहाड़ी इलाक़े पर स्थित है किंतु इसका तापमान अधिकतर गर्म रहता है। इसका भू-भाग ऊँचा-नीचा है एवं इसके दायरे में कई छोटे पहाड़ हैं। उदाहरण के लिए श्यामला हिल, ईदगाह हिल, अरेरा हिल, कतारा हिल इत्यादि। यहाँ गर्मियाँ गर्म और सर्दियाँ सामान्य ठण्डी रहती हैं। बारिश का मौसम जून से ले के सितंबर-आक्टोबर तक रहता है और सामान्य वर्षा दर्ज की जाती है। २०१९ मानसून में भोपाल में ४० वर्षों में सबसे अधिक वर्षा हुई है 

नगर निगम की सीमा २८९ वर्ग कि. मी. है। शहरी सीमा के भीतर दो मानव निर्मित झीलें है जो संयुक्त रूप से भोज स्थल के नाम से जानी जाती हैं। बड़ी झील राजा भोज द्वारा निर्मित करवाई गई थी जिसका कुल जल ग्रहण क्षेत्र ३६१ वर्ग कि. मी. है। छोटी झील का निर्माण राजा भोज ने करवाया।

भोपााल का तालाब

भोपाल की पहचान भोपाल के बड़े तालाब से है। कहा जाता है- तालों में ताल भोपाल ताल बाकी सब तलैया । भोपाल ताल में स्थित बोट क्लब एक पर्यटन स्थल है जो बोटिंग के लिए सुंदर स्थान है। 

यहां का छोटा तालाब, बड़ा तालाब, भीम बैठका, अभयारण्य, शहीद भवन तथा भारत भवन देखने योग्य हैं। भोपाल के पास स्थित सांची का स्तूप भी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है, जोकि यूनेस्को द्वारा संरक्षित है। भोपाल से लगभग २८ किलोमीटर दूर स्थित भोजपुर मन्दिर एक एतिहासिक दर्शनिय स्थल है। भेल स्थित श्रीराम मंदिर, बरखेड़ा एक प्रसिद्ध आस्था का केंद्र है। 

इस मंदिर में मुख्य मंदिर में विराजे श्रीराम चतुष्ट्य की स्थापना 4 अप्रैल 1971 को हुई थी. यहाँ की सभी मूर्तिया बहुत सुन्दर और अलौकिक है. इस मंदिर का दिव्य वातावरण सबका मन मोह लेता है. करीब 3 एकड़ में फैले इस मंदिर में मनोहारी उपवन है जिसमें अनेक प्रकार के फूल खिलते है।  मंदिर में श्रीराम के अलावा दुर्गा जी, योगेश्वर कृष्ण, रामभक्त हनुमान, शंकर जी, शिव जी व् गुरुदेव दत्तात्रेय भी विराजे है. मंदिर परिसर में बच्चों के लिए अनेक झूले भी लगे है. घास के बड़े मैदानों में बच्चे किलकारी मारते खेला करते है. सुबह व् शाम सुन्दर कर्णप्रिय भजन भक्तों का मन मोह लेते है. मंदिर में ऑनलाइन दर्शन की भी व्यवस्था है. श्रीराम नवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हनुमान जयंती, शिवरात्रि, दत्तात्रेय जयंती समेत अनेक पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाये जाते है. विशेष पर्वो पर भोपाल के सभी मंदिरों की तुलना में सबसे ज्यादा श्रद्धालु इसी मंदिर में एकत्र होते है. श्रीराम नवमी पर तो पूरे दिन मंदिर में पैर रखने तक की जगह नहीं होती।  

 

यह अनोखा संग्रहालय श्यामला की पहाडियों पर 200 एकड के क्षेत्र में फैला हुआ है।

भोपाल शहर वनस्पतियों की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध शहर है। यहाँ पर्याप्त हरियाली मौजूद है।

भोपाल का राजा भोज हवाई अड्डा शहर से १२ कि॰मी॰ की दूरी पर है। दिल्‍ली, मुंबई, इंदौर, अहमदाबाद, चेन्नई, चंडीगढ़, हैदराबाद, कोलकाता, रायपुर से यहां के लिए एयर इंडिया एवम अन्य निजी एयरलाइन्स कंपनियों की नियमित उडान सेवाएँ हैं।

भोपाल का रेलवे स्थानक देश के विविध रेलवे स्थानकों से जुडा हुआ है। यह रेलवे स्थानक भारतीय रेल के दिल्‍ली-चैन्‍नई मुख्य मार्ग पर पड़ता है। शताब्‍दी एक्‍सप्रेस भोपाल को दिल्‍ली से सीधा जोडती है। साथ ही यह शहर मुम्‍बई, आगरा, ग्‍वालियर, झांसी, उज्‍जैन, कोलकाता, चेन्नै, बंगलूरू, हैदराबाद आदि शहरों से अनेक रेलगाडियों के माध्‍यम से जुडा हुआ है।

सांची, इंदौर,उज्जैन, खजुराहो, पंचमढी, जबलपुर आदि शहरों से आसानी से सडक मार्ग से भोपाल पहुंचा जा सकता है। मध्‍यप्रदेश और पड़ोसी राज्‍यों के अनेक शहरों से भोपाल के लिए नियमित बसें चलती हैं।

भोपाल शहर की कुल जनसंख्या (२०११ की जनगणना के अनुसार) कुल १७,९५,६४८ है। भोपाल जिले की कुल जनसंख्या २३,६८,१४५ है। जिसमे करीब ५६% हिन्दू, ४०% मुस्लिम हैं। पुरुषों की संख्या १२,३९,३७८ तथा महिलाओं की संख्या ११,२८,७६७ है। कुल साक्षरता ८२.२६% है (पुरुष: ८७.४४%, महिला: ७६.५७%)।




#Article 84: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (424 words)


राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन या एनडीए या राजग (अंग्रेजी: National Democratic Alliance NDA) भारत में एक राजनीतिक गठबंधन है। 
इसका नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी करती है। इसके गठन के समय इसके १३ सदस्य थे।

शरद यादव को इसका संयोजक बनाया गया था, किन्तु उनकी पार्टी ने गठबन्धन से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया। इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह हैं। इसके अलावा प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा में नेता हैं जबकि थावरचंद गहलोत राज्यसभा में नेता हैं। इसके नेता, नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को भारत के प्रधान मंत्री के रूप में शपथ ली। भारतीय आम चुनाव, 2019 में, गठबंधन ने आगे बढ़कर 45.43% के संयुक्त वोट शेयर के साथ अपनी 353 सीटों पर वृद्धि की।

मई 1998 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की घोषणा हुई थी जो उस समय गैर काँग्रेसी सरकार के गठन के निर्माण में पहला कदम था लेकिन एक वर्ष के भीतर ही ढह गया क्योंकि आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने अपना समर्थन वापस ले लिया। इसे और विस्तृत करने के लिये कुछ नये दलों के साथ मिलकर 1999 का लोकसभा चुनाव जीतने का नये सिरे से प्रयास किया गया। इसके परिणाम बेहतर निकले और राजग को पूरे पाँच साल के लिये प्रधानमन्त्री वाजपेयी के तहत सत्ता संचालित करने का अवसर मिला। वाजपेयी ने अपना कार्यकाल बेहतर ढँग से पूरा किया। 2004 के लोकसभा चुनाव जीतने की उम्मीद के साथ यह गठबन्धन पुन: मैदान में उतरा लेकिन कांग्रेस पार्टी नीत गठबन्धन को अन्य गुट निरपेक्ष पार्टियों से समर्थन मिलने से इसे विपक्ष में बैठना पडा। हालांकि कांग्रेस और राजग की प्रमुख पार्टी भाजपा को लोक सभा में मिली सीटों की संख्या में कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं था लेकिन बहुमत का जुगाड़ करने में भाजपा असफल रही।

भारत में राजनीतिक दलों की मूल प्रवृत्ति गठबन्धन बनाने की कम और उसे तोड़ने की ज्यादा रही है। इस प्रवृत्ति को देखते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एक कार्यकारी बोर्ड या पोलित ब्यूरो के रूप में एक औपचारिक संरचना नहीं है अपितु यह व्यक्तिगत रूप से कुछ दलों के नेताओं की महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिये सीटों के उपचुनाव में साझा रणनीति बनाने के लिये एक समझौते जैसा लगता है। राष्ट्रहित के मुद्दों पर निर्णय लेने अथवा संसद में उन मुद्दों को उठाते समय दलों के बीच विभिन्न विचारधाराओं को देखते हुए कभी सहमति तो कभी असहमति जैसी कठिनाई आती है जिसके कारण सहयोगी दलों के बीच विभाजित मतदान के कई मामले भी देखने में आये हैं। इसके पहले संयोजक ज्योर्ज फ़र्नान्डिस के खराब स्वास्थ्य के कारण शरद यादव को इसका संयोजक नियुक्त किया गया था। परन्तु आगे चलकर वे भी इससे अलग हो गये।




#Article 85: पुराण (4245 words)


पुराण, हिन्दुओं के धर्म-सम्बन्धी आख्यान ग्रन्थ हैं, जिनमें संसार - ऋषियों - राजाओं के वृत्तान्त आदि हैं। ये वैदिक काल के बहुत समय बाद के ग्रन्थ हैं, जो स्मृति विभाग में आते हैं। भारतीय जीवन-धारा में जिन ग्रन्थों का महत्त्वपूर्ण स्थान है उनमें पुराण प्राचीन भक्ति-ग्रंथों के रूप में बहुत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। अठारह पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केन्द्र मानकर पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, कर्म और अकर्म की गाथाएँ कही गयी हैं। कुछ पुराणों में सृष्टि के आरम्भ से अन्त तक का विवरण दिया गया है। 

'पुराण' का शाब्दिक अर्थ है, 'प्राचीन' या 'पुराना'। पुराणों की रचना मुख्यतः संस्कृत में हुई है, किन्तु कुछ पुराण क्षेत्रीय भाषाओं में भी रचे गए हैं। हिन्दू और जैन दोनों ही धर्मों के वाङ्मय में पुराण मिलते हैं। 

पुराणों में वर्णित विषयों की कोई सीमा नहीं है। इसमें ब्रह्माण्डविद्या, देवी-देवताओं, राजाओं, नायकों, ऋषि-मुनियों की वंशावली, लोककथाएँ, तीर्थयात्रा, मन्दिर, चिकित्सा, खगोल शास्त्र, व्याकरण, खनिज विज्ञान, हास्य, प्रेमकथाओं के साथ-साथ धर्मशास्त्र और दर्शन का भी वर्णन है।  विभिन्न पुराणों की विषय-वस्तु में बहुत अधिक असमानता है। इतना ही नहीं, एक ही पुराण के कई-कई पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुई हैं जो परस्पर भिन्न-भिन्न हैं।  हिन्दू पुराणों के रचनाकार अज्ञात हैं और ऐसा लगता है कि कई रचनाकारों ने कई शताब्दियों में इनकी रचना की है। इसके विपरीत जैन पुराण हैं। जैन पुराणों का रचनाकाल और रचनाकारों के नाम बताये जा सकते हैं।

कर्मकाण्ड (वेद) से ज्ञान (उपनिषद्) की ओर आते हुए भारतीय मानस में पुराणों के माध्यम से भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित हुई है। विकास की इसी प्रक्रिया में बहुदेववाद और निर्गुण ब्रह्म की स्वरूपात्मक व्याख्या से धीरे-धीरे मानस अवतारवाद या सगुण भक्ति की ओर प्रेरित हुआ।

पुराणों में वैदिक काल से चले आते हुए सृष्टि आदि संबंधी विचारों, प्राचीन राजाओं और ऋषियों के परंपरागत वृत्तांतों तथा कहानियों आदि के संग्रह के साथ साथ कल्पित कथाओं की विचित्रता और रोचक वर्णनों द्वारा सांप्रदायिक या साधारण उपदेश भी मिलते हैं।

पुराणों में विष्णु, वायु, मत्स्य और भागवत में ऐतिहासिक वृत्त— राजाओं की वंशावली आदि के रूप में बहुत-कुछ मिलते हैं। ये वंशावलियाँ यद्यपि बहुत संक्षिप्त हैं और इनमें परस्पर कहीं-कहीं विरोध भी हैं, पर हैं बडे़ काम की। पुराणों की ओर ऐतिहासिकों ने इधर विशेष रूप से ध्यान दिया है और वे इन वंशावलियों की छानबीन में लगे हैं।

'पुराण' का शाब्दिक अर्थ है - 'प्राचीन आख्यान' या 'पुरानी कथा'। ‘पुरा’ शब्द का अर्थ है - अनागत एवं अतीत। ‘अण’ शब्द का अर्थ होता है - कहना या बतलाना। रघुवंश में पुराण शब्द का अर्थ है पुराण पत्रापग मागन्नतरम् एवं वैदिक वाङ्मय में प्राचीन: वृत्तान्त: दिया गया है।

सांस्कृतिक अर्थ से हिन्दू संस्कृति के वे विशिष्ट धर्मग्रंथ जिनमें सृष्टि से लेकर प्रलय तक का इतिहास-वर्णन शब्दों से किया गया हो, पुराण कहे जाते है। पुराण शब्द का उल्लेख वैदिक युग के वेद सहित आदितम साहित्य में भी पाया जाता है अत: ये सबसे पुरातन (पुराण) माने जा सकते हैं। अथर्ववेद के अनुसार ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह ११.७.२) अर्थात् पुराणों का आविर्भाव ऋक्, साम, यजुस् औद छन्द के साथ ही हुआ था। शतपथ ब्राह्मण (१४.३.३.१३) में तो पुराणवाग्ङमय को वेद ही कहा गया है। छान्दोग्य उपनिषद् (इतिहास पुराणं पंचम वेदानांवेदम् ७.१.२) ने भी पुराण को वेद कहा है। बृहदारण्यकोपनिषद् तथा महाभारत में कहा गया है कि इतिहास पुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् अर्थात् वेद का अर्थविस्तार पुराण के द्वारा करना चाहिये। इनसे यह स्पष्ट है कि वैदिक काल में पुराण तथा इतिहास को समान स्तर पर रखा गया है।

अमरकोष आदि प्राचीन कोशों में पुराण के पांच लक्षण माने गये हैं : सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय, पुनर्जन्म), वंश (देवता व ऋषि सूचियां), मन्वन्तर (चौदह मनु के काल), और वंशानुचरित (सूर्य चंद्रादि वंशीय चरित)। 

माना जाता है कि सृष्टि के रचनाकर्ता ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम जिस प्राचीनतम धर्मग्रंथ की रचना की, उसे पुराण के नाम से जाना जाता है।

प्राचीनकाल से पुराण देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों - सभी का मार्गदर्शन करते रहे हैं। पुराण मनुष्य को धर्म एवं नीति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देते हैं। पुराण मनुष्य के कर्मों का विश्लेषण कर उन्हें दुष्कर्म करने से रोकते हैं। पुराण वस्तुतः वेदों का विस्तार हैं। वेद बहुत ही जटिल तथा शुष्क भाषा-शैली में लिखे गए हैं। वेदव्यास जी ने पुराणों की रचना और पुनर्रचना की। कहा जाता है, ‘‘पूर्णात् पुराण ’’ जिसका अर्थ है, जो वेदों का पूरक हो, अर्थात् पुराण (जो वेदों की टीका हैं)। वेदों की जटिल भाषा में कही गई बातों को पुराणों में सरल भाषा में समझाया गया हैं। पुराण-साहित्य में अवतारवाद को प्रतिष्ठित किया गया है। निर्गुण निराकार की सत्ता को मानते हुए सगुण साकार की उपासना करना इन ग्रंथों का विषय है। पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केन्द्र में रखकर पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म और कर्म-अकर्म की कहानियाँ हैं। प्रेम, भक्ति, त्याग, सेवा, सहनशीलता ऐसे मानवीय गुण हैं, जिनके अभाव में उन्नत समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। पुराणों में देवी-देवताओं के अनेक स्वरूपों को लेकर एक विस्तृत विवरण मिलता है। पुराणों में सत्य की प्रतिष्ठा के अतिरिक्त दुष्कर्म का विस्तृत चित्रण भी पुराणकारों ने किया है। पुराणकारों ने देवताओं की दुष्प्रवृत्तियों का व्यापक विवरण दिया है लेकिन मूल उद्देश्य सद्भावना का विकास और सत्य की प्रतिष्ठा ही है।

केवल ५ पुराणों -- मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्रह्माण्ड एवं भागवत में ही राजाओं की वंशावली पायी जाती है।

पुराणों की संख्या प्राचीन काल से अठारह मानी गयी है। पुराणों में एक विचित्रता यह है कि प्रायः प्रत्येक पुराण में अठारहों पुराणों के नाम और उनकी श्लोक-संख्या का उल्लेख है। देवीभागवत में नाम के आरंभिक अक्षर के निर्देशानुसार १८ पुराणों की गणना  इस प्रकार की गयी हैं: 

म-२, भ-२, ब्र-३, व-४। ​अ-१,ना-१, प-१, लिं-१, ग-१, कू-१, स्क-१ ॥

'विष्णुपुराण' के अनुसार अठारह पुराणों के नाम इस प्रकार हैं—ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शैव (वायु), भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड और ब्रह्माण्ड। क्रमपूर्वक नाम-गणना के उपरान्त श्रीविष्णुपुराण में इनके लिए स्पष्टतः 'महापुराण' शब्द का भी प्रयोग किया गया है। श्रीमद्भागवत, मार्कण्डेय एवं कूर्मपुराण में भी ये ही नाम एवं यही क्रम है। अन्य पुराणों में भी 'शैव' और 'वायु' का भेद छोड़कर नाम प्रायः सब जगह समान हैं, श्लोक-संख्या में कहीं-कहीं कुछ भिन्नता है। नारद पुराण, मत्स्य पुराण और देवीभागवत में 'शिव पुराण' के स्थान में 'वायुपुराण' का नाम है। भागवत के नाम से आजकल दो पुराण मिलते हैं—एक 'श्रीमद्भागवत', दूसरा 'देवीभागवत'। इन दोनों में कौन वास्तव में महापुराण है, इसपर विवाद रहा है। नारद पुराण में सभी अठारह पुराणों के नाम निर्देश के अतिरिक्त उन सबकी विषय-सूची भी दी गयी है, जो पुराणों के स्वरूप-निर्देश की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। बहुमत से अठारह पुराणों के नाम इस प्रकार हैं:

आचार्य बलदेव उपाध्याय ने पर्याप्त तर्कों के आधार पर सिद्ध किया है कि शिव पुराण वस्तुतः एक उपपुराण है और उसके स्थान पर वायु पुराण ही वस्तुतः महापुराण है। इसी प्रकार देवीभागवत भी एक उपपुराण है। परन्तु इन दोनों को उपपुराण के रूप में स्वीकार करने में सबसे बड़ी बाधा यह है कि स्वयं विभिन्न पुराणों में उपलब्ध अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय सूचियों में कहीं इन दोनों का नाम उपपुराण के रूप में नहीं आया है। दूसरी ओर रचना एवं प्रसिद्धि दोनों रूपों में ये दोनों महापुराणों में ही परिगणित रहे हैं। पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र ने बहुत पहले विस्तार से विचार करने के बावजूद कोई अन्य निश्चयात्मक समाधान न पाकर यह कहा था कि 'शिव पुराण' तथा 'वायु पुराण' एवं 'श्रीमद्भागवत' तथा 'देवीभागवत' महापुराण ही हैं और कल्प-भेद से अलग-अलग समय में इनका प्रचलन रहा है। इस बात को आधुनिक दृष्टि से इस प्रकार कहा जा सकता है कि भिन्न संप्रदाय वालों की मान्यता में इन दोनों कोटि में से एक न एक गायब रहता है। इसी कारण से महापुराणों की संख्या तो १८ ही रह जाती है, परन्तु संप्रदाय-भिन्नता को छोड़ देने पर संख्या में दो की वृद्धि हो जाती है। इसी प्रकार प्राचीन एवं रचनात्मक रूप से परिपुष्ट होने के बावजूद हरिवंश एवं विष्णुधर्मोत्तर का नाम भी 'बृहद्धर्म पुराण' की अपेक्षाकृत पश्चात्कालीन सूची को छोड़कर पुराण या उपपुराण की किसी प्रामाणिक सूची में नहीं आता है। हालाँकि इन दोनों का कारण स्पष्ट ही है। 'हरिवंश' वस्तुतः स्पष्ट रूप से महाभारत का खिल (परिशिष्ट) भाग के रूप में रचित है और इसी प्रकार 'विष्णुधर्मोत्तर' भी विष्णु पुराण के उत्तर भाग के रूप में ही रचित एवं प्रसिद्ध है। नारद पुराण में बाकायदा विष्णु पुराण की विषय सूची देते हुए 'विष्णुधर्मोत्तर' को उसका उत्तर भाग बताकर एक साथ विषय सूची दी गयी है तथा स्वयं 'विष्णुधर्मोत्तर' के अन्त की पुष्पिका में उसका उल्लेख 'श्रीविष्णुमहापुराण' के 'द्वितीय भाग' के रूप में किया गया है। अतः 'हरिवंश' तो महाभारत का अंग होने से स्वतः पुराणों की गणना से हट जाता है। 'विष्णुधर्मोत्तर' विष्णु पुराण का अंग-रूप होने के बावजूद नाम एवं रचना-शैली दोनों कारणों से एक स्वतंत्र पुराण के रूप में स्थापित हो चुका है। अतः प्रतीकात्मक रूप से महापुराणों की संख्या अठारह होने के बावजूद व्यावहारिक रूप में 'शिव पुराण', 'देवीभागवत' एवं 'विष्णुधर्मोत्तर' को मिलाकर महापुराणों की संख्या इक्कीस होती है।

सुखसागर के अनुसारः

(१) ब्रह्मपुराण : इसे “आदिपुराण” भी का जाता है। प्राचीन माने गए सभी पुराणों में इसका उल्लेख है। इसमें श्लोकों की संख्या अलग- २ प्रमाणों से भिन्न-भिन्न है। १०,०००…१२.००० और १३,७८७ ये विभिन्न संख्याएँ मिलती है। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में लोमहर्षण ऋषि ने किया था। इसमें सृष्टि, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का वर्णन, देवों और प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। इस पुराण में विभिन्न तीर्थों का विस्तार से वर्णन है। इसमें कुल २४५ अध्याय हैं। इसका एक परिशिष्ट सौर उपपुराण भी है, जिसमें उडिसा के कोणार्क मन्दिर का वर्णन है।

(२) पद्मपुराण : इसमें कुल ६४१ अध्याय और ४८,००० श्लोक हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार इसमें ५५,००० और ब्रह्मपुराण के अनुसार इसमें ५९,००० श्लोक थे। इसमें कुल खण़्ड हैं—(क) सृष्टिखण्ड : ५ पर्व, (ख) भूमिखण्ड, (ग) स्वर्गखण्ड, (घ) पातालखण्ड और (ङ) उत्तरखण्ड।
इसका प्रवचन नैमिषारण्य में सूत उग्रश्रवा ने किया था। ये लोमहर्षण के पुत्र थे। इस पुराण में अनेक विषयों के साथ विष्णुभक्ति के अनेक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। इसका विकास ५ वीं शताब्दी माना जाता है।

(३) विष्णुपुराण : पुराण के पाँचों लक्षण इसमें घटते हैं। इसमें विष्णु को परम देवता के रूप में निरूपित किया गया है। इसमें कुल छः खण्ड हैं, १२६ अध्याय, श्लोक २३,००० या २४,००० या ६,००० हैं। इस पुराण के प्रवक्ता पराशर ऋषि और श्रोता मैत्रेय हैं।

(४) वायुपुराण : इसमें विशेषकर शिव का वर्णन किया गया है, अतः इस कारण इसे “शिवपुराण” भी कहा जाता है। एक शिवपुराण पृथक् भी है। इसमें ११२ अध्याय, ११,००० श्लोक हैं। इस पुराण का प्रचलन मगध-क्षेत्र में बहुत था। इसमें गया-माहात्म्य है। इसमें कुल चार भाग है : (क) प्रक्रियापाद – (अध्याय—१-६), (ख) उपोद्घात :  (अध्याय-७ –६४ ), (ग) अनुषङ्गपादः–(अध्याय—६५–९९), (घ) उपसंहारपादः–(अध्याय—१००-११२)। इसमें सृष्टिक्रम, भूगो, खगोल, युगों, ऋषियों तथा तीर्थों का वर्णन एवं राजवंशों, ऋषिवंशों,, वेद की शाखाओं, संगीतशास्त्र और शिवभक्ति का विस्तृत निरूपण है। इसमें भी पुराण के पञ्चलक्षण मिलते हैं।

(५) भागवतपुराण : यह सर्वाधिक प्रचलित पुराण है। इस पुराण का सप्ताह-वाचन-पारायण भी होता है। इसे सभी दर्शनों का सार “निगमकल्पतरोर्गलितम्” और विद्वानों का परीक्षास्थल “विद्यावतां भागवते परीक्षा” माना जाता है। इसमें श्रीकृष्ण की भक्ति के बारे में बताया गया है।
इसमें कुल १२ स्कन्ध, ३३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। कुछ विद्वान् इसे “देवीभागवतपुराण” भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देवी (शक्ति) का विस्तृत वर्णन हैं। इसका रचनाकाल ६ वी शताब्दी माना जाता है।

(६) नारद (बृहन्नारदीय) पुराण : इसे महापुराण भी कहा जाता है। इसमें पुराण के ५ लक्षण घटित नहीं होते हैं। इसमें वैष्णवों के उत्सवों और व्रतों का वर्णन है। इसमें २ खण्ड है : (क) पूर्व खण्ड में १२५ अध्याय और (ख) उत्तर-खण्ड में ८२ अध्याय हैं। इसमें १८,००० श्लोक हैं। इसके विषय मोक्ष, धर्म, नक्षत्र, एवं कल्प का निरूपण, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, गृहविचार, मन्त्रसिद्धि,, वर्णाश्रम-धर्म, श्राद्ध, प्रायश्चित्त आदि का वर्णन है।

(७) मार्कण्डयपुराण : इसे प्राचीनतम पुराण माना जाता है। इसमें इन्द्र, अग्नि, सूर्य आदि वैदिक देवताओं का वर्णन किया गया है। इसके प्रवक्ता मार्कण्डय ऋषि और श्रोता क्रौष्टुकि शिष्य हैं। इसमें १३८ अध्याय और ७,००० श्लोक हैं। इसमें गृहस्थ-धर्म, श्राद्ध, दिनचर्या, नित्यकर्म, व्रत, उत्सव, अनुसूया की पतिव्रता-कथा, योग, दुर्गा-माहात्म्य आदि विषयों का वर्णन है।

(८) अग्निपुराण : इसके प्रवक्ता अग्नि और श्रोता वसिष्ठ हैं। इसी कारण इसे अग्निपुराण कहा जाता है। इसे भारतीय संस्कृति और विद्याओं का महाकोश माना जाता है। इसमें इस समय ३८३ अध्याय, ११,५०० श्लोक हैं। इसमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है। इसके अतिरिक्त शिवलिंग, दुर्गा, गणेश, सूर्य, प्राणप्रतिष्ठा आदि के अतिरिक्त भूगोल, गणित, फलित-ज्योतिष, विवाह, मृत्यु, शकुनविद्या, वास्तुविद्या, दिनचर्या, नीतिशास्त्र, युद्धविद्या, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, छन्द, काव्य, व्याकरण, कोशनिर्माण आदि नाना विषयों का वर्णन है।

(९) भविष्यपुराण : इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन है। इसमें दो खण्ड हैः–(क) पूर्वार्धः–(अध्याय—४१) तथा (ख) उत्तरार्धः–(अध्याय़—१७१) । इसमें कुल १५,००० श्लोक हैं । इसमें कुल ५ पर्व हैः–(क) ब्राह्मपर्व, (ख) विष्णुपर्व, (ग) शिवपर्व, (घ) सूर्यपर्व तथा (ङ) प्रतिसर्गपर्व। इसमें मुख्यतः ब्राह्मण-धर्म, आचार, वर्णाश्रम-धर्म आदि विषयों का वर्णन है। इसका रचनाकाल ५०० ई. से १२०० ई. माना जाता है।

(१०) ब्रह्मवैवर्तपुराण : यह वैष्णव पुराण है। इसमें श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें कुल १८,००० श्लोक है और चार खण्ड हैं : (क) ब्रह्म, (ख) प्रकृति, (ग) गणेश तथा (घ) श्रीकृष्ण-जन्म।

(११) लिङ्गपुराण : इसमें शिव की उपासना का वर्णन है। इसमें शिव के २८ अवतारों की कथाएँ दी गईं हैं। इसमें ११,००० श्लोक और १६३ अध्याय हैं। इसे पूर्व और उत्तर नाम से दो भागों में विभाजित किया गया है। इसका रचनाकाल आठवीं-नवीं शताब्दी माना जाता है। यह पुराण भी पुराण के लक्षणों पर खरा नहीं उतरता है।

(१२) वराहपुराण : इसमें विष्णु के वराह-अवतार का वर्णन है। पाताललोक से पृथिवी का उद्धार करके वराह ने इस पुराण का प्रवचन किया था। इसमें २४,००० श्लोक सम्प्रति केवल ११,००० और २१७ अध्याय हैं।

(१३) स्कन्दपुराण : यह पुराण शिव के पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य) के नाम पर है। यह सबसे बडा पुराण है। इसमें कुल ८१,००० श्लोक हैं। इसमें दो खण्ड हैं। इसमें छः संहिताएँ हैं—सनत्कुमार, सूत, शंकर, वैष्णव, ब्राह्म तथा सौर। सूतसंहिता पर माधवाचार्य ने “तात्पर्य-दीपिका” नामक विस्तृत टीका लिखी है। इस संहिता के अन्त में दो गीताएँ भी हैं—-ब्रह्मगीता (अध्याय—१२) और सूतगीताः–(अध्याय ८)।
इस पुराण में सात खण्ड हैं—(क) माहेश्वर, (ख) वैष्णव, (ग) ब्रह्म, (घ) काशी, (ङ) अवन्ती, (रेवा), (च) नागर (ताप्ती) तथा (छ) प्रभास-खण्ड। काशीखण्ड में “गंगासहस्रनाम” स्तोत्र भी है। इसका रचनाकाल ७ वीं शताब्दी है। इसमें भी पुराण के ५ लक्षण का निर्देश नहीं मिलता है।

(१४) वामनपुराण : इसमें विष्णु के वामन-अवतार का वर्णन है। इसमें ९५ अध्याय और १०,००० श्लोक हैं। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) माहेश्वरी, (ख) भागवती, (ग) सौरी तथा (घ) गाणेश्वरी । इसका रचनाकाल ९ वीं से १० वीं शताब्दी माना जाता है।

(१५) कूर्मपुराण : इसमें विष्णु के कूर्म-अवतार का वर्णन किया गया है। इसमें चार संहिताएँ हैं—(क) ब्राह्मी, (ख) भागवती, (ग) सौरा तथा (घ) वैष्णवी । सम्प्रति केवल ब्राह्मी-संहिता ही मिलती है। इसमें ६,००० श्लोक हैं। इसके दो भाग हैं, जिसमें ५१ और ४४ अध्याय हैं। इसमें पुराण के पाँचों लक्षण मिलते हैं। इस पुराण में ईश्वरगीता और व्यासगीता भी है। इसका रचनाकाल छठी शताब्दी माना गया है।

(१६) मत्स्यपुराण : इसमें पुराण के पाँचों लक्षण घटित होते हैं। इसमें २९१ अध्याय और १४,००० श्लोक हैं। प्राचीन संस्करणों में १९,००० श्लोक मिलते हैं। इसमें जलप्रलय का वर्णन हैं। इसमें कलियुग के राजाओं की सूची दी गई है। इसका रचनाकाल तीसरी शताब्दी माना जाता है।

(१७) गरुडपुराण : यह वैष्णवपुराण है। इसके प्रवक्ता विष्णु और श्रोता गरुड हैं, गरुड ने कश्यप को सुनाया था। इसमें विष्णुपूजा का वर्णन है। इसके दो खण्ड हैं, जिसमें पूर्वखण्ड में २२९ और उत्तरखण्ड में ३५ अध्याय और १८,००० श्लोक हैं। इसका पूर्वखण्ड विश्वकोशात्मक माना जाता है।

(१८) ब्रह्माण्डपुराण : इसमें १०९ अध्याय तथा १२,००० श्लोक है। इसमें चार पाद हैं—(क) प्रक्रिया, (ख) अनुषङ्ग, (ग) उपोद्घात तथा (घ) उपसंहार । इसकी रचना ४०० ई.- ६०० ई. मानी जाती है।

पुराणों में सबसे पुराना विष्णुपुराण ही प्रतीत होता है। उसमें सांप्रदायिक खींचतान और रागद्वेष नहीं है। पुराण के पाँचो लक्षण भी उसपर ठीक ठीक घटते हैं। उसमें सृष्टि की उत्पत्ति और लय, मन्वंतरों, भरतादि खंडों और सूर्यादि लोकों, वेदों की शाखाओं तथा वेदव्यास द्वारा उनके विभाग, सूर्य वंश, चंद्र वंश आदि का वर्णन है। कलि के राजाओं में मगध के मौर्य राजाओं तथा गुप्तवंश के राजाओं तक का उल्लेख है। श्रीकृष्ण की लीलाओं का भी वर्णन है पर बिलकुल उस रूप में नहीं जिस रूप में भागवत में है।

वायुपुराण के चार पाद है, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, कल्पों ओर मन्वन्तरों, वैदिक ऋषियों की गाथाओं, दक्ष प्रजापति की कन्याओं से भिन्न भिन्न जीवोत्पति, सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राजाओं की वंशावली तथा कलि के राजाओं का प्रायः विष्णुपुराण के अनुसार वर्णन है।

मत्स्यपुराण में मन्वंतरों और राजवंशावलियों के अतिरिक्त वर्णश्रम धर्म का बडे़ विस्तार के साथ वर्णन है और मत्सायवतार की पूरी कथा है। इसमें मय आदि असुरों के संहार, मातृलोक, पितृलोक, मूर्ति और मंदिर बनाने की विधि का वर्णन विशेष ढंग का है।

श्रीमदभागवत का प्रचार सबसे अधिक है क्योंकि उसमें भक्ति के माहात्म्य और श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन है। नौ स्कंधों के भीतर तो जीवब्रह्म की एकता, भक्ति का महत्व, सृष्टिलीला, कपिलदेव का जन्म और अपनी माता के प्रति वैष्णव भावानुसार सांख्यशास्त्र का उपदेश, मन्वंतर और ऋषिवंशावली, अवतार जिसमें ऋषभदेव का भी प्रसंग है, ध्रुव, वेणु, पृथु, प्रह्लाद इत्यादि की कथा, समुद्रमथन आदि अनेक विषय हैं। पर सबसे बड़ा दशम स्कंध है जिसमें कृष्ण की लीला का विस्तार से वर्णन है। इसी स्कंध के आधार पर शृंगार और भक्तिरस से पूर्ण कृष्णचरित् संबंधी संस्कृत और भाषा के अनेक ग्रंथ बने हैं। एकादश स्कंध में यादवों के नाश और बारहवें में कलियुग के राचाओं के राजत्व का वर्णन है। भागवत की लेखनशैली अन्य पुराणों से भिन्न है। इसकी भाषा पांडित्यपूर्ण और साहित्य संबंधी चमत्कारों से भरी हुई है, इससे इसकी रचना कुछ पीछे की मानी जाती है।

अग्निपुराण एक विलक्षण पुराण है जिसमें राजवंशावलियों तथा संक्षिप्त कथाओं के अतिरिक्त धर्मशास्त्र, राजनीति, राजधर्म, प्रजाधर्म, आयुर्वेद, व्याकरण, रस, अलंकार, शस्त्र-विद्या आदि अनेक विषय हैं। इसमें तंत्रदीक्षा का भी विस्तृत प्रकरण है। कलि के राजाओं की वंशावली विक्रम तक आई है, अवतार प्रसंग भी है। इसी प्रकार और पुराणों में भी कथाएँ हैं।

विष्णुपुराण के अतिरिक्त और पुराण जो आजकल मिलते हैं उनके विषय में संदेह होता है कि वे असल पुराणों के न मिलने पर पीछे से न बनाए गए हों। कई एक पुराण तो मत-मतांतरों और संप्रदायों के राग-द्वेष से भरे हैं। कोई किसी देवता की प्रधानता स्थापित करता है, कोई किसी देवता की प्रधानता स्थापित करता है, कोई किसी की। ब्रह्मवैवर्त पुराण का जो परिचय मत्स्यपुराण में दिया गया है उसके अनुसार उसमें रथंतर कल्प और वराह अवतार की कथा होनी चाहिए पर जो ब्रह्मवैवर्त आजकल मिलता है उसमें यह कथा नहीं है। कृष्ण के वृंदावन के रास से जिन भक्तों की तृप्ति नहीं हुई थी उनके लिये गोलोक में सदा होनेवाले रास का उसमें वर्णन है। आजकल का यह ब्रह्मवैवर्त मुसलमानों के आने के कई सौ वर्ष पीछे का है क्योंकि इसमें 'जुलाहा' जाति की उत्पत्ति का भी उल्लेख है -- म्लेच्छात् कुविंदकन्यायां जोला जातिर्बभूव ह (१०, १२१)। ब्रह्मपुराण में तीर्थों और उनके माहात्म्य का वर्णन बहुत अधिक हैं, अनन्त वासुदेव और पुरुषोत्तम (जगन्नाथ) माहात्म्य तथा और बहुत से ऐसे तीर्थों के माहात्म्य लिखे गए हैं जो प्राचीन नहीं कहे जा सकते। 'पुरुषोत्तमप्रासाद' से अवश्य जगन्नाथ जी के विशाल मंदिर की ओर ही इशारा है जिसे गांगेय वंश के राजा चोड़गंग (सन् १०७७ ई०) ने बनवाया था। मत्स्यपुराण में दिए हुए लक्षण आजकल के पद्मपुराण में भी पूरे नहीं मिलते हैं। वैष्णव सांप्रदायिकों के द्वेष की इसमें बहुत सी बातें हैं। जैसे, पाषडिलक्षण, मायावादनिंदा, तामसशास्त्र, पुराणवर्णनइत्यादि। वैशेषिक, न्याय, सांख्य और चार्वाक 'तामस शास्त्र' कहे गए हैं और यह भी बताया गया है। इसी प्रकार मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कंद और अग्नि तामस पुराण कहे गए हैं। सारंश यह कि अधिकांश पुराणों का वर्तमान रूप हजार वर्ष के भीतर का है। सबके सब पुराण सांप्रदायिक है, इसमें भी कोई संदेह नहीं है। कई पुराण (जैसे, विष्णु) बहुत कुछ अपने प्राचीन रूप में मिलते हैं पर उनमें भी सांप्रदायिकों ने बहुत सी बातें बढ़ा दी हैं।

यद्यपि आजकल जो पुराण मिलते हैं उनमें से अधिकतर पीछे से बने हुए या प्रक्षिप्त विषयों से भरे हुए हैं तथापि पुराण बहुत प्राचीन काल से प्रचलित थे। बृहदारण्यक उपनिषद् और शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि गीली लकड़ी से जैसे धुआँ अलग अलग निकलता है वैसे ही महान भूत के निःश्वास से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वांगिरस, इतिहास, पुराणविद्या, उपनिषद, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान और अनुव्याख्यान हुए। छान्दोग्य उपनिषद् में भी लिखा है कि इतिहास पुराण वेदों में पाँचवाँ वेद है। अत्यंत प्राचीन काल में वेदों के साथ पुराण भी प्रचलित थे जो यज्ञ आदि के अवसरों पर कहे जाते थे। कई बातें जो पुराण के लक्षणों में हैं, वेदों में भी हैं। जैसे, पहले असत् था और कुछ नहीं था यह सर्ग या सृष्टितत्व है; देवासुर संग्राम, उर्वशी पुरूरवा संवाद इतिहास है। महाभारत के आदि पर्व में (१.२३३) भी अनेक राजाओं के नाम और कुछ विषय गिनाकर कहा गया है कि इनके वृत्तांत विद्वान सत्कवियों द्वारा पुराण में कहे गए हैं। इससे कहा जा सकता है कि महाभारत के रचनाकाल में भी पुराण थे। मनुस्मृति में भी लिखा है कि पितृकार्यों में वेद, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण आदि सुनाने चाहिए।

अब प्रश्न यह होता है कि पुराण हैं किसके बनाए। शिवपुराण के अंतर्गत रेवा माहात्म्य में लिखा है कि अठारहों पुराणों के वक्ता मत्यवतीसुत व्यास हैं। यही बात जन साधारण में प्रचलित है। पर मत्स्यपुराण में स्पष्ट लिखा है कि पहले पुराण एक ही था, उसी से १८ पुराण हुए (५३.४)। ब्रह्मांड पुराण में लिखा है कि वेदव्यास ने एक पुराणसंहिता का संकलन किया था। इसके आगे की बात का पता विष्णु पुराण से लगता है। उसमें लिखा है कि व्यास का एक 'लोमहर्षण' नाम का शिष्य था जो सूति जाति का था। व्यास जी ने अपनी पुराण संहिता उसी के हाथ में दी। लोमहर्षण के छह शिष्य थे— सुमति, अग्निवर्चा, मित्रयु, शांशपायन, अकृतव्रण और सावर्णी। इनमें से अकृतव्रण, सावर्णी और शांशपायन ने लोमहर्षण से पढ़ी हुई पुराणसंहिता के आधार पर और एक एक संहिता बनाई। वेदव्यास ने जिस प्रकार मंत्रों का संग्रहकर उन का संहिताओं में विभाग किया उसी प्रकार पुराण के नाम से चले आते हुए वृत्तों का संग्रह कर पुराणसंहिता का संकलन किया। उसी एक संहिता को लेकर सुत के चेलों के तीन और संहीताएँ बनाई। इन्हीं संहिताओं के आधार पर अठारह पुराण बने होंगे।

मत्स्य, विष्णु, ब्रह्मांड आदि सब पुराणों में ब्रह्मपुराण पहला कहा गया है, पर जो ब्रह्मपुराण आजकल प्रचलित है वह कैसा है यह पहले कहा जा चुका है। जो कुछ हो, यह तो ऊपर लिखे प्रमाण से सिद्ध है कि अठारह पुराण वेदव्यास के बनाए नहीं हैं। जो पुराण आजकल मिलते हैं उनमें विष्णुपुराण और ब्रह्मांडपुराण की रचना औरों से प्राचीन जान पड़ती है। विष्णुपुराण में 'भविष्य राजवंश' के अंतर्गत गुप्तवंश के राजाओं तक का उल्लेख है इससे वह प्रकरण ईसा की छठी शताब्दी के पहले का नहीं हो सकता। जावा के आगे जो बाली द्वीप है वहाँ के हिंदुओं के पास ब्रह्माण्डपुराण मिला है। इन हिंदुओं के पूर्वज ईसा की पाँचवी शताब्दी में भारतवर्ष में पूर्व के द्वीपों में जाकर बसे थे। बालीवाले ब्रह्मा़डपुराण में 'भविष्य राजवंश प्रकरण' नहीं है, उसमें जनमेजय के प्रपौत्र अधिसीमकृष्ण तक का नाम पाया जाता है। यह बात ध्यान देने की है। इससे प्रकट होता है कि पुराणों में जो भविष्य राजवंश है वह पीछे से जोड़ा हुआ है। यहाँ पर ब्रह्मांडपुराण की जो प्राचीन प्रतियाँ मिलती हैं देखना चाहिए कि उनमें भूत और वर्तमानकालिक क्रिया का प्रयोग कहाँ तक है। 'भविष्यराजवंश वर्णन' के पूर्व उनमें ये श्लोक मिलते हैं—

उक्त अंश से प्रकट है कि आदि ब्रह्मांडपुराण अधिसीमकृष्ण के समय में बना। इसी प्रकार विष्णुपुराण, मत्स्यपुराण आदि की परीक्षा करने से पता चलता है कि आदि विष्णुपुराण परीक्षित के समय में और आदि मत्स्यपुराण जनमेजय के प्रपौत्र अधिसीमकृष्ण के समय में संकलित हुआ।

पुराण संहिताओं से अठारह पुराण बहुत प्राचीन काल में ही बन गए थे, इसका पता लगता है। आपस्तंब धर्मसूत्र (२.२४.५) में भविष्यपुराण का प्रमाण इस प्रकार उदधृत है—

यह अवश्य है कि आजकल पुराण अपने आदिम रूप में नहीं मिलते हैं। बहुत से पुराण तो असल पुराणों के न मिलने पर फिर से नए रचे गए हैं, कुछ में बहुत सी बातें जोड़ दी गई हैं।

प्रायः सब पुराण शैव, वैष्णव सम्प्रदाय और सौर संप्रदायों में से किसी न किसी के पोषक हैं, इसमें भी कोई संदेह नहीं। विष्णु, रुद्र, सूर्य आदि की उपासना वैदिक काल से ही चली आती थी, फिर धीरे धीरे कुछ लोग किसी एक देवता को प्रधानता देने लगे, कुछ लोग दूसरे को। इस प्रकार महाभारत के पीछे ही संप्रदायों का सूत्रपात हो चला। पुराणसंहिताएँ उसी समय में बनीं। फिर आगे चलकर आदिपुराण बने जिनका बहुत कुछ अंश आजकल पाए जानेवाले कुछ पुराणों के भीतर है। पुराणों का उद्देश्य पुराने वृत्तों का संग्रह करना, कुछ प्राचीन और कुछ कल्पित कथाओं द्वारा उपदेश देना, देवमहिमा तथा तीर्थमहिमा के वर्णन द्वारा जनसाधारण में धर्मबुद्धि स्थिर रखना था। इसी से व्यास ने सूत (भाट या कथक्केड़) जाति के एक पुरुष को अपनी संकलित आदिपुराणसंहिता प्रचार करने के लिये दी।

जैन परम्परा में 63 शलाकापुरुष माने गए हैं। पुराणों में इनकी कथाएं तथा धर्म का वर्णन आदि है। प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश तथा अन्य देशी भाषाओं में अनेक पुराणों की रचना हुई है। दोनों सम्प्रदायों का पुराण-साहित्य विपुल परिमाण में उपलब्ध है। इनमें भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है।

जैन धर्म में २४ पुराण तो तीर्थकरों के नाम पर हैं; और भी बहुत से हैं जिनमें तीर्थकरों के अलौकिक चरित्र, सब देवताओं से उनकी श्रेष्ठता, जैनधर्म संबंधी तत्वों का विस्तार से वर्णन, फलस्तुति, माहात्म्य आदि हैं। अलग पद्मपुराण और हरिवंश (अरिष्टनेमि पुराण) भी हैं।

मुख्य पुराण हैं:- जिनसेन का 'आदिपुराण' और जिनसेन (द्वि.) का 'अरिष्टनेमि' (हरिवंश) पुराण, रविषेण का 'पद्मपुराण' और गुणभद्र का 'उत्तरपुराण'। प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में भी ये पुराण उपलब्ध हैं। भारत की संस्कृति, परम्परा, दार्शनिक विचार, भाषा, शैली आदि की दृष्टि से ये पुराण बहुत महत्वपूर्ण हैं।

समस्त आगम ग्रंथो को चार भागो मैं बांटा गया है

अन्य ग्रन्थ

बौद्ध ग्रंथों में कहीं पुराणों का उल्लेख नहीं है पर तिब्बत और नेपाल के बौद्ध ९ पुराण मानते हैं जिन्हें वे नवधर्म कहते हैं —




#Article 86: जवाहरलाल नेहरू (1487 words)


जवाहरलाल नेहरू (नवंबर १४, १८८९ - मई २७, १९६४) भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री थे और स्वतन्त्रता के पूर्व और पश्चात् की भारतीय राजनीति में केन्द्रीय व्यक्तित्व थे। महात्मा गांधी के संरक्षण में, वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे और उन्होंने १९४७ में भारत के एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर १९६४ तक अपने निधन तक, भारत का शासन किया। वे आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य – एक सम्प्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र - के वास्तुकार माने जाते हैं। कश्मीरी पण्डित समुदाय के साथ उनके मूल की वजह से वे पण्डित नेहरू भी बुलाए जाते थे, जबकि भारतीय बच्चे उन्हें चाचा नेहरू के रूप में जानते हैं।

स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री का पद संभालने के लिए कांग्रेस द्वारा नेहरू निर्वाचित हुए, यद्यपि नेतृत्व का प्रश्न बहुत पहले 1941 में ही सुलझ चुका था, जब गांधीजी ने नेहरू को उनके राजनीतिक वारिस और उत्तराधिकारी के रूप में अभिस्वीकार किया। प्रधानमन्त्री के रूप में, वे भारत के सपने को साकार करने के लिए चल पड़े। भारत का संविधान 1950 में अधिनियमित हुआ, जिसके बाद उन्होंने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुधारों के एक महत्त्वाकांक्षी योजना की शुरुआत की। मुख्यतः, एक बहुवचनी, बहु-दलीय  लोकतन्त्र   को पोषित करते हुए, उन्होंने भारत के एक उपनिवेश से गणराज्य में परिवर्तन होने का पर्यवेक्षण किया। विदेश नीति में, भारत को दक्षिण एशिया में एक क्षेत्रीय नायक के रूप में प्रदर्शित करते हुए, उन्होंने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में एक अग्रणी भूमिका निभाई।

नेहरू के नेतृत्व में, कांग्रेस राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय चुनावों में प्रभुत्व दिखाते हुए और 1951, 1957, और 1962 के लगातार चुनाव जीतते हुए, एक सर्व-ग्रहण पार्टी के रूप में उभरी। उनके अन्तिम वर्षों में राजनीतिक संकटों और 1962 के चीनी-भारत युद्ध में उनके नेतृत्व की असफलता के बाद भी , वे भारत में लोगों के बीच लोकप्रिय बने रहे । भारत में, उनका जन्मदिन बाल दिवस  के रूप में मनाया जाता है।

जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को ब्रिटिश भारत में इलाहाबाद में हुआ। उनके पिता, मोतीलाल नेहरू (1861–1931), एक धनी बैरिस्टर जो कश्मीरी पण्डित थे। मोती लाल नेहरू सारस्वत कौल ब्राह्मण समुदाय से थे,  स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए। उनकी माता स्वरूपरानी थुस्सू (1868–1938), जो लाहौर में बसे एक सुपरिचित कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थी, मोतीलाल की दूसरी पत्नी थी व पहली पत्नी की प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी। जवाहरलाल तीन बच्चों में से सबसे बड़े थे, जिनमें बाकी दो लड़कियां थी।  बड़ी बहन, विजया लक्ष्मी, बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी। सबसे छोटी बहन, कृष्णा हठीसिंग, एक उल्लेखनीय लेखिका बनी और उन्होंने अपने परिवार-जनों से संबंधित कई पुस्तकें लिखीं।

जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया के कुछ बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज (लंदन) से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए जिसमें वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया।

जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए।

नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपड़ों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया। वे अब एक खादी कुर्ता और गांधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।

जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर त्यागपत्र दे दिया।

दिसम्बर 1929 में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र के दौरान एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें 'पूर्ण स्वराज्य' की मांग की गई। 26 जनवरी 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। आंदोलन खासा सफल रहा और इसने ब्रिटिश सरकार को प्रमुख राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया।

जब ब्रिटिश सरकार ने भारत अधिनियम 1935 प्रख्यापित किया तब कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। नेहरू चुनाव के बाहर रहे लेकिन ज़ोरों के साथ पार्टी के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। कांग्रेस ने लगभग हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केन्द्रीय असेंबली में सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की।

नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936 और 1937 में चुने गए थे। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड़ दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भागीदारी की।

सन् १९४७ में भारत को आजादी मिलने पर जब भावी प्रधानमन्त्री के लिये कांग्रेस में मतदान हुआ तो तो सरदार पटेल को सर्वाधिक मत मिले। उसके बाद सर्वाधिक मत आचार्य कृपलानी को मिले थे। किन्तु गांधीजी के कहने पर सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमन्त्री बनाया गया।

जवाहर लाल नेहरू ने जोसिप बरोज़ टिटो और अब्दुल गमाल नासिर के साथ मिलकर एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए एक गुट निरपेक्ष आंदोलन की रचना की। वह कोरियाई युद्ध का अंत करने, स्वेज नहर विवाद सुलझाने और कांगो समझौते को मूर्तरूप देने जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में मध्यस्थ की भूमिका में रहे। पश्चिम बर्लिन, ऑस्ट्रिया और लाओस के जैसे कई अन्य विस्फोटक मुद्दों के समाधान में पर्दे के पीछे रह कर भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्हें वर्ष 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

लेकिन नेहरू पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों में सुधार नहीं कर पाए। पाकिस्तान के साथ एक समझौते तक पहुंचने में कश्मीर मुद्दा और चीन के साथ मित्रता में सीमा विवाद रास्ते के पत्थर साबित हुए। नेहरू ने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। नेहरू के लिए यह एक बड़ा झटका था और शायद / किंचित उनकी मौत भी इसी कारण हुई। 27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू को दिल का दौरा पड़ा जिसमें उनकी मृत्यु हो गयी।

समस्त राजनीतिक विवादों से दूर नेहरू जी निःसंदेह एक उत्तम लेखक थे। राजनीतिक क्षेत्र में लोकमान्य तिलक के बाद जम कर लिखने वाले नेताओं में वे अलग से पहचाने जाते हैं। दोनों के क्षेत्र अलग हैं, परंतु दोनों के लेखन में सुसंबद्धता पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है।

नेहरू जी स्वभाव से ही स्वाध्यायी थे। उन्होंने महान् ग्रंथों का अध्ययन किया था। सभी राजनैतिक उत्तेजनाओं के बावजूद वे स्वाध्याय के लिए रोज ही समय निकाल लिया करते थे।  परिणामस्वरूप उनके द्वारा रचित पुस्तकें भी एक अध्ययन-पुष्ट व्यक्ति की रचना होने की सहज प्रतीति कराती हैं।

नेहरू जी ने व्यवस्थित रूप से अनेक पुस्तकों की रचना की है। राजनीतिक जीवन के व्यस्ततम संघर्षपूर्ण दिनों में लेखन हेतु समय के नितांत अभाव का हल उन्होंने यह निकाला कि जेल के लंबे नीरस दिनों को सर्जनात्मक बना लिया जाय। इसलिए उनकी अधिकांश पुस्तकें जेल में ही लिखी गयी हैं। उनके लेखन में एक साहित्यकार के भावप्रवण तथा एक इतिहासकार के खोजी हृदय का मिला-जुला रूप सामने आया है।

इंदिरा गांधी को काल्पनिक पत्र लिखने के बहाने उन्होंने विश्व इतिहास का अध्याय-दर-अध्याय लिख डाला। ये पत्र वास्तव में कभी भेजे नहीं गये, परंतु इससे विश्व इतिहास की झलक जैसा सहज संप्रेष्य तथा सुसंबद्ध ग्रंथ सहज ही तैयार हो गया। भारत की खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) ने लोकप्रियता के अलग प्रतिमान रचे हैं, जिस पर आधारित भारत एक खोज नाम से एक उत्तम धारावाहिक का निर्माण भी हुआ है। उनकी आत्मकथा मेरी कहानी ( ऐन ऑटो बायोग्राफी) के बारे में सुप्रसिद्ध मनीषी सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना है कि उनकी आत्मकथा, जिसमें आत्मकरुणा या नैतिक श्रेष्ठता को जरा भी प्रमाणित करने की चेष्टा किए बिना उनके जीवन और संघर्ष की कहानी वर्णित की गयी है, जो हमारे युग की सबसे अधिक उल्लेखनीय पुस्तकों में से एक है।

इन पुस्तकों के अतिरिक्त नेहरू जी ने अगणित व्याख्यान दिये, लेख लिखे तथा पत्र लिखे। इनके प्रकाशन हेतु 'जवाहरलाल नेहरू स्मारक निधि' ने एक ग्रंथ-माला के प्रकाशन का निश्चय किया। इसमें सरकारी चिट्ठियों, विज्ञप्तियों आदि को छोड़कर स्थायी महत्त्व की सामग्रियों को चुनकर प्रकाशित किया गया। जवाहरलाल नेहरू  वांग्मय नामक इस ग्रंथ माला का प्रकाशन अंग्रेजी में 15 खंडों में हुआ तथा हिंदी में सस्ता साहित्य मंडल ने इसे 11 खंडों में प्रकाशित किया है।




#Article 87: मनमोहन सिंह (1129 words)


मनमोहन सिंह (; जन्म : २६ सितंबर १९३२) भारत गणराज्य के १३वें प्रधानमन्त्री थे। साथ ही साथ वे एक अर्थशास्त्री भी हैं। लोकसभा चुनाव २००९ में मिली जीत के बाद वे जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमन्त्री बन गये हैं, जिनको पाँच वर्षों का कार्यकाल सफलता पूर्वक पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला है। इन्हें २१ जून १९९१ से १६ मई १९९६ तक पी वी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्त मन्त्री के रूप में किए गए आर्थिक सुधारों के लिए भी श्रेय दिया जाता है।

मनमोहन सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत (वर्तमान पाकिस्तान) के पंजाब प्रान्त में २६ सितम्बर,१९३२ को हुआ था। उनकी माता का नाम अमृत कौर और पिता का नाम गुरुमुख सिंह था। देश के विभाजन के बाद सिंह का परिवार भारत चला आया। यहाँ पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई पूरी की। बाद में वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गये। जहाँ से उन्होंने पीएच. डी. की। तत्पश्चात् उन्होंने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी. फिल. भी किया। उनकी पुस्तक इंडियाज़ एक्सपोर्ट ट्रेंड्स एंड प्रोस्पेक्ट्स फॉर सेल्फ सस्टेंड ग्रोथ भारत की अन्तर्मुखी व्यापार नीति की पहली और सटीक आलोचना मानी जाती है। डॉ॰ सिंह ने अर्थशास्त्र के अध्यापक के तौर पर काफी ख्याति अर्जित की। वे पंजाब विश्वविद्यालय और बाद में प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकनामिक्स में प्राध्यापक रहे। इसी बीच वे संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन सचिवालय में सलाहकार भी रहे और १९८७ तथा १९९० में जेनेवा में साउथ कमीशन में सचिव भी रहे। १९७१ में डॉ॰ सिंह भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मन्त्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किये गये। इसके तुरन्त बाद १९७२ में उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया। इसके बाद के वर्षों में वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमन्त्री के आर्थिक सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रहे हैं। भारत के आर्थिक इतिहास में हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब डॉ॰ सिंह १९९१ से १९९६ तक भारत के वित्त मन्त्री रहे। उन्हें भारत के आर्थिक सुधारों का प्रणेता माना गया है। आम जनमानस में ये साल निश्चित रूप से डॉ॰ सिंह के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। डॉ॰ सिंह के परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती गुरशरण कौर और तीन बेटियाँ हैं।

मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण को उपचार के रूप में प्रस्तुत किया और भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाज़ार के साथ जोड़ दिया। डॉ॰ मनमोहन सिंह ने आयात और निर्यात को भी सरल बनाया। लाइसेंस एवं परमिट गुज़रे ज़माने की चीज़ हो गई। निजी पूंजी को उत्साहित करके रुग्ण एवं घाटे में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रमों हेतु अलग से नीतियाँ विकसित कीं। नई अर्थव्यवस्था जब घुटनों पर चल रही थी, तब पी. वी. नरसिम्हा राव को कटु आलोचना का शिकार होना पड़ा। विपक्ष उन्हें नए आर्थिक प्रयोग से सावधान कर रहा था। लेकिन श्री राव ने मनमोहन सिंह पर पूरा यक़ीन रखा। मात्र दो वर्ष बाद ही आलोचकों के मुँह बंद हो गए और उनकी आँखें फैल गईं। उदारीकरण के बेहतरीन परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था में नज़र आने लगे थे और इस प्रकार एक ग़ैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति जो अर्थशास्त्र का प्रोफ़ेसर था, का भारतीय राजनीति में प्रवेश हुआ ताकि देश की बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके।

सिंह पहले पंजाब यूनिवर्सिटी और बाद में दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में प्रोफेसर के पद पर थे। १९७१ में मनमोहन सिंह भारत सरकार की कॉमर्स मिनिस्ट्री में आर्थिक सलाहकार के तौर पर शामिल हुए थे। १९७२ में मनमोहन सिंह वित्त मंत्रालय में चीफ इकॉनॉमिक अडवाइज़र बन गए। अन्य जिन पदों पर वह रहे, वे हैं– वित्त मंत्रालय में सचिव, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष। मनमोहन सिंह 1991 से राज्यसभा के सदस्य हैं। १९९८ से २००४ में वह राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे। मनमोहन सिंह ने प्रथम बार ७२ वर्ष की उम्र में २२ मई २००४ से प्रधानमंत्री का कार्यकाल आरम्भ किया, जो अप्रैल २००९ में सफलता के साथ पूर्ण हुआ। इसके पश्चात् लोकसभा के चुनाव हुए और भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की अगुवाई वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन पुन: विजयी हुआ और सिंह दोबारा प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दो बार बाईपास सर्जरी हुई है। दूसरी बार फ़रवरी २००९ में विशेषज्ञ शल्य चिकित्सकों की टीम ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में इनकी शल्य-चिकित्सा की। प्रधानमंत्री सिंह ने वित्तमंत्री के रूप में पी. चिदम्बरम को अर्थव्यवस्था का दायित्व सौंपा था, जिसे उन्होंने कुशलता के साथ निभाया। लेकिन २००९ की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का प्रभाव भारत में भी देखने को मिला। परन्तु भारत की बैंकिंग व्यवस्था का आधार मज़बूत होने के कारण उसे उतना नुक़सान नहीं उठाना पड़ा, जितना अमेरिका और अन्य देशों को उठाना पड़ा है। 26 नवम्बर 2008 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकियों ने हमला किया। दिल दहला देने वाले उस हमले ने देश को हिलाकर रख दिया था। तब सिंह ने शिवराज पाटिल को हटाकर पी. चिदम्बरम को गृह मंत्रालय की ज़िम्मेदारी सौंपी और प्रणव मुखर्जी को नया वित्त मंत्री बनाया।

इसके अतिरिक्त उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियाई विकास बैंक के लिये भी काफी महत्वपूर्ण काम किया है।

सन १९८७ में उपरोक्त पद्म विभूषण के अतिरिक्त भारत के सार्वजनिक जीवन में डॉ॰ सिंह को अनेकों पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं: -

डॉ॰ सिंह ने कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। अपने राजनैतिक जीवन में वे १९९१ से राज्य सभा के सांसद तो रहे ही, १९९८ तथा २००४ की संसद में विपक्ष के नेता भी रह चुके हैं।

टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, जो स्वतन्त्र भारत का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला है उस घोटाले में भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के अनुसार एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपये का घपला हुआ है। इस घोटाले में विपक्ष के भारी दवाव के चलते मनमोहन सरकार में संचार मन्त्री ए० राजा को न केवल अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा, अपितु उन्हें जेल भी जाना पडा। केवल इतना ही नहीं, भारतीय उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में प्रधानमन्त्री सिंह की चुप्पी पर भी सवाल उठाया। इसके अतिरिक्त टूजी स्पेक्ट्रम आवण्टन को लेकर संचार मन्त्री ए० राजा की नियुक्ति के लिये हुई पैरवी के सम्बन्ध में नीरा राडिया, पत्रकारों, नेताओं और उद्योगपतियों से बातचीत के बाद डॉ॰ सिंह की सरकार भी कटघरे में आ गयी थी।

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में देश में कोयला आवंटन के नाम पर करीब 26 लाख करोड़ रुपये की लूट हुई और सारा कुछ प्रधानमंत्री की देखरेख में हुआ क्योंकि यह मंत्रालय उन्हीं के पास है। 

इस महाघोटाले का राज है कोयले का कैप्टिव ब्लॉक, जिसमें निजी क्षेत्र को उनकी मर्जी के मुताबिक ब्लॉक आवंटित कर दिया गया। इस कैप्टिव ब्लॉक नीति का फायदा हिंडाल्को, जेपी पावर, जिंदल पावर, जीवीके पावर और एस्सार आदि जैसी कंपनियों ने जोरदार तरीके से उठाया। यह नीति खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दिमाग की उपज थी।




#Article 88: पी॰ वी॰ नरसिम्हा राव (272 words)


पामुलापति वेंकट नरसिंह राव (जन्म- 28 जून 1921, मृत्यु- 23 दिसम्बर 2004) भारत के 10 वें प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं। 'लाइसेंस राज' की समाप्ति और भारतीय अर्थनीति में खुलेपन उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही आरम्भ हुआ। ये आन्ध्रा प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे।

इनके प्रधानमंत्री बनने में भाग्य का बहुत बड़ा हाथ रहा है। 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या हो गई थी। ऐसे में सहानुभूति की लहर के कारण कांग्रेस को निश्चय ही लाभ प्राप्त हुआ। 1991 के आम चुनाव दो चरणों में हुए थे। प्रथम चरण के चुनाव राजीव गांधी की हत्या से पूर्व हुए थे और द्वितीय चरण के चुनाव उनकी हत्या के बाद में। प्रथम चरण की तुलना में द्वितीय चरण के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा। इसका प्रमुख कारण राजीव गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर थी। इस चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ लेकिन वह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। कांग्रेस ने 232 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। फिर नरसिम्हा राव को कांग्रेस संसदीय दल का नेतृत्व प्रदान किया गया। ऐसे में उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया। सरकार अल्पमत में थी, लेकिन कांग्रेस ने बहुमत साबित करने के लायक़ सांसद जुटा लिए और कांग्रेस सरकार ने पाँच वर्ष का अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूर्ण किया।
 पीवी नरसिंह राव ने देश की कमान काफी मुश्किल समय में संभाली थी। उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार चिंताजनक स्तर तक कम हो गया था और देश का सोना तक गिरवी रखना पड़ा था। उन्होंने रिजर्व बैंक के अनुभवी गवर्नर डॉ. मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाकर देश को आर्थिक भंवर से बाहर निकाला। 




#Article 89: लालबहादुर शास्त्री (2063 words)


 लालबहादुर शास्त्री (जन्म: 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय (वाराणसी) : मृत्यु: 11 जनवरी 1966 ताशकंद, सोवियत संघ रूस), भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे। इस प्रमुख पद पर उनका कार्यकाल अद्वितीय रहा।शास्त्री जी ने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की। 

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। गोविंद बल्लभ पंत के मंत्रिमंडल (मन्त्रिमण्डल) में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मंत्रालय सौंपा गया। परिवहन मंत्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी। पुलिस मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियंत्रण (नियन्त्रण) में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारंभ (प्रारम्भ) कराया। 1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होंने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिये बहुत परिश्रम किया।

जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमंत्री का पद भार ग्रहण किया।

उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

ताशकंद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।

उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिवस पर 2 अक्टूबर को शास्त्री जयंती व उनके देहावसान वाले दिन 11 जनवरी को लालबहादुर शास्त्री स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में एक कायस्थ परिवार में मुंशी  शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी । लालबहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने का हुआ दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उनकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्ज़ापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे 'शास्त्री' लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया।

 
संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् वे भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गान्धीवादी थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन उल्लेखनीय हैं।
 
दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को दिल्ली चलो का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को भारत छोड़ो व भारतीयों को करो या मरो का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने इलाहाबाद पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक मरो नहीं, मारो! में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये।
 
शास्त्रीजी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में पुरुषोत्तमदास टंडन और पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। सबसे पहले 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने टण्डनजी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढ़ी। इसके बाद तो शास्त्रीजी का कद निरन्तर बढ़ता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढ़ते हुए वे नेहरूजी के मंत्रिमण्डल में गृहमन्त्री के प्रमुख पद तक जा पहुँचे। और इतना ही नहीं, नेहरू के निधन के पश्चात भारतवर्ष के प्रधान मन्त्री भी बने।

उनकी साफ सुथरी छवि के कारण ही उन्हें 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी शीर्ष प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है और वे ऐसा करने में सफल भी रहे। उनके क्रियाकलाप सैद्धान्तिक न होकर पूर्णत: व्यावहारिक और जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप थे।

निष्पक्ष रूप से यदि देखा जाये तो शास्त्रीजी का शासन काल बेहद कठिन रहा। पूँजीपति देश पर हावी होना चाहते थे और दुश्मन देश हम पर आक्रमण करने की फिराक में थे। 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया। परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख व मन्त्रिमण्डल के सदस्य शामिल थे। संयोग से प्रधानमन्त्री उस बैठक में कुछ देर से पहुँचे। उनके आते ही विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ। तीनों प्रमुखों ने उनसे सारी वस्तुस्थिति समझाते हुए पूछा: सर! क्या हुक्म है? शास्त्रीजी ने एक वाक्य में तत्काल उत्तर दिया: आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है?

शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

भारत पाक युद्ध के दौरान ६ सितम्बर को भारत की १५वी पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्तृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के बहुत बड़े हमले का डटकर मुकाबला किया। इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी। इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। भारतीय थलसेना ने दूनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने में सफलता अर्जित की। इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की।

आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्रीजी पर जोर डाला गया। उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकन्द न जायें और वे भी मान गयीं। अपनी इस भूल का श्रीमती ललिता शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा। जब समझौता वार्ता चली तो शास्त्रीजी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं। काफी जद्दोजहेद के बाद शास्त्रीजी पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये। उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधान मन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि क्या वाकई शास्त्रीजी की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी? कई लोग उनकी मौत की वजह जहर को ही मानते हैं।

शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हें मरणोपरान्त वर्ष 1966 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

पाकिस्तान के आक्रमण का सामना करते हुए भारतीय सेना ने लाहौर पर धाबा बोल दिया। इस अप्रत्याशित आक्रमण को देख अमेरिका ने लाहौर में रह रहे अमेरिकी नागरिकों को निकालने के लिए कुछ समय के लिए युद्धविराम की मांग की। रूस और अमेरिका के चहलकदमी के बाद भारत के प्रधानमंत्री को रूस के ताशकंद समझौता में बुलाया गया।   ने ताशकंद समझौते की हर शर्तों को मंजूर कर लिया मगर पाकिस्तान जीते इलाकों को लौटाना हरगिज स्वीकार नहीं था। अंतर्राष्ट्रीय दवाब में शास्त्री जी को ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा पर लाल बहादुर शास्त्री ने खुद  प्रधानमंत्री कार्यकाल में इस जमीन को वापस करने से इंकार कर दिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब खान के साथ युद्ध विराम पर हस्ताक्षर करने के कुछ घंटे बाद ही भारत देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का संदिग्ध निधन हो गया। 11 जनवरी 1966 की रात देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री की मृत्यु हो गई।

ताशकन्द समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उसी रात उनकी मृत्यु हो गयी। मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया गया। शास्त्रीजी की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्तिवन (नेहरू जी की समाधि) के आगे यमुना किनारे की गयी और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया। जब तक कांग्रेस संसदीय दल ने इन्दिरा गान्धी को शास्त्री का विधिवत उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया, गुलजारी लाल नन्दा कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे।

शास्त्रीजी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मानते है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं बल्कि जहर देने से ही हुई। पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी ऐसा बताया गया। मजे की बात यह कि इण्डियन पार्लियामेण्ट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है। यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्रीजी का पोस्ट मार्टम भी नहीं हुआ। 2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जबाव दिया गया कि शास्त्रीजी के प्राइवेट डॉक्टर आर०एन०चुघ और कुछ रूस के कुछ डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जाँच तो की थी परन्तु सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। बाद में प्रधानमन्त्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी माँगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी।
 
शास्त्रीजी की मौत में संभावित साजिश की पूरी पोल आउटलुक नाम की एक पत्रिका ने खोली। 2009 में, जब साउथ एशिया पर सीआईए की नज़र (अंग्रेजी: CIA's Eye on South Asia) नामक पुस्तक के लेखक अनुज धर ने सूचना के अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी पर प्रधानमन्त्री कार्यालय की ओर से यह कहना कि शास्त्रीजी की मृत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथल-पुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस भी पहुँच सकती है। ये तमाम कारण हैं जिससे इस सवाल का जबाव नहीं दिया जा सकता।।

सबसे पहले सन् 1978 में प्रकाशित एक हिन्दी पुस्तक ललिता के आँसू में शास्त्रीजी की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढँग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था। उस समय (सन् उन्निस सौ अठहत्तर में) ललिताजी जीवित थीं।

यही नहीं, कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकन्द में शास्त्रीजी के साथ गये थे, इस घटना चक्र पर विस्तार से प्रकाश डाला है। गत वर्ष जुलाई 2012 में शास्त्रीजी के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की माँग की थी।

मित्रोखोन आर्काइव नामक पुस्तक में भारत से संबन्धित अध्याय को पढ़ने पर ताशकंद समझौते के बारे में एवं उस समय की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में विस्तरित जानकारी मिलती है।

 




#Article 90: मोरारजी देसाई (1115 words)


मोरारजी देसाई (29 फ़रवरी 1896 – 10 अप्रैल 1995) (गुजराती: મોરારજી રણછોડજી દેસાઈ) भारत के स्वाधीनता सेनानी और देश के चौथे प्रधानमंत्री (सन् 1977 से 79) थे। वह प्रथम प्रधानमंत्री थे जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बजाय अन्य दल से थे। वही एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न एवं पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया है। 

वह 81 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बने थे। इसके पूर्व कई बार उन्होंने प्रधानमंत्री बनने की कोशिश की परंतु असफल रहे। लेकिन ऐसा नहीं हैं कि मोरारजी प्रधानमंत्री बनने के क़ाबिल नहीं थे। वस्तुत: वह दुर्भाग्यशाली रहे कि वरिष्ठतम नेता होने के बावज़ूद उन्हें पंडित नेहरू और लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद भी प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया। मोरारजी देसाई मार्च 1977 में देश के प्रधानमंत्री बने लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में इनका कार्यकाल पूर्ण नहीं हो पाया। चौधरी चरण सिंह से मतभेदों के चलते उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा।

मोरारजी देसाई का जन्म 29 फ़रवरी 1896 को गुजरात के भदेली नामक स्थान पर हुआ था। उनका संबंध एक ब्राह्मण परिवार से था। उनके पिता रणछोड़जी देसाई भावनगर (सौराष्ट्र) में एक स्कूल अध्यापक थे। वह अवसाद (निराशा एवं खिन्नता) से ग्रस्त रहते थे, अत: उन्होंने कुएं में कूद कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। पिता की मृत्यु के तीसरे दिन मोरारजी देसाई की शादी हुई थी।

मोरारजी देसाई की शिक्षा-दीक्षा मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में हुई जो उस समय काफ़ी महंगा और खर्चीला माना जाता था। मुंबई में मोरारजी देसाई नि:शुल्क आवास गृह में रहे जो गोकुलदास तेजपाल के नाम से प्रसिद्ध था। एक समय में वहाँ 40 शिक्षार्थी रह सकते थे। विद्यार्थी जीवन में मोरारजी देसाई औसत बुद्धि के विवेकशील छात्र थे। इन्हें कॉलेज की वाद-विवाद टीम का सचिव भी बनाया गया था लेकिन स्वयं मोरारजी ने मुश्किल से ही किसी वाद-विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा लिया होगा। मोरारजी देसाई ने अपने कॉलेज जीवन में ही महात्मा गाँधी, बाल गंगाधर तिलक और अन्य कांग्रेसी नेताओं के संभाषणों को सुना था।

मोरारजी देसाई ने मुंबई प्रोविंशल सिविल सर्विस हेतु आवेदन करने का मन बनाया जहाँ सरकार द्वारा सीधी भर्ती की जाती थी। जुलाई 1917 में उन्होंने यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर्स में प्रविष्टि पाई। यहाँ इन्हें ब्रिटिश व्यक्तियों की भाँति समान अधिकार एवं सुविधाएं प्राप्त होती रहीं। यहाँ रहते हुए मोरारजी अफ़सर बन गए। मई 1918 में वह परिवीक्षा पर बतौर उप ज़िलाधीश अहमदाबाद पहुंचे। उन्होंने चेटफ़ील्ड नामक ब्रिटिश कलेक्टर (ज़िलाधीश) के अंतर्गत कार्य किया। मोरारजी 11 वर्षों तक अपने रूखे स्वभाव के कारण विशेष उन्नति नहीं प्राप्त कर सके और कलेक्टर के निजी सहायक पद तह ही पहुँचे।

मोरारजी देसाई ने 1930 में ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही बन गए। 1931 में वह गुजरात प्रदेश की कांग्रेस कमेटी के सचिव बन गए। उन्होंने अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की शाखा स्थापित की और सरदार पटेल के निर्देश पर उसके अध्यक्ष बन गए। 1932 में मोरारजी को 2 वर्ष की जेल भुगतनी पड़ी। मोरारजी 1937 तक गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव रहे। इसके बाद वह बंबई राज्य के कांग्रेस मंत्रिमंडल में सम्मिलित हुए। इस दौरान यह माना जाता रहा कि मोरारजी देसाई के व्यक्तितत्त्व में जटिलताएं हैं। वह स्वयं अपनी बात को ऊपर रखते हैं और सही मानते हैं। इस कारण लोग इन्हें व्यंग्य से 'सर्वोच्च नेता' कहा करते थे। मोरारजी को ऐसा कहा जाना पसंद भी आता था। गुजरात के समाचार पत्रों में प्राय: उनके इस व्यक्तित्व को लेकर व्यंग्य भी प्रकाशित होते थे। कार्टूनों में इनके चित्र एक लंबी छड़ी के साथ होते थे जिसमें इन्हें गाँधी टोपी भी पहने हुए दिखाया जाता था। इसमें व्यंग्य यह होता था कि गाँधीजी के व्यक्तित्व से प्रभावित लेकिन अपनी बात पर अड़े रहने वाले एक ज़िद्दी व्यक्ति।

स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी के कारण मोरारजी देसाई के कई वर्ष ज़ेलों में ही गुज़रे। देश की आज़ादी के समय राष्ट्रीय राजनीति में इनका नाम वज़नदार हो चुका था। लेकिन मोरारजी की प्राथमिक रुचि राज्य की राजनीति में ही थी। यही कारण है कि 1952 में इन्हें बंबई का मुख्यमंत्री बनाया गया। इस समय तक गुजरात तथा महाराष्ट्र बंबई प्रोविंस के नाम से जाने जाते थे और दोनों राज्यों का पृथक गठन नहीं हुआ था। 1967 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने पर मोरारजी को उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बनाया गया। लेकिन वह इस बात को लेकर कुंठित थे कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता होने पर भी उनके बजाय इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। यही कारण है कि इंदिरा गाँधी द्वारा किए जाने वाले क्रांतिकारी उपायों में मोरारजी निरंतर बाधा डालते रहे। दरअसल जिस समय श्री कामराज ने सिंडीकेट की सलाह पर इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की घोषणा की थी तब मोरारजी भी प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल थे। जब वह किसी भी तरह नहीं माने तो पार्टी ने इस मुद्दे पर चुनाव कराया और इंदिरा गाँधी ने भारी मतांतर से बाज़ी मार ली। इंदिरा गाँधी ने मोरारजी के अहं की तुष्टि के लिए इन्हें उप प्रधानमंत्री का पद दिया।

पण्डित जवाहर लाल नेहरू के समय कांग्रेस में जो अनुशासन था, वह उनकी मृत्यु के बाद बिखरने लगा। कई सदस्य स्वयं को पार्टी से बड़ा समझते थे। मोरारजी देसाई भी उनमें से एक थे। श्री लालबहादुर शास्त्री ने कांग्रेस पार्टी के वफ़ादार सिपाही की भाँति कार्य किया था। उन्होंने पार्टी से कभी भी किसी पद की मांग नहीं की थी। लेकिन इस मामले में मोरारजी देसाई अपवाद में रहे। कांग्रेस संगठन के साथ उनके मतभेद जगज़ाहिर थे और देश का प्रधानमंत्री बनना इनकी प्राथमिकताओं में शामिल था। इंदिरा गांधी ने जब यह समझ लिया कि मोरारजी देसाई उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा कर रहे हैं तो उन्होंने मोरारजी के पर कतरना आरम्भ कर दिया। इस कारण उनका क्षुब्ध होना स्वाभाविक था। नवम्बर 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन कांग्रेस-आर और कांग्रेस-ओ के रूप में हुआ तो मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी की कांग्रेस-आई के बजाए सिंडीकेट के कांग्रेस-ओ में चले गए। फिर 1975 में वह जनता पार्टी में शामिल हो गए। मार्च 1977 में जब लोकसभा के चुनाव हुए तो जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया। परन्तु यहाँ पर भी प्रधानमंत्री पद के दो अन्य दावेदार उपस्थित थे-चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम। लेकिन जयप्रकाश नारायण जो स्वयं कभी कांग्रेसी हुआ करते थे, उन्होंने किंग मेकर की अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए मोरारजी देसाई का समर्थन किया।

इसके बाद 23 मार्च 1977 को 81 वर्ष की अवस्था में मोरारजी देसाई ने भारतीय प्रधानमंत्री का दायित्व ग्रहण किया। इनके प्रधानमंत्रित्व के आरम्भिक काल में, देश के जिन नौ राज्यों में कांग्रेस का शासन था, वहाँ की सरकारों को भंग कर दिया गया और राज्यों में नए चुनाव कराये जाने की घोषणा भी करा दी गई। यह अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक कार्य था। जनता पार्टी, इंदिरा गांधी और उनकी समर्थित कांग्रेस का देश से सफ़ाया करने को कृतसंकल्प नज़र आई। लेकिन इस कृत्य को बुद्धिजीवियों द्वारा सराहना प्राप्त नहीं हुई।




#Article 91: सनातन धर्म (944 words)


सनातन धर्म अपने मूल रूप हिंदु धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है। वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये सनातन धर्म नाम मिलता है। 'सनातन' का अर्थ है - शाश्वत या 'हमेशा बना रहने वाला', अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त।सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है। सिन्धु नदी के पार के वासियो को ईरानवासी हिन्दू कहते, जो 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। उनकी देखा-देखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतवासियों को हिन्दू और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। भारत के अपने साहित्य में हिन्दू शब्द कोई १००० वर्ष पूर्व ही मिलता है, उसके पहले नहीं। हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था।

सनातन धर्म जिसे हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहा जाता है और यह १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं। भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था।

प्राचीन काल में भारतीय सनातन धर्म में गाणपत्य, शैवदेव, कोटी वैष्णव, शाक्त और सौर नाम के पाँच सम्प्रदाय होते थे। गाणपत्य गणेशकी, वैष्णव विष्णु की, शैवदेव, कोटी शिव की, शाक्त शक्ति की और सौर सूर्य की पूजा आराधना किया करते थे। पर यह मान्यता थी कि सब एक ही सत्य की व्याख्या हैं। यह न केवल ऋग्वेद परन्तु रामायण और महाभारत जैसे लोकप्रिय ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है। प्रत्येक सम्प्रदाय के समर्थक अपने देवता को दूसरे सम्प्रदायों के देवता से बड़ा समझते थे और इस कारण से उनमें वैमनस्य बना रहता था। एकता बनाए रखने के उद्देश्य से धर्मगुरुओं ने लोगों को यह शिक्षा देना आरम्भ किया कि सभी देवता समान हैं, विष्णु, शिव और शक्ति आदि देवी-देवता परस्पर एक दूसरे के भी भक्त हैं। उनकी इन शिक्षाओं से तीनों सम्प्रदायों में मेल हुआ और सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई। सनातन धर्म में विष्णु, शिव और शक्ति को समान माना गया और तीनों ही सम्प्रदाय के समर्थक इस धर्म को मानने लगे। सनातन धर्म का सारा साहित्य वेद, पुराण, श्रुति, स्मृतियाँ, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि संस्कृत भाषा में रचा गया है।

कालान्तर में भारतवर्ष में मुसलमान शासन हो जाने के कारण देवभाषा संस्कृत का ह्रास हो गया तथा सनातन धर्म की अवनति होने लगी। इस स्थिति को सुधारने के लिये विद्वान संत तुलसीदास ने प्रचलित भाषा में धार्मिक साहित्य की रचना करके सनातन धर्म की रक्षा की।

जब औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन को ईसाई, मुस्लिम आदि धर्मों के मानने वालों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये जनगणना करने की आवश्यकता पड़ी तो सनातन शब्द से अपरिचित होने के कारण उन्होंने यहाँ के धर्म का नाम सनातन धर्म के स्थान पर हिंदू धर्म रख दिया।

सनातन में आधुनिक और समसामयिक चुनौतियों का सामना करने के लिए इसमें समय समय पर बदलाव होते रहे हैं, जैसे कि राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद आदि ने सती प्रथा, बाल विवाह, अस्पृश्यता जैसे असुविधाजनक परंपरागत कुरीतियों से असहज महसूस करते रहे। इन कुरीतियों की जड़ो (धर्मशास्त्रो) में मौजूद उन श्लोको -मंत्रो को क्षेपक कहा या फिर इनके अर्थो को बदला और इन्हें त्याज्य घोषित किया तो कई पुरानी परम्पराओं का पुनरुद्धार किया जैसे विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा आदि। यद्यपि आज सनातन का पर्याय हिन्दू है पर सिख, बौद्ध, जैन धर्मावलम्बी भी सनातन धर्म का हिस्सा हैं, क्योंकि बुद्ध भी अपने को सनातनी कहते हैं।यहाँ तक कि नास्तिक जोकि चार्वाक दर्शन को मानते हैं वह भी सनातनी हैं। सनातन धर्मी के लिए किसी विशिष्ट पद्धति, कर्मकांड, वेशभूषा को मानना जरुरी नहीं। बस वह सनातनधर्मी परिवार में जन्मा हो, वेदांत, मीमांसा, चार्वाक, जैन, बौद्ध, आदि किसी भी दर्शन को मानता हो बस उसके सनातनी होने के लिए पर्याप्त है।

सनातन धर्म की गुत्थियों को देखते हुए कई बार इसे कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है। हालांकि, सच्चाई तो ऐसी नहीं है, फिर भी इसके इतने आयाम, इतने पहलू हैं कि लोगबाग कई बार इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं। सबसे बड़ा कारण इसका यह कि सनातन धर्म किसी एक दार्शनिक, मनीषा या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है, न ही यह किसी ख़ास समय पैदा हुआ। यह तो अनादि काल से प्रवाहमान और विकासमान रहा। साथ ही यह केवल एक दृष्टा, सिद्धांत या तर्क को भी वरीयता नहीं देता।

विज्ञान जब प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्व का मूल्यांकन करता है तो इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदांत में उल्लेखित जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन किया गया है विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है।

हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर 'मोक्ष' की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था। मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन मार्ग माना है।




#Article 92: ज्योतिष (730 words)


ज्‍योतिष या ज्यौतिष विषय वेदों जितना ही प्राचीन है। प्राचीन काल में ग्रह, नक्षत्र और अन्‍य खगोलीय पिण्‍डों का अध्‍ययन करने के विषय को ही ज्‍योतिष कहा गया था। इसके गणित भाग के बारे में तो बहुत स्‍पष्‍टता से कहा जा सकता है कि इसके बारे में वेदों में स्‍पष्‍ट गणनाएं दी हुई हैं। फलित भाग के बारे में बहुत बाद में जानकारी मिलती है।

भारतीय आचार्यों द्वारा रचित ज्योतिष की पाण्डुलिपियों की संख्या एक लाख से भी अधिक है। 

प्राचीनकाल में गणित एवं ज्यौतिष समानार्थी थे परन्तु आगे चलकर इनके तीन भाग हो गए।

इन तीनों स्कन्धों ( तन्त्र-होरा-शाखा ) का जो ज्ञाता होता था उसे 'संहितापारग' कहा जाता था। 

तन्त्र या सिद्धान्त में मुख्यतः दो भाग होते हैं, एक में ग्रह आदि की गणना और दूसरे में सृष्टि-आरम्भ, गोल विचार, यन्त्ररचना और कालगणना सम्बन्धी मान रहते हैं। तंत्र और सिद्धान्त को बिल्कुल पृथक् नहीं रखा जा सकता । सिद्धान्त, तन्त्र और करण के लक्षणों में यह है कि ग्रहगणित का विचार जिसमें कल्पादि या सृष्टयादि से हो वह सिद्धान्त, जिसमें महायुगादि से हो वह तन्त्र और जिसमें किसी इष्टशक से (जैसे कलियुग के आरम्भ से) हो वह करण कहलाता है । मात्र ग्रहगणित की दृष्टि से देखा जाय तो इन तीनों में कोई भेद नहीं है। सिद्धान्त, तन्त्र या करण ग्रन्थ के जिन प्रकरणों में ग्रहगणित का विचार रहता है वे क्रमशः इस प्रकार हैं-

ज्योतिष से निम्नलिखित का बोध हो सकता है-

भारतीय आर्यो में ज्योतिष विद्या का ज्ञान अत्यन्त प्राचीन काल से था । यज्ञों की तिथि आदि निश्चित करने में इस विद्या का प्रयोजन पड़ता था । अयन चलन के क्रम का पता बराबर वैदिक ग्रंथों में मिलता है । जैसे, पुनर्वसु से मृगशिरा (ऋगवेद), मृगशिरा से रोहिणी (ऐतरेय ब्राह्मण), रोहिणी से कृत्तिका (तौत्तिरीय संहिता) कृत्तिका से भरणी (वेदाङ्ग ज्योतिष) । तैत्तरिय संहिता से पता चलता है कि प्राचीन काल में वासंत विषुवद्दिन कृत्तिका नक्षत्र में पड़ता था । इसी वासंत विषुवद्दिन से वैदिक वर्ष का आरम्भ माना जाता था, पर अयन की गणना माघ मास से होती थी । इसके बाद वर्ष की गणना शारद विषुवद्दिन से आरम्भ हुई । ये दोनों प्रकार की गणनाएँ वैदिक ग्रंथों में पाई जाती हैं । वैदिक काल में कभी वासंत विषुवद्दिन मृगशिरा नक्षत्र में भी पड़ता था । इसे बाल गंगाधर तिलक ने ऋग्वेद से अनेक प्रमाण देकर सिद्ध किया है । कुछ लोगों ने निश्चित किया है कि वासंत विषुबद्दिन की यह स्थिति ईसा से ४००० वर्ष पहले थी । अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि ईसा से पाँच छह हजार वर्ष पहले हिंदुओं को नक्षत्र अयन आदि का ज्ञान था और वे यज्ञों के लिये पत्रा बनाते थे। शारद वर्ष के प्रथम मास का नाम अग्रहायण था जिसकी पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र में पड़ती थी । इसी से कृष्ण ने गीता में कहा है कि 'महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ' । 

प्राचीन हिंदुओं ने ध्रुव का पता भी अत्यन्त प्राचीन काल में लगाया था । अयन चलन का सिद्धान्त भारतीय ज्योतिषियों ने किसी दूसरे देश से नहीं लिया; क्योंकि इसके संबंध में जब कि युरोप में विवाद था, उसके सात आठ सौ वर्ष पहले ही भारतवासियों ने इसकी गति आदि का निरूपण किया था। वराहमिहिर के समय में ज्योतिष के सम्बन्ध में पाँच प्रकार के सिद्धांत इस देश में प्रचलित थे - सौर, पैतामह, वासिष्ठ, पौलिश ओर रोमक । सौर सिद्धान्त संबंधी सूर्यसिद्धान्त नामक ग्रंथ किसी और प्राचीन ग्रंथ के आधार पर प्रणीत जान पड़ता है । वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त दोनों ने इस ग्रंथ से सहायता ली है । इन सिद्धांत ग्रंथों में ग्रहों के भुजांश, स्थान, युति, उदय, अस्त आदि जानने की क्रियाएँ सविस्तर दी गई हैं । अक्षांश और देशातंर का भी विचार है । 

पूर्व काल में देशान्तर लंका या उज्जयिनी से लिया जाता था । भारतीय ज्योतिषी गणना के लिये पृथ्वी को ही केंद्र मानकर चलते थे और ग्रहों की स्पष्ट स्थिति या गति लेते थे । इससे ग्रहों की कक्षा आदि के संबंध में उनकी और आज की गणना में कुछ अन्तर पड़ता है । क्रांतिवृत्त पहले २८ नक्षत्रों में ही विभक्त किया गया था । राशियों का विभाग पीछे से हुआ है । वैदिक ग्रंथों में राशियों के नाम नहीं पाए जाते । इन राशियों का यज्ञों से भी कोई संबंध नहीं हैं । बहुत से विद्वानों का मत है कि राशियों और दिनों के नाम यवन (युनानियों के) संपर्क के पीछे के हैं । अनेक पारिभाषिक शब्द भी यूनानियों से लिए हुए हैं, जैसे,— होरा, दृक्काण केंद्र, इत्यादि । 




#Article 93: अरविन्द घोष (680 words)


अरविन्द घोष या श्री अरविन्द (बांग्ला: শ্রী অরবিন্দ, जन्म: १८७२, मृत्यु: १९५०) एक योगी एवं दार्शनिक थे। वे १५ अगस्त १८७२ को कलकत्ता में जन्मे थे। इनके पिता एक डाक्टर थे। इन्होंने युवा अवस्था में स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारी के रूप में भाग लिया, किन्तु बाद में यह एक योगी बन गये और इन्होंने पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया। वेद, उपनिषद ग्रन्थों आदि पर टीका लिखी। योग साधना पर मौलिक ग्रन्थ लिखे। उनका पूरे विश्व में दर्शन शास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है और उनकी साधना पद्धति के अनुयायी सब देशों में पाये जाते हैं। यह कवि भी थे और गुरु भी।

अरविन्द के पिता डॉक्टर कृष्णधन घोष उन्हें उच्च शिक्षा दिला कर उच्च सरकारी पद दिलाना चाहते थे, अतएव मात्र ७ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने इन्हें इंग्लैण्ड भेज दिया। उन्होंने केवल १८ वर्ष की आयु में ही आई० सी० एस० की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। इसके साथ ही उन्होंने अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक एवं इटैलियन भाषाओँ में भी निपुणता प्राप्त की थी।

देशभक्ति से प्रेरित इस युवा ने जानबूझ कर घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और राष्ट्र-सेवा करने की ठान ली। इनकी प्रतिभा से बड़ौदा नरेश अत्यधिक प्रभावित थे अत: उन्होंने इन्हें अपनी रियासत में शिक्षा शास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया। बडौदा में ये प्राध्यापक, वाइस प्रिंसिपल, निजी सचिव आदि कार्य योग्यता पूर्वक करते रहे और इस दौरान हजारों छात्रों को चरित्रवान देशभक्त बनाया। 1896 से 1905 तक उन्होंने बड़ौदा रियासत में राजस्व अधिकारी से लेकर बड़ौदा कालेज के फ्रेंच अध्यापक और उपाचार्य रहने तक रियासत की सेना में क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण भी दिलाया था। हजारों युवकों को उन्होंने क्रान्ति की दीक्षा दी थी।

वे निजी रुपये-पैसे का हिसाब नहीं रखते थे परन्तु राजस्व विभाग में कार्य करते समय उन्होंने जो विश्व की प्रथम आर्थिक विकास योजना बनायी उसका कार्यान्वयन करके बड़ौदा राज्य देशी रियासतों में अन्यतम बन गया था। महाराजा मुम्बई की वार्षिक औद्योगिक प्रदर्शनी के उद्धाटन हेतु आमन्त्रित किये जाने लगे थे।
लार्ड कर्जन के बंग-भंग की योजना रखने पर सारा देश तिलमिला उठा। बंगाल में इसके विरोध के लिये जब उग्र आन्दोलन हुआ तो अरविन्द घोष ने इसमे सक्रिय रूप से भाग लिया। नेशनल लाॅ कॉलेज की स्थापना में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। मात्र ७५ रुपये मासिक पर इन्होंने वहाँ अध्यापन-कार्य किया। पैसे की जरूरत होने के बावजूद उन्होंने कठिनाई का मार्ग चुना। अरविन्द कलकत्ता आये तो राजा सुबोध मलिक की अट्टालिका में ठहराये गये। पर जन-साधारण को मिलने में संकोच होता था। अत: वे सभी को विस्मित करते हुए 19/8 छक्कू खानसामा गली में आ गये। उन्होंने किशोरगंज (वर्तमान में बंगलादेश में) में स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। अब वे केवल धोती, कुर्ता और चादर ही पहनते थे। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय से भी अलग होकर अग्निवर्षी पत्रिका बन्दे मातरम् (पत्रिका) का प्रकाशन प्रारम्भ किया। 

ब्रिटिश सरकार इनके क्रन्तिकारी विचारों और कार्यों से अत्यधिक आतंकित थी अत: २ मई १९०८ को चालीस युवकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में इसे 'अलीपुर षडयन्त्र केस' के नाम से जानते है। उन्हें एक वर्ष तक अलीपुर जेल में कैद रखा गया।| अलीपुर जेल में ही उन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू-राष्ट्र विषयक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति हुई। इस षड़यन्त्र में अरविन्द को शामिल करने के लिये सरकार की ओर से जो गवाह तैयार किया था उसकी एक दिन जेल में ही हत्या कर दी गयी। घोष के पक्ष में प्रसिद्ध बैरिस्टर चितरंजन दास ने मुकदमे की पैरवी की थी। उन्होने अपने प्रबल तर्कों के आधार पर अरविन्द को सारे अभियोगों से मुक्त घोषित करा दिया। इससे सम्बन्धित अदालती फैसले ६ मई १९०९ को जनता के सामने आये। ३० मई १९०९ को उत्तरपाड़ा में एक संवर्धन सभा की गयी वहाँ अरविन्द का एक प्रभावशाली व्याख्यान हुआ जो इतिहास में  के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अपने इस अभिभाषण में धर्म एवं राष्ट्र विषयक कारावास-अनुभूति का विशद विवेचन करते हुए कहा था:।

चम्पकलाल, नलिनि कान्त गुप्त, कैखुसरो दादाभाई सेठना, निरोदबरन, पवित्र, एम पी पण्डित, प्रणब, सतप्रेम, इन्द्र सेन

श्री अरविन्द की 125 वीं जयन्ती के अवसर पर, 1997 में श्री अरबिंदो आश्रम ने श्री अरविन्द की सम्पूर्ण कृतियों को 37 भागों में प्रकाशित किया। ये भाग निम्नलिखित हैं-




#Article 94: दर्शनशास्त्र (1316 words)


दर्शनशास्त्र वह ज्ञान है जो परम् सत्य और सिद्धांतों, और उनके कारणों की विवेचना करता है। दर्शन यथार्थ की परख के लिये एक दृष्टिकोण है। दार्शनिक चिन्तन मूलतः जीवन की अर्थवत्ता की खोज का पर्याय है। वस्तुतः दर्शनशास्त्र स्वत्व, तथा समाज और मानव चिंतन तथा संज्ञान की प्रक्रिया के सामान्य नियमों का विज्ञान है। दर्शनशास्त्र सामाजिक चेतना के रूपों में से एक है।

दर्शन उस विद्या का नाम है जो सत्य एवं ज्ञान की खोज करता है। व्यापक अर्थ में दर्शन, तर्कपूर्ण, विधिपूर्वक एवं क्रमबद्ध विचार की कला है। इसका जन्म अनुभव एवं परिस्थिति के अनुसार होता है। यही कारण है कि संसार के भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने समय-समय पर अपने-अपने अनुभवों एवं परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवन-दर्शन को अपनाया

भारतीय दर्शन का इतिहास अत्यन्त पुराना है यह पीढ़ी दर पीढ़ी अर्जित दर्शन है इसके जड़ तक जाना असम्भव है किन्तु पश्चिमी फिलॉसफ़ी (Philosophy) के अर्थों में दर्शनशास्त्र पद का प्रयोग सर्वप्रथम पाइथागोरस ने लिखित रूप से किया था। विशिष्ट अनुशासन और विज्ञान के रूप में दर्शन को प्लेटो ने विकसित किया था। उसकी उत्पत्ति दास-स्वामी समाज में एक ऐसे विज्ञान के रूप में हुई जिसने वस्तुगत जगत तथा स्वयं अपने विषय में मनुष्य के ज्ञान के सकल योग को ऐक्यबद्ध किया था। यह मानव इतिहास के आरंभिक सोपानों में ज्ञान के विकास के निम्न स्तर के कारण सर्वथा स्वाभाविक था। सामाजिक उत्पादन के विकास और वैज्ञानिक ज्ञान के संचय की प्रक्रिया में भिन्न भिन्न विज्ञान दर्शनशास्त्र से पृथक होते गये और दर्शनशास्त्र एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में विकसित होने लगा। जगत के विषय में सामान्य दृष्टिकोण का विस्तार करने तथा सामान्य आधारों व नियमों का करने, यथार्थ के विषय में चिंतन की तर्कबुद्धिपरक, तर्क तथा संज्ञान के सिद्धांत विकसित करने की आवश्यकता से दर्शनशास्त्र का एक विशिष्ट अनुशासन के रूप में जन्म हुआ। पृथक विज्ञान के रूप में दर्शन का आधारभूत प्रश्न स्वत्व के साथ चिंतन के, भूतद्रव्य के साथ चेतना के संबंध की समस्या है।

दर्शन  विभिन्न विषयों का विश्लेषण है । इसलिये भारतीय दर्शन में चेतना की मीमांसा अनिवार्य है जो आधुनिक दर्शन में नहीं। मानव जीवन का चरम लक्ष्य दुखों से छुटकारा प्राप्त करके चिर आनंद की प्राप्ति है। भारतीय दर्शनों का भी एक ही लक्ष्य दुखों के मूल कारण अज्ञान से मानव को मुक्ति दिलाकर उसे मोक्ष की प्राप्ति करवाना है। यानी अज्ञान व परंपरावादी और रूढ़िवादी विचारों को नष्ट करके सत्य ज्ञान को प्राप्त करना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है। सनातन काल से ही मानव में जिज्ञासा और अन्वेषण की प्रवृत्ति रही है। प्रकृति के उद्भव तथा सूर्य, चंद्र और ग्रहों की स्थिति के अलावा परमात्मा के बारे में भी जानने की जिज्ञासा मानव में रही है। इन जिज्ञासाओं का शमन करने के लिए उसके अनवरत प्रयास का ही यह फल है कि हम लोग इतने विकसित समाज में रह रहे हैं। परंतु प्राचीन ऋषि-मुनियों को इस भौतिक समृद्धि से न तो संतोष हुआ और न चिर आनंद की प्राप्ति ही हुई। अत: उन्होंने इसी सत्य और ज्ञान की प्राप्ति के क्रम में सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं गूढ़तम साधनों से ज्ञान की तलाश आरंभ की और इसमें उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई। उसी सत्य ज्ञान का नाम दर्शन है।

दृश्यतेह्यनेनेति दर्शनम् (दृष्यते हि अनेन इति दर्शनम्)

अर्थात् असत् एवं सत् पदार्थों का ज्ञान ही दर्शन है। 
पाश्चात्य फिलॉस्पी शब्द फिलॉस (प्रेम का)+सोफिया (प्रज्ञा) से मिलकर बना है। इसलिए फिलॉसफी का शाब्दिक अर्थ है बुद्धि प्रेम। पाश्चात्य दार्शनिक (फिलॉसफर) बुद्धिमान या प्रज्ञावान व्यक्ति बनना चाहता है। पाश्चात्य दर्शन के इतिहास से यह बात झलक जाती है कि पाश्चात्य दार्शनिक ने विषय ज्ञान के आधार पर ही बुद्धिमान होना चाहा है। इसके विपरीत कुछ उदाहरण अवश्य मिलेंगें जिसमें आचरण शुद्धि तथा मनस् की परिशुद्धता के आधार पर परमसत्ता के साथ साक्षात्कार करने का भी आदर्श पाया जाता है। परंतु यह आदर्श प्राच्य है न कि पाश्चात्य। पाश्चात्य दार्शनिक अपने ज्ञान पर जोर देता है और अपने ज्ञान के अनुरूप अपने चरित्र का संचालन करना अनिवार्य नहीं समझता। केवल पाश्चात्य रहस्यवादी और समाधीवादी विचारक ही इसके अपवाद हैं।

भारतीय दर्शन में परम सत्ता के साथ साक्षात्कार करने का दूसरा नाम ही दर्शन हैं। भारतीय परंपरा के अनुसार मनुष्य को परम सत्ता का साक्षात् ज्ञान हो सकता है। इस प्रकार साक्षात्कार के लिए भक्ति ज्ञान तथा योग के मार्ग बताए गए हैं। परंतु दार्शनिक ज्ञान को वैज्ञानिक ज्ञान से भिन्न कहा गया है। वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने में आलोच्य विषय में परिवर्तन करना पड़ता है ताकि उसे अपनी इच्छा के अनुसार वश में किया जा सके और फिर उसका इच्छित उपयोग किया जा सके। परंतु प्राच्य दर्शन के अनुसार दार्शनिक ज्ञान जीवन साधना है। ऐसे दर्शन से स्वयं दार्शनिक में ही परिवर्तन हो जाता है। उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है। जिसके द्वारा वह समस्त प्राणियों को अपनी समष्टि दृष्टि से देखता है। समसामयिक विचारधारा में प्राच्य दर्शन को धर्म-दर्शन माना जाता है और पाश्चात्य दर्शन को भाषा सुधार तथा प्रत्ययों का स्पष्टिकरण कहा जाता है

दर्शनशास्त्र अनुभव की व्याख्या है। इस व्याख्या में जो कुछ अस्पष्ट होता है, उसे स्पष्ट करने का यत्न किया जाता है। हमारी ज्ञानेंद्रियाँ बाहर की ओर खुलती हैं, हम प्राय: बाह्य जगत् में विलीन रहते हैं। कभी कभी हमारा ध्यान अंतर्मुख होता है और हम एक नए लोक का दर्शन करते हैं। तथ्य तो दिखाई देते ही हैं, नैतिक भावना आदेश भी देती है। वास्तविकता और संभावना का भेद आदर्श के प्रत्यय को व्यक्त करता है। इस प्रत्यय के प्रभाव में हम ऊपर की ओर देखते हैं। इस तरह दर्शन के प्रमुख विषय बाह्य जगत्, चेतन आत्मा और परमात्मा बन जाते हैं। इनपर विचार करते हुए हम स्वभावत: इनके संबंधो पर भी विचार करते हैं। प्राचीन काल में रचना और रचयिता का संबंध प्रमुख विषय था, मध्यकाल में आत्मा और परमात्मा का संबंध प्रमुख विषय बना और आधुनिक काल में पुरुष और प्रकृति, विषयी और विषय, का संबंध विवेन का केंद्र बना। प्राचीन यूनान में भौतिकी, तर्क और नीति, ये तीनों दर्शनशास्त्र के तीन भाग समझे जाते थे। भौतिकी बाहर की ओर देखती है, तर्क स्वयं चिंतन को चिंतन का विषय बनाता है, नीति जानना चाहती है कि जीवन को व्यवस्थित करने के लिए कोई निरपेक्ष आदेश ज्ञात हो सकता है या नहीं।

तत्वज्ञान में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

प्राचीन काल में नीति का प्रमुख लक्ष्य नि:श्रेयस के स्वरूप को समझना था। आधुनिक काल में कांट ने कर्तव्य के प्रत्यय को मौलिक प्रत्यय का स्थान दिया। तृप्ति या प्रसन्नता का मूल्यांकन विवाद का विषय बना रहा है।

ज्ञानमीमांसा में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

ज्ञानमीमांसा ने आधुनिक काल में विचारकों का ध्यान आकृष्ट किया। पहले दर्शन को प्राय: तत्वज्ञान (मेटाफिजिक्स) के अर्थ में ही लिया जाता था। दार्शनिकों का लक्ष्य समग्र की व्यवस्था का पता लगाना था। जब कभी प्रतीत हुआ कि इस अन्वेषण में मनुष्य की बुद्धि आगे जा नहीं सकती, तो कुछ गौण सिद्धांत विवेचन के विषय बने। यूनान में, सुकरात, प्लेटो और अरस्तू के बाद तथा जर्मनी में कांट और हेगल के बाद ऐसा हुआ। यथार्थवाद और संदेहवाद ऐसे ही सिद्धांत हैं। इस तरह दार्शनिक विवेचन में जिन विषयों पर विशेष रूप से विचार होता रहा है, वे ये हैं-

(1) मुख्य विषय - 

(2) गौण विषय - 

इन विषयों को विचारकों ने अपनी अपनी रुचि के अनुसार विविध पक्षों से देखा है। किसी ने एक पक्ष पर विशेष ध्यान दिया है, किसी ने दूसरे पक्ष पर। प्रत्येक समस्या के नीचे उपसमस्याएँ उपस्थित हो जाती हैं।

विस्तृत विवरण के लिये भारतीय दर्शन देखें।

वैसे तो समस्त दर्शन की उत्पत्ति वेदों से ही हुई है, फिर भी समस्त भारतीय दर्शन को आस्तिक एवं नास्तिक दो भागों में विभक्त किया गया है। जो ईश्वर यानी शिव जी तथा वेदोक्त बातों जैसे न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत पर विश्वास करता है, उसे आस्तिक माना जाता है; जो नहीं करता वह नास्तिक है।

वैदिक परम्परा के ६ दर्शन हैं :

(1) मीमांसा (2) न्याय (3) वैशेषिक (4) सांख्य (5) योग (6) वेदान्त

यह दर्शन पराविद्या, जो शब्दों की पहुंच से परे है, का ज्ञान विभिन्न दृष्टिकोणों से समक्ष करते हैं। प्रत्येक दर्शन में अन्य दर्शन हो सकते हैं, जैसे वेदान्त में कई मत हैं।




#Article 95: योग (4228 words)


योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया  है जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। यह शब्द - प्रक्रिया और धारणा - हिन्दू धर्म,जैन धर्म और बौद्ध धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बन्धित है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत्‌ में लोग इससे परिचित हैं। 

प्रसिद्धि के बाद पहली बार ११ दिसम्बर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा  ने प्रत्येक वर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है। परिभाषा ऐसी होनी चाहिए जो अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोषों से मुक्त हो, योग शब्द के वाच्यार्थ का ऐसा लक्षण बतला सके जो प्रत्येक प्रसंग के लिये उपयुक्त हो और योग के सिवाय किसी अन्य वस्तु के लिये उपयुक्त न हो। भगवद्गीता प्रतिष्ठित ग्रंथ माना जाता है। उसमें योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं। पतंजलि योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। पाशुपत योग और माहेश्वर योग जैसे शब्दों के भी प्रसंग मिलते है। इन सब स्थलों में योग शब्द के जो अर्थ हैं वह एक दूसरे से भिन्न हैं ।

गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है योगः कर्मसु कौशलम्‌' ( कर्मों में कुशलता ही योग है।) यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं। इस बात को स्वीकार करने में यह बड़ी आपत्ति खड़ी होती है कि बौद्धमतावलम्बी भी, जो परमात्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते, योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं। यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं। पतञ्जलि ने योगसूत्र में, जो परिभाषा दी है 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम योग है। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं: चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं।

परन्तु इस परिभाषा पर कई विद्वानों को आपत्ति है। उनका कहना है कि चित्तवृत्तियों के प्रवाह का ही नाम चित्त है। पूर्ण निरोध का अर्थ होगा चित्त के अस्तित्व का पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृतियों और संस्कारों का नि:शेष हो जाना। यदि ऐसा हो जाए तो फिर समाधि से उठना संभव नहीं होगा। क्योंकि उस अवस्था के सहारे के लिये कोई भी संस्कार बचा नहीं होगा, प्रारब्ध दग्ध हो गया होगा। निरोध यदि संभव हो तो श्रीकृष्ण के इस वाक्य का क्या अर्थ होगा? योगस्थः कुरु कर्माणि, योग में स्थित होकर कर्म करो। विरुद्धावस्था में कर्म हो नहीं सकता और उस अवस्था में कोई संस्कार नहीं पड़ सकते, स्मृतियाँ नहीं बन सकतीं, जो समाधि से उठने के बाद कर्म करने में सहायक हों।

संक्षेप में आशय यह है कि योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक्‌ रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। संसार को मिथ्या माननेवाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है। बौद्ध ही नहीं, मुस्लिम सूफ़ी और ईसाई मिस्टिक भी किसी न किसी प्रकार अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ उसका सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं।

इन विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं में किस प्रकार ऐसा समन्वय हो सकता है कि ऐसा धरातल मिल सके जिस पर योग की भित्ति खड़ी की जा सके, यह बड़ा रोचक प्रश्न है परंतु इसके विवेचन के लिये बहुत समय चाहिए। यहाँ उस प्रक्रिया पर थोड़ा सा विचार कर लेना आवश्यक है जिसकी रूपरेखा हमको पतंजलि के सूत्रों में मिलती है। थोड़े बहुत शब्दभेद से यह प्रक्रिया उन सभी समुदायों को मान्य है जो योग के अभ्यास का समर्थन करते हैं।

योग की उच्चावस्था समाधि, मोक्ष, कैवल्य आदि तक पहुँचने के लिए अनेकों साधकों ने जो साधन अपनाये उन्हीं साधनों का वर्णन योग ग्रन्थों में समय समय पर मिलता रहा। उसी को योग के प्रकार से जाना जाने लगा। योग की प्रामाणिक पुस्तकों में शिवसंहिता तथा गोरक्षशतक में योग के चार प्रकारों का वर्णन मिलता है - 

उपर्युक्त दोनों श्लोकों से योग के प्रकार हुए : मंत्रयोग, हठयोग लययोग व राजयोग। 

'मंत्र' का समान्य अर्थ है- 'मननात् त्रायते इति मन्त्रः'। मन को त्राय (पार कराने वाला) मंत्र ही है। मन्त्र योग का सम्बन्ध मन से है, मन को इस प्रकार परिभाषित किया है- मनन इति मनः। जो मनन, चिन्तन करता है वही मन है। मन की चंचलता का निरोध मंत्र के द्वारा करना मंत्र योग है। मंत्र योग के बारे में योगतत्वोपनिषद में वर्णन इस प्रकार है- 

( अल्पबुद्धि साधक मंत्रयोग से सेवा करता है अर्थात मंत्रयोग उन साधकों के लिए है जो अल्पबुद्धि है।)

मंत्र से ध्वनि तरंगें पैदा होती है मंत्र शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालता है। मंत्र में साधक जप का प्रयोग करता है मंत्र जप में तीन घटकों का काफी महत्व है वे घटक-उच्चारण, लय व ताल हैं। तीनों का सही अनुपात मंत्र शक्ति को बढ़ा देता है। मंत्रजप मुख्यरूप से चार प्रकार से किया जाता है। 

हठ का शाब्दिक अर्थ हठपूर्वक किसी कार्य को करने से लिया जाता है। हठ प्रदीपिका पुस्तक में हठ का अर्थ इस प्रकार दिया है- 

ह का अर्थ सूर्य तथ ठ का अर्थ चन्द्र बताया गया है। सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था हठयोग है। शरीर में कई हजार नाड़ियाँ है उनमें तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन है, वे इस प्रकार हैं। सूर्यनाड़ी अर्थात पिंगला जो दाहिने स्वर का प्रतीक है। चन्द्रनाड़ी अर्थात इड़ा जो बायें स्वर का प्रतीक है। इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है। इस प्रकार हठयोग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इड़ा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराकर ब्रहमरन्ध्र में समाधिस्थ किया जाता है। हठ प्रदीपिका में हठयोग के चार अंगों का वर्णन है- आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बन्ध तथा नादानुसधान। घेरण्डसंहिता में सात अंग- षटकर्म, आसन, मुद्राबन्ध, प्राणायाम, ध्यान, समाधि जबकि योगतत्वोपनिषद में आठ अंगों का वर्णन है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि

चित्त का अपने स्वरूप विलीन होना या चित्त की निरूद्ध अवस्था लययोग के अन्तर्गत आता है। साधक के चित्त् में जब चलते, बैठते, सोते और भोजन करते समय हर समय ब्रह्म का ध्यान रहे इसी को लययोग कहते हैं। योगत्वोपनिषद में इस प्रकार वर्णन है- 

राजयोग सभी योगों का राजा कहलाया जाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ सामग्री अवश्य मिल जाती है। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है। राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों का निरोध करना है। 

महर्षि पतंजलि के अनुसार समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेशों का नाश होता है, चित्त प्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेक ख्याति प्राप्त होती है। 

राजयोग के अन्तर्गत महिर्ष पतंजलि ने अष्टांग को इस प्रकार बताया है- 

योग के आठ अंगों में प्रथम पाँच बहिरंग तथा अन्य तीन अन्तरंग में आते हैं। 

उपर्युक्त चार प्रकार के अतिरिक्त गीता में दो प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है- 

ज्ञानयोग, सांख्ययोग से सम्बन्ध रखता है। पुरुष प्रकृति के बन्धनों से मुक्त होना ही ज्ञान योग है। सांख्य दर्शन में 25 तत्वों का वर्णन मिलता है।

वैदिक संहिताओं के अंतर्गत तपस्वियों तपस (संस्कृत) के बारे में ( ब्राह्मण)) प्राचीन काल से वेदों में (९०० से ५०० बी सी ई) उल्लेख मिलता है, जब कि तापसिक साधनाओं का समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणियों में प्राप्त है। कई मूर्तियाँ जो सामान्य योग या समाधि मुद्रा को प्रदर्शित करती है, सिंधु घाटी सभ्यता (सी.3300-1700 बी.सी. इ.) के स्थान पर प्राप्त हुईं है। पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्ल के अनुसार, ये मूर्तियाँ योग के धार्मिक संस्कार के योग से सम्बन्ध को संकेत करती है। यद्यपि इस बात का निर्णयात्मक सबूत नहीं है फिर भी अनेक पंडितों की राय में सिंधु घाटी सभ्यता और योग-ध्यान में सम्बन्ध है।
 

ध्यान में उच्च चैतन्य को प्राप्त करने कि रीतियों का विकास श्रमानिक परम्पराओं द्वारा एवं उपनिषद् की परंपरा द्वारा विकसित हुआ था।

बुद्ध के पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रंथों मे ध्यान के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं मिलते हैं, बुद्ध के दो शिक्षकों के ध्यान के लक्ष्यों के प्रति कहे वाक्यों के आधार पर वय्न्न यह तर्क करते है की निर्गुण ध्यान की पद्धति ब्रह्मिन परंपरा से निकली इसलिए उपनिषद् की सृष्टि के प्रति कहे कथनों में एवं ध्यान के लक्ष्यों के लिए कहे कथनों में समानता है। यह संभावित हो भी सकता है, नहीं भी.

उपनिषदों में ब्रह्माण्ड सम्बन्धी बयानों के वैश्विक कथनों में किसी ध्यान की रीति की सम्भावना के प्रति तर्क देते हुए कहते है की नासदीय सूक्त किसी ध्यान की पद्धति की ओर ऋग्वेद से पूर्व भी इशारा करते है।

हिंदू ग्रंथ और बौद्ध ग्रंथ प्राचीन ग्रन्थो में से एक है जिन में ध्यान तकनीकों का वर्णन प्राप्त होता है। वे ध्यान की प्रथाओं और अवस्थाओं का वर्णन करते है जो बुद्ध से पहले अस्तित्व में थीं और साथ ही उन प्रथाओं का वर्णन करते है जो पहले बौद्ध धर्म के भीतर विकसित हुईं. हिंदु वाङ्मय में,योग शब्द पहले कथा उपानिषद में प्रस्तुत हुआ जहाँ ज्ञानेन्द्रियों का नियंत्रण और मानसिक गतिविधि के निवारण के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जो उच्चतम स्थिति प्रदान करने वाला माना गया है। महत्वपूर्ण ग्रन्थ जो योग की अवधारणा से सम्बंधित है वे मध्य कालीन उपनिषद्, महाभारत,भगवद गीता 200 BCE) एवं पतंजलि योग सूत्र है। (ca. 400 BCE)

भारतीय दर्शन में, षड् दर्शनों में से एक का नाम योग है। योग दार्शनिक प्रणाली,सांख्य स्कूल के साथ निकटता से संबन्धित है। ऋषि पतंजलि द्वारा व्याख्यायित योग संप्रदाय सांख्य मनोविज्ञान और तत्वमीमांसा को स्वीकार करता है, लेकिन सांख्य घराने की तुलना में अधिक आस्तिक है, यह प्रमाण है क्योंकि सांख्य वास्तविकता के पच्चीस तत्वों में ईश्वरीय सत्ता भी जोड़ी गई है। योग और सांख्य एक दूसरे से इतने मिलते-जुलते है कि मेक्स म्युल्लर कहते है,यह दो दर्शन इतने प्रसिद्ध थे कि एक दूसरे का अंतर समझने के लिए एक को प्रभु के साथ और दूसरे को प्रभु के बिना माना जाता है।.... सांख्य और योग के बीच घनिष्ठ संबंध हेंरीच ज़िम्मेर समझाते है: 

इन दोनों को भारत में जुड़वा के रूप में माना जाता है, जो एक ही विषय के दो पहलू है।[41]यहाँ मानव प्रकृति की बुनियादी सैद्धांतिक का प्रदर्शन, विस्तृत विवरण और उसके तत्वों का परिभाषित, बंधन (बंधा) के स्थिति में उनके सहयोग करने के तरीके, सुलझावट के समय अपने स्थिति का विश्लेषण या मुक्ति में वियोजन मोक्ष का व्याख्या किया गया है। योग विशेष रूप से प्रक्रिया की गतिशीलता के सुलझाव के लिए उपचार करता है और मुक्ति प्राप्त करने की व्यावहारिक तकनीकों को सिद्धांत करता है अथवा 'अलगाव-एकीकरण(कैवल्य) का उपचार करता है।

पतंजलि, व्यापक रूप से औपचारिक योग दर्शन के संस्थापक माने जाते है। पतंजलि योग, बुद्धि के नियंत्रण के लिए एक प्रणाली है जिसे राज योग के रूप में जाना जाता है। पतंजलि उनके दूसरे सूत्र मे योग शब्द को परिभाषित करते है, जो उनके पूरे काम के लिए व्याख्या सूत्र माना जाता है: 
 
 - योग सूत्र 1.2 

तीन संस्कृत शब्दों के अर्थ पर यह संस्कृत परिभाषा टिकी है। अई.के.तैम्नी इसकी अनुवाद करते है की,योग बुद्धि के संशोधनों ( [49]) का निषेध ( [48]) है ( [50])।  योग की प्रारंभिक परिभाषा मे इस शब्द  [52] का उपयोग एक उदाहरण है कि बौद्धिक तकनीकी शब्दावली और अवधारणाओं, योग सूत्र मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है; इससे यह संकेत होता है कि बौद्ध विचारों के बारे में पतंजलि को जानकारी थी और अपने प्रणाली मे उन्हें बुनाई.स्वामी विवेकानंद इस सूत्र को अनुवाद करते हुए कहते है,योग बुद्धि (चित्त) को विभिन्न रूप (वृत्ति) लेने से अवरुद्ध करता है।

पतंजलि का लेखन 'अष्टांग योग(आठ-अंगित योग) एक प्रणाली के लिए आधार बन गया।
 29th सूत्र के दूसरी किताब से यह आठ-अंगित अवधारणा को प्राप्त किया गया था और व्यावहारिक रूप मे भिन्नरूप से सिखाये गए प्रत्येक राज योग की एक मुख्य विशेषता है।

आठ अंग हैं:

इस संप्रदाय के विचार मे, उच्चतम प्राप्ति विश्व के अनुभवी विविधता को भ्रम के रूप मे प्रकट नहीं करता.
यह दुनिया वास्तव है। इसके अलावा, उच्चतम प्राप्ति ऐसी घटना है जहाँ अनेक में से एक व्यक्तित्व स्वयं, आत्म को आविष्कार करता है, कोई एक सार्वभौमिक आत्म नहीं है जो सभी व्यक्तियों द्वारा साझा जाता है।

भगवद गीता (प्रभु के गीत), बड़े पैमाने पर विभिन्न तरीकों से योग शब्द का उपयोग करता है। एक पूरा अध्याय (छठा अध्याय) सहित पारंपरिक योग का अभ्यास को समर्पित, ध्यान के सहित, करने के अलावा इस मे योग के तीन प्रमुख प्रकार का परिचय किया जाता है।

मधुसूदन सरस्वती (जन्म 1490) ने गीता को तीन वर्गों में विभाजित किया है, जहाँ प्रथम छह अध्यायों मे कर्म योग के बारे मे, बीच के छह मे भक्ति योग और पिछले छह अध्यायों मे ज्ञाना (ज्ञान) योग के बारे मे गया है। अन्य टिप्पणीकार प्रत्येक अध्याय को एक अलग 'योग' से संबंध बताते है, जहाँ अठारह अलग योग का वर्णन किया है।

हठयोग योग, योग की एक विशेष प्रणाली है जिसे 15वीं सदी के भारत में हठ योग प्रदीपिका के संकलक, योगी स्वत्मरमा द्वारा वर्णित किया गया था।

हठयोग पतांजलि के राज योग से काफी अलग है जो सत्कर्म पर केन्द्रित है, भौतिक शरीर की शुद्धि ही मन की, प्राण की और विशिष्ट ऊर्जा की शुद्धि लाती है।[62] [63] केवल पतंजलि राज योग के ध्यान आसन के बदले, [64] यह पूरे शरीर के लोकप्रिय आसनों की चर्चा करता है। हठयोग अपनी कई आधुनिक भिन्नरूपों में एक शैली है जिसे बहुत से लोग योग शब्द के साथ जोड़ते है।

प्राचीन बौद्धिक धर्म ने ध्यानापरणीय अवशोषण अवस्था को निगमित किया। बुद्ध के प्रारंभिक उपदेशों में योग विचारों का सबसे प्राचीन निरंतर अभिव्यक्ति पाया जाता है। बुद्ध के एक प्रमुख नवीन शिक्षण यह था की ध्यानापरणीय अवशोषण को परिपूर्ण अभ्यास से संयुक्त करे. बुद्ध के उपदेश और प्राचीन ब्रह्मनिक ग्रंथों में प्रस्तुत अंतर विचित्र है।

बुद्ध के अनुसार, ध्यानापरणीय अवस्था एकमात्र अंत नहीं है, उच्चतम ध्यानापरणीय स्थिती में भी मोक्ष प्राप्त नहीं होता। 

अपने विचार के पूर्ण विराम प्राप्त करने के बजाय, किसी प्रकार का मानसिक सक्रियता होना चाहिए:एक मुक्ति अनुभूति, ध्यान जागरूकता के अभ्यास पर आधारित होना चाहिए।  बुद्ध ने मौत से मुक्ति पाने की प्राचीन ब्रह्मनिक अभिप्राय को ठुकराया. ब्रह्मिनिक योगिन को एक गैरद्विसंक्य द्रष्टृगत स्थिति जहाँ मृत्यु मे अनुभूति प्राप्त होता है, उस स्थिति को वे मुक्ति मानते है।

बुद्ध ने योग के निपुण की मौत पर मुक्ति पाने की पुराने ब्रह्मिनिक अन्योक्त (उत्तेजनाहीन होना, क्षणस्थायी होना) को एक नया अर्थ दिया; उन्हें, ऋषि जो जीवन में मुक्त है के नाम से उल्लेख किया गया था। 

योगकारा(संस्कृत:योग का अभ्यास, शब्द विन्यास योगाचारा, दर्शन और मनोविज्ञान का एक संप्रदाय है, जो भारत में 4 वीं से 5 वीं शताब्दी मे विकसित किया गया था।

योगकारा को यह नाम प्राप्त हुआ क्योंकि उसने एक योग प्रदान किया, एक रूपरेखा जिससे बोधिसत्त्व तक पहुँचने का एक मार्ग दिखाया है। ज्ञान तक पहुँचने के लिए यह योगकारा संप्रदाय योग सिखाता है।

ज़ेन (जिसका नाम संस्कृत शब्द ध्याना से उत्पन्न किया गया चीनी छ'अन के माध्यम से)महायान बौद्ध धर्म का एक रूप है। 
बौद्ध धर्म की महायान संप्रदाय योग के साथ अपनी निकटता के कारण विख्यात किया जाता है। पश्चिम में, जेन को अक्सर योग के साथ व्यवस्थित किया जाता है;ध्यान प्रदर्शन के दो संप्रदायों स्पष्ट परिवारिक उपमान प्रदर्शन करते है। यह घटना को विशेष ध्यान योग्य है क्योंकि कुछ योग प्रथाओं पर ध्यान की ज़ेन बौद्धिक स्कूल आधारित है।[81]योग की कुछ आवश्यक तत्वों सामान्य रूप से बौद्ध धर्म और विशेष रूप से ज़ेन धर्म को महत्वपूर्ण हैं।

योग तिब्बती बौद्ध धर्म का केंद्र है। न्यिन्गमा परंपरा में, ध्यान का अभ्यास का रास्ता नौ यानों, या वाहन मे विभाजित है, कहा जाता है यह परम व्यूत्पन्न भी है। अंतिम के छह को योग यानास के रूप मे वर्णित किया जाता है, यह है:क्रिया योग, उप योग (चर्या), योगा याना, महा योग, अनु योग और अंतिम अभ्यास अति योग. सरमा परंपराओं नेमहायोग और अतियोग की अनुत्तारा वर्ग से स्थानापन्न करते हुए क्रिया योग, उपा (चर्या) और योग को शामिल किया हैं। अन्य तंत्र योग प्रथाओं में 108 शारीरिक मुद्राओं के साथ सांस और दिल ताल का अभ्यास शामिल हैं। 
अन्य तंत्र योग प्रथाओं 108 शारीरिक मुद्राओं के साथ सांस और दिल ताल का अभ्यास को शामिल हैं।
  

यह न्यिन्गमा परंपरा यंत्र योग का अभ्यास भी करते है। (तिब. तरुल खोर), यह एक अनुशासन है जिसमे सांस कार्य (या प्राणायाम), ध्यानापरणीय मनन और सटीक गतिशील चाल से अनुसरण करनेवाले का ध्यान को एकाग्रित करते है।लुखंग मे दलाई लामा के सम्मर मंदिर के दीवारों पर तिब्बती प्राचीन योगियों के शरीर मुद्राओं चित्रित किया जाया है।

चांग (1993) द्वारा एक अर्द्ध तिब्बती योगा के लोकप्रिय खाते ने कन्दली (तिब.तुम्मो) अपने शरीर में गर्मी का उत्पादन का उल्लेख करते हुए कहते है कि यह संपूर्ण तिब्बती योगा की बुनियाद है. चांग यह भी दावा करते है कि तिब्बती योगा प्राना और मन को सुलह करता है, और उसे तंत्रिस्म के सैद्धांतिक निहितार्थ से संबंधित करते है।

चित्र:Kevalajnana.jpg|thumb|175px]महावीर को केवल ज्ञान प्राप्ति मुलाबंधासना मुद्रा में
दूसरी शताब्दी के जैन ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र, के अनुसार मन, वाणी और शरीर सभी गतिविधियों का कुल 'योग' है। 
 उमास्वामी कहते है कि आस्रव या कार्मिक प्रवाह का कारण योग है साथ ही- सम्यक चरित्र अर्थात योग नियंत्रण और अन्त में निरोध मुक्ति के मार्ग मे बेहद आवश्यक है।

 अपनी नियमसार  में, आचार्य कुन्दकुन्द ने योग भक्ति का वर्णन- भक्ति से मुक्ति का मार्ग - भक्ति के सर्वोच्च रूप के रूप मे किया है। आचार्य हरिभद्र और आचार्य हेमचन्द्र के अनुसार पाँच प्रमुख उल्लेख संन्यासियों और 12 समाजिक लघु प्रतिज्ञाओं योग के अंतर्गत शामिल है। इस विचार के वजह से कही इन्डोलोज़िस्ट्स जैसे प्रो रॉबर्ट जे ज़्यीडेन्बोस ने जैन धर्म के बारे मे यह कहा कि यह अनिवार्य रूप से योग सोच का एक योजना है जो एक पूर्ण धर्म के रूप मे बढ़ी हो गयी। 

 डॉ॰ हेंरीच ज़िम्मर संतुष्ट किया कि योग प्रणाली को पूर्व आर्यन का मूल था, जिसने वेदों की सत्ता को स्वीकार नहीं किया और इसलिए जैन धर्म के समान उसे एक विधर्मिक सिद्धांतों के रूप में माना गया था

 जैन शास्त्र, जैन तीर्थंकरों को ध्यान मे पद्मासना या कायोत्सर्ग  योग मुद्रा में दर्शाया है। ऐसा कहा गया है कि महावीर को मुलाबंधासना स्थिति में बैठे केवला ज्ञान आत्मज्ञान प्राप्त हुआ जो अचरंगा सूत्र मे और बाद में कल्पसूत्र मे पहली साहित्यिक उल्लेख के रूप मे पाया गया है। 

पतांजलि योगसूत्र के पांच यामा या बाधाओं और जैन धर्म के पाँच प्रमुख प्रतिज्ञाओं में अलौकिक सादृश्य है, जिससे जैन धर्म का एक मजबूत प्रभाव का संकेत करता है।

 लेखक विवियन वोर्थिंगटन ने यह स्वीकार किया कि योग दर्शन और जैन धर्म के बीच पारस्परिक प्रभाव है और वे लिखते है:योग पूरी तरह से जैन धर्म को अपना ऋण मानता है और विनिमय मे जैन धर्म ने योग के साधनाओं को अपने जीवन का एक हिस्सा बना लिया.

 सिंधु घाटी मुहरों और इकोनोग्रफी भी एक यथोचित साक्ष्य प्रदान करते है कि योग परंपरा और जैन धर्म के बीच संप्रदायिक सदृश अस्तित्व है। 

 विशेष रूप से, विद्वानों और पुरातत्वविदों ने विभिन्न तिर्थन्करों की मुहरों में दर्शाई गई योग और ध्यान मुद्राओं के बीच समानताओं पर टिप्पणी की है: ऋषभदेव की कयोत्सर्गा मुद्रा और महावीर के मुलबन्धासन मुहरों के साथ ध्यान मुद्रा में पक्षों में सर्पों की खुदाई पार्श्वनाथ की खुदाई से मिलती जुलती है। 

यह सभी न केवल सिंधु घाटी सभ्यता और जैन धर्म के बीच कड़ियों का संकेत कर रहे हैं, बल्कि विभिन्न योग प्रथाओं को जैन धर्म का योगदान प्रदर्शन करते है।

प्राचीनतम के जैन धर्मवैधानिक साहित्य जैसे अचरंगासुत्र और नियमासरा, तत्त्वार्थसूत्र आदि जैसे ग्रंथों ने साधारण व्यक्ति और तपस्वीयों के लिए जीवन का एक मार्ग के रूप में योग पर कई सन्दर्भ दिए है। 

बाद के ग्रंथ, जिसमे योग के जैन अवधारणा सविस्तार है, वह निम्नानुसार हैं:

सूफी संगीत के विकास में भारतीय योग अभ्यास का काफी प्रभाव है, जहाँ वे दोनों शारीरिक मुद्राओं (आसन) और श्वास नियंत्रण (प्राणायाम) को अनुकूलित किया है। 11 वीं शताब्दी के प्राचीन समय में प्राचीन भारतीय योग पाठ, अमृतकुंड, (अमृत का कुंड) का अरबी और फारसी भाषाओं में अनुवाद किया गया था।

सन 2008 में मलेशिया के शीर्ष इस्लामिक समिति ने कहा जो मुस्लमान योग अभ्यास करते है उनके खिलाफ एक फतवा लगू किया, जो कानूनी तौर पर गैर बाध्यकारी है, कहते है कि योग में हिंदू आध्यात्मिक उपदेशों के तत्वों है और इस से ईश-निंदा हो सकती है और इसलिए यह हराम है।

मलेशिया में मुस्लिम योग शिक्षकों ने अपमान कहकर इस निर्णय की आलोचना कि. मलेशिया में महिलाओं के समूह, ने भी अपना निराशा व्यक्त की और उन्होंने कहा कि वे अपनी योग कक्षाओं को जारी रखेंगे.	
इस फतवा में कहा गया है कि शारीरिक व्यायाम के रूप में योग अभ्यास अनुमेय है, पर धार्मिक मंत्र का गाने पर प्रतिबंध लगा दिया है, और यह भी कहते है कि भगवान के साथ मानव का मिलाप जैसे शिक्षण इस्लामी दर्शन के अनुरूप नहीं है। 

इसी तरह, उलेमस की परिषद, इंडोनेशिया में एक इस्लामी समिति ने योग पर प्रतिबंध, एक फतवे द्वारा लागू किया क्योंकि इसमें हिंदू तत्व शामिल थे। किन्तु इन फतवों को दारुल उलूम देओबंद ने आलोचना की है, जो देओबंदी इस्लाम का भारत में शिक्षालय है।

सन 2009 मई में, तुर्की के निदेशालय के धार्मिक मामलों के मंत्रालय के प्रधान शासक अली बर्दाकोग्लू ने योग को एक व्यावसायिक उद्यम के रूप में घोषित किया- योग के संबंध में कुछ आलोचनाये जो इसलाम के तत्वों से मेल नहीं खातीं. 

सन 1989 में, वैटिकन ने घोषित किया कि ज़ेन और योग जैसे पूर्वी ध्यान प्रथाओं शरीर के एक गुट में बदज़ात हो सकते है।

वैटिकन के बयान के बावजूद, कई रोमन कैथोलिक उनके आध्यात्मिक प्रथाओं में योग , बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के तत्वों का प्रयोग किया है।

तंत्र एक प्रथा है जिसमें उनके अनुसरण करनेवालों का संबंध साधारण, धार्मिक, सामाजिक और तार्किक वास्तविकता में परिवर्तन ले आते है।

तांत्रिक अभ्यास में एक व्यक्ति वास्तविकता को माया, भ्रम के रूप में अनुभव करता है और यह व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त होता है।हिन्दू धर्म द्वारा प्रस्तुत किया गया निर्वाण के कई मार्गों में से यह विशेष मार्ग तंत्र को भारतीय धर्मों के प्रथाओं जैसे योग, ध्यान, और सामाजिक संन्यास से जोड़ता है, जो सामाजिक संबंधों और विधियों से अस्थायी या स्थायी वापसी पर आधारित हैं।

तांत्रिक प्रथाओं और अध्ययन के दौरान, छात्र को ध्यान तकनीक में, विशेष रूप से चक्र ध्यान, का निर्देश दिया जाता है। जिस तरह यह ध्यान जाना जाता है और तांत्रिक अनुयायियों एवं योगियों के तरीको के साथ तुलना में यह तांत्रिक प्रथाओं एक सीमित रूप में है, लेकिन सूत्रपात के पिछले ध्यान से ज्यादा विस्तृत है। 

इसे एक प्रकार का कुंडलिनी योग माना जाता है जिसके माध्यम से ध्यान और पूजा के लिए हृदय में स्थित चक्र में देवी को स्थापित करते है। 

वैसे तो योग हमेशा से हमारी प्राचीन धरोहर रही है। समय के साथ-साथ योग विश्व प्रख्यात तो हुआ ही है साथ ही इसके महत्व को जानने के बाद आज योग लोगों की दिनचर्या का अभिन्न अंग भी बन गया है। लेकिन योग के प्रचार-प्रसार में विश्व प्रसिद्ध योगगुरुओं का भी योगदान रहा है, जिनमें से अयंगार योग के संस्थापक बी के एस अयंगर स्वामी शिवानंद और योगगुरु रामदेव का नाम अधिक प्रसिद्ध है।

अयंगर को विश्व के अग्रणी योग गुरुओं में से एक माना जाता है और उन्होंने योग के दर्शन पर कई किताबें भी लिखी थीं, जिनमें 'लाइट ऑन योगा', 'लाइट ऑन प्राणायाम' और 'लाइट ऑन द योग सूत्राज ऑफ पतंजलि' शामिल हैं।  अयंगर का जन्‍म 14 दिसम्‍बर 1918 को बेल्‍लूर के एक गरीब परिवार में हुआ था। बताया जाता है कि अयंगर बचपन में काफी बीमार रहा करते थे। ठीक नहीं होने पर उन्‍हें योग करने की सलाह दी गयी और तभी से वह योग करने लगे। अयंगर को 'अयंगर योग' का जन्‍मदाता कहा जाता है। उन्होंने इस योग को देश-दुनिया में फैलाया। सांस की तकलीफ के चलते 20 अगस्त 2014 को उनका निधन हो गया।

बाबा रामदेव भारतीय योग-गुरु हैं, उन्होंने योगासन व प्राणायामयोग के क्षेत्र में योगदान दिया है। रामदेव स्वयं जगह-जगह जाकर योग शिविरों का आयोजन करते हैं।

योग का उद्देश्य योग के अभ्यास के कई लाभों के बारे में दुनिया भर में जागरूकता बढ़ाना है।लोगों के स्वास्थ्य पर योग के महत्व और प्रभावों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 21 जून को योग का अभ्यास किया जाता है। शब्द ‘योग‘ संस्कृत से लिया गया है जिसका अर्थ है जुड़ना या एकजुट होना।

वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली के कारण लोग संतोष पाने के लिए योग करते हैं। योग से न केवल व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है 
योग बहुत ही लाभकारी है। योग न केवल हमारे दिमाग, मस्‍तिष्‍क को ही ताकत पहुंचाता है बल्कि हमारी आत्‍मा को भी शुद्ध करता है। आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए योग बहुत ही फायदेमंद है। योग के फायदे से आज सब ज्ञात है, जिस वजह से आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है।

योग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार से लेकर मोक्ष (आत्मा को परमेश्वर का अनुभव) प्राप्त करने तक है। जैन धर्म, अद्वैत वेदांत के मोनिस्ट संप्रदाय और शैव सम्रदाय के अन्तर में योग का लक्ष्य मोक्ष का रूप लेता है, जो सभी सांसारिक कष्ट एवं जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्ति प्राप्त करना है, उस क्षण में परम ब्रह्मण के साथ समरूपता का एक एहसास है। महाभारत में, योग का लक्ष्य ब्रह्मा के दुनिया में प्रवेश के रूप में वर्णित किया गया है, ब्रह्म के रूप में, अथवा आत्मन को अनुभव करते हुए जो सभी वस्तुओं मे व्याप्त है।

मीर्चा एलीयाडे योग के बारे में कहते हैं कि यह सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम ही नहीं है, एक आध्यात्मिक तकनीक भी है।  सर्वपल्ली राधाकृष्णन लिखते हैं कि समाधि में निम्नलिखित तत्व शामिल हैं: वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता।




#Article 96: काशी (3656 words)


काशी नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित पौराणिक नगरी है। इसे संसार के सबसे पुरानी नगरों में माना जाता है। भारत की यह जगत्प्रसिद्ध प्राचीन नगरी गंगा के वाम (उत्तर) तट पर उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कोने में वरुणा और असी नदियों के गंगासंगमों के बीच बसी हुई है। इस स्थान पर गंगा ने प्राय: चार मील का दक्षिण से उत्तर की ओर घुमाव लिया है और इसी घुमाव के ऊपर इस नगरी की स्थिति है। इस नगर का प्राचीन 'वाराणसी' नाम लोकोच्चारण से 'बनारस' हो गया था जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने शासकीय रूप से पूर्ववत् 'वाराणसी' कर दिया है।

विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है - 'काशिरित्ते.. आप इवकाशिनासंगृभीता:'। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहां श्रीहरिके आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदुसरोवर बन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए। ऐसी एक कथा है कि जब भगवान शंकर ने क्रुद्ध होकर ब्रह्माजी का पांचवां सिर काट दिया, तो वह उनके करतल से चिपक गया। बारह वर्षों तक अनेक तीर्थों में भ्रमण करने पर भी वह सिर उन से अलग नहीं हुआ। किंतु जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और वह कपाल भी अलग हो गया। जहां यह घटना घटी, वह स्थान कपालमोचन-तीर्थ कहलाया। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास-स्थान बन गया।

हरिवंशपुराण के अनुसार काशी को बसानेवाले भरतवंशी राजा 'काश' थे। कुछ विद्वानों के मत में काशी वैदिक काल से भी पूर्व की नगरी है। शिव की उपासना का प्राचीनतम केंद्र होने के कारण ही इस धारणा का जन्म हुआ जान पड़ता है; क्योंकि सामान्य रूप से शिवोपासना को पूर्ववैदिककालीन माना जाता है। वैसे, काशी जनपद के निवासियों का सर्वप्रथम उल्लेख हमें अर्थर्ववेद की पैप्पलादसंहिता में (५, २२, १४) मिलता है। शुक्लयजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में (१३५, ४, १९) काशिराज धृतराष्ट्र का उल्लेख है जिसे शतानीक सत्राजित् ने पराजित किया था। बृहदारण्यकोपनिषद् में (२, १, १, ३, ८, २) काशिराज अजातशत्रु का भी उल्लेख है। कौषीतकी उपनिषद् (४, १) और बौधायन श्रौतसूत्र में काशी और विदेह तथा गोपथ ब्राह्मण में काशी और कोसल जनपदों का साथ-साथ वर्णन है। इसी प्रकार काशी, कोसल और विदेह के सामान्य पुरोहित जलजातूकर्ण्य का नाम शांखायन श्रौतसूत्र में प्राप्य है। काशी जनपद की प्राचीनता तथा इसकी स्थिति इन उपर्युक्त उल्लेखों से स्पष्ट हो जाती है। वाल्मीकि रामायण में (किष्किंधा कांड ४०, २२) सुग्रीव द्वारा वानरसेना को पूर्वदिशा की ओर भेजे जाने के संदर्भ में काशी और कोसल जनपद के निवासियों का एक साथ उल्लेख किया गया है– 

महाभारत में काशी जनपद के अनेक उल्लेख हैं और काशिराज की कन्याओं के भीष्म द्वारा अपहरण की कथा तो सर्वविदित ही है (आदि पूर्व, अध्याय १०२)। महाभारत के युद्ध में काशिराज ने पांडवों का साथ दिया था।

बौद्ध काल में, गौतम बुद्ध के जन्म के पूर्व तथा उनके समय में काशी को बहुत प्रसिद्धि प्राप्त हो चुकी थी। अंगुत्तरनिकाय में काशी की भारत के १६ महाजनपदों में गणना की गई है। जातक कथाओं में काशी जनपद का अनेक बार उल्लेख आया है, जिससे ज्ञात होता है कि काशी उस समय विद्या तथा व्यापार दोनों का ही केंद्र थी। अक्तिजातक में बोधिसत्व के १६ वर्ष की आयु में वहाँ जाकर विद्या ग्रहण करने का उल्लेख है। खंडहालजातक में काशी के सुंदर और मूल्यवान रेशमी कपड़ों का वर्णन है। भीमसेनजातक में यहाँ के उत्तम सुगंधित द्रव्यों का भी उल्लेख है। जातककथाओं से स्पष्ट है कि बुद्धपूर्वकाल में काशी देश पर ब्रह्मदत्त नाम के राजकुल का बहुत दिनों तक राज्य रहा। इन कहानियों से यह भी प्रकट है कि 'काशी' नगरनाम के अतिरिक्त एक देश या जनपद का नाम भी था। उसका दूसरा नगरनाम 'वाराणसी' था। इस प्रकार काशी जनपद की राजधानी के रूप में वाराणसी का नाम धीरे-धीरे प्रसिद्ध हो गया और कालांतर में काशी और वाराणसी ये दोनों अभिधान समानार्थक हो गए।

काशी और वहाँ प्रचलित शिवोपासना का उल्लेख महाभारत में भी है– ततो वाराणसीं गत्वा अर्चयित्वा वषध्वजम (वनपर्व, ८४, ७८)। कहा जाता है 'वाराणसी' नाम वरुणा और असी नदियों पर इस नगरी की स्थिति होने से पड़ा है। कीथ के अनुसार वरुणा नदी का उल्लेख अर्थर्ववेद के इस मंत्र में है– वारिद वारयातै वरुणावत्यामधि। तत्रामृतस्यासिक्तं तेना ते वारये विषम् (४, ७, १)। युवजयजातक में वाराणसी के ब्रह्मवद्धन (उब्रह्मवर्धन), सुरूंधन, सुदस्सन (उसुदर्शन), पुप्फवती (उपुष्पवती) और रम्म (उरम्या?) एवं संखजातक में मालिनी आदि नाम मिलते हैं। लोसकजातक में वाराणसी के चारों ओर की खाई या परिखा, का वर्णन है। 

गौतम बुद्ध के समय में काशी राज्य कोसल जनपद के अंतर्गत था। कोसल की राजकुमारी का मगधराज बिंबिसार के साथ विवाह होने के समय काशी को दहेज में दे दिया गया था। बुद्ध ने अपना सर्वप्रथम उपदेश वाराणसी के संनिकट सारनाथ में दिया था जिससे उसके तत्कालीन धार्मिक तथा सांस्कृतिक महत्व का पता चलता है। बिंबिसार के पुत्र अजातशत्रु ने काशी को मगध राज्य का अभिन्न भाग बना लिया और तत्पश्चात् मगध के उत्कर्षकाल में इसकी यही स्थिति बनी रही। बौद्ध धर्म की अवनति तथा हिंदू धर्म के पुनर्जागरण काल में काशी का महत्व संस्कृत भाषा तथा हिंदू संस्कृति के केंद्र के रूप में निरंतर बढ़ता ही गया, जिसका प्रमाण उस काल में लिखे गए या पुन: संपादित पुराणों द्वारा प्राप्त होता है। स्कंदपुराण में तो स्वतंत्र रूप से काशी के माहात्म्य पर 'काशीखंड' नामक अध्याय लिखा गया। पुराणों में काशी को मोक्षदायिनी पुरियों में स्थान दिया गया है। चीनी यात्री फ़ाह्यान (चौथी शती ई.) और युवानच्वांग अपनी यात्रा के दौरान काशी आए थे। युवानच्यांग ने सातवीं शताब्दी ई. के पूर्वार्ध में यहाँ लगभग ३० बौद्ध बिहार और १०० हिंदू मंदिर देखे थे। नवीं शताब्दी ई. में जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपने विद्याप्रचार से काशी को भारतीय संस्कृति तथा नवोदित आर्य धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया। काशी की यह सांस्कृतिक परंपरा आज तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।

भारतीय इतिहास के मध्य युग में मुसलमानों के आक्रमण के पश्चात् उस समय के अन्य सांस्कृतिक केंद्रों की भाँति काशी को भी दुर्दिन देखना पड़ा। ११९३ ई में मुहम्मद गोरी ने कन्नौज को जीत लिया, जिससे काशी का प्रदेश भी, जो इस समय कन्नौज के राठौड़ राजाओं के अधीन था, मुसलमानों के अधिकार में आ गया। दिल्ली के सुल्तानों के आधिपत्यकाल में भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं को काशी के ही अंक में शरण मिली। कबीर और रामानंद के धार्मिक और लोकमानस के प्रेरक विचारों ने उसे जीता-जागता रखने में पर्याप्त सहायता दी। मुगल सम्राट् अकबर ने हिंदू धर्म की प्राचीन परंपराओं के प्रति जो उदारता और अनुराग दिखाया, उसकी प्रेरणा पाकर भारतीय संस्कृति की धारा, जो बीच के काल में कुछ क्षीण हो चली थी, पुन: वेगवती हो गई और उसने तुलसीदास, मधुसूदन सरस्वती और पंडितराज जगन्नाथ जैसे महाकवियों और पंडितों को जन्म दिया एवं काशी पुन: अपने प्राचीन गौरव की अधिकारिणी बन गई। किंतु शीघ्र ही इतिहास के अनेक उलटफेरों के देखनेवाली इस नगरी को औरंगजेब की धर्मांधता का शिकार बनना पड़ा। उसने हिंदू धर्म के अन्य पवित्र स्थानों की भाँति काशी के भी प्राचीन मंदिरों को विध्वस्त करा दिया। मूल विश्वनाथ के मंदिर को तुड़वाकर उसके स्थान पर एक बड़ी मसजिद बनवाई जो आज भी वर्तमान है। मुगल साम्राज्य की अवनति होने पर अवध के नवाब सफ़दरजंग ने काशी पर अधिकार कर लिया; किंतु उसके पौत्र ने उसे ईस्ट इंडिया कंपनी को दे डाला। वर्तमान काशीनरेश के पूर्वज बलवंतसिंह ने अवध के नवाब से अपना संबंधविच्छेद कर लिया था। इस प्रकार काशी की रियासत का जन्म हुआ। चेतसिंह, जिन्होंने वारेन हेस्टिंग्ज़ से लोहा लिया था, इन्हीं के पुत्र थे। स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् काशी की रियासत भारत राज्य का अविच्छिन्न अंग बन गई। 

काशी में इस समय लगभग १, ५०० मंदिर हैं, जिनमें से बहुतों की परंपरा इतिहास के विविध कालों से जुड़ी हुई है। इनमें विश्वनाथ, संकटमोचन और दुर्गा के मंदिर भारत भर में प्रसिद्ध हैं। विश्वनाथ के मूल मंदिर की परंपरा अतीत के इतिहास के अज्ञात युगों तक चली गई है। वर्तमान मंदिर अधिक प्राचीन नहीं है। इसके शिखर पर महाराजा रणजीत सिंह ने सोने के पत्तर चढ़वा दिए थे। संकटमोचन मंदिर की स्थापना गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। दुर्गा के मंदिर को १७वीं शती में मराठों ने बनवाया था। घाटों के तट पर भी अनेक मंदिर बने हुए हैं। इनमें सबसे प्राचीन गहड़वालों का बनवाया राजघाट का 'आदिकेशव' मंदिर है। 

प्रसिद्ध घाटों में दशाश्वमेध, मणिकार्णिंका, हरिश्चंद्र और तुलसीघाट की गिनती की जा सकती है। दशाश्वमेध घाट पर ही जयपुर नरेश जयसिंह द्वितीय का बनवाया हुआ मानमंदिर या वेधशाला है। दशाश्वमेध घाट तीसरी सदी के भारशिव नागों के पराक्रम का स्मारक है। उन्होंने जब-जब अपने शत्रुओं को पराजित किया तब-तब यहीं अपने यज्ञ का अवभृथ स्नान किया। इस प्रकार के दस विजय यज्ञों से संबंधित काशी का यह घाट दशाश्वमेध नाम से विख्यात हुआ। नवीन मंदिरों में भारतमाता का मंदिर तथा तुलसीमानस मंदिर प्रसिद्ध हैं। आधुनिक शिक्षा के केंद्र काशी विश्वविद्यालय की स्थापना महामना मदनमोहन मालवीय ने १९१६ ई. में की। वैसे, प्राचीन परंपरा की संस्कृत पाठशालाएँ तो यहाँ सैकड़ों ही हैं जो संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, काशी (संस्थापित १९५८ ई.) से संबद्ध है। इसके अतिरिक्त यहाँ काशी विद्यापीठ (संस्थापित १९२१) नामक विश्वविद्यालय भी है जिसमें व्यावहारिक समाजशास्त्र की शिक्षा की भी व्यवस्था है। भारत की सांस्कृतिक राजधानी होने का गौरव इस प्राचीन नगरी को आज भी प्राप्त है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि काशी ने भारत की सांस्कृतिक एकता के निर्माण तथा संरक्षण में भारी योग दिया है। भारतेंदु आदि साहित्यकारों तथा नागरीप्रचारिणी सभा जैसी संस्थाओं को जन्म देकर काशी ने आधुनिक हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाया है।

वाराणसी के घाटों का दृश्य बड़ा ही मनोरम है। भागीरथी के धनुषाकार तट पर इन घाटों की पंक्तियाँ दूर तक चली गई हैं। प्रात: काल तो इनकी छटा अपूर्व ही होती है। पुरानी कहावत के अनुसार शामे अवध अर्थात् लखनऊ की शाम और सुबहे बनारस यानी वाराणसी का प्रात:काल देखने योग्य होता है। यहाँ की छोटी-छोटी और असाधारण रूप से सँकरी गलियाँ तथा उनमें स्वच्छंद विचरनेवाले साँड़ अपरिचितों के लिए कुतूहल की वस्तु हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदासने गंगा-तट पर वाराणसी नगर बसाया था। एक बार भगवान शंकर ने देखा कि पार्वती जी को अपने मायके (हिमालय-क्षेत्र) में रहने में संकोच होता है, तो उन्होंने किसी दूसरे सिद्धक्षेत्रमें रहने का विचार बनाया। उन्हें काशी अतिप्रिय लगी। वे यहां आ गए। भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा से देवता भी काशी में आ कर रहने लगे। राजा दिवोदास अपनी राजधानी काशी का आधिपत्य खो जाने से बडे दु:खी हुए। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान मांगा- देवता देवलोक में रहें, भूलोक (पृथ्वी) मनुष्यों के लिए रहे। सृष्टिकर्ता ने एवमस्तु कह दिया। इसके फलस्वरूप भगवान शंकर और देवगणों को काशी छोड़ने के लिए विवश होना पडा। शिवजी मन्दराचलपर्वत पर चले तो गए परंतु काशी से उनका मोह कम नहीं हुआ। महादेव को उनकी प्रिय काशी में पुन: बसाने के उद्देश्य से चौसठ योगनियों, सूर्यदेव, ब्रह्माजी और नारायण ने बड़ा प्रयास किया। गणेशजी के सहयोग से अन्ततोगत्वा यह अभियान सफल हुआ। ज्ञानोपदेश पाकर राजा दिवोदासविरक्त हो गए। उन्होंने स्वयं एक शिवलिंग की स्थापना करके उस की अर्चना की और बाद में वे दिव्य विमान पर बैठकर शिवलोक चले गए। महादेव काशी वापस आ गए।

काशी का इतना माहात्म्य है कि सबसे बड़े पुराण स्कन्दमहापुराण में काशीखण्ड के नाम से एक विस्तृत पृथक विभाग ही है। इस पुरी के बारह प्रसिद्ध नाम- काशी, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनन्दकानन, महाश्मशान, रुद्रावास, काशिका, तप:स्थली, मुक्तिभूमि, शिवपुरी, त्रिपुरारिराजनगरीऔर विश्वनाथनगरी हैं।

स्कन्दपुराण काशी की महिमा का गुण-गान करते हुए कहता है-

जो भूतल पर होने पर भी पृथ्वी से संबद्ध नहीं है, जो जगत की सीमाओं से बंधी होने पर भी सभी का बन्धन काटनेवाली (मोक्षदायिनी) है, जो महात्रिलोकपावनी गंगा के तट पर सुशोभित तथा देवताओं से सुसेवित है, त्रिपुरारि भगवान विश्वनाथ की राजधानी वह काशी संपूर्ण जगत् की रक्षा करे।
सनातन धर्म के ग्रंथों के अध्ययन से काशी का लोकोत्तर स्वरूप विदित होता है। कहा जाता है कि यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अत: प्रलय होने पर भी इसका नाश नहीं होता है। वरुणा और असि नामक नदियों के बीच पांच कोस में बसी होने के कारण इसे वाराणसी भी कहते हैं। काशी नाम का अर्थ भी यही है-जहां ब्रह्म प्रकाशित हो। भगवान शिव काशी को कभी नहीं छोडते। जहां देह त्यागने मात्र से प्राणी मुक्त हो जाय, वह अविमुक्त क्षेत्र यही है। सनातन धर्मावलंबियों का दृढ विश्वास है कि काशी में देहावसान के समय भगवान शंकर मरणोन्मुख प्राणी को तारकमन्त्र सुनाते हैं। इससे जीव को तत्वज्ञान हो जाता है और उसके सामने अपना ब्रह्मस्वरूप प्रकाशित हो जाता है। शास्त्रों का उद्घोष है- 

काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान विश्वेश्वर (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं। तारकमन्त्र सुन कर जीव भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
यह मान्यता है कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं। इस संदर्भ में काशीखण्ड में लिखा भी है-

ऐसा इसलिए है कि पांच कोस की संपूर्ण काशी ही विश्व के अधिपति भगवान विश्वनाथ का आधिभौतिक स्वरूप है। काशीखण्ड पूरी काशी को ही ज्योतिर्लिंग का स्वरूप मानता है-

पांच कोस परिमाण के अविमुक्त (काशी) नामक क्षेत्र को विश्वेश्वर (विश्वनाथ) संज्ञक ज्योतिर्लिंग-स्वरूप मानना चाहिए।

अनेक प्रकाण्ड विद्वानों ने काशी मरणान्मुक्ति:के सिद्धांत का समर्थन करते हुए बहुत कुछ लिखा और कहा है। रामकृष्ण मिशन के स्वामी शारदानंदजी द्वारा लिखित श्रीरामकृष्ण-लीलाप्रसंग नामक पुस्तक में श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का इस विषय में प्रत्यक्ष अनुभव वर्णित है। वह दृष्टांत बाबा विश्वनाथ द्वारा काशी में मृतक को तारकमन्त्र प्रदान करने का सत्य उजागर करता है। लेकिन यहां यह भी बात ध्यान रहे कि काशी में पाप करने वाले को मरणोपरांत मुक्ति मिलने से पहले अतिभयंकर भैरवी यातना भी भोगनी पडती है। सहस्रों वर्षो तक रुद्र पिशाच बन कर कुकर्मो का प्रायश्चित्त करने के उपरांत ही उसे मुक्ति मिलती है। किंतु काशी में प्राण त्यागने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता।

फाल्गुन शुक्ल-एकादशी को काशी में रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और काशी में होली का पर्वकाल प्रारंभ हो जाता है। 

मुक्तिदायिनीकाशी की यात्रा, यहां निवास और मरण तथा दाह-संस्कार का सौभाग्य पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप तथा बाबा विश्वनाथ की कृपा से ही प्राप्त होता है। तभी तो काशी की स्तुति में कहा गया है-

विश्वनाथजी की अति-श्रेष्ठ नगरी काशी पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप से ही प्राप्त होती है। यहां शरीर छोडने पर प्राणियों को मुक्ति अवश्य मिलती है। 
काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ कहते हैं- इदं मम प्रियंक्षेत्रं पंचक्रोशीपरीमितम्। पांच कोस तक विस्तृत यह क्षेत्र (काशी) मुझे अत्यंत प्रिय है। पतित-पावनी काशी में स्थित विश्वेश्वर (विश्वनाथ) ज्योतिर्लिंग सनातनकाल से हिंदुओं के लिए परम आराध्य है, किंतु जनसाधारण इस तथ्य से प्राय: अनभिज्ञ ही है कि यह ज्योतिर्लिंग पांच कोस तक विस्तार लिए हुए है- पंचक्रोशात्मकं लिंगंज्योतिरूपंसनातनम्। ज्ञानरूपा पंचक्रोशात्मक | यह पुण्यक्षेत्र काशी के नाम से भी जाना जाता है-ज्ञानरूपा तुकाशीयं पंचक्रोशपरिमिता। पद्मपुराण में लिखा है कि सृष्टि के प्रारंभ में जिस ज्योतिर्लिगका ब्रह्मा और विष्णुजी ने दर्शन किया, उसे ही वेद और संसार में काशी नाम से पुकारा गया-

पांच कोस की काशी चैतन्यरूप है। इसलिए यह प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होती। प्राचीन ब्रह्मवैक्‌र्त्तपुराणमें इस संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख है कि अमर ऋषिगण प्रलयकाल में श्री सनातन महाविष्णुसे पूछते हैं- हे भगवन्!वह छत्र के आकार की ज्योति जल के ऊपर कैसे प्रकाशित है, जो प्रलय के समय पृथ्वी के डूबने पर भी नहीं डूबती? महाविष्णुजी बोले-हे ऋषियो! लिंगरूपधारीसदाशिवमहादेव का हमने (सृष्टि के आरम्भ में) तीनों लोकों के कल्याण के लिए जब स्मरण किया, तब वे शम्भु एक बित्ता परिमाण के लिंग-रूप में हमारे हृदय से बाहर आए और फिर वे बढ़ते हुए अतिशय वृद्धि के साथ पांच कोस के हो गए-

यह काशी वही पंचक्रोशात्मकज्योतिर्लिगहै। काशीरहस्य के दूसरे अध्याय में यह कथानक मिलता है।
स्कन्दपुराणके काशीखण्डमें स्वयं भगवान शिव यह घोषणा करते हैं-

पांच कोस परिमाण का अविमुक्त (काशी) नामक जो महाक्षेत्र है, उस सम्पूर्ण पंचक्रोशात्मकक्षेत्र को विश्वेश्वर नामक एक ज्योतिर्लिंग ही मानें। इसी कारण काशी प्रलय होने पर भी नष्ट नहीं होती। काशीखण्डमें भगवान शंकर पांच कोस की पूरी काशी में बाबा विश्वनाथ का वास बताते हैं-

जैसे सूर्यदेव एक जगह स्थित होने पर भी सब को दिखाई देते हैं, वैसे ही संपूर्ण काशी में सर्वत्र बाबा विश्वनाथ का ही दर्शन होता है।

स्वयं विश्वेश्वर (विश्वनाथ) भी पांच कोस की अपनी पुरी (काशी) को अपना ही रूप कहते हैं- पंचक्रोश्या परिमितातनुरेषापुरी मम। काशी की सीमा के विषय में शास्त्रों का कथन है-असी- वरणयोर्मध्ये पंचक्रोशमहत्तरम। असी और वरुणा नदियों के मध्य स्थित पांच कोस के क्षेत्र (काशी) की बड़ी महिमा है। महादेव माता पार्वती से काशी का इस प्रकार गुणगान करते हैं-

भूलोक के समस्त क्षेत्रों में काशी साक्षात् मेरा शरीर है।

पंचक्रोशात् मकज्योतिर्लिग-स्वरूपाकाशी सम्पूर्ण विश्व के स्वामी श्री विश्वनाथ का निवास-स्थान होने से भव-बंधन से मुक्तिदायिनी है। धर्मग्रन्थों में कहा भी गया है-काशी मरणान्मुक्ति:। काशी की परिक्रमा करने से सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा का पुण्यफल प्राप्त होता है। भक्त सब पापों से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है। तीन पंचक्रोशी-परिक्रमा करने वाले के जन्म-जन्मान्तर के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। काशीवासियोंको कम से कम वर्ष में एक बार पंचकोसी-परिक्रमाअवश्य करनी चाहिए क्योंकि अन्य स्थानों पर किए गए पाप तो काशी की तीर्थयात्रा से उत्पन्न पुण्याग्नि में भस्म हो जाते हैं, परन्तु काशी में हुए पाप का नाश केवल पंचकोसी-प्रदक्षिणा से ही संभव है। काशी में सदाचार-संयम के साथ धर्म का पालन करना चाहिए। यह पर्यटन की नहीं वरन् तीर्थाटन की पावन स्थली है।

वस्तुत:काशी और विश्वेश्वर ज्योतिर्लिगमें तत्त्‍‌वत:कोई भेद नहीं है। नि:संदेह सम्पूर्ण काशी ही बाबा विश्वनाथ का स्वरूप है। काशी-महात्म्य में ऋषियों का उद्घोष है-काशी सर्वाऽपिविश्वेशरूपिणीनात्रसंशय:। अतएव काशी को विश्वनाथजी का रूप मानने में कोई संशय न करें और भक्ति-भाव से नित्य जप करें- शिव: काशी शिव: काशी, काशी काशी शिव: शिव:। ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि (निर्जला एकादशी) के दिन श्री काशीविश्वनाथ की वार्षिक कलश-यात्रा वाराणसी में बडी धूमधाम एवं श्रद्धा के साथ आयोजित होती है, जिसमें बाबा का पंचमहानदियोंके जल से अभिषेक होता है।

काशी की महिमा विभिन्न धर्मग्रन्थों में गायी गयी है। काशी शब्द का अर्थ है, प्रकाश देने वाली नगरी। जिस स्थान से ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलता है, उसे काशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी-क्षेत्र में देहान्त होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है, काश्यांमरणान्मुक्ति:। 
काशी-क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने के लिए पुराकालमें पंचक्रोशीमार्ग का निर्माण किया गया। जिस वर्ष अधिमास (अधिक मास) लगता है, उस वर्ष इस महीने में पंचक्रोशीयात्रा की जाती है। पंचक्रोशी (पंचकोसी) यात्रा करके भक्तगण भगवान शिव और उनकी नगरी काशी के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। लोक में ऐसी मान्यता है कि पंचक्रोशीयात्रा से लौकिक और पारलौकिक अभीष्टिकी सिद्धि होती है। अधिमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। लोक-भाषा में इसे मलमास कहा जाता है। इस वर्ष मलमास प्रथम-ज्येष्ठ शुक्ल (अधिक) प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर द्वितीय-ज्येष्ठ कृष्णपक्ष (अधिक) अमावस्या तिथि को समाप्त होगा। 

पंचक्रोशीयात्रा के कुछ नियम है, जिनका पालन यात्रियों को करना पड़ता है। परिक्रमा नंगे पांव की जाती है। वाहन से परिक्रमा करने पर पंचक्रोशी-यात्राका पुण्य नहीं मिलता। शौचादिक्रिया काशी-क्षेत्र से बाहर करने का विधान है। परिक्रमा करते समय शिव-विषयक भजन-कीर्तन करने का विधान है। कुछ ऐसे भी यात्री होते हैं, जो सम्पूर्ण परिक्रमा दण्डवत करते हैं। यात्री हर-हर महादेव शम्भो, काशी विश्वनाथ गंगे, काशी विश्वनाथ गंगे, माता पार्वती संगेका मधुर गान करते हुए परिक्रमा करते हैं। साधु, महात्मा एवं संस्कृतज्ञयात्री महिम्नस्त्रोत, शिवताण्डव एवं रुद्राष्टकका सस्वर गायन करते हुए परिक्रमा करते हैं। महिलाएं सामूहिक रूप से शिव-विषयक लोक गीतों का गायन करती हैं। परिक्रमा अवधि में शाकाहारी भोजन करने का विधान है। पंचक्रोशीयात्रा मणिकर्णिकाघाट से प्रारम्भ होती है। सर्वप्रथम यात्रीगणमणिकर्णिकाकुण्ड एवं गंगा जी में स्नान करते हैं। इसके बाद परिक्रमा-संकल्प लेने के लिए ज्ञानवापी जाते हैं। यहां पर पंडे यात्रियों को संकल्प दिलाते हैं। संकल्प लेने के उपरांत यात्री श्रृंगार गौरी, बाबा विश्वनाथ एवं अन्नपूर्णा जी का दर्शन करके पुन:मणिकर्णिकाघाट लौट आते हैं। यहां वे मणिकर्णिकेश्वरमहादेव एवं सिद्धि विनायक का दर्शन-पूजन करके पंचक्रोशीयात्रा का प्रारम्भ करते हैं। गंगा के किनारे-किनारे चलकर यात्री अस्सी घाट आते है। यहां से वे नगर में प्रवेश करते है। लंका, नरिया, करौंदी, आदित्यनगर, चितईपुरहोते हुए यात्री प्रथम पडाव कन्दवा पर पहुंचते हैं। यहां वे कर्दमेश्वरमहादेव का दर्शन-पूजन करके रात्रि-विश्राम करते हैं। रास्ते में पडने वाले सभी मंदिरों में यात्री देव-पूजन करते हैं। अक्षत और द्रव्य दान करते हैं। रास्ते में स्थान-स्थान पर भिक्षार्थी यात्रियों को नंदी के प्रतीक के रूप में सजे हुए वृषभ का दर्शन कराते हैं और यात्री उन्हें दान-दक्षिणा देते हैं। कुछ भिक्षार्थी शिव की सर्पमालाके प्रतीक रूप में यात्रियों को सर्प-दर्शन कराते हैं और बदले में अक्षत और द्रव्य-दान प्राप्त करते हैं। कुछ सड़क पर चद्दर बिछाए बैठे रहते हैं। यात्रीगण उन्हें भी निराश नहीं करते। अधिकांश यात्री अपनी गठरी अपने सिर पर रखकर पंचक्रोशीयात्रा करते हैं। परिक्रमा-अवधि में यात्री अपनी पारिवारिक और व्यक्तिगत चिन्ताओं से मुक्त होकर पांच दिनों के लिए शिवमय, काशीमय हो जाते हैं। दूसरे दिन भोर में यात्री कन्दवा से अगले पड़ाव के लिए चलते हैं। अगला पड़ाव है भीमचण्डी। यहां यात्री दुर्गामंदिर में दुर्गा जी की पूजा करते हैं और पहले पड़ाव के सारे कर्मकाण्ड को दुहराते हैं। पंचक्रोशीयात्रा का तीसरा पडाव रामेश्वर है। यहां शिव-मंदिर में यात्रीगणशिव-पूजा करते हैं। चौथा पड़ाव पांचों-पण्डवा है। यह पड़ाव शिवपुर क्षेत्र में पडता है। यहां पांचों पाण्डव (युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल तथा सहदेव) की मूर्तियां हैं। द्रौपदीकुण्ड में स्नान करके यात्रीगणपांचों पाण्डवों का दर्शन करते हैं। रात्रि-विश्राम के उपरांत यात्री पांचवें दिन अंतिम पड़ाव के लिए प्रस्थान करते हैं। अंतिम पड़ाव कपिलधारा है। यात्रीगणयहां कपिलेश्वर महादेव की पूजा करते हैं। काशी परिक्रमा में पांच की प्रधानता है। यात्री प्रतिदिन पांच कोस की यात्रा करते हैं। पड़ाव संख्या भी पांच है। परिक्रमा पांच दिनों तक चलती है। कपिलधारा से यात्रीगण मणिकर्णिका घाट आते हैं। यहां वे साक्षी विनायक (गणेश जी) का दर्शन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि गणेश जी भगवान शंकर के सम्मुख इस बात का साक्ष्य देते हैं कि अमुक यात्री ने पंचक्रोशीयात्रा कर काशी की परिक्रमा की है। इसके उपरांत यात्री काशी विश्वनाथ एवं काल-भैरव का दर्शन कर यात्रा-संकल्प पूर्ण करते हैं।

काशी में काशी खंडोकत मन्दिर भी है जिनके दर्शन यात्रा से मोक्ष की प्राप्ति होती है -

इनके दर्शन से ही काशी यात्रा पूर्ण होती है जिनका वर्णन काशी खण्ड में उल्लेखनीय है। इसी यात्रा को पंचकोशी यात्रा भी कहा जाता है।

सराय मोहना घाट




#Article 97: रबीन्द्रनाथ ठाकुर (1565 words)


रबीन्द्रनाथ ठाकुर या रबीन्द्रनाथ टैगोर (बंगाली: রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর रबीन्द्रनाथ ठाकुर) (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के  नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बाँग्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म देवेन्द्रनाथ टैगोर  और शारदा देवी के सन्तान के रूप में ७ मई १८६१ को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनकी आरम्भिक शिक्षा प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की इच्छा में १८७८ में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम लिखाया फिर लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन १८८० में बिना डिग्री प्राप्त किए ही स्वदेश वापस लौट आए। सन् १८८३ में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ।

टैगोर की माता का निधन उनके बचपन में हो गया था और उनके पिता व्यापक रूप से यात्रा करने वाले व्यक्ति थे, अतः उनका लालन-पालन अधिकांशतः नौकरों द्वारा ही किया गया था। टैगोर परिवार बंगाल पुनर्जागरण के समय अग्रणी था उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया; बंगाली और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत एवं रंगमंच और पटकथाएं वहां नियमित रूप से प्रदर्शित हुईं थीं। टैगोर के पिता ने कई पेशेवर ध्रुपद संगीतकारों को घर में रहने और बच्चों को भारतीय शास्त्रीय संगीत पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया था। टैगोर के सबसे बड़े भाई द्विजेंद्रनाथ एक दार्शनिक और कवि थे एवं दूसरे भाई सत्येंद्रनाथ कुलीन और पूर्व में सभी यूरोपीय सिविल सेवा के लिए पहले भारतीय नियुक्त व्यक्ति थे। एक भाई ज्योतिरिंद्रनाथ, संगीतकार और नाटककार थे एवं इनकी बहिन स्वर्णकुमारी उपन्यासकार थीं। ज्योतिरिंद्रनाथ की पत्नी कादंबरी देवी सम्भवतः टैगोर से थोड़ी बड़ी थीं व उनकी प्रिय मित्र और शक्तिशाली प्रभाव वाली स्त्री थीं जिन्होंने १८८४ में अचानक आत्महत्या कर ली। इस कारण टैगोर और इनका शेष परिवार कुछ समय तक काफ़ी समस्याओं से घिरा रहा था।

इसके बाद टैगोर ने बड़े पैमाने पर विद्यालयी कक्षा की पढ़ाई से परहेज किया और मैरर या पास के बोलपुर और पनिहती में घूमने को प्राथमिकता दी, और फिर परिवार के   साथ कई जगहों का दौरा किया। उनके भाई हेमेंन्द्रनाथ ने उसे पढ़ाया और शारीरिक रूप से उसे वातानुकूलित  किया - गंगा को तैरते हुए या पहाड़ियों के माध्यम से, जिमनास्टिक्स द्वारा, और जूडो और कुश्ती अभ्यास करना उनके भाई ने सिखाया था। टैगोर ने ड्राइंग, शरीर विज्ञान, भूगोल और इतिहास, साहित्य, गणित, संस्कृत और अंग्रेजी को अपने सबसे पसंदीदा विषय का अध्ययन किया था। हालाँकि टैगोर ने औपचारिक शिक्षा से नाराजगी व्यक्त की - स्थानीय प्रेसीडेंसी कॉलेज में उनके विद्वानों से पीड़ित एक दिन का दिन था। कई सालों बाद उन्होंने कहा कि उचित शिक्षण चीजों की व्याख्या नहीं करता है; उनके अनुसार उचित शिक्षण, जिज्ञासा है।

ग्यारह वर्ष की उम्र में उनके उपनयन (आने वाला आजीवन) संस्कार के बाद, टैगोर और उनके पिता कई महीनों के लिए भारत का दौरा करने के लिए फरवरी १८७३ में कलकत्ता छोड़कर अपने पिता के शांतिनिकेतन सम्पत्ति और अमृतसर से  डेलाहौसी के हिमालयी पर्वतीय स्थल तक निकल गए थे। वहां टैगोर ने जीवनी, इतिहास, खगोल विज्ञान, आधुनिक विज्ञान और संस्कृत का अध्ययन किया था और कालिदास की शास्त्रीय कविताओं के बारे में भी पढ़ाई की थी। १८७३ में अमृतसर में अपने एक महीने के प्रवास के दौरान, वह सुप्रभात गुरबानी और नानक बनी से बहुत प्रभावित हुए थे, जिन्हें स्वर्ण मंदिर में गाया जाता था जिसके लिए दोनों पिता और पुत्र नियमित रूप से आगंतुक थे। उन्होंने इसके बारे में अपनी पुस्तक मेरी यादों में उल्लेख किया जो १९१२ में प्रकाशित हुई थी।

बचपन से ही उनकी कविता, छन्द और भाषा में अद्भुत प्रतिभा का आभास लोगों को मिलने लगा था। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और सन् १८७७ में केवल सोलह साल की उम्र में उनकी प्रथम लघुकथा प्रकाशित हुई थी। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूँकने वाले युगदृष्टा टैगोर के सृजन संसार में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं। देश और विदेश के सारे साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि उन्होंने आहरण करके अपने अन्दर समेट लिए थे। पिता के ब्राह्मसमाजी के होने के कारण वे भी ब्रह्म-समाजी थे। पर अपनी रचनाओं व कर्म के द्वारा उन्होंने सनातन धर्म को भी आगे बढ़ाया।
मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनकी रचनाओं के अन्दर वह अलग-अलग रूपों में उभर आता है। साहित्य की शायद ही ऐसी कोई शाखा हो, जिनमें उनकी रचना न हो - कविता, गान, कथा, उपन्यास, नाटक, प्रबन्ध, शिल्पकला - सभी विधाओं में उन्होंने रचना की। उनकी प्रकाशित कृतियों में [गीतांजलि|गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। अंग्रेज़ी अनुवाद के बाद उनकी प्रतिभा पूरे विश्व में फैली।

टैगोर ने अपने जीवनकाल में कई उपन्यास, निबंध, लघु कथाएँ, यात्रावृन्त, नाटक और हजारों गाने भी लिखे हैं। रबीन्द्रनाथ टैगोर ज्यादातर अपनी पद्य कविताओं के लिए जाने जाते हैं। टैगोर की गद्य में लिखी उनकी छोटी कहानियों को शायद सबसे अधिक लोकप्रिय माना जाता है; इस प्रकार इन्हें वास्तव में बंगाली भाषा के संस्करण की उत्पत्ति का श्रेय दिया जाता है। उनके काम अक्सर उनके लयबद्ध, आशावादी, और गीतात्मक प्रकृति के लिए काफी उल्लेखनीय हैं। टैगोर ने इतिहास, भाषाविज्ञान और आध्यात्मिकता से जुड़ी कई किताबें लिखी थी। टैगोर के यात्रावृन्त, निबंध, और व्याख्यान कई खंडों में संकलित किए गए थे, जिनमें यूरोप के जटरिर पत्रों (यूरोप से पत्र) और 'मनुशर धर्म' (मनुष्य का धर्म) शामिल थे। अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ उनकी संक्षिप्त बातचीत, वास्तविकता की प्रकृति पर नोट, बाद के उत्तरार्धों के एक परिशिष्ट के रूप में शामिल किया गया है।

टैगोर के १५० वें जन्मदिन के अवसर पर उनके कार्यों का एक (कालनुक्रोमिक रबीन्द्र रचनाबली) नामक एक संकलन वर्तमान में बंगाली कालानुक्रमिक क्रम में प्रकाशित किया गया है। इसमें प्रत्येक कार्य के सभी संस्करण शामिल हैं और लगभग अस्सी संस्करण है। २०११ में, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने विश्व-भारती विश्वविद्यालय के साथ अंग्रेजी में उपलब्ध टैगोर के कार्यों की सबसे बड़ी संकलन द एसेंटियल टैगोर, को प्रकाशित करने के लिए सहयोग किया है यह फकराल आलम और राधा चक्रवर्ती द्वारा संपादित की गयी थी और टैगोर के जन्म की १५० वीं वर्षगांठ की निशानी हैं।

टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बाँग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएँ तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित ये गीत मानवीय भावनाओं के अलग-अलग रंग प्रस्तुत करते हैं।

अलग-अलग रागों में गुरुदेव के गीत यह आभास कराते हैं मानो उनकी रचना उस राग विशेष के लिए ही की गई थी। प्रकृति के प्रति गहरा लगाव रखने वाला यह प्रकृति प्रेमी ऐसा एकमात्र व्यक्ति है जिसने दो देशों के लिए राष्ट्रगान लिखा।

गुरुदेव ने जीवन के अंतिम दिनों में चित्र बनाना शुरू किया। इसमें युग का संशय, मोह, क्लान्ति और निराशा के स्वर प्रकट हुए हैं। मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनकी रचनाओं में वह अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया। टैगोर और महात्मा गाँधी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गान्धी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे। टैगोर ने गान्धीजी को महात्मा का विशेषण दिया था। एक समय था जब शान्तिनिकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे। उस समय गान्धी जी ने टैगोर को 60 हजार रुपये के अनुदान का चेक दिया था।

जीवन के अन्तिम समय ७ अगस्त १९४१ से कुछ समय पहले इलाज के लिए जब उन्हें शान्तिनिकेतन से कोलकाता ले जाया जा रहा था तो उनकी नातिन ने कहा कि आपको मालूम है हमारे यहाँ नया पावर हाउस बन रहा है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हाँ पुराना आलोक चला जाएगा और नए का आगमन होगा।

उनकी काव्यरचना गीतांजलि के लिये उन्हे सन् १९१३ में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। सन् १९१५ में उन्हें राजा जॉर्ज पंचम ने नाइटहुड की पदवी से सम्मानित किया जिसे  उन्होंने सन् १९१९ में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में वापस कर दिया था।

गुरुदेव के नाम से रबीन्द्र नाथ टैगोर ने बांग्ला साहित्य को एक नई दिशा दी। उन्होंने बंगाली साहित्य में नए तरह के पद्य और गद्य के साथ बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग किया। इससे बंगाली साहित्य क्लासिकल संस्कृत के प्रभाव से मुक्त हो गया। टैगोर की रचनायें बांग्ला साहित्य में एक नई ऊर्जा ले कर आई। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। इनमे चोखेर बाली, घरे बहिरे, गोरा आदि शामिल है। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्गीय समाज विशेष रूप से उभर कर सामने आया। 1913 ईस्वी में गीतांजलि के लिए इन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला जो कि एशिया मे प्रथम विजेता साहित्य मे है। मात्र आठ वर्ष की उम्र मे पहली कविता और केवल 16 वर्ष की उम्र मे पहली लघुकथा प्रकाशित कर बांग्ला साहित्य मे एक नए युग की शुरुआत की रूपरेखा तैयार की। उनकी कविताओं में नदी और बादल की अठखेलियों से लेकर अध्यात्मवाद तक के विभिन्न विषयों को बखूबी उकेरा गया है। उनकी कविता पढ़ने से उपनिषद की भावनाएं परिलक्षित होती है।




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